Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 151–160
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 151–160
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ६४ - ' ग्रस्थन्वन्तं यदनस्था विभत्तिं ' मन्त्रार्थ का समन्वय ६५ - ' यावानुवै रसस्तावानात्मा ' ६६ - रस, और पारिभाषिक ' श्राज्य ', ६७ - शुक्र, और पारिभापिक ' पृष्ठ ' ६८ -- रसशुक्रात्मक- श्राज्यपृष्ठ के द्वारा वस्तु-स्वरूप का उदय ६६ -- श्रोषधिभुक्ता तत्त्वद्वयी ७० - श्रोषधिशुक्ररूप अग्नि ६० - प्रत्यक्षपृष्ट भूतभाव, और ' अर्थ ' ६७३ ६ ' - ' अर्थ ', और ' पदार्थ ' का पारिभाषिक - समन्वय " ' } ६७२ " 1 ६२ - निरिन्द्रियभावापन्न जड़ पदार्थ ६३ - मेन्द्रियभावापन्न चेतन पदार्थ " " 12 " " " " ७१ - श्रोषधिरसरूप आप ७२ - ' पोह्य तासां रसः ' का तात्त्विक - समन्वय ७३ – ‘ श्रापो ह्य ेतासामात्मा ' श्रुति का अर्थ-समन्त्रय ७४ - ईश्वरशरीरसंस्था के सुप्रसिद्ध पाँच पर्वों का संस्मरण ७५ – पञ्चपर्वात्मक विश्व, और पञ्चपुण्डीरा प्राजापत्या बल्शा ७६ -- पञ्चविध स्वतन्त्र - प्रजापति - विवर्त ७७ -- आदिप्रजापति, और ' भूप्रजापति ' का श्रमेद ७६ - प्रजापति की - ' आत्मा - पदं पुनः पदम् ' रूप संस्था ८० - वस्तुकेन्द्र, और श्रात्मा ८१-- वस्तुपिण्ड, और पदम् ८२ -- वस्तुमण्डल, और पुनः पदम् " ८३- मण्डलानुगत महिमा, और विभूति - शब्द ८४ - पुन: पद की आधारभूमि का संस्मरण 23 ८५ श्रनिरुक्तप्रजापति की सर्वव्याप्ति, और तन्निबन्धन - ' सर्व प्रजापति ' ८६ हृदयावच्छिन्न अणोरणीयान् प्रजापति " " ८७ - पुन: पदावच्छिन्न महतो महीयान् प्रजापति " " ८८ - पुनः पद, और वषट्कार ८६ - ज्ञान - क्रिया - अर्थ - शक्तिधन -- मनः -- प्राण-वाग् - धन - चिदात्मा 37 ६४ - ' क्रिया ' तत्त्व की सर्वव्याप्ति ६५ - नास्ति अस्ति नास्ति भावापन्न क्रियातत्त्व ६६ - क्रियातत्त्व का आधार - निष्क्रिय तत्व ६७- अव्ययात्मक ज्ञानशक्तिघन - मन ६८- अक्षरात्मक क्रियाशक्तिघन प्राण ६६ - क्षरात्मिका - अर्थशक्तिघना - वाक् १०० - मनःप्राणवाङ मय प्रजापति की अभिव्यक्ति १०१ - अभिव्यक्ति, और पदार्थ का व्यक्तीभाव, I १०२ - प्रति व्यक्ति की प्रजापतिरूपता १०३ - प्रजापति की साक्षीरूपता १०४ -- अक्षरप्रधान देवता, और सृष्टिकर्म्म १०५- देवेभ्यश्च जगत्सर्वम् १०६ - सृष्टयधिष्ठात्री देवत्रयी " " १०७ ज्ञानप्रधान ब्रह्मतत्त्व 33 " " " " " 11 } } १०८ - क्रियाप्रधान इन्द्रतत्त्व १०६ -- अर्थप्रधान - विष्णुतत्त्व ११० - क्रिया, तथा भूतसङघ एवं ज्ञानात्मिका प्रतिष्ठा १११ - ज्ञानाधारेण प्रतिष्ठित किया, और अर्थतन्त्र ६७४ " 2 " " " ११२ - ' ब्रह्म नै सर्वस्य प्रतिष्ठा ' का समन्वय ११३ - गतितत्त्व की इन्द्ररूपता " " ११४ - बलकृति, और ऐन्द्रध ६७३ ११५ – सदागतिधर्म्मा वायु, और इन्द्र ११६-- इन्द्र, और वायु की अभिन्नता ११७ -- वाङमय कोशात्मक पाञ्चभौतिक शरीर ११८ - वाचिति के द्वारा पञ्चमहाभूतों की स्वरूप - निष्पत्ति ११ - अन्नब्रह्म, और वागब्रह्म की अभिन्नता १२० - अन्न, और अपतत्त्व के द्वारा पाश्च-भौतिक शरीर का सन्तर्पण " २३
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ची १२१ प्रति का समन्वय - भेदेन ६७४ १२२ -- सूर्य - चन्द्र - श्रग्नि- वाक् - संस्कार १५१ - उकारात्मिका ससङ्गासङ्गा शब्द सृष्टि १५२ - मकारात्मिका शब्दसृष्टि ६७५ संस्मरण पञ्चधा विभक्त पञ्चज्योतिर्विवर्त्त का हविद्रव्य १२३ - पञ्चविध भूतान्न, और आहूतिरूप कोश १२४ - हवि, और हविर्द्धानिरूप अन्न " १२५ विष्णुदेवता 1 और विद्वान " १२६-- अन्नात्मिका अर्थशक्ति, देवाः और विष्णु १२० एका मूर्तिः, और पयो 17 १२८ इन्द्र और विष्णु की प्रतिस्पर्धा ' १२६ - प्रतिस्पर्द्धा से समुत्पन्न - ' वघट्कार १३० रहस्यार्यिका मन्त्र ति वि १३१ मन्त्रस्यनुगामिनी ब्राह्मण अकान्ति और १३२ ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र की 19 त्रिविध साहस्रियों का जन्म १३३ - प्राणमय ब्रह्मा, और वेद साहसी १३४ प्रापोमय विए, धौर लोकसाहसी वाक्साइसी १२५ - बाडमय इन्द्र, और १३६ वेदष्टधिष्ठाता प्राणमय झ विष्णु १३७ - लोकष्टमधिष्ठाता प्रापोमय १३८ प्राष्टपधिष्ठाता वाङ्मय इन्द्र १३६ - प्राकृतिक तत्वत्रयी १५० पञ्चकलोपेता दरप्रकृति १४१ साइलीजयी, और वाक की सर्वव्याप्ति -साहस्री १४२- पुरुश्रवाक् का वितान, और १४२ साहसी और महिमा -६७५ " १५३- ' कादयो मावसानाः स्पर्शाः, और मकार की आत्यन्तिकी स्पर्शरूपता १५४ - नासिकास्थान का संग्रह, और मकार " 39 १५५ - आत्मसृष्टि के त्रिविध - महिमामय विवर्त ६७६ १५६ - ज्ञानमय मन, और तद्रूपा श्रसङ्गा " १५७ - क्रियामय प्राण और तद्रूपा समझा-ससङ्गा-" " सङ्गा - अर्थसृष्टि १५८ मी वाकू, अर्थसृष्टि औरतद्रूपा ससङ्गा 11 37 37 " 1 39 का 79 १५६- प्रकार उकार - मकार अक्षरत्रयी साङ्केतिक पारिमापि समन्वय १६० ' ओम् ' और आत्मप्रजापति १६१ - अर्थ, और ज्ञान की पद्मरूपता १६२ सृष्टिकर्तृस्वधर्म से अनुगत सक्रिय. प्राणतत्व १६३ प्राण और उकार १६४ प्राण का प्राधान्य, और उग्ररूपा -वस्तुस्थिति १६५ - उ - श्अ - अच् - और ' थाक् ' १६६ – माहेश्वरी सृष्टि का संस्मरण १६७-३..म्. और ' वम् ' १६८ ' वम् शहर और वंशर 17 १६६ - वाक्तत्व की महिमामण्डल के रूप में १४५ याग्यापा निदानेन यत् सखी 71 १४४ - महिमा और पटकार १४६ - तस्या एतत् सहस्रं वाच: प्रजातम् १४७-- वाग्वा ग्रस्य स्वो महिमा का १४८ - शब्द, और अर्थ की अभिन्नता संस्मरण १४६ -- प्रसङ्ग - ससङ्गासङ्ग - ससङ्ग - रूपेण शब्द-सृष्टि के त्रिविध महिमा - विवर्त्त १५० प्रकारका शब्दसृष्टि 39 17 परियति १७० - प्राणः श्रपः- वाक् - नाम की तत्त्वत्रयी का वीर १०१ वीरणधम्मं के माध्यम से वेद - लोक - याक्-साइखी त्रयी का महिमामय वितान 39 १७२ - रेन्द्रीवा की पट्काररूप में परिशति ६७७ १७२ - इन्द्र, और वौषट १७४ - अ - उ - अ - अच्, और वौक् 71 19 २४
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१७५ - मनःप्राणगर्भिता वाक् - वौक् १७६ - वौषट्कार, वौषट्, और वषट् १७७ - उक्थरूप मनस्तत्र १७८ - श्रकरूप - प्राणतन्त्र १७६- अशीतिरूप वाक्तन्त्र १८० - प्राण की गतिरूपता १८१ - ' एकविधा ', और ' द्वितीया विधा ' शतपथब्राह्मणं २ खण्ड ६७७ २०३ - लव, और अभिप्लव 29 39 २०४ - सौर प्राणानुबन्धी ३६००० अभिप्लव " " २०५-- ज्योतिगरायुर्घन सूर्य्यनारायण,, २०६ - बृहती मध्यूढस्तपति २०७ - सप्त देबच्छन्द, और अक्षरपरिगणन ६७८ 22 22 २०८- इन्द्रात्मक - सौर बृहतीप्राण २०६ - षट्त्रिंशत् बृहतीसहस्र " " " १८२ - प्राणत्मक गतितत्त्व, और गौ १८३ - गौतत्त्वनिबन्धन अभिप्लवस्तोम १८४ - पृष्ठयस्तोम का संस्मरण २२० श्रायुःसूत्रों का परिगणन २११ - शतायुः पुरुष, और बृहतीप्राण २१२ - महर्षि ताण्ड्य, और ऐतर " " " " * प्रभिप्लव स्वरूप - - दिग्दर्शन २१३ - सम्वत्सर, और श्री रूप अभिप्लव १८५ - अभि- लवन, और सम्मुख प्रवहण १८६ - ' अभिप्लव ' शब्द का निर्वचनात्मक समन्वय १८७ - प्राणात्मक द्रत रस, और अभिप्लव १८८ - सप्तावयवा मर्त्या चिति, और सप्तपुरुष-पुरुषात्मक - पुरुष २१४- बृहती हि सम्बत्सरः ' ६७७ २१५- ' श्री व यशच्छन्दसां बृहती ' २१६ - श्रियां प्रतिष्ठायां तपति " " " " १८६ - सप्तम भाग का ऊर्ध्वप्रतिष्ठित ' श्री ' भाग " १६० - ' श्री ', और अमृत १६१ - ' चत्त्वार श्रात्मा ' का पारिभाषिक समन्वय १६२ - त्रिकास्थिगत स्थिरप्राण, और पुच्छ-प्रतिष्ठा १६३ - पिप्पल - पत्र, और तन्निन्धना सप्तचिति " १६४ - ब्रह्मपुच्छ प्रतिष्ठा " " १६५ - शरीरानुगत प्रतिष्ठाप्राण और शरीर-यष्टि का संतनन १६६ – दशमी अवस्था, और प्रतिष्ठाप्राण का शैथिल्य १६७ - मृतप्राणानुबन्धी शिरोभाग १६८ - श्री: - रसः शिरः १६६ - श्रीः, और श्रभिप्लव २०० - चयनश्रुति का संस्मरण २०१ - इमे वैलोका अभिप्लवाः २०२ - प्रातिवाहकरूप प्लव २१७ - भगवान् याज्ञवल्क्य के शब्दों में बृहती का स्वरूप समन्वय २१ -- सौर बात प्राण का पार्थिवमण्डल के साथ सम्बन्ध २१६ - त्रिंशदक्षरा बृहती २२० - जीवाह्ना जीवाक्षरम् " " " " " 29 19 29 ६७६ " " २२१ - श्रीरूप अभिप्लव का अधिष्ठाता 17 23 २२२ - बृहतीविज्ञान का संस्मरण २२३ - बार्हतप्राण का सम्बन्ध 17 " ६७८ " " 33 " " २२४ - सौर - मनोतात्रयी २२५ – पार्थिव - अभिप्लविकस्तोम, और ह * पृष्ठव स्वरूप - दिग्दर्शन २२६ - प्राणात्मक रस का रश्मिवत् प्रसार, और अभिप्लवस्तोम २२७ - प्राणात्मक रस का मण्डलवत् प्रसार, और २२८ - साममण्डलानुगता साहस्री, और पृष्ट्य-स्तोम २२६- एतानि खलु सामानि यत् पृष्ठानि " " " " " " 23 " २५
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विषयसूची २३० - श्री पृष्ठानि ६७६ २६०-- पञ्चपर्वात्मक विश्व की प्राकृतता ६८१ २३१ - पृष्ठ्यस्तोम के आधार पर पार्थिव देव-२६१ - बोडशी प्रजापतिरूप पुरुष ताओं का स्वर्लोकगमन ६८० २३२ -- वाङमय प्राण की गौरूपता " २३३-३० अंशात्मिका राशि २३४ - राशिरूप अहर्गण २३५ -- एकसहस्र गौतत्व, और ३३ अहर्गण २३६- १८ गौसमष्टि, और प्रजापति " " " " २६२ -- प्रकृतिपञ्चक का आलम्बन पुरुष २६३ - श्रमृत - मृत्यु - निबन्धन -वविध शुक्रविव २६४ - पुरुष, और प्रकृति का समन्वय, एवं तन्मूलक प्रजासर्ग २६ -- श्रमृत - ब्रह्म - शुक्र - त्रयी २६६ - पुरुष - प्रकृति - विकृति - त्रयी 33 " " II 23 २३७ -- चतुस्त्रिंशः प्रजापतिः २३८ - पिण्डहृदयस्था अहर्गणत्रयी २३ -- हृद्याक्षस्त्रयी, और अहर्गणत्रयी २४० - त्रिवृत् - पञ्चदशादि स्तोमों की स्वरूप-निष्पत्ति २४१ - महिमामण्डल की प्रतिष्ठा, और सप्तदश अहर्गण २४२ - सप्तदशो वै प्रजापतिः । २४३- अनिरुक्तप्रजापति २४४ - सर्वप्रजापति २४५ -- उद्गीथप्रजापति 33 २६७ - शुक्रदृष्टि, और प्रजापति की विश्वरूपता 29 31 39 ६८० 31 33 33 22 " 23 ६८१ 97 37 33 २६८- ब्रह्मदृष्टि और प्रजापति का विश्वकर्तृत्त्व " २६६ -- श्रमृतदृष्टि और प्रजापति का विश्वा-लम्बनत्त्व २७० -- मनः - प्राण - वाङमय पुरुष की विश्वा-लम्बनता २७१ - सृष्टिसाक्षी - पुरुष २७२ - वाङ मय - आापोमय - प्राणवाङमय मनः प्राण-वाङमय व्यवहारों की विभिन्नता तात्त्विक स्वरूप - समन्वय " का 11 २७३ - अमृतात्मा की पूर्णविकासभूमि चितिधर्म्मा-वच्छिन्न सू २७४ – सौरचितिमूलक चिदात्मव्यवहार २७५ - ' सूर्य्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' २७६ -- ' नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः ' २७७ - वाचीमा विश्वाभुवनान्यर्पिता २७८ न्यो वोगवेदं सर्वम् २७६ षडविध शुक्रों का विश्वपर्वो में क्रमिक विभाजन २८० - वाकतत्त्व की वेदाग्निरूपता २८१ – सत्याग्निरूप- सार्वया जुषाग्नि २८२ - प्राणाग्निरूप ब्रह्माग्नि २८३ -- अपतत्त्व, और ऋताग्नि 31 " 29 39 ६८२ 39 33 २४६ - उच्च - गीश्च - थंच, और उद्गीथ 13 २४७ - पृष्ठ्यस्तोम की षडहरूपता २४८ - स्तोमसमष्टिरूप - वघट कार २४६ -- वघट का रस्वरूपेतिवृत्तविराम २५० - वपट्कारानुगत स्तोमों का युग्म, और श्रयुग्म - स्वरूप २५१ - पार्थिवपिण्ड से विनिर्गत शुक्रतत्त्व २५२ - वाक - प्रापः - अग्नि - रूपा शुक्रत्रयी २५३ - वे'दात्मक - वाक्शुक्र २५४ - सोमात्मक- आपः शुक २५.५ - भूपिण्डानुगत अग्निपृष्ट २५६-- भूपिण्डानुगत सोमपृष्ट २५७ - भपिण्डानुगत वेदपृष्ठ २५८ - सुप्रसिद्ध पाँच पुर, और विश्व २५६ - पाँचों पुरों का दहरोत्तरसम्बन्ध " २८ -ऋताग्नि की मुब्रह्माग्निरूपता 29 २८५ - देवाग्नि का संस्मरण २ = ६ - मर्त्य वाक्तत्त्व, और भतानि २६ 33
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड २८७ -- अमृत - मर्त्य - शुक्रषटक् के विभाजक सूर्य्य-नारायण २८८ - ' निवेशयन्नमृतं, मर्त्यञ्च २८६- श्रात्मा, पिण्ड, देवता, प्रकृति, विकृति, भूत - भेद निबन्धन- विश्वपर्वों के नाम भेद २६० -- अभिप्लव -- पृष्ठ - वाक् -- शुक्र -- ब्रह्म -- आदि शब्दों के विभिन्नार्थों से अनुप्राणित विरोधाभास २६१-- तालिका के माध्यम से विभिन्न नाम-व्यवहार - समन्वय २६२ - दइरोत्तरानुगत विश्वपर्व २६३ -स्वयम्भ का प्राणमयत्व ६८५ ३१३- आधार, और आयतन 19 ६८३ ३१४- वसुधानकोश, और ग्रावपन 22 " २६४ -- परमेष्ठी का प्राणमयत्त्व, और ग्रापोमयत्त्व " २६५ - सूर्य का प्राण- श्रापः - वाङ ्ममयत्त्व २६६ -- चन्द्रमा का प्रारण आपः वाक -अन्नमयत्त्व २६७ -- भूपिण्ड का प्राण - आापः - वाक् - अन्न-अन्नादमयत्त्व २६८ - शुक्रापेक्षया स्वयम्भू का वाङ् मयत्त्व २६६ - परमेष्ठी का वाक् - श्रापोमयत्त्व ३०० - सूर्य का वाक - अग्निमयत्त्व ३०१ - अग्नि - अप् - वाक् - पृष्ठत्रयी समन्त्रय ३१५ – उख्यापृथिवी, और आपन ३१६ - यं वै लोक वपनं महत् ३१७ - आवपनात्मक खं ब्रह्म ३१८ - अन्नादब्रह्म की स्वरूपमीमांसा ३१६ - मुख्य आत्मा, और अन्नाद २० - अन्नादाग्नि के तीन विव ३२१ - खं ब्रह्म, और आवपन ब्रह्म ३०२ - कं ब्रह्म, और अन्नादब्रह्म " ३२३ - रं ब्रह्म, और अन्नब्रह्म " ३२४ - समष्टि, और ' शंब्रह्म ' " ६५४ " का स्वरूप " ३०२ - यज्ञपृष्ठ - ब्रह्मपृष्ठ - पारावतपृष्ठ - त्रयी ३०३ - अमृतानि शुक्राणि त्रीणि ३०४ - मर्त्यानि शुक्राणि त्रीणि ३०५ – सर्वान्तभूता पृथिवी ३०६ - द्यावापृथिव्य - श्यैत- नौस ३०७ - अग्निरहस्यानुगता विज्ञेया तत्त्वत्रयी ३०८ - श्रावपन अन्नाद अन्न त्रयी ३०६ - एकतः आधारभूमि, और श्रायतन ३१०- सर्वतः श्राधारभृमि, और श्रावपन ३११ - तद्ब्रह्मायतनं - महत् ३१२ - मनो वा श्रायतनम् ३२५ - समष्टि, और ' सर्वम् ' ३२६ - श्राकाश, और शुन - इन्द्र ३२७ - इन्द्रप्राण, और आकाश ३२८-- ' शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रम् ' ३२ - सांख्यानुगता भ्रान्ति ३३० - तत्त्वचतुष्टयी का दिग्दर्शन ३३१-- श्राकाशतत्त्वानुगता महती भ्रान्ति " ३३२ - भारतीय- पञ्चतत्त्ववाद " ३३३ - मारूप - श्राकाशात्मा " " 39 ६८५ २७ " " 29 23 " " 11 " " 33 " 19 " ६८६ ३३४- वाक्तत्त्व की आकाशरूपता ३३४- अब्रू अन्न से उभयतः परिगृहीत अग्नितत्त्व ३३५ -- अग्नित्रयी, और पारमेष्ठ्यायः ३३६ - परिलेख के द्वारा परमाकाश - अन्नब्रह्म-अन्नादब्रह्म - अन्नब्रह्म पुराणाकाश - पञ्चक का समन्वय ३३७ - हृदय और चान्द्र मन ३३८ - वाक् - प्राण चक्षु - रूपा अग्नित्रयी ३३६ - अध्यात्म, और अधिदैवत का सम-समतुलन " " " ३४०-- परिलेख के द्वारा अध्यात्म का समन्वय ६८७ ३४१ - मानवानुगता द्यावापृथिवी 22
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१४२ भू और पृथिवी ३४३ - पर्त्य भूपिण्ड, एवं अमृता पृथिवी २४४ पार्थिवस्तीवेलीक्य, और महिमा - पृथिवी २४५ तिखो वा इमाः पृथिव्य का तात्विक समन्वय ३४६ - यज्ञस्वरूप- समन्वय ३४७ - पारमेष्ठ्य सोम की आहुति, और यज्ञ ३४८८ - अग्निपृष्ठात्मक यज्ञपृष्ठ ३४६ - यज्ञमण्डल में प्रतिष्ठित यज्ञियदेवता ३५० मनोवा शियासा २५१-२२ पर्यन्त व्याप्त यज्ञाग्नि २५२- ग्निवितानात्मक रथन्तरसाम ३५.३ - एकविंशो वै स्वर्गो लोकः ३५४ - स्वरहर्देवाः सूर्यः २५५ असो वा आदित्य रथः ३५६ - असो वा आदित्यो देवमधु ३५७ र सन्तं रथ इत्याचक्षे २५८ अग्निरी श्रीर रचन्तरसाम विषयसूची ६८० | २७२- रथन्तरं तद्रूपम् 31 ३७३ - तृतीय वाकपृष्ठात्मक वेदपृष्ठ २७४ - समाप्त - भाव और शक्वरी २७५ - तक्रीया शक्यरीत्य २७६ - लोहित रथन्तर साम " २७७- कृष्ण पान " ३७८ - शुक्ल - शाक्वरसाम 19 .. ६७६. - मर्त्य- शुक्रत्रयी का स्वरूपदिग्दर्शन | ३८० - अग्निस्तर का स्वरूप परिचय ३ = १ –कृष्णस्तरात्मक श्रापः स्तर ३८२ - भस्मात्मक - वाकस्तर ३८३ वाकस्तरात्मक विभूतिस्तर ३८ प्रतिवस्तु मे भुक्ला स्तरत्रयी ३८२- भूपिएड, और भूमहिमा ३८६ भूमहिमा और मही 1 ३८७ पार्थिव संस्था स्वरूप- दिगदर्शन -सावित्राग्नि " ३८८-- सौर मण्डलानुगत - स " ३८ - सर- श्रपः पृष्ठ ६५६ 39 " : " 13 " " " 19 " " " " २५६ श्रग्नि की रसास्थ और श्रुति ३६० - श्रग्नि की रसरूपता ३६१ - वायु की रमतररूपता ३६१ - आदित्य की रसमरूपता, और रथन्तर-साम ३६३ - लोहितपृष्ठात्मक अग्निपृष्ठ " ३६० - सीर - वाक पृष्ठ २ ९ १+ ज्योतिर्मय पदार्थों की स्वरूपपरिभाषा " ३६२ – स्वाती नीलकण्ठ - पशुपति, चित्रा आदि की सूर्यरूपता ६६० ३६३ -- परज्योतिर्म्मय पदार्थों की स्वरूपपरिभाषा २६४ - चन्द्रमा और परज्योति ३ ९.५ - रूपम्योतिर्मयी पृथिवी २६४ पृथ्वि " -३६५ द्वितीय पृष्ठ और अर्णवसमुद्र ६८८ ३६.६ - स्वज्योतिर्म्मय ३६६ - सागराम्बरा पृथिवी ३६७ - अपतत्त्वानुगत गौतत्त्व बृहत्साम २६८-सोमोलोगी I II ३६६ - विष्णुदेवतामय गौतत्त्व, श्रौर मन्त्र-७० राजा २७१ मिरा और आम पार्थिव साम का वैरूपाव यद्गौ " " ३६७ - चान्द्र - राजनसाम सूर्य और तन्निबन्धन ३६८- यद्भरवं - सद्धन्तरं यद्दी - सहत् ३६६ विश्वद्वृत्त, और बृहत्साम 29 " ४००- बृहती छन्द, और बृहत् साम ४०१ पृथिवी का परिभ्रमण और सूर्य का उदयास्तमन " " २८
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शपथब्राह्मण २ खण्ड ४०२ -- सूर्य्यानुगत स्थिरधर्म्म, एवं तन्निबन्धन श्रौतस्मार्त्त - वचन ४०३ -- बृहतीछन्दोऽनुगत सू ४०४- सौर बृहत्साम, और बृहद्भाव ४०५ - सौर- बृहत्साम की महती व्याप्ति ४०६ - सौराग्निसामात्मक - बृहत् साम ४०७ - सौर- श्रापः सामात्मक- वैराजसाम ४०८ -- सौर - वाक - सामात्मक- रवतसाम ४०६ -- दृष्टि - स्थिति - सृष्टि - मूला सृष्टिविद्या ४१० -- सौरसंस्था, और तन्निबन्धन शुक्रषट्क ४११ -- सौर - सामत्रयी ४१२ - पार्थिवसामत्रयी, और सौर सामत्रयी का पारस्परिक प्रतिमानसम्बन्ध ४१३ -- यद्वै रथन्तरं ं , तद्द्वैरूपम् ४१४ - यद्वृहत्, तद्वं राजम् ६६ ९ " ६६२ 33 " 23 33 ६६३ " " " " " ४३१ -- देवताओं का प्रथम श्रोषधिसम ४३२ -- पारमेष्ठ्यलोक की पितृलोकता ४३३ - त्रिलोको नैं पितरः ४३४ -- पारावतपृष्ठ, और जगतीछन्द ४३५ - श्रोषधि, और जगती ४३६ · -संरेवतीर्जगतीभिः ४३७ – यज्ञोदर्क - संस्मरण ४३८ - दैवात्मा, और स्वर्गावाप्ति ४३६ - ॠक - यजुः साम - तत्त्वत्रयी से सम्पन्न-यज्ञियदैवात्मा का स्तोमानुबन्धी पारिभा विक - स्वरूप ६ ४४० -- मानुषात्मा में प्रतिष्ठित दैवात्मा ४४१ - त्रिणाचिकेतस्वर्गप्रापक दैवात्मा ४४२ - क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोके वसन्ति ४४३ - यज्ञात्मा का मूलोपादान द्रव्य पुरोडाश ४४४-- पिष्टद्रव्य का दैवात्मप्रजननत्त्व ४४५ - अप्तत्त्वानुबन्धी - जाया - धारा श्रापः तत्त्व-त्रयी ४४६ -- वैकारिकी सृष्टि, और अपतत्त्व ४४७ - अप् एव ससर्जादौ ४४८ - श्रपतत्त्व के द्वारा स्वयम्भू की अण्डरूप में परिणति ४४ - श्रप् तत्त्व के जायाधर्म का दिग्दर्शन ४१५ -- यद्रथन्तरं ं, तच्छाक्वरम् ४१६ -- यद्वृहत्, तद्रैवतम् ४१७ - वैरूप, और बृहत् का अतिमान 19 ४१८ - वैरान, और वैरूप का अतिमान " " ४१६ -- शाक्वर, और रैवत का अतिमान " ४२०-- प्रतिमान सम्बन्ध, और ऐतेरयश्रति " ४२१ - परिलेख के माध्यम से सामातिमान का स्वरूप स्पष्टीकरण ६६४-६५-६६ ४२२ -- स्तोमानुगत युग्म, और अयुग्मभाव ४२३ - युग्मस्तोम, और अयुग्मस्तोमों का पार-भाषिक अक्षरसंख्यानिबन्धन - स्वरूप - सम-न्वय ४२४ - छन्दोमा स्तोम का संस्मरण ४२५ - श्रस्तोमा वा एते यच्छन्दोमा ः ४२६ - वतसाम, और परमेष्ठी ४२७ -- परमेष्ठी, और रेवती - श्रापः ४२ = - श्राप:, और रेवती ४२६ – रेवती श्रापः, और जागत् - श्रोपधियाँ ४३० - पारमेष्ट्यलोक की पितृलोकता ६६७ ४५०--आपः धम्म का " " ४५१-धारा धर्म का " " 99 " 03 " २६ ४५२ -- श्रृप्तत्त्व की सर्वरूपता का समन्वय ४५३- पूतत्व के स्वरूपधम्मों का विश्लेषक गोपथब्राह्मण ४५४ -- प्रजनन - भावप्राप्त्यर्थ पुरोडाश में अप का सम्मिश्रण ४५५ -- एवं वै तत् संयौति ४५६ – वस्तुस्वरूपसंसाधक आाज्य, और पृष्ठ ४५७-- श्रात्मा, और - पुर ४५८- प्रथमज अनस्थाभाव ६
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४५६ - द्वितीयज अस्थिमद्भाव ४६० -- अनस्थाभाव, और श्राज्य ४६ ९ अरिथमद्भाव और पृष्ठ ४६२ -- अद्ध मावात्मक श्राज्यद्रव्य ४६४-- एवम् ष श्रात्मा यज्ञस्य सन्धीयते ४६५ पृथिवीलोक और दधिस्थान ४६६ - अन्तरिक्ष लोक, और घृतस्थान ४६७ - लोक, और मधुस्थान ४६८ - तेजी व घृतम् ४६६ - वरुण से प्रतिमूच्छित श्रग्नि की वृतरूपता II ४७० - वरुण से प्रतिमूति इन्द्र की तैलरूपता ४७१-वरुणदेवता ४७२- अग्निस्वरूप का दमन धीर पृत की अभिव्यक्ति ४७२- मृतावृष्टिवल और तत्सम्बन्ध में मन्त्रति ४७४ - वृष्टिजल की घृतरूपता ४७५ मृतरूपा श्रापोमयी दृष्टि और लोकवि-दम्वी ४७६ वर्षा, और तज्जनित ऊर ४७७ - यावदुद्वित्तं तावदात्मा ४७८ - वृष्टि, ऊस, और तत्सम्बन्ध में ब्राह्मण-श्रुति ४७६- श्रान्तरिक्ष्य पृतानुगता ऊष्मा और वृष्टि विषयसूची ६६६ 1 ७०० ४८. हविद्रव्य का कुन पेषण, और प्राण-वियोगात्मिका हिंसा ४६६ पुरोवाश की निर्जीवता ४६० जी ने देवानां विरमृतममृतानाम् ४६१- पुरोडाश में जीवनसत्ता का प्रधान ४६२- भूमाभाव से अनुप्राणित अन्नरस ७०१ 19 " " 39 ,, 33 ७०० ४६३ श्रधि अन्न का सीमाभाव " ४६४- पुरोडाशद्रव्य का आत्यन्तिक सीमाभाव 39 19 31 ४६.५ अन्नरस की अल्पता में परिणति ४६६ पुरोडाश में प्रचन के द्वारा भूमाभाव का संस्थापन ४६७ - उरु ते यज्ञपतिः प्रथताम् ४६. - भूमाभावानुगत सीमाबन्धन VEE निःसीन भूमाव और मृत्यु ५०० - विश्वातीत भूमाभाव ५०१ - विश्वानुगता अपेक्षिता भूमा " 37 " " ५०२ - श्रनृतसंहित मनुष्य के श्रनृतभावापन्न संकल्प ७०२ , I ५०३ - मानुषी - बुद्धि का दम्भ, और शास्त्रा-देशों की उपेक्षा ५०४ - मानव की अस्मिता और तद्द्द्वारा " तद्विनाश " ४८०- पुनरुद्वासयति ऊर्जेत्या ४८१ राजा - मह - वि - रूपा सोमचतुर पी 31 ४८२- राजासोम, और राजप ४८३ - वाजसोम, और वाजपेय ४८४- ग्रहसोम और ब्रहृयाग ७०१ " ४८८५ - हविः सोम, और हविर्याग ४७६ - ब्रह्मौदन, एवं प्रवर्ग्य- मेदभिन्न यज्ञ ४६७ - घम्र्मोऽसीति, यज्ञमेवैतत् करोति ५०५ सत्यसंदित प्राप्तपुरुष और तहचनेषु प्रामाण्यबुद्धि ५०६ - शास्त्रीय श्रादेश, श्रौर गीतावचन ५०७ प्रकृतस्थल और शास्त्रीय आदेश -५०८ स्तम्यत्रैलोक्य में व्याप्त विराट्पुरुष " ५० ९ अदितिधिनी का संस्मरण " " " ३० ५१० - सौर- पार्थिव - प्राण - समष्टि और अश्वप ५११ श्वमूर्ति विराट्पुरुष ५१२ कामपूरक विराट्पुरुष ५१२- त्रिपादूर्ध्व उदैपुरुषः - रूप विरा 19 17 "
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ५१४- मानवीय कामनाओं की इयत्ता और अश्वशफात्मक परिमाण ५१७- श्रात्मानुकूल - प्रथनक ७०३ ७०२ ५१८ - प्रथनकर्म्म, और भूमाभाव की प्राप्ति " } ५१५ - अश्वशक मात्रा, और पुरोडाश का प्रथन " ५१६- अश्वशकमात्रा के सम्बन्ध में भगवान् याज्ञवल्क्य के द्वारा नीरक्षीरविबेक ५२६ - यावन्तमेव स्वयं मनसा न सत्रा पृथु मन्येत, एवं कुर्य्यात् इदि - प्रथमकाण्डे - द्वितीयाध्याये - द्वितीयं ब्राह्मणम् इति - प्रथमप्रपाठके - षष्ठं - ब्राह्मणम् प्रथमप्रपाठकश्चात्रोपरतः इति -- पिष्टेनोदकमिश्रितेन -- पुरोडाशसम्पादनम् ११ ३१
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श्रीः अथ शतपथब्राह्मरण- हिन्दी - प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्याये - तृतीयं ब्राह्मणम् ( द्वितीय - प्रपाठकश्चोपक्रान्तः ) द्वितीय - प्रपाठके च प्रथमं ब्राह्मणम् " पात्री निर्णेजनम् - पुरोडाशमीमांसया - समन्वितम् ” नामक क्रमप्राप्त १२ वें कर्म्म के विज्ञानभाष्य की विषय स्मारकसूची ( पृष्ठ सं ० ७०४ से ७६७ ) १- प्रथमकाण्डान्तर्गत- द्वितीयाध्यायानुगत--प्रथम ब्राह्मण मूल ) तृतीयब्राह्मण, तथा द्वितीय प्रपाठकानुगत २- मुल त्राह्मण का अक्षरार्थसमन्वयात्मक-३ - विज्ञानभाष्योपक्रम ४- पात्रीनिर्णेजनकर्म, और पुरोडाश ५- पात्रीनिर्णेजनकर्मेतिकर्त्तव्यता अनुवाद ६ - अध्वर्युकृत निनयनक ७- यजमानकृत प्रतिनिनयन क ८ श्रोदनपरिपाकानुगत श्रपणाग्नि ( दक्षि-६ - यज्ञसंसाधिका पशुसम्पत्ति १०- पशु के मेघभाग की यज्ञियता नाग्नि ) ७०४ ७०५ ७०८ " 37 29 29 77 ११- मेघार्थपशु का श्रालम्बन ०२ - श्रालम्भन विज्ञान की स्वरूप दिशा, १३ - आप्त्या - दक्षिणा - आलम्भन - मेद मिना विज्ञानत्रयी, श्रीर प्रकृतब्राह्मण १४- ' चतुर्द्धा विहितो ह वा अप्रे श्रग्निरास ' इत्यादि श्रनुगमश्रुति का संस्मरण १५ - नियतार्थप्रतिपादक - निगमवचन १६ - अन्वर्थार्थप्रतिपादक - अनुगमवचन १७ - चतुर्विध अग्निदेव का संस्मरण १८- पुरुषाग्नि, प्रकृत्याग्नि, विराडग्नि, सम्व-त्सराग्नि - भेदेन चतुर्द्धा विभक्त अग्नि १६ - ब्रह्माग्नि, सुब्रह्माग्नि, शुक्राग्नि, भूताग्नि, भेदेन चतुर्द्धा विभक्त अग्नि ७०६ 29 " " " ७१. ३२