Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1221–1230

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1221–1230

पृष्ठ 1221

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प्रयाजब्राह्मण यजन से यज्ञान्तलक्षण - स्वर्गावाप्ति हो सम्भव है । श्रपेक्षित यह है कि, यज्ञ - कर्त्ता यजमान यावदायुर्भोगपर्य्यन्त ऐहलौकिक सुख का भोग करता हुआ अनन्तर दैवात्माकर्षण से स्वर्ग प्राप्त करे । अनन्तर पुनः पुण्ययोनि में जन्मधारण करे | क्या स्वाहायाग से ऐसा भी सम्भव है? । प्रत्यक्ष में तो अपने अन्तभाव से हेमन्तयाग केवल तात्क्षणिक स्वर्गावाप्ति का समर्थक बना हुआ है । इमी विप्रतिपत्ति का निराकरण करती हुई श्रुति कहती है कि, यद्यपि यह ठीक है कि हमन्त अन्तभाव का प्रवर्त्तक है । तथापि यह भी सिद्ध विषय है कि ) हेमन्त से ही वसन्त पुनः प्राण धारण करता है, हेमन्त से ही वसन्त पुनः उत्पन्न होता है । जो याज्ञिक हेमन्त के इस पुनः प्राणा-धान के रहस्य को जानता है, वह अवश्यमेव ( यावदायुर्भोगपर्यन्त जीवित रहता हुआ ऐहलौकिक सुख का भी भोग कर लेता है, एवं स्वर्गफल के भोगानन्तर ) इस लोक में भी ( पुण्ययोनि में ) जन्म लेता है ( जैसे कि, हेमन्त के अन तर वसन्त जन्म लया करता है ) । ( तात्पर्य यही है कि, हेत अवसानात्मक बनता हुआ भी जीवनोपयक वसन्तोपक्रम का निमित्त है । इस भावना से अन्तभावनात्मक हेमन्तयाग- ज. नत नष्ट भावना की निवृत्ति हो जाती है ) ॥ १४ ॥

अयमत्र संग्रहः— १ – समिद्याग: --समित् ( वसन्तः ) २ - तनूनपाद्यागः तनूनपात् ( ग्रीष्मः ) ३ - इडयागः इट् ( शरत् ( वर्षा ) -- पचप्रयाजाः, पचतनः ( हेमन्त: ) ५ - स्वाहायागः स्वाहा ( " स वै समिधो यजति ० " इत्यादि ६ कण्डिका से आरम्भ कर " अथ स्वाहा स्वाहा यजति " इत्यादि १४ वीं कण्डिकापर्यन्त ब्राह्मणभाग से पञ्च प्रयाजों की इतिकर्त्तव्यता का विश्लेषण किया गया । आगे के शेष ब्राह्मण भाग पन प्रयाजों की इतिकर्त्तव्यता का विश्लेषण किया गया । अव आगे के शेष ब्राह्मणभाग में प्रयाजकर्म्म से सम्बन्ध रखने वाली कुछ एक उन विशेषताओं का स्पष्टीकरण किया जाता है, जिनके सम्बन्ध से प्रयाजयाग परोक्ष - श्रदृष्ट- फलों का जनक बनता है । होता के द्वारा प्रयुक्त याज्या मन्त्रों के अन्त में- १-२-३-४-५- इन पाँचों मन्त्रों के अन्त में क्रमशः १- व्यन्तु, २ - वेतु, ३ - व्यन्तु, ४- वेतु, ५- व्यन्तु इस प्रकार व्यन्तु वेतु पदों का सन्निवेश रहता है । यह विपर्य्यय क्यों. जबकि पञ्चतु यागात्मक पञ्चप्रयाजयाग ऋतुसमानत्त्वेन एवं प्रयाजसमान-वेन - समान है । या तो पाँचों याज्यामन्त्रों में ' वेतु- वेतु ' का ही समावेश होना चाहिए, अथवा तो पाँचों में ' व्यन्तु - व्यन्तु ' का ही समावेश रहना चाहिए । स्थिति प्रदर्शनपूर्वक इसी विप्रतिपत्ति का निराकरण करती हुई श्रुति कहती है ) - वह ( अध्वर्यु होता के द्वारा - ज्या मन्त्रों के ब्र.मिक ) ' व्यः तु, वेतु ' इस ( क्रम से उच्चरित होने पर ही ) समिद्यागादि करता है ( यजन करता है ) १३३

पृष्ठ 1222

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शतपथ भाष्य जामिता के लिए ही । सिद्ध - को पुनः सिद्ध करना, उक्त को पुनः कहना हीं जामि दोष है । इस पुनरुक्त दोष की निवृत्ति के लिए व्यन्तु - व्यन्तु अथवा वेतु- वेतु रूप से यजन न कर व्यन्तु - वेतु, इस रूप से यजन किया जाता है, यही तात्पर्य्य है । इसी तात्पर्य को स्पष्ट व रती हुई श्रुति कहती है कि वह अवर्यु ( अपने इस यज्ञ में ) जामि ( पुनरुक्तदोष का समावेश ) करेगा, यदि वह व्यन्तु - व्यन्त - रूप से यजन करेगा, अथवा तो वेतु- वेतु - रूप से यजन करेगा । ( जामि दोर्षानवृत्ति के साथ साथ इस व्यन्तु वतु विपर्य्यय का एक प्रासङ्गिक फल और भी है । यज्ञ से दैवात्मा का प्रजनन अपेक्षित है! प्रजनन कर्म्म योषात्मक- स्त्री - भ्रूण, एवं वृपात्मक - पु भ्रूण, दोनों के दाम्पत्य-भाव पर निर्भर है । व्यन्तु इस बहुवचनान्त पद से, वेतु इस एकवचनान्त पद से प्रजननसाधक-योषावृषात्मक वह मिथुन भाव भी प्राप्त हो जाता है । ' तस्मादेकस्य पुरुषस्य बह्वयो जाया भवन्ति ' इत्यादि श्रुति के अनुसार योपात्मिका स्त्री बहुत्त्वधर्म से एवं षात्मक पुरुष एकत्त्व से युक्त है । फलतः व्यन्तु से संख्यानिदान - सम्पतद्वारा योषा का, तथा वेतु से वृषा का संग्रह हो जाता है । इसी प्रासङ्गिक फल का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है ) – ' व्यन्तु यह ( बहुवचनान्तपद अपने बहुत्त्वधर्म्य से ) निश्चयेन योषा ( की प्रतिकृति बनता हुआ योषाप्राण का संग्राहक ) है, ' वेतु ' यह ( एकवचनान्त पद अपने एकत्वधर्म्म से ) निश्चयेन वृषा ( की प्रतिकृति बनता हुआ वृपात्राण का सम्राइक ) है । ( व्यन्तु - वेतु रूप से किए जाने वाले प्रयाजयाग से योपा - वृषा के ) मिथुनभाव से ही प्रजनन किया [ ता है ( प्रजननसम्पत्ति प्राप्त की जाती है ) । इसलिए 1 अजामिता के लिए, एवं मिथुनभात्र प्राप्ति के लिए, दूसरे शब्दों में पुनरुक्तदोष - निवृत्ति के लिए, एवं प्रजन्न - सम्पत्ति के संग्रह के लिए वह अध्वर्यु ) ' व्यन्तु - वेतु ' इस ( विपर्य्यय क्रम ) से ( ही ) यजन करता है ( करना चाहिए ) ॥ १५ ॥

( पञ्चत्तु के भेद से पाँच प्रयाज बतलाए गए हैं । इन में से शरद्यागात्मक बर्हिर्नाक चौथे प्रयाज की इतिकर्त्तव्यता में एक विशेष धर्म का अनुगमन किया जाता है । ' यदुपभृति, प्रयाजानुयाजेभ्यस्तत् ' तै ० ब्रा ० ३ | ३ | ६ इत्यादि कृष्णश्रुति के अनुसार जुहू की आधारभूता उपभृत् नाम की स्रुक् में जो श्राज्य लिया जाता है, उस से ऋतुरूप प्रयाजकर्म, तथा छन्दोरूप अनुयाजकर्म्म, दानों की इतिकर्त्तव्यता पूरी की जाती है । पूर्व के २ प्रपाठकके ५ ब्राह्मण में भी यह स्पष्ट किया गया है कि, श्राज्यग्रहण ऋतु और छन्दोरूप प्रयाजानुयाजों के लिए ही होता है - " अथ यान्याज्यानि गृहन्ते, ऋतुभ्यश्चैव तान, छ दोभ्यश्च गृह्यन्ते " - शत ० ११२ प्र ० ।४ ब्रा ० | ७ कं > | वहीं यह भी स्पष्ट किया गया है कि, ' ध्रुवा ' पात्र में आठ बार करके उपभृत् में चार बार कर के जुहू में ज्यग्रहण होता है । चतुर्बार गृहीत जुहूस्थित श्राज्य प्रयाजकर्म्म का, एवं अष्टवार गृहीत उपभृतस्थ श्रज्य अनुयाजकर्म का सम्पादक बनता है । जुहूस्थित आभ्य से क्रमशः समित् - तनूनपात् - इटू लक्षण वसन्त - ग्रीष्म - वर्षा इन तीन ऋतुदेवताओं का यजन तो बिना उपभृदाज्य से सम्वन्ध कराए केवल जुहूस्थित श्राज्य से ही कर लिया जाता है । चौथे बर्हिर्लक्षण शरद्याग के समय जुहू का उपभृत से सम्बन्ध कराना आवश्यक माना गया है । तीसरे प्रयाज के समाप्त होने पर जुहू में उपभृदाज्य लेकर ही चौथा प्रयाज होता है । ऐसा क्यों किया जाता है?, इसी प्रश्न का स्थित प्रदर्शनपूर्वक समाधान करती हुई श्रुति कहती है ) -१३४ ७

पृष्ठ 1223

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प्रथाजब्राह्मण " तृतीय प्रयाजयाग के समाप्त्यनन्तर वह श्रध्वर्यु चौथे ' बर्हि ' नामक प्रयाज कर्म्म में ( जुहू में उपभृत् से ) आञ्च ग्रहण करता है । बहिं निश्चयेन ( उत्तरोत्तर बृ इणधर्म से ) प्रजा है, श्राज्य रेत ( वीर्य्य ) है । ( बहियों में जुहू में उपभृत् से आज्य लेता हुआ ) अध्वर्यु बहिरूप प्रजाओं में ह्रीं आज्यरूप रेत का सिञ्चन करता है ( वीर्य्याधान करता है ) । इस सिक्त रेत से ( ही ) प्रजाएँ पुनः पुनः जन्म लिया करतीं हैं । इसीलिए चौथे बहि नामक प्रयाज में ( जुहू में उपभृत से ) श्राज्य लेता है | ( तात्पर्य्य वस्तुतः यह है कि, प्रयाजकर्म के लिए जुहू से पाँच श्रहुतियाँ दी जातीं हैं । अवश्य ही पाँच आहुतियों के लिए जुहूस्थित श्राज्यमात्रा अपर्याप्त है । अतएव प्रयाज-कर्म के मध्य में एक बार उपभृत् से आाज्य लेना आवश्यक हो जाता है । कब लेना?, यह प्रश्न है । ' वसन्तो ग्रीष्म, वर्षाः, ते देवा ऋतवः ' - ' शरन् - हेमन्तः- शिशिरः, ते पितरः ' - शत ० २।५।१।३।१ इत्यादिश्रुति के अनुसार अग्निप्राणप्रधाना, अतएव देवदेवतात्मिका वसन्त - प्रीम - वर्षा, इन तीन ऋतुओं का एक स्वतन्त्र श्राग्नेय विभाग है । एवं सोमप्राणप्रधना, अतएव पितृदेवतात्मिका- शरत्-हेमन्त शिशिर - इन तीन ऋतुओं का एक स्वतन्त्र सौम्य विभाग है । ऐसी स्थिति में वसन्त- प्रीष्म-वर्षानुगत समित - तनूनपात - इटू - इन तीन प्रयाजों का तो अविच्छिन्नरूप से बिना उपभृत से दुबारा आज्य लिए ही यजन करना प्रकृतिसम्मत हो जाता है । चौथे प्रयाज से विजातीय बहि नाम की सौम्य ऋतु का उपक्रम होता है । अतएव इसी में श्राज्यग्रहण करना सुसङ्गत बनता है I । इसके साथ ही निदान मात्र से प्रजाओं में रेतः सेक भी हो जाता है, जो कि देवात्मप्रजनन में अपनी प्रधानता रख रहा है । इसीलिए चतुर्थप्रय ज में हीं आज्यसमानयन किया गया है, जैसाकि विवे-चना प्रकरण में विस्तार से बतलाया जाने वाला है ) ॥ १६ ॥

( चतुर्धप्रयाज में श्राज्यग्रहण करना ऋतुस्वरूपानुगत बनता हुआ प्रकृत्यनुगत है, प्रजाओं में रेत का प्रधान करता है, इन दो प्रतिशियों के अतिरि इसके यहाँ ग्रहण का एक फल और भी स्वतः सिद्ध है । उसीका विश्लेषण करती हुई श्रति कहती है ) – जो अध्वर्यु इन पाँच प्रयाजों से ( ऋतुओं का ) यजन करता है, वह ( पूर्वाख्यानानुसार सम्वत्सरमण्डल में प्रविष्ट शत्रुओं को पराजित करने के लिये ) संग्राम ही ठान रहा है । दो दलों के संग्रामाभिमुख होने पर जिस एक दल को मित्रसेना का सहयोग प्राप्त हो जाता है, वह जीत जाता है । ( ठीक इसी के अनुरूप यह आय - ग्रहणकर्म है ) । इस श्राज्यग्रहण कर्म्म से जुहू को उपभृदात्यरूप मित्र मिल जाता है । ( जुहू स्थित श्राज्य वह सेनादल है, जिसे असुरपराभव क ना है । उपभृत स् ित आज्य वद्द मित्रसेना है, जिसके सहयोग मिलने पर पुरपराभव निश्चित है ) इसी मित्रसेना - सहयोग प्राप्ति के लिये ( भी ) चौथे ' बाई ' नामक प्रयाज में ही श्राज्यसमानयन करता है | १७ || ( प्रयाजकर्म वह संग्राम कर्म है, जिसके द्वारा यजमान के स्वर्गफलभोक्ता दैवात्मा के भोग्य सम्पत्सर में से असुरों को पराजित करना है । शत्रु को निर्वल बनाना हीं शत्रुपराभव का मूल-कारण है | मित्रसेना की सहयोगप्राप्ति, स्वस्थानस्थिति, आदि अन्यान्य कारणों में से शत्रुपराभव का एक यह भी अन्यतम कारण माना गया है कि, शत्रुसेना में भेदनीति डालते हुये उसे अपनी सेना में मिला लेना । उसक बल को अपना भोग्य बना लेने से अवश्य ही वह निर्बल हो जायगा । १३५

पृष्ठ 1224

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शतपथमाष्य इसी एक और प्रयोजन का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है ) - यजमान जुहू को लक्ष्य बना रहा है । यजमान के लिये जो शत्रुता करता है, वह । यजमान के शत्रुदल ) उपभृत को लक्ष्य बना रहा है । ( अर्थात् जुहूस्थित श्राज्य निदानेन यजमान का सैन्यदल है, ( उपभृत से जुहू में भाग्य लेता हुआ ( अध्वयु द्वेष करने वाले शत्रु सेनादल को यजमान के लिये ही बलिरूप से आकर्षित करता है ( शत्रुबल का यजमान बल में समावेश कराता हुआ यजमान को सशक्त बना रहा है ) । अपिच ( एक प्रयोजन यह भी है कि ) - जुहू अत्ताभाव का, एवं उपभृत श्राद्यभाव को लक्ष्य बना रही है । ( उपभृत से जुहू में श्राज्यग्रहण करता हुआ ) अध्वर्यु भोक्ता यजमान के लिये भोग्य सामग्री पहुँचा रहा है । ( इसप्रकार प्रकृत्यनुगत ऋतुभाव, प्रजावर्ग में वीर्य्याधान, मित्र सेनाप्राप्ति, शत्रुदल की मित्ररूप में परिणति भोग्यसम्पत्प्राप्ति, इत्यादि अनेक दृष्टियों से चोथे प्रयाज में ही श्राभ्यग्रहण करना श्रन्वर्थ बनता है ) - ' तस्माच्चतुर्थे प्रयाजे समानयति ' || १८ || ( उपभृत्, और तत्रस्थ आाज्य निदानेन शत्रुसैन्यदल है, यह कहा गया है । साथ ही इस आज्य के समानयन का यह भी फल बतलाया गया है कि, शत्रुसैन्यदल को भेदनीति के द्वारा यह ' अपना बलि बना लेता है । भेदनीत से सम्बन्ध रखने वाला यह प्रकार तभी सफल होता है, जबकि सैन्यदल के सम्पर्क में न जाकर तटस्थ रहते हुये अपने स्थान में रहते हुए, पृथक रहते हुये हो परोक्षरूप से उसे अपने दल में मिलाया जाय । निकटसम्पर्क में जाना शत्रुदल में फँसना है । और सम्भवतः ऐसा करना कभी कभी पराजय का कारण भी बन जाता है । इसलिये ) वह अध्वर्यु । जुहू में उपभृत् से श्राज्यग्रहण करने की कामना रखा हुआ ) जुहू को उपभृत पृथकू रखता हुआ ही श्राज्यसमानयन करता है । यदि वह अध्वर्यु जुहू को उपभृत् से मिला देगा, ( स्पर्श कराता हुआ श्रथग्रहण करेगा ) तो ( अपने इस अवमर्शन से ) बह शत्रु के साथ यज-मान को मिला देगा ( शत्रुसेना में अपनी सेना का बल डाल देने वाला बनता हुआ इष्टसाधन के स्थान में अनिष्ट करा बैठेगा ) । ( इसके अतिरिक्त इसी अबमर्शन से ) यह अध्ययुत्ता ( भोक्ता ) को श्रद्य से मिला देगा ( भोक्ता को भोग्य के आधीन कर देगा, जबकि भोग्य का भोक्ता के आधीन रहना समृद्धि का कारण माना गया है । ऐसा न हो ) इसलिये नवमृशम् ( जुहू का उपभृत् से स्पर्श न करता हुआ ) ही आज्यग्रहण करता है ( करना चाहिये ) ॥ १६ ॥

( उपभृत् के साथ स्पर्श न कराते हुये जुहू में जब उपभृत् से श्राज्य ले लिया जाता है, तो को किस स्थिति में रक्खा जाय?, यह जिज्ञासा इसलिये होती है कि, जुहू - उपभृत्, दोनों जुहू स्त्र क् - सामान्यत्त्वेन मइयोगिनी मानी गई हैं । क्या जुहू को उपभृत् से अध: प्रदेश में अध्वर्यु -हाथ में लिये रहे? । श्रुति कहती है नहीं । श्रपितु ) ज्यग्रहणानन्तर ( अथ ) वह अध्वर्यु गृहीताया उस जुहू को उपभृत के ऊपर ( उपभृत् से न मिलता हुआ ) थामे रहता है ( उपभृत् से ऊर्ध्व- प्रदेश में हीं जुहू हाथ में लिए रहना चाहिये ) । ( जुहू को उत्तरा रूप से रखता हुआ ) अध्वर्यु यजमानशत्रु की समुपस्थिति में यजमान को ऊँचा ही रखता है । श्रत्ता को श्राद्य की समुप-स्थिति में ऊँचा ही रखता है । तात्पर्य, जुहू निदानेन यजमान है, भोक्ता है । उपभृत् यजमानशत्रु है, आद्य है । ऐसी स्थिति में जुहू को उपभृत् से नीचे रखना - यजमान को, भोक्ता को यजमानशत्रु १३६

पृष्ठ 1225

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प्रयाजवाह्मण के, भोग के नीचे रखना होगा, जो महा अनिष्टकर है । ऐसा न हो, अपितु यजमान अपने शत्रु से ऊँचा रहे, भोक्ता भोग्य के ऊपर रहे ) - ' तस्मादुत्तरां जुहूमध्यूति ' ॥ ९ ॥

( १५ वीं कण्डिका से आरम्भकर २० वीं कण्डिका पर्य्यन्त ६ कण्डिकात्मक ब्राह्मण भाग में प्रयाजकर्म्म से सम्बन्ध रखने वाली व्यन्तु चेतु चतुर्थप्रयाज में आज्यसमानयन, अनबमशे-पूर्वक समान ग्न, ज्याइणान्तर जुहू का उत्तर अध्यइन, आदि विशेषताओं का सापपत्तिक निरूपण किया गया । अब स्वाहायागात्मक हेमन्तयाग नामक पाँचवें प्रयाज से सम्बन्ध रखने वाली विशेषता का एक ऐतिहासिक आख्यान के द्वारा विश्लेषण करती हुई श्रुति कहती है ) -' ( भोमार्गनिवासी मनुष्यविध भौमदेवता त्रों नें प्रयाजों से सम्वत्सर मण्डल - प्रतिकृतिरूपा भौम-त्रिलोकी पर अपना अधिकार कर लिया । देवता जीत गए, असुर पराजित होगए । इस विजय प्राप्ति के व्यवहितोत्तर काल में हीं ) उन देवदेवताओं ने परम्पर की मन्त्रणा से निश्चय कर अपना यह मन्तव्य प्रकट किया कि, क्या ही अच्छा हो ( हन्त ), यदि अपने ( प्रयाजयागद्वार ) विजित ( अपने अधिकार में आए हुए यज्ञ ) को लक्ष्य बनाकर ( इस प्रयाजबाग के साथ ही ) सम्पूर्ण यज्ञकर्म्म पूरा कर डालें । ( ऐसा करने से, यहीं यज्ञ को सर्वात्मना पूर्ण करने से फल यह होगा कि ) यदि इसके अनन्तर ( यज्ञपूर्णा तासिद्धयनन्तर ) असुर - राक्षस अपने ( यज्ञ ) पर आक्रमण करेंगे ( विघ्न डालेंगे ), तब भी अपना यह यज्ञ पूर्ण ही बना रह जायगा । इसी निश्चय के अनुसार ॥ २१ ॥ -उन देवदेवताओंनें पाँचवें प्रयाजानुष्ठान में ' स्वाहा ', कार से ही सम्पूर्ण यज्ञ पूरा कर

लिया | ' स्वाहा अग्निम् ' इससे आग्नेय अध्यभाग को पूरा कर लिया । ' स्वाहा अग्निम् ' इससे, मोजो कि उभयत्र अच्युत आग्नेय पुरोडाश होता है - ( विहित है ), उसे पूरा कर लिया || २० || -( पौर्णमासेष्टि, किंवा दर्शेष्ट, के अनुरूप जो यजनीय देवता विहित हैं, उनका उसी ) देवता-क्रमानुसार यजन कर लिया । ' स्वाहा देवा श्राज्यपाः ' इससे प्रयाजानुयाज - देवताओं को पूरा कर लिया । प्रयाजानुयाज देवता ही ( ऋतुछन्द ही ) तो ( आहुति के कारण ) आज्यपा ( घृतपान करने वाले ) हैं । ' जुषाणोऽग्निराज्यस्य वेतु ' इससे स्विष्टकृत् अग्नि को पूरा कर लिया । श्रग्नि ह्रीं स्विष्टकृत् है - " अग्निर्हि त्विष्टकृत् " || ( आख्यान का विशदीकरण ता विवेचना प्रकरण से ही सम्बन्ध रखता है । प्रकरणसङ्गति के लिए प्रकृत में इस सम्बन्ध में यही कह देना पय्यांत होगा कि, प्राकृतिक नित्य यज्ञ के आधार पर वितायमान वैधयज्ञ का अनुगमन सर्वप्रथम भौमस्वर्ग निवासी भौम- मनुष्यविध - देवताओं नें किया था । उनके यज्ञ कर्म्म पर मनुष्यविध असुर समय समय पर आक्रमण किया करते थे । कभी कभी इन असुराक्रमणों से भौमदेवताओं का यह यज्ञकर्म्म अधूरा ही रह जाता था । इस विप्रतिपत्ति के निराकरण के ए देवताओं नें जिस तात्-कालिक प्रणाली का आविष्कार किया, उसी का श्राख्यानद्वारा स्पष्टीकरण हुआ है प्रयाजनागान्त में उस प्रणाली के अनुगमन से उनका यज्ञ एक प्रकार से इमलिए पूर्ण हो गया हि. कृम्न यज्ञ में जिन जिन देवताओं का यजन अपेक्षित है, उन सबका स्वाहाकारात्मक पञ्चम प्रयाज कर्म में अनुकल्प है । अतएव स्वाद्दान्त पञ्चम प्रयाज पूर्ण यज्ञ का प्रतिनिधि बन रहा है । मान लीजिए, १३७

पृष्ठ 1226

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शतपथभाष्य कोई ऐसा प्रत्याशित विघ्न उपस्थित होगया, जिससे प्रयाजानन्तर यजमान अन्य यज्ञेतिकर्त्त-व्यता पूरी न कर सका । क्या ऐसी स्थिति में उसका प्रयाजान्त कर्म्म व्यर्थ चला जायगा?, पूर्णयज्ञ के द्वारा जो अतिशय इसे मिलने वाला था, क्या उससे यह सर्वथा वञ्चित रह जायगा? | श्रुति कहती है- नहीं । पचम प्रयाज में जिस इतिकर्त्तव्यता का अनुगमन किया जाता है, उसी से अंशत: इसे वह यज्ञातिशय प्राप्त हो जाता है, जिसके लिए इसे प्रयाजानन्तर अन्यान्य शेष कर्म्म और करने पड़ते हैं । सुर- विघ्नों से संत्रस्त भौ देवता भी तो इसी प्रणाली से प्रयज्ञान्त कर्म से ही यज्ञेतिकर्त्तव्यता पूर्ण बना लेते थे ) -ठीक उसी प्रकार ( प्रयाजान्त में विहित, भौमस्वर्गीय मनुष्यविध देवताओं के द्वारा श्रवि-कृत उसी प्रणाली - पद्धति से ( अपने प्रयाजान्त में अनुगमन से ) आज भी ( यजमान का ) यह ( इष्टिलक्षण वैध ) यज्ञ उसी प्रकार ( तथैव ) पूर्ण हो जाता है, जैसे कि ( जिस पद्धति के अनुगमन से ) इस यज्ञ को अपूर्ण भी यज्ञ को ) भौमदेवताओं ने पूर्ण कर लिया था । ( यही ग्वाहाकारान्त अन्तिम पाँचवें - प्रयाज से सम्बन्ध रखने वाली पूर्व प्रतिज्ञाता विशेषता है । स्वाहात्मिका पद्धति से सम्बन्ध रखने वाली उस उक्त विशेषता के अनुगमन से प्रयाजान्त में ही यजमान का यह अकृत्स्न भी यज्ञ कृत्हन बन जाता है ) इसीलिए ( अकृत्स्न भी यज्ञ की मध्य में ही प्रयाजा त में हीं-कृत्स्नता सम्पादन के लिए ) वह अध्वर्यु पाँचवें प्रयान में ' स्वाहा - स्वाहा ' पूर्वक जितनी भी इबि होती हैं, उन सब का यजन करता है । ( यज्ञपूर्णता प्रवर्त्तक अन्यान्य सभी संग्राह्य देवताओं के लिए आहुति देता हुआ, तद्द्वार । सर्वसंग्रह करता हुआ हेमन्तयाग का यजन करता है । इस ( म्वाहा - स्वाहात्मिका सर्वदेवयजनात्मिका परचम प्रायाजाहुति के प्रभाव ) से वह अध्वर्युपञ्च-प्रयाजयाग से ) विजित यज्ञसम्पत्ति को लक्ष्य बनाता हुआ सम्पूर्ण यज्ञ पूरा कर लेता है-' तदनु सर्व यज्ञ ं संस्थापयति ' ॥ ( यह नियम है कि, जबतक यज्ञेतिकर्त्तव्यता पूर्ण नहीं हो जाती, तबतक गमनागमन-भाषण - स्पर्श आदि के सम्बन्ध में विशेष नियमों का अनुगमन करना पड़ता है, जैसा कि -‘ अनवमृशन्त्समानयति’- ' न वै सर्वेण संवेदत ' इत्यादि आदेशों मे स्पष्ट है । यज्ञ के पूर्ण होजाने पर इन नियम - बन्धनों की कोई आवश्यकता नहीं रहती । स्वाहाकारात्मक अ न्तम प्रयाज यागानन्तर यज्ञ पूर्ण होजाता है । अतएव इससे आगे जो भी शेष कर्म्म बच रहते हैं, उन के सम्बन्ध नियम - बन्धन का विशेष महत्त्व नहीं रह जाता । उस अवस्था में यदि किसी किसी नियम का उल्लंघन हो जायगा, तब भी कोई अनिष्ट न होगा, यही तात्पर्य है । इसी का विश्लेषण करती हुई श्रुति कहती है ) - ( प्रयाजान्त कर्म्म यज्ञपूर्णताप्रवर्त्तक है, नियमानुगमन तत्पूर्णता-पर्य्यन्त ही अपेक्षित है ) इसलिए इससे आगे ( प्रयाज कम्र्मानन्तर होने वाले कम्मों में ) ऋत्विक ( किंवा यजमान ) यदि ( अपने स्वाभाविक अनृतभाव से ) कुछ विलोम ( असावधानी ) कर बैठे, तो उसे विशेष महत्त्व नहीं देना चाहिए । उसे तो ( प्रयाजानन्तर ) यह समझ लेना चाहिए कि, मेरा यह यज्ञ कर्म्म ( तो प्रयाजयाग से ही ) पूरा हो गया -- “ संस्थितो यज्ञ, इति ह विद्यात् " । १३८

पृष्ठ 1227

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1227 का मूल पृष्ठ
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प्रयाणादाण ( स्वाहाकृत, एवं वपटूकृत यज्ञ जैसे यात ग्राम - गतरस - बन जाता है, तद्वत् प्रयाजलक्षण यह इष्टिकर्म्म. किंवा इष्ट्रियज्ञान्तर्भुक्त प्रयाजकर्म्म भी वषट् स्वाहा - सम्बन्ध से यातयाम बन जाता है । वौषट्कार वाङ्मएड न के अवसान का सूचक है । एवमेव स्वाहाकार भी ' स्वं वाचमाह ' निवचना-नुसार वाङ्मय यज्ञ के अवसान का ही सूचक बन रहा है, जैसाकि विवेचना प्रकरण में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । वागूरस का वाङ्मय वषट्कार से, वाङ्मय स्वाहाकार से | नर्गमन हो जाता है । यही बाङ्मय यज्ञ का रसशून्य बन जाना है । ऐसा नीरस यज्ञ इ गतरस बनता हुआ यातयाम कहलाया है । वषट् - स्वाहा से अपक्रान्त- द्युलोक की ओर गत वाङ्मय - वागग्निमय - यज्ञरस यज्ञ पूर्णता - समाप्ति के अनन्तर पुनः यजमानात्मा में प्रविष्ट हो जाय, इस पुनः रसप्रवेश से यानयाम यज्ञ पुनः यजमानात्मा में प्रविष्ट होजाय इस पुनः रसप्रवेश से यातयाम यज्ञ पुनः श्रयातनाम - जाग्रम परिपूर्ण बन जाय इन प्रयोजन के लिए एक ' स्त्रिष्टकृद्याग ' नाम का क विशेष विहित है । वागग्नि ही शेपाहुत से तृप्त होकर यज्ञ को ' स्विष्ट ' - रसयुक्त बनाते हैं । श्रतएव इन्हें - ' स्विष्टकृत् ' कहा जाता है । अतएव तदाहुतिकर्म ' स्विष्टकृद्याग ' कहलाया है । पच-प्रयाजकर्म से सम्बन्ध रखने वाली वौषट् स्वाहा व्याहृतियों से आज प्रस्तुत यज्ञ भी यातयाम बन रहा है । स्वप्रकृयाग होता है - यज्ञान्त में । ऐसी दशा में इस की वर्त्तमान यातयामता के निराकरण का बया उपाय?, इसी प्रश्न का ऐतिह्य कारणानुगत स्थित प्रदर्शनपूर्वक समाधान करती हुई श्रुति कहती है ) -जिस प्रकार वषट्कृत हुत, स्वाहाकृत हुत ( वौषट, स्वाहा पूर्वक दी जाने वाली आहुति से युक्त कर्म्म यातायाम बन जाता है, इसी प्रकार वषट् स्वाहापूर्वक आहुति होने से प्रयाजान्त से ( संस्थित होने वाला ) यह यज्ञ यातयाम ही रह गया ( यज्ञ का वागूरस द्युलोक की ओर चला गया ) || २३ || ( इस प्रकार प्रयाजान्त में संस्थित- पूर्ण होने वाले यज्ञ को चौपट् स्वाहाकार सम्बन्ध यातयाम बना देख कर ) उन भौम देवताओं ने यह कामना प्रकट की ( विचार विमर्श किया ) कि, अपन कैसे इस ( नीरस ) यज्ञ को पुनः श्राप्यायित ( रस से परिपूर्णा ) करें?, ( रस समावेश के द्वारा कैसे- किस पद्धति से इसे अयातयाम बनावें?, एवं श्रयातयाम बने हुए यज्ञ से कैसे जीवन-यात्रा का निर्वाह करें? || २४ || अपनी उक्त कामनाओं को कार्य्यरूप में परिणत करने के लिये, यातयाम यज्ञ को प्रयातयाम बनाने के लिये उन देव ाओं ने यह किया कि ) सो प्रयाजाहुति के अनन्तर जो आज्यमात्रा - जुहू में बची रह गई थी, जिस जुहू स्थित श्राज्य ( श्राज्याहुति ) से देवताओं ने ( प्रयाजयाग के द्वारा ) यज्ञ पूर्ण किया था, उसी ( आहुत्यनन्तर बाकी बचे हुये तच्छेष ) श्राज्य से ही यथापूर्व - ( आन्तम प्रयाजविहित आहुतियों की भाँति तत्तदेवताओं के लिए ) आज्य हषियों का आधार करते हुए. ( यातयाम बने हुए उन वाङ्मय देवों को ) पुनः आप्यायित कर दिया, अयातयाम बना दिया । श्राज्य ( वागग्नि रसात्मक होने से ) अवश्य ही श्रयातयाम रसपूर्ण होने से स्वयमपि श्रयातयाम १३६

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शतपथ माध्य ( अन्य यातयामों में भी रसप्रदान करता हुआ उन्हें भी अयातयाम बनाने वाला ) है । ( इसप्रकार भौम देवताओं ने परिशिष्ट- अयातयाम - श्राज्याहुति से यातयाम यज्ञ को पुनः प्रयातयाम बना लिया | देवयज्ञवत् यजमान का प्रस्तुत प्रयाजान्त यज्ञ भी वौषट् स्वाहा द्वारा हुत होने से आज यातयाम बन गया ) इसीलिये ( इसे पुनः श्रयातयाम बनाने के लिये ही ) उत्तम ( पाँचवां ) प्रयाजयाग करके ( करने के अनन्तर हुतशेष आज्य से ) यथापूर्व हवियों का आधार करता है । इस आधार कर्म से यह देवताओं को पुनः श्राप्यायित, अयातयाम करता है । आज्य ( पूर्व कथनानुसार ) अवश्य ही प्रयातयाम है- ' अयातयाम ह्याज्यम् ' || ( शेष श्राज्याधार से गातयाम यज्ञ श्राप्यायित होता हुआ अयातयाम बन जाता है ) अतएव ( यज्ञपद्धति में यह नियम बन गया है कि ) जिस किसी भी देवता के लिये ( देवात्मक यज्ञकर्म्स के लिए ) ऋत्विक हबि का विभाजन करता है ( प्रदान करता है ), उसके सम्बन्ध से तच्छेष के पुनः स्विष्टकृत ( एतन्नामक श्रग्नि-विशेष ) के लिये अभिघार करता है । ( इस श्रभिघार से ) वह उस यज्ञ को पुनः श्राप्यायित, श्रयातयाम बनाता है । यदि स्विष्टकृदग्नि के लिए ( श्रयातयामसम्पत् प्रादयर्थ ) हवि का विभाजन पहिले से ही कर देता है. ( तो उस अवस्था में ) पुनरभिघार अनावश्यक है | ( तात्पर्य्य इस कथन का यही है कि- कृत्स्न इष्टिकर्म में तो पहले से ही स्विष्टकृदग्नि के लिए भाग नियत रहता है | अतः उसकी समाप्ति पर पुनरभिघार नहीं होता । अभिघार तो वहाँ आवश्यक है, जहाँ पहिले से स्विष्टकृदग्नि के लिए श्रवदान विहित नहीं है । प्रकृत स्थल ऐसा ही है । अतः यहाँ अवश्य ही अभिघार अपेक्षित है । जहाँ पहले से अवदान नियत है, वहाँ श्राहुतिकर्म्म समाप्त्यनन्तर ) न में और किसी वि की आहुति की अपेक्षा नहीं रखता है । ( अपेक्षा नहीं रह जाती ) -" नो हि ततः काञ्चन इबिषोऽग्नावाहुति होध्यन् भवति ” || २५ || इति - प्रयाजब्राह्मणम् ( ३ ) -:: -पाँचवें अध्याय में तीसरा, चौथे प्रपाठक में चौथा ब्राह्मण समाप्त ( ११५३ ) - ( ११४१४ ) ( १ ९ - त्रिब्राह्मणात्मक प्रयाजब्राह्मण में प्रथम ब्राह्मण समाप्त ) -१-प्रथमकाण्ड में पाँचवें अध्याय में चौथा, चौथे प्रपाठक में पाँचवाँ ब्राह्मण ( १।५।४ ) - ( १।४।५ ) ( २ - त्रिब्राह्मणात्मक प्रयाजब्राह्मण में क्रमप्राप्त द्वितीय ब्राह्मण ) ४ – प्रयाजावृत् ( पद्धति ) प्रकृत ब्राह्मण में प्रयाजावृत् ( पद्धति ), और प्रयाजानुमन्त्रण, इन दो प्रकरणों का समावेश हुआ है, जिन्हें पूर्वब्राह्मणोक्त तीन प्रकरणों ( १ - प्रयाजबन्धु, २ - उत्तरप्रॆष, ३ - प्रयाजन्ब्राह्मण, इन तीन प्रकरणों ) की दृष्टि से - ४-५ वें प्रकरण माना जा सकता है । इनमें चौथे प्रस्तुत प्रयाज | वृत १४०

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प्रवाज राह्मण प्रकरण में प्रकारान्तर से उस क्रमिक पद्धति का ही निरूपण हुआ है, जिसका पूर्व ब्राह्मण के ‘ प्रयान-त्राह्मण ' नामक तृतीय प्रकरण की 5 वीं कण्डिका से १४ वीं कण्डिका पर्य्यन्त ७ कण्डिकाओं में विभिन्न दृष्टिकोण से प्रतिपादन हुआ है । उस पूर्व पद्धति प्रकरण में बतलाई गई उपपत्ति का प्रधान लक्ष्य आधिदैविक सम्वत्सरमण्डल था । एवं प्रकृत प्रकरण म बतलाई जाने वाली उपपत्ति का प्रधानतः आध्यात्मिक प्रपञ्च से सम्बन्ध है । पद्धत्यंश उभयत्र समान है, केवल उपपत्तिप्रदर्शन में विभिन्नता है | इस विभिन्नता को लक्ष्य बनाकर ही निम्न लिखित श्रुति- प्रकरण का समन्वय करना चाहिये - ( सैषा प्रकरण सङ्गतिः ) । ( १ ) - वह ( अध्वर्यु ' नामक ऋत् होता - ' समिद्धो अग्न आज्यस्य व्यन्तु वौषट् ' इस समिदेवताक याज्यामन्त्र के उच्चारण करने पर उसके ' वोपट ' उच्चारण के साथ आहवनी-याग्नि के समिद्ध - प्रज्वलित - भाग में जुहूस्थित श्राज्याहुति के द्वारा क्रमप्राप्त पहिले ( समिधा -समित् नामक प्रथम प्रयाज ) का यजन करता है ( समिद्याग सम्पादन करता है ) | ( समिद्याग क्यों किया जाता है?, प्रश्न की आध्यात्मिक उपपत्ति बतलाती हुई श्रुति कहती है कि, स्रुगादा-पनकर्म्म से दैवात्मा में जिन ६ आध्यात्मिक प्राणों का आधान हुआ है, दैवात्मप्रतिष्ठित न प्राणों के समिन्धन के लिए ही, आध्यात्मिक - प्राणसमिन्धन के लिए ही यह समिद्याग बिहित है । इसी प्राणसमिन्धन कर्म का अपने शब्दों में स्पष्टीकरण करते हुए श्रुति ने कहा है ) -समिधाएँ निश्चयेन प्राण हैं । ( इस समिद्यागकर्म से - प्रथमप्रयाज से ) वह श्रध्वर्यु ( दैवात्मा के आध्यात्मिक नौ ) प्राणों को ही प्रज्वलित - जीवनीयरस से युक्त करता है । ( समिद्ध ) प्राणों से ही यह पुरुष ( शरीरपुराधिष्ठाता आलांमभ्यः, आनत्वाप्रेभ्यः, सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त शरीराभि-मानी चितेनिधेयाग्निमूर्त्ति प्राणात्मा - कम्र्मात्मा ) समिद्ध है । ( क्योंकि समिद्याग से यजमानात्मा प्राणों का समिन्धन होता है, अतएव इस समिद्याग से आग्नेय ताप भी एक विशेष प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, यही इस समिद्याग का काम्यफल माना गया है । प्राणसमिन्धन की कमी से ही प्राणाग्नि केन्द्र से विच्युत हो जाता है । प्राणाग्नि के केन्द्र से विच्युत होकर शरीराभिमुख न जाने का ही नाम उपताप है, उपताप की चरमावस्था ही उष्णता - लक्षण सन्ताप - ज्वर दाह-है । यदि इस समय यजमान उपतापी है: यजमान को ज्वर है, ता समिद्याग के द्वारा वह हटाया जा सकता है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है ) - ( क्योंकि पुरुषाग्नि प्राणों से समिद्ध रहता है, इधर समिद्याग प्राणसमिन्धक है ) इसलिए वह अध्वर्यु ( होता के द्वारा प्रयुक्त समिद्देवताक याज्यमन्त्र के साथ होने वाले अपने समिद्याग कम्र्मानुष्ठान काल में यजमान से यह प्रैप करे ( कहे ) कि, हे यजमान! तुम ( समिद्द्द्वारा अपने प्राण - समिन्धन का ध्यान करते हुए ) अपने शरीर को स्पर्श करो, यदि यजमान उपतापी हो तब । ( अर्थात् उतपातदशा में ही यजमान को * ' समिद्धहोमेन ह्य े व समिद्धाः ( समृद्धा वा ) आहुतय: ' - शत ० ७ । ५ । ३ । ७ । ÷ “ ता वाऽएता नव व्याहृतयो ( स्रुगादापन निगद मन्त्रस्य ) भवन्ति नवेमे पुरुषे प्राणा: । एतानेवा-स्मिन् ( यज्ञातिशयलक्षणे दैवात्मनि ) एतत ( व गादापनकर्म्मणा ) दधाति ” — शत ० १।५।२ | ५ | १४१

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शतपथमाध्य स्पर्श करना चाहिए ) | ( साथ ही स्वयं अध्वर्यु भी यही भावना करे, इसी अध्वर्यु कृत भावना को स्पष्ट करती हुई श्रुति कहती है ) – यदि वह यजमान ज्वरार्त्त हो, तो अध्वर्यु भी यही श्रशंसन ध्यान करे ) | ( क्योंकि, इस मेरे सामद्याग से प्राणसमिन्धन द्वारा यजमान का ताप शान्त हो ) । ( अध्वर्यु के इस आशंसन से, साथ ही अपनी भी भावना से ) वह वजमान ( श्रवश्यमेव ) समिद्ध हो जाता है । प्राण समिद्ध होते हुए केन्द्राभिमुख बनते हुए बाह्य शान्ति के कारण बन जाते हैं ) । यदि यजमान शीत ( तापरहित, स्वस्थ ) है, तो ( उस दशा में न तो यजमान अपना स्पर्श ही करे, एवं न श्रध्वर्यु आशंसन ही करे । ( इस प्रत्यक्ष इष्ट फल से भी हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, समिध अवश्यमेव आध्यात्मिक प्राणों को समिद्ध करतीं हैं ) अतएव ( कहा जा सकता है कि ) अपने इस समिद्याग से ( अध्वर्यु यजमानात्मा में ( स्थित ) प्राणों का ही समिन्धन करता है । ( पूर्व ब्राह्मण में प्रतिपादित श्रधिदैविक सम्वत्सर के प्रथम वसन्त पर्वसमिन्धन के साथ साथ ) आध्यात्मिक प्राणसमिन्धन - फलप्राप्ति के लिए ( भी ) यह समिद्याग करता है ॥ १ ॥

( २ ) - ( अध्वर्युसमिद्याग के ) अनन्तर ( होता के - ' तनूनपादग्न आज्यस्य वेतु वौषट् ' इस तनूनपाद्द बताक याज्यामन्त्र के उच्चारण करने पर उसके ' वौषट् ' उच्चारण साथ आहवनीयाग्नि के समिद्ध प्रदेश में आज्याहुति के द्वारा क्रमप्राप्त दूसरे ) तनूनपात् ( नामक प्रयाज ) का यजन करता है । तनूनपात् निश्चय से रेत ( वीर्य्य - शुक्र ) है ( क्योंकि सप्तम धातुभूत रेत ही शरीर को न गिरने देता हुआ तनूनपात् है ) । ( इस तनूनपाद्याग से ) वह अध्वर्यु ( दैवात्मा में प्रजननधर्म के समावेश के लिए ) रेतःसेक ही करता है । ( पूर्व ब्राह्मण में प्रतिपादित श्रभिदैविक सम्वत्सर के द्वितीय ग्रीष्म पर्वसमिन्धन के साथ साथ ) आध्यात्मिक रेतःसेक प्राप्ति के लिए ( भी ) यह तनूनपाद्याग का अनुष्ठान करता है ॥ २ ॥

( ३ ) - वह ( अध्वर्यु तनूनपाद्याग के ) अनन्तर ( होता के - ' इडो अग्न श्राज्यस्य व्यन्तु वौषट् ' इस इड्देवताक याज्यामन्त्र के उबारण करने के अनन्तर उसके ' वौषट् ' उच्चारण के साथ श्राहवनीयाग्नि के समिद्ध प्रदेश में श्रान्याहुति के द्वारा क्रमप्राप्त तीसरे ) इट् नामक प्रयाज ) का यजन करता है । इट् निश्चयेन प्रजा है । जिस समय - ( नवमसानन्तर ' एवयावरुत् ' नामक प्रसववायु की नोदना से, नवमास पूर्व योषाग्नि में वृषा द्वारा । ) सिक्त रेत ( प्रजारूप से ) उत्पन्न होता है ( भूमिष्ठ बनता है ), उत्पत्ति के अव्यवहितोत्तरक्षण से ही वह ( उत्पन्न प्रजा ) ( अन्नकामना से ) इड्मयी - ( अन्नमयी ) सी बन कर अन्न की इच्छा करती हुई विचरने लगती है ( उत्पत्यनन्तर ही अन्न की ओर प्रवृत्त हो जाती है ) - ( तनूपाद्याग के द्वारा सिक रेत का प्रजारूप से प्रजनन अपेक्षित है, प्रजनन उत्तरभावी, साथ ही इट् - अन्न- अभिमुख है । तरब अन्नेच्छात्मक इस उत्तरभावी प्रजननकर्म्म के लिए ही तनूपाद्यागानन्तर इड्याग आवश्यक है । पूर्वब्राह्मण में प्रतिपादित आधिदैविक सम्वत्सर के तृतीय वर्षापर्व समिन्धन के साथ उत्तरभावी अध्यात्मिक इस प्रजनन फल को ही लक्ष्य बना कर श्रुति कहती है कि ) इस ( इड्याग से ) यह १४२