Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 31–40

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 31–40

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शतपथब्राह्मण २ ख एड कार नहीं है । सर्वरहस्यवित् तथाविध दीर्घतमा नामक वैसे महामहर्षि अपने व्यक्तित्त्व की स्वरूप - मीमांसा के लिए जब प्रवृत्त होते हैं, तो हमारी स्वल्पप्रज्ञा सर्वथैव विमूढा बनी रह जाती है । उन्हीं के मुखपङ्कज से विनिःसृता परमोद्बोधनप्रदात्री निम्नलिखिता वाणी को सुन कर सचमुच ही हम तो अपना सभी कुछ भूल जाते हैं कि—

अचिकित्वाच्चिकितुषश्चिदत्र कवीन् पृच्छामि विद्यनं, न विद्वान् ।

वि यस्तस्तम्भ षडिमा रजांसि, अजस्य रूपे किमपि स्विदेकम् ॥

- ऋक्संहिता १।१६३।६ । ( स्वामी यसूक्ते ) मन्त्रव्याख्यान का अत्र अवसर नहीं है । केवल मन्त्र के पूर्वाद्ध की ओर ही हमें अपना ध्यान आक-र्षित कर लेना है, जिसका ऋजुभावान्न यही अक्षरार्थ है कि – “ मैं स्वयं इस तथ्य के सम्बन्ध में मीमांसा करने में क्योंकि असमर्थ हूँ - अज्ञ हूँ, अतएव समर्थ - सुविज्ञेय - क्रान्तीदर्शी विद्वानों से ही इस सम्बन्ध में केवल अपने बोध के लिए मैं यह पूँछ रहा हूँ, क्योंकि मैं स्वयं नहीं जानता उस तथ्य को कि - किसने उन ६ रजोरूप लोकों को अपने ऊपर स्थापित कर रक्खा है, समतुलित कर रक्खा है " । जो महर्षि दीर्घतमा आगे चलकर स्वयं इसी अपने अस्यवामीयसूक्त में - ' तिस्रो मातृ स्त्रीन् पितृन बिभ्रेदक ऊर्ध्वस्तस्थौ नेमत्र ग्लापयन्ति ' ( ऋक्सं ० १ | १६४ | १० | ) इत्यादि मन्त्र के द्वारा ' रोदसी--क्रन्दसी - संयती -- रूपा - त्रैलोक्य त्रिलोकी विद्या ' का स्वरूपोद्घाटन करते हुए ' उर्ध्वस्तस्थौ नेमव ग्लापयन्ति ' रूपेण ' अजस्य रूपे किमपि स्विदेकम् ' इस समाधेय प्रश्न का स्वयं ही समाधान कर रहे हैं, उन्होंनें--क्यों, और किस लिए – ' अचिकित्त्वान्न विद्वान ' कह दिया?, यह महान् प्रश्न है, जिसके गर्भ में हीं महर्षि का वह उद्बोधनसूत्र पिनद्ध है, जिसका पूर्व में यशोगान किया जाचुका है । प्रधान - लक्ष्य - रूप महान् सृष्टिविज्ञान के स्वरूप - विश्लेषण - प्रसङ्ग से उसी के द्वारा सतविधि से ऋषिवाणी अन्यान्य प्रासङ्गिक उद्बोधन भी प्रदान करती रहती है, और यही गभीरार्थगर्भिता अनेकलक्ष्य-संवाहिका ऋषिवाणी की गरिमा - महिमामयी - महती विशेषता मानी गई है लोक - सामान्या वाणी के समतुलन में । महर्षि दीर्घतमा इसी सहजशैली के आधार पर सप्तलोकविज्ञान - प्रसङ्ग के साथ ही ' अचिकित्त्वाचि कि-तुश्चिदत्र ' इत्यादि रूप से वेदानुगत - सृष्टिविज्ञान से अनुगता सफलता के महान् श्राधारस्तम्भ, व्यक्ति-त्वविमोहनापहरणात्मक - महतो महीयान् उद्बोधन - तथ्य का भी स्पष्टीकरण कर रहे हैं, जिसका सहजरूपेण यही निष्कर्षार्थ है कि, वेदपुराणादि शास्त्र के स्वाध्याय में प्रविष्ट व्यक्ति को अपने मनः शरीरनिबन्धन प्रकृत्य-नुगत लोक - समाजानुबन्धी बाह्य व्यक्तित्व को एकान्ततः विस्मृत ही कर देना चाहिए । दूसरे शब्दों में - इस सनातनसाहित्य के पारिभाषिक तथ्यों के साथ आत्मसाक्षात् करने के लिए अपने व्यक्तित्त्व - दम्भ को सर्वथैव विस्मृत कर देना चाहिए । व्यक्तित्त्वविमोहनात्मक व्यक्तित्त्व की विस्मृति को क्यों श्रावश्यक समझा ऋषि ने १, प्रश्न का उत्तर पूर्व के सन्दर्भ से ही यद्यपि गतार्थं है । तथापि स्पष्टीकरणदृष्ट्या लोकभाषा में भी तत्सम्बन्ध में किञ्चिदिव निवेदन कर दिया जाता है । वास्तविक व्यक्तित्त्व एवं व्यक्तित्त्वविमोहनात्मक व्यक्तित्त्व - भेद से व्यक्तित्त्व ३१

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किञ्चिदि आवेदन को हम समझने के लिए दो भागों में विभक्त मान सकते हैं । मानवीय आत्मा उस परमात्मा से अभिन्न माना गया है, जिसे दिग्देशकालातीत अनन्तब्रह्म कहा गया है । वही मानवीय आत्मा का श्रात्मनिबन्धन स्वस्वरूप है, और आत्मनिबन्धन दगदेशकालातीत सनातन शाश्वत - ऐसा अलौकिक व्यक्तित्त्व ही मानव का वास्तविक व्यक्तित्त्व है, जिसका लोकसमाजानुबन्धी- पाण्डित्य - वीरता, किंवा सत्तानिबन्धन - उच्चपद आदि श्रादि के साथ यत्किञ्चित् भी सम्पर्क नही है । अपितु समदर्शनाधारभूत, श्रात्मसाम्यमूलक ऐसा महान् व्यक्तित्त्व ही मानव का वह व्यापक व्यक्तित्त्व है, जिस व्यक्तित्त्व पर प्रतिष्ठित रहता हुआ मानव व्यक्ति - समाज - राष्ट्र आदि आदि परिच्छिन्नभावों से निकल कर सर्वभूनहितरति का ही अनुगामी बन जाता है, और ऐसा मानवश्रेष्ठ ही ' अलौकिक - मानव ' माना गया है, एवं इसी को " ऋषिमानत्र ' कहा गया है, जिसका वास्तविक महान् व्यक्तित्त्व महतोमीयान् दिग्देशकालातीत अनन्तब्रह्म से समतुलित होता हुआ एक प्रकार से ' व्यक्तित्त्व ' की परिधि से सर्वथै संस्पृष्ट है । दूसरा व्यक्तित्त्व है --दिग्देशकालानुबन्धी - सोपाधिक- पराश्रित - व्यक्तित्त्व | जबतक मानव श्रात्मसाम्य के आधार पर प्रतिष्ठित होता हुआ विषमवर्त्तनात्मक सोपाधिक- लोक - समान - सत्तातन्त्र टि से अनुप्राणित पराश्रित व्यक्तित्त्व का उत्तरदायित्त्व की दृष्टि से तटस्थरूपेण निर्वाहमात्र करता रहता है, तत्रतक तो यह श्रागन्तुक व्यक्तित्व भी मानव के लिए इष्टजनक लौकिक समादरणीय व्यक्तित्त्व ही बनता रहता है । किन्तु आत्मसाम्यरूप समदर्शनात्मक - निरुपाधिक- वास्तविक व्यक्तित्त्व की उपेक्षा कर यही मानव जत्र केवल दिगदेशकाल का ही ग्राम बन जाता है, तो यही आगन्तुक व्यक्तित्व इष्ट नामक - समादरणीय- लौकिक व्यक्तित्व के स्थान में -‘ अनिष्टपरम्परार्द्धक – समाज- राष्ट्र - स्वरूपविध्वंसक ' ही बन जाता है, और इसी दूसरे दिग्देशकालानुबन्धी तात्कालिक व्यक्तिव का नाम है ' व्यक्तित्त्व विमोहनात्मक व्यक्तित्त्व ' कालसाची सूर्य मानव के बुद्धितन्त्र का प्रवर्त्तक है, दिक्साक्षी चन्द्रमा मानव के मनस्तन्त्र का प्रभु है, एवं देशसाक्षी भूपिण्ड मानव के पाश्चभौतिक शरीर का आर-म्भण ( उपादानकारण ) है । यों कालात्मक सूर्य, दिगात्मक चन्द्रमा, एवं देशात्मक भूपिण्ड, इन तीनों प्राकृतिक पत्र से ही मानव के बुद्धि- मनः - शरीर - रूप तीनो प्राकृत - पर्वो का स्वरूप निर्माण हुआ है । और यही है मानव के दिग्देशकाला-नुबन्धी - लौकिक प्रकृतिसिद्ध व्यक्तित्व के चिरन्तन इतिवृत्त का सक्षिप्ततम इतिवृत्त । यदि दिग्देशकालानुचन्त्री -- बुद्धिमनःशरीरात्मक - लौकिक -- व्यक्तित्त्व दिग्देशकालातीत आत्मनिबन्धन वास्तविक -- व्यक्तित्व को आधार बनाए रहता है, तो पुत्रकथनानुसार इत्थंभूत आत्मनिष्ठ मानव को दिग्देश-कालानुबन्धी -- तात्कालिक -लोकैषणानुगत -- सामयिक -- प्रलोभन प्रभावित नहीं कर पाते । और ऐसी अवस्था में आत्मनिष्ठ मानव का यह लौकिक व्यक्तित्त्व भी कदापि इसके स्वरूपविमोहन का कारण नहीं बन सकता | अतएव ऐसा अलौकिक मानत्र लोकव्यक्तित्त्व का भी सर्वात्मना सत्यनिष्ठा से ही निर्वाह कर लेजाता है दिग्-देशकालानुबन्धी- उत्पीड़नों की उपेक्षा ही करता हु | | ठीक इसके विपरीत वही मानव दुर्भाग्यवश यदि अपने दिग्देशकाल । तीत श्रात्मनिबन्धन- समझ से अभिन्न-वास्तविक – व्यक्तित्व को विस्मृत कर अपने मानवीय स्वरूप को दिग्देशकालिक - आत्माभिव्यक्तित्वशून्य-३२

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड मानवेतर पशु - पक्षी - श्रादि की भाँति केवल बुद्धि - मनः - शरीर - तन्त्रतत्रयी पर ही परिसमाप्त मान बैठ की भयावह भूल कर बैठता है क्षणिकवादयों की भाँति, तो निश्चयेन थोड़े ही समय में इस का समत्त्व उच्छिन्न होजाता है । और केवल बुद्धिवादात्मक मनोराज्य के बल पर काल्पनिक - शारीरिक- भूतताम्य की अहर्निश घोषणा करता हुआ भी यह प्राकृत मानव उत्तरोत्तर - प्रकृत्यनुबन्धिनी उस भयावहा विषमता का ही पथिक बनता जाता है, जिस की पर्य्यवसान भूमि - ' समुलस्तु विनश्यति ' ही मानी गई है । बौद्धिक दम्भ अहोरात्र प्रतिमानाक्रान्त, मानसिक मान से सतत काल्वालीकृत, एवं शारीरिक मद से निरन्तर अशु-चिभावाभन्न ऐसा दिग्देशकालविमूढ मानव ही कालान्तर में अपने दिग्देशकाल नुबन्धी- लोकिक - व्यक्तित्त्व से भी पराङमुख बन जाया करता है । ऐसी अवस्था, किंवा मानवस्वरूपविघातिनी ऐसी घोरघोरतमा दुद्दशा-वस्था से समलङ्कत ये मानव महाभाग ही व्यक्तित्त्वविमोहनात्मक उस काल्पनिक व्यक्तित्त्व के महापात्र माने गए हैं, जिस का यह पदप्रतिप्रतिष्ठात्मक काल्पनिक व्यक्तित्त्व किसी भी क्षण गन्धर्वनगरलेखावत् देखते ही देखते सदा के लिए सस्मृति के गर्भ में विलीन होजाया करता है, और तब इन के बुद्धिवादात्मक दम्भ के क्षेत्र में क्षणिक - दुःख - शून्य - भावनिबन्धन - अनात्मवादात्मक जड़वाद के अतिरिक्त और कुछ भी तो शेष नहीं रह जाता । प्रसङ्गतः निर्दिष्ट वास्तविक - व्यक्तित्त्व एवं व्यक्तित्त्वत्रिमोहनात्मक - व्यक्तित्त्व. भेदेन द्विधा-विभक्त व्यत्तित्व में से भारतीय - ऋषिदृष्टि में आत्मसाम्यमूलक - वास्तविक - व्यक्तित्त्व ही मानव का वह ' व्यक्तित्त्व ' है, जिस के गर्भ में उसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व गर्भीभूत है, जैसे कि दिग्देशकालातीत समब्रह्म के महिमामण्डल में सम्पूर्ण चराचर विश्वप्रपञ्च गर्भीभूत है । ऐसे अलौकिक व्यक्तित्त्व के मुख से ही तो— ' मा कश्चित् - दुःखभाग्भवेत् ' - ' सर्वे सन्तु निरामयाः ' - ' कुण्वन्तो विश्वमार्य्यम ' जैसे आत्मसाम्यसूत्र विनिर्गत होसकते हैं । और यही है भारतीय व्यक्तिमूलक वह आत्मसाम्य, जिस के स्वरूपबोध से वञ्चित आज के समाजवादी भारतीय - समाज - व्यवस्था पर व्यक्तित्त्वातिमान का घृणित अरोप लगाते हुए लज्जा से यत् किञ्चित् भी तो अवनत नहीं होजाते । जिस सम - भावापन्न - समानाधिकारमूलक साम्य का, किंवा समाजवाद का आज के बुद्धिवादी यशोगान करते नहीं अघाते, वह तो वास्तव में व्यक्तित्त्वविमोहनात्मक - काल्पनिक - व्यक्तित्त्व से सम्बन्ध रखने वाला प्रकृतिनिबन्धन वैसा घोरघोरतम विषमवाद, किंवा वैषम्य है, जिस के क्षेत्र में विश्व - राष्ट्र - समाज की कथा तो दूर रही, अपने परिवार के कुलवृद्धों का भी समादार सम्भव नहीं है – केवल स्वकामार्थ-भोगवृत्ति से अनुप्राणित तत्सहायक - स्वार्थसंसाधक कतिपय तथाविध ही व्यक्तिविशेषों के अतिरिक्त | स्वयं, स्वापत्य, और तत्कामार्थभोगसंसाधक- चाटुकार - गतानुगतिक - परिगणित - व्यक्तिविशेष, अलमतिपल्लवितेन । यही उन समाजनिष्ठों का सम्पूर्ण समाज, किंवा राष्ट्र, किंवा सम्पूर्ण विश्व है, जिस के दिग्देशकालानुचन्धी तात्कालिक - स्त्रार्थ - संसाधन के लिए ही ये पुरुषपुङ्गव परिवारकुलवृद्ध - समाज - राष्ट्र - आदि आदि सभी के साथ क्षणमात्र में प्रचण्डतम विश्वासघात करते हुए भी विलम्ब नहीं करते । और अत्यन्त की कारुणिक हृदय से श्राज हमें इस नग्न सत्य का अनुगमन करना पड़ रहा है कि, श्राज का स्वतन्त्र भारत आत्मसाम्यमूला ब्रह्मसंविद्र पा धर्म्मनिष्ठा से अपने आपको पराङ्मुख प्रमाणित करता हुआ दिग्देशकालानुत्रन्धी- व्यक्तित्त्वविमोहनात्मक - उस व्यक्तित्त्व की ओर ही अन्धरूपेण अनुधावन ३३

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किञ्चिदिवखवेदन करता जारहा है, जिस अनुधावन से आज भारतराष्ट्र का आत्ममूलक - वास्तत्रिक - व्यक्तित्त्वनिबन्धन-श्रभ्युदयनिःसचैव पराब मुख बन गए है । व्यक्तिवाद की इत्यंभूता अनर्थकारिणी प्रवृत्ति तो उन प्रतीव्यदेशों में भी नहीं है, जिन में कभी भी दिग्देशकालातीत आत्मब्रह्म के व्यवस्थित समन्वय का प्रयास नहीं हुआ । उन का व्यक्तित्व भी ' स्वराष्ट्र ' के प्रति तो अधिकांश में मनोबुद्विशरीरापगा की भावना से ही सम-लङ्कृत सुना गया है, जबकि श्रात्मासाम्य के जनन्मदाता इस पावन भारतराष्ट्र की मानवप्रना श्राज अधिकांश में जघन्यतम व्यक्तित्वविमोहनात्मक - व्यक्तित्व से अनुप्राणित वैय्यक्तिक - कामार्थभोग के समतुलन में राष्ट्र की कामार्थसमस्था के साथ विश्वासघात कर डालने में भी लज्जा का अनुभव नहीं कर रही, इससे अधिक भारतराष्ट्र का नैतिक तथा सांस्कृतिक अधःपतन और क्या होगा है । दिगदेशकालानुबन्धिनी सीमा में प्रतिष्ठित मानव का व्यक्तित्व ही विमुग्धभावापन्न बना करता है, और ऐसा विमुग्ध व्यक्तित्व ही दिग्देशकालानुबन्धिनी उस सामयिकी कारयाता के प्रति तल्लीन बना रहता है, जिसके माध्यम से ही युगधर्म्मनिवन्धन स्वार्थी की पूर्ति सम्भव मानी गई है । यही वैय्यक्तिक स्वार्थ भारतीय उस वेदपुराणशास्त्र की सीमा में भी गत अनेक शताब्दियों से प्रविष्ट होता रहा है, जिसके आकर्षण से ही शास्त्रीय सिद्धान्त भी दिग्देशकालानुबन्धी सत्तातन्त्रों की परिवर्तनशीला तात्कालिकी मान्यताओं के अनुपात से तद्युग के कारणवादी दिग्देशकालविमूढबुद्धिवादी विद्वानों के द्वारा यथेच्छ परिवर्तित होते आ रहे हैं, जिस युगधर्म्मनिबन्धना परिवर्तनपरम्परा से ही सम्प्रदायवाद - परम्पराओं से एकान्ततः संस्पृष्टमी, विशुद्ध ज्ञान विज्ञानात्मक की वेदशास्त्र आज इतर साम्प्रदायिक मतवादात्मक मानसिक-शब्दजाल की भाँति केवल ' साम्प्रदायिकअन्थ ' ही प्रमाणित होगया है और यो दिग्देशकालानुबन्धी- व्यक्ति-स्वविमोहनात्मक काल्पनिक व्यक्तित्व के कारणता नुवन्धी आकर्षण के दुष्परिणाम स्वरूप ही भारतीय विद्वत्-प्रज्ञा तिगत अनेक शताब्दियों से वेदपुराण - शास्त्र ही, तत्रापि ब्राह्मण, तथा पुराण के श्राख्यानों की ज्ञानविज्ञानात्मिका परिभाषाओं की तत्त्वमूला संवित से वञ्चित ही बनती चली आ रही है । महर्षि दीर्घतमा के उद्बोधक - सूत्रानुसार आज भी भारतीय ब्राणणप्रज्ञा यदि अपने आपको व्यक्तित्त्व-विमोहनात्मक- काल्पनिक - व्यक्तित्व का परित्याकर दिग्देशकालातीत अनन्त समब्रह्ममूलक- वास्तविक - व्यक्तित्त्व के माध्यम से गुहानिहितनृत्या एकान्तनिष्ठा से वेदपुराणस्वाध्याय में अपने आपको प्रवृत्त करदेती है, वो निश्चयेन स्वतः ही इस के ऋजुभावापन्न निष्कारणात्मक बीघ्र धरातल पर वेदार्थ का पारिभाषिक बोध स्वत: ही श्रावित होसकता है, और इस पथ के अतिरिक्त वेदपुराणशास्त्र के पारिभाषिक तथ्य - समन्वय के लिए " नान्यः-पन्था विद्यते अयनाय " । यही उस प्रकान्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न का प्रासङ्गिक समन्वय - निष्कर्ष है, जिस प्रश्न के द्वारा वेद - पुराणानुगत श्राख्यानोपाख्यानों की परिभाषाएँ श्राज विद्वानों के लिए भी जटिलतमा समस्या प्रमाणित होरही है. इस्पन मतिविस्तरेणा - वेदपुराणनिबन्धन पारिभाषिक - बोधानुगत प्रासङ्गिक महत्वपूर्ण प्रश्न-समाधान - प्रसङ्गेन । उक्त सन्दर्भ के माध्यम से अत्र निवेदनीय प्रमुख लक्ष्य यही है कि, मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के-' विधि ' नामक ब्राह्ममान की आख्यानोपाख्यानानुगता पारिभाषिक शब्दावली के तत्वार्थ समन्वय के बिना, एवं पुराणशास्त्र की तथाविधा परिभाषाओं के समन्वय के बिना वेदशास्त्र का ज्ञानविज्ञानात्मक तात्त्विक समन्वय भी असम्भव है, एवं श्राचारात्मिका क्रमव्यवस्था का भी समन्वय श्रसम्भव है । श्रतएव ब्राह्मण, ३४

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड और पुराण, दोनों का पारिभाषिक - स्वाध्याय उस प्रत्येक द्विजाति के लिए अनिवार्य्यं ही माना जायगा, जो निगमागमपुराणसम्मता भारतीय - प्राच्य संस्कृति के ज्ञानविज्ञानात्मक अभ्युदय - निःश्रेयस संसाधक उदर्क से अपने राष्ट्र को समन्वित करने की कामना रखता है । इन दोनो महान् स्तम्भों के पारिभाषिक - समन्वय के बिना भारतीय - श्रार्ष - संस्कृति का मौलिक स्वरूप कदापि समन्वित नहीं होसकता । जैसाकि प्रथमखण्डानुगता प्रस्तावना में निवेदन किया जाचुका है, ब्राह्मणग्रन्थों में ' शतपथब्राह्मण ' नामक ब्राह्मणग्रन्थ का अनेक कारणों से प्रमुख स्थान है । अन्यान्य ब्राह्मणभन्थों की अपेक्षा इस ब्राह्मणग्रन्थ की भाषा भी ' भारती ' नाम से प्रसिद्धा प्रचलिता संस्कृतभाषा से अधिकांश में समतुलिता है, अतएव विशेष-रूपेण बोधगम्या है । एतदतिरिक्त अपने युग के दुद्धर्ष वैज्ञानिक भगवान् याज्ञवल्क्य के महान् मेधावी शिष्य मधुश्रवा के द्वारा संकलित किंवा स्वयं याज्ञवल्क्य के द्वारा ही दृष्ट यह शतपथब्राह्मण वैज्ञानिकी - सर्व-परिभाषाओं का समन्वयात्मक - वैसा पूर्व, एवं पूर्ण ब्राह्मणग्रन्थ है, जिसमें शथपथेतर ब्राह्मणों से अनुगता वैज्ञानिक परिभाषाओं का भी भगवान् याज्ञवल्क्य ने सूत्ररूप से संग्रह कर लिया है । इन्हीं सब कारणों से यह ब्राह्मणग्रन्थ सौ ( १०० ) अध्यायों के विस्तारपथ का अनुवर्त्मा बनता हुआ ' शतपथ ' नाम से प्रसिद्ध होरहा है | स्वयं भगवान् बादरायण ने भगवान् याज्ञवल्क्य के मुख ' से ' शतपथब्राह्मण ' की तथोक्ता अपूर्वता का निम्न लिखित शब्दों में यशोगान किया है— याज्ञवलक्य - उवाच - श्रव्यक्तस्थं परं यत्तत् पृष्टस्तेऽहं नराधिप! ॥ परं गुह्यमिमं प्रश्नं शणुष्वावहितो नृप! ॥ १ ॥

यथार्षेणेह विधिना चरताऽवनतेनह ॥ मयाऽऽदित्यादवाप्तानि यजूंषि मिथिलाधिप! ॥ २ ॥

महता तमसा देवस्त पिष्णुः सेवितो मया ॥ प्रीतेन चाहं विभुना सूर्य्येणोक्तस्तदानघ! ॥३ ॥

वरं वृणीष्व विप्रर्षे! यदिष्टं ते सुदुर्लभम् ॥ तत्तं दास्यामि प्रीतात्मा मत्प्रसादो हि दुर्लभः ॥ ४ ॥

ततः प्रणम्य शिरसा मयोक्तस्तपतां वरः ॥ यजूंषि नोपयुक्तानि क्षिप्रमिच्छामि वेदितुम् ॥ ५ ॥

ततो मां भगवानाह वितरिष्यामि ते द्विज! ॥ ' सरस्वती ' ह ' वाग् ' भूत्वा शरीरं ते प्रवेदयति ॥ ६ । ततो मामाह भगवा नास्यं स्वं विवृतं कुरु! ॥ विवृतं च ततो मेहयं प्रविष्टा च सरस्वती ॥ ७ । ततो विदह्यमानोऽहं प्रविष्टोऽम्भस्तदानघ! ॥ श्रविज्ञातादमर्षाच्च भास्करस्य महात्मनः ॥ ८ ॥

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किश्चिदिव आवेदन ततो विदद्यमानं मामुवाच भगवान् रविः ॥ मुहूर्त्त ं सह्यतां दाहस्ततः शीती भविष्यति ॥ ६ ॥

शीतीभूतं च मां दृष्ट्वा भगवानाह भास्करः ॥ प्रतिष्ठास्यति ते वेदः सखिलः सोत्तरो द्विज! ॥१० ॥ ·

" कृत्स्नं शतपथं चैत्र प्रणेश्यसि द्विजर्षभ! ॥ तस्यान्ते चापुनर्भावे बुद्धिस्तव भविष्यति ॥ ११ ॥

प्राप्स्यसे च यदिष्टं तत्सांख्ययोगेप्सितं पदम् ॥ ” एतावदुक्त्वा भगवानस्तमेवाभ्यवर्त्तत ॥ १२ ॥

ततोऽनुव्याहृतं श्रुच्चा गते देवे विभास ॥ गृहयागत्य संहृष्टोऽचिन्तयन् - वै सरस्वतीम् ॥ १३ ॥

ततः प्रवृत्तातिशुभा स्वरव्यञ्जनभूषिता ॥ ओङ्कारमादितः कृच्वा मम देवी सरस्वती ॥ १४ ॥

ततोऽहमर्थ्य विधिवत् सरस्वत्यै न्यवेदयं - ॥ तपतां च वरिष्ठाय निषण्णस्तत्परायणः ॥ १५ ॥

“ ततः शतपथं कृत्स्नं सरहस्यं ससंग्रहम् ॥ चक्रे सपरिशेषं च हर्षेण परमेण ह ॥ १६ ॥ "

बीजमेतत् पुरस्कृत्य देवीं चैव सरस्वतीम् ॥ सूर्यस्य चानुभावेन प्रवृत्तोऽहं नराधिप! ॥ १७ ॥

कर्त्त शतपथं चेदमपूर्व च कृतं मया ॥ यथाभिलषितं मार्ग तथा तच्चोपपादितम् ॥ १८ ॥

- महाभारत, शा ० मो ० ३१८ श्र ० । अपनी तथाविधा कृत्स्ना - विशेषताओं के अनुबन्ध से ही हमने शतपथब्राह्मण के ही पारिभाषिक— समन्वय को प्रमुखता प्रदान की है इतर ब्राह्मणग्रन्थों के समतुलन में 1 मौलिक - परिभाषाओं के चिरन्तनेतिवृत्त समन्वय के बिना ब्राह्मणग्रन्थोक्त क्रत्वर्थ, तथा पुरुषार्थ रूप किसी भी गौण - प्रधान - कर्म्म की सृष्टिरहस्य-समवयात्मिका व्यवस्था व्यवस्थित नहीं होसकती । और तत्त्वसमन्वयव्यवस्थात्मिका ज्ञानविज्ञानात्मिका वे परिभाषाएँ, कारणतावाद के वारुणपाशात्मक निग्रह से शताब्दियों से अभिभूतप्राया ही बनतीं चलीं आ रहीं हैं । यही वह महतो जटिलता है, जिसके समन्वय के लिए हमें प्रत्येक पारिभाषिक शब्द के पारिभाषिक ज्ञान विज्ञान सम्मत चिरन्तन- इतिवृत्त का अनिवार्य्यरूपेण उपबृहण करना ही पड़ता है, एवं उससे सम्बन्ध रखने वाली पारिभाषिकी पुररुक्ति, तथा इतिवृत्त - विश्लेषणात्मक - विस्तार, दोनों वैसे माध्यमों का भी अनुगमन करना ३६

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ही पड़ता है, जिनके अनुबन्ध से ही ' शतपथ ब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्य ' का पृष्ठात्मक - लिपिरूप - कलेवर अनुमानत; बीससहस्रपृष्ठों में सम्पन्न हुआ है । परिभाषाओं के प्राथमिक- स्पष्टीकरणानुबन्ध से चतुद्द शकाण्डा-त्मक- शतपथ के केवल प्रथमकाण्ड का ही भाष्य अनुमानतः तीन सहस्रपृष्ठों में लिपिबद्ध हुआ है, जबकि -आगे के काण्ड यथासम्भव सहस्र - सहस्र - पृष्ठानुगति के ही अनुगामी बने हुए हैं । आज से बीस वर्ष पूर्व लिपिबद्ध किया हुआ यह विस्तृत शतपथभाष्य प्रकाशनावसरों पर पुनः संशोधन की तो अनिवार्य्यरूपेण अपेक्षा रख ही रहा है । और इसी दृष्टि से प्रकाशन वेला से पूर्व पुनः प्रकाशन - लक्षीभूत भाग का आद्यन्त पुनः प्रतिलिपिकरण अनिवार्य्य बन जाता है । इत्थंभूत महत्त्वपूर्ण - पारिभाषिक ग्रन्थ को दिग्देशकाला-नुबन्धिनी तात्कालिकी कण्डूपशान्तिमात्र के लिए झटिति एक हेलया यथेच्छुरूपेण प्रकाशित कर देना तो श्रात्महनन ही माना जायगा । बहुत सम्भव है, हम अपनी शारीरिक - जर्जरितावस्था के अनुबन्ध से इस भौतिक जीवन में सम्पूर्ण शतपथ का प्रकाशन यथाविधि न कर सकें । किन्तु जितना अश प्रकाशित होगा, उसकी परिभाषाओं के माध्यम से यह तो आस्थापूर्वक उद्घोष किया ही जासकेगा कि, भविष्य में इस साहित्य के पारिभाषिक - मन्थन के लिए सज्जीभूत महानुभावों के लिए यह प्रकाशितभाग अवश्यमेव श्रंशतः तो सहयोगी ही प्रमाणित होगा । एकमात्र इसी तुष्टि के आधार पर यथाशक्ति शतपथब्राह्मणभाष्य का प्रकाशन खण्डशः प्रक्रान्त हुआ है गतवर्षं से – ‘ राजस्थानवैदितत्त्वशोधसंस्थानजयपुर ' के द्वारा । गतवर्ष प्रथमकाण्डानुगत जो प्रथमखण्ड प्रकाशित हुआ था, उसके प्रमुख विषयों का प्रास्ताविक के उपक्रम से ही सिंहावलोकनन्यायेन संस्मरण किया जा चुका है ( देखिए पृ ० सं ७ ) । ठीक एक वर्ष के अनन्तर प्रकाशित होने वाले प्रथम-काण्डानुगत - द्वितीयखण्ड के प्रस्तुत प्रकाशन से अनुप्राणित प्रमुख विषयों का भी अत्र सन्दर्भसङ्कृति के लिए नामस्मरण कर लिया जाता है । प्रथमकाण्डानुगत - प्रस्तुत - द्वितीय - खण्ड में ( प्रथमकाण्डानुगत - पूर्वप्रकाशित - प्रथमखण्ड के विषयों से आगे क्रमप्राप्त ) जिन - प्रमुख याज्ञिक - विषयों का पारिभाषिक – समन्वय हुआ है, उनका निम्न लिखितरूपेण क्रमविभाजन हुआ है । २

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 38 का मूल पृष्ठ
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प्रथमकाण्डानुगत - द्वितीय - तृतीय - चतुर्थ - पञ्चमाध्यायात्मक-द्वितीयखण्ड में प्रतिपादित प्रमुख - कम्र्मों की तथा - स्मारकविषयों की तालिका प्रधानकर्माणि उपवेष सम्पादनम्, अग्नौ कपालोप--१० धानेन हविः परिपाकञ्च पिष्टेनोदकमिश्रितेन-११ पुरोडाशसम्पादनम् पात्री निर्णेजनम्-१२ पुरोडाशमी मांसया - समन्वितम् वेदिकाकरणम् -- स्तम्बय जुई रां, १३ भूविशोधनञ्च बेदिपरिग्रहः १८ द्रव्यसंस्काराः १५ १६ श्रन्यग्रहणम् इध्मानुगतः -- कर्म्मसंग्रहः १७ सामिधेन्यनुवचनम् १८ पर्वाषारतिकर्त्तव्यता १६ उत्तराघात कर्त्तव्यता २० प्रवरणकम्र्मेतिकर्त्तव्यता २१ स गादापनम् - श्राभावर्ण-२२ प्रत्याश्रावणञ्च २३ प्रयाजब्राह्मणम् प्रधानकर्म्मसंख्या - १४ क्रमानुगता पृष्ठसंख्या ६११ ६६१ ७०४ ७६८ ८४४ ६५६ १०३७ १०७७ ११३५ १३१७ १३५७ १३६७ १४०५ १४७५ भाष्यपृष्ठसंख्या - ११३२ स्मारक विषय संख्या ६२२ ५१६ १३१ ६६८ I • I t ७७६ २८६ ३३६ १७६६ ४१३ २६२ ५१० ३ स्मारक विषय संख्या संकलन-८५६१

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 39 का मूल पृष्ठ
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड प्रथमकाण्डानुगत पूर्वप्रकाशित प्रथमखड, तथा प्रस्तुत द्वितीयखण्ड के संकलनात्मक अठारह सौ पृष्ठात्मक विज्ञानभाष्य में आरम्भ के ' व्रतोपायनकर्म्म ' से आरम्भ कर प्रस्तुत खण्ड के अन्तिम २३ वें ' प्रयाजब्राह्मण - ' पय्यन्त जिन स्मारक - विषयों का परिभाषारूपेण समावेश हुआ है, उन के आधार पर ही स्थालीपुलाकन्यायेन-शतपथविज्ञानभाष्य की पारिभाषिकी उपयोगिकता का मूल्याङ्कन सम्भव बन सकता है । प्रथमखण्ड में अनु-मानतः ४६०० परिभाषाओं का, तथा प्रस्तुत द्वितीयखण्ड में अनुमानतः ८५०० परिभाषाओं का, सम्भूय-१३००० ( तेरह सहस्र ) पारिभाषिक तथ्यों का संस्मरण कराने वाले प्रथमकाण्डानुगत प्रकाशित दोनों खण्डों की तथाकथिता परिभाषाओं के संस्मरणाधार पर निश्चयेन उन अनेक ज्ञानविज्ञानात्मक सृष्टिविद्यानिबन्धन तथ्यों का सर्वात्मना नहीं, तो अंशतः तो दिग्दर्शन हो ही जाता है, जिस पारिभाषिक दिग्दर्शन के बिना रहस्यपूर्णं ब्राह्मणग्रन्थों के रहस्यात्मक - पारिभाषिक - सृष्टीतिष्टत्त सर्वथा परोक्ष ही बने रहते हैं । जैसा कि - प्रास्ताविक के उपक्रम में हीं निवेदन किया जाचुका है, वर्त्तमानयुग के मानवों की प्रज्ञा दिग्देशकालानुबन्धिनी तात्कालिकी उपयोगिता, एव तन्निबन्धना कारणता के आधार पर ही किसी लक्ष्य की ओर प्रवृत्त हुआ करती है, जिस कारणता का ' ब्राह्मणेन निष्कारणं पडङ्गो वेदेऽध्येयो ज्ञेयश्च ' रूपेण यद्यपि सर्वथा निराकरण किया जाचुका है । तथापि तथाविधा सामयिकी उपयोगिता के पक्षपाती मुक भखिविशेष के अनुगामी पाठकों की तुष्टि के लिए ' युगानुगता उस उपयोगिता ' का भी दिग्दर्शन श्राव-श्यक होजाता है, जिस के बिना इत्थंभून शास्त्रावलोकन - स्वाध्याय - चिन्तन - मनन- श्राचरणादि में तथाविध विशेष वर्ग की प्रवृत्ति नहीं हुआ करती । इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए ही ' प्रथमकाण्ड के प्रास्तविक ' में स्वयं - वेदाक्षरों के आधार पर ही वेदशास्त्र की दृष्टफलजनकतानुबन्धिनी सामयिकी उपयोगिता का भी स्पष्ठीकरगा कर दिया गया है । यह सब कुछ होने पर भी आज के युग का महान् तर्क - ' समय नहीं है ' रूपेण दिग्-देशकालाक्रान्त मानव - विशेषों को सतत उत्पीड़ित ही करता रहता है । और ' आज के अर्थप्रधानयुग में किसे इतना समय है, जो ऐसे बड़े आदि " इत्थंभूत बड़े ग्रन्थों को पढ़ सके आदि काल्पनिक — नितान्त भावुकतापूर्ण तर्क के माध्यम से जो महानुभाव इस दिशा में ' बहुविस्तृत ' की घोषणा कर क्रमिक - स्वाध्याय से तटस्थ बन जाते हैं, उन के परितोष के लिए प्रतिपादित प्रमुख कम्मों से अनुप्राणिता कुछ एक पारिभाषाओं का स्थालीपुलाकन्याय - समतुलनदृष्ट्या अत्र प्रास्तविक में भी दिग्दर्शन करा देना प्रासङ्गिक ही बन जाता है । प्रस्तुत ' द्वितीयखण्ड ' में क्रमप्राप्त ' उपवेषसम्पादनम्, अग्नौ कपालोपधानेन हविः - परिपाकम् ' नामक ११ वें कर्म्म से आरम्भ कर ' प्रयाजब्राह्मण ' नामक २३ वें फर्म- पर्य्यन्त कुल १४ विषयों का स्वरूप - दिग्दर्शन- प्रयास हुआ है, जिन में से अत्र उदाहरणविधि से कुछ एक पारिभाषिक - तथ्यों का ही दिग्दर्शन पर्य्यान्त मान लिया जायगा । वही विषय क्रमानुगति के अनुचन्ध से क्रमश: अत्यन्तः संक्षेप से पाठकों के अत्र समक्ष उपस्थित होरहा है । ३६

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 40 का मूल पृष्ठ
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शतपथभाष्य - द्वितीयखण्डानुगत - १४ प्रमुख - कम्र्मों के प्रसङ्ग से अनुप्राणित - कतिपय " पारिभाषिक - उदाहरण ” ( १० ) - उपवेषसम्पादन- हविःपारापाकात्मक कर्म्म प्रसङ्गतः -समन्विता - प्रासङ्गिकी ' तप: ' - शब्द - निबन्धना - परिभाषा १ त्याग, तपस्या, बलिदान, रूपेण तीनों शब्द कुछ समय से लोकसामान्य में प्रसिद्धि - पथ के अनु-गामी बने हुए हैं, जिन इन तीनों लोकप्रसिद्ध शब्दों में से मध्य के - ' तपस्या ' शब्द मे अनुप्राणित- ' तपः ' शब्द का ही भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् ' इस श्रुतिवचन के पारिभाषिक - समन्वय के अाधार पर स्वरूप - विश्लेषण - प्रयास हुआ है पृष्ठसंख्या ६४५ से ६५८ पर्यन्त | ' त्याग - तपस्या - बलिदानत्रयी ' से अनु-प्राणित ' तप ' का अर्थ माना जारहा है- ' शारीरिक श्रममात्र, और इसी भौतिक - श्रम पर ' तप ' शब्द का उपराम कर दिया जाता है । उधर दार्शनिक दृष्टि के अनुसार ' तप ' उस लौकिक लोकोत्तर - श्रपासनिक-ध्वनादि से श्रनुगत गुह्यतम प्राणव्यापार मात्र है, जिस के अनुगामी को ' तपस्वी ' कहा जाता है, एवं जिस की तपश्चर्या में मानसिक क्लेश के साथ साथ पञ्चाग्नितपनमूलक शारीरिक उत्पीड़नादि भी समन्वित हैं । यो उस ओर की दार्शनिकी तपश्चर्या ने, तथा इस ओर की देशातिमानानुगता तपस्या ने तपः शब्द के उस पारिभाषिक तथ्य को सर्वचैत्र अभिभूत कर लिया है, जिस श्रभिभूति से न तो उस ' तपश्चर्य्या ' का ही कोई वास्तविक - तथ्य - समन्त्रय सम्भव, एवं नैव श्राज की ' तपस्या ' का ही कोई अर्थ | प्रथमकर्म्म ( १० ) -प्रसङ्गतः तपः शब्द के उसी पारिभाषिक तथ्य का दिग्दर्शन कराते हुए प्रकृतिसिद्ध उन तीन महान् तपोभावों की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित किया गया है, जो तपस्त्रयी क्रमशः ब्राह्मतप - वैष्णत्रतप- रौद्रनप, नाम से प्रसिद्ध है । पञ्चमहाभूतात्मक महतो महीयान् ब्रह्माण्ड की स्वरूपसंस्थिति जिन प्राकृतिक - नित्याक्षरदेवदेवताओं के आधार पर अवलम्बित है, वे क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र ( महादेव ) नाम से प्रसिद्ध हैं । इन तीनों देवताओं की त्याग बलिदानानुगता तपश्चर्या के सह समन्वय से ही पञ्चपुण्डीरा - प्राजापत्या - बल्शा से कृतरूप ४०