Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1231–1240
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1231–1240
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प्रया जत्रा झगा ( दिव्य प्रजा को ) ही उत्पन्न करता है । इसीलिए ( प्रजोत्पत्ति के लिए ) इड्याग करता है || ४ || ( ४ ) - वह ( अध्वर्यु इड्याग के अनन्तर ( होता के– ' बहिरग्न आज्यस्य वेतु वौषट् ' इस वहिदेवताक याज्या मन्त्र के उच्चारण करने पर उनके ' पट् उच्चारण के साथ आहवनी-याग्नि के समिद्ध प्रदेश में आज्याहुति के द्वारा क्रम प्राप्त चांथे ) वर्हि ( नामक प्रयाज ) का यजन करता है । वाई निश्चयेन भूमा ( बहुत्वमम्पत्ति से युक्त ) है । ( बहि - दर्भ का भूमाभाव इसके संख्या - बहुत्त्व पर, एवं बृंहणधर्म्म पर ही अवलम्बित है ) । उत्पन्न प्रजा को भूमा प्रजावृद्धिरूप से भी अभीष्ट है, एवं प्रत्येक प्रजा के बहुयशाभाव से भी अपेक्षित है । इड्ाग से प्रजा उत्पन्न की गई है । अत्र अपेक्षित उभयविध भूमा भात्र का भी उत्पन्न प्रजा में धान होना चाहिए । बर्हि भूमाधर्म्य से युक्त है । ( पूर्वब्राह्मण में प्रतिपादित आधिदैविक सम्वत्सर के चतुर्थ शरत् - पर्व समिन्धन के साथ साथ ) आध्यात्मिक इस भूमाभात्र फल प्राप्ति के लिए ( भी ) यह बर्हि का यजन करता है ॥ ४ ॥
( ५ ) - वह ( अध्वर्यु बर्हियोग के ) अनन्तर ( होता के - " स्वाहाग्निम, स्वाहा सोमम्, स्वाहाग्निम्, स्वाहा देवाँ आज्यपान्, स्वाहाग्निहोत्रा जुषाग् श्रग्न श्राज्यस्य व्यन्तु वौषट् ” इस स्वाहा देवताक याज्यमान्त्र के उच्चारण करने पर उसके ' वौषट् ' उच्चारण के साथ आइवनी-याग्नि के समृद्ध - प्रदेश में श्रज्याहुति के द्वारा क्रमप्राप्त पाँचवें ) स्वाह । - स्वाहा ( नामक प्रयाज ) का यजन करता है । ( वसन्त - प्रीष्म - वर्षा - शरत - हेमन्त इन ) पाँच ऋतुओं का निश्चयेन हेमन्त स्त्राहाकार ( अन्तिम पत्र ) है । ( अपने स्वाभाविक कटुस्पर्श से ) हेमन्त ही इस ( पार्थिव प्रजावर्ग को अपने वश में कर लेता है । इमीलिए ( हेमन्ताक्रमण से स्वविकास -लक्षण स्वातन्त्र्य से ही ) हेमन्त ऋतु में श्रोषधियाँ म्लान ( मुकुलित ) होजातीं हैं, वनस्पतियों के पत्ते झड़ जाते हैं, पक्षिगण अतिशयरूपेण क्षीणकाय बन जाते हैं, क्षीणकाय बनते हुए निर्जीव से बनकर श्राकाश से, तथा अपने घोंसलों से ये ( पक्षी ) पट - पट नीचे गिरने लगते हैं, पुरुष - समुदाय मुण्डित केशपुरुष की भाँति इतश्री बन जाता है - ( प्रतीत होने लगता है ) । इसप्रकार ( इन प्रत्यादृष्ट स्थितियों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि ) हेमन्त सम्पूर्ण पार्थिव प्रजावर्ग को अपने अधिकार में कर लेता है ( किए हुए है ) । जिसप्रकार एक समर्थ- बलवान् - योग्य व्यक्ति अपने वर्ग पर अधिकार करता हुआ वर्ग के द्वारा श्री - वित्तस-म्पति, एवं अन्नाद्य - अन्नसम्पत्ति का अन्यतम भोक्ता बन जाता है, एवमेव हेमन्तयागकर्त्ता भी अपने समाज का नेता बनता हुआ श्री और अन्नाद्य का अन्यतम भोक्ता बन जाता है । हेमन्तयाग के इसी फल का अपने शब्दों में अभिनय करती हुई श्रुति कहती है ) - वह यजमान जिस श्रर्द्ध ' ( समाज ) में रहता है, उस श्रद्ध को श्री, और अन्ना के लिए स्वीकृत कर लेता है । ( उस समाज का अपने वश में कर तद्द्वारा अभीष्ट श्री - अन्नाद्य प्राप्त करने में समर्थ होजाता है ), ज कि यजमान ( माथ ही यजमानदत्त दक्षिणा से परिगृहीत प्रयाजकर्त्ता श्रभी ) III
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शतपथ भाष्य हेमन्त के ( उक्त लक्षण ) सर्वाधिपत्य को जान लेता है | ( हेमन्तयाग का आध्यात्मिक फल सर्वाधिकार भावप्राप्ति ही है, यही तात्पर्य है ) ॥ ५ ॥
इति प्रयाजावृत ( पद्धति ) - ( ४ ) प्रयाजानुमन्त्रण प्रस्तुत प्रयाजकर्म में एक ' प्रयाजानुमन्त्रण ' नामक कर्म - विशेष यजमान को करना बड़ता है । पाँच_प्रयाजों के लिए होतृकर्तृक पाँच आज्या मन्त्र हैं, जिनका पूर्व के प्रयाजावृत् प्रकरण में स्पोकरण किया जाचुका है । पाँच याज्यमन्त्र ' प्रयाजमन्त्र ' हैं । जिस समय १-२-३-४-५ - क्रम से होता पाँच याज्यामन्त्रों का उच्चारण करता है, उस समय प्रत्येक याज्यामन्त्र की समाप्ति पर यजमान भी एक एक निगदमन्त्र का उच्चारण करता है । यजमान इस मन्त्रपाठ से प्रयाज का अपने दैवात्मा के साथ सम्बन्ध कराता है । अतएव यजमानकर्तृक ये मन्त्र ‘ प्रथाजानुमन्त्रण ' कहलाए हैं । उन पाँचों प्रयाजानुमन्त्रण - मन्त्रों का स्वरूप निम्नलिखित है-( १ ) - होता - " समिद्धो अग्न आज्यत्य त्र्यन्तु वापट् " - यजमानः - " इदं समिद्भ्यो न मम । एको मम, एका तस्य यमहं द्वेष्मि, योऽस्मान् द्वेष्टि यंच त्रयं द्विष्मः । त्विषिमान् भूयासम् ” ( समिदनुमन्त्रणम् - १ ) । ( २ ) - होता - ' तनूनपादग्न आज्यस्य वेतु वौषट् यजमान: - ' इदं तनूनपाते न मम । द्वौ मम, द्वे तस्य यं च वयं । अपचितिमान् भूयासम् ' ( तनूनपादनुमन्त्रणम् - २ ) । '.. यजमानः-- ' इमिड्यो ( ३ ) होता - ' इडो अग्न आज्यस्य वेतु वौषट् ' --:, न मम । त्रयो मम, तिस्रस्तस्य - यं च वयं ० । यरास्त्री भूयासम् ' ( इडनुमन्त्रणम् – ३ ) । ( ४ ) - होता- ' बहिरग्न ज्यस्य वेतु वौषट् - यजमानः- ' इदं बर्हिषे, न मम । चत्वारो मम, चतस्रस्तस्य - य च त्रयं । ब्रह्मवर्चसी भूयासम् ' ( बर्हिरनुमन्त्रणम् – ४ ) । ( ५ ) - होता - ' स्वाहाग्नि, स्वाहा सोमं स्त्रा व्यन्तु वौषट् ' - यजमानः - ' इदमग्नये सोमाय, अग्नये ० न मम । पञ्च मम, न तस्य किञ्चन -यं च त्रयं ० । अन्नादो भूयासम् ' ( स्वाहानु-मन्त्रणम् – ५ ) । श्रत्रतक के ब्राह्मणभाग में होतृकक प्रयाजमन्त्रों का, एवं अध्वर्यु कर्तृ क आहुति - कर्म्म से सम्बन्ध रखने वालों अन्यान्य विशेषताओं का पद्धति - प्रदर्शन - पुरस्सर निरूपण होचुका है । परन्तु अबतक यजमानकर्तृ ' क ' प्रयाजानुमन्त्रण ' मन्त्रों को उपपत्ति नहीं बतलाई गई है । प्रकृत शेष ब्राह्मणभाग में उस प्रयाजानुमन्त्रण की ही पद्धति प्रदर्शन - पूर्वक उपपत्ति बतलाई जारही है । इस उपपत्ति से सम्बन्ध रखने वाला एक आख्यान सर्वप्रथम उद्धृत करती हुई श्रुति कहती है-१४४
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प्रयाजनादगा देवदेवता, और असुर, दोनों प्राजापत्य ( प्रजापति की सन्तानें ) परस्पर स्पर्द्धा ( युद्ध ) करने लगे । ( दोनों हीं ) दण्ड, तथा धनुषों से ( एक दूसरे पर ) विजय प्राप्त न कर सके ( भौतिक शस्त्रबल से युद्ध का निश्चित परिणाम न निकल सका ) | ( अपने श्रायुधयुक्त युद्धक से ) विजय लाभ न करते हुए दोनों ने यह निश्चय किया कि, अरे भाई ( हन्त भला, अच्छा तो ) अपन वागुरूप ब्रह्म के माध्यम से ही जीतने की इच्छा करें ( शास्त्रार्थ के द्वारा । युद्ध का निर्णय करें ) । ( इस मन्त्रात्मिका वाक़ के युद्ध में, वाचिक युद्ध में ) अपन दोनों में से जो भी - ( एक दूसरे द्वारा ) प्रयुक्त वाक का मिथुनभाव से अनुक्रमण द्वारा ( युग्म द्वारा ) अनुगत न करेगा, वह हार जायगा, दसरा ( मिथुनभावानुगत दल ) विजेता माना जायगा दोनों ने संधा ( शर्त ) मान ली ( तथेति ) । ( प्रस्तुत वागयुद्ध में इन्द्र को ही योग्य अधिकारी मान कर ) देवदेवताओं नें इन्द्र से कहा कि, ( हमारी ओर से, देवमण्डली की ओर से ) आप ही बाकू - शस्त्र का प्रयोग करें! ॥६ ॥
( देवप्रेरणानुमत ) इन्द्र ( ही वाग् युद्ध का प्रारम्भ करते बोले- ' एको मम ' ( हमारा एक है ) । ' अस्माकमेका ' ( हमारी हुए असुरों को लक्ष्य बनाकर ) एक है ) यह ( प्रत्युत्तर में ) असुर बोले । इस प्रथम ( वाङ्मय ) स्पर्द्धा कर्म्म से ( प्रतिज्ञात सन्धान् सार ) देवदेवता, असुर, दोनों नें मिथुनसम्पत्ति प्राप्त कर ली । यह मिथु ही तो है, जो ' एक ' और ' एका ' है । ( दोषा-वृषात्मक स्त्री- पुम्भाव का समन्वित रूप ही मिथुनभाव है । पुम्बाचक ' एक: ' से वृषात्मक पुम्भाव का, एवं स्त्रीवाचक ' एका ' से योपात्मक स्त्रीभाव का संग्रह हो रहा है । दोनों के संग्रह से मिथुन-भाव गतार्थ बन रहा है, यही तात्पर्य है ) || ७ || ( प्रथम मिथुन वाप्त्यनन्तर ) ' द्वौ मम ' यह इन्द्र बोले, एवं प्रत्युत्तर में ' अस्माकं द्वे ' यह असुर बोले । इस कर्म्म से ( भी दोनों ने ) मिथुन सम्पत्ति प्राप्त कर ली । यह मिथुन ही तो है, जो ' द्वौ ' ( पुम्वाचक शब्द ), एवं ' द्व े ' ( स्त्रीवाचक शब्द ) है ॥ ॥ ( द्वितीय मिथुनावाप्यनन्तर ) ' यो मम ' यह इन्द्र बोले, एवं प्रत्युत्तर में ' अस्माकं तिस्रः ' यह असुर बोले । इस कर्म से ( भी दोनों नें ) मिथुन सम्पत्ति प्राप्त कर ली । यह मिथुन ही तो है, जो कि ' त्रयः, और तिस्रः ' है ॥६ ॥
( तृतीय मिथुनात्राप्यनन्तर ) ' चत्वारो मम ' यह इन्द्र बोले, एवं प्रत्युत्तर में ' अस्माकं चतस्रः ' यह असुर बोलें । इस कर्म से ( भी दोनों नें ) मिथुन सम्पत्ति प्राप्त कर ली । यह मिथुन ही तो है, जो कि ' चत्त्वारः, और चतस्रः ' है ॥ १० ॥
( चतुर्थ मिथुनावाप्त्यनन्तर ) ' पञ्च मम ' यह इन्द्र बोले । ( इन्द्र के इस वाङ्मय ' पञ्च ' पर्व के प्रत्युत्तर के लिए ) असुर कोई साधन प्राप्त न कर सके । ( क्योंकि ' चत्त्वारः चतस्रः ' से आगे स्त्री- पुल्लिङ्गभेदक लिङ्ग का ही अभाव है । अतएव ) इससे आगे मिथुन का अभाव है । आगे तो स्त्री- पुम्भात्र दोनों के लिए ) ' पञ्च पञ्च ' इस समान शब्द का ही प्रयोग होता है । ( बस १४५
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शतपथमाध्य यहाँ आकर पूर्व प्रतिज्ञात संधा के अनुसार इन्द्रप्रयुक्त ' पञ्च ' के मिथुन की पूर्ति करने में असमर्थ रहते हुए ) असुर अपना सर्वस्व ( पहिले के चार मिथुन भाव भी ) हार गए । उधर देवदेवताओं नें ( मिथुन मर्यादानुगमन से ) असुरों का भी सर्वस्व जीत लिया । सम्पूर्ण मिथुनों से ( तद्रूप प्रयाजकम्मों से ) सपत्न असुरों को भागरहित बना दिया ॥ ११ ॥
( क्योंकि प्राकृतिक प्रारणयज्ञ में देवासुर - स्पर्द्धा में मिथुनभाव के द्वारा देवदेवता असुरों के पराभव में समर्थ हुए हैं । अतएव इस पञ्चप्रयाज कर्म्म में भी प्रयाजानुमन्त्रण - मन्त्रों में क्रमशः ' एक: - एका ' इत्यादि मिथुन - भावात्मक पदों का समावेश कराता हुआ मिथुनसम्पत्ति - ऋतुपञ्चात्मिका पाक यज्ञ सम्पत्ति पर अपना अनन्य अधिकार जमा लेता है । यही अनुमन्त्रण - मन्त्रों की, एवं तत् पठित- ' एकः - एका ' आदि मिथुनभावों की मौलिक उपपत्त है, जिसका वैज्ञानिक विश्लेषण तत्प्रकरणानुगत विवेचना - प्रकरण में किया जायगा । प्राकृतिक मिथुनभाव के आधार पर प्रतिष्ठित इसी प्रयाजानुमन्त्रणकर्म की इतिकर्त्तव्यता बतलाती हुई श्रुति कहती है ) – इसलिए ( पूर्वोक्त मिथुनभावावाप्ति के लिए ) उस यजमान को प्रथम प्रयाज समाप्त होने पर यह ( प्रयाजानुमन्त्रणमन्त्र ) बोलना चाहिए कि- ' एको ममेत्येका तस्य यमहं द्वेष्मि ' ( एक मेरा है, एक उनकी है, जिससे मैं द्वेष करता हूँ । यदि यजमान किसी को अपना व्यक्तिगत शत्रु नहीं मानता है, व्यक्तिगत द्वेप नहीं करता है, तो उस अवस्था में ( ' यमहं द्वेष्मि ' न बोल कर ) - -' योऽस्मान् द्वेष्टि, यं च वयं द्विष्मः ' ( जो हम से द्वेष रखता है, जिसके प्रति हम सहज वैर रखते हैं ) यह बोलना चाहिए ( इस १२ वीं कण्डिका के अमुवाद से ही १३, १४, १५, कण्डिकाओं का, एवं सोलहवीं कण्डिका के पूर्वसमतुलित भाग का अनुवाद गतार्थ बन रहा है ॥ १३, १४, १५, ॥ वह यजमानशत्रु ( पाँचवें प्रयाज में यजमान के द्वारा प्रयुक्त – ' पञ्च मम - न तस्य - किञ्चन, योऽस्मान् द्वेष्टि, यं च बयं द्विष्मः ' इस प्रयाजानुमन्त्रण - मन्त्र के द्वारा ) केवल पञ्च पञ्च करता हुआ ही रह जाता है । उसे मिथुनसम्पत्ति उपलब्ध ही नहीं होती ) । परिणाम स्वरूप वह यजमान अपने शत्रुवर्ग का सब कुछ छीन लेता है, सर्वसम्पत्ति से सपत्नों को भागरहित ( वञ्चित ) कर देता है, जो यजमान प्रयाजानुमन्त्रण से सम्बन्ध रखने वाले मिथुन विज्ञान को जानता हुआ तनुप्रयोग करता है ॥ १६ ॥
इति - प्रयाजानुमन्त्रणम् ( ५ ) पाँचवें अध्याय में चौथा, चौथे प्रपाठक में पाँचवा ब्राह्मण समाप्त २ – त्रिब्राह्मणात्मक प्रयाजब्राह्मण में क्रमप्राप्त द्वितीय ब्राह्मण समाप्त ( पाँचवाँ अध्याय समाप्त ) * जिसके साथ द्वेष हो, उस का - ' कामशत्रु ' -क्रोधशत्रु ' - लोमशत्रु - लोकैषणात्मकं शत्रु, इत्यादिरूप से उस शत्रु के नाम का सन्निवेश कर देना चाहिए । १४६
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प्रयाजनाया ( छठा अध्याय प्रारम्भ ) प्रथमकाण्ड में छठे अध्याय में पहिला, चौथे प्रपाठक में छठा ब्राह्मण ( १।६।१ ) -- ( ११४१६ ) ( ३ - त्रिब्राह्मणाक प्रयाजन्ब्राह्मण में क्रमप्राप्त तृतीय ब्राह्मण ) ६ - प्रयाजों का इष्टि में प्राथम्य त्रिब्राह्मणात्मक प्रयाजब्राह्मण के पूर्वोपात प्रथम ब्राह्मण में ( १ ५ ३ ) आरम्भ के ' ऋतवो इबै प्रयाजाः ' इत्यादिरूप पञ्च पञ्चकण्डिकात्मक भाग के द्वारा ' प्रयाजबन्धु ' ( प्रयाजकर्मोपपत्ति ) क । प्रतिपादन हुआ है । वहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि, यह पञ्च - प्रयाजयाग सम्वत्सर में भुक्त बसन्तादि पाँच ऋतुओं पर यजमानात्मा का अधिकार प्रतिष्ठित करने के लिए ही किया जाता है । वहीं यह भी स्पष्ट किया गया है कि, देवता और असुरों की पारस्परिक प्रतिस्पर्द्धा में देवताओं नें अपने बिजय का साधन पाँच प्रयाजों को ही बनाया । इन पाँच प्रयाजों से ( पञ्चप्रयाजयाग से ) वे पञ्चत्त की समष्टिरूप सम्वत्सर सम्पत् पर अपना अधिकार करने में समर्थ होगए । इस उक्त उपपत्ति से यह निष्कर्ष निकलता है कि, प्रयाजक वस्तुतः ऋतुकम्मं है । ऋतुओं का यजन ही प्रयाजयजन है । अब इस सम्बन्ध में यह जिज्ञामा होती है कि, सम्वत्सर बज्ञ में, – जिसमें साम्वत्सरिक प्राणविध देवदेवताओं के भाग नियत हैं - ऋतुओं का ( ऋतुदेवताओं का क्या भाग है? | दूसरी जिज्ञासा का अग्नि से सम्बन्ध है । समिद्ध आहवनीयाग्नि में इन ऋतुरूप प्रयाज - देवताओं के लिए आज्याहुति विहित है । यह समिद्ध अग्नि साम्वसारक दिव्याग्नि का प्रतिरूप है । अतएव सिद्ध होजाता है कि, प्राकृतिक पचत्तु श्रों का भी ( अन्य देवदेवताओं की भाँति अग्निदेव के साथ अवश्य ही कोई न कोई घनिष्ठ सम्बन्ध है । वह अग्निसम्बन्ध भी प्रकृत में बिजिज्ञास्य बन रहा है । इस श्रग्निसम्बन्ध - जिज्ञासा का यों भी अभिनय किया जा सकता है कि, ऋतुरूप पच प्रयाजों के लिए होता की ओर से जो पाँच याज्यामन्त्र प्रयुक्त होते हैं, उन पाँचों हीं मन्त्रों में ' समिद्धो अग्न आज्यस्य व्यन्तुः ' – ' तनूनपादग्न श्राज्यस्य वेतु ० ' इत्यादिरूप से ' अग्नि ' का समावेश है । जबकि पाँचों मन्त्रों से सम्बन्ध रखने वाली पाँचों प्रयाजाहुतियाँ क्रमशः समित, तनूनपात् इट्, बहिं, स्वाहा, इन पाँच प्रयाज- ऋतु - देवताओं के लिए ही विहित हैं, तो तद्देवताक याज्यामन्त्रों में ' अग्नि ' पद का समावेश क्यों हुआ?, क्यों-याजयागात्मक अन्य में अग्नि को भी भागहर माना गया? । तीसरी जिज्ञासा का प्रयाज- प्राथम्य से सम्बन्ध है । प्रधानदेवतायाग ही ' इष्टिक ' है । इस इष्टिकर्म में ऋतुओं की तृप्ति के लिए यो प्रयाजकर्म विहित है, एवं छन्दों की तृप्ति के लिए अनुयाज कर्म्म विहित है । इन दोनों में प्रयाज कर्म्म प्रधानदेवता - यागलक्षण इष्टिकर्म से पहिले हाता है, अनुयाजकर्म्म इष्टिकर्म्म से पीछे | यह जिज्ञासा भी स्वाभाविक है कि, प्रयाजकर्म्म का इष्टिकर्म में प्राथम्य क्यों है? । इव तीनों जिज्ञासाओं का प्राकृतिक अधिदैविक ऋतुयज्ञ से ही सम्बन्ध है, तद्विज्ञान ही इस जिज्ञा सात्रयी का तात्त्विक समाधान है । प्रस्तुत - वाह्मण की प्रथम कण्डिका से आरम्भ कर १५ वी १४७
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शतपथभाष्य कण्डिका पर्य्यन्त इसी जिज्ञासा- त्रयी का सोपपात्तिक विश्लेषण हुआ है । अतएव पञ्चदशकण्डि -कात्मक इस ब्राह्मण भाग का एक स्वतन्त्र प्रकरण माना जासकता है, जिसे हमनें - ' प्रयाजों का इष्टि में प्राथम्य ' नामकरण अन्वर्थ माना है । १६ वीं कण्डिका से आरम्भ कर १८ वीं कण्डिका पर्य्यन्त तीन कण्डिकाओं में ' अभिचार ' कर्म्म का निरूपण हुआ है, यही प्रकृत ब्राह्मण का कण्डिकात्रयात्मक द्वितीय करण है । १६ वी कण्डिका में फलश्रुति का विश्लेषण हुआ है, यही एक कण्डिकात्मक तृतीय प्रकरण माना गया है । १६, २०, इन दो कण्डिकाओं में प्रयाज कर्म्म से सम्बन्ध रखने वाले परिशिष्ट आज्य - देवतादि प्रश्नों का विमर्श हुआ है, यही प्रस्तुत त्राह्मण का - ' परिशिष्ट प्रश्नोत्तरविमर्श ' नामक अन्तिम प्रकरण है । सम्भूय २१ काण्डात्मक प्रकृत तृतीय प्रयाजन्ब्राह्मण में ४ अवान्तर प्रकरण होजाते हैं, जिन्हें पूर्वब्राह्मण - द्वयी में प्रतिपादित ५ प्रकरणों की क्रमिक संख्या के अनुरोध से क्रमशः ६, ७, ८, ६, वें प्रकरण माना जासकता है । इस प्रकरणसङ्कतिको लक्ष्य बना कर ही प्रकृत ब्राह्मणानुवाद का समन्वय करना चाहिए-( सैंपा प्रकरणसङ्गतिः ) ( प्रयाजयाग ऋतुयाग है, इसका प्राकृतिक सम्वत्सराग्नियज्ञ में एक विशेष - प्रथम - स्थान है, इसी आधिदैविक तत्त्व का एक वैज्ञानिक आख्यान के द्वारा विश्लेषण करती हुई श्रुति कहती है ) – ( बसन्तादि पाँचों याज्ञिक ) ऋतुओं में ( प्राणविध ) देवताओं के साथ यज्ञ ( सम्वत्सरा-ग्निलक्षण सोमगर्भित ज्योतिष्टोमयज्ञ ) में ( अपना भी ) भाग चाहा ( अर्थात जिस प्रकार देव-देवताओं का यज्ञाग्नि में भाग है, एवमेव ऋतुओं में भी उसके भागीदार बनने की देवदेवताओं से कामना प्रकट की । अपनी इसी कामना को प्रकट करते हुए ऋतुत्रों ने देवदेवताओं से अनुरोध किया कि ) आप लोग इस यज्ञ में हमें भी भागी ( हिस्सेदार ) बनाइये! हमें इस यज्ञ ( भाग ) सेति न कीजिए!, ( हम चाहते हैं कि, आप लोगों की भाँति ) इस यज्ञ में हमारा भी भाग रहे ॥ १ ॥
( जिसप्रकार किसी आगन्तुक सम्पत्ति - भोक्ता, सम्पद्विभाग - कामुक के आ जाने से, उसके विभाग माँगने पर स्वाभाविक वित्तलोभ के आकर्षण से लोक में सम्पत्ति का ब्रथमभोक्ता आगन्तुक की उस न्यायप्राप्त माँग की उपेक्षा कर देता है, सुनी अनसुनी कर देता है, ठीक इसी लौकिक वित्त - स्थिति के अनुसार ऋतुओं के द्वारा यज्ञभाग माँगने पर ) देवताओं ने ऋतुओं की उस ( न्यायप्राप्त माँग - कामना को ) न पहिचाना - सुन कर भी ऐसी उपेक्षावृत्ति दिखलाई, जैसे उन्होंने कुछ सुना - जाना हीं न हो ) । देवताओं की उपेक्षावृत्ति का ऋतुओं की न्यायप्राप्त माँग ठुकरा देने का वही परिणाम हुआ, जो आज भी प्रत्यक्ष में देखा सुना जाता है । यदि किसी को अपना न्यायप्राप्त अधिकार माँगने से भी नहीं मिलता, जो वस्तुतः बिना माँगे भी मिल जाना चाहिए, तो उस अवस्था में माँगने वाले का आत्मा विद्रोही बन कर उस वित्तभोगी - भोगरोगी के प्रति-द्वन्द्वी - शत्रुदल में जा मिलता । यही ऋतुओं ने किया । इसी प्राकृतिक धर्म का विश्लेषण करती हुई श्रुति कहती है ) प्राणविध देवदेवताओं के इसप्रकार ( अपनी माँग के ) न जानने पर ( उपेक्षा करने पर ) वे ऋतुएँ ( उत्पन्न स्वाभाविक आत्मविद्रोह के कारण ) देवदेवताओं के सहज शत्रु, भ्रातृव्य असुरों की ओर लौट आई असुरदल में समाविष्ट हो गई ) ॥ २ ॥
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प्रयाजब्राह्मण ( अपने शत्रु की समृद्धि सुन सुन कर विपक्षीदल को अन्तर्वेदना का स्वाभाविक अनुभव हुआ करता है | यदि किसी से बदला लेना हो, तो उसे चाहिए कि, वह उसके शत्रुदल में मिल जाय । और उससे मिल कर उसके उस समृद्धिकर्म में अपना सहयोग देकर उस समृद्धि को ओर भी अधिक समृद्ध बनावे, जिस समृद्धि को सुनने मात्र से विपक्षी दल की वेदना वृद्धिंगत हो जाती है । ऋतुओं में इसी पथ का आश्रय लिया । असुर मण्डल की ओर आगत ) ऋतुओं नें ( असुरों के लिए ) उस समृद्धि को ( ओर भी अधिक ) समृद्ध करना आरम्भ किया, जिस ( असुरसमृद्धि ) को देवता सुना करते हैं ( सुन कर व्यथित हुआ करते हैं ) । ( ऋतुओं के द्वारा असुरों की पूर्वसमृद्धि में क्या विशे ता उत्पन्न हो गई?, प्रश्न का समाधान करती हुई श्रुति कहती है कि ) - जिस युग में इन असुरों के पूर्वज ( ऋतुओं के अनुकूल सहयोग न मिलने से ) जिस समय ( मोसम में ) इल जोत थे. ( इल जोत कर ) बीज डालते थे ( इस प्रकार हल जोत कर बीज डाल कर बड़े परिश्रम से थोड़ा बहुत अन्न उत्पन्न कर येनकेन रूपेण बड़े कष्ट से अपना निर्वाह करते थे, उन्हीं असुरों के ) वंशज ( अपरे ) - इन ऋतुओं के अनुग्रह से आज उसी मोसम में ) कुछ तो धान काट रहे हैं, कुछ कटे हुए धानों को बैल आदि से: रहे हैं । ' खुदवा इस प्रकार ( ऋतुओं के अनुग्रह से आज ) उन - श्रासुर प्रदेशों में बिना हो हल जोते पुनः पुनः ओषधि पक रहीं हैं । ( तात्पर्य, ऋतु - अनुग्रह से पहिले जिन इन असुरों के पूर्वजों को जिस मौसम में इल जोत कर बड़े कष्ट से अन्न उत्पन्न करना पड़ता था, आज उनके बराज असुर ऋतुओं के अनुग्रह से उस मौसम में तो धान का संग्रह कर लेते हैं । साथ ही इन्हें हल जोतने का भी कष्ट नहीं उठाना पड़ता । ऋतु अनुग्रह से बिना हल जोते ही इनके देश में पर्याप्त अन्नसम्पत्ति उत्पन्न होती रहती है । यही वह प्रभूत समृद्धि है, जिसे सुन सुन कर देवता व्यथित हो सकते हैं ॥ ३ ॥
( देवदेवताओं के समीप भी कर्णाकर्णिद्वारा ये समाचार पहुँचे । वही हुआ, जो होना चाहिए था ) । असुरसमृद्धि सुन कर देव देवताओं को बड़ा पश्चात्ताप ( ग ) हुआ । ( इन्होंनें प्रज्ञा-पराध - जनित इस पश्चात्ताप को इन शब्दों में प्रकट किया कि ) - हमारे इस ( ऋतुओं को उनके न्यायप्राप्त भाग न देने के ) कारण ( हीं ) आज शत्रुदल - ( असुर लोग ) अपने शत्रुदल ( देवदल ) के प्रति ( स्पर्द्धापूर्वक ) शत्रुता करना चाहता है ( अर्थात् हम से उपेक्षित ऋतुओं के बल से ही समृद्ध बन कर आज वे असुर यहाँ तक समर्थ हो गए कि, वे - खुल्लमखुल्ला हम से युद्ध करने के लिए सन्नद्ध हैं । आज असुरों का यह साहस हो गया है कि, वे प्रत्यक्ष में हम से शत्रुता रखते हुए भी नहीं डर रहे । वास्तव में ) ऐसा हो जाना बहुत ही कमी है - ( कनीय इन्नु - लज्जा की बात है ) । ऋतुओं के अनुग्रह से आज असुर बलवान् बन गए हैं । अतएव प्रत्यक्ष में इनसे मुटभेड करना तो ओर भी पश्चात्ताप का कारण होगा । अतएव अव तो ) आप सब ( मिलकर ) वैसा कोई ( अप्रत्यक्ष सहज ) उपाय निकालिए, जिससे असुर लोग अपनी इस ( वर्त्तमान समृद्ध स्थिति से विपरीत ( असमृद्ध - निर्बल ) अवस्था में ( स्वतः एव ) पहुँच जाँय ॥। ४ ॥ २४६
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शतपथभाष्य ( सभी यह जानते थे कि, ऋतुओं को उनका न्यायप्राप्त भाग न मिलने से वे असुरों में जा मिली, परिणामस्वरूप असुर समृद्ध होगए । अब उन्हें अप्रत्यक्ष रूप निर्बल बनाने का भी यही उपाय हो सकता है कि, जैसे बने तैसे ऋतुओं को वापस लौटा लिया जाय । परामर्श के द्वारा यह निश्चय कर ) देवदेवता ( अपना मन्तव्य प्रगट करते हुए ) कहने लगे कि, अपन ( इस संकट से बचने के लिए असुरदल में पहुँच जाने वालों ) ऋतुओं को ही निमन्त्रित करें ( आदर-पूर्वक ऋतुओं को ही वापस बुलाना चाहिए । उपाय निकल आया । परन्तु किस साधन से ( किस प्रलोभन से ) उन्हें बुलाया जाय?, यह समस्या आपड़ी । समस्या का कारण यही था कि, ऋतुएँ देवताओं से तिरस्कृत होकर ही गई थीं । उन्हें अपने प्रिय यज्ञ में भाग नहीं मिला था । आज भी वे लौट सकतीं हैं । परन्तु प्रलोभन ऐसा होना चाहिए, जो पूर्वप्रलोभन से भी विशिष्ट बह यही हो सकता है कि, जिस यज्ञभाग की उन्हें कामना थी, स्वाभाविक प्रलोभन था. उसका प्रथम भागहर ऋतुओं को ही बनाया जाय । अवश्यमेव इस विशिष्ट प्रलोभनाकर्षण से वे वापस लौट आएँगी । इसी तात्पर्यार्थ का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है कि ) - अपन इन ऋतुओं का इस यज्ञ में सर्वप्रथम ही यजन करें ( अर्थात् पहिला भाग इन्हें ही दिया जाय – आपको प्रथमभाग मिलेगा, यही सन्देश ऋतुओं के पास भेजा जाय । विश्वास है, इस साधन से श्रवश्य वे हमारी ओर श्रजायँगी ) ॥ ५ ॥
( देवमण्डल में वे अग्निदेव भी समुपस्थित थे, जिन्हें यज्ञ में देवताले ग सब से पहिला भागहर मानते आरहे हैं । ऋतुयाग से भी पहिले अग्नि का ही प्रथम यजन होता आया है । जब अग्नि ने यह निर्णय सुना कि, ऋतुलक्षण प्रयाओं का ये लंग प्रथम यजन करने वाले हैं, तो उन्हें अपने प्रथमाधिकार की चिन्ता हुई । इसी चिन्ता को व्यक्त करते हुए ) अग्निदेव बोल पड़े कि - ( हे देवदेवताओं! ) आपने जो कि पांइले ( प्रयाजयाग से भी पहिले ) मेरा यजन किया है, ( पहिला भागहर बनाया है ) वह मैं ( यज्ञ में ) कहाँ प्रतिष्ठित रहूँगा ( अग्नि को भय यह हुआ कि मुझे इन्होंने यज्ञ का प्रथमभाग पहिले से दे दिया है । आज ये ऋतुओं को भी प्रथम भाग देना चाहते हैं । कहीं ऐसा न हो कि, मेरा भाग छीन कर ऋतुओं को दे दिया जाय । यदि कहीं ऐसा हो गया, तो मेरी प्रतिष्ठा ही उच्छिन्न हो जायगी । देवताओं ने अग्निदेव की इस चिन्ता को हटाते हुए आश्वासन दिया कि ) अग्निदेव! ( आप चिन्ता न करें ) हम आपको अपने श्रायतन ( प्रथमभागलक्षण प्रतिष्ठास्थान ) से कभी न गिरावेंगे । ( देवताओं का यह आश्वासन अवश्य ही सुरक्षित रहता है । अग्निदेव का प्रथमभाग अक्षुण्ण ही बना रहता है । इसी स्थिति का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है कि ) उन देवदेवताओं नें ( प्रथमभाग प्रलोभन - साधन से ) ऋतुओं को बुलाते हुए ( भी उन्हें प्रथमभाग देते हुए भी ) क्योंकि अग्निदेष को अपने उनके आयतन से ( प्रथमभाग से ) च्युत नहीं किया, अतएव ( तब से, इसी अच्युत-भाव से ) वे अग्निदेव ' अच्युत ' नाम से ही प्रसिद्ध होगए । ( जिनके लिए उभयत्राच्युत् आग्नेय पुरोडाश विहित है ) । वह याज्ञिक भी अपने उस आयतन से कभी च्युत नहीं होता है, जिस श्रायतन में वह प्रतिष्ठित रहता है, जोकि इस अच्युत अग्नि को ( अग्नि के इस अच्युत धर्म्म का ) जानता है || ६ || १५०
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प्रयाजब्राह्मण ( देवताओं अग्नि का - ' न त्वामायतनाच्च्यावयाम: ' इत्यादिरूप से वाचिक सन्तोष तो करा दिया, परन्तु इस से समस्या अधिक क्लिष्ट बन गई । ' प्रथमयजन ' कर्म एकबार ही सम्भव है । ऋतुओं का प्रथमयजन कर लिया जाय, अथवा तो अग्नि का प्रथम यजन कर लिया जाय । अग्नियजन हो चुका है । यदि इन्हें इसी स्थान पर प्रतिष्ठित रखना है, तब तो ऋतुओं का प्रथमयजन असम्भव हो जाता है । यदि ऋतुओं का प्रथमयजन किया जाता है, तो अग्नि के प्रथम भाग के अपहरण के अतिरिक्त अन्य उपाय का अभाव है । फलस्वरूप अग्निदेव के साथ की गई प्रतिज्ञा का निर्वाह असम्भव हो जाता है । इस जटिल अवस्था के निराकरण के लिए देवदेवताओं के ध्यान में एक उपाय आया । उन्होंनें यह निश्चय किया कि, प्रथमयजन का प्रलोभन प्रथम भागहर अग्नि के द्वारा ही ऋतुओं के समीप पहुँचाना चाहिए । परिणाम यह होगा कि, ऋतुदेवता अग्निदेवता को प्रथम यजनरूप प्रिय भाग का लाने वाला समझ कर इनसे अवश्य ही यह कहेंगे कि, जब आप अपना प्रथम यजन उपेक्ष्य मान कर हमें प्रथम भागद्दर बनाने का त्याग कर रहे हैं, तो हमारा यह कर्त्तव्य हो जाता है कि, हम अपने इस प्रथम यजन से आपको पृथक् न करें, अपितु श्रापका भी अपने प्रथम यजन कर्म में हीं समावेश करलें । इस प्रकार ऋतुदेवताओं का भी प्रथम राजन हो जायगा, साथ ही ऋतुयाग में समाविष्ट होने से अग्निदेव का प्रथम यजन भी सुरक्षित रह जायगा । इसी भाव का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है- ) ( उक्त मन्त्ररणा के द्वारा उक्त निश्चय कर ) देवदेवताओं ने अग्निदेव से कहा कि, ( हे अग्निदेव! ) जाइए, ( और ) आप ही उन ( सुरप्रविष्ट ) ऋतुओं को निमन्त्रित कीजिए । ( प्रेरणानुसार अपने स्वाभाविक श्रह्लानलक्षण हौत्र - धर्म की अपेक्षा से ) अग्निदेव ( वहाँ पहुँचे, वहाँ ) पहुँच कर उन ऋतुओं से ) अग्नि कहने लगे, कि, हे ऋतुदेवताओ! मैनें देवताओं के यज्ञ के प्रति आपका भाग जान लिया है ( अर्थात् देवताओं के इस निश्चय की मैं आपको सूचना देने आया हूँ कि, वे अपने यज्ञ में आपको प्रथम भागहर बनाने के लिए सन्नद्ध हैं ) । ( ऋतुदेवताओं का पहिले अपमान हो चुका था । श्रतएव वे तबतक संतुष्ट नहीं होने वाले थे, जब तक कि, उनके सामने पहिले यज्ञभाग से बढ़ कर कोई प्रिय साधन देवताओं की ओर से देने का निश्चय नहीं हो जाय । उन्होंने सोचा कि, यदि वे केवल यज्ञभाग ही देना चाहते हैं, तब तो अपन लौटेंगे नहीं । हाँ, यदि वे प्रथम भागहर बनाना निश्चित कर चुके हैं, तो अपना मान सुरक्षित रह सकता है, फलतः मानपूर्वक ही वहाँ लौटना भी श्रेयस्कर बन सकता है । साथ ही भागविभक्ति के समय वे यह भी देख चुके थे कि, प्रथमभाग अग्निदेव को निल चुका है । वे ही अग्निदेव अपना भाग छोड़कर उसे हमें देने आए होंगे, इसकी कोई सम्भावना है नहीं । और बिना प्रथमभाग के अपन लौटेंगे नहीं । इसी आशङ्का के स्पष्टीकरण के लिए अग्निदेव के द्वारा निमन्त्रित ऋतुदेवता श्रग्निदेव से पूँछने लगे कि, हे अग्निदेव! देवताओं के यज्ञ के प्रति ) आपने कैसे ( हमारा भाग ) जान लिया ( अर्थात् देवताओंने हमें पहिले के समान केवल भागइर बनाना ही निश्चित किया है, श्रथवा वे हमें प्रथम भागहर बनाने के लिए सन्नद्ध हैं? | ऋतुदेवताओं को इच्छानुसार देवसंकल्प का स्पष्टोकरण करते हुए श्रग्निदेव कहने
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शतपथ भाष्य लगे कि, हे ऋतुदेवताओ! देवदेवता अपने ) यज्ञ में आपका सर्वप्रथम हो यजन करेंगे ( आपको प्रथमभागहर बनाने का ही देवताओं ने निश्चय किया है ) ॥ ७ ॥
( जब अग्निदेव के द्वारा ऋतुदेवताओं को यह विदित हो गया कि, अपने को देवदेवता उस प्रथमभाग का अधिकारी बनाना चाहते हैं, जो यज्ञ कर्म में केवल उभयशच्युत प्रधानभूत अग्निदेव के लिए ही विहित है, और वही प्रथम भागहर अग्निदेव यह जानते हुए भी कि जो प्रथम भाग मेरा प्रातिश्विक धन है, उसे देवमण्डलोपकार के लिए मुझे ऋतुदेवताओं का बिना किमी मकोच के सौंप देना चाहिए, तो उन ऋतुदेवताओं का हृदय अग्निदेव के इस अपूर्वत्याग के प्रति कृतज्ञता से आप्लावित हो गया । प्रत्युपकार की भावना से इन्होंनें भी यह निश्चय कर लिया कि, जिसने अपने लिए अपना स्वत्त्र छोड़ दिया, उसे कभी अपन पृथक न करेंगे । फलतः अपने नियम, पूर्वप्राप्त प्रथम भाग से युक्त रहते हुए अग्निदेव प्रसन्न हो जायँगे, प्रत्युपकार भी हो जायगा, साथ ही जिन देवताओंने संकटापन्न स्थिति जानते हुए भी प्रथमभाग अपने लिए नियत कर दिया, उनकी अग्निदेव के प्रति की गई - ' न त्त्वामायतनाच्चावयामः ' इस प्रतिज्ञा की भी रक्षा हो जायगी । यह निश्चय कर ऋतुओंने अपने प्रथम भाग में अग्निदेव का भी समावेश कर लिया । इसी स्थिति का ऋतुओं के साथ अग्नि का घनिष्ठ सम्बन्ध है, इस स्थिति का उपपादन करती हुई श्रुति कहती है ) -( निमन्त्रण देने वाले, प्रथम भागहर, अग्निदेव के उक्त त्याग से प्रभावित होकर, प्रत्युप-कार में अग्निदेव के प्रातिस्विक प्रथम भागाधिकार को सुरक्षित रखने की कामना से ) उन ऋतुओं अग्निदेव से कहा कि, ( हे अग्निदेव! आपके इस उपकार के बदले ) हम आपको हमारे में ( हमारे प्रथमभाग में ) भागहर बनाते हैं, जो कि आपने देवताओं के यज्ञ के प्रति हमारे लिए ( अपना अधिकार छोड़ते हुए ) भाग ( प्रथम भाग ) जाना ( अपने प्रथम भाग को हमारे लिए स्वीकार कर अपनी उदारता का, त्याग का परिचय दिया ) | ( क्योंकि देवदेवताओं के सम्वत्सरयज्ञ में प्रथमभाग लेने वाले ऋतुदेवताओं की ओर से अग्निदेव भी समाविष्ट हुए थे, अतएव तभी से ) ये अग्निदेव ( दिव्यप्राणाग्नि ) ऋतुओं में समाविष्ट है ( ऋतुओं से श्रग्निप्राण का समन्वय प्राकृतिक है, इसी सहज सम्बन्ध को लक्ष्य में रखकर प्रयाजदेवताक ि में प्रत्येक प्रयाजयाग के साथ अग्नि का भी यजन होता है । अतएव च प्रयाज देवताक याज्या मन्त्रों में ) – ' समिधोऽग्ने, तनूनपादग्ने, इडोऽग्ने, बर्हिरग्ने, स्वाहाग्निम् ' ( इत्यादिरूप से श्रग्निपढ़ का समावेश हुआ है ) । वह ( यज्ञातिशयरूप फलभोक्ता यजमान, प्रयाजकर्मेतिकर्त्तव्यतापूरक ऋात्त्वक् ) उस पुण्यकर्म्म में निश्चयेन भागहर बन जाता है, जिस पुण्यकर्म में वह ( पुण्यकर्म्म सूचक के प्रति, प्रवर्त्तक के प्रति, संयोजक के प्रति ' समान करता हु ( उसे भी संयुक्त करता हुआ ) तत् पुण्यकम्र्मानुष्ठान करता है । ( प्रयाज कम्र्मानुगत श्रग्निसमावेश से ) अग्निप्राणयुक्त बने हुए उस ( gr यकम्र्मा ) के लिए अग्निप्राणयुक्ता ( ही, श्रतएव समृद्ध हीं ) ऋतुएँ उन सम्पूर्ण श्रोषधियों का परिपाक करतीं हैं, जो कि ( उक्त विज्ञान परिचय के आधार पर ) ऋतु में अग्नि को समाविष्ट जानता है ॥ ८ ॥
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