Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1211–1220
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1211–1220
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या जाह्मण इति । स एषोऽग्निॠतुष्वाभक्त: - " समिधोऽश्रग्ने ” – “ तनूनपादग्ने ” – “ इडोऽअग्ने " -“ बर्हिरग्ने ” – ' स्वाहाग्निम् ' ( तै ० ना ० ३ | ५ | ५ | ) इति । आभक्तो ह वै तस्यां पुण्य-कृत्यायां भवति, यामस्य समानो ब्रुवाणः करोति, अग्निमते ह वा अस्मा अग्निमन्त ऋतव ओषधीः पचन्तीदं सर्वम् - य एव मेतमग्निमृतुष्वाभक्त ं वेद । ( ८ ) । तदाहु: - ‘ यद् उत्तमान् प्रयाजा नावाहयन्ति - अथ कस्मादेनान् प्रथमान् यजन्ति ' इति । उत्तमान् ह्य ेनान् यज्ञे वाकल्पयन् - प्रथमान् वो यजाम- इत्यत्र वन् । तस्मादुत्त-मानावाहयन्ति, प्रथमान् यजन्ति ' ॥ ( ६ ) ॥ चतुर्थेन वै प्रयाजेन देवा यज्ञवाप्नुयन् तं पञ्चमेन समस्थापयन् । अथ यदुर्ध्वमसंस्थितं यज्ञस्य - स्वर्गमेत्र तेन लोकं समाश्नुवत || ( १३ ) || ते स्वर्ग लोकं यन्तोऽसुररक्षसेभ्य आसङ्गाद् विभयाञ्चक्रुः । ते ऽग्नि पुरस्तादकुर्वत - रक्षोहणं रक्षसा-मपहन्तारम् । अग्नि मध्यतोऽकुर्वत रक्षोहणं रक्षसामपहन्तारम् । अग्नि पश्चादकुर्णत -रक्षोहणं रक्षसामपहन्तारम् || ( ११ ) ॥ स यद्य ेनान् पुरस्ताद सुररक्षसान्यासिसङ्क्षन्-अग्निरेव तान्यपाहन - रक्षोहा रक्षसामपहन्ता । यदि पश्चादासिसङ तन्- अग्निरेव तान्यपाहन् – रक्षोहा रक्षसामपहन्ता । अत एवं सर्वतोऽग्निभिर्गुप्यमानाः स्वर्ग लोकं समाश्नुवत ॥ ( १२ ) ॥ तथो एवैष एतच्चतुर्थेन प्रयाजेन यज्ञमाप्नोति तं पञ्चमेन संस्थापयति । अथ यदत ऊर्ध्वमसंस्थितं यज्ञस्य - स्वर्गमेव तेन लोकं समश्नुते ॥ ( १३ ॥ स यदाग्नेयमाज्यभागं यजति अग्निमेतत् पुरस्तात् कुरुते रक्षोहणं रक्षसामपहन्तारम् । अथ यदाग्नेयः पुराडाशो भवति - अग्निमेवैतन्मध्यतः कुरुते - रक्षोहणं रक्षसामपहन्तारम् । अथ यदग्निं स्विष्टकृतं यजति — अग्निमेवैतत् पश्चात् कुरुते - रक्षोहणं रक्षसामपहन्तारम् | ॥ ( १४ ) ॥ स यद्यनं पुरस्तादसुररक्षसान्या सिसङ क्षन्ति - अग्निरेव तान्यपहन्ति-रक्षोहा रक्षसामपहन्ता । यदि मध्यत आसिसङ क्षन्ति - श्रग्निरेव तान्यपहन्ति - रत्तोहा रक्षसामपहन्ता । यदि पश्चादा सिसङ क्षन्ति - अग्निरेव तान्यपहन्ति - रक्षोहा रचसाम-पहन्ता । स एवं सर्वतोऽग्निभिगुप्यमानः स्वर्ग लोक समश्नुते ॥ ( १५ ) ॥ ७- अभिचारः स यद्य ेनं पुरस्ताद् यज्ञस्य अनुव्याहरेत् तं प्रति ब्रूयात् - ' मुख्यामार्त्तिमारिष्यति– अन्धो वा, बधिरो वा भविष्यसि ' इति । एता नै मुख्या यातयः । तथा हैव स्यात् ॥ ( १६ ) ॥ यदि मध्यतो यज्ञस्य अनुव्याहरेत् तं प्रति ब्रूयात् – ' अप्रजा, पशुर्भ १२३
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शतपथ भाष्य विष्यसि ' इति । प्रजा नै पशत्रो मध्यम् । तथा हैव स्यात् ॥ ( १७ ) || यद्यन्ततो यज्ञस्य अनुव्याहरेत् - तं प्रति ब्रूयात्- ' अप्रतिष्ठितो दरिद्रः क्षिप्रं म्म्रु ं लोकमेष्यसि ' इति । तथा
हैव स्यात् तस्मादु ह नानुव्याहारीक स्थात् । उत ह्य् नंवित्परो भवति ॥ ( १८ ) ॥
८ - फलश्रुतिः सम्वत्सरं ह नैं प्रयाजैर्जयन् जयति । स ह बेनैनं जयति - योऽस्य द्वाराणि वेद । किं हि स गृहैः कुर्यात् - यानन्तरतो न व्यवविद्यात् यथा यथास्य ते भवन्ति । तस्य वसन्त एव द्वारं, हेमन्तो द्वारम् । तं वा एतं सम्वत्सरं स्वर्ग लोकं प्रपद्यते । स सम्वत्सरः, सर्व वा अक्षयम् । एतेनो हास्याक्षय्यं सुकृतं भवति, अक्षय्यो लोकः ॥ ( १६ ) ॥ ६- परिशिष्ट प्रश्नोत्तरविमर्शः तदाहुः – ' किंदेवत्यान्याज्यानि ' इति । ' प्राजापत्यानि ' इति ह ब्रूयात | अनिरुक्तो प्रजापतिः, अनिरुक्तान्याज्यानि । तानि हैतानि यजमानदेवत्यान्येव । यजमानो ह्यव स्वे यज्ञ े प्रजापतिः - एतेन ह्युक्ता ऋत्विजस्तन्ते, तं जनयन्ति ॥ ( २० ) ॥ स आज्यस्य उपस्तीर्य, द्विर्हविषोऽवदाय, अथोपरिष्टात् आज्यस्य अभिघारयति । सैषा आज्येन मिश्राहुति यते । यजमानेन है । पैतन्मिश्रा हूयते । यदि ह वा अपि दूरे सन् यजते, यद्यन्तिके - यथा हैवान्ते सत इष्ट ं स्थात्, एवं हेर्नैनं विदुष इष्ट वा त्रवि पापं करोति – नो हैव वहिर्द्धा यज्ञाद्भवति य एवमेतद्वेद ॥ ( २१ ) ॥ इति पष्टाध्याये प्रथमं, चतुर्थप्रपाठके च षष्ट ब्राह्मणम — ( 219121 ) - ( 21816, ) —— ( चतुर्थप्रपाठकच समाप्तः ) इति - त्रिब्राह्मणात्म के प्रयाजब्राह्मणे तृतीयं ब्राह्मणम् समाप्तञ्चेदं त्रिब्राह्मणात्मकं प्रयाजन्राह्मणम् इति प्रवृरणपाटः - ( २ ) श्रयमत्र - मूलानुवादे प्रासङ्गिकसंग्रह: -प्रस्तुत ' प्रयाज ' कर्म का ब्राह्मणग्रन्थ के तीन ब्राह्मणों में सोपपत्तिक निरूपण हुआ है! अतएव समानप्रकरणानुबन्ध से हमने तीन ब्राह्मणों का एकत्र समन्वित रूप से समावेश करना १२४
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प्रयाजनाझग आवश्यक माना है । तीनों ब्राह्मणों में प्रयाज- कर्म्म का ही विश्लेषण हुआ है, अतएव तीनों की समष्टि को एक ब्राह्मण मानते हुए हमने इसे - ' प्रयाजब्राह्मण ' इस एक नाम से व्यवहृत करना वर्थ मान लिया है । त्रिब्राह्मण।त्मक ‘ प्रयाजब्राह्मण ' के प्रथम, द्वितीय, तृतीय, ब्राह्मणों में क्रमश: ३, २, ४, इतने अवान्तर प्रकरणों का समावेश हुआ है । तीनों ब्राह्मणों की कण्डिका संख्या क्रमशः ( १ ) –२५, ( ) – १६, ( ३ ) –२१, हैं । सम्भूय त्रिब्राह्मणात्मक इस प्रयाज ब्राह्मण में अवान्तर प्रकरण, तथा ६२ कडिका हो जाती हैं । इस प्रासङ्गिक संग्रह को लक्ष्य में रखते हुए ही प्रस्तुत मूलानुवाद का समन्वय करना चाहिये । ( १ ) - १ -प्रयाजबन्धुः १ | ( २ ) - २ - उत्तरप्र १: ( ३ ) - ३ - प्रयाजब्राह्मणम १ कं ०, ५ कं ० । ( ५ कं ० ) ६ कं ०, ८ कं ० । ( ३ कं ० ) ६ कं ०, २५ कं ० । ( १७ कं ० ) २ - त्रिप्रकरणात्मकं २५ कण्डिकात्मकं प्रथमं प्रयानब्राह्मणम् १ ( १ ) - ४ - प्रया जावृत् १ कं ०, ५. कं ० 1 ( ५. कं ० ) ( २ ) -५ - प्रयानुमन्त्रणम् ६ कं ०, १६ कं ० । ( ११ कं ० ) 8 ( १ - ६ - प्रयाजानामिष्टौ प्राथम्यम्- १ कं ०, १५० । ( १५ कं ० ) - द्विप्रकरणात्मकं १६ कण्डिकात्मकं द्वितीयं प्रयाजब्राह्मणम् २ ( २ ) -७ - अभिचार: १६ कं ०, १८ कं ० 1 ( ३ कं ० ) ( ३ ) - ८ - फलश्रुतिः १६ कं ०, । ( १ कं ० ) - चतुःप्रकरणात्मकं २१ करिडका -त्मकं तृतीयं प्रयाजब्राह्मणम् ३ ( ४ ) -६ - परिशिष्ठप्रश्नोत्तरविमर्श: - २० कं ०, २१ कं ० । ( २ कं ० ) विद्यालात्मक, अवान्तरप्रकरणात्मकं, ६२. कटिकात्मक " प्रयानत्राह्मणम् " १२५
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शतपथमाध्य ( ३ ) - मूलानुवादः— ( १ ) - पाँचवें अध्याय में तीसरा ( ३ ), चौथे प्रपाठक में चौथा ( ४ ) - ( १।५।३ ) - ( १ | ४ | ४ ) — ( २ ) — पाँचवें अध्याय में चौथा ( ४ ), चौथे प्रपाठक में पाँचवां ( ५ ) - ( ११५१४ ) - ( ११४५ ) -( ३ ) - बठे अध्याय में पहिला ( १ ), चौथे प्रपाठक में छठा ( ६ ) - ( १ | ६ | १ ) - ( १।४।६ ) — तीन ब्राह्मणों की समष्टिरूप - " प्रयाजब्राह्मण ” ( प्रथमकाण्डानुगत क्रम से २२, २३, २४ वें ब्राह्मण ) -:: -प्रथमकाण्ड में पाँचवें अध्याय में तीसरा, चौथे प्रपाठक में चौथा ब्राह्मण ( १-५-३ ) – ( १-४-४ ) ( १ – त्रिब्राह्मणात्मक प्रयाजब्राह्मण में क्रमप्राप्त प्रथम ब्राह्मण ) १ - प्रयाजबन्धु ( प्रयाजों की मौलिक उपपत्ति ) पूर्व के स्रुगादापन ब्रह्मण में त्रुगादापन - निगदमन्त्र के पाठानन्तर जिस श्राश्रावण, प्रत्याश्राबरणकर्म की उपपत्ति बतलाई गई है, उसका ' पचप्रयाज ' याग से सम्बन्ध है । आवाप -कर्म से पहिले ' पचप्रयाज ' नामक कर्म्मविशेष विहित है, जैसाकि, सूत्रानुगत - पद्धतिप्रकरण में स्पष्ट किया जाने वाला है । ' श्रो श्रावय ' इत्यादि व्याहृतियों के पारस्परिक सम्प्रदानपूर्वक विहित-पञ्चधा विभक्त आज्याहुतकर्म्म ही ' पचप्रयाज ' कर्म्म है । आ ० प्र ० कम्र्मेतिकर्त्तव्यता बतलाते हुए पूर्वब्राह्मणान्तर्गत सूत्रानुगत पद्धतिसंग्रह - परिच्छेद में यह स्पष्ट किया गया था कि, होतृकर्तृक ' अमित वेत्त्वग्नेत्रम् ' इत्यादि नवव्याहृत्यात्मक त्रुगादापर्ना नगद पाठ के अवसर पर होता के मुख से जिस समय - ' घृतवती ' - मध्वर्यो स्रुचमास्यस्व ' इस चौथी व्याहृति का उच्चारण होता है, उसके ' घृतवतीम् ' पदोच्चारण के साथ साथ ही अध्वर्यु जुहू - उपभृत् का ग्रहण कर लेता है । गादापन - कर्म्म समाप्त्यनन्तर अध्वर्यु ' आमा ' के प्रति ओ ' श्रावय ' व्याहृति का, श्रीध प्रति ' अस्तु श्रौषट् ' व्याहृति का, अध्वर्यु ' होता के प्रति ' यज ' व्याहृति का, एवं होता अध्वर्यु ' के प्रति ' ये यजामहे ' व्याहृति का उच्चारण करता है । सर्वान्त में होता के मुख से ‘ बौषट् ’ इस पाँचवीं व्याहृति का उच्चारण होते ही अध्वर्यु ' जुहू स्थित आज्यभाग की समिद्ध आहवनी-यानि में आहुति दे देता है, यही श्र ० प्र ० कर्म्म है " - ( देखिये पृ ० सं ० १०८ स्रुगादापन ब्राह्मण - ) वस्तुत: आ ० प्र ० कर्म्म का तात्पर्य है - पञ्चव्याहृतियों का पारस्परिक सम्प्रदानपूर्वक उच्चारण करना । आहुति देना तो प्रयाजकर्म्म है, जो इन्हीं पाँच व्याहृतियों के पश्चावर्त्तन से पाँच बार होता है, जिसकी सोमपतिक इतिकर्त्तव्यता प्रकृत के त्रिब्राह्मणात्मक प्रयाजब्राह्मण में प्रतिपादित हुई है । पूर्वत्राह्मण में बस्तुतः स्रु गादावनकर्म की ही सोपपत्तिक इतिकर्त्तव्यता का निरूपण हुआ है । श्रतएव वह ब्राह्मणभाष्य इसी नाम से ( ' स्रुगादापन ब्राह्मण ' नाम से ) ही व्यवहृत किया गया है । १२६
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७ प्रयाजब्राह्मण क्योंकि इस कर्म्म का ' घृतवतीम् ० ' इत्यादि चोथी व्याहृति के साथ ही ' श्रो श्रावयः ' इत्यादि लक्षण व्याहृतिरूप ( पञ्चप्रयाज कर्म का ) उपक्रम हो जाता है, अतएव वहीं श्रुति ने इस पल-व्याहृति से सम्बन्ध रखने वाला उपपत्ति का स्पष्टीकरण कर दिया है । तत्त्वतः आः प्रः कम्मों-पपत्ति से सम्बन्ध रखने वाले स्रुगादापनब्राह्मण में प्रतिपादित वह प्रकरण प्रकृत के प्रयाजब्राह्मण ही सम्बन्ध रखता है । और इस दृष्टिकोण से यह कहा जा सकता है कि, - पूर्वब्राह्मण, की-' अग्निर्होता वग्नेर्होत्रम् ० ' - ५ - ५ - २ - १ ' इस प्रथम कण्डिका से आरम्भ कर- ' ता वा एता नव व्याहृतयो भवन्ति ० ' १-५ - २ - ५ ' इस पाँचवीं कण्डिका पर्यन्त पञ्जकण्डिकात्मक ब्राह्मणभाग ही वस्तुतः ' स्स्र गाढ़ापन ब्राह्मण ' है । आगे की ' यज्ञो ह देवेभ्योऽपचक्राम ० ' - २ - ५-२-६ " इस ६ ठी कण्डिका से ही प्रयाजब्राह्मण आरम्भ हो जाता है । यहाँ से ६ ठी काण्डका से आरम्भ कर चित्राह्मणात्मक प्रकृत प्रयाजब्राह्मण के तृतीय ब्राह्मण की ' स आज्यस्योपस्तीर्य -१-६-१-२१ ' इस इक्कीसवीं कण्डिका पर्यन्त सम्पूर्ण ब्राह्मण भाग ' प्रयाजब्राह्मण ' है । प्रयाजकर्म जिन ' श्रो श्रावय ' इत्यादि आश्रावण - प्रत्याश्रावणात्मिका व्याहृतियों से सम्पन्न होता है, उन व्याहृतियों से सम्बन्ध रखने वाले पारम्परिक सम्प्रदान की, व्याहृतियों की पञ्च सख्या की, सप्तदश अक्षरों की, काम्य फलों की उपपत्तिमात्र पूर्वब्राह्मण में प्रतिपादित हुई है । अब प्रकृत प्रकरण में ' श्रश्रावय ' आदि से सम्पन्न होने वाले प्रयाजकर्म कं. ही उपपत्ति बतलाई जाती है । श्रतएव प्रस्तुत प्रकरण - ' प्रयाजबन्धु ' नाम से व्यवहृत हुआ है । इसी प्रकरणसङ्गति को लक्ष्य में रखते हुए अक्षरार्थ का समन्वय करना चाहिए । ( गाढ़ापन कम्र्मानन्तर- ' ओ श्रावय ० ' इत्यादि व्याहृतियों के द्वारा श्रवापक से पहिले पाँच प्रयाज होते हैं । प्रयाज पाँच क्यों होते हैं?, इसी प्रश्न का सोपपत्तिक समाधान करती हुई श्रुति कहता है ) – ( ये पाँच ) प्रयाज निश्चय से ( पाँच ) ऋतुएँ हैं ( अर्थात् पचप्रमाज पाँच ऋतुओं के प्रतीक हैं ) । इसीलिये ( यहाँ ) पाँच प्रयाज होते हैं ( किये जाते हैं ) । निश्चयेन ऋतुएँ पाँच हैं । तात्पर्य यही हुआ कि, प्रयाजकर्म ऋतुकर्म है । ऋतुएँ क्योंकि पाँच हैं, अतएव तद्रूप प्रयाजों का पाँच होना स्वाभाविक ही है ) | | ( दूसरा प्रश्न प्रयाजकर्म के सम्बन्ध में यह उपस्थित होता है कि, प्रकृत इष्टिकर्म में ऋतुलक्षण प्रयाजों का बजन किया ही क्यों जाता है?, इसी प्रश्न का एक वैज्ञानिक आख्यान के द्वारा समाधान करती हुई श्रुति कहती है ) – ( एक ही प्रजापति की सन्तान होने से ) ' प्राजापत्य ' ( नाम से प्रसिद्ध ) देव ( देवदेवता ) और असुर ( असुरदेवता ), दोनों ( हीं ) पिता प्रजापतिरूप यज्ञात्मक स वत्सर को लक्ष्य बनाकर ( निमित्त बना कर ) – ' यह हमारा ही होगा, यह हमारा ही होगा ' इस प्रकार स्पर्द्धा करने लगे । ( तात्पर्य, सम्बत्सर प्रजापतिरूप यज्ञसम्पत के लिए दोनों में प्रतिस्पर्द्धा चलने लगी, दोनों इस पर अपना स्वत्त्व प्रतिष्ठित करने के लिए परस्पर झगड़ने लगे ) ॥ ( २ ) || ( तिमानी असुरों स्पर्द्धा तो अवश्य की प्राजापत्य यज्ञसम्पत्ति के भोग की तो कामना अवश्य की परन्तु जिस प्राण - वाग् व्यापारलक्षण अचन -तप- श्रम से वह कामना सफल हुआ करती है, उसका अनुगमन उन्होंने नहीं किया । उधर ) देवों नें ( अपनी स्वाभाविक कर्म्म - प्रवणता से ) अर्चन ( लक्षण तपो रूप १२७
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शतपथमाध्य प्राणत्र्यापार, अन्तर्व्यापार एवं ) श्रम ( लक्षण वाग्व्यापार - बहिर्व्यापार, तत्त्वतः श्रात्मबल, एवं शरीरबल ) का अनुगमन करते हुए ( यज्ञसम्पत् प्राप्ति के उपाय का अन्वेषण करते हुए ) बिचरने लगे । ( कालान्तर में इस अर्चन, श्रम के फलस्वरूप ) उन्होंनें ( देयदेवताओं नें ) ( यज्ञसम्पत-जयसाधनभूत ) इन ( आगे बतलाए जाने वाले ) प्रयाजों को देख लिया ( प्राप्त कर लिया ) । इन ( प्राप्त प्रयाजों ) से ( देवदेवताओं नें सम्वत्सर यज्ञप्रजापति का ) यजन किया ( यज्ञ के साथ प्रयाज कर्म्म का सम्बन्ध कर दिया ), इन ( पाँच प्रयानों ) से ( देवदेवताओं नें सम्वत्सरावयबभूत पाँच ऋतुओं को, ( एवं पाँच ऋतुओं के द्वारा ही पश्चत समष्टिरूप ) सम्वत्सर को जीत लिया । ( इस प्रयाजकर्म्मबल से हो ) देवदेवताओं नें ( सम्वत्सर के श्रवयवभूत पाँचों ) ऋतु पर्वो से, ( एवं समथ्र्यात्मक ) सम्वत्सर ( रूप यज्ञमण्डल ) से ( क्योंकि अपने सहज ) शत्रुओं ( असुरों ) को निकाल वाहिर किया, अतएव ( असुरपराजयपूर्वक स्वजयलाभ के कारण हीं ) ये ( पाँच कर्म्म ) ' प्रजय ' ( जयप्राप्ति के साधन ) कहलाए । यह ' प्रजया ' ही नाम ( परोक्ष प्रिय देवताओं की परोक्षभाषा में. यज्ञसम्प्रदाय में ) ‘ प्रयाजा: ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । ( तात्पर्य आख्यान का यही हुआ कि, देवत । और असुर, दोनों सम्वत्सरयज्ञ - सम्पत्ति प्राप्त करना चाहते थे । देवताओं ने देखा कि, बिना अवयव सम्पत्ति की प्राप्ति के अवयवी सम्पत्ति प्राप्त नहीं की जा सकती । फलस्वरूप उन्होंने पहिले अवयव स्वरूपा ऋतुसम्पत्ति प्राप्त की । इसी के बल से आगे जाकर सम्पूर्ण सम्वत्सर पर उनका अधिकार होगया । इस प्रकार ऋतुयजन ही देवताओं के जय का कारण बना । अतएव ऋतुक अवश्य ही ' प्रजय ' कहा जासकता है । प्रजयरूप ऋतुकर्म हीं परोक्षभाषा में ' प्रयाज ' कहलाया ) । ( वैधज्ञ में प्रवृत्त यजमान के लिए भी यह आवश्यक है कि, वह भी उसी प्राकृतिक नियमानुसार पहिले श्रवयवसम्पत्ति ही प्राप्त करे । इसी अभिप्राय से आगे जाकर श्रुति कहतो है ) उसी प्रकार ( जैसे प्राकृतिक प्रारणलक्षण देवदेवताओं नें किया था ) यह यजमान ( भी अपने इन ) पाँच प्रयाजों से ( यज्ञातिशयलक्षण दैवात्मा के लिए ) ऋतुओं को, एवं ( ऋतुद्वारा ऋतुसमष्टिरूप ) सम्व-सर को अपने अधिकार में करता है, ( इस प्राप्ताधिकार बल पर ) ऋतुओं और सम्बत्सर से अपने शत्रुओं को बाहिर निकाल देता है । इसीलिए ( ऋतुसम्पत्तिपूर्वक सम्वत्सर सम्पत्ति की प्राप्ति के लिए ही ) यह प्रयाजों से ( ऋतुओं का यजन करता है ( प्रयाज कर्म्म करता है ) । प्रयाज कर्म क्यों किया जाता है?, इस प्रश्न का यही ' बन्धु ' - ( तात्पर्य्य - उपपत्ति - समाधान ) है || ३ || ( आवाप - प्रधान - देवता के लिए जहाँ पुरोडाशाहुति विहित है, वहाँ ऋतुरूप प्रयाज देव-ताओं के लिए श्राज्यहवि - घृताहुति - विहित है । प्रयाजों के लिए श्राज्यहवि क्यों होती है?, इसी प्रासङ्गिक प्रश्न की उपपत्ति बतलाने के अभिप्राय से श्रुति कहती है ) - वे ( पांचों प्रयाज ) निश्चयेन श्रयवि वाले होते हैं ( पाँचों के लिए घृताहुति का विधान हुआ है । कारण इसका यही है कि ) ( यह ) श्राज्य निश्चयेन वज्र ( शत्रु नाशक अमोघ शास्त्र ) है । श्राज्यरूप इसी वस्त्र से निश्चयेन देवदेवताओं नें ( असुरों का संहार करते हुए ) पाँचों ऋतुओं, ( एवं तद्द्वारा ) सम्वत्सर को जीत लिया ( था ), ( इसी जयलाभ के बल पर उन्होंनें ) ऋतुओं और सम्वत्सर से शत्रुओं को निकाल बाहिर किया ( था ) । उसी प्रकार ( प्राकृतिक I
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प्रयाजन्राह्मण यज्ञत्रत ) यह यजमान ( भी ) श्राज्यरूप इसी व्रज से ऋतु, और सम्वत्सर जीत लेता है ( लेगा ), ऋतु और सम्वत्सर से शत्रुओं को निकाल देता है ( देगा ) । ( क्योंकि आज्य शत्रुविनाशक वस्त्र है, वही कर्म - शत्रुनाशपूर्वक जयलाभ ही यहाँ अभीप्सित है । ) अतएव ( ये प्रयाज ) श्राज्य वि-वाले होते हैं । ( प्रयाजों के लिए क्यों आज्याहुति होती है?, प्रश्न की यही उपपत्ति है ) ॥ ४ ॥
( श्रभ्यवि का एक कारण तो शत्रुपराभव है । अब एक दूसरा कारण और बतलाती हुई श्रुति कहती है ) – यह जो श्राज्य है, वह निश्चयेन सम्वत्सरयज्ञ का अपना रस - सार - भाग है ( प्रातिविक रेत - बल - है ) । ( प्रयाजों के लिए अन्तरिक्ष्य श्राम्यतत्त्व की आहुति देते हुए ) देव-देवताओंने उस सम्वत्सर प्रजापति को अपने आपके सारभाग से ही युक्त बनाया । तथैव ( हविः करता हुआ ) यह यजमान ( भी ) सम्वत्सर के अपने सारभाग से ही उसे अपनाता है । इसलिए भी ये प्रयाज आम्यहवि वाले होते हैं । तात्पर्य, शत्रुविनाश पहिला फल है, सम्वत्सर को अपने ही सार भाग से युक्त कर उसे समृद्ध करना, तद्द्द्वारा स्वयज्ञ को समृद्ध करना यष्किर का द्वितीय फल है । यही प्रयाजानुगता आज्यछवि का बन्धु - उपपत्ति है ) || ५ || ( प्राजक श्रावण पूर्वक श्रारम्भ होता है, यह कहा जा चुका है । इस सम्बन्ध में यह नियम है कि, जिस यज्ञभूमिप्रदेश पर खड़ा हुआ अध्वर्यु श्राग्नीध्र के प्रति प्रयाजकर्म के लिए ' श्र श्रावय ' इस व्याहृति का उच्चारण करता है, वहाँ से पीछे नहीं हटना चाहिए । ऐसा आदेश क्यों दिया गया?, इसी प्रश्न की उपपत्ति बतलाने के अभिप्राय से प्रदेश - विश्लेषण पूर्वक श्रुति कहती है ) - वह अध्वर्यु जिस ( नियत ) प्रदेश में ही खड़ा हूं कर प्रयाजों के लिए श्रश्रावण करे, उस प्रदेश से पीछे न हटे । ( कारण यही है कि ) जो श्रध्वर्यु प्रयाजों से ( ऋतुओं का ) यजन करना है, वह ( यजमान के शत्रुओं के साथ ) युद्ध ही ठानता है । दो योद्धाओं में से जो योद्धा पराजित हो जाता है, वह निश्चयन मैदान छोड़ भागता है । दूसरा जीतने वाला योद्धा आगे बढ़ता जाता है । ( प्रयाजकर्म्म संग्रामकर्म्म है, अध्वर्यु योद्धा को जयलाभ करना है । आगे बढ़ना हीं जय का सूचक है ) अतएव ( अध्वर्यु को चाहिए कि वह आगे आगे ही बढ़े, आगे आगे ही आहुति प्रदान करे । ( प्रयाजकर्म्म से सम्बन्ध रखने वाले अपक्रमणनिषेध, अभि-क्रमण विधान का यही बन्धु है । एवं यही प्रयाजकर्म का बन्धु - उपपत्ति - है, जिसका ६ कण्डिकाओं में विश्लेषण हुआ है ) || ६ || ( परम वैज्ञानिक भगवान् याज्ञवल्क्य की दृष्टि में पीछे न हटना तो ठीक है । परन्तु आहुति • साथ साथ आगे आगे बढ़ना अनुचित है । अतएव-' तस्मादभितरामभितरामेव क्रामेत् ' पक्ष उनकी दृष्टि में विज्ञानविरुद्ध है । इसी पक्ष का खण्डन करते हुए याज्ञल्क्य कहते हैं क्रि ) वह श्रध्वर्य वैसा न करे ( आगे आगे बढ़ बढ़ कर आहुति न दे ) । ' जिस प्रदेश में खड़ा होकर अध्वर्यु प्रयाजों के लिए आश्रावण करे, वहाँ से पीछे न हटे ( इतना अंश तो विज्ञानसम्मत है, परन्तु - थोड़ा थोड़ा आगे बढ़ता हुआ आहुति दे, यह श वैज्ञानिक है । शत्रुनाश ही तो अभिप्र ेत है । वह यहाँ उस श्राहुति पर निर्भर है. जो आहुति समिद्ध अग्नि में हुत होकर समिद्ध बनती है । यदि आगे आगे बढ़ना अनिवार्य मान लिया जायगा, और उन अग्रप्रदेशों में अग्नि समिद्ध न मिलेगा, तो उस श्रसमिद्ध ( अप्रज्ज्वलित ) अग्नि १२६
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शतपथ भाष्य में आहुति भी समिद्ध रहती हुई निरर्थक बन जायगी । अतएव उत्तराक्रमण का आग्रह निरर्थक, साथ ही अभीष्टफल का विघातक भी होगा । अतएव होना यह चाहिए कि वह अध्वर्यु ( आहवनीयाग्नि के ) जिस प्रदेश में अग्नि को समिद्ध देखे, वहीं श्राहुति दे ( चाहे उप्स समिद्धा-ग्निप्रदेश के लिए भले ही आगे आक्रमण न करना पड़े । क्योंकि ) समिद्धद्दोम ( समिद्धाग्नि में आहुतिद्रव्य डालने से ) ही आहुतियाँ समिद्ध मानी गई हैं ॥ ७ ॥
इति – प्रयाजबन्धुः ( १ ) -२ – उत्तर प्रष ( सर्वप्रथम अध्वर्यु श्राग्नीध के प्रति - ' श्रो श्रावय ' यह प्रैष ( अनुज्ञा ) करता है । इस प्रैष से आग्नीध्र अर्यु के प्रति ' अस्तु श्रौपट्, यह कहता है । अनन्तर पुनः श्रध्वर्यु होता के प्रति ' यज'-यायामन्त्रका अनुवचन करो; यह प्रैष करता है । जिस जिस प्रयाज का यजन होता है, उस उस प्रयाज के लिए अध्वर्यु को श्रो श्रावय श्र श्रावय, इत्यायि रूप से आग्नीध के प्रात, एवं-' यज ' — ' यज ' इत्यादि रूप से होता के प्रति प्रैष करना पड़ता है । इस दृष्टि से आग्नीध के प्रति होने वाले ' श्रो श्रावय ' रूप प्रैषों को ' पूर्वप्रेष ' कहा जायगा, एवं उत्तरभावी होता के प्रति होने वाले- यज ' रूप प्रैयों को ' उत्तर प्रैष ' कहा जायगा । प्रस्तुत सातवीं कण्डिका में ' यज ' लक्षए । उन उत्तर प्रैषों का ही विश्लेषण हुआ है । श्रुति कहती है ) -वह ( अध्वर्यु ' आग्नीध्र के प्रति ' श्रो श्रावय ' इस रूप से ) श्रश्रावरण कर ( श्राग्नीध्र से-' अस्तु श्रौषट् ' इत्याकारक प्रत्युत्तर प्राप्त करने के अनन्तर होता नामक ऋत्विक् के प्रति उत्तर प्रेष करता हुआ ) कहता है - ' समिधो यज ' ( हे हं तः! समिद्वती देवता के याग के लिए याज्या पाठ करो ) | ( ' समिधो यज ' इस ) उत्तर प्रैष से श्रध्वर्यु वसन्त ऋतु को ही समिद्ध - प्रज्वलित करता है ( उत्तर कर्म से ऋतुएँ प्रदीप्त हो पड़ती हैं, यही तात्पर्य है । श्रध्वर्यु कृत उत्तर प्रैषात्मक ' समिधो यज ' इस समिन्धनकर्म्म से न केवल वसन्त को ही, अपितु तदुद्वारा सम्पूर्ण - पाँचों-ऋतुओं को समिद्ध कर देता है । क्योंकि वसन्त ही शेप ऋतुओं की मूलजननी है, जैसा कि, विवेचना प्रकरण में स्पष्ट किया जाने वाला है । इसी तात्पर्य्यार्थ का प्रतिपादन करती हुई श्रुति कहती है ) - ( अध्वर्यु कृत उत्तर प्रैष से ) समिद्ध वह वसन्त अन्य ( चारों ) ऋतुओं को समिद्ध कर देता है । ( वसन्तसमिन्धन के द्वारा परम्परया क्रमशः समिद्ध पाँचों ऋतुएँ प्रजा उत्पन्न करत हैं, ओषधि ( वनस्पतियों को भी ) परिपक्व करतीं हैं । ( वसन्तसमिन्धन रूप ) जिस कारण से वसन्त स्वयं समिद्ध होता हुआ परम्परया अन्य ऋतुसमिन्धन का भी कारण बन जाता है ) एता-वता ही ( केवल वसन्त समिन्धन हीं ) अन्य सव ऋतुओं ( के समिन्धन का स्पष्ट करण कर ) रहा है । तात्पर्य, केवल बसन्त समिन्धन हीं शेष ऋतुसमिन्धन के लिए पर्याप्त है ) । ( जिस अकार वसन्तयागात्मक समिद्याग में ' समिधो यज ' इत्यादि रूप से ऋतु नाम का उल्लेख होता है, १३०
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प्रया जबाझगा तद्वत् इतर ग्रीष्मादि यागात्मक तनूनपात यागादि में — ' तनूनपातं यज ' – इत्यादि रूप से नामनिर्देश स्वतः प्राप्त है । उसी का एक विशेष हेतु से निराकरण करती हुई श्रुति कहती है ) - वह अध्वर्यु ( बसन्त के आगे की - प्रीष्मादि ) ऋतुओं को ( तनूनपातं यज- इडो - यज- इत्यादि रूप से नाम निर्देश न कर केवल ) ' यज - यज ' - इस प्रकार नाम निर्देश के बिना हीं कहता है । ( जब क्रमप्राप्त नामनिर्देश होना न्यायप्राप्त है, तो नामग्रहण पूर्वक उत्तर ऋतुओं के लिए उत्तर प्रैष क्यों नहीं किया जाता?, प्रश्न का समाधान करती हुई श्रति कहती है कि ) अजामिता के लिए ( ही यज रूप से ही ) उत्तर ऋतुओं को कहता है ( ऋतुओं के लिए उत्तर प्रैष करता है ) । जामि ( पुनरुक्त-दोष ) करेगा, यदि वह अध्वर्यु ' - ' तनूनपातं यज ' - ' इडो यज ' यह कहेगा तो । तात्पर्य्य, जब समिद् नामनिर्देश से ही इतर ऋतुओं का समिन्धन हो जाता है, तो दुबारा ऋतुओं का नाम निर्देश करना पुनरुक्ति होगी, जो वेदभाषा में ' जामि ' दोष कहलाया है ) इसलिए वह ( नाम निर्देश किए -बिना केवल ) ' यज - यज ' इसी रूप से उत्तर ऋतुओं को कहता है ॥ ८ ॥
इति — उत्तरप्रॊषः ( २ ) -: ०: -३ - प्रयाजब्राह्मण – ऋतुयागात्मक पञ्च प्रयाजों से सम्बन्ध रखने वाली उपपत्तिका १ कण्डिका से ८ कण्डिका-पर्यन्त = कण्डिकाओं के द्वारा स्पष्टीकरण कर है कण्डिका से २५ वीं कण्डिकापर्य्यन्त ब्राह्मण-समाप्तिपन्न १७ कण्डिकाओं के द्वारा प्रयाजयागेतिकर्त्तव्यता लक्षण पद्धति का प्रयाजयागा-ठाक्रम से निरू करती हुई श्रुति कहती है ) – ( १ ) वह ( अध्वर्यु ' नामक ऋत्विक् के - ' समिधो अग्न श्राजस्य व्यन्तु बौषट् ' इस समिह बताक याभ्यामन्त्र के बोलने पर उसके - ' बॉषट् ' उच्चारण के साथ आहवनीयाग्नि के समिद्ध प्रदेश में जुहू स्थित ज्य की आहुति के द्वारा ) समिद्याग ( वसन्तयजन ) करता है । समित निश्चयेन वसन्त है । ( प्राकृतिक समिद्याग से ) देवदेवताओं ने वसन्त को ही ( असुराराधिकार से पृथक किया ( था ), एवं वसन्त से ( अपने शत्रु असुर ) सपत्नों को निकाल बाहिर किया ( था ) । इसी प्रकार ( प्राकृतिक समिद्याग की विधा पर प्रतिष्ठित याज्यामन्त्रशक्तियुक्त इस अपने वैध समिद्याग के बल पर ) यह श्रध्वर्यु ( यजर ान के लिए ) वसन्त को ही ( यजमान के शत्रुओं के अधिकार से ) पृथक करता है, एवं ( यजमान के ) शत्रुओं को निकाल बाहिर करता है । वैधयज्ञ से उत्पन्न यज्ञातिशय लक्षण यजमान के दैवात्मा के स्वर्गात्मक सम्वत्सर यज्ञफल के प्रथम वसन्त पर्व पर यजमान के शत्रु का अधिकार न रहे, केवल देवात्मा ही उसका अन्यतम भोक्ता बने ) इसीलिए ( अध्वर्यु ) समिद्याग करता है ॥ ६ ॥
( २ ) समिद्याग करने के अनन्तर वह ( श्रध्वर्यु होता के - ' तनूनपादग्न श्राजस्य वेतु बौषट् ' इस तानूनपाद्दे वताक याज्यामन्त्र के बोलने पर उसके ' वौषट् ' उच्चारण के साथ श्राइवनीयाग्नि के १३१
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शतपथमाध्य समिद्ध प्रदेश में जुहूस्थित श्रज्याहुति के द्वारा ) ततून गद्याग ( ग्रीष्मयजन ) करता है । तनूनपात् निश्चयेन प्रीष्म है प्रीष्म ही इन ( पार्थिव ) प्रजाओं के शरीरों को तपाता है ( श्रतएव तनूनपात अवश्य ही प्रीष्म है ) | ( प्राकृतिक तनूनपाद्याग से ) देवदेवताओं ने ग्रीष्म को ही ( असुराधिकार से ) पृयकू किया ( था ), एवं प्रीष्म से ( असुर ) सपत्नों को निकाल बाहिर किया था - ( शेष ह कण्डिकावत् ) || १० ॥ ( ३ ) तनूनपाद्यागानन्तर वह ( अध्वर्यु होता के– ' इडो अग्न श्राज्यस्य व्यन्तु, वौषट् ' इस इट् - देवताका याज्या - मन्त्रोचारण करने पर उसके ' वौषट् ' उच्चारण के साथ समिद्ध आहवनीयाग्नि याहुति के द्वारा ) इड् - याग ( बर्षायजन ) करता है । इडः निश्चयेन वर्षा है । इड: इसलिए वर्षा है कि, पृथिवी पर रेंगते हुए ये छोटे छोटे कृकलास- गोधा लटें आदि जन्तु गर्मी, और सर्दी के आक्रमण से अतिशयरूप से क्षीणकाय हूं ' जाते हैं, वे सब क्षुद्र सरीसृप वर्षा के छाते ही जीवन धारण करते हुए से- पुष्ट से होते हुए अन्नादान की इच्छा करते हुए ( बड़े उल्लास के साथ ) इतस्ततः विचरने लगते हैं । ( इस प्रत्यक्ष दृष्ट इडन्न भाव से अवश्य ही वर्षा को इट् अन्नात्मक-कहा जा सकता है । - ( शेष १ कण्डिकावत ) ॥ ११ ॥
( ४ ) -इड् - यागानन्तर वह ( अध्वर्यु ' होता के बहिरग्न श्राजस्य वेतु वौषट् ' इस बर्हि र्देषताक याभ्यामन्त्रोच्चारण के अनन्तर उसके ' वौषट् ' उच्चारण के साथ समिद्ध श्राहवनीयाग्नि में ज्याहुति के द्वारा ) बहियांग ( शरधजन ) करता है । बर्हि निश्चयेन शरत् है । बईि इसलिए शरत् है कि, जो ये श्रोषधियाँ गर्मी - सर्दी से मुझ जातीं हैं, वे श्रोषधियाँ वर्षा के आगमन पर ( पुनः ) प्रवृद्ध हो जाती हैं । ( वर्षा में प्रवृद्ध ) वे ( ही ) ओषधियाँ शरदऋतु में फैले हुए - बिखरे हुए दर्भतृणों की भाँति शीर्ण हो जातीं हैं । इस स्तरण - शीर्ण - भाव के साधर्म्य से शरत् ( श्रवश्यमेव ) बर्हि है । ( शेष कण्डिकावत् ) ॥ १२ ॥
( y ) - बर्हिय्र्यागानन्तर वह ( अध्वर्यु होता के - " स्वाहाऽग्नि स्वाहा सोभं स्वाहाग्नि, स्वाइ । देवाँ श्राज्यपान, स्वाहाग्नि होत्रा जुषाणा:, श्रग्न आयस्य व्यन्तु चौपट् " इस स्वाहा - हेमन्त - देवताक याग्यामन्त्रोचारण के अनन्तर उसके ' वौषट् ' उच्चारण के साथ समिद्ध आहवनीयाग्नि में श्राज्या-हुति के द्वारा ) स्वाहा - स्वाहायाग - ( हेमन्त यजन ) करता है । ' स्वाहा ' कार यज्ञ का अन्त ( अन्तिम पर्ब ) है | ( उधर पाँच ) ऋतुओं का हेमन्त ही अन्त ( अन्तिम पर्व ) है । हेमन्त वसन्त से पराद्ध - परले भाग- अन्तिम भाग पर है । इसीलिए इसे ऋतुओं का अन्त कहा जा सकता है । ( अपने प्राकृतिक स्वाहायाग से ) देवदेवताओं नें ( यज्ञ के ) अन्त ( अन्तिम पर्व रूप हेमन्त ) को ( असुराधिकार से ) पृथक कर लिया ( था ), अन्तद्वारा ( स्वाहायाग के द्वारा ) अन्त से
( हेमन्त से ) सपत्नों को निकाल बाहिर किया ( था ) । ( तथैव शेषं स्पष्टम् ) ॥ १३ ॥
( हेमन्त ऋतुओं का अन्तिम पर्व है, उधर स्वाहा भी यज्ञ का अन्तिम पर्व ही है । इस स्वाहास्त ऋतु - अन्त हेमन्त - पर अधिकार तो हो जाता है, परन्तु अन्तभावना यजमान के ऐड-लौकिक जीवन के लिए प्रशस्त नहीं मानीं जा सकती । इस श्रन्तयाग स्वाहायाग - लक्षण हेमन्त-१३२