Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 221–230
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 221–230
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड १६६ - स्व: - श्रौर पर: - रूप तन्त्रों के पारिभाधिक तत्वार्थ १६७ - स्वतन्त्र - परतन्त्र - भावानुगत आत्मभाव, और अनात्मभाव का पारिभाषिक - सम-न्वय १६८ - आत्मानुगता स्वतन्त्रता, और श्रेयोभाव का समन्वय १६६ - श्रनात्मानुगता परतन्त्रता, श्रौर प्रयो-भाव का समन्वय १७० - तन्त्र शब्दार्थ पर दृष्टिनिक्षेप १७१ - तन्त्रशब्द के लोकप्रचलित विविध भावों का संस्मरण १७२ - प्रकृतिरूप प्रधानतत्त्व १७३ - अतरङ्गा, और बहिरङ्गा - प्रकृति १७४ - विश्वात्मिका भूतप्रधाना बहिरङ्गप्रकृति १७५ - विश्वसञ्चालिका प्राणात्मिका अन्तरङ्ग-प्रकृति १६१ - क्षरः परः ( २ ) ६८६ १६२ - अक्षरः- तन्त्रम् ( ३ ) 11 " " 1 १६३ –स्वयम्भूः परमेष्ठी च स्व: ( १ ) १६४ - चन्द्रमाः, पृथिवी च परः ( २ ) १६५ - सूर्य्य: -तन्त्रम् ( ३ ) १६६ - स्वतन्त्र तथा परतन्त्र शब्दों का पारि भाषिकाविर्भाव १६७ - आत्मा का वाचक ' स्वतन्त्र ' शब्द १६८ - श्रात्मा स्वतन्त्रः, श्रात्मा परतन्त्रः- वाक्यों का पारिभाषिक समन्वय १६६ - स्वतन्त्रशब्द का ' पर ' वाचकरव २०० - स्वानुगामी तन्त्र, और ' स्वतन्त्र ' " " २०१ - परानुगामी तन्त्र, और ' परतन्त्र ' " २०२ - स्वतन्त्र की परतन्त्रता 11 ६८७ १७६ - प्रधानरूपा प्रकृति की क्षेत्रज्ञरूप में परिणति " १७७ - क्षेत्रज्ञ, और विज्ञानात्मा १७८ - विश्ववितान - कर्त्री प्रधान प्रकृति १७६ - प्रकृति का तननात्मक विस्तार १०- तननात्मक तन्त्रभाव १८१ - श्राधिदैविक विश्व का स्वरूपदर्शन १८२- पुरुष - प्रकृति विकृति भावत्रयी के माध्यम से स्वतन्त्र - परतन्त्र - शब्दों का रहस्यात्मक-पारिभाषिक समन्वय 22 १८३- श्रात्मविवर्त का दिग्दर्शन, और स्वातन्त्र्य-पारतन्त्र्य - निष्कां १८४ - श्रात्मा स्व: ( १ ) १८५ - श्रनात्मा परः ( २ ) " 11 12 " " " ६८७ 31 २०३ - परतन्त्र की स्वतन्त्रता " 21 ६८८ " 1 11 33 २०४ संस्था से भुगत स्वतन्त्र, परतन्त्र शब्द " २०५ आत्मस्वातन्त्र्य पारतन्त्र्य का विचार-समन्वय २०६ - तन्त्रानुगतः स्वः - स्वतन्त्रः, श्रौर श्रात्म-वाचक स्वतन्त्र शब्द का निर्वचन २०७ - आत्मा की ' पर ' भावासक्ति, और पर-तन्त्रानुगतिरूप ' परतन्त्र ' का पारिभाषिक-स्वरूप समन्वय २०८ - ' पर ' की आसक्ति की विश्राम भूमि २०६ -स्व की पर रूप में परिणति, एवं तन्त्रता का अपहरण, और पारतन्त्र्य का पारि-भाषिक स्वरूप- समन्वय " २१० - तन्त्रानुगति से अनुप्राणित स्वतन्त्र, और परतन्त्र शब्दो का श्रात्मवाचकता-नुबन्ध से पारिभाषिक समन्वय २११ - श्रनुकूल तन्त्रात्मक आत्मा की मित्ररूपता २१२ - प्रतिकूल तन्त्रात्मक श्रात्मा की शत्रुरूपता " " ESE " " १८६ - प्रधानम् - तन्त्रम् ( ३ ) 3 ) १८७ - पुरुषः स्वः ( १ ) १८८ - विकृति: पर: ( २ ) " " २१३ - विभिन्न दृष्टि और निर्वाचन १८६ - प्रकृतिः - तन्त्रम् ( ३ ) 22 २१४- आत्मबन्धु, और श्रात्मरिपु " १६० - श्रव्ययः स्वः ( १ ) 13 २१५ श्रात्मा का स्वजन, और स्वतन्त्रता " II
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विषयसूची २१६ - आत्मा का परबन, २१७ -- आत्महितैषी तन्त्र, श्रौर परतन्त्रता ६८६ और स्वातन्त्र्य २१८ - श्रात्मप्रतिद्वन्द्वी तन्त्र, और पारतन्त्र २११ - स्वतन्त्र- परतन्त्र शब्दों की विचारोपरति २२०-- अपना, और पराया का पारिभाषिक समन्वय और २२१- अविनाशी श्रव्यय विनाशी चर २२२ - स्व - भाव की पर भाव में परिणति २२३- श्रव्ययात्मानुगत स्व - भाव से अनुप्राणित तन्त्रानुगत अभाव निबन्धन स्वतन्त्र परतन्त्र शब्दों का पारिभाषिक समन्वय २२४ - विविध दृष्टियों से स्व - पर, तथा तन्त्रभावों का पारिभाषिक - दिग्दर्शन २२५- अनुगमभावापन्न स्वतन्त्र - परतन्त्र शब्द 19 २२६ - स्वतन्त्रता, और परतन्त्रता की व्यापकता " २२७ - प्रकृति सहयोगी पुरुष का स्वातन्त्र्य २२८ - विकृतिपरवश पुरुष का पारव्य २२६ - मौलिक- परिभाषा, श्रौर स्वतन्त्रता, परन्त्रता २३०-- श्राध्यात्मिक जगत् की स्वन्त्रता - परतन्त्रता का अन्वेषण एवं सम्मूलाधारेण स्त्री-स्वातन्त्र्य की मीमांसा का उपक्रम २३१- श्राधिदैविक प्राकृतिक विश्व का स्वरूप-दिग्दर्शन २३२- पुरुष - प्रकृति - विकृतिय २३३ श्रात्मा - प्राण - पशु त्रयी -२३४- चतुर्विध स्थूलभावों का संस्मरण २३५ श्राधिदैविक और अध्यात्मिक - विवर्श-का स्थूल - परिचय, एवं तत्साम्य - प्रदर्शन २३६ प्रजापति का संस्मरण २३७ श्रधिदैविक से आध्यात्मिक का आविर्भाव २३८ -- यज्ञधरातल रूप आत्मभाव 93 27 33 २४० - पृथिवी से समन्वित चन्द्रमा का यजमान-पत्नीव २४१- अग्निमय सूर्य " और सोममय- चन्द्रमा २४२- सौर अग्नि का प्रभाग ताग्नि ६६२ 39 11 11 २४३- चान्द्रोम का प्रवमागतसम २४४ श्रुतसोमस्थानामिका उत्तरादिक 19 २४५ - ताग्निस्थानात्मिका दक्षिणा दिकू 17 २४६ सोम का समन्वय और पद् का निर्माण ΕΕ २४७ -- तुसमष्टिरूप सम्वत्सरप्रजापति २४८ - पार्थिवप्रनोत्पत्ति का प्रवर्तक सम्वत्सर-प्रजापति २४६ – वृषा सृष्टि, और अग्नि का प्राधान्य २५० योपाटि और सोम का प्राधान्य , २५१- पुरुषस्वरूप निर्मापक नि २५२- स्त्रीस्वरूपनिर्मापक सोम २५३ - मित्ररूप भोग्यभाव, और सोम २४४ श्रग्नि और सोम का सहज सख्यभाव, और सोम का म्योकमा २५५ ' अग्निगार ' इत्यादि अति का संस्मरण २५६- श्रग्नि की सोमानुगता बलवत्ता 19 २५७ ६६२ 31 29 यमावानुगत बलविकास २५८ - हृदयस्थ उक्थचल की सत्यरूपता २५.६ - सत्य के आधार पर बल का प्रयोग २६० सत्य और बल की प्रतिद्वन्द्विता २६१ - बलं सत्यादोनीयः २६२ बलं वाव विज्ञानाद्भूयः २६२ - बलवान् अग्नि, निर्जल सोम २६४ श्राग्नेय बलवान् पुरुष 39 39 " 39 " 37 11 " 39 19 19 17 19 २६५ - सोम्या श्रतएव श्रबला स्त्री २६६- बलवान् वृषा, श्रवला योषा २६७ - सत्य भावोपेत पुरुष " 97 99 २६८ प्रनृतभावोपेता ( श्रुतसोमभावोपेता ) स्त्री " २३६ - यज्ञ के यजमान सूर्यनारायण 21 २६- आग्नेय पुरुष सौम्या स्त्री ६४
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२७० - भोक्ता पुरुष, भोग्या स्त्री २७१ - स्वप्रतिष्ठात्मक पुरुष २७२ - परप्रतिष्ठात्मिका स्त्री २७३ - पुरुष का प्राधान्य, और स्त्री का गौणत्व " " २७४ - अबला स्त्री और तत् उपास्यपद - प्राप्ति का समन्वय २७५ - सबल, और निर्बल भावों का पारिभा धिक स्वरूप - दिग्दर्शन २७७ - बल की स्वरूप परिभाषा विषयसूची ६६३ २६६ - अन्नप्रदान, और रुद्रोत्तेजना की उप-शान्ति ६६५ 27 २६७ -- ब्राह्मणश्रुत्यर्थ का संस्मरण २६८ - रुद्रदेवता की शान्ति - तुष्टि २६६ -- श्राधिदैविकरुद्र का संस्मरण ३०० -- रुद्राग्नि की रुदनात्मिका द्रुतावस्था, ६६४ ३०१ -- रजत, ओर रुदन " " २७६– ' अबला ' व्यवहार का आश्चय्यमयत्त्व " २७८ - निर्बल की स्वरूप - परिभाषा २७६ - संकोचभाव, और बलप्रतिमा " २८० - विकासभाव, और नितंबलता की प्रतिमा २१- बद्धमुष्टिता, और बलवत्ता २८२ - मुक्तहस्तता, और निर्बलता २८३- संकोच भावापन्ना नपरिभाषा २८४ - विकासभावापन्ना निर्जलपरिभाषा २८५ - विकासधर्म्मा अग्नि, और उसका पारि-" ३०२ - ( क ) रजतदक्षिणा का निषेध ३०२ ( ख ) रुद्र के लिए सोमाहुति प्रदान १०३ - घोररुद्र की शिवातनूरूप में परिणति १०४ - सोमाहुति का अभाव, और तत्परिणाम 11 १०५ - अग्नि का चरम विकास, और सोम का आविर्भाव ३०६ - सोम का चरमविकास, और अग्नि का श्राविर्भाव ३०७ - मानव का रुदन और श्रापोभाव ३०८-- अग्नि की निःशेषता, और शैत्य ३०६ - बुभुक्षित मनुष्य की अन्नरूप में परिणति ३१० - मानव की शबान्नरूप में परिणति ३११ - श्मशानाग्निरूप क्रव्यादग्नि " " " 33 " 2 " 2 19 27 : " " 13 23 " ६६६ भाषिक निर्बलत्व २८६ -- संकोचधर्म्मा सोम, और उसका पारि-भाषिक सबलत्व २७ अग्निप्रधान पुरुष का निर्बलत्त्व २८ सोमप्रधाना स्त्री का सवलत्व ९ ८६ - स्त्रीस्वातन्त्र्य, और तत्प्रासङ्गिक शिव-रुद्र - भाव का संस्मरण २६० श्रग्निर्वा रुद्रः २६१ - विश्वसंहारक रुद्रदेवता २६२ - शक्तिसमागम से बराङमुख रुद्र का-रोदनक,, २६३ - रुद्र का पारिभाषिक निर्वचनार्थ २६४ - रुद्ररुदनकारण - जिज्ञासा, और तत्समा-धान २६५ न्नादरुद्र की उत्तेजना " ३१२ - भोक्ता की भोग्यरूप में परिणति 33 " 39 " ६६५ " " २३१३ -- रुद्राग्निविवेचन का निष्कर्षार्थं ३१४- सोमसम्बन्धानुगता श्रग्निबलबत्ता ३१५ - अग्निमूर्ति रुद्र की सोम - सम्बन्धेन ' साम्ब -सदाशिव ' रूप में परिणति ३१६- शिव, और शक्ति का संस्मरण ३१७ -- रुद्र, और शिव - भाव का प्रासङ्गिक संस्मरण ३१८ - अन्तर्दृष्टि, और शिव - शक्ति - युग्म ३१६ -- पुरुष का अन्तरात्मा, और सौम्यशुक्र ३२० -- बलघन सौम्यशुक्र, और ब्रह्मचर्य्य ३२१-- बलबन का अबलत्व, किंवा निर्बलत्व ३२२ - शुक्त्युपासना के रहस्यात्मक संस्मरण ३२३ - रहस्यभेद की परम्परा " 1 23 19 11 " " " " 19 " " ६५
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३२४ - सौम्यजगत् की चमत्कारपरम्पररा ३२५- सर्वानुभूत स्पष्टतम- विश्लेषण १२६ -- पुरुष की प्रतिष्ठा रूपा स्त्री ३२७ - सम्पूर्ण पुरुषों का स्त्रीरूपस्व ३२८ - सम्पूर्ण स्त्रियों का पुरुषरूपस्य ३२६ श्रुति का रहस्यात्मक संस्मरण ३३०-- पश्यदत्चण्वान्- न विचेतदन्धः २३१ - पुरुष की महती चिन्ता, श्रोर मित् पायप्रदर्शनोपक्रम २३२ शरीरानुगत भूत और प्राण एवं निबन्धन दृश्य - अदृश्य - जगत् ३३३- शरीरविन का मुख्यकारण २३४ प्राप्यसोम और ब्रह्मणस्पति ३३५ - दर्भ - गङ्गा - सुवर्ण मृगचर्म श्रादि की पवि-त्रता का मूलाधार ' ग्रम्भः ' - तत्त्व २३६- श्रम्भ: -तत्त्व और शारीरिक भूती की प्रतिष्ठा का संरक्षगा ३३७ - अम्भोरूप ब्रह्मणस्पति और मति " ३३८ - श्रसदाचरण, और श्राप्यमाण पर श्राघात 31 २३ ९ - सीम्यशुक्रानुगत भूत, और प्राण २४० का अग्निमयत्व एवं आभ्यन्तर धरातल का सोममयत्त्व ३४१ ग्राम्यन्तर- रात का अग्निमयस्य एवं चाह्मघरातल का सोममयत्त्व ३४२- लौकिक उदाहरणों के द्वारा वस्तुस्वरूप का समन्वय ३४३ - ज्वरावस्था के द्वारा स्थिति का स्पष्टी-करण ३४४ - सर्दी - गम्मी और गम्मी सर्दी का विय ३४५ - प्रकृतिमण्डल का शीतत्त्व, और शरीर का अग्निमयत्त्व ३४६ - प्रकृतिमण्डल का उष्णस्व, श्रौर शरीर का शीतस्य विषयसूची ६६६ ३४७ - बहिर्भयानक भगवान् रुद्र का श्राभ्यन्तर-" सौम्य रूप ६६७ ३४८ - खरे, और खोटे की कसौटी " ३४ ९- प्राकृतिक कसोटी " 39 εεε " ६६ ४५० - शुक्र और शोणित के बाह्य, तथा श्राभ्य-उतर - रूपों का पारिभाषिक रहस्यात्मक-समन्वय ३५१ - पुरुष - व्यवहार का संरक्षण ३५२ पुरुषसंस्था का स्पष्टीकरण और स्वत-, न्त्रता- परतन्त्रता का समन्वय २५३- पुरुष, और स्त्री का स्वरूप निम्मर्पाक दक्षिणोत्तर - भावानुबन्धी- श्रग्नि - सोमात्मक-सम्बरसर प्रजापति ३५४- दक्षिण भाग, और पुरुपत्त्व " २५ - उत्तरभाग और स्त्रीव " ३५६ - दक्षिणभाग का अपेक्षाकृत सभारत्व ३५७-- उत्तरभाग का अपेक्षाकृत निर्मारत्व ३५८ श्राग्नेय दक्षिणभाग की बलवत्ता का पारिभाषिक समन्वय २५६ सौम्य उत्तरभाग की निर्बलता का पारि-भाषिक समन्वय ३६० - सूक्ष्म शक्तिहि, और दक्षिणोत्तर मागौ का समय लिख 29 ३६१ - पुरुषात्मक दक्षिण चिपुरुष " ३६२ -- योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषः " " ३६३ - शारीरिक दैनिक चेष्टाओं के माध्यम से स्थिति का समन्वय ३६४ - वामभाग, श्रौर सौम्या इन्द्रपत्नी ३६५- वामनी और भामिनी ३६६- सोम का गौरव १६७- चरणगति के माध्यम से दक्षिणोत्तरभावों का समन्वय ३६८ उत्तरा सौम्या दिक ३६६ - दक्षिणा - आग्नेयी दिक् ΕΕΕ 19 १००० १००१ " " " 39 " " 39 99
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ३७० - दक्षिणोत्तर - चरणों का ऊर्ध्व अधोभाव १००२ ३७१ - पुरुषकेपुरुषत्व का संरक्षण ३७२ - शक्तिघन सोम का पारिभाषिक रहस्या-त्मक शक्तित्त्व ३७३ - हृदय, और परिधि की अपेक्षा से अग्नि और सोम की स्थिति का स्वरूप - दिग्दर्शन " ३७४ - सोम का अन्तिम परिणाम अग्नि " ३७५ - अग्नि का अन्तिम परिणाम सोम ३७६ - अग्नि, और सोम का समन्वय, तथा शिवतत्त्व का आविर्भाव ३७७ - अग्नीषोमात्मक यज्ञ का उच्छेद, विश्व का प्रलय " " " " " ३६३ - ' स्त्रियः सतीस्त इमे पुंस श्राहुः ' का पारिभाषिक समन्वय १००४ ३६४ - रजो वीर्य्यं के स्वरूप - माध्यम से वस्तुस्थिति का स्वरूप - विश्लेषण ३६५ - दाम्पत्यभाव का मौलिक रहस्य ३६६- श्रद्धनारीश्वर का संस्मरण ३६७ - विश्वशान्ति की मूलप्रतिष्ठा " और ,, ३७८ - शक्तिपुञ्जरूपिणी स्त्री १००३ ३७६ - प्रदीप्त शोणिताग्नि, और स्त्री " " ३८० - अबला - सौम्या स्त्री की बलवत्ता " ३८१ - ' बुद्धिस्तासां चतुर्गुणा ' का वैज्ञानिक समन्वय ३८२ -- सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ३८६ - पुरुषाभिनिवेश से नागरूक स्त्री के शोणि-ताग्नि में पुरुष का सर्वविनाश " ३८४ - ऐतिहासिक सत्य, और स्त्री के दलन मे विश्वसंहार ३८५ -- रोगवद्ध'क स्त्रीस्वातन्त्र्यवाद " " " " " ३६८ -- पुम्भ्रण, और स्त्रीभ्रूण का मिथुनभाव ३६६ -- भ्र णों का अन्न - अन्नादात्मक संघर्ष ४०० - पुत्र सन्तति, और रेत का प्राधान्य ४०१- कन्यासन्तति, और शोणित का प्राधान्य ४०२ - नपुंसकसन्तति, और रनोवीर्य्य का साम्य ४०३ -- भावप्रकाश, और मनुस्मृति ४०४ - स्त्री का सौम्य शरीर, और ग्राग्नेयात्मा ४०५ - प्रत्येक के सौम्य - आग्नेय - भेद से दो दो विभाग ४०६ - स्त्री का पारिभाषिक - प्रकृतिसिद्ध पार-तन्त्र्य " " " " " 9 " १००५ " " " १००६ " ४०७ - स्त्रीसंस्था का स्वरूप- समन्वय ४०६-- पुरुष का अपना तन्त्र ४१०- स्त्री का अपना तन्त्र ४११ -- पुरुष स्वातन्त्र्य की स्वरूपपरिभाषा " " " " १००४ ३८६ - स्त्रीभाव के प्राकृतिक स्वरूप का समन्वय ३८७ - एक पक्षपात की बात ३८८ - श्रपमान सहने में समर्थ पुरुष " ३८६ - अपमान सहने में असमर्थ स्त्री ३६० - पुरुषजाति का ' स्त्री ' उपाधि से संक्षोभ, और तन्निराकरण ३६१ - पुरुष शरीरतः पुरुष, किन्तु शुक्रतत्ः स्त्री ३६२ - स्त्री शरीरत: स्त्री, किन्तु शोणित: -पुरुष " " 39 " 1 " " ४ १ २ स्त्रीस्वातन्त्र्य की स्वरूप परिभाषा 21 ४१३ - स्त्री और पुरुष का सहज मैत्रीसम्बन्ध " " " । ४१४ -- ' सहधम्मं चरताम् ' श्रादेश का संस्मरण 29 ४१५ - समानधर्माचरणमूला मैत्री ४१६-- महत्वशून्य प्रश्न ४१७ – स्त्रीसमानाधाधिकाररूप महान् श्रभ्व, और पुरुष का व्यामोहन ४ ९८- स्त्री और पुरुष के प्रकृतिसिद्ध स्वरूप से अपरिचित याज का भावुक - मानव वर्ग- 27 ४१६-- नियत अधिकारों का समन्वय ४२०-- पुरुष, और स्त्री की आधिकारिकी विभक्ता व्यवस्था का संस्मरण " १००७ " " " 37 " "
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४२१ स्वीस्वातन्त्र्ययाद का निरर्थक प्रलाप ४२२ - स्व - स्व - संस्थानुगत प्रकृतिसिद्ध स्वातन्त्र्य का समन्वय ४२३ अनिवार्य रूपेण अपेक्षित दाम्पत्यभाव ४२४ -- कर्म्म का स्वतन्त्र कर्ता, और स्वातन्त्र्य की परिभाषा ४२५ दम्पती, और तदनुगतपति तथा पत्नी ४२६ - पुरुष एवं स्त्रियमनुधावति ४३३ – श्राग्नेय – शरीर ( १ ) – पुरुष ( १ ) विषयसूची १००७ ४२७ स्त्री पुरुषमनुभावति १००८ " " ४२८ तापमा ४६ ) और वृषाकपि ४२६ -- धृषा, ४३० - योषा का स्वतः सिद्ध पारतन्त्र्य ४३१ - दो प्रतिद्वन्द्वी ४३२ चार युग्मों के स्थान में शेषभूता युग्म-अथी -प्रथमद्वन्द्व १००८ " 19 27 २०० ९ ४३४ – सौम्य - शरीर ( १ ) —स्त्री ( २ ) ४३५ - श्राप्यप्राण ( २ ) - स्त्री ( १ ) ४३६ - श्राग्नेयप्राण || –द्वितीयद्वन्द् 19 ( २ ) – पुरुष २ ) ४३७ - सौम्यशुक्र ( ३ ) स्त्री ( १ ) } तृतीयद्वन्द्व " ४३८ - श्राग्वशी ( ३ ) पुरुष ( २ ) ४३६ श्रावण ( c ) पुरुद ( ४ ) - स्त्री –चतुर्थद्वन्द्व ४४० - सौम्या ४४१ – प्रकारान्तर से चारों प्रतिद्वन्द्वी द्वन्द्वों का स्वरूप - दिग्दर्शन ४४२ प्राप्यप्राणगर्मिता - शरीर ( पुरुष ) २०१० --४४३ - नेवप्रागर्मित - सौम्यशरीर ( स्त्री ) ४४४ - सौम्य शुरू ( स्त्री ) ४४५ - श्राग्नेय - शोणित ( पुरुषः ) ४४६ आग्नेयोप ( पुरुष ) ४४७ सौम्या योषा ( स्त्री ) ४४८ - अग्रगामी द्वन्द्व के सम्बन्ध में जिज्ञासा, और तत्समाधान ४४ - इन्द्री के पारस्परिक प्रथम द्वितीयादि-आक्रमण ४५० -- अन्तिम शाक्रमण, श्रीर पुरुष की प्रधानता ' ४५१ - पुरुप्रभाव का स्त्रीभाव पर आक्रमण " ४५२ स्वतन्त्रप्रधान भावापन्न पुरुषात्मक ४५.२ -- स्वतन्त्र - कर्त्ता - प्रधान वृषा ४५३ - परतन्त्रा - कर्त्तानुगामिनी – गौण भावापन्नो स्यात्मिका योगा ४५४ - सोमसंस्था, और स्त्री का स्वातंत्र्य ४५५ स्त्री के स्वाथ्य का संरक्षणोपाय ४५६ - ' न स्त्री स्वातंत्रयमर्हति ', का पारिभाषिक-समन्वय ४५७- स्त्री की स्वतन्त्रता पर मर्यादासूत्र का नियन्त्रण ४५८ - स्त्रीस्वातन्त्र्य, और गृहस्थसंस्था का उच्छेद £ 5
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ४५६ -- ' स्त्री - पुं ंबच्च तद्धि गेहं विनष्टम् ' का संस्मरण १०१० ४८५ - यद्वै पुरुषवान् कर्म्म चिकीर्षति, शक्नोति ४६० -- सम्वत्सरमण्डलानुबन्ध से दम्पती का स्वरूप विचार ४३१-- पुरुषसृष्टि, और स्त्रीसृष्टि का पारिभाषिक-स्वरूप ४६२ -- सम्वत्सरो वै सोमो राजा ४६३ – सम्वत्सरो वै सोमः पितृमान् ४६४ -- अर्द्धन पुरुषोऽभवत्, श्रद्धन नारी ४६५ - अग्नि - सोमात्मक सम्वत्सर की अग्नि-प्रधानता, और पुरुष का प्राधान्य ४६६ - नायका विनश्यन्ति ४६७-- नश्यन्ति बहुनायकाः ४६८ - स्त्री नायका विनश्यन्ति ४६६ -- नश्यन्ति बालनायकाः ४७० - सर्वं वै सम्वत्सरः ४७१- सम्वत्सर एवाग्निः ४७२ -- सम्वत्सरो वै पिता वैश्वानरः ४७३ - वाक - सम्वत्सरः ४७४-- अग्निः सम्वत्सरः ४७५ - वागग्निमूर्ति सम्वत्सर, और आग्नेय पुरुष 19 " " १०११ 17 वै. तत्कर्त्ताम् ( ३ ) 1 ४८६ -- पुरुषः - शतवीर्य्यः ( ४ ) ४८७ - द्वि प्रतिष्ठः पुरुषः ( ५ ) * * * स्त्री स्वरूपानुगत - श्रतिवचन ४८८ - उत्तरन श्रायतना स्त्री ( १ ) ४८८ - अनृतं स्त्री ( २ ) ४६० - कर्म वा इन्द्रियं वीर्य्य, तदेतदुत्सन्न ' स्त्रीषु ( ३ ) ४ २- पतयो ह्य ेव, स्त्रियै प्रतिष्ठा ( ५ ) * * वृषा - स्वरूपानुगत - श्र तिवचन " " 9 ४ ९ १ - अत्री वै स्त्री ( ४ ) 99 " १०१२ " " ४६३ - इन्दो वै वृषा ( १ ) " ४६४-- वृषा हिङ्कारः ( २ ) 33 ४६५ - वृषा रेतः सिञ्चति ( ३ ) ४७६ -- गौणभागात्मिका सौम्या स्त्री और सम्बत्सर ४७७ -- अग्नि की सत्यरूपता ४७८ सोम की ऋतात्मिका अनृतरूपता ४७६ - दक्षिणपार्श्वस्थ बलवान् अग्नि ४८० – उत्तरपार्श्वस्थ निर्बल सोम ४८१- परतन्त्रतात्मक मर्य्यादासूत्र की अर्गला का मौलिक - रहस्य समन्वय पुरुषस्वरूपानुगत - श्रुतिवचन ४८२ -- तिसम्पत - वैज्ञानिक- श्रतएव प्रामाणिक विधि - विधान ४८८३ -- पुरुषोऽग्निः ( १ ) ४८४ - एतावान् पुरुषः - यदात्मा - प्रजा जाया ( २ ) " " I " ४६६ -- दक्षिणतो वै वृषा योषामुपशेत्ते ( ४ ) ४६७ - समग्निरिध्यते वृषा ( ५ ) * * * योषा - स्वरूपानुगत श्र तिबचत ४६८ - योत्रा वै सिनीवाली [ १ ] ४६६-- पुरन्धिर्योषा [ २ ] ५०० – योषा वै रेतो धत्ते [ ३ ] ५०१ या पत्नी [ ४ ] ५०१ - न वै योषा कञ्चन हिनस्ति [ ५ ] * * अग्नि - स्वरूपानुगत - श्रतिवचन III " " 39 99 " 3 " " " 39 " " 99 " " 33 ५०२ – यो वै रुद्रः, सोऽग्निः [ १ ] १०१३ ५०४ - वीय्यं वा श्रग्निः [ २ ] ,, ५०४ - पुरुषो वा श्रग्निः [ ३ ] १०१४
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* ५०५ -- वृषाग्नि: [ ४ ] ५०६ श्रग्निवें रेतोधा [ ५ ] * * सोम- स्वरूपानुगत - श्रुतिवचन ५०७ - श्री सोमः [ १ ] ५०८ - पशवो हि सोमः [ २ ] ५०६-- भद्रा तत् सोमः [ ३ ] G ५१० – योगा वा आपः [ सोम: ] - [ ४ ] ५११ - - तिरो ग्रहन्या हि सोमः [ ५ ] * * विषयसूची १०१४ 39 21 39 39 33 * अन्नाद - स्वरूपानुगत - श्रुतिवचन ५१२ - श्रन्नादोऽग्निः [ १ ] ५१३- श्रग्निर्वै देवानामन्नादः [ २ ] ५१४ -- अग्निरन्नादोऽन्नपति: [ ३ ] ५१५ - श्रग्निमन्नादं वेद - अन्नादो हैव भवति [ ४ ] " ५१६ - अन्नादः, तदग्निः [ ५ ] * * * अन- स्वरूपानुगत - श्रतिवचन ५१७ - अन्न पशवः [ १ ] ५१८ - श्रन्नम् श्रीः [ २ ] ५१६- श्रिया स्त्रियं समदधात् [ ३ ] ५२० - अन्न ं वै सोमः [ ४ ] ५२१- परममन्नाद्य ं यत्सोमः [ ५ ] * * दक्षिणा दिक्- स्वरूपानुगत - श्रतिवचन ५२२ - दक्षिणामारोह ग्रीष्म ऋतुः ( १ ) ५२३ - दक्षिणैव सर्वम् ( २ ) ५२४- श्रग्निना दक्षिणाम् ( ३ ) ५२५ - दक्षिणादिक् - इन्द्रोदेवता ( ४ ) ५२६ - दक्षिणा दिशि रुद्रादेवाः ( ५ ) 11 " " " " " १०१५ " 71 उत्तरादिक् - स्वरूपानुगत - श्रुतित्रचन ५२७ - उत्तरा ह वै सोमोराजा ( १ ) ५२८ - एषा वै वरुणस्य दिक् ( २ ) ५२६ - यदुग्तो वासि, सोमो राजा भूतो वासि ( ३ ) ५३० - एषा उ वै शान्ता दिक् ( ४ ) ५३१ - एषा हि दिक् स्विष्टकृतः ( ५ ) * ५३२- स्त्री और पुरुष के मौलिक स्वरूप -निर्माण में महान् मौलिक अन्तर, और श्रतिवचन ५३३ - स्त्री और पुरुष का वैय्यक्तिक स्वरूपा-तर, और विभिन्न धारा ५३४ - विकासधर्म्मा पुरुष का स्वरूप- समन्वय ५३५ - संकोचधर्मिणी स्त्री का स्वरूप- समन्वय ५३६ -लजा - शील आदि मर्यादा सूत्रात्मक गुण, और तद्द्वारा स्त्री का स्वरूप - संरक्षण " ५३७ - समीकरणमूला शान्ति का आधारभूत दो विरोधी भावों का एकत्र समन्वय ५३८- अग्निरूपा उग्रता, ५३६ - सोमरूपा शान्ति, और पुरुष और स्त्री ५५० श्रग्नि- सोम का सह समन्वय, और दाम्प त्यजीवन की शान्ति तुष्टि पुष्टि ५४१ - ' पर ' रूप तन्त्र का संरक्षत्त्व, और स्त्री का पारतन्त्र्य ५४२ – स्त्री के स्वतन्त्र - सौम्यतन्त्र का संरक्षणो-पाय- प्रदर्शन ५४३ - स्त्री - स्वातन्त्र्य, और स्त्री- पारतन्त्र्य को स्वरूप - जिज्ञासा, और तत्समाधान - प्रयास 12 ५:४४ - शास्त्रदृष्टि और स्त्री के पारतन्त्र्य से अनुप्राणित विशेष दृष्टिकोण 17 ५४५ - लौकिकी परतन्त्रता का स्त्रीस्वातन्त्र्य से असंस्पर्श " " " 77 " " " 21 १०१६
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शतपथब्राह्मगा २ लण्ड ५६७– ( ६ ) पतियों का १०१६ ५४६ - काल्पनिकी स्त्री स्वरूपविघातिनी - श्रज की स्वतन्त्रताका प्रचण्ड विरोध, श्रौर शास्त्रदृष्टि ३४७ - स्वतन्त्रता, और परतन्त्रता की विभिन्ना व्यवहारशैली ५४८ - स्वतन्त्रतामूलक श्रात्मभाव ५४६ - परतन्त्रतामूलक पशुभाव ५५० -अचिकित्म्य वर्त्तमान स्त्रीस्वातन्त्र्य - वाद ५५१ - रुढिवादनिबन्धन कतिपय कुप्रथाएँ, और तत्संशोधन ५५२ -सुधारकों की मनोवृत्ति का समादर ५५३ - स्त्रीसमाज की सुशिक्षा का प्रश्न ५५४ - वर्तमान श्रान्दोलन, और स्त्रीशिक्षा ५५५ - श्रान्दोलन का हृदयाभिनन्दन ५५.६ - गीता की सूक्तिद्वयी का संस्मरण ५.५७ - वर्तमान भारत की शिक्षा ५५८ - ' सुधार ' का स्वरूप ५५६ - विषकुम्भं पयोमुखं रूप आज का काल्प-निक सुधार ५६० - एक विशेष आवेदन ५६१ - सुधारों, और दोषों का समतुलन ५६२ - ( १ ) त्री - शिक्षा का समादर, किन्तु पश्चिमी सहशिक्षा की भयङ्करता " ५६३ - ( २ ) पढें की अशास्त्रीयता, किन्तु लज्जा-शीलादि के परित्याग की मयङ्करता ५६४ - ( ३ ) सर्वथा निन्द्य चालविवाह, किन्तु युवति - परिणय ततोऽपि अधिक भयङ्कर ५६५ - ( ४ ) नुकता श्रोसर - भोजनादि असामयिक, किन्तु गॉर्डनपार्टी - टीपार्टी आदि ततोऽपि भयङ्कर ५६६ ~ ( 1 ) अन्त्यजों के साथ श्रमानवीय-व्यवहार अक्षम्य, किन्तु खाद्याखाद्य के विवेक का प्रभाव ततोऽपि भयङ्कर " " 1 " 39 37 17 १०१७ 37 " " " 33 " १०१८ सदाचरण सर्वथा निद्य, किन्तु पतिपत्नी का परस्पर त्याग ( तलाक ततोऽपि भयङ्कर ५६८ - ( ७ ) रुढिवाद सर्वथैव त्याज्य, किन्तु रुढिवाद के विसर्जन- व्यामोहन में मूल आदर्शों का भी परित्याग ततोऽपि भयपुर ५६६ - ( ८ ) सभी सुधार अपेक्षित, किन्तु पश्चिम का अन्धानुकरण सर्वथैव भयङ्कर " ५७०- ( ६ ) सुधार का अभिनन्दन किन्तु बुद्धि-भेद की भयङ्करता ५७१- ( १० ) शब्दप्रमाण कसार- शास्त्रीय - सुधार उपादेय, किन्तु मान सकल्पनैकसार सुधार सर्वथा ही हेय ५७२ - स्त्रियों की पूर्णशिक्षा, और तत्समादर ५७३ - स्त्री के अभ्युत्थान- श्रभ्युदय - नि यस से पुरुष का अभ्युत्थान अभ्युदय - निश्रेयस् -सम्भव ५७४ - भारतीय विधि - विधानों का प्रदर्शन, और सुधारक - बन्धुनों का निरर्थक आक्रमण ५७५ स्त्री के यश: स्वरूप का महिमामय उप-वर्णन ५७६ - परतन्त्रतात्मिका स्वतन्त्रता का पारि-भाषिक समन्वय ५७७ - स्वतन्त्रता की स्वरूपरक्षिणी परतन्त्रता ४७८- परतन्त्रता - लक्षण रक्षाकर्म 39 ५७६ पदे पदे पूजनभाव पूर्णसत्कार, और स्वतन्त्रता संरक्षक - मधुर- नियन्त्रण ५८०- एक वामत्कारिकी दृष्टि ५८१ - जन भावयुक्त रक्षभाव ५८२ - सम्पत्ति संग्रहनियुक्ति ५८३ - द्रव्यादि - परिशोधन ५८४- धर्मकार्य्याभिगमन २०१८ 17 ,, 12 " १०१६ II १०२० 93 39 23 " " " "
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५८५ - बलपूर्वक रक्षा का शास्त्र के द्वारा प्रचण्ड-विरोध ५८६- श्रात्मनियन्त्रणानुगत — स्वतन्त्रतानुगत-रक्षाकर्म, और स्त्री का पारतन्त्र्य 29 , ५८७- परतन्त्र शब्द का प्रात्यन्तिक प्रभाव और भारतीय शास्त्र अंशतः ५८८ - स्वतन्त्रता की उपयोगिता का नियन्त्रण, और स्त्री- पारतन्त्र्य ” ५८६ -रक्षक, और शासक शब्दों में महान् विमेद II ५६० - पिता ' रक्षति ' कौमारे ५६.१ - मर्का - ' रक्षति ' यौवने ५६२ - ' रक्षन्ति ' स्थाविरे पुत्राः ५६३ - स्त्रियो ' रया ' विशेषतः ५.६.३ - जायां ‘ रतन् ’ हि ' रक्षति ' ५६५ – ‘ रक्षेयुस्ताः ' ५६.६ - यतन्ते - ' रक्षितु भार्थ्याम् ५६७ - भगवान् मनु के सम्बन्ध में सुधारकों का अनर्गल प्रलाप 39 ५६८ - स्त्रीजाति का विषयसूची १०२२ ६०८ - मानस - वृत्तियों का समीकरणोपाय- प्रदर्शन १०२०६०६ - ज्ञानकोशात्मक ब्राह्मण " १०२१ 93 " पतन- पुरुषापराधमूलक, श्रौर - मानवधर्म्मशास्त्र के महत्त्वपूर्ण उद्गार ” ५६६- पुरुषरक्षा के सम्बन्ध में एक महान् प्रश्न, और तत्समाधान - प्रयास ६०० - कुतूहल - वद्ध के प्रश्न ६०१ - कुतूहल - वृद्धि का कारण मानव का बुद्धि-वैभव 39 ६०२ - शक्तिवन का रहस्यपूर्ण अशक्तित्व ६०३ - मनोघन का श्रमनोभाव ६०४ - प्राणधन का श्रप्राणभाव ६०५ - शक्तिघना नारी की शक्तिप्रयोग में दुई-लता, और अपेक्षिता रक्षा 19 ६०६ - लौकिक- उदाहरणों के द्वारा तथ्य का पारिभाषिक समन्वय,, ६०७ - शक्तिमान् के द्वारा ही शक्तितत्त्व का सम्भावित विकास १०१२ 23 " " ६१०- पराक्रमकोशात्मक क्षुत्रिय ६११ - सम्पतिकोशात्मक वैश्य ६१२ - शिल्पकलानुगत सेवात्मककोश शुद्ध 39 ६१३ - ज्ञानशक्ति, श्रौर समाजशान्ति ६१४ - पराक्रमशक्ति, और समानतृप्ति ६१५ - सम्पत्तिशक्ति, और समाजतुष्टि १०२३ 39 ६१६ - सेवा - शक्ति, और समाजपुष्टि ६१७ – सर्वहुतयज्ञात्मिका सामाजिकी शान्ति-तृप्ति - तुष्टि पुष्टि चतुष्टयी 39 ६१८ - समाजस्वातन्त्र्य की मूलप्रतिष्ठा का संरक्षण सर्व-11 ६१६ -- कोशाध्यक्षों की हव्यकव्य - वृत्ति से नाश, और तन्निबन्धन कतिपय - लौकिक उदाहरगा ६२०- विषमता के निरोध का वैज्ञानिकोपाय-प्रदर्शन ६२१- भावुकतापूर्णं ठद्गार, श्रौर पश्चिमोन्नति का प्रचण्ड - उद्घोष ६२२ -- कर्म्मभूमि - श्राय्र्य्यावर्त्त रूप- भारतवर्ष ६२४ - पूर्व का पश्चिमीकरणात्मक आज का महान् व्यामोहन ६२५ - प्रकृति से तत्सम्बन्ध में प्रश्न, के द्वारा तटस्थ समाधान ६२६ - पूर्वदेश, और इन्द्रदेवता ६२७ -- पश्चिमदेश, और श्राप्य बरुण " " 99 29 19 " 29 और प्रकृति 22 23 ६२८-- इन्द्र- और वरुण के विभिन्न स्वरूपों के वाचक श्रुतिवचनों का संस्मरण ६२६ -- इन्द्र, । और अग्नि के द्वारा पुरुष- सृष्टि १०२४ . की प्रवृत्ति ६३० - वरुण, और सोम के द्वारा स्त्रीष्टि की प्रवृत्ति ६३१ - स्त्री और पुरुष सर्गों का प्रकृतिसिद्ध मेद, और भेदानुगता व्यवस्था 19 II 99 19 " ६३२ - सूक्ष्मप्राणप्रधाना दाम्पत्यव्यवस्था 29 १०२