Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1191–1200
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1191–1200
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पञ्चम अध्याय ख गब्राह्मरण प्रथमकाण्ड विसृजातिम् ( E ) || ये देवा दिविभागा ये ऽन्तरिक्षभागा ये पृथिवीभागाः, त इमं यज्ञ-मत्रन्तु त इदं क्षेत्रमाविशन्तु त इदं क्षेत्रमनुविशन्तु ( १० ) । - तै ० सं ० २।४८ । उत्तराङ्गमन्त्रत्र्याख्यानम् ( ३ ) " देवा वसव्या, देवाः शमण्या, देवाः सपीतय, इत्याबध्नाति । देवताभिरेवान्वहं वृष्टिमिच्छति । यदि वर्षेत्तावत्येव होतव्यम् । यदि न वर्णेत् श्वोभृते हविर्निर्वपेत् । अहोरात्रे नै मित्रावरुणौ । अहोरात्राभ्यां खल वै पर्जन्यो वर्णति । नक्त ं वा हि दिना वा वर्षति । मित्रवरुणावेव स्वेन भागधेयेनोपधावति । तावेवास्मै अहोरात्राभ्यां पर्जन्यं वर्षयतः । अग्नये धामच्छदे पुरोडाशमष्टाकपालं निर्वपेत्, मारुतं सप्तकपालं, सौर्यमेककपालम् । अग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीरयति, मरुतः सृष्टां नय-न्ति, यदा खल वा असावादित्यों न्यङ रश्मिभिः पर्यावर्त्तते, अथ वर्षति । धामच्छदिग खलु में भूत्वा वर्षति । एता को देवता दृष्ट्या ईशते । ता एव स्वेन भागधेयेनोपधावति । ता एवास्मै पर्जन्यं वर्णयन्ति । उतावर्षिष्यन् वत्येव । सृजा वृष्टिं दिन, आद्भिः समुद्र ं पृण, इत्याह । इमा-वामश्चाप समर्द्धयति 1 । अथों आभिरेवामूरच्छति । कब्जा असि प्रथमजा, बलमसि समुद्रियं इत्याह । यथा यजुरेवैतत् । उन्नम्भय पृथिवीं इति वर्षाह्वां जुहोति । एषा वा ओषधीनां वृष्टिवनिः । तयैा वृष्टिमाच्याचयति । ये देवा दित्रि भागा - इति कृष्णाजिनम-धूनोति । इम एवास्में लोका: प्रीता अभीष्टा भवन्ति " | - ते ० सं ० २।४।१० । तैत्तिरीय - संहिता के चार अनुवाकों से सम्बन्ध रखने वाले मन्त्रभाग से सुप्रसिद्ध ' कारीरीष्टि ' की इतिकर्त्तव्यता का ही स्पष्टीकरण हुआ है । कम्र्मेतिकर्तव्यता के साथ साथ रक्त इष्टिप्रकरण में दृष्टि से सम्बन्ध रखने वाले श्राधिदैविक विज्ञान का भी अ ंशतः विश्लेषण हुआ है । ' मारुतमसि ' यहाँ से इसका उपक्रम है । एवं ' अभीष्टा भवन्ति ' पर अवसान है । उपक्रमवाक्य यह सूचित कर रहा है कि, अन्तरिक्ष्य मरुद्द देवता [ वायुदेवता ] ही वृष्टिकर्म्म के प्रधान निमित्त हैं । यद्यपि अग्नि, सूर्य, विद्युत्, स्तनयित्नु, सोम, मेघ, यदि सभी निमित्त बनते हैं । परन्तु इन सत्र प्राणों का समन्वय एकमात्र गतिधर्म्मा वायु के सञ्चार पर ही निर्भर है । अतएव बायु को ही प्रधान निमित्त माना जासकता है । अतएव प्राच्यङ्गमन्त्रव्याख्यानश्रुति में ' वायुर्वै वृथा ईशे ' इत्यादिरूप से वायु को ही ॠष्टि का प्रधान प्रवर्त्तके बतलाया गया है । इसी श्रौत सिद्धान्त नम्नलिखित चचन प्रतिष्टित हुए हैं-III
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पञ्चम- श्रध्याय स गब्राह्मण सूर्य दक्षिणगोलस्थे तप्तादन्धेर बुत्थितिः ॥ तत्तोयं वायुना क्षिप्तं देशे देशे प्रवर्षति ॥ ५ ॥
न सूर्यो न च नक्षत्रं न चन्द्रस्तत्र कारणम् ॥ वायुनैवोद्धृतं तोयं वायुरेव प्रवर्षति ॥ २ ॥
- श्रीगुरुप्रणीता कादम्बिनी प्रथमकाण्ड दृष्टि है भौतिक द्रव्यों पर, एवं मनोयोग है - आधिदैविक प्राण- देवताओं के साथ, यही सम्पूर्ण मन्त्रभाग का तात्त्विक निष्कर्ष है । कारीरी इष्टि में काला वस्त्र पहिना जाता है, जिसके चारों कोने गहरे काले होते हैं | यही बस्त्र ‘ कृष्णतूप - कृष्ण - वास ' कहलाया है । यह कृष्णवस्त्र धामच्छद मेघ, कृष्ण-जल, एवं कृष्णमरुत्, इत्यादि का प्रतिनिधि माना गया है । वही वृष्टि का स्वरूप है । मेघ इसी रूप में परिणत होकर बरसता है । इसीप्रकार कारीर सौम्यप्राण का संग्राहक है । बातहोम अविध नाक्षत्रिक सर्प - वायु का संग्राहक है । पार्थिव अग्नि धामच्छद है । वसु - सम्बन्धेन वह मृष्टावयव है । आन्त-रिक्ष्य मरुत् सप्तावयव है, सूर्य्य ' एकल एव स्थाता ' । दृष्टिकर्म्म में तीनों का सहयोग अपेक्षित है । अतएव कारीरी इष्टि में धामच्छद अग्नि, मरुत्वान् वायु, सौर इन्द्र तीनों के लिए क्रमशः अाकपाल -- सप्तकपाल- ' एककपाल - गुरोडाश का निर्वाप होता है । तीनों देवताओं का उपयोग स्पष्ट है । पार्थित्र अग्नि जलमात्रा ऊपर फेंकता है, आन्तरिक्ष्य मरुत्वान उसे अपने गर्भ में रखता हैं, एवं सूर्य रश्मियों से बरसा देते हैं । अग्निर्वा इतो वृष्टिदोरयति ' इत्यादि से इसी उपयोग का स्पष्टीकरण हुआ है । ' ये देवा दिवि भाग |: ( ऐन्द्राः ), येऽन्तरिक्ष भागा ( वायत्र्याः ), ये पृथिवीभागाः ( आग्नेयाः ) के अनुसार तीनों हीं इस दृष्टियज्ञ [ कारीरीष्टिं ] के स्वरूप - सम्पादक हैं । अवश्य ही तत्तत् प्राणदेवतानुरूप कृष्णवास, करीर, पुरोडाशादि तत्तत् भौतिक द्रव्यों के माध्यम से तत्तत्प्राणदेवताओं के द्वारा अभीष्टसिद्धि [ वर्षा ] होताती है । ' इम एवास्मै लोकाः प्रीता अभीष्टा भवन्ति ' इस उपसंहार --वाक्य से इसी कर्म्मसिद्धि का समर्थन हुआ है 1 यज्ञप्रक्रियाओं से क्या सम्भव नहीं?, आवश्यकता है - - रहस्यज्ञान पूर्वक उनके अनुगमग की । प्राकृतिक प्राण -- देवताओं के प्रकृतिविरुद्ध होजाने से ही अनावृष्टि, अतिवृष्टि -जनित दुष्काल, जनपद - विद्-ध्वंसिनी, करकापात, उल्कापात आग्नेय - वारुण - ऐन्द्र- वायव्यादि भूकम्प, आदि बिघ्न उपस्थित हुआकरते हैं । मानयसमाज प्राकृतिक विश्व का अवयव है । इसके प्रकृतिविरुद्ध गमन से ही अवयवी रूप प्राकृतिक विश्व के प्राकृतिक विधानों में अव्यवस्था का समावेश स्वतः सिद्ध है । इसप्रकार प्रकृतिविरुद्ध आचरण करते हुए हम स्वयं ही उक्त विघ्नों के प्रवर्त्तक बनते हैं । वर्तमान युग के मान वसमाज की इसी चिकृति से आज पदे पदे हमें इन विघ्नों का आक्रमण सहना पड़ रहा है । ऋषिप्रदिष्ट चिकित्सामार्ग ( यज्ञ ) आज के शिक्षित समाज के लिए जहाँ उपहास की वस्तु बन रहा है, वहाँ प्रकृति को अधिकाधिक संक्षुब्ध करने १४६४
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पञ्चम अध्याय न गत्राह्मण शतपथब्राह्मण वाले अभक्ष्य भक्षण, अगम्यागमन, अस्पृश्य- स्पर्शन, देव - द्विज - गुरु - शुश्रुषा परित्याग, सच्छा-स्त्रनिन्दा, मलिनीकरण - संकरीकरण जातिभ्रंशकर, आदि पातक - अतिपातक - महापातक निन्द्य सम्मों में प्रवृत्ति, मर्यादोल्लंघन, कल्पित साम्यवाद की घोषणा, सर्वोपरि दुराग्रह, श्रादि यदि अधर्म्मपथ ग्राह्य बने हुए हैं । स्मरण रखिए, जबतक प्रकृति का अनुग्रह प्राप्त नहीं कर लिया जायगा, तत्रतक एक दो - चार - टस नहीं, सहस्रों आन्दोलनों से भी; जिनके मूल में घातक व्यक्ति प्रतिष्ठा का मोह प्रतिष्ठित है - मानब समाज सुस्थिर नहीं बन सकेगा । इस के लिए तो प्राकृतिक विश्व की सुस्थिरता ही प्रधान साधन होगा । एवं इस साधन के लिए प्राकृतिक नियम- संघातलक्षण शाश्वत सनातनधम्मं - पथ ही एकमात्र श्रेयः पन्था माना जायगा । भ्रान्त- मानवसमाज के श्रभ्युदय के लिए उसी प्रशस्त पथ की भावना करते हुए बुद्धिगम्याभाषा से सम्बन्ध रखने वाला वृष्टिविज्ञान - प्रकरण उपरत होता है, एवं सड्जभाषानुगामी प्रकरण का संक्षिप्त निरूपण उपक्रान्त होता है । एक वर्ष में यों तो वसन्तादि ६ ऋतुएँ [ मौसम ] मानी गई हैं, परन्तु ' ग्रीष्म र्पा - शीत ' इन तीन स्थूल ऋतुओं का तो सर्वसाधारण को भी बोध है ही । इह्रीं तीनों को लक्ष्य बनाकर कहा जाता है--' त्रयो वा ऋतवः सम्वत्सरस्य ' [ शत ० ३ | ४ | ४ | १७ ] | सहजभाषा में ये ही तोनों क्रमश: गर्मी, बर--सात, सर्दी, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । इन तीनों मौसमों के प्रत्येक के ४-४ महीनें होजाते हैं | इस और चतुर्मासात्मिका गर्मी है, उस ओर चतुर्मासात्मिका सर्दी है, मध्यमें चतुर्मासामिका न्वरसात है । त्ररसात दोनों के मध्य में हैं । और ऐसा एक लौकिकन्याय [ व्यवहार ] है कि, मध्यस्थ पदार्थ का इधर - उधर रहने वाले दोनों पार्श्ववर्ती पदार्थों से ग्रहण होजाता है । अतएव कहा जासकता है कि, एक वर्ष में केवल गर्मी, एवं सर्दी, ये दो ही मौसम हैं । बरसात का ग्रहण इन दोनों के ग्रहण से ही चरितार्थ है । इसी व्यवहार के आधार पर पूरे वर्ष में ग्रीष्मकाल, शीतकाल, ये दो ही मौसम मान लिए जाते हैं । ग्रीष्मकाल उष्णकाल है, इसी का अपभ्रंश ' उहालू ' है । एवं शीतकाल का अपभ्रंश ' श्यालू ’ है । वर्ष में ये दो ही ' कृषि ' [ फसल होतीं हैं । यदि और भी सूक्ष्म विचार किया जाता है, तो हमें इस तथ्य पर पहुँचना पड़ता है कि, त्रस्तुतः गर्मी ही सम्पूर्ण वर्ष की मूलप्रतिष्ठा है । कारण स्पष्ट है । पृथिवी पर रहने वालों के लिए पार्थिवी ऋतुओं को ही प्रधानता दी जायगी । एवं अग्मिभू स्थान: ' - ' यथाग्नि-गर्भा पृथिवी ' इत्यादि वचनों के अनुसार पृथिवी में अग्नितत्त्व की ही प्रधानता है । अतएव मानना पड़ेगा कि, पार्थिव प्रजा से सम्बन्ध रखने वाली ऋतुओं में पार्थिव अग्नि की ही प्रधानता है । अग्नि की ह्रास-वृद्धि से ही पार्थिव २, ३, ५, ६, ७, आदि विभिन्न ऋतुओं की अभिव्यक्ति होती है । जिसे हम ' शीत ' कहते हैं ‘ वही विज्ञानभाषा में ' सोम ' तत्त्व है । इस सोमतत्त्व के भास्वर सोम, दिक्-सोम, भेद से दो विवर्त्त माने गए हैं । प्रत्यक्षदृष्ट आन्तरिक्ष्य चन्द्रमा ही भास्वरसोम है । यही ' सहृदयं सशरीरं - सत्यम् ' परिभाषानुसार केन्द्रानुगत पिण्डावच्छिन्न चान्द्रभास्वर [ ज्योतिर्मय चमकीला ] सोम * तन्मध्यपतितस्तद्ग्रहणेन गृह्यते । ( लौकिकन्याय ) १४६५
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पञ्चम अध्याय स गब्राह्मण शतपथब्राह्मण अवश्य ही ' सत्य सोम ' माना जासकता है । विशाल अन्तरिक्ष में वायुसमुद्र व्याप्त है । इस बाष्पावस्थापन्न वायुसमुद्रमें व्याप्त नीरूप प्राणात्मक सोमतत्त्व ही दूसरा ' दिक्सोम ' है । ' अययमशरीरं -- ऋतम ' इस परिभाषा के अनुसार केन्द्र - पिण्डभाव से वञ्चित प्राणात्मक इस आन्तरिक्ष्य दिक्सोम को अवश्यमेय ' ऋन सोम ' कहा जासकता है । भास्वरसोम [ चन्द्रमा ] जहाँ अपने सकेन्द्रपिण्ड - भाव से प्रत्यक्ष है, वहाँ दिक्सोम अपने अकेन्द्र - अशरीर - भाव से अप्रत्यक्ष है । सम्पूर्ण खगोल में एकरूप से यह ' ऋतसोम ' व्याप्त है, जिसका ' ओस के पानी ' से भलीभाँति अनुमान लगाया जासकता है । सूर्य्यसत्तात्मक दिन में एवं सूर्याभावात्मिका रात्रि में, सदासर्वदा यद्यपि श्रान्तरिक्ष्य ऋतसोम अजस्ररूप से भूपिण्ड की ओर प्रच्यावित होता रहता है । तथापि पृथियी में इस की मुक्ति रात्रि में ही होती है । दिन में सौररश्मिगत सोमप्रिय इन्द्रप्राण इसे अपना अन्न बना लेता है । रात्रि में जो ओोस का पानी यत्र तत्र सर्वत्र उपलब्ध होता है, वह सूर्योदय से पूर्व पूर्व ही अपनी सत्ता पृथिवी पर रखता है । उदित सूर्य्य इसे रश्मियों से अपना गर्भ बना लेता है । प्रत्यक्षदृष्ट यह प्रोस का पानी अान्तरिक्ष्य प्राणात्मक दिसोम का ही पार्थिव भौतिक जल मिश्रत भौतिकरूप है । तात्पर्य्य — कहने का यही है कि, आन्तरिम वायु में ऋतसोममात्रा प्रतिष्ठित रहती है । भूषिण्ड एवं सूपिण्ड, दोनों से ही अग्निमात्रा प्रवर्ग्यरूप से निकल कर आन्तदिय नायुधरातल में उसी ऋतभाव से परिव्याप्त रहती है । आकाश में यदि चन्द्रमा सत्यसोमपिण्ड है, तो पूर्वलक्षणानुसार सूर्य सत्याग्नि पिएड है | सत्याग्निमय सूर्यपिण्ड के केन्द्र से ' सहस्रधा - महिमानः सहस्रम् रूप से चारों ओर, सत्र और विनिःसृत रश्मियों में से प्रतिक्षण श्रग्निमात्रा प्रवर्ग्यरूप से निकलती रहती है । वही गर्मी तो सूर्यास्त होजाने पर भी वायु में प्रवाहित होती हुई हमें उपलब्ध होती है । यह वायव्याग्नि भी पूर्वलक्षणानुसार ' ऋताग्नि ' ही कह--लाया है । क्या श्रान्तरिक्ष्य सत्यसोमात्मक चन्द्रपिण्ड से उसी प्रवर्ग्य के द्वारा सोममात्रा निकलकर वायु में व्याप्त नहीं होती?, होती है, और अवश्य होती है । चन्द्रमा से निकल कर अन्तरिक्ष में व्याप्त होने वानी सोममात्रा ही तो पार्थिव - भुक्ति के द्वारा ओषधियों का पोषण करती है । एवमेव सूर्य से निकलकर अन्तरिक्ष में व्या'त रहने वाली अग्निमात्रा ही तो पार्थिवमुक्ति के द्वारा वनस्पतियों का पोषण करती है । क्या -धियों में अग्निमात्रा, एवं क्या वनस्पतियों में सोममात्रा नहीं रहती?, रहती है, और अवश्य रहती है । दोनों में दोनों की भुक्ति है । केवल स्थिति में तारतम्य है । अग्निमात्रागर्भिता सोमामात्रा जहाँ श्रपधियों का निर्माण करती है, वहाँ सोम मात्रागर्भिता अग्निमात्रा से वनस्पतियों का स्वरूप - निर्माण होता है । दूसरे शब्दों में - ओषधियों में चान्द्र सौम्य प्राण की, एवं वनस्पतियों में सौर - आग्ने - यशण की प्रधानता है । चन्द्रमा, सूर्य, दोनों क्रमशः सत्य सोम - सत्याग्निपिण्ड हैं । सत्यसोमपिण्डात्मक चन्द्रमा से विनिर्गत वायव्य ऋतसोम की सजातीयभावानुबन्ध से सौम्य उत्तराकाश में प्रधानता रहती है एवं सत्याग्निपिण्डात्मक सूर्य से विनिर्गत वायव्य ऋताग्नि की आग्नेय दक्षिणाकाश में प्रधानता रहती है । ऋताग्नि दक्षिण से उत्तर की ओर निरन्तर जाया करता है, तो ऋतसोम उत्तर से दक्षिण की ओर निरन्तर आया करता है । दक्षिण से उत्तर की ओर जाने वाले १४६६
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पञ्चम अध्याय गब्राह्मण प्रथमकाण्ड ऋताग्नि में उत्तर से दक्षिण की ओर ओर आने वाले ऋतसोम की आहुति होना अनिवार्य है । इसी आहुति से ऋताग्नि ऋतसोम के रासायनिक सम्मिश्रणात्मक याग- सम्बन्ध से, अन्तर्यामि सम्बन्ध से ही उस उभयात्मक अपूर्वभाव का जन्म होता है, जिसे ऋताग्निसोम के सम्बन्ध से ही ' ऋतु ' कहा जाता है । इसप्रकार यद्यपि ऋतु में अग्नि- सोम, दोनों का ही समन्वय है । तथापि एक विशेष दृष्टिकोण के अनुरोध से हम इसे अग्निप्रधान हीं कहेंगे । सौर - प्रवर्ग्याग्नि से युक्त पार्थिव श्रग्नि की ही हासवृद्धि होती है । ऋतसोम की ह्रास वृद्धि अस्वाभाविक है । प्रतिसञ्चर ( लय ) अवस्था में अग्नि अवश्य ऋत ( सोम ) रूप में परिणत होजायगा, परन्तु - ' यथाकाशगतो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् सिद्धान्तानुसार नित्याकाशानुगत नित्यवायव्य ऋतसोम अपने प्राणरूप से सदा अक्षुण्ण ही बना रहेगा । सोम के इसी नित्यधम्मं को लक्ष्य में रखते हुए वैज्ञानिकोनें इस की ह्रास वृद्धि नहीं मानी है । ' ऋनं नात्येति किञ्चन -' ऋते भूमिरियं श्रिता ' इत्यादि आथर्वण सिद्धान्तानुसार व्यापक, सत्यपिण्डाधारभूत ऋतसोम की प्रतीयमाना हास - वृद्धि वस्तुतः पार्थिव ऋताग्नि की ही ह्रास वृद्धि है । सोम स्वस्वरूप से एकरस ही है । अतएव वसन्तादि षडऋतुओं के निवचन में ' अग्निकरणा वसन्तो भवन्ति, अतिशयेन पदार्थान गृह्णाति, अतिशयेन उरू, अग्निकरणाः शीर्णा भवन्ति, हीनतां गता भवन्ति, पुनः पुनरतिशयेन शीर्णा भवन्ति ', इत्यादिरूप से अग्निकणों का ही उद्याम- निग्राम ( चढ़ाव उत्तार ) बतलाया जाता है । तत्त्वतः ऋताग्नि ही स्वोद्यान से षड् - ऋतुरूप में परिणत होता है । इसी आधार हर श्रुति का सिद्धान्त व्यवस्थित हुआ है कि – ' अग्नयो वा ऋतवः ' - ' ऋतवो हैते, यदेताश्चितयः - अग्निचितयः - ( शत ० ६।२।१।३६ ) । प्रकृतमनुसरामः । पार्थिव अग्नि भी सौर अग्निवत् सत्य, ऋत भेद से दो भागों में विभक्त है । भूकेन्द्र से बद्ध पार्थिव वह अङ्गिरोऽग्नि, जो नियतपथ से सर्वथा ऋजुभाव से ' अश्रो न देववाहनः ' इत्यादि मन्त्रवर्णनानुसार अश्वस्वरूप में परिणत होता हुआ । द्युलोक की ओर जाया करता है, सत्याग्नि है । इस सत्याग्नि से पार्थिविवर्मा का कोई उपकार नहीं होता, प्रत्युत अपकार ही होता है । जाता हुआ यह सत्याग्नि तो हव्यवाहन है, पार्थिव रसमात्राओं को स्वगर्भ में प्रतिष्ठित कर द्युलोकस्थ सावित्रप्राणाग्निमय सौर देवताओं में आहुति देने वाला है, पृथिवी के पानी को द्युलोक में बरसाने वाला है । इसी सत्याग्नि के लिए- ' अग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीरयति ' इत्यादि कहा गया है । दूसरा है— ऋतजक्षण पार्थिव अग्नि । भूप्रदेश से सर्वत्र उष्मा ( गर्मी ) निकलती रहती है । कूपादि गर्तौ ( गढ्ढों ) में इस ऊष्मा का प्रत्यक्ष किया जासकता है । इसका कोई नियत पथ नहीं है । अपितु अनियमितरूप से ( ऋतरूप से ) यह सब ओर से निकला करती है । ऋतधर्म्मा उष्मात्मक यह पार्थिव ऋताग्नि ही अन्तरिक्ष्य पानी के आकर्षण का कारण बनता है । जबतक यह ऊष्मा चरम सीमा पर नहीं पहुँच जाती, तबतक पानी नहीं बरस सकता । भूपिण्ड से सत्याग्नि के द्वारा द्युलोक में पहुँचने वाली जलमात्रा सूर्यरश्म्यवच्छिन्न वायुधरातल पर प्रतिष्ठित रहती है । इस श्रान्तरिक्ष्य जलमात्रा में आन्तरिक्ष्य ऋत - टिकमोम का समावेश होता है | श्रद्धा का रूपान्तर यह सोम ही उस जलमात्रा का पोषण करता है । अान्तरिक्ष्य पजन्य वायु, पार्थिव ऋताग्नि-लक्षणा ऊष्मा से उत्पन्न घूमात्मक बाष्प, सौर तेजोमय प्रवृक्त ज्योतिर्भाव, अन्तरिक्षमुक्त पार्थिव जलमात्रा, इन सत्र ( वायु, धूम, ज्योति, सलिल ) तत्त्वों के समन्वय से अन्तरिक्ष में जो अपूर्ण भौतिक पदार्थ III
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पञ्चम अध्याय स्र गब्राह्मण शतपथब्राह्मण उत्पन्न होता है, वही ‘ अभ्र ' कहलाया है । * ' अप् - ( जल ) को अपने गर्भ में रखने के कारण ही ' धूम-ज्योतिः - सलिल - मरुतां ' - समन्वय लक्षण वह अपूर्णभाव - ' अ ' कहलाया है । ' अभ्र ' केवल अभ्र है, जलधारण करने वाला मात्र है । इस से वृष्टि नहीं होती । वृष्टि होती है- ' मेघ ' से । जलकोशात्मक बद्दल अभ्र है, एवं जलवर्धक बद्दल अपने मेहन धर्म से मेब हैं | जबतक बद्दल में अश्मा सोमात्मक वृत्रप्रारण के सहयोगी वृष्ठ्यवरोधक ' नमुचि ' ( न मुश्चति जलम् ) प्राण का प्राधान्य रहता है, तत्रतक वह बद्दल ' अ ' कहलाता है । न्यङ परावर्तित सूर्यरश्मियाँ सौर इन्द्रतत्त्व के वज्र हैं । इस दिव्य इन्द्र के वज्रप्रहार से [ रश्मिगत आग्नेयप्राण के समावेश से ], तथा पार्थिव ऊष्मा-नुगत बासत्र इन्द्र के व्यापार से [ पार्थिवी ऊष्मा के समावेश से ] जब अवरोधक ' नमुचिप्राण ' का ग्रन्थिबन्धन टूट जाता है, तभी वह अभ्र ' मेघ ' रूप में परिणत होकर वृष्टि करता है । इसप्रकार द्यु लोकस्थ मघवेन्द्र, भूलोकस्थ वासवेन्द्र के वज्रप्रहार से नमुचि असुर का जब शिर - छेद हो--जाता है, तभी वृष्टि होती हैं । निम्न लिखित मन्त्र इसी रहस्य का विश्लेषण कर रहा है— ( १ ) -- " पां फेनेन नमुचेः शिर इन्द्रोदवर्त्तयः । विश्वा यदजयः स्पृधः || " - सं ० ८ १४।१३ । ( १ ) — “ इन्द्रश्व वा नमुचिश्वासुर समदधात्तन्न नौ नक्तान्न दिवाहनन्नार्द्रोण न शुष्केणेति । तस्य व्युष्टायामनुदित आदित्यफेनेन शिरोऽच्छिनत् " ॥ पार्थिवी ऊष्मा नीचे से - ताण्ड्य महाब्रा ० १२ । ६ ॥ ऊपर जारही है । ऊपर अन्तरिक्ष में वायुधरातल में अभ्रात्मक वारिदलों ( बद्दलों ) में जल भरा हुआ है । जब पार्थिव - ऊष्मा वहाँ पहुँच रही है, तो इसके रुद्रात्मक -- रुद्धद्भवण-धर्म्म से भ्रस्थ जल रस क्यों नहीं पड़ता १, यह एक प्रश्न है । वैज्ञानिक समाधान करते हैं कि, यह ठीक है कि पार्थिव अग्नि ( ऊष्मा ) ऊपर जारहा है । परन्तु साथ साथ ही अान्तरिक्ष्य दिक्सोम पृथिवी की ओर भी तो रहा है । जितनी मात्रा में ऊष्मा [ गर्मी ] ऊपर जाती है, उतनो हीं मात्रा से सोम भी [ स ] नीचे आ रहा है | सममात्रा से आने वाले सोम के सम्बन्ध से तन्मात्रासमतुलित पार्थिव अग्नि का द्रवण-धर्म्म शान्त होजाता है । फलस्वरूप अन्तरिक्ष्य अभ्र मेघस्वरूप में परिणत नहीं होने पाते, श्रतएव वृष्टि नहीं होती । आवश्यक यह है कि, श्राते हुए शीतगुणक अन्तरिक्ष्य ऋतमोम के तथा जाते हुए पार्थिव अग्नि में मध्यावरण का समावेश होना चाहिए, जो अान्तरिक्ष्य सोमचल को अपने ऊपर अवरुद्ध करदे । उस अवस्था में पार्थिव - ऊष्माबल एक तो सोमावरोध से प्रबल होजायगा, दूसरे मध्यावरणजनित संकोच से भी उसे बल मिलेगा । परिणाम - स्वरूप उभयत्रल के समावेश से अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँचती हुई यह ऊष्मा अवश्य ही सौर इन्द्र के सहयोग से अभ्र को मेघरूप में परिणत कर देगी, ' अग्नेराप: ' सिद्धान्त चरितार्थ हो -जायगा, फलतः पानी भूतल पर बरस पड़ेगा । * धूम - ज्योतिः - सलिल - मरुतां - सन्निपातः व मेघः ( अभ्रः ) 1 १४६८ - कालिदास मेघदूते
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पञ्चम अध्याय प्रथमकाण्ड समाधान सामयिक है । परन्तु उस मध्यावरण का जन्मदाता कौन बने?, प्रश्न का उत्तर एकमात्र पाठकों का सुपरिचित ' पर्जन्य वायु ' ही है । पालन - नूरणार्थक ' ' धातु ( पालनपूर ( योः जु ० प ० से ० ) से, अथव । तो सेचनार्थक ‘ पृपु ' धातु ( ' पृपु ' सेचने - स्वा ० प से ० ) से ' पर्जन्य ' शब्द निष्पन्न हुआ है । पर्जन्य उस वर्ष वायुविशेष का नाम है, जिस का स्वरूप प्राप्यप्राणात्मक सौररश्मिगर्भित इन्द्र से सम्पन्न हुआ है । अतएव इन्द्र को भी पर्जन्य कहा जासकता है । ' पर्पति - सिनति मेवलयद्वारा वृद्धिं ददाति ' से मे समय के द्वारा जल बरसाने वाला इन्द्रप्राणगर्भित पुरोवात आध्य - वायुविशेष ही ' पर्जन्य ' है । ' पर्जन्यो मेघशब्देऽपि ध्वनदम्बुद- शब्दयोः ( विश्वकोश ) - पर्जन्यौ रसदृन्देन्द्रो ' ( श्रमरः ) इत्यादि कोशवचन भी इसी निर्वाचन का समर्थन कर रहे हैं । ऋक्संहिता के ५ मण्डलान्तर्गत, दशमन्त्रात्मक ‘ अच्छात्र ' सूक्त में पर्जन्य के इसी वैज्ञानिक स्वरूप का विश्लेषण हुआ है । वहीं बतलाया गया है कि, पुरवाई हवा का चलना, वर्पणानुकूल गर्जन - तर्जन, वृष्टिपात अधिसभी ' वृष्टिकम् ' इसी पर्जन्य पर अवलम्बित हैं । जिस समय अपने गज्जैन- तर्ज्जन के साथ पर्ज्जन्यदेवता नभोमण्डल में मेरूप से व्याप्त होते हुए ऋष्टयन्मुख बनते हैं, उस समय सम्पूर्ण पार्थिव चर - अचर - प्रजावर्ग में एक
प्रकार का उल्लास छाजाता है । देखिए-यत् पर्जन्यः कनिक्रदत् स्तनयन हंसि दुष्कृतः ।
ती विश् मोदते यत्किञ्च पृथिव्यामधि ॥
- ऋक्सं ० ५२२३२६ |
यस्य व्रते पृथिवी नन्नमीति तस्य ते शकवज्जभुरीति ।
यस्य बृत ओषधीर्विश्वरूषाः स नः पर्जन्य महि शर्म्म यच्छ ॥
- ऋकुसं ० ५२८३ | ५ | सुप्रसिद्ध ‘ इन्द्रधनुष ' की उत्पत्ति का प्रधाननिमित्त भी यही पर्जन्यवायु है । वृष्टि से पहिले, अथवा तो पीछे श्राकाश में सप्तवर्णात्मक ' धनुष ' का प्रत्यक्ष किया जाता है । सप्तवर्ण ( रङ्ग ) का कारण एकमात्र * सूरश्मियाँ हीं हैं, जिन के प्रतिफलन से वायुगर्भित श्रापोमय धनुषधरातल सप्तवर्णात्मक बन जाता है । वी धरातल से संस्पृष्ट रश्मियों का उसीप्रकार वक्रीभाव हो जाती है, जैसे कि पानी में सीधी भी प्रविष्ट लकड़ी अचगर्भ में वक्रित प्रतीत होने लगती है, जिसका त्रिभुजाकर - टपणखण्ड में भी प्रत्यक्ष किया जासकता है । यही * जिस सूर्यरश्म्यनुगत सप्तवर्ण. विज्ञान - परिज्ञान का प्रथम श्रेय भारतीय महर्षियो को मिलना चाहिए था, शास्त्रानुशीलन- परित्यागलक्षण हमारे आलस्य ने वह श्रेय आज सुप्रसिद्ध वैज्ञा-निक- " 5- " न्यूटन " को मिल रहा है । कहा जाता है- न्यूटन ने ही परीक्षा के द्वारा पहिले पहिल यह प्रमाणित किया कि, सौर प्रकाश में अनेक रङ्गों का समन्वय है, जब कि सप्तवर्णविज्ञान - ऋग्वेदीय-' अहोरात्र विज्ञान ' में न्यूटन से लाखों वर्ष पहिले पूर्णरूप से परीक्षित, एवं प्रमाणित बन चुका था-' कालाय तस्मै नमः ' । १४६६
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गब्राह्मण शतपथब्राह्मण पञ्चम अध्याय का सप्तवर्णैकत्र समष्टिरूप श्वेतवर्ण व्यवहृत हुई है । लम्बन से रश्मिभुक्त सप्तवर्णप्रतीति का मूलकारण है । पर्जन्य– वक्रयक्रिया ' लम्बन ' नाम से क - सात पर्व होजाते हैं । और यही है । रश्मिभुक्त प्राण ही विशकलन होजाता है, एक - लम्बन से सप्तवर्णात्मक इन्द्रधनुष का जनक बनता त्रुटित - रश्मिभावात्मक आय - वायुधरातल इसी रश्मि से व्यवहृत हुआ है । पर्जन्यात्मक इन्द्रधनुष का भी से यह धनुष तन्नाम की भाँति ÷ इन्द्रधनुषदर्शन इन्द्र है | इसी सम्बन्ध उद्यन्त - अस्तंयान्त- यादि सूर्यो हुए श्रुति ने है । अतएव का विश्लेषण करते जनता हुआ आत्मविरोधी के पर्जन्यात्मक इसी तात्त्विक स्वरूप निषेध हुआ है | इन्द्रधनुर कहा है-। सूर्यो ज्योतिश्चरति चित्रमायुधम् माया वा मित्रावरुणा दिवि श्रिता पर्जन्य द्रप्सा मधुमन्त ईरते ॥ तमभ्रण वृष्ट्या गृहयेो दिवि - ऋकसं ० ५। ६३ । ४ । ' वायु पजन्य है । यही प्रर्तव्यभाषा है । प्रवाहित होता है, वही ' पुरोवात जलवर्धक माना गया - वृष्टि से पहिले जो आप्य पर्जन्यवायु वायु - ' वायुर्वै वृपया ईशे ' के अनुसार धूम [ चाप ] में ' मान्सून ' कहलाया है । यही प्रश्न का उत्तर है - मेघत्रयी की प्रवृत्ति । वायुप्रेरणा होजाता से विनिर्गत है । ऐसे घन - घूम पर्जन्यवायु करता क्या है?,, इस एवं रश्मिगत तेजोमात्रा - लेंकर घनभाव सत्र में से परिंगात ऊपर का मेघावरण आन्तिरिक्ष्य आन्तरिक्ष्य सलिलमात्रा बन जाते, तबतक दृष्टि नहीं होमकती की स्कम्भनी बनता है । सर्वाधः जबतक त्रिस्तरात्मक नहीं निरोधक बनता है । मध्य का स्तर उपरिस्थित होता स्तर हुआ पर्जन्य की नोदना से बरस शीतधर्मा सोमागमन का जलमात्रा भरी हुई है - पार्थिव उष्मा से च्युत पर्जन्यः ' । पार्थिव - अग्निजनित स्तर [ अभ्र ], जिस में सञ्चार होता है – यज्ञाग्नि के द्वारा - ' यज्ञाद्भवति विष्णुरूप से भी उपस्तुत है । पड़ता है । पर्जन्य का का जनक बनता है । इसीलिए तो पर्जन्य को लक्ष्य बना कर भति धूम ही तो पर्जन्यात्मक १।६५ मेघ / ४४ ) | यज्ञाग्नि के द्वारा उत्पन्न इसी पर्जन्यविज्ञान
( देखिए - महाभारत-कहती है-, धूमादभ्र 9 अभ्राव ष्टिः ।
' तपोजा ' इति । श्रग्नेर्णे धूमो जायते ' तपोजा ' इति ॥
अग्नेर्वा एता जायन्ते । तस्मादाह - शत ० वा ० ५।३।५।१७ । कीजिए । १८ वीं कएिडका का समन्वय में रखते हुए ही ब्राह्मण की को प्रवृद्ध होने का उक्त पर्जन्य - विज्ञान को लक्ष्य का निरोध होजाता । फलस्वरूप पार्थिनी ऊष्मा मेघस्तरों से सोम पर्जन्य के द्वारा उत्पन्न
कदाचन ।
- नेक्षेते । द्यन्तमादित्यं नास्तं यान्तं गतम् ॥
नोपसृष्ट 9ं न वारिस्थं, न मध्यनभसो १४७०
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पञ्चम अध्याय गूबाबा या प्रथमकाण्ड -अवसर मिल जाता है । श्रीऋ निदाघात्मक प्रवृद्धकालानुग्रह से भी पार्थिवाग्नि अपेक्षाकृत प्रबल रहता है । अतिशयेन उदभावापन्ना यह उष्मा ( उमस ) ही तो वर्षा की जननी बनती है, जिसका श्रेय परम्परया पर्जन्य को ही प्राप्त है । ' ओभावय ' इत्याकारक देवप्राण ( श्राग्नेय प्राण ) के सम्बन्धरूप आह्वान से पुरोवात ( पर्जन्य ) का प्रादुर्भाव होगया ' अस्तुऔषद् ' लक्षण देवप्रायासम्बन्ध से पर्जन्य - व्यापार के द्वारा धूम-जनित अभ्रस्तरों से आकाश छागया । अत्र आगे चलकर वर्षा से पहिले विद्युत एवं स्तनयित्नु, ये दो धर्म्म और उत्पन्न होते हैं । पुरोवात के द्वारा आकाश में समाप्लावित अभ्रों के पारस्परिक संघर्ष से ही विद्युत् ( ज्योति ) ओर स्तनयित्नु ( शब्दध्वनि ) उत्पन्न होती है अ तिने प्रथम स्थान विद्युत् का रक्खा है, एवं द्वितीय स्थान स्तनयित्नु का माना है । इस का एकमात्र कारण दृश्यस्थिति ही है । हमें पहिले - विद्युत् की ही प्रतीति होती है, अनन्तर शब्दध्वनि सुनाई पड़ती है तत्वतः स्थिति यह है कि, पहिला स्थान स्वनयित्नु ( ध्वनि ) का है, एवं दूसरा विद्युत् का है प्रत्यक्ष में देखिए एक रजक सरोवर के इस छोर पर खड़ा हुआ शिला पर वस्त्र फटकारता है । हम इस क्रिया का सरोवर के उस छोर पर खड़े हुए साक्षात्कार कर रहे हैं । फटकार के साथ ही ध्वनि का आविर्भाव होता है । यह नि संघर्ष जन्मा है परन्तु प्रतीति ध्वनि की होती है संघर्ष [ फटकार ] के कुछ काल पीछे । वायु के सहयोग से संघर्षजनित अग्निव्यापार के द्वारा उत्पन्न शब्द - सरोवर प्रदेश में व्याप्त आयवायु - वीचियों [ लहरों ] के आधार पर प्रतिष्ठित होकर ही श्रोत्रेन्द्रिय पर आता है । यही इसके ' श्रागमन - विलम्ब ' का कारण है । जलकण मिश्रित वायु से अग्निमयी शब्दध्वनि अवरुद्धची बन जाती है । एवमेत्र भुशुण्डी [ तोप ] छूटने पर पहिले चमक दिखलाई पड़ती है, अनन्तर शब्द सुना जाता है । विद्युत् में तीव्रगति है । शब्द वायुस्तरका से मन्दगति है । अतएव पहिले भी उत्पन्न " किंवा साथ भी अपन विद्यत् तत्काल प्रतीत होजाती है । ठीक यही स्थिति यहाँ समझिए दृश्यस्थिति कुछ भी हो, वस्तुस्थिति यही है कि, पहिले संघर्ष से शब्द, [ स्तनयित्नु ], एवं अनन्तर ज्योति [ विद्युत् ] उत्पन्न होती है । 9 पूर्व में मेघ के तीन स्तर बतलाए गए हैं । यह त्रित्व स्थूल मान है । वस्तुतः श्राकाशस्थ सत्तमरुत्-स्तरों के कारण मेघ के भी सात ही स्तर होते हैं । मध्य मध्यस्थ वायुस्तरों के निर्गमन से ही मेघस्तरों का परस्पर संघर्ष होता है, इसी संघर्ष से त्रियुत् उत्पन्न होती है, इसी संघर्ष से ' वायुः खान, शब्दस्तन् ' इत्यादि प्रातिशाख्य - सिद्धान्तानुसार स्तनयित्नु ( शब्द - गज्जैन ) उत्पन्न होती है । मेधस्तरों का उच्चावच जैसा आकार होता है, तत्संघर्ष से उत्पन्न विद्युत् स्तनयित्नु की भी सत्सदृश ही उच्चावच आकृतियाँ " इसी हैं । ऊस्तरसंघर्ष से उत्पन्न विद्युत् स्तनयित्नु अधोऽथत मेचस्तरावरण से दृष्टिश्रुति का विषय नहीं अनती । उन का अधः स्तर - प्रदेशों में ही विलयन होजाता है । श्रधोऽवस्थित तीन स्तरों के पारस्परिक संघर्ष से उत्पन्न विद्युत्, और स्तनयित्नु का ही प्रत्यक्ष, एवं श्रवण हुआ करता है । सर्वोपरिस्थ स्तर मध्यस्थ स्तर पर पड़ता है, संघर्ष होपड़ता है । इस मध्यम संघर्ष से उत्पन्न विद्युत्, और स्तनवित्नु की प्रायः एकसाथ ही प्रतीति होती है । साथ ही सर्वाधः स्थित तृतीय मेघस्तरावरण के कारण इस विद्युत् का भूपृष्ठ पर पात भी नहीं होता । यदि संघर्ष आत्यन्तिक होता है, तो यह भी गिर पड़ती है । परन्तु सर्वाधः स्थित मेघस्तर के संघर्ष से जो विद्युत् उत्पन्न होती है, वह अवश्यमेव भूगर्भ में घाटहरती है । १४७१
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पञ्चम श्रध्याय गब्राह्मण शतपथब्राह्मण संघर्ष से उत्पन्न ज्योतिर्भाग सघर्ष के तारतम्य से उसी प्रकार कभी कभी वज्र, उल्का, आदि की भी उत्पत्ति होजाया करती है, जैसे कि अान्तरिक्ष्य एकोनपञ्चाशत् ( ४६. ) मरुतों के पारस्परिक संघर्ष से ' वज्र, उल्का, धिष्ण्या, तारा ' ये चार प्रकार के ज्योतिःपुञ्ज उत्पन्न होते रहते हैं । दगार्गलविज्ञान के अनुसार जैसे भूगर्भ में पूर्व - पश्चिम - उत्तर - दक्षिण - ईशान - नैर्ऋत- आग्नेय वायव्यादि दिक् -- प्रतिदिक से क्षार -- मधुर-तिक्तादि जलस्रोत प्रवाहित रहते हैं, एवमेत्र आकाश में दिक् प्रतिदिक् भेद से तीव्रवेग के साथ वायुस्तर प्रवाहित हैं । कल्पना कीजिए, एक वायुस्तर तीव्र वेग से पूर्व से पश्चिम की ओर नारहा है, तो दूसरा उसी वेग से पश्चिम से पूर्व की ओर । यदि दोनों का गमनागमन भार्ग विभिन्न है, तो शान्ति है । यदि दोनों के प्रान्तभागों का भी स्पर्श होजायगा, तो संघर्ष से ज्योति उत्पन्न होजायगी । यत् किञ्चित् - सम्पर्कमात्र से उत्पन्न यही क्षुद्रज्योति ' तारा ' है । यदि संघर्ष में बलाधिक्य है, तो ज्योति प्रवृद्ध है । यही सामान्य ज्योति ' धिन्या ' है | यदि दोनों के प्रान्तभाग एक दूसरे से आक्रान्त [ द ] होजाते हैं, तो अतिशयरूपेण प्रवृद्धा ज्याला उत्पन्न होजाती है । साथ ही प्रान्तभागा क्रान्ति के अनुपात से बड़ी दूर पर्य्यन्त वह प्रकाशपुञ्ज जाता हुआ प्रतीत होता है, जिस का आकार पुच्छसम माना गया है । यही ' उल्का ' है । यदि दुर्भाग्य से दोनों वायुस्तरों के मार्ग श्रभिन्न होजाते हैं, तो दोनों का सर्वात्मना संघर्ष होपड़ता है । इस से भयानक प्रतिध्वनि के साथ जो ज्योतिःपुञ्ज पृथक् होकर अपने आत्यन्तिक वेग से भूपृष्ठ पर आकार ठहरता है, वही ' वज्र ' कहलाया है । यही अधः-प्रदेशस्थ वायुस्तर मार्गावरोध होने से भूपिएड की ओर अनुगत होता हुआ कन्दरा, भूगर्त्तादि में प्रविष्ट होकर तदवच्छिन्न भूप्रदेश को कम्पित कर देता है । यही सुप्रसिद्ध आग्नेय, वारुण [ आय ], ऐन्द्र, [ ग्रह ], वायव्य, चतुर्विध भूकम्पों में से चौथा वायय भूकम्प कहलाया है । पुरोत्रात, अभ्र, विद्यत, स्तनयित्नु. वर्षा, इस क्रम से वृष्टिकर्म में [ जलवर्षक मेघों में ] इन पाँचों का रहना अनिवार्य है । त्रिःस्तर ही इस पञ्चावयवात्मिका मेघ -- सत्ता का कारण है । ऐसा मेघ निश्चयेन कृष्णवर्ण होता है । क्यों कि, ऊर्ध्व-स्तरों के आवरण से सौर - प्रकाश प्रात्यन्तिकरूप से अवरुद्ध होजाता है । इसी आधार पर श्रुति ने कहा है - धामच्छदिन खलु वै भूत्त्वा वर्षति ' ( तै ० सं ० २/४/१० - कृष्णो भवति । एतद्वै वृष्टयै रूपम'-( तै ० सं ० २१८ ) । पारमेष्ठ्य आध्यप्राण अप्सरामय है, आध्य वायव्य प्राण गन्धर्व है । अतएव वर्षाऋतु कामभाव की प्रतिष्ठा मानी गई हैं । गन्धर्वप्राण के सम्बन्ध से सङ्गीत की भी मूल प्रतिष्ठा यही है । ' वर्षा हि सर्व ऋतवः ' के अनुसार यही सम्वत्सर की भी प्रतिष्ठा है । भारतीय लोकसंगीतों * में भी वर्षा का यही स्वरूप उपवर्णित है, जिसका कृष्णपर्जन्य, विद्युत्, स्तनयिलु, आदि रूप से अबतक विश्लेषण हुआ है 1 यही प्रासङ्गिक वृष्टिविज्ञान है, जिसका प्रकृत आश्रावण - प्रत्याश्रावण कर्म के साथ निम्नलिखित रूप से समन्वय किया जारहा है । * - यो अव वरपा रुत । ( ध्रुव ० ) । ( उ ) कट कान्ति नरेस ( श ) । अम्भोधर नग प्रमत्त कामी जन सब हरषत । चमकत दामिनी पताक डंका भयो अशनी ख । कृष्ण चरण मधुर मेघ गगन भरयो समन्तात ( आयो ० ) । १४७२