Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 211–220

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 211–220

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शतपथब्राह्मण २ लगत ८० - हृदयम, और अक्षरत्रयी ८४१ - शक्तित्रयो का रहस्यात्मक कार्य्य - समन्वय ८४२ - ' मध्ये वामनमासीनं सर्वे देवा उपासते ' का रहस्यात्मक समन्वय ८४३ - प्रपानाधिष्ठाता ब्रह्मा ८४४ - प्राण।धिष्ठाता इन्द्र ८४५ - व्यानमूर्ति वामन विष्णु ८४६ - विष्णुदेवता, और सृष्टिपालन ८४७ ओषधि वनस्पति से समन्विता शक्तित्रयी - श्वत्थाय नमो मनः ८४६ - पानी मिट्टी का सम्मिश्रण, और अङ्क र का ऊर्ध्वं प्ररोहरण ८५० -- नाड्यो वायुसंयोगादारोहणम् ८५१ - ' अङ्क ुर ' की स्वरूप परिभाषा ८५२ - महद्ब्रह्मानुगतची जायतन ८५३ - आकृति -प्रकृति - अहङ्क ति त्रयीका अधि ष्ठाता महद्ब्रह्म ६३६ 31 " " 9 " " " 33 ६३७ ८५४ - मूलस्थ विष्णु प्राण का वेदि में समावेश " " ८५५ -- ' सोऽयं विष्णुलन: ' का समन्वय " 1 ८५६ - ग्राख्यान के श्राधिदैविक रहस्य का उपराम इत्याधिदैविक रहस्यम् " 19 " ८६४- अन्न - वस्त्र की महती चिन्ता से श्रापाद-मस्तक संत्रस्त्र राष्ट्रीय, किन्तु भावुक भार -तीय मानव के भारतीय प्राच्य सहित्य के प्रति भ्रान्तिपूर्ण उद्गार ८६५ - उपयोगितावाद का महान् व्यामोहन, और तत्समाधान - प्रयास ८६६ - यज्ञियभू - प्रदेश का स्वरूप - समन्वय ८६७ - सस्यश्यामला - जीवनीयरसप्रदात्री - उपयुक्ता भूमिका संस्मरण ८६८ - ' अधिक अन्न उपजाओ ' का उदात्त उद्घोष, और तत्सम्बन्ध में किञ्चिदिव आवेदन ८६६ - भूप्रदेश की उर्वराशक्ति ८७०-- उर्वराशक्ति का उत्पीड़न ८७१ -- भूप्रदेशोत्पीडनानुगता अन्नबहुलता का ६३८ 27 ६३६ नग्नचित्रण, तत्सम्बन्ध में भारतीय दृष्टिकोण 99 ८७२ -- मधु प्राण से वश्चित्ता आज की श्रोषधि-वनस्पतियाँ ८७३ - योषधियों का रहस्यात्मक उत्तरमूल, और मधुप्रवर्तक विष्णुप्राण ८७४ - आज की कृषि पद्धति, और विष्णुरूप यज्ञियप्राण का तद्द्वारा श्रभिभव ८७५ -- शरीरात् शरीरम् - रू श्रात्मप्रतिष्ठाण्या आज की उत्पादनशक्ति * पद्धत्यनुगत सन्दर्भ - समन्वय ८७६ - श्रात्मान्नसम्पत्ति का अत्यन्ताभाव ८७- भौमदेवताओं ( मनुष्यदेवताओं ) का परीक्षण, और यज्ञविद्या का श्राविष्कार ६३८ -- ' तं खनन्त इवान्वीषुः ' = ५६ -- वेदिपरिग्रह का संस्मरण ८७७-- यातयामभावात्मिका " 2 " " " " " " " ओषधि -- वन-स्पतियाँ ८७८ - भूतभार का महान् व्यामोहन " " " ८७६ -- यज्ञिय - भूतान्न " " " " ८८०-- ' यज्ञशिष्टा शिम: सन्तु ' की श्रात्यन्तिक-८६० - सुक्ष्मा चासि शिवा चासि का संस्मरण " उपेक्षा ८६१- दक्षिणपरिग्रहेतिकर्त्तव्यता का समन्वय ८६२ -- पश्चिमपरिग्रहेतिकत्तव्यता का समन्वय ८६३ - उत्तरपरिग्रहेतिकर्तव्यता का समन्वय ८८१-- यज्ञियान्न का अनुराग ,, " " ८८२ -- यज्ञिया वै माषाः " " " } ८८३ - लशुन " " - पलाण्ड गृञ्जनादि - की अयशियता ८३

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विषयसूची ८८४- धर्मशास्त्रानुबन्ध ८८५ यज्ञप्राणानुबन्धी मधुमय ऊर ८८७ - वैदिक शब्दों की पारिभाषिकी रहस्यपूर्णता ८८७ - ज्या धरा धरित्री- भूः - भूमिः श्रादि पारि-भाषिक शब्दों का संस्मरण पदन्यज्ञियप्रक्रिया, और ऋषिवचन - यज्ञियप्रक्रिया, और देवात्मा ९००- ' हिरण्यशकलं निधाय ' का वैज्ञानिक-समन्वय ६०१ - श्रनतिप्रश्न का संस्मरण, और तत्समा-धान - प्रयास ६०२ -- अस्थि और अनस्थि - भावों का श्राध्या-हिमक ज्ञानुचन्धी पारिभाषिक समन्वय " ६०२ - भूपिण्ड की स्वरूप निर्माण प्रक्रिया ६०४ – ऋतधर्म्मा - प्रतिष्ठाशून्य - अप् में ऋत-धर्मा प्रतिष्ठाशून्य ही वायु का प्रवेश ६०५ - वायुप्रवेशात् अप् की जुबुद्रूप में परिणति ६०६ - भूपिएड की जन्मदात्री मूलप्रक्रिया 31 ६०७- तेजः संयोग से चुद्बुदावच्छिन्न पानी की ' फेन ' रूप में परिणति ६०८ - फेन की क्रमशः मृत् - सिकता- शर्करा-अय: -हरण्य - रूप में परिणति ६०६ - धुतिलक्षण प्रतिष्ठागुण, और भूमि ६१० - अतुलितभारसहत्त्व, और सुक्ष्मा ६११ - दमा - श्रौर सर्व क्षमते ६१२ - हल के द्वारा श्रधिमूलका संस्पर्श ६१३ - विष्णुतेजोमय प्रतिष्ठाप्राणात्मक ' दमा ' भाव ६१४ - भूपिण्ड का ' सुबदा ' भाव १५ - भूपिण्ड का ' शिवा'- भाव II " " } 13 " " " III ६२० यज्ञिय प्रकारों का अन्धानुप्रकरण २१- इमामेवैतत् पृथिवीं संविध रसवर्ती - उपजी-वनीयामकुर्वत, इत्यादि ब्राह्मणश्र ुति का समन्वय ६२२ - दक्षिणाग्नि के द्वारा परिपाक ६२३ – परिपाकानुगत - मसृणधर्म ६२४ - मृत्तिका में रस, और बल का प्रधान ६२५ - प्राणरूप विष्णु का छन्दों से परिग्रहण, और घटपरिम ६२६ - यज्ञसम्पत् का संग्रह " " ६४१ ६२७ - लोकी - परिग्रहत्रयी ६२८ - भूतप्रधाना लोकत्रयी ६२६ - प्राण प्रधाना - लोकी - त्रयी ६४२६२६ - व्याहृतिषट् क, और लोकपरिमत्रयी ६३० - व्याहृतिघटक और लोकी परिग्रहत्रयी ६३१ - द्वादश ( १२ ) व्याहृतियाँ ६३२- द्वादशव्याहृतिपरिलेख: ,, 17 ६४४ ६३३ - वेदि का पश्चिम भाग, और तैत्तिरीयमत " ६२४ - याज्ञवल्क्य के द्वारा व्यामपरिमाण का विरोध, और, विज्ञानसम्मत परिमाण का संस्थापन " 19 " " ६३५ - परिमाणागला की अनाश्यकता ६३६ - श्राधिदैविकयज्ञ से समतुलित पिण्डब्रह्म " " ६३७ – यज्ञो वै पुरुषः " ६३८ - पुरुषो वै यज्ञः " ६३६ - प्राकृतिक यज्ञानुगत श्रधिभौतिक यज्ञ " 7 79 ६४० - पुरुषस्थानीय यज्ञ ६४१ - स्त्री स्थानीया बेदि ६४२- स्त्री के प्राकृतिक सौन्दर्य्यं की स्वरूप-मीमांसा १६४३ - वेदि सौन्दर्य का संग्रह ६४५ - अभिरूप - सौन्दर्य्यं से समन्विता नारी, और ११६ - भूपिण्ड का ' स्योना ' भाव 11 ६१७ - उर्जस्वती - पृथिवी ६४२ ६४४ - श्रभिरूप्य - सौन्दर्य्य १८- पयस्वती पृथिवी } } ६१६ - ऋद्धि वृद्धि तुष्टि - प्रद - प्रकारों की उपेक्षा " 1 चतुर्विध रागभावों से समन्वित रतिप्रम 19

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६४६ - रूप सौन्दर्य्यं के अधिष्ठाता इन्द्र ६४७ - अभिरूपसौन्दर्य्यं के अधिष्ठाता त्वष्टा ६४६ - वर्णरूपाधिष्ठाता इन्द्र ६४६- श्राकाररूपाधिष्ठाता त्वष्टा शपपथब्राह्मण २ खण्ड ६४५ | ६७४ - अभिरूपसौन्दर्य्य, और विशिष्ट - प्रजनन-" 1 " ध ६४६ ६७५ - श्रभिरूपसौन्दर्य्यगुणान्विता यज्ञिया वेदि ६४७ 11 ६७६- प्राक्प्रवणा वेदि ६५० - वर्णरूपात्मक रूपसौन्दर्य का पारिभाषिक ६७७ - उदकप्रवणा वेदि " " समन्वय ६४६ ६.७८ - रेतोमयी भूतसृष्टि " ६५१ - श्राकार रूपात्मिका अभिरूपता " 1 ६७६ - प्राणमयी देवसृष्टि ६५२ - वयोनाधात्मक छन्द्र, और आकार " ६५३ - श्राकार का श्राधारत्व ६८० - चन्द्रमसाद्रेतो तव श्रामृतम् ६८१ - चन्द्रमा और शुक्रात्मकरस 11 " १५४ - कारित का प्रवेयरव 11 ६८२ - प्राचीदिक, और देवदेवता " " 1 " " ५५ - श्रभिरूपसौन्दर्य की प्रमुखता ६५६ - वर्णसौन्दर्य्यं का सौन्दर्य्यं के मापदण्ड में अधिकार १५७ - श्राकाररूपात्मिका श्रमरूपता ६५८- पदार्थ के आकार का समन्वय ६५६ श्रपासनिक वचन का संस्मरण ६६० - प्रजनन का मूलाधारतत्त्व ६३१ - वर्णरूपात्मक ऐन्द्र - रूपसौन्दर्य का गौणत्व ६६२ - श्राकाररूपात्मकत्वाष्ट्र - अभिरूपसौन्दर्य्य का प्रधानत्त्व ६६३ - प्रतिमाओं के उभयात्मक सौन्दर्य में तारतम्य ६६४ - चित्रात्मक शिल्प का सौन्दर्य्य ६६५ यशपुरुषरूप वृषा की पत्नीरूपा योषा, और वेदि ६६६ - पश्चाद्वरीयसी योषा ६४६ " ६८३ - उत्तरादिक, और मानव ६८४ - दक्षिणप्रवणता का निरोध ६८५ - याम्या दक्षिणदिक ६८६ - ददाद्यमोऽवसानं पृथिव्याः ६८७ - यमो वै श्रवसानस्येष्टे " " " 1 11 " 1 ) 29 ६- नोदी चीन शिराः शयीत " 13 ६८६- वास्तुशास्त्र, श्रीर दक्षिण दिशानुगत द्वारादि का निरोध " ६६.० - युगधर्म का प्रभाव, और प्रकृतिसिद्धा शास्त्रीय मर्यादाओं की उपेक्षा " ६६१ - वेदिप्रदेश की उन्नतता " 39 ९ ६२ - पुरीषभाग, और पशुसम्पत्ति ६६३ - पशु, श्रर पशुपति 21 ६६४ - श्राधिभौतिकयश की प्रकृति जगत् से अनुरूपता ६६५ - प्रतिमाज्जैन - कम्मोपक्रम प्रतिमार्ज्जन कम्मोंपपत्तिः ६६६ - ' स्पय ' नामक यज्ञायुष से उत्पाटित मृद्भाग का बहिःप्रक्षेप, और प्रतिमार्ज्जन-कम्में ६६७ - कर्मसाधक वैज्ञानिक- मन्त्र का संस्मरण " ६६८ - मन्त्र का अक्षराथ समन्वय " ६६६ - मन्त्राक्षरार्थ के सम्बन्ध में शातपथी-अति ? " " 13 ६४८ " 1 29 ६४८ ६६८- पुरस्तादुर्वी योषा ६६६ - अभिरूपसुन्दरी योषा ६६७ मध्ये संहारिता योघा " } " " ६७० - एवमेव हि योषा प्रशंसन्ति 13 ६७१ – पृथुश्रोणिः ६७२ मध्ये संग्राह्या ६७३ - विमृष्टान्तरांसा ८५

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१००० - केबल विज्ञानतत्त्व के निरूपक मन्त्रों का भाषादृष्ट्या, तथा श्रर्यह-ष्ट्या, उभयथा पारिभाषिक- काठिन्य १००१ - पुरा करस्य विसृप: ' इत्यादि वैज्ञा-निक मन्त्र के द्वारा एक पूर्व - अधि-विषयसूची १०२३- भृगु अङ्गिरा और त्रि - प्राणत्रयी १०२४ - अवस्थात्रयी से समन्वित भृगुप्राण Εγκ १०२५-" निराप्राण १०२६ - त्रि - भावापन्न श्रत्रिप्राण ६५० " " " दैविक विज्ञान का स्पष्टीकरण १००२ - कल्पनारसिकों की उत्तालतरङ्गों की " १००३ - चन्द्रविम्वस्थ कृष्णवर्णात्मक चिह्न " कल्पना भूमि- ' चन्द्रकलङ्क ' १००४ - भावुक कवियों की भावुकतापूर्ण दृष्टि में चन्द्रकलङ्क का उपवर्णन १००५ - सुप्रसिद्ध ' अङ्क केऽपि शशङ्किरे ० ' इत्यादि पद्य, और तत् अक्षरार्थ - सम-न्वय १००६ - ' भूच्छायमैच्छन् परे ' की ग्रांशिक-सत्यता, और चन्द्रकलङ्क १००७ - चन्द्रोत्पत्तिप्रकरणोपकम १००८ - शनि बृहस्पति- मङ्गल - नामकी बहिम ' इत्रयी २००६ - शुक्र - बुध- पृथिवी नाम की अन्त ६४६ 27 " " त्रयी " १०१० - सूर्य के उपग्रह १०११ - पृथिवी का उपग्रह चन्द्रमा १०१२ - पृथिवी का पुत्र चन्द्रमा १०१३- भूतप्रतिष्ठामय - घामच्छद वागूरू-त्रिप्राण १०१४ - नादाग्नि का संस्मरण " " " १०२७-- पारदर्शकता का महान् प्रतिबन्धक धामच्छद चत्रिमाण " १०२८ - तमोमयी - पाप्मा मतसृष्टि का मूलप्र-वर्त्तक त्रिप्राण १०२६- श्रत्रिप्राण से समन्विता ऋतुमती नारी, और य १०३० - पाप्मानोऽत्रिणः १०३१ - रक्षांसि वै पाप्मा श्रत्रिणः १०३२ - ऋतुमती आत्रेयी का स्पर्श निषिद्ध १०३३ - पृथिवी का मूल उपादान अपतत्त्व १०३४ - श्रत्रिप्राण से समन्वित पारमेष्ठ्य आपः, और भू पड 39 १०३५ - अप् - वायु - तेज, और श्रत्रिप्राण से सम-न्वित - भूपिण्ड १०३६ - चित्याग्निमूर्ति - श्रनादाग्नि रूप- श्रत्रि-प्राणमय भूपिण्ड १०३७ – सम्बत्सरगति का अधिष्ठाता भूपिण्ड १०३८ - भूपिण्ड का साम्वत्सरिक- परिभ्रमण, और दिसोम की आहुति १०३६ - खण्ड खण्ड- भावप्रवत्त ' के पार्थिव श्रग्नि 19 १०४० - संकोचधर्म्मा ध्रुवसोम " " 22 39 ,, 27 " " EL: " 1 " " " " " १०१५ - चित्य - चिते निघेयरूप श्रनादग्नि ६५० १०४१ - वरुणसोम का पारिभाषिक स्वरूप १०१६ - वाग्रूप - अन्नादमूर्त्ति II १०१७ - वागेवात्रि: १०४२ - त्रिप्राणमय पार्थिव बागग्नि, और विश " १०१८ - इयं वैवाक् २०१६ - वागिति पृथिवी " २०४३ - अङ्गिरोऽग्नि की अवस्थात्रयी " 1 " १०४४ - सोम की अवस्थात्रयी " 3 37 १०४५ - श्रत्रिप्राण का प्रस्रवण, और चन्द्रोत्पत्ति " " १०२० - या सा वागग्निः सः १०२१ – छा या सा वागासीत्, सोऽग्निस्नादः समभवत् १०४६ - अत्रिपुत्र चन्द्रमा, और पौराणिक वचन 37 सन्दर्भ १०२२ -प्रापोमय परमेष्ठी की मनोतात्रयी 27 १०४७- नेत्राभ्यामस्रवत् - सोमः ८६ " "

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१०४८ - सार्वदेवत्य- श्रग्ति २०४६ - देवयजनात्मक वान्द्रसोम १०५० - देवयजनभूमि, और सोम १०५१ - पितृप्राणमय देवयजनात्मक सोम १०५२ - स्वधा और पितर शतपथब्राह्मण २ खण्ड ६५२ 23 33 १०५३ - स्वधा, शब्द का निर्ववचनात्मक " समन्वय १०५४ - ' स्वधाभिश्चन्द्रमसि - ऐरयन् ' इत्यादि मन्त्रभाग का पारिभाषिक समन्वय " " १०५५ - पार्थिव - देवयजनभाग, और चन्द्रमा १०५६ - देवयजनभागात्मक चान्द्र कृष्णभाग १०५७ - देवयजनात्मक सोम से चन्द्रमा का निर्माण, और सृष्टयारम्भकाल १०५८ - पार्थिव देवयजन, और भूपिण्ड १०५६- चान्द्र देवयजन, और चन्द्रमा १०६० - प्रतिमार्जन कर्म्म - स्वरूप- रहस्य १०६१ - चान्द्री - देवयजनसम्पत्ति का संग्रह १०६२- सोमवजी, और वैधयज्ञ १०६३ - वैधयज्ञ, और मानवदेवता १०६४ – सोमरक्षक भौम चन्द्रमा १०६५ - भौम ब्रह्मा, और लोकपाल चन्द्रमा १०६६ - सोमवल्ली का असुरों के द्वारा आमूल-चूड़ उत्पाटन, और देवत्रल का पराभव इति - प्रतिमाज्जेनकम्र्म्मोपपत्तिः १०६७- शेषभूत अनवमर्श प्रकरण १०६८- कुशास्तरणत: पूर्व - श्रवमर्श का निषेध १०६६ - यज्ञकर्म का प्राणविद्युन्मयत्त्व, एवं तन्निबन्धन इष्टानिष्टजनकत्त्व १०७० – वेदिविद्य त् का संहारकधर्म्म १०७२ - ( क ) - दर्भविद्युत्, और वेदिविद्युत् का 19 ; ) 39 " } , 31 " " " " 91 ६५३ " १०७२- ( ख ) -- प्राणात्मिका यज्ञविद्युत् का प्राण ६५४ से ही अनुरूप सम्बन्ध 37 १०७३- ऋषिप्रोक्त पद्धतिक्रम का ही अनुगमन, और इष्टसंसिद्धि १०७४ - बुद्धिवादात्मक व्यामोहन का प्रवेश १०७५ – सनातनधर्म्मनिष्ठों की पतनपरम्परा का मूलकारणान्वेषण, और तन्निरोधोपाय-प्रदर्शन १०७६ - वेदभक्तों के सम्मिलित हवन का भावुकतापूर्ण इतिवृत्त, और विज्ञान-सिद्धा यज्ञविद्या का तद्भक्तों के द्वारा ही उपहास " " १०७७ - आर्य्यजगत् का ' नमस्ते ' व्यवद्दा-रात्मक अभिनिवेश १०७८ -- ' नमस्ते ' की व्यावहारिकता के सम्बन्ध में ति का प्रचण्ड निरोध, ' नमस्ते ' खण्डनपरक श्रतिवचन का संस्मरण, तथा तद्वै ज्ञानिक समन्वय १०७६ - यज्ञ में दीक्षित यजमान के लिए अनुगमनीय कतिपय नियम १०८०- देवसंस्थात्मिका यज्ञसंस्था, और तत्र ' नमस्ते ' व्यवहार का समादर १०८ ९ व्यवहारजगत्, और ' नमस्ते ' व्यवहार का प्रचण्ड निरोध 11 १०८२ ' नमस्ते ' व्यवहारनिरोधक श्रुति-वचन १०८३ - यज्ञकर्मानुगता श्रश्रद्धा, और यज्ञपद्ध-तियों की उपेक्षा १०८४ - यज्ञानुगता श्रद्धा का संस्मरण १०८५ - बृहस्पति से अनुगत श्राख्यान का संस्मरण १०८६ - यथाविधि यज्ञ का सम्पादन, और तद्-" ६५६ " 1 " " समतुलन ६५४ द्वारा अभ्युदय की संसिद्धि "

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विषयसूची इति प्रथमकाण्डे - द्वितीयाध्याये पञ्चमं ब्राह्मणम् इति - द्वितीयप्रपाठके - तृतीयं ब्राह्मणम् इति - द्वितीयोऽध्यायः २ इति - वेदिपरिग्रहात्मकं - वेदि सम्पादनम् १४

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* श्री * अथ - शतपथब्राह्मणविज्ञान भाष्ये प्रथमकाण्डे संस्कारब्राह्मणाध्यायः ३ प्रथ- शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्ये - प्रथमकाण्डे-तृतीयाध्याये - प्रथमं ब्राह्मणम् द्वितीय- प्रपाठके च चतुर्थ ब्राह्मणम् १५- द्रव्यसंस्काराः क्रमप्राप्त १५ वें कर्म्म के विज्ञानभाष्य की ' विषय स्मारकसूची ' ( पृष्ठ सं ० ६५६ से १०३६ पर्य्यन्त ) १ - प्रथमकाण्डान्तर्गत - तृतीयाध्यायानुगत-प्रथम ब्राह्मण, एवं द्वितीयप्रपाठकानुगत चतुर्थत्राह्मण ( मूल ) ६५६ ६६५ ६७१ २- मूल ब्राह्मण का अक्षराथ समन्वयात्मक अनुवाद ३- सूत्र प्रदर्शित पद्धतिप्रकरण उपपत्तिप्रकरण ( विज्ञानभाष्य ) ( १ ) - द्रव्यसंस्कारोपत्तिर्विज्ञानं वा ४ - स्रु व- जुहू -- उपभृत् - त्र वा पुरोडाशपात्री-इड़ापात्री आदि यज्ञिय पात्र, और देव-भोजन - साधन ६७५ ५- लोकव्यवहारानुगत भोजनपात्रों के साथ ६७५ दैवव्यवहारानुगत पात्रों का समतुलन ६ - भोजनपात्रों का विशुद्धीकरणात्मक संस्कार " ७- सम्मार्जनीय पानी, और विशोधन ८- कुशा रूप विशोधन साधन E-- वेदात्मक - पारमेष्ठ्य श्रम्भः पानी १० -- आपो वै कुशा, और कुशोत्पत्ति का संस्मरण ११- अनिशितोऽसि, और सम्मार्जन १२- कुशा रूप दिव्यपानी, और दिव्यमन्त्रबल, तथा सम्मार्ज्जन 29 " " " CR

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१३- वारुणा, और असुरप्राय ६७६ १४ - श्रन्तरिक्ष में विचरण करने वाले असुर १५ - श्रग्नि, और मन्त्रबल के द्वारा असुर-91 पराभव 21 १६- पात्रतपनक का समन्वय १७- अलौकिक दिव्यभावान सम्मार्जन १८ - यज्ञ से अलोकिक देवरमा की अभिव्यक्ति १६ - सम्मार्ज्जन की विशेष पद्धति २०- आगमन, और गमन - भावानुगत सम्मा वर्जन २१- प्राणापाननात्मक सम्मार्जनकम्म " " २२- देवयजनात्मक स्रुव 21 २३- प्राणोदानावेवैतद्भाति २४- प्राणोदान से युक्ता रोमावलियाँ २५- पुरुषो वै यशः २६- तस्मादितीमानि लोमानि इतीवेमानि-का समन्वय २७ - प्रालोदानरूपा सोररश्मियों 27 २८ व की स्वाभाविक शक्ति ६७७ २६. - श्राहुतिद्रव्यात्मक चतुर्विध सोम ३० - अन्न सोमात्मक बाज और तद्रूप यश ३१- वाजिनं त्वा बाजेध्यायै समामि ३२- प्राशिवपात्री और इडापात्री का तूष्णीं सम्मार्जन ३३- तपन, और सम्मार्जन ३४- सम्मार्जनानन्तर पुनः प्रनवन श्रीर तत्कारण - समन्वय ३५ यथावमर्श निर्णिज्य अन वर्शमुतमं परि-चालयेत् ३६ का सम्मार्जन में प्राथम्य और तत्प्रथम - सम्मा ३७ वृषा का प्राथम्य, " जन ३८ - गात्मक वृष - पुरुष ३६ - स्त्री खात्मिका योषा - स्त्री ६७७ ४० - वृषारूप पुरुष का श्रग्नियमत्त्व " 3 ४१ - योषारूपा स्त्री का सोममयत्त्व " ४२ - वृषारूप अग्नि का प्राथभ्य ४२ - योपारूप सोम का पश्चाद्भाविव ४४- श्रप्रत्व, और अभि ४५ - अन्नाद - भोका - रूप अनि " " 20 " " ४६ - न - भोग्य रूप सोम 21 ४७ - भोक्ता का प्राधान्य " " ४८ - भोग्य का गौणत्व ४६ पुरुषात्मभाव और मोका अग्नि ५० - स्त्रीभाव, और भोग्य सोम ६७८ ५१ - बालक ( पुरुष ) का अग्रगामित्व ५२ एकपुरुषात्मक व " ५३ - अनेक सुकू रूपा स्त्रियों पुरुष और स्त्री का उत्तरदायित्वपूर्ण निविभाजन ५५ गाईपत्य का पश्चिमभाग और पात्र-सम्मार्जन 27 ५६ – दर्भतृणात्मक पात्रीनिर्णेजन " " ५७ - सम्मार्जनक में अपेक्षिता सावधानी ५८ - कुशराशिरूप ' वेद ' ( कुशमुष्टि ) ५६. - यज्ञप्रवर्त्तक सूर्य्य का त्रयीवेदमयत्त्व ६०-- गायत्री मात्रिकवेदात्मक सूर्य्य ६१- वेदमय सौर - पतव ,, " 17 ६२ - वेदावच्छिन्न सौरप्राण, और द ६२ - दर्भ की वेदरूपता " " 19 ६४ - यज्ञसीमा, और यज्ञिय वेद ६५ तैतिरीय - मत और दर्भात्मक परिय - द्रव्य ', का यज्ञमण्डल में ही समावेश 39 ६६ - सूत्रकाराभिमत, और ' एके ' ६७६ ६७ श्राहवनीयाग्नि और दिव्यप्राण ध्यात दोष "

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ६६ - दर्भतृणादि के बहिर्निरसन के सम्बन्ध में तथ्यपूर्णं निर्णय इति - द्रव्यसंस्कारोपपत्तिः १ ६-२ - पत्नी सन्नहनोपपत्तिः ७० - पत्नी संन्नहनकम्मे का स्वरूप ७१ - पन्युन यज्ञसंयोगे और यजमानपत्नी ७२ - यज्ञसम्बन्धानुगत - पत्नी- शब्द ७३ - पति और पत्नी का दाम्पत्य ७४- दाम्पत्यमूला विराट्प्रजा ६७६ ६७६ " " 99 " 7 " " ६४ - सौम्य चन्द्रमोपग्रह ६५ - सम्वत्सररूप महासुपर्ण ६६ - सुपर्ण के दक्षिणोत्तरपक्ष ६७ - पूर्वख गोल, और पुरुषभाव ६८ - पश्चिमग्वगोल, और स्त्रीभाव ६१ - सम्वत्सररूप यज्ञप्रजापति १०० - दृश्य - खगोलात्मक सूर्य, और पुरुष -सृष्टि १०१ - श्रदृश्य खगोलात्मक चन्द्रमा, और स्त्री-सृष्टि १०२– | वष्वद्वृत्त, और मेरुदण्ड ( रीड की हड्डी ) १०३ - श्रद्ध भागात्मक पुरुष ६८१ ६८० " 9 " " 19 " " " " ७५ -‘स विराजमसृजत् प्रभुः ७६ - वेदतत्त्व - विभक्तित्रयी ७७ - वागग्निरूप सार्वयाजुषाग्नि ७८ - वागग्नि का सत्याग्निमयत्त्व ७६ - यज्जू: - रूप यजु का स्वरूपविभाजन ८० ऋक्सामरूप वयोनाधों से यज्जू: - रूप योभाग का न ८१ - स्वयम्भू का यजुर्म्मय शरीर ८२ - शरीरात्मिका वाक का द्रवण, और श्रग्नेरापः , १०४ - अर्द्ध भागपूरिका स्त्री 19 १०५ - श्रर्द्धाङ्गिनी स्त्री " " १०६ - पुरुष का शून्यार्द्धाकाश, और तत्पूरिका स्त्री १०७ - देवो भूत्त्वा देवं भावयेत् १०८ - सम्वत्सरयज्ञानुरूपा सम्पत्ति, और दाम्प-त्यभाव १०६ - यशानुगता - पत्नी, और पूर्णता ११० - श्रद्ध वा एष श्रात्मनः यत्पत्नी " ८३ - सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् 19 १११ - सोऽयमकाशः पन्यापूर्यते ११२ - यशो वा एष योऽपत्नीकः ११३ - बहुविवाह की मौलिकता 19 " " " " 9 " ८४ - वागेत्र साऽसृज्यत ८५ - प्रकृतिसिद्ध प्रथम दाम्पत्य, और उन का प्रथम अपत्य " ८६ - दाम्पत्य के तीन महिमा - वित्त ' ११४ - यश का पश्चिमाद्ध, और पत्नी ११५ - यजमान के यज्ञ का ऊर्ध्व वितान 99 " " " ,, ८७- स्वायम्भुवयज्ञात्मक प्रथम दाम्पत्य " - सम्वत्सरयज्ञात्मक द्वितीय- दाम्पत्य - अध्यात्मयज्ञात्मक तृतीयदाम्पत्य ६० - त्रिविध - दाम्पत्यभाव परिलेख ६१- श्रग्नीषोमात्मक प्राकृति - यज्ञ ६२ - सम्वत्सर मण्डल के सूर्याचन्द्रमसौ-नामक ग्रहोपग्रह ६३ - श्राग्नेय - सूर्य्यग्रह 22 19 19 " 9 ६१ ११६ – ' जगनार्दो वा एष ० ' इत्यादि श्रतिवचन का रहस्यात्मक समन्वय ११७ - यज्ञ में योक्त्र के द्वारा यजमान -पत्नी का योग ११८ - यशबन्धन, और पलायन का अभाव ११६ - यज्ञात्मक बन्धन का रहस्योपक्रम १२० - स्त्री का स्वरूपधर्म्म, और स्त्रीस्वातन्त्र्य का विरोध " 9 ६८२ " "

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 220 का मूल पृष्ठ
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१२१ परतन्त्रतामा अर्गला, और स्त्री १२२ स्वातन्त्र्य - पारतन्त्र्य स्वरूप विश्लेषण १२३ - तप्रधाना, श्रतएव श्रनृतभावापन्ना योषा १२४ - स्त्री का पारतन्त्र्य, और पत्नीसाइन-कर्म १२५ - योक्त्रन्धनात्मक निश्किन्धन १२६ इनकम का मौलिक रहस्य १२७ - हमारी युगधर्मानुगता अनुभूति १२८ ( क ) स्त्री - स्वातन्त्र्य के पक्षपातियों के हृदयोद्गार १२८ ( ख ) ईश्वराशापत्ररूप वेद और अभि शापरू - पस्त्री - पारतन्त्र्य? " १२६ समस्या की महती जटिलता १३० - शब्द प्रमाणका वयम् - त १३१ ( क ) मानवीय मन, और उसका सहज प्रमाद १३१ ( ख ) ( २ ) धम्मं का रूढिवादस्य और विजयसभी ६८२ " 13 19 आजका भ्रान्त सनातनधर्मावलम्बी जगत् ६८३ १३२ - ( २ ) पश्चिमा डम्बग्भक्त आज का सुधारकवर्ग १३३ ( ३ ) धम्र्मोपदेशकों की निरीहता १३४ - ( ४ ) धार्मिक जनता का असन्तोष १३५ - धर्म्मप्रेमी सनातनधम्माँ ( १ ) ११६ धामी सुधारक ( २ ) १३७ - धर्मोपदेष्टा धार्मिकता ( ३ ) १३८ - मार्गप्रदर्शक समाजनेता ( ४ ) १३६- पश्चम - राष्ट्रीय समाज का संस्मरण १४० उद्देश्य की मान्यता में स्वीकृति १४१ आदर्शभक्त, किन्तु कम्र्मशून्य धार्मिक जगत् १४२ कर्म्मपरायण, किन्तु आदर्शशून्य सामा जिक जगत् १४३ - राष्ट्र की ज्ञानशक्ति, और क्रियाशक्ति का विभाजन और महान् श " " 23 " " " " १४४ - स्व का विलयन एवं रूढ़िवाद का प्राधान्य, और धार्मिक जगत् १४५ शाश्वतम् के स्थान में मतवाद परम्परा का संस्थापन, एवं तद्द्द्वारा धर्मव्याज ( छल ) से विशुद्ध स्वार्थ का पोषण १२४६ सुधारक की रूढ़िवाद के प्रति क्रान्ति १४७ - आवेशमूला क्रान्ति का घातक परिणाम 13 १४८ - रोग के साथ साथ रोगी का भी निकृ-न्तन, और सुधार - व्यामोहन १४६ श्रप्रासङ्गिकमायानुगतासा १५० स्त्रीस्वातन्त्र्यानुगत महान् प्रश्न? १५.१ स्वतन्त्र 3 परतन्त्र शब्दों का अक्षरार्थ-समन्वय १५२ ब्रामा और स्व ' ' भाष -१५३ - स्वानुगत स्वधर्म्म, और परानुगत पर धम्मं से आक्रान्त आत्मा १५४ - शब्दोत्पादक श्रात्मा १५५ तात्पर्य्या समन्वय १५६ - शिक्षा सूत्र, और ग्रात्मा के द्वारा शब्दा-विर्माव १५७ - ' वायुः खात् शब्दस्तत् ' का संस्मरण १५८ शब्दप्रपत्ति में समर्थ आत्मा और ' स्व ' भाव १५६ शब्दोत्पत्ति की सनातनता और स्वा--नुगता विपतिपति १६० - तत्व समन्ययदृष्ट्या विप्रतिपत्ति का निरा-करण १६१ - स्वतन्त्राध्यक्ष - स्वतन्त्र श्रात्मा १६२ - परतन्त्राबद्ध परतन्त्र श्रात्मा १६३ - तन्त्रवाचक स्वतन्त्र, और परतन्त्र शब्द १६४ - स्वतन्त्रता- परतन्त्रता के द्वन्द्व से प्रतीत सर्वरूप आत्मा १६५ द्वादभ्याय के द्वारा आत्मस्वातन्त्र्य, और ग्रात्मपारतन्त्र्य का समन्वय ६८५ " ६८६ ER