Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1241–1250

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1241–1250

पृष्ठ 1241

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प्रयाजब्राह्मण ( पूर्वप्रकरण से यह निष्कर्ष निकलता है कि, प्रयाजदेवताओं का यजन पहिले होता है । इस निष्कर्ष के सम्बन्ध में - एक पूर्वपक्ष उपस्थित किया जा सकता है । पूर्व के ' होतृप्रकरण ब्राह्मण ' ( १।४।२ ) वरणर्थक मन्त्रों की व्याख्या करते हुये श्रुति ने देवाह्नान कर्म का क्रमिक विश्लेषण किया है । वहाँ आह्वान का जो क्रम बतलाया गया है, उसमें प्रयाजदेवताओं का अन्तिम स्थान पड़ता है, जैसाकि निम्न लिखित वचन से स्पष्ट है-“ आवह देवान् यजमानायेति, तदस्मै यज्ञाय देवानावोढवाऽयह 1 । अग्निमग्नऽआ-बहेति, तदाग्नेयाज्यभागायाग्निमावोढवाऽग्रह | सोममावहेति, तत् सौम्यायाज्यभागाय सोममावोढवाऽग्रह | अग्निमावहेति, तद्य ऽएष ऽउभयत्राच्युतश्राग्नेयः पुराडाशो भवति, तस्माऽअग्निमाबोढवाऽयह । अथ यथादेवतम् । देवाँ २ ॥ ज्यषां २ ॥ श्रवहेति, तत् प्रयाजानुयाजानावोढवाऽयह । प्रयाजुनायाजा वै देवाऽञाज्यपाः ” — - शत ० ११४/२/१६, १७, । उक्त देवता - वाहनश्रुति से स्पष्ट है कि, आज्यपा - प्रयाज देवताओं का आवाहन सब के अन्त में विहित है । श्रत पद्धति में यह भी नियम विहित है कि, जिस देवता का जिस क्रम से आवाहन बिहित है, उसी क्रम से तद्ददेवता का यजन विहित है । सर्वत्र देवावाहन क्रम से ही देवयाग विहित है । देखते हैं, प्रकृत प्रयाज कर्म में इस समान पद्धति - नियम - का इसलिए उल्लंघन हुआ है कि, प्रयाजों का आवाहन तो विहित है सब के अन्त में. किन्तु यजन हुआ है । सब से पहिले । प्रयाजयाग के सम्बन्ध में यह व्यक्तिक्रम क्यों?, क्यों नहीं इनका भी यजन नियमानुसार श्रावाहन क्रम से अन्त में ही किया जाता?, इसी पूर्वपक्ष का अपने शब्दों में निरू-पण करती हुई, श्रागे जाकर उत्थित पूर्वपक्ष का समाधान करती हुई श्रुति कहती है ) -प्रयाजयाग के विहित आवाहनक्रम से विपरीत हे ने वाले प्रथम यजन कर्म्म के सम्बन्ध में ( वैज्ञानिक ) कहते हैं - ( यह पूर्वपक्ष उठाते हैं, विप्रतिपत्ति उपस्थित करते हैं - ' तदाहुः ' कि ) जब कि प्रयाजों को - ( इविविभागानुसार विहित नियम के आधार पर ) उत्तम रूप से ( अन्त में देव-देवता ) आहूत करते हैं, ( आवाहन जब कि इनका सर्वान्त में होता है ) तो ऐसी स्थिति में ( आवाहन क्रम से विपरीत ) किस कारण ( क्यों ) इनका प्रथम रूप से ( देवदेवता ) यजन करते हैं ( यजन सर्वप्रथम क्यों किया जाता है? ) । ( उत्तर स्पष्ट है - अपने प्राकृतिक सम्वत्सर ) यज्ञ में ( प्राणविध ) देवदेवताओं ने इन ( प्रयाओं ) को उत्तमरूप से ही ( अन्तिमरूप से ही यद्यपि ) स्थापित किया ( था ), ( तथापि उसी समय उन ) देवदेवताओं नें ( अग्निदेव के द्वारा इनके लिए यह भी निश्चय कर दिया था कि ) हम तुम्हारा यजन तुम्हें प्रथम मान कर ही करेंगे । ( इस विशेष विधान के आधार पर ही सामान्य विधान की उपेक्षा करते हुये देवदेवताओं नें आवाहन किया इनका यद्यपि अन्त में हीं, परन्तु यजन किया सर्वप्रथम । प्राकृतिक यज्ञ में प्रयान- कल्पना अन्तिम १५३

पृष्ठ 1242

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शतपथभाष्य है, यजन प्रथम है । उसी प्राकृतिक यज्ञविद्या पर प्रस्तुत वैध मानुष यज्ञ का वितान हुआ है । श्रुत. यहाँ भी उसी प्राकृतिक नियम का अनुगमन करना आवश्यक हो जाता है ) श्रतएव ( प्राकृतिक नियमानुरोधेनैत्र ) ऋत्त्विक् लोग ( अपने इस इष्टिकर्म में भी इन प्रयाजों का उत्तमरूप से तो श्रावाहन करते हैं, एवं प्रथमरूप से यजन करते हैं ॥६ ॥

४ * ( प्रयाजयाग के सम्बन्ध में एक विषय और विजिज्ञास्य रद्द जाता है । समित्, तनूनपात् बाई, स्वाहा, ये पाँच व्याहृतियाँ नाम - क्रमशः बसन्त ग्रीष्म, वर्षा, शरत्, हेमन्त, इन पाँच इद्.. ऋतुओं से सम्बन्ध रखतीं हैं । सम्वत्सरयज्ञ की पर्वरूपा वसन्तादि पाँचों ऋतुओं का सम्वत्सराग्नि से सम्बन्ध है, जैसाकि ब्राह्मणारम्भ की = कण्डिकाओं से स्पष्ट कर दिया गया है । इसी आधार पर यह मान लेना श्रविप्रतिपन्न बन जाता है कि, ऋऋतुओं का यजन अग्निपूर्वक ही होता है । परन्तु - वाद्दालक्षण पञ्चम् प्रयाजयाग के सम्बन्ध में एक नवीन विप्रतिपत्ति उपस्थित होती है । आरम्भ के चार प्रयाजों में जहाँ ऋतुलक्षण प्रयाजों के साथ ' समिद्धा अग्न श्राज्यस्य व्यन्तु'-' तनूनपादग्न आजम्य वेतु'- ' इडो अग्न आज्यस्य व्यन्तु ' - ' बर्हिरग्न आजस्य वेतु ' - इस रूप से केवल अग्नि का सम्बन्ध बिहित है, वैसे पाँचवें हेमन्तऋतुलक्षण स्वाहायाग में केवल अग्नि का ही सम्बन्ध विद्दित नहीं है । श्रपितु पूर्वप्रयाजचतुष्टयी की भाँति अग्नि के सम्बन्ध के अतिरिक्त - इस प्रयाजयाग में श्राज्यभाग, प्रधान, स्विष्टकृत् 9 इन तीन श्रग्नियागों का सम्बन्ध और किया जाता है । दूसरे शब्दों में श्राज्यभाग ग्राहक अग्नि, प्रधानभाग ग्राहक अग्नि, स्विष्टकृद्भागग्राहक अग्नि, इन तीन श्रग्नियों का आदि - मध्य अवसान में यजन और किया जाता है । यदि सामान्य सम्वत्सरा-ग्निवत् इस विशेषाग्नित्रयी का भी ऋतुओं के साथ सम्बन्ध है, तब तो ऋतुलक्षण पाँचों हीं प्रयाजों में - प्रत्येक में - इन तीनों विशेषाग्नियागों का अनुष्ठान होना चाहिये । यदि ऋतुओं के साथ सम्बन्ध नहीं है, तो किसी भी प्रयाजकर्म में इनका यजन नहीं होना चाहिये । स्थिांत यह है कि, आरम्भ के चार प्रयाजों में तो केवल सामान्य अग्नि का ही यजन किया जाता है । किन्तु पञ्चम प्रयाज में सामान्य अग्नियजन के अतिरिक्त विशेषाग्नित्रयी का यजन और किया जाता है, जबकि ऋतुसामा-न्यत्त्वेन पञ्चम प्रयाज में इनका यजन विप्रतिपत्र बना हुआ है । स्वाहा लक्षण हेमन्त प्रयाजयाग से सम्बन्ध रखने वाले मन्त्र में प्रयाज, तथा सामान्य अग्नि, दोनों के यजन के अतिरिक्त तीन विशेपाग्नियों के यजन का भी समावेश हुआ है । मन्त्रभाग निम्न लिखित है— " स्वाहा प्रिं, स्वाहा सोमं, स्वाहा मिं, स्वाहा देवाँ आज्यपान्, स्वाहानिं होत्रा जुषाणः, अग्न आज्यस्य व्यन्तु वौषट् ” - शत ० १ | ५ | ४ | २२,०३ । उक्त याज्यामन्त्र के पाँच विभाग स्पष्ट हैं । ( १ ) ' स्वाहाग्नि, स्वाहा सोमम् ' - यह एक विभाग है । इससे आग्नेय श्राज्यभाग, तथासौम्य श्राज्यभाग, इन दो श्राज्यभागों का सम्बन्ध है । सोम-122

पृष्ठ 1243

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प्रयाजब्राह्मण गर्भित अग्नि हीं श्राज्यभागदेवता है । इसी का प्रथम यजन होता है । ( २ ) स्वाहानिम ' - यह द्वितीय विभाग हैं । उभयत्राच्युत श्राग्नेय पुरोडाशानुगत प्रधान देवता ही इस विभाग से गृहीत है, यह दूसरा प्रधानयाग है । ( ३ ) ' स्वाह । देवाँ श्राज्यपान् ' यह तीसरा विभाग है । आज्या स्वाहा-लक्षण प्रयाज ( हेमन्त ) देवता के लिए ही यह तृतीय विभाग नियत है । ( ४ ) ' स्वाहानं होत्रा जुषाणः ' यह चौथा विभाग है । स्विष्टकृदमि का ही इससे यजन होता है । ( ५ ) ' अग्न आजस्य व्यन्तु चौपट् ' यह पाँचवाँ विभाग है । पूर्व ऋतु सामान्य सम्वत्सराग्नि का ही इससे यजन होता है । आयभागयागानुगत विशेष श्रग्नि आदि में विहित है, प्रधानभागयागानुगत विशेष अग्नि ( उभयत्राच्युत अग्नि ) मध्य में विहित है, विष्टकृद्यागानुगत विशेष अग्नि अन्त में विहित है । इस प्रकार स्वाहात्मक पचम प्रयाजयाग के आदि - मध्य अवसान में क्रमशः श्राज्यभागयाग, प्रधान-याग, स्विद्याग, ये तीन विशेषग्नियाग पूर्व के चार प्रयाजापेक्षया विशेषरूपेण विहित हैं । इनकी उसी पूर्वोपात्त बैज्ञानिक आख्यान के द्वारा उपपत्ति बतलाती हुई श्रुति कहती है ) -( अपने प्राकृतिक इष्ट्रिक में होने वाले पद्म प्रयाजयाग के ) चौथे ( शरदऋतुरूप बर्हि-नमक ) प्रयाज से देवदेवताओं नें निश्चय से यज्ञ ( यज्ञातिशयरूपा यज्ञसम्पत् ) प्राप्त कर लिया-( एवं चौथे प्रयाज से प्राप्त ) उस ( यज्ञ ) को पाँचवें ( हेमन्त ऋतुरूप स्वाहात्मक ) प्रयाज प्रतिष्ठित- पूर्ण कर लिया । ( इस प्रयाजकर्म्म के ) अनन्तर होने वाला श्राज्यभागादिरूप जो यज्ञ का शेष ( इतिकर्त्तव्यता ) बच रहा, उस ( के अनुष्ठान ) से देवदेवता स्वर्गलोक को प्राप्त हो गये || १० || प्रयाजकम्र्म्मातिरिक्त श्राज्यभागादि लक्षण शेष यज्ञानुष्ठान के बल से स्वर्गलोक ( की ओर ) जाते हुए देवदेवतालोग ( अन्तरिक्ष में अमूल - उभयतः परिच्छिन्न रूप से विचरने वाले आय-प्राणात्मक, यज्ञविरोधी ) असुर राक्षसों के निरोध ( संकल्प ) से डर गए ( उन्हें भय हुआ कि, ये दुष्ट कहीं हमारे स्वर्गगमन में बाधा न खड़ी करदें । इस भय से त्राण पाने के लिए ) उन देव-देवताओं नें असुर राक्षसों को मारने वाले, एवं मार भगाने वाले अग्नि को ( ही स्वर्गप्राप्तिसाधक ( यभागातिशय के पूर्व में ( पहिले ) प्रतिष्ठित किया, उसी को मध्य में, उसीको अन्त में प्रतिष्ठित कर दिया । ( अर्थात् श्रन्तरिक्ष्य असुराकमण से अपने स्वर्गसाधक यज्ञातिशय को निर्विघ्न स्वर्गप्राप्ति का हेतु बनाने के लिए उन्होंने यज्ञातिशय के आदि - मध्य अवसान, तीनों स्थानों में श्रप्यप्रापोच्छंदक श्राग्नेयप्राण प्रतिष्ठित कर दिया ) ॥ ११ ॥

( देवदेवताओं के द्वारा त्रिः स्थानों में नियुक्त अग्नि के प्रभाव से इन का स्वर्गगमन निर्विघ्न पूर्ण होगया । षयों कि ) यदि इन देवदेवताओं का उन असुर राक्षसों ने पूर्व की ओर से निरोध करना चाहा, विघ्न डालना चाहा, तो तत्रस्थ अग्नि में तत्रस्य असुरों को मार भगाया । यदि मध्य की ओर से निरोध करना चाहा, तो तत्रस्थ अग्निने तत्रस्य असुरों को मार भगाया । यदि पीछे की ओर से निरोध करना चाहा, तो तत्रस्य अग्नि ने तत्रस्थ असुरों को मार भगाया । ( इस प्रकार तीन स्थानों में रक्षक रूप से नियुक्त तीनों ) श्रग्नियों से सर्वात्मना सुरक्षित रहते हुए देवदेवताओं नें निर्विघ्न स्वर्गलोक प्राप्त कर लिया ॥ १२ ॥

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पृष्ठ 1244

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शतपय भाष्य ( प्राकृतिक यज्ञ में पृथिवी से द्युलोक की ओर जाते हुए पार्थिव प्राणदेवताओं के प्रयाजातिशय पर श्रान्तरिक्ष्य असुरों का आक्रमण होता रहता है । परन्तु त्रिः स्थान स्थित अग्नेयप्रशण के सम्बन्ध से उन का वह आक्रमण व्यर्थ सिद्ध होजाता है । इसी प्राकृतिक यज्ञविधा के आधार पर भौम देवताओं ने वैधयज्ञ के पञ्चप्रयाजकर्म में पांचवें प्रयाज में उसी प्राकृतिक आग्नत्रयो सम्पत्- की प्राप्ति के लिए तीन विशेषाग्निकर्मों का समावेश किया था, तद्द्द्वारा अपने दैवात्मरूप से वे निरापद स्वर्ग पहुँचने में समर्थ हुए थे । उसी भौमदेवानुगता यज्ञविधा के आधारपर इस यजमान का यह वैध इष्टिकर्म विहित हुआ है । इसे भी अपने दैवात्माकर्षणद्वारा स्वर्ग में जाना है । जाते समय आन्तरिक्ष्य असुरराक्षसों का आक्रमण जहाँ अनिवार्य है, वहीं इस आक्रमण को रोकना भी आवश्यक है । उसी आक्रमण निरोध के लिए, निरापद स्वर्गावाप्ति के लिए भौमदेवा-गत यज्ञ अपने इस यज्ञ में भी पाँचवें प्रयाज कर्म्म के - आदि - मध्य अवसान में विशेषाग्नित्रयी का यजन करता है । इस यजन से रक्षक - अग्नित्रयी का अनुग्रह प्राप्त होजाता है । फलस्वरूप यह भी देववत निर | पदरूप से स्वर्गफल भो । बन जाता है । पाँचवें प्रयाज के आदि - मध्य - अवसान-में अग्नित्रयी का यजन क्यों किया जाता है?, विप्रतिपत्ति का यही समाधान है, जिसका श्रति के अक्षरों में यों विश्लेषण हुआ है ) -( जिसप्रकार प्राकृतिक नित्य यज्ञ में अग्नित्रयी का सहयोग होरहा है, तदनु जिसप्रकार भौम मनुष्य देवताओं नें अपने चतुर्थ प्रयाज समाप्त्यनन्तर पाँचवें प्रयाज के आदि - मध्य अवसान अग्नि का यजन किया था. तत्द्वारा निरप्रद रूप से स्वर्ग प्राप्ता किया था, ) ठीक इसी प्रकार ( तथोऽएव ) यह यजमान भी अपने इस चौथे प्रयाज से ( तो स्वर्गसाधक ) यज्ञ प्राप्त करता है, उसे पाँचवें प्रजाज से प्रतिष्ठित करता है, इस के अनन्तर जो आज्यभागादिरूप यज्ञ का शेष बच रहता है उस से स्वर्गलोक ही प्राप्त करता है ॥ १३ ॥

सो जो कि ( पश्चम प्रयाज के आदि में - ' स्वाहाग्नि ' - रूप से यजमान के प्रतिनिधिरूप ) अध्य-आग्नेय- श्राज्यभाग का यजन करता है, ( इस से अपने स्वर्ग जाते हुए यज्ञातिशय के ) पूर्वभाग की ओर से राक्षसों के मारने वाले, मार भगाने वाले अग्नि को ही ( नियुक्त ) करता है । ( अग्नेय - श्राज्यभाग के ) अनन्तर ( इसी पञ्चम प्रयाज कर्म्म के मध्य में ) जो ( उभयत्राच्युत प्रधान अग्नि के लिए ) जो श्राग्नेय पुरोडाश ( का भागहर ) बन जाता है ( उस का ' स्वाहाग्निम रूप से यजन करता है ) । इस कर्म से ( इस यज्ञातिश के ) मध्यभाग की ओर से ही अग्नि को नियत करता है । ( मध्यम अग्नि यजन के ) अनन्तर जो कि अध्वर्यु ( प्रयाजान्त में -' स्वाहाग्निं होत्रा जुषाण: ' इत्यादि रूप से ) स्विष्टकृत् - अग्नि का यजन ( स्वप्रकृद्याग ) करता है, इस कर्म से ( इस यज्ञातिशय के ) पश्चिम भाग की ओर से ही अग्नि को नियुक्त करता है, ( जो कि ) अग्नि ' रक्षोहण ' - ( राक्षसों को निर्जीव बनाने वाला, मारने वाला ) एवं ' रत्तसामपहन्ता ' ( राक्षसों को मार भगाने वाला, यह्नमण्डलसीमा से बहिष्कृत करने वाला ) है ॥ १४ ॥

( प्रयाजकर्म से स्वर्गलोक की ओर जाते हुए ) इस यजमान के ( स्वर्गसाधक ) यज्ञातिशय पूर्वभाग से यदि असुर राक्षसों को मार भगाते हैं । यदि मध्य भाग से आक्रमण करते है, १५६

पृष्ठ 1245

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प्रयाजब्राह्मण तत्रस्थ अग्नि तत्रस्थों को मार भगाते है । यदि पश्चिमभाग से आक्रमण करते हैं, तो तत्रस्थ श्रग्नि तत्रस्थों को मार भगाते हैं । इस प्रकार वह ( यज्ञातिशयरूप - स्वर्गसाधक ) दैवात्मा तीनों अग्नियों से सुरक्षित- निरापद बनता हुआ स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है ( प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है ) || १५ || 8 83 इति — प्रयाजानामि प्राथम्यन् ६. ७- अभिचार ( कृत्याप्रयोग ) * ( प्रयाज कर्म के द्वारा यज्ञातिशय उत्पन्न भी आज ही हो जायगा, वह सप्तदश स्वर्गस्थान में भी आज ही प्रतिष्ठित हो जायगा । परन्तु यज्ञकर्त्ता यजमान का वह मानुपात्मा भूतात्मा, जो स्वर्गगत यज्ञातिशयरूप देवात्माकर्षण से आकर्षित है, अपने ऐहलौकिक प्रारब्धकर्म्मक्षयानन्तर ( जिस प्रारम्भ कर्म से इसे वर्त्तमान शरीर मिला है ) ही ( मृत्यु के अनन्तर ही ) दैवात्माकर्षण के द्वारा स्वर्गफल का भोक्ता बनेगा, स्वर्ग पहुँचेगा । इसीलिए तो स्वर्गफल श्रमुष्मिक ( पारलौकिक ) माना गया है, अतएव तो यह ' अदृष्टफल ' ( परोक्षफल ) कहलाया है । त्रिब्राह्मणात्मक प्रयाजब्राह्मण से पहिले प्रतिपादित ' गब्राह्मण ' के आश्रावण - प्रत्याश्रावण कर्म्म - विज्ञान में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि, मानवीय मन परोक्षफलापेक्षया ऐहिक प्रत्यक्ष फलों की ओर विशेषरूप से आकर्षित रहता है - ( देखिए- पृ ० सं ० १२५, वृष्टिविज्ञान प्रकरण ) । अवश्य ही प्रकृत अग्नित्रय - यजन का भी परोक्ष- स्वर्गफलातिरिक्त कोई प्रत्यक्ष भी फल होना चाहिए । उस प्रत्यक्ष फल को तात्कालिक, कालानन्तरभावी, भेद से दो भागों में विभक्त किया जा सकता है । भोजन किया, और तृप्ति हा गई, यह ऐहलौकिक तात्कालिक फल माना जायगा । भोजन किया, भुक्त द्रव्य क्रमशः रस असृक्-मांस - मेद - अस्थि - मज्जा- शुक्र - श्रोज - मनोरूप में परिणत हुआ । यही ऐहलौकिक कालान्तरभावी फल माना जायगा । ब्राह्मण की प्रकृत १६, १७, १८. इन तीन कण्डिकाओं में तो तात्कालिक फल का विश्लेषण हुआ है, जिसे कृत्यासम्बन्ध से अभिचारात्मक फल मानते हुए तात्त्विक कालान्तर-भावी फल से हमने पृथक कर दिया है, वही ' अभिचार ' नामक ७ वाँ प्रकरण है । एवं १६ बीं कण्डिका में कालान्तरभावी, अतएव स्थिर धर्मात्मक ऐहलौकिक फल का विश्लेषण हुआ है । श्रतएव तत्कण्डिकात्मक प्रकरण ' फलश्रुति ' नामक वाँ प्रकरण मान लिया है । इन दोनों ऐहलौकिक फलों में से सूचीकटाइन्यायेन पहिले अभिचारात्मक - तात्कालिक - प्रथम ऐहलौकिक फल का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है ) -( जिस समय आज्यभागानुगत प्रथम अग्नि का यजन हो रहा हो, और उस समय यदि कोई यजमान का शत्रु यजमान के प्रति निन्दाभाव प्रकट करे, श्रथवा तो कुछ निन्द्य बचन बोल पड़े. इसके अतिरिक्त यजमान को अपने किसी शत्रु के द्वारा पहिले से कहे गये निन्दावचनों १५७

पृष्ठ 1246

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शतपथ माध्य का प्रतिशोध लेना हो, तो उसे चाहिए कि वह उस शत्रु को लक्ष्य बना कर उसके नामग्रह्ण पूर्वक – ' मुख्या पार्त्तिमारिष्यसि – अन्धो वा बधिरो वा भविष्यसि ' - हे शत्रु तू मुख्य पीड़ा प्राप्त करेगा, या तो अन्धा हो जायगा. या बहिरा हो जायगा, यह बचन बोल दे । इसी प्रकार दूसरे तीसरे अग्नियजन में भी यह अभिचार वाक्य द्वारा अपने शत्रु का अनिष्ट कर सकता है । इन्हीं तीनों अभिचारों का अपने शब्दों में दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है ) ( इस प्रयाजकर्म्म में ) यदि इस ( यजमान ) के प्रति वह ( यजमानशत्रु, अथवा और कोई-ईर्ष्यालु - निन्दक ) यज्ञारम्भ में ( श्राज्यभागानुगत प्रथमाग्नियाग काल में निन्दावचन का प्रयोग करे, तो ( यजमान ) उस ( निन्दक ) के प्रति ( यह ) बोले कि, तू मुख्य पीड़ा प्राप्त करेगा, अन्धा हो जायगा, अथवा तो बहिरा बन जायगा । वास्तव में ( शारीरिक कष्टों में ) ये ही ( दोनों ) मुख्य पीड़ा हैं । ( यजमान के उक्त कथन मात्र से ) वैसा ही अवश्य हो जायगा, शत्रु अन्धा हो जायगा, श्रथवा बहिरा हो जायगा, यही प्रथम अभिचारात्मक तात्कालिक फल है ) ॥२६ ॥

यदि इसके प्रति वह यज्ञमध्य में ( उभयत्राच्युत द्वितीयाग्नियागकाल में ) अनुचित कहे, तो ( यजमान ) उसके प्रति ( यह ) बोले कि, तू प्रजाशून्य, पशुशून्य हो जायगा । प्रजाएँ, और पशु निश्चयरूप से मध्य ( रूप ) हैं । ( यजमान के उक्त कथन से ) वैसा ही निश्चयेन हो जायगा ( निन्दक की प्रजा, पशुसम्पत्ति नष्ट हो जायगी । यही द्वितीय अभिचारात्मक तात्कालिक फल है ) || १७ || यदि इसके प्रति वह यज्ञान्त में ( स्विष्टकृत अग्निरूप तृतीयाग्नियाग काल में ) अनुचित कहै, तो ( यजमान ) उसके प्रति ( यह ) बोले कि, तू प्रतिष्ठा रहित, एवं निर्धन बनता हुआ शीघ्र ही उस ( यम ) लोक को प्राप्त होगा ( मर जायगा ) | ( यजमान के ऐसा कहने से ) वह ( निन्दक ) वैसा ही अवश्य हो जायगा ( अपयशपूर्वक दरिद्री बनता हुआ शीघ्र मर जायगा । यही तृतीय अभिचारात्मक तात्कालिक फल माना जायगा । इस प्रकार श्राज्यभागयाग, प्रधानयाग, स्विष्ट-कृश्चाग, तीनों से सम्बन्ध रखने वाले प्रथम - मध्यम- अन्तिम - श्रग्नियों के यजन से शत्रुविनाशक दृष्ट - प्रत्यक्ष - तात्कालिक - ऐहलौकिक फल भी प्राप्त किया जा सकता है । अति ने तातकालिक फल तो बतला दिया । परन्तु वह यह नहीं चाहती कि, यज्ञरहस्य को न जानकर ऐसी भूलें करने वाले अज्ञ जन भी यों अपना नाश करालें । उनके अभ्युदय को लक्ष्य में रखते हुए उनको सावधान करती हुई श्रुति कहती है कि, उन यज्ञरहस्यानभिज्ञों को यह जान लेना चाहिए कि, यज्ञ कोई सामान्य लौकिक कर्म नहीं है । अपितु यह प्राकृतिक समिद्ध उस प्राणाग्नि को अपनी प्रतिष्ठा बनाता है, जिसके प्रति साथ ही इस यज्ञाग्नियुक्त यजमान के प्रति जान - अनजान में थोड़ी भी उपेक्षा, निन्दा, उपहास करने से सर्वनाश निश्चित है । ) अतएव उन निन्दकों को चाहिए कि, वे भूल कर भी ( हास परिहास में भी यज्ञ तथा यज्ञानुष्ठानकर्त्ता ) यजमान के प्र अनुव्याहारी ( अनुचित बोलने वाले ) न बनें - ' नानुव्याहारीव स्यात् ' । १५८

पृष्ठ 1247

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प्रयाजब्राह्मण ( अभिचार कर्म्म- कोई उत्तम कर्म नहीं है । लोकसंग्रहात्मक, सर्व - अभ्युदयकारक, अतएव श्रेष्ठतम यज्ञ जैसे सात्त्विक कर्म में अपने व्यक्तिगत द्वेष के बदले की भावना रखना भी यज्ञ-स्वरूप में तमोगुण का आधान करना है । अतएव उत्तम पक्ष तो यही है कि, यज्ञकर्त्ता भी ऐसे अभिचार का अनुगमन न करे । रही बात - इटफल की । इस सम्बन्ध में यही उत्तर पर्याप्त होगा कि, यज्ञकर्त्ता सामान्य मनुष्य मनुष्य नहीं है, अपितु प्रकृति की साक्षात् प्रतिमा है । जिस प्रकार प्रकृति से विरुद्ध जाने वाला अपने ही दोष से दण्डित हो जाता है, तथैव यजमान से शत्रुता रखने वाले भी स्वतः एव प्रकृतिद्वारा ही दण्डित हो जाते हैं । समयातिक्रम अवश्य हो सकता है । परन्तु दण्ड अवश्य मिल जाता है । दण्डव्यवस्था की अनिवार्यता तो ऐसी है कि, जो यजमान नहीं है, अपितु केवल इस रहस्य को जानता भर है, यदि उस केवल एवंवित् के प्रति भी कोई शत्रुता रखता है, तो वे भी नष्ट हो जाते हैं । एवंवित् भी उस फल को प्राप्त कर लेता है । फिर यजमान का तो कोई आशङ्का रहनी ही नहीं चाहिए । फलतः उसे यह भार प्रकृति पर दो छोड़ देना चाहिए | यज्ञनिन्दकों के ' तस्मादु ह नानुव्याहारी स्यात् ' इस सामयिक आदेश-चेतावनी- के साथ साथ यज्ञकर्त्ताओं के प्रति भी उन्हें सात्त्विक - भावारूढ़ बने रहने के लिए, अभिचारकर्म्मप्रवृत्ति से बचते रहने के लिए सङ्केत करता हुई श्रुति कहती है कि ) – ( यज्ञकर्त्ता ही क्या ) इस रहस्य को जानने वाला भी पर ( उत्कृष्ट, शत्रुपराभव कर्त्ता ) बन जाता है ( श्रतः जबकि केवल जानने वाले के शत्रु भी नष्ट हो जाते हैं, तो यजमान के साथ कौन शत्रुता कर सकता है | यदि कोई करेगा भी, तो प्रकृति स्त्रयं उसे दण्ड दे देगी ) - ' उत ह्येवंवित् परो भवति ' । अथवा उक्त वाक्य का यह भी अर्थ किया जा सकता है कि, जिस प्रकार यज्ञकर्त्ता के ' नष्ट हो जाते हैं, एवमेव इस अग्निरहम्यात्मक प्रयाजक नष्ट हो जाते हैं । दोनों में पूर्वार्थ ही समीचीन प्रतीत शत्रु यज्ञकर्त्ता के अभिचार प्रयोग को जानने वाले विद्वानों के भी शत्रु होता है || १८ || इति श्रभिचारः = - फलश्रुति ( बतलाया गया है कि, तात्कालिक इष्ट फल के अतिरिक्त कालान्तरभावी दृष्ट फल भी यज्ञ से सम्भव है । दोनों ऐहिक फलों के सम्बन्ध में यह भी जान लेना चाहिए कि, तात्कालिक फल जहाँ यजमानप्रयत्न - सापेक्ष है, वहाँ कालान्तरभावी फल श्रमुष्मिक स्वर्गफल की भाँति स्वतः एव प्राप्त हो जाता है । अतएव इस फल का तात्कालिक फलापेक्षया विशेष महत्त्व माना जायगा । अतएवच ऐसा ही फल ' फलश्रुति ' रूप से संग्राह्य माना जा सकेगा । इसी स्वाभाविक प्राकृतिक स्वतः प्राप्त इष्ट फल का विश्लेषण करती हुई श्रुति कहती है ) -१५६

पृष्ठ 1248

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शतपथभाष्य ( वसन्त - ग्रीष्म - संग्राहक समित् - तनूनपात - आदि पाँच ) प्रयाजयागों से ( ऋतुमण्डल में प्रविष्ट असुरों को ) जीतता हुआ यजमान ( परम्परया - ऋतुसम्बन्ध से ) निश्चयेन ( ऋतुसमष्टि-रूप ) सम्वत्सर को ही जीतता ( अधिकार प्रतिष्टित करता ) है । ( यह भी निश्चित है कि ) वही ( विजेता ) इस सम्वत्सर का जय करता है ( जीतता है ), जो सम्वत्सर ( रूप दुर्ग ) के द्वारों को जानता है । ( अर्थात द्वार परिज्ञान पूर्वक ही दुर्गप्रवेश द्वारा जयलाभ सम्भव है ) । वह ( जयेच्छु ) उन घरों से- दुगों - से क्या लाभ उठा सकेगा, ( जिसके अन्तर्द्वारों को वह उस रूप से भलीभाँति न जान लेगा, जैसे कि वे इसके उपयोग में श्राते हैं । ( ठीक इसी प्रकार जिन प्रयाजों के द्वार भूत प्रथम - अन्तिम प्रयाजों के तात्त्विकरूप को जो नहीं जानता, वे प्रयाज जिस प्रकार के वे इस यज-मान के उपकारक होते हैं, उनके तान्त्रिक प्रकारों को, प्रधान द्वारभूत प्रयाजों को नहीं जानता, वह क्या फल प्राप्त कर सकता है - कुछ नहीं । ( श्रतएव सम्वत्सर दुर्ग द्वारका परिज्ञान श्रावश्यक है ) | ( सम्बत्सर दुर्ग का ) वसन्त हूं । ( प्रवेश द्वार है, हेमन्त ही ( निर्गमन ) द्वार है । ( दोनों के स्वरूपज्ञान पूर्वक प्रयाजयजन करने वाला ) यजमान इस द्वारयुक्त सम्वत्सररूप स्वर्गलोक को प्राप्त हो जाता है । सम्वत्सर सर्वरूप है । सर्वभाव ही अक्षय्यभाव है । प्रयाज - यजन कर्त्ता का सुकृत ( कर्म्म ) अक्षय्य होता है, लोक भी अक्षय्य होता है । ( तात्पर्य कहने का यही है कि, सम्वत्सर सम्पत्न्तिसंग्राहक प्रयाजकर्म से स्थायी सम्पत् प्राप्त होती है, वह लोकप्रतिष्ठा से युक्त हो जाता है, और यही प्रयाजकर्म का कालान्तर भात्री प्राकृतिक स्थायी कल है ) ॥ १६ ॥

इति- फलश्रुतिः ६- परिशिष्ट प्रश्नोत्तरविमर्श ( प्रयाजकम्मं को यज्ञ पूर्णता प्रवर्त्तक, एवं तद्द्द्वारा । यजमानात्मा का स्वर्गप्रापक बतलाया गया । है । प्रश्न स्वाभाविक है कि, प्रयाजकर्म में ऐसी क्या विशेषता है, जिससे क्रत्त्वर्थस्थानीय भी प्रयाज जैसा श्रङ्गकर्म्म पुरुषार्थकर्म्मवत स्वर्गप्राप्ति का कारण बन जाता है? । प्रयाजकर्म्म में जो हुतिविहित है प्रत्यक्ष में उस श्राज्य में भी हम ऐसा कोई अतिशय उपलब्ध नहीं कर रहे, जो स्वर्गप्रापक बन जाय । इसी प्रश्न का यों भी उत्थान किया जा सकता है कि, सर्वत्र सभी कम्मों में आहुतिद्रव्य ही स्वस्व देवप्राणानुसार तत्तत् विशेष यज्ञातिशयों का जनक बनता है । जिस देवप्राण से आहुतिद्रव्य युक्त रहता है, आहवनीयाग्नि में हुत तह वप्राणमयी आहुति तद्देवप्राणाति-शय यज्ञ में प्रतिष्ठित करने का कारण बनती है । क्या प्रयाजकर्म के लिए नियत श्राज्याहुति का कोई वह विशिष्ट देवता है, जो स्वर्गप्राप्ति का निमित्त बन सकता है? । प्रश्न का उत्तर ' हाँ ' में दिया जायगा । वास्तव में केवल श्राग्यदेवता ही प्रयाज जैसे अङ्ग कर्म को भी स्वर्गप्रापक बनाने में समर्थ हो रहा है । उस श्राज्यदेवता का स्वरूप क्या है?, जिसके द्वारा प्रयाजकर्म स्वर्गप्रापक बन रहा है?, यही प्रश्न की अन्य उत्थानिका है, जिसका निम्नलिखित रूप से विश्लेषण हुआ है ) । १६०

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प्रयाजब्राह्मणा ( प्रयाजकर्म में संगृहीत ) श्राज्याहुति के सम्बन्ध में वैज्ञानिक लोग प्रश्न उपस्थित करते हैं ( तदाहुः ) कि – ये ( प्रयाजार्थं जुहू - उपभृत् में गृहीत ) श्राज्य किंदेवत्य हैं? ( इनका कोनसा देवता है? ) - ( प्रश्न हुआ हो क्यों, जबकि ऋतुदेवता पहिले से ही स्पष्ट किए जा चुके हैं, यह - प्रासङ्गिक प्रतिप्रश्न - प्रश्न पर प्रश्न और उपस्थित होता है । इस प्रतिप्रश्न का उत्तर वही होता है, जो कि अष्ट है । यह ठीक है कि श्राज्याहुति होती है ऋतुदेवताओं के लिए ही । श्रतएव यह समझना भी अनुचित नहीं है कि, श्राज्य के देवता ऋतुदेवता हैं । परन्तु यह समझना केवल समझना ही है । श्रज्यग्रहणपद्धति में किसी भी देवता के नाम का उल्लेख नहीं हुआ है । नामोल्लेख सम्भव भी कैसे हो, जबकि प्रयाजकर्म का उद्देश्य ऋतुद्वारा सम्वत्सर प्रजापति से सम्बन्ध रखने वाली सम्वत्सरात्मिका स्वर्गसम्पत है । यदि ऋतुओं का नाम लिया जाता है, तो समयात्मक सम्वत्सर का ग्रहण नहीं होता । यदि सम्बत्सर का नाम ले दिया जाता है, तो ऋतुओं का व्यष्टिरूप से यजन नहीं होता । अपेक्षित यह है कि - श्राज्यद्वारा ऋतुओं का भी यजन हो जाय, साथ ही इसी कर्म से ऋतुसमप्ररूपा सम्वत्सरसम्पत्ति भी प्राप्त हो जाय । इसका उपाय है - श्राज्य का ग्रहण हो - उपांशरूप से, बिना किसी देवता का नाम लिए, एवं आज्या-हुति हो तुनामपूर्वक । उपांशुग्रहण से ज्यद्वारा प्राजापत्यसम्पत्ति इसीलिए मिल जायगी कि, सम्बत्सरमण्डलकेन्द्र में प्रतिष्ठित प्रजापति अनिरुक्त है । अनिरुक्तभाव ही उपांशुभाव है । इस उपांशुभाद्वारा तत्समतुलित अनिरुक्ता प्राजापत्यसम्पत् प्राप्त हो जाती है. यजनकम्मानुगत याज्यामन्त्रों में - ‘ समिद्धो अग्न श्राभ्यस्य व्यन्तुः ' इत्यादि रूप से ऋतुनामोच्चारणपूर्वक आहुति देने से उद्देश्यभूत ऋतुओं का यजन सफल हो जाता है । इसीलिए श्राज्यग्रहण उपांशु रूप से *, एवं हु नामग्रहपूर्विका ही विहित हुई है । बिना नाम ग्रहण के चुपचाप जुहूपभृत में यहण करना ही इस प्रश्न का भी समर्थक वन रहा है कि, आज्य का देवता कौन है? किस देवता के उद्देश्य से आज्यग्रहण हुआ है? - साथ ही यही नामग्रहण भावात्मक तूष्णीभाव-श्रनिरुक्कभाव - इस प्रश्न का उत्तर भी दे रहा है कि, यह आज्य प्रजापतिदेवताक है । इसी स्थिति का संकेतविधा से स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कह रही है ) – ( ये आय ) प्राजापत्य हैं, यही कहना चाहिए । अर्थात् आज्य किंदेवत्य हैं? प्रश्न का ' प्राजापत्य हैं ', यही उत्तर हो सकता है क्योंकि प्रजापति निश्चयेन अनिरुक्त है । उधर आज्य भी ( तत्तदनादिश्याज्यस्यैव रूपेण गृह्णाति रूप से ) अनिरुक्त ही हैं- " अनिरुक्तो हि प्रजापतिः, अनिरुक्तान्याज्यानि ” । ( श्राज्य प्राजापत्य है, एतावता ही ये इनकी आहुति - यजमान के स्वर्गप्राप्ति के साधक कैसे घन गए?, यह प्रश्न उपस्थित होता है । इसी का समाधान करती हुई श्र ति कहती है ) – ( अपने अनिरुक्कभाव से प्राजापत्य बने हुए ) वे ये आज्य यजमानवेत्य ही हैं । ( अर्थात् यज्ञकर्ता यजमान भी ' प्रजापति ' सम्बन्ध से इन आज्यों का देवता बन जाता है । क्योंषि, जैसे सम्बत्सर यज्ञमण्डल का अधिष्ठता नभ्यभाव ( हृद्यतत्त्व -- सम्बत्ससर मण्डलापेक्षया प्रजापति है । एबमेब ) यह यजमान * — ' अथ यान्याज्यानि गृह्यन्ते - ऋतुभ्यश्चैव तानि छन्दोभ्यश्च गृह्यन्ते, बच्चदनादिश्याज्यस्यैव रुपेण गृह्णाति ” ( शत ० २ प्र ० । ५ ब्रा ० । ७ कटिका ) । ६१

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शतपथमाध्य भी निश्चयेन अपने इस यज्ञ में ( स्वयज्ञापेक्षया उसका प्रवर्त्तक बनने से ) प्रजापति है । ( जिस प्रकार सम्वत्सर प्रजापति की हृद्यकामना से अग्निवाय्वादित्यादि ऋत्विक् प्राकृतिक नित्य यज्ञ का वितान करते हैं, एवमेव इस यज्ञ में भी इस यजमान से उक्त ( प्रेरित ) होकर ही होता - अध्वर्यु आदि ऋत्विक - ( ग्रह - शस्त्र - स्तोत्रादि स्वकम्मों के द्वारा ) यज्ञ वितत करते हैं, ( इस वितान से यजमान के ) उस ( दैवात्मा ) को उत्पन्न करते हैं । ( इसप्रकार जिन प्रेरणाओं, धम्मों से वह अपने यज्ञ में प्रजाति बन रहा है, सब प्रेरणा- धम्र्मों का प्रवर्तक बनता हुआ यजमान भी अपने यज्ञ में अवश्य ही प्रजापति माना जा सकता है । एवं इसीलिए प्राजापत्य श्राज्यों को यजमानदेवत्य माना जा सकता है ) || २० || ( प्रजापत्त्र अज्य क्यों यजमान के स्वर्गगमन का कारण बन जाता है?, प्रश्न का परोक्षरूप सेयद्यपि पूर्वकण्डिका से समाधान हो जाता है । तथापि, जैसा चाहिए, वैसा स्पष्टीकरण अभी नहीं हुआ । इसी यत् किचित् - अस्वारस्य का स्पष्टीकरण करती हुई पद्धत्यंश - प्रदर्शन पूर्वक समाधान करती हुई श्रुति कहती है ) - वह अध्वर्यु श्राज्य का उपस्तरण कर ( पुरोडाशस्था-पनप्रदेश को श्राज्य से पहिले आय से युक्त कर, अनन्तर नियत ) इवि के दो अवदान कर ( स्तृत आज्य पर हविरवदान रख, अनन्तर पुनः ऊपर से उस द्विरवत्त ) इवि पर श्राज्याभिघार करता है ( ऊपर से घृत ढारता है ) । ( इस प्रकार उभयतः श्राज्यसम्बन्ध से युक्त ) यह आहुति आज्य से ( सर्वात्मना - नीचे - ऊपर दोनों ओर से ) संश्लिष्ट होकर ( मिलकर ही द्वारा ( आहवनीयाग्निके समिद्ध - प्रज्वलित - प्रदेश में ) आहुत होती है ( यह है आाज्याहुति का स्वरूप, जिसमें दोनों ओर से श्राज्य का सम्बन्ध हो रहा है ) । अध्वर्यु के द्वारा श्राज्यमिता श्राहुति यजमानमिश्रिता बन कर ही ( अग्नि में ) आहुत होती है | ( तात्पर्य्य यही हुआ कि, आज्याहुति प्राजापत्या बनती हुई स्वर्गाधिष्ठाता प्रजापति से युक्त होती है । श्राज्य यजमानात्मक है, यजमान का प्राण श्राज्य में समाविष्ट है, साथ ही यजमान ज्ञी अपेक्षा से प्रजापति भी है । श्राज्य एक प्रकार से यजमानात्मा है । इस प्रकार श्राज्य परम्परया यजमानात्मा - लक्षण प्रजापति से युक्त होता हुआ स्घर्गावाप्ति का अनुगामी बन जाता है । और अज्याहुति के द्वारा कैसे यजमान स्वग पहुँच जाता है?, किंवा आ याहुति कैसे स्वर्ग प्रापिका बन जाती है?, किंवा प्रयाज जैसे क्रत्वर्थ - अङ्ग कर्म से स्वर्गप्राति कैसे सम्भव है?, इत्यादि परिशिष्ट प्रश्नों का सम्यग्रूपेण विमर्श हो जाता है ) । ( इसी आहुति के सम्बन्ध में एक प्रासङ्गिक फल बतलाकर श्रुति इस प्रथाजप्रकरण को समाप्त कर रही है । श्राज्य साक्षात् यजमान है । श्राज्य का हवि के साथ युक्त हो जाना यजमान का इवि के साथ, किंवा यज्ञ के साथ युक्त हो जाना है । अतएव इस अपने श्राज्य स्वरूपानुगत प्राजापत्यस्वरूप को जानने वाले यजमान के लिए यह आवश्यक नहीं होता कि, वह आहुतिकाल में ऋत्विजों के पास रहे ही रहे । क्यों कि, आज्यसान्निध्य से ही यजमानसान्निध्य # उपस्तरण - शय्या - बिछायत - बिस्तर १६२