Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1201–1210

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1201–1210

पृष्ठ 1201

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1201 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पञ्चम श्रध्याय स्र गब्राह्मण ७१ प्रथमकाण्ड बतलाया गया है कि, अभ्रसमा ' लावन के अनन्तर ' यज ' - ये ' यजामहे ' इत्याकाराकारिता यजना-नुगति, एवं यजनप्रवृत्तियों से क्रमश: विद्युत् – स्तनयित्नु उत्पन्न होजाती हैं । सर्वान्त में ' बौपट् ' इत्याकारक जनकर्म्मारम्भ के साथ साथ ही पानी बरसने लगता है । इसप्रकार प्राकृतिक यज्ञ के प्राणविध ऋत्विजों ( प्राणदेवताओं ) के पच्चव्याहृत्यात्मक पञ्च कम्मों से वृष्टिकर्म्म सञ्चालित है । जिस यजमान को वृष्टि अपेक्षित हो, वह संख्या - सम्पत् से समतुलित ' ओश्रावय ' ' अस्तु श्रौषट् ' - ' यज ' - ' ये यजामहे ' - ' बौपट् ' इन पाँच व्याहृतियों के प्रयोगकाल में ऋत्विजों को क्रमश: ' पुरोवात ' - ' अभ्र ' - ' विद्युत्’– ' स्तनयित्नु ' - ' वर्षा'कर्म्म ' इन पाँच अधिदैविक वृष्टिकर्म्मावयवों के मानस संकल्प के लिए प्रेरित करें । निश्चयेन इस भावनामात्र से वृष्टि होगी - ' वर्षाति हैव तत्र यत्रैत्रमृत्विजः संविदाना यज्ञ ेन चरन्ति ' । और —- ' यज्ञाद्भवति पर्जन्यः ' वचन चरितार्थ होगा । ब्राह्मण की १८, १६, इन दो कण्डिकाओं में काम्यकर्म्मलक्षणा वृष्टि के द्वारा संक्षिप्त - भाषा में इसी वृष्टिविद्या का दिगदर्शन कराया गया है ॥ १८, १६, ॥ इतिवृष्टिविज्ञानम् श्राश्रावण - प्रत्याश्रावण - कर्म वह महत्त्वपूर्ण कर्म्म है, जिससे आधिदैविक - श्राधिभौतिक - अध्यात्मिक, तीनों कामनाओं को परिपूर्ण किया जासकता है । सम्वत्सरयज्ञसम्पत्ति आधिदैविकफल है । इसके समष्टि, व्यष्टयात्मक दो विवर्त्त ' हैं | अहोरात्र पक्ष- ऋतु - अयन - सम्बत्सर, ये पाँच एक सम्वत्सर की पाँच व्यष्टियाँ है । स्वयं सम्वत्सर, और उसकी मूलप्रतिष्ठारूप सप्तदशप्रजापति, दोनों समष्टयात्मक सम्वत्सर है । पञ्च व्याहृतियों से व्यष्टयात्मिका सम्वत्सरसम्पत्ति का, पञ्चव्याहृतियों के सत्रह अक्षरों से समष्टयात्मिका सम्वत्सर-सम्पत्ति का संग्रह करते हुए ऋत्विग्गण पञ्चव्याहृत्यात्मक ' श्राश्रावण - प्रत्याश्रावण ं कर्म्म से यजमान के मानुषज्ञ को आधिदैविक सम्पत्ति से युक्त कर देते हैं, जिसका १६, १७, इन दो कण्डिकाओं में विश्लेषण हुआ है । अङ्गभूत नवव्याहृयात्मक ' स्रुगढ़ापनकर्म्म ' से दैवात्मा में नव आध्यात्मिक प्राणाधान के द्वारा आध्यात्मिक - सम्पत्ति का संग्रह कर लिया जाता है, जिसका ५ वीं कण्डिका में उल्लेख हुआ है | शेत्र रह जाता है - आधिभौतिक इष्ट फल । आधिभौतिक इष्ट फल की प्राप्ति द्यौः ( आकाश ) और पृथिवी, इन दो विवर्त्तो से होती है । आकाशोपलक्षित पर्जन्यदेवता समय पर वृष्टि करते रहें - ( निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु ) यही चाका-शात्मक आधिभौतिक ऊर्ध्व पर्व का अनुग्रह है । ब्राह्मण की १८, १६, इन दो कडिकाओं में इसी अनुग्रह का स्पष्टीकरण हुआ है | प्रस्तुत २० वीं कण्डिका में पृथिव्यनुगत आधिभौतिक अधः पर्व के इष्टफल का दिग्दर्शन कराती हुई ही श्रुति कहती है कि जिसप्रकार ' ओश्रावय ' आदि पाँच व्याहृतियों से प्राणदेवता पुरोवातादि के द्वारा वृष्टिकम् ' का सञ्चालन कर रहे हैं, एवमेव इह्रीं व्याहृतियों से ( व्याहृत्यात्मक देवाह्वान- — प्रदान - आदान लक्षण यज्ञ से ) वे विराड्गौरूपधरा पृथिवी का दोहन किया करते हैं । १४७३

पृष्ठ 1202

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1202 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पञ्चम अध्याय व गवाह्मण शतप यत्र । झया का स्तन के ( पावसने के लिए ) खोलना, वत्समुख दोहनकम्म ' में गौ का सामीप्य वधे वत्स को दोहने के लिए सन्नद्ध होजाना, एवं दोहना, ये कराना, बच्चे को हटाते हुए दोहनपात्र लेकर से क्रमिक सम्बन्ध है । पार्थिव साथ - सम्बन्ध क्रमशः इन पाँचों दोहनकर्म्म -पव प पर्व है । पाँचों व्याहृतियों का अग्निहोत्र सञ्चालित है, जैसा कि द्वितीय काण्डान्तर्गत ' अग्निहोत्र-अग्नि ही विराट् गौं है 1 । इसीसे पार्थिव जाने वाला है । पार्थिव प्राणाग्नि के ६-१५-२१ भेद से तीन ब्राह्मणविज्ञान ' में विस्तार से बतलाया में विस्तार से बतलाया जाचुका है । त्रिवृत्स्तोमानुगत पार्थिव अग्नि विवर्त्त हो जाते हैं, जैसा कि पूर्व प्रकरणों अान्तरिक्ष्य ( पार्थिव ही ) अग्नि धिष्ण्य है । अष्टविध गार्हपत्य है, यह एककल है । पञ्जदशस्तोमानुगत अष्टकल है । एकविंशस्तोमानुगत दिव्य [ पार्थिव ही ) अग्नि आहवनीय के नाक्षत्रिक सर्पप्राण के सम्बन्ध से यह स्तोमात्मिका महापृथिवी के पृथिवी अन्तरिक्ष- चौरूप तीनों स्तेमलोकों है, यह एककल है । इसप्रकार भेद से १० पर्व हो जाते हैं । यही दशकल ' शिडू अग्नि ' है । भेद से पार्थिव गौरूप अग्नि के १८०१ ' कहलाया है । इसीके ही गौरूप पार्थिव अग्नि ' विराट दशाक्षर विराट् छन्द से समतुलित होने से ' विराड् गौ ' कहलाया है । विराड़ गौ का वत्स है -- मातरिश्वा सम्बन्ध से चित्य [ भूत ] अग्निमय भूपिण्ड एवं संवरणधर्म से ' एषवराह ' नाम से प्रसिद्ध होरहा हैं । इसी वत्स नामक वह भूवायु, जो अपने व्याप्ति विराडगो का दोहन करने में समर्थ हुए है । वायु के द्वारा ही [ वायु ] के सम्बन्ध से द्युलोकम्थ प्राणदेवता । यही विराड्गो का दोह है, जिसे जानकर सद्भावनापूर्वक आश्रवण-पार्थिव रसमात्राओं का दोहन होता है पार्थिव कामनाएँ पूरी होजाती हैं || २० || प्रत्याश्श्रावण - कम्र्म्म ' करने वालों के लिए में तीसरा पाँचवें अध्याय में दूसरा, एवं चौथे प्रपाठक ब्राह्मण उपरतम् १४७४

पृष्ठ 1203

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1203 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीः श्रथ - शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्ये प्रथमकाण्डे त्रिब्राह्मणात्मकं - " प्रयाजब्राह्मणम् ” [ क्रमानुगता पृष्ठसंख्या १४७५ ]

पृष्ठ 1204

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1204 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्री. विशेष सूचना -हमारी शारीरिक अस्वस्थता के कारण कम्पोजीटरों की सावधानी से आगे पृष्ठसंख्या के समावेश में भूल होगई है । फलस्वरूप क्रमप्राप्त १४७४ इस पृष्ठ संख्या पर से आगे १४७५ यह क्रम न रहकर ११७ से उपक्रान्त होकर आगे अवसान १७६ संख्या लग गई है | पाठकों को इस क्रमव्यत्यास का संशोधन करते हुए इस की प्रक्रान्त पञ्चमाध्यायानुगत तृतीय ब्राह्मण, तथा चतुर्थप्रपाठकानुगत चतुर्थब्राह्मण से संशोधन कर ११७ से १७६ की संख्या का “ १४७५ से १५४२ पर्य्यन्त " इस क्रम लेना चाहिए । केवल संख्या में ह्रीं त्रुटि हुई है । विषयानुपूर्वी से क्रमबद्ध ही है । विनीत-सम्पादक

पृष्ठ 1205

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1205 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( १ ) - प्रतुण्णपाठः ( अर्थावबोधानुगतः ) अथ प्रयमकाण्डे पञ्चमाध्याये तृतीयं चतुर्थप्रपाठके च चतुर्थं ब्राह्मणम् अथ त्रित्राह्मणात्मके प्रयाजब्राह्मणे प्रथमं ब्राह्मणम १- प्रयाजबन्धुः ऋतवो ह वै प्रयाजाः । तस्मात् पञ्च भवन्ति, पञ्च हि ऋतवः ॥ ( १ ) । देवाश्च वा असुराश्च उभये प्राजापत्याः पस्पृविरे - एतस्मिन् यज्ञे प्रजापतौ पितरि सम्वत्सरे-' अस्माकमयं भविष्यति, अस्माकमयं भविष्यति ' इति । ( २ ) ॥ ततो देवा श्रर्चन्तः श्राम्यन्तश्चेरुः, त एतान् प्रयाजान् ददृशुः, तैरयजन्त I । तैऋ तून् सम्वत्सरं प्राजयन्, ऋतुभ्यः सम्वत्सरात् सपत्नानन्तरायन्; तस्मात् प्रजयाः । ' प्रजयाः ' ह वै नामैतत्-यत् ‘ प्रयाजाः ' इति । तथो एवैष एतै तून् सम्वत्सरं प्रजयति, ऋतुभ्यः सम्वत्सरात् सपत्नानन्तरेति; तस्मात् प्रयाजैर्यजते ॥ ( ३ ) ॥ ते वा ज्यहविषोभवन्ति । वज्रो वा आज्यम् । एतेन वै देवा वज्र गाज्येन ऋतून् सम्वत्सरं प्रजयति, ऋतुभ्यः, सम्वत्सरात् सपत्नान् श्रन्तरेति । तस्मादाज्य-हरिषो भवन्ति ॥ ( ४ ) ॥ एतद्वै सम्वत्सरस्य स्वं पयः - यत् ' आज्यम् ' । तत् स्वेनैवेन-मेतत् पयसा देवा: स्व्यकुर्वत । तथो एवैनमेष एतत् स्वेनैव पयसा स्त्रीकुरुते । तस्मादाज्य-हविषो भवन्ति ॥ ( ५ ) ॥ स यत्रैव तिष्ठन् प्रयाजेभ्य श्राश्रावयेत्, तत एव नापक्रामेत् । सङ्ग्रामो वा एष सन्निधीयते - यः प्रयाजैर्यजते । यतरो वै संयत्तयोः पराजयेत, अप वै स क्रामति, अभित-राम्र वै जयन् क्रामति । तस्माद‌भितरामभितरामेव क्रामेत्, अभितरामभितरामाहुतीजु हु-यात् ॥ ( ६ ) ॥ तदु तथा न कुर्यात् । यत्रैव तिष्ठन् प्रयाजेभ्य श्रावयेत् तत एब ११७

पृष्ठ 1206

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1206 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथभाष्य नापक्रामेत् । यत्रो एव समिद्धतमं मन्येत तदाहुतीजुहूयात् । समिद्धहोमेन ह्यन समिद्धा श्रहुतयः ॥ ( ७ ) ॥ २ – उत्तरः प्रैषः स श्राव्य आह - " समिधो यज ' इति । तद् वसन्तं समिद्ध े । स वसन्तः समिद्धों अन्यान् ऋतून् समिन्धे । ऋतवः समिद्धाः प्रजाश्च प्रजनयन्ति, श्रोषधीश्व पचन्ति । तद्वेदेव खलु सर्वानृतून निराह । अथ " यज, यज ' " इत्येव उत्तरानाह-अमितायै । जामिह कुर्यात् यत् " तनूनपातं यज, इडो यज " इति ब्रूयात् । तस्मात-' यज, यज ' इत्येवोत्तरानाह ॥ ( = ) ॥ ३ - प्रयाजब्राह्मणम् सवै ' समिघो ' ( १ ) यजति । वसन्तो वै समित् । वसन्तमेव तवा अवृञ्जत, बसन्तात् सपत्नान् अन्तरायन् । वसन्तम् - एवैष एतद् वृङ्क्त, वसन्तात् सपत्नान अन्तरेति । तस्मात् समिधो यजति । ॥ ( 8 ) ॥ अथ ' तनूनपातं ' ( २ ) यजति । ग्रीष्मो तनूनपात्- ग्रीष्मो हिसां प्रजानां तनूस्तपति । ग्रीष्ममेव तद्देवा अवृञ्जत, ग्रीष्मात् सपत्नान् अन्तरेति । दस्माचनूनपातं यजति ॥ ( १० ) ॥ अथ ' इडो ( ३ ) यजति I । वर्षा वाः । इति हि वर्षा इड: - यदिदं क्षुद्र सरीसृपं ग्रीष्महेमन्ताभ्यां नित्यक्त ं भवति-तद् वर्षा ईडितमिवान्नमिच्छमानं चरति, तस्माद् वर्षा इड: । वर्षा एव तद् देवा अवृञ्जत, वर्षाभ्यः सपत्नान् अन्तरायन् । वर्षा उ एवैप एतद् वृङ्क्त, वर्षाभ्यः सपत्नान् अन्तरेति । तस्मादिडो जति ॥ ( ११ ) ॥ अथ ' बर्हिः ' ( ४ ) यजति । शरद बर्हिः । इति हि शरद् बर्हिः - - या इमा ओषधयो ग्रीष्महेमन्ताभ्यां नित्यक्ता भवन्ति, ता वर्षा वर्द्धन्ते; ताः शरदि बर्हिषो रूपं प्रस्तीर्णाः शेरे- तस्मात् शरत् बर्हिः । शरदमेव तदेवा अवृञ्जत, शरदः सपत्नान् अन्तरेति । तस्माद् बहियंजति ॥ ( १२ ) ॥ अथ ' स्वाहा स्वाहा ' ( ५ ) इति यजति । अन्तो वै यज्ञस्य स्वाहाकारः । अन्त ऋतूनां हेमन्तः सन्ताद्धि पराद्भ्यः ११८

पृष्ठ 1207

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1207 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रयाजब्राह्मण अन्तेनैव तदन्तं देवा श्रवृञ्जत, अन्तेन अन्तात् सपत्नान् अन्तरायन् । अन्तेनो एवैष एतद् अन्तं वृङ ्मक्त े , अन्तेन श्रन्तात् सपत्नान् श्रन्तरेति । तस्मात् स्वाहा स्वाहेति

यजति ॥ ( १३ ) ॥ तद्वा एतद् वसन्त एव हेमन्तात् पुनरसुः, एतस्माद्भयेषु पुनर्भवति ।

पुनर्ह वा श्रस्मिन् लोके भवति य एवमेतद् वेदः ॥ ( १४ ) ॥

सवै ' व्यन्तु, वेतु ' इति यजति - अजामितायै । जामि ह कुर्यात् यद् ' व्यन्तु, त्र्यन्तु ' इति चैव यजेत्; ' वेतु, वेतु ' इति वा । ' व्यन्तु ' - इति वै योपा, ' वेतु ' - इति वृषा; मिथुन मंत्रैतत् प्रजननं क्रियते । तस्माद्- ' न्यन्तु, वेतु ' इति यजा॑ति ॥ ( १५ ) ॥ अथ चतुर्थे प्रयाजे समानयति बर्हिषि । प्रजा वै वर्हिः, रेत आज्यम् । तत् प्रजास्त्रैवैतद् रेतः सिच्यते । तेन रेतसा सिक्तेन इमाः प्रजाः पुनरभ्यावर्त्त प्रजायते । तस्मात् चतुर्थे प्रयाजे समानयति बर्हिषि ॥ ( १६ ) सङग्रामो वा एष सन्निधीयते - यः प्रयाजैर्यजते । यतरं वै संयत्तयो मंत्रमागच्छति स जयति । तदेतत् -- उपभृतोऽधि जुह

मित्रमागच्छति, तेन प्रजयति । तस्मात् चतुर्थे प्रयाजे समानयति बर्हिषि ॥ ( १७ ) ॥

यजमान एव जुहूमनुः योऽस्मा अरातीयति स उपभृतमनु । यजमानायैवैतद् द्विषन्तं भ्रातृव्यं बलिं हारयति । त्तव जुहमनु, आद्य उपभृतमनु । अत्र एवैतद् श्रद्य बलिं हारथति । तस्मात् चतुर्थे प्रयाज समानयति ॥ ( १८ ) ॥ स वा श्रनवमृशन् समानयति । म यद्ध अवमृशेत् - यजमानं द्विषता भ्रातृव्येन श्रवमृशेत्; श्रत्तारमाद्य ेन अवमृशेत् । तस्मादनवमृशन् समानयति ॥ ( १६ ) ॥ अथ उत्तरा जुहूमध्यूहति । यजमानमेवैतद् द्विषति भ्रातृव्येऽघ्यूहति; अत्तारमाद्ये ऽप्यूहति । तस्मादुत्तरां जुहूमध्यृहति ॥ ( २० ) ॥ देवा ह वा ऊचुः - हन्त विजितमेवानु सर्व यज्ञं संस्थापयामः, यदि नोऽसुररक्ष-मन्यासजेयुः - ' संस्थिते एत्र नो यज्ञः स्यात् ' इति ॥ ( २१ ) ॥ त उत्तमे प्रयाजे स्वाहा-कारेणैव सर्वं यज्ञं समस्थापयन् । ' स्वाहाग्निम् ' इति तदाग्नेयमाज्यभागं समस्थापयन् । ' स्वाहा सोमम् ' इति तत् सौम्यमाज्यभागं समस्थापयन् । ' स्वाहाग्निम् ' इति तद्य एष उभयत्राच्युत आग्नेयः पुरोडाशो भवति -तं समस्थापयन् ॥ ( २२ ) ॥ अथ यथादेवतम् । ' स्वाहा देवा आज्यपाः ' इति तत् प्रयाजानुयाजान् समस्थापयन् । प्रयाजानुयाजा वै देवा आज्यपाः । “ जुषाणो अग्निराज्यस्य वेतु " ( तै ० ना ० ३१५/६/२ ) इति तदग्नि ११६

पृष्ठ 1208

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1208 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथ माध्य स्विष्टकृतं समस्थापयन् । अग्निर्हि स्विष्टकृत् । स एषोऽप्येतहिं तथैव यज्ञः संतिष्ठते-यथैनं देवाः समस्थापयन् । तस्मादुत्तमे प्रयाजे स्वाहा स्वाहेति यजति यावन्ति हवींषि भवन्ति । विजितमेवैतत् - श्रनु सर्व यज्ञं संस्थापयति । तस्माद् यदत ऊर्ध्वं विलोम यज्ञे क्रियेत - न तदाद्रियेत; ' संस्थितो मे यज्ञः ' इति ह विद्यात् । स ह एप यज्ञो यातयामे-वास - यथा वषट्कृतम्, हुतम्, स्वाहाकृतम् ॥ ( २३ ) || ते देवा अकामयन्त - ' कथं न्विमं यज्ञं पुनराप्याययेम, अयातयामानं कुर्याम तेन अयातयाम्ना प्रचरेम ' इति ॥ ( २४ ) ॥ स यत् जुह्वामाज्यं परिशिष्टमा सीत् - तेन् यज्ञं समस्थापयन्; - तेनैव यथापूर्वं हवींष्यभ्य-घारयन्, पुनरेवैतानि तदाप्यापयन्, अयातयामान्यकुर्वन् । श्रयातयामं ह्याज्यम् । तस्मादुत्तमं प्रयाजं दृष्ट्वा यथापूर्व हवींप्यभिघारयति, पुनरेवैनानि तदाप्याययति, अया-तयामानि करोति । अयातयाम ह्याज्यम् । तस्माद् यस्य कस्य च हविषोऽवद्यति - पुनरेव तदभिघारयति, स्विष्टकृत एव तत् पुनराप्याययति, अयातयाम करोति । अथ यदा स्विष्टकृतेऽवद्यति - न ततः पुनरभिघारयति । नो हि ततः कांचन हविषोऽग्नावाहुतिं होण्यन भवति ॥ ( २५ ) ॥ इति पञ्चमाध्याये तृतीयं चतुर्थप्रपाठके च चतुर्थब्राह्मणन् ( १।५।३ ) - ( ११४ | ४ ) इति — त्रित्राह्मणात्मके प्रयाजब्राह्मणे प्रथमं ब्राह्मणम् १ अथ प्रमथकाण्डे पञ्चमाध्याये चतुर्थं चतुर्थप्राठके च पञ्चमं ब्रह्मणम् अथ त्रित्रात्मके प्रयाजन्त्राह्मणे द्वितीयं ब्राह्मणम् --१ - प्रयाजावृत ( पद्धतिः ) 6 सव ' समिघो ' ( १ ) बजति । प्राणा वै समिधः प्राणानेवैतत् समिन्धे I । प्राणैह्य र्यं पुरुषः समिद्धः । तस्मादभिमशेति ब्रूयात् यद्य पतापी स्यात् । स यद्य ुष्णः स्यात् ऐव तावत् शंसेठ, समिद्धो हि तावद् भवति । यद्यु शीतः स्यात् - नाशंसेत । तत् प्राणानेव अस्मिन् एतद् दधाति । तस्मात् समिधो जयति ॥ ( १ ) ॥ अथ ' तनूनपातं ' ( २ )

यजति 1 । रेतो वै तनूनपात् । रेत एवैतत् सिञ्चति । तस्मात् तनूनपातं यजति ॥ ( २ ) ॥

अथ ' ड्डो ' ( ३ ) यजति । प्रजा वा इडः । यदा वै रेतः सिक्तं प्रजायते— अथ तत्

पृष्ठ 1209

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1209 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रयाजब्राह्मण ईडितमिव अन्न ' इच्छमानं चरति तत् प्रैव एतत् जनयति तस्मादिडो यजति ॥ ( ३ ) ॥ अथ ' बाहः ' ( ५ ) यजति । भ्रूमा वै बर्हिः । भूमानमेतैत् प्रजनयति । तस्माद् बर्हिर्यजति ॥ ( ४ ) ॥ अथ ' स्वाहा, स्वाहा ' ( ५ ) इति यजति । हेमन्तो वा ऋतूनां स्वाहाकारः । हेमन्तो हामाः प्रजाः स्वं वशमुपनयते । तस्माद्ध मन् म्लायन्त्योषधयः, प्र वनस्पतीनां पलाशानि मुच्यते, प्रतितरामित्र वयांसि भवन्ति, अधस्तरामित्र वयांसि पतन्ति । विप-तितलोमेव पापः पुरुषो भवति - हेमन्तो हीमाः प्रजाः स्वं वशमुपनयते । स्वी ह वै तमद्ध कुरुते श्रियेऽन्नाद्याय - यस्मिन्नद्धे भवति य एवमेतद्वेद । ( ५ ) । ५- प्रयाजानुमन्त्रणम् देवाश्च वा असुराश्च उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे । ते दण्डैर्धनुभिर्न व्यजयन्त । ते ह अविजयमाना ऊचुः – ‘ हन्त वाच्येव ब्रह्मन् विजिगीषाम है, स यो नो वाचं व्याहृताः मिथुनेन न अनुनिक्रामात् - स सर्व पराजयातै, अथ सर्वमितरे जयान् ' इति । ' तथा ’ इति देवान् । ते देवा इन्द्रमत्र वन् ' ज्याहर ' इति ॥ ( ६ ) ॥ स इन्द्रोऽत्रवीत्-' एको मम ' इति । अथ ‘ अस्माकमेका ' इति इतरेऽब्रुवन् । तदु तन्मिथुनेन अविन्दन् । मिथुनं हि - एकश्च, एका च ॥ ( ७ ) ॥ ' द्वौ मम ' इति इन्द्रोऽवधीत् । अथ ' अस्माकं द्वे ' इति इतरेऽत्र ुवन् । तदु तन्मिथुनमेव अविन्दन् । मिथुनं हि - द्वौ च द्वे च ॥ ( ८ ) ॥ ' त्रयो मम ' इति इन्द्रोऽब्रवीत् । अथ ' अस्माकं तिस्रः ' इति इतरेऽब्रुवन् । तदु तन्मि-थुनमेवाविन्दन् । मिथुनं हि - त्रयश्व, तिस्रश्च ॥ ( 8 ) || ' चचारो मम ' इति इन्द्रोऽब-चीत् । अथ ' अस्माकं चतस्रः ' इति इतरेऽब्रुवन् । तदु तन्मिथुन मेत्राविन्दन् । मिथुनं हि - चच्चारश्च चतस्रथ ॥ ( १० ) ॥ ' पञ्च मम ' इतीन्द्रोऽत्रवीत् । तत इतरे मिथुनं नाविन्दन् । नो ह्यत ऊर्ध्वं मिथुनमस्ति । पञ्च पञ्च - इति ह्येवैतदुभयं भवति । ततोऽसुराः सर्व पराजयन्त, सर्वस्माद् देवा असुरानजयन्, सर्वस्मात् समत्नानसुरान् निरभजन् ॥ ( ११ ) ॥ तस्मात् प्रथमे प्रयाजे इष्टे ब्रूयात् - ' एको मम ' इति । ' एका तस्य, यमहं द्वेष्मि ’ इति । यद्यु ुन द्विष्यात् – ‘ योऽस्मान् द्वेष्टि, यं च वयं द्विष्मः इति ब्रूयात् ॥ ( १२ ) ॥ ‘ द्वौ मम ' इति द्वितीये प्रयाजे – ' द्व ' तस्य –— योऽस्मान् द्वेष्टि, यं च वयं द्विष्मः ' इति ॥ ( १३ ) ॥ १२१

पृष्ठ 1210

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1210 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथगाध्य ' त्रयो मम ' इति तृतीये प्रयाजे - ' तिस्रस्तस्य - योऽस्मान् द्वेष्टि, यं च वयं द्विष्मः इति ॥ ( १४ ) ॥ चचारो मम ' इति चतुर्थे प्रयाजे- ' चतस्रस्तस्य यो- स्मान् द्वेष्टि, यं च वयं द्विष्मः ' इति ॥ १५ ) ॥ ' पञ्च मम ' इति पञ्चमे प्रयाजे- ' न तस्य किञ्चन -यो -स्मान् द्वेष्टि, यं च वयं द्विष्मः ' इति । स पञ्च पञ्चेत्येव भवन् पराभवति । तथास्य सवं संवृङ क्त े -सर्वस्मात् सपत्नान् निर्भजति - य एवमेतद्वेद ॥ ( १६ ) ॥ इति पञ्चमाध्याये चतुर्थं, चतुर्थप्रपाठके च पञ्चमं ब्राह्मणम - ( १५४ ) - ( ११५१४ ) -( पञ्चमाध्यायश्च समाप्तः ) इति - त्रित्राह्मणात्मके प्रयाजत्राह्मणे द्वितीयं ब्राह्मणम् अथ प्रथमकाण्डे षष्टाध्याये प्रथमं चतुर्थप्रपाठके च षष्ठ ब्राह्मणम् श्रथब्राह्मणात्मके प्रयाजब्राह्मणे तृतीयं ब्राह्मणम ( षष्ठाध्याय: प्रारम्भः ) ६ - प्रयाजानामिष्टौ प्राथम्यम् -ऋतवो ह वै देवेषु यज्ञ े भागमी पिरे - आ नो यज्ञ भजत, मा नो यज्ञादन्तर्गत, अस्त्वेव नोऽपि यज्ञळे भागः - इति ॥ ( ९ ) ॥ तद्वै देवा न जज्ञुः । त ऋतवो देवेश्वजानत्सु असुरानुप । वर्तन्त - अप्रियान् देवानां द्विषतो भ्रातृव्यान् ॥ ( २ ) || ते हैता मेघतुमेषाञ्चकिरे-यामेषामेतामनुशृण्वन्ति । कृपन्ती ह स्मैव पूर्वे वपन्तो यन्ति, लुनन्तोऽपरे मृणन्तः, शश्वद्धेभ्योऽकृष्टपच्या एवौषधय: पेचिरे ॥ ( ३ ) । तद्वै देवानामाग आस । ' कर्नाीय इन्न्वतो द्विषन्, द्विषतेऽरातीयति किमु एतावन्मात्रमुपजानीत - - यथेदमितोऽन्यथाऽसदिति । ( ४ ) ॥ ते होचुः - ' ऋतूनेवानुमन्त्रयाम है ' – इति । ' केन ' इति । ' प्रथमानवैनान् यज्ञे यजाम ' इति ॥ ( ५ ) ॥ स हाग्निरुवाच - ' अथ यन्मां पुरा प्रथमं यजय, काहं भवानि ' इति । ‘ न त्वमायतनात् च्यावयाम ' इति । ते यतूनभिह्वयमाना अथाग्निमा-यतनात् - नाच्यावयन् I तस्मादग्निरच्युतः । न ह वा आयतनाच्च्यवते यस्मिन्नायतने भवति य एवमेतमग्निमच्युतं वेद । ( ६ ) || ते देवा अग्निमत्र वन्- ' परेहि, एनांस्त्व-मेवानुमन्त्रयस्व ' इति । स हेत्याग्निरुवाच- ' ऋतवः! विदं वै वो देवेषु यज्ञ भाग ' मिति । ' कथं नोऽविदः ' इति । ' प्रथमानेव वो यज्ञ ययन्ति ' इति ॥ ( ७ ) ॥ त ऋत्रोऽग्निमत्र वन्- ' वयं त्वामस्मासु भजामः - यो नो देवेषु यज्ञ भागमविद ' १२२