Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 231–240

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 231–240

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६३३ -स्थूल भूतप्रधान दाम्पत्यजीवन शतपथब्राह्मण २ खण्ड " ६३४ - प्राकृतिक कारण के साथ गजनिमीलिका, और लौकिक - कारण निदर्शन १०२४ ६३५ -- उभय- सद्भावना, और अभ्युदय " ६३६ - सुधारवादी का अभिनिवेश ६३७ - वास्तविक सुधार का अभाव ६३८ - विद्वानों, तथा सुधारकों से नम्र आवेदन ६३ -- धर्मानुयायी धार्मिक नेता, तथा समाज-नेता, एवं उभयनेतृवर्ग के द्वारा श्रात्म-प्रतारणा ६४० - दयानिधि से प्रार्थना ६४१-- ' सन्तारणीयास्त्वया ' का संस्मरण " " 35 " " १०२५ ६५८-- सुप्रसिद्ध वरुणपाश ६५ -- श्रोषधिरूप वस्त्र का वरुणदेवतामयत्त्व ६६० – बन्धनसाधिक । रज्जु, और वरुणदेवता ६६१ - योक्त्रबन्धन के विभिन्न कारणों का वैज्ञा-निक समन्वय ६६२ -- ' दित्यै रास्नासि ', और पत्नीसन्नहन-कर्म्म १०२६ ६६३ - अदिति के पारिभाषिक स्वरूप का संस्मरण " ६६४ -- अदिति का देवमातृत्त्व " ६६५- पदार्थविद्यानुगत पति - पुत्र- पिता - माता-भ्राता आदि व्यवहारों का साङ्क ६६ व्यवहार - साङ्कुर्य्य - प्रतिपादक श्रुतिवचन का संस्मरण ६६७ प्राणदेवताओं की समष्टिरूप यज्ञ ६६८ - चान्द्रगर्भित - समष्टिरूप यज्ञ " " " " १०२७ " " " " ६४२ -- ऋत्तमयी - सत्यशून्या -- सौम्या - वृत्ति, और स्त्री सर्ग ६४३ - स्त्रीसग के सम्बन्ध में एक महत्त्व पूर्ण आदेश ६४४-- पुरातन - विज्ञानसिद्ध सिद्धान्त का समादर " ६४५-- रक्षात्मक -- मर्य्यादासूत्रात्मक -- योक्त्र-बन्धन ६४६ - ' योक्त्रेण हि युञ्जन्ति ' इत्यादि ब्राह्मण-वचन का समन्वय ६४७ - पानी का अधोमाव ६४८ -- ग्रत्रिप्राण, और आत्रेयी का स्मरण ६४६ - आत्रेयी - योषित्, और अमेध्यभाव ६५० -- यज्ञ की मेध्यरूपता ६५१-- श्राज्य - पृष्ठ के पारिभाषिक स्वरूप का सस्मरण ६५२ -- मेध्यभावापन्न श्राज्य ६५३ - मेध्यभाव का अवरोध, और योक्त्र-बन्धनक ६५४ - श्रद्धा, और चान्द्रपानी " ६६- अदिति की रास्ना ( काञ्ची ) १०२६ " " " " ६७० -- पत्नी का आभूषण, और तद्द्वारा सौन्दर्य की अभिवृद्धि 1 ६७१ -- प्रात्यन्तिक - ग्रन्थि का निरोध, और योक्त्र-बन्धन ६७२ - प्रन्थि के अभाव में नीवी - स्खलन का भय, एवं ऊर्ध्वभाग में पाशाग्र- समावेश से भय का निराकरण ६७३ – योक्त्रबन्धन का ऊर्ध्व - उद्गूहन ६७४ - ' विष्णोर्वेष्योऽसि ' इत्यादि मन्त्रभागार्थ -समन्वय :) ६७५ - सम्वत्सरयज्ञ को स्वरूपसम्पत्ति " ६७६- यज्ञात्मक विष्णु का संस्मरण " ,, 23 " " " " " " " " ६५५-- श्रद्धा की आहुति, और वृष्टि ६७७ - यज्ञात्मक वेष्टन, और यज्ञ का स्वरूप-सम्पादन १७८ - पत्नी के नियतस्थान के सम्बन्ध में प्रश्न, और तत्समाधान १०२८ 29 " " ६५६ - वृष्टि, और श्रोषधियों का आविर्भाव ६५७ - संवरणधर्म्मा वरुणप्राण " 2 ६७६ - पत्नीशाला का पारिभाषिक स्वरूप " " " ६८० - स्वस्थान भूत - गार्हपत्यमण्डल " १०३

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६८१ - गाईपत्य के नैऋतकोण में पत्नीस्थान की व्यवस्था विषयसूची १०२८ इति - पत्नीसन्नहनकम्र्म्मोपपत्तिः २ अथ - पत्नीकृताज्यावेक्षणोपपत्तिः ३ अथ – ४–५–६ – संख्यानुगता परिशिष्ट कर्मानुगता उपपत्तिः ६६५ - यज्ञियद्रव्यों के परिपाक के सम्बन्ध में मतद्वयी का संस्मरण ६६६ -- श्राज्य की हविद्रव्यरूपता, एवं तत्परि पाकानुगत निर्णय ६६७ - श्रावश्यक श्राज्यदर्शन ६६८ -- श्राज्यावेक्षणानन्तर श्राहवनीयाग्नि में श्राज्याधिश्रयण, और पद्धत्यनुगत तत्समन्वय ६६- आपोमयाः - सर्वरसा: " " ७०० - सर्वमापोमयं जगत् १०२६ " १०३० 23 " " " 39 ६- २ - योषा प्राणमयी - पत्नी ६८३- रेतोरूप श्राज्य का वृषाप्राणमयत्त्व ६८४ - दुग्धकार्य्यभूत श्राज्य ६८५ - सोमात्मक रेत, और श्राज्य ६८६– योषा वृषा - प्राणों का मिथुन भाव, श्रीर 39 प्रजासर्ग की प्रवृत्ति ६८७ - दृष्टि सूत्रानुगत प्राणसम्बन्ध एव तद्द्द्वारा सर्गप्रवृत्ति ६८८ - श्राज्यदर्शन की उपपत्ति ६८६ -- चक्षुरनुगत भावदोष, और श्राज्यदर्शन की सदोषता ६६० - ' श्रदन्येन त्वा चक्षुषा पश्यामि ' का संस्मरण ६६१ - प्राणदेवताओं की प्रदीप्ति, और श्राहुति की सार्थकता ६६२- श्राज्याहुति के द्वारा श्रग्नि का प्रज्ज्वलन ६६.३ - श्रग्नि का बिह्वा स्थानीय श्राज्यद्रव्य " ६६४ – ' श्रग्नेर्जिह्वा सि ', और श्राज्यदर्शन " 22 ७०१ - श्रपतत्त्व की सर्वव्याप्ति का संस्मरण ७०२ - श्रृप् - और श्रापः, एवं मनुवचन का 11 संस्मरण १०२६७०३ - वाः वारि, 27 99 इति - पत्नीकृताज्याचे क्षणोपपत्तिः ३ --७०४ - तत श्राण्डं समवर्तत ७०५ - श्रापोमय विश्व की ब्रह्मा एडरूपता का संस्मरण ' प्रासङ्गिक - नीरक्षीरविवेक ' ७०६ – हँसानुगत - ‘ नीरक्षीरविवेकम्पाय ७०७ - तदप्सु पयो हितम्, और नीर में क्षीर १०४ ( दुग्ध ) का प्राधान ७०८ - श्राप:, और भ्राज्य का सम्मिश्रण ७०६ - पानी, और दूध के सम्मिश्रण से विश्व-स्वरूप की श्रमिव्यक्ति ७१० श्रास्थामयी- सौम्या - पावन श्रद्धा, श्रौर पुराणशास्त्र का स्वाध्याय ७११ -- क्षीरसमुद्र, और विष्णुभगवान् ७१२ - नीरक्षीर विवेकशालिनी बुद्धि 17 १०३१ 37 27 23 " "

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७१३ - नीर - क्षीर विवेक - रहस्योपक्रम ७१४ - अप्तत्त्व, और आपोमय परमेष्ठी ७१५- भार्गवतत्त्वरूपा महालक्ष्मी ७१६ -- श्राङ्गिरसतत्त्वरूपा महासरस्वती ७१७ सैषा प्राकृत - स्थिति: शतपथब्राह्मण २ खण्ड ७१८ - पारमेष्ठ्यप्राणात्मक सर्गों की अभिव्यक्ति 19 ७१६ - सुर- गन्धर्व और पितर ७२० - पितरः सोम्यास: १०३१ 93 29 ७३६ - स्त्री और क्षीर की अभिव्यक्ति ७४० - क्षीर का अभिव्यक्तिस्थान, और तत्रैव चिदात्मा का गर्भधारण 22 ७४१ - सौम्या दीरिणी - मातृजाति 29 " ७२१ -- ( क. ) श्रनन्तशेषनाग, और पारमेष्ठ्य भार्गव -वायु १०३२ ७२१ ( ख ) पारमेष्ठ्य यज्ञवराहभगवान् ७२२ -- पारमेष्ठ्य सरस्वान् समुद्र ७२३ -- नीर - क्षीर - वायु, और सरस्वान्समुद्र ७२४ - दुग्धरूप क्षीरभाव ७२५ -- सोममय - क्षीरभाव ७२६- चिदात्मा की गर्भ भूमि महद्ब्रह्म ७२७-- महान् की विभूतित्रयी 17 ७२८ - श्राप्य - वायव्य - सौम्यरूपा महिमा - विवर्त्तत्रयी " ७२६- श्राप्य - वायव्य, एवं सौम्यजीवों का संस्मरण 99 ७३० - चिदात्मा विष्णु की अभिव्यक्ति, और क्षीरतत्त्व का श्राविर्भाव " " ७३१ - ' नीरक्षीरविवेक ' रूप लौकिक न्याय का मलाधार ७३२ -- अङ्गिरा, और भृगु ७३३ --योषा, और वृषासृष्टि ७३४ - शरीरानुबन्धेन यच्चयावत् सर्गों का श्रापो-मयत्व ७३५ - आग्नेय - वृषा - पुरुष की मूलप्रतिष्ठारूप-अग्नितत्त्व ७३६ - सौम्या - योषा- स्त्री की मूलप्रतिष्ठारूप सोमतत्त्व ७३७ - स्त्री का सौम्य श्रापोमय - शरीर, और तत्र क्षीरात्मक दुग्ध की अभिव्यक्ति ७३८ - पुरुष, और क्षीर की अनभिव्यक्ति 22 " " 99 " " " " १०३३ " के द्वारा महद्ब्रह्म की अभिव्यक्ति, और प्रजासर्ग-प्रवृति का रहस्यात्मक समन्वय ७४२ - प्रजापति के द्वारा योषा के पोमय भाग में ह्रीं क्षीर का प्रधान ७४३ - ' तदप्सु पयो हितम् ' का रहस्यात्मक-समन्वय ७४४ - मातृस्थान की ( पितुरपेक्षया ) उच्चता ७४५ - क्षीराभिव्यक्तित्त्वानुगता चिदात्मनोऽभि-व्यक्तिः ७४६ - जीव का स्वरूपत्रोध, और नीर में क्षीर का आधान ७४७ - नीरक्षीर विवेक न्याय की प्रक्रान्ति ७४८ - जगन्माता हैमवती उमा भगवती का संस्मरण १०३३ " " " " १०३४ " ७४- प्रासङ्गिक - नीरक्षीर विवेक न्याय का उपराम,, ७५० - प्रकृति के द्वारा सौम्या योषासृष्टि के अनुबन्ध से ही नीर में क्षीर का आधान ७५१- वीरानुगत आाज्य, और उसका प्रजनान-धर्मामुगता प्रजा का मूलाधारत्व ७५२ - योषाप्राणात्मिका यजमानपत्नी के द्वारा | ज्यदर्शन, और तदुपपत्तिसमन्वय ७५३ - पवित्र [ दर्भ ] के द्वारा श्राज्य का प्रोक्षण ७५४ - पोमय जीवनीय- रस, और तदनुबन्धी प्रोक्षणकर्म ७५५ - ' यो वः शिवतमो रसः ' ७५६ - उत्पवनकम्म का समन्वय " " ७५७ दक्षिणाक्रीत ऋत्विक् " " ७५८ - दक्षिणा के द्वारा यज्ञप्रविष्ट यजमान के दिव्यात्मा का पार्थक्य 29 19 22 " " 29 " " १०५

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७५६ - श्रध्वर्यु के द्वारा श्राज्यदर्शन ७६० यजमान के द्वारा आज्यदर्शन का निरोघ ७६१ - सत्यनारायण सौर विष्णु ७६२ - सत्य सूर्य्यानुगत चतु ७६३ - ' स वै सत्यमेव वदेत् ' का संस्मरण ७६४ - सत्यभाषणादेश के सम्बन्ध में अनृत-भावापन्न मानव, और श्रादेश का विरोध ७६५ - विरोध का निराकरण, और सत्यभाषणा-नुगता मानवीया मर्यादा 19 ७६६- श्रुति, और स्मृति - शब्दों से अनुप्राणित-रहस्य ७६७ - ' श्रुति ' शब्द व्यवहार के सम्बन्ध में काल्पनिकों की महती भ्रान्ति, और तन्निराकरण विषयसूची १०३४ | ७६८- द्रष्टुर्वाक्यं श्रुतिः 17 " ७६६ - श्रोतुर्वाक्यं स्मृतिः " " " " ७७० - श्रुति, और स्मृति - शब्दों का रहस्यात्मक समन्वय १०३४ ७७१ - द्रष्टा की सत्यभावापन्ना चक्षुरिन्द्रिय १०३५ ७७२ - श्वतः प्रमाण- श्रतिशास्त्र ७७३ - श्रुत्यनुगामिनी स्मृति ७७४ - योषावृषात्मक -यश की समृद्धि के विभिन्न कारण ७७५ - तेजोरूप ज्य ७७६ - वाङ् मय - शुकतत्त्व ७७७ - श्राज्य से शुक्रवृद्धि ७७८ - भूतात्मा की समृद्धि, और तेजोरूप श्राज्य ७७६- श्राज्यगुण का समन्वय, श्रीर तेजोऽसि -शुक्रमसि मृतमसि का संस्मरण इति प्रथमकाण्डे -तृतीयाध्याये - प्रथमं ब्राह्मणम् इति द्वितीयप्रपाठके चतुर्थं ब्राह्मणम् इति - द्रव्यसंस्काराः १५ " " 11 " " " "

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श्रीः अथ - शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञान भाष्ये - प्रथमकाण्डे तृतीयाध्याये - द्वितीयं ब्राह्मणम् ( याज्यब्राह्मणम् ) द्वितीयप्रपाठके च पञ्चमं ब्राह्मणम् * १६ आज्यग्रहणकर्म्म क्रमप्राप्त १६ वें कर्म्म के विज्ञानभाष्य की ' विषयस्मारकसूची ' ( पृष्ठ सं ० २०३७ से १०७६ पृ ० पर्य्यन्त ) १ - प्रथमकाण्डान्तर्गत- तृतीयाध्यायानुगत-द्वितीयब्राह्मण, एवं द्वितीय प्रपाठकानु-गत - चतुर्थब्राह्मण ( मूल ) १०३७ २ - मूलवाह्मण का अक्षरार्थ- समन्वयात्मक-अनुवाद २०४० ३- सूत्रानुगत पद्धतिसंग्रह १०५६ ४ - वैज्ञानिक विषेचनोपकम II % E ५ - यज्ञितिकर्त्तव्यता की उपनिषत् ( मौलिक-उपपत्ति ) के सम्बन्ध में प्रश्न ६- श्राध्यात्मिक यज्ञ के द्वारा प्रश्नसमाधा-नोपक्रम " ७- अध्यात्मानुगत - प्रासङ्गिक- आधिदैविकयश का संस्मरण 99 ८- एक महती विप्रतिपत्ति का उत्थान ६ - विज्ञान भाएढाररूप वेदशास्त्र का संस्मरण 33 १०- वैदिक विज्ञान के अनुबन्ध से वर्तमान-युगीय - भौतिक - श्राविष्कारों से अनुप्रा-प्राणिता प्रश्नात्मिका विप्रतिपत्ति ११- वेदाक्षरोचारण, और ' विज्ञान ' शब्द का पुनरावर्त्तन, एवं तन्मूला विप्रतिपत्ति १२- देवयुगात्मक - सर्वोत्कृष्टयुग, और तदनु-गत भौतिक- विमानादि श्राविष्कारों का संस्मरण 19 १३ - वैदिक - विज्ञानपरम्परा के पुनरुजीवन से यच्चयावत् विप्रतिपत्तियों का सम्भावित-निराकरण १४ - महर्षियों का यश: सौरभ, और भौतिक-विज्ञान का समादर १५ - भारतीय वैज्ञानिक - जगत् के ' विज्ञान ' शब्द की सर्वथा स्वतन्त्रा - परिभाषा का संस्मरण १०५६ "

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१६ - भौतिकाविष्कारों की नगण्यता, और भारतीय विज्ञानदृष्टि १७- देवयुगानुगत भौतिष - श्राविष्कारों की व्यवहारानुगता मर्यादा, और नियन्त्रण 19 १८- भौतिकाविष्कारों के द्वारा मानवीय बुद्धि में उत्तरोत्तर जड़ता की अभिव्यक्ति 39 १६- जड़ता प्रयुक्त प्रतिहिंसात्मक प्रतिद्वन्द्विता-मूलक श्रासुरभाव, और भौतिक - आवि एकार २० - श्राविष्कारो के निरतिशय- उपयोग से मानव की प्राकृतिक शक्तियों का, एवं पौरुष का उत्तरोत्तर हास २१- जीवनीय रसात्मक आत्मस्वातन्त्र्य के अन्य-तम शत्रु ये भौतिक - श्राविष्कार " " २२ - वैदिक विज्ञान की की महत्ता से संस्पृष्ट भौतिक श्राविष्कार, और आक्षेपों का नि. सारत्व 39 २३- ऋषिदृष्टा- वैदिक - विज्ञान की धारात्रयी, विषयसूची १०५६. और दैविक आत्मिक भौतिक विवर्त्त १०६० २४ - यज्ञविज्ञानात्मक - श्राधिभौतिकविज्ञान २५- गृहस्थाश्रमानुगत कर्मकाण्ड, और यज्ञ-विज्ञान २६- श्राधिदेविक विज्ञानात्मक - ईश्वरविज्ञान २७- श्राध्यात्मिक विज्ञानात्मक जीवविज्ञान २८ - वानप्रस्थानुगत - उशसनाकाण्ड, और ईश्वर विज्ञान २६ - संन्यासानुगत ज्ञानकाण्ड, और जीव-विज्ञान ३० - कम्मं - उपासना - ज्ञान- रूपा पुरुषार्थत्रयी, और मानव युवावस्था, और यज्ञ विज्ञाना-३१- मानव की नात्मक कर्मकाण्ड ३२- मानव की प्रौढावस्था, और ईश्वर विज्ञा-नात्मक - उपासनाकाण्ड 27 105 ३३- मानव की वृद्धावस्था, और जीवविज्ञा नात्मक ज्ञानकाण्ड श्रीर भूतजगत् ३४- यज्ञ, ३५ - उपासना, और देवजगत् ३६ - ज्ञान, और जीवजगत् ३७- ' यज्ञ ' शब्द की महती - व्याप्ति ३८ - यज्ञ ेन यज्ञमयजन्त देवाः ३६ - यज्ञविज्ञानात्मक भौतिकविज्ञान में अधि-दैविक - ईश्वरविज्ञान, तथा अध्यात्मिक-जीवविज्ञान का आविर्भाव ४० - विज्ञानत्रयी की समष्टि, श्रीर ' विश्व -विज्ञान ' " ४१ - त्रिपर्वात्मक - विश्वविज्ञानात्मक समष्टियज्ञ-रूप - ‘ सर्वमेध नामक ' सर्वहुतयज्ञ ' का नाम-संस्मरण ४२ -स्वयम्भू - रूप विश्वपर्व, और श्राधिदैविक-विज्ञान १०६१ ४३ - सूर्य्य - रूप विश्वपर्व, और आध्यात्मिक विज्ञान ४४ - भूपिण्डरूप विश्वपर्ण, और श्राधिभौतिक विज्ञान ४५- सहस्रत्रल्शात्मक- महामायावच्छिन्न अश्वत्थ-वृक्ष का, तथा महिमा - भावों का संस्मरण ४६ - विश्व के पाँच पर्वो का प्रमुख तीन पवाँ मेंहीं विश्राम 30 ४७- यज्ञस्वरूप- सम्पादक प्राणदेवताओं का पारस्परिक - यजन ४८ - ब्रह्म ेन्द्र विष्एवग्नि सोम नामक विश्वेदेवों का संस्मरण ४६ - ब्रह्मा, श्रीर सर्व प्रतिष्ठात्मक तत्त्व ५० - विष्णु, और इन्द्रात्मक एक युग्म ५१ - ' इन्द्रस्य युज्यः सखा ' ५२ - इन्द्र - सोम - श्रग्न्यात्मक एक युग्म १०६० 27 37 " " " " " " " १०६२

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शतपथत्राह्मण २ खराब ५३-१-२-३ - संख्या नुगत क्रम, और संस्था-त्रयी की स्वरूपनिष्पत्ति ५४ - वैदिकपञ्चदेवतावाद का पुराणशास्त्र के द्वारा त्रिदेवतावाद पर विश्राम ५५ - पुरुषविज्ञानानुत्रन्घेन पर्वत्रयी का समर्थन 33 ५६ – श्रानन्द - ब्रह्मा - प्राण - न्त्रयी, और स्वयम्भूः 22 ५७ - विज्ञान - विष्णु- श्राप त्रयी, और परमेष्ठी 27 ५८ - मन - इन्द्र - वाक्, त्रयी, और सूर्य्य ५- प्राण - सोम - अन्न - त्रयी, और चन्द्रमा " ६० - वाक् - अग्नि - अन्नाद - त्रयी, और पृथिवी 19 ६१ -- सर्वहुतयज्ञ का स्वरूप - निष्कर्ष " " ६२ - स्वयम्भूः - श्रध्यात्मम् ६३ - सूर्य्य: -अधिदैवतम् ६४- पृथिवी - अधिभूतम् ६५ - अध्यात्मयज्ञ - प्रतिष्ठा ज्ञानकाण्डम् ६६ - अधिदैवतयज्ञप्रतिष्ठा उपासनाकाण्डम् ६७- अधिभूतयज्ञप्रतिष्ठा - कर्म्मकाण्डम् ६८ - प्राकृतिक यज्ञ - विज्ञानात्मक विश्वविज्ञान ६६ - यज्ञत्रयी - रूपा विज्ञानत्रयी का भारतीय-महर्षियों के द्वारा आविष्कार ७० - यज्ञविज्ञानत्रयी के द्वारा मानव की अभ्यु -दय - नि: यस - सिद्धि १०६२ ७१ - भारतीय- विज्ञानशास्त्र की प्रवृत्ति का एक-मात्र महान् उद्देश्य ७२ - भारतीय विज्ञान शब्द की पारिभाषिकी मर्यादा का रहस्यात्मक - समन्वय ७३ - भारतीय ' विज्ञान ' शब्द का सीमाभाव ४- प्रक्रान्त - ' श्राज्यब्राह्मण ' का संस्मरण और तदनुत्रन्वेन लक्षीभूत ७५ प्रकृत - प्रकरण, पार्थिव आधिभौतिक यज्ञ ७६ – ब्राह्मणग्रन्थ, और आधिभौतिक यज्ञ-विज्ञान ७७ - आरण्यकप्रन्थ, और श्राधिदैविक - यज्ञ-विज्ञान " " १०६३ 39 19 39 " 1 " 22 " ७८ - उपनिषद्ग्रन्थ, और आध्यात्मिक यज्ञ-विज्ञान ७६ - पृथिव्यनुगत प्राधिभौतिक यज्ञ के भषि-१०६३ एड - पार्थिव शरीर- भूमहिमारूप तीन वा-तर भौतिकयज्ञ ० - वैश्वानर- तैजस प्राज्ञात्मक संसंज्ञ पार्थिव ८०-शरीर, और पार्थिव आध्यात्मिक यज्ञ " ८१ - पार्थिव - दिव्यदेवदेवता, और भूमहिमा १०६४ ८२ - भूविवर्त्त - पार्थिवचेतनवर्ग - दिव्यदेववर्ग, और पार्थिवसंस्था ८३- वेद का ब्राह्मणभाग, और उसके विधि आरण्यक उपनिषत् रूप तीन महिमा -विवर्त्त ८४ - इति - नु- अधिभूतम् ८५. - इति नु श्रध्य मम् ८६ - इतिनु- ग्रधिदैवतम् ८७ - आधिभौतिक — पृथिव्यनुगत — त्र्यात्मक -यजपर्व की महती व्याप्त का समन्वय ८८ – स्वायम्भुवम - अध्यात्म बिज्ञानम्, और विधिभागः कर्त्तव्यात्मक कर्म्म ) ८- सौरम् - अधिदैवतविज्ञानम्, और आरण्यक-भागः ( कर्त्तव्यात्मिका - उपासना ) ६० - पार्थिवम् - अधिभूतविज्ञानम्, और उप-निषद्भागः ( कर्त्तव्यात्मकं ज्ञानम् ) ६१ - यज्ञत्रयी का अत्यन्त रहस्य- पूर्ण - महिमा-मय - समन्वय ६२ - एकविंशस्तोमावच्छिन्नो भूमहिमा - धि-दैवतयज्ञ: ( पार्थिव एव ) 29 ६३ - पार्थिवशरीराणि - अध्यात्मयज्ञ:-( पार्थिव एव ) ६४- पुरुषप्रयत्नसाध्या वैधयज्ञाः - श्रधिभूतयज्ञः [ पार्थिव - एव ] " " १५- सैषा आधिभौतिक यज्ञत्रयी - पृथिव्यनुगता-एव विधि भागानुगता - द्रष्टव्या " " 39 " " " १०६

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विषयसूची ६. ६ - प्रतिरूपरहस्य का समन्वयोपक्रम १०६४ १२७ - वैधयज्ञ की पुरुष के साथ प्रतिरूपता ६.७ - यशोद े श्येन ' पुरुष ' का विधान ६८ - वैधयज्ञ का प्रतिकृतित्त्व 12 " " " " " ' I 39 99 १२८- पुरुषयज्ञवत् ही वैधयज्ञ के विभिन्न कर्म्म-कलापों का समतुलनात्मक समन्वय " " १२६ - ' प्रकृतिवद्विकृति: कर्त्तव्या ' इत्यादि श्रौत-श्रादेश का पारिभाषिक - समन्वय 99 १३० - श्रधिभौतिक वैध - यज्ञ की पुरुषरूपता का दिग्दर्शन १३१- श्राध्यात्मिकयज्ञ की श्राधिभौतिकयज्ञ के प्रति उपनिषत्ता १३२ -महिमामय पार्थिवमण्डल, और ' यज्ञसंस्था ' १३३ - पार्थिव अग्निरूप सर्वप्रजापति, और यज्ञ-कर्त्ता यजमान 21 १३४ - त्रिवृत्स्तोमानुगत पार्थिव अग्नि, और होता १३५ - पञ्चदश स्तोमानुगत ग्रान्तरिक्ष्य वायु, और अध्वर्यु 99 १०६६ १३६ - एकविंशस्तोमानुगत श्रादित्य, और उद्गाता " १०६५ १३७ - भूपिण्ड, और पुराणगाईपत्य " " ६६ - यज्ञस्वरूप का सूचक ' पुरुष ' शब्द १०० - पुरुषोत्पत्ति के साधक यज्ञिक अग्नि, और सोम - रूप शोणित- शुक्र " १०१ - वैधयज्ञ के द्वारा उत्पन्न श्रतिशयरूप पूर्वदेवात्मा १०२ - देवात्मा की यज्ञरूपता १०३ - उभय - यज्ञों की पुरुषरूपता का पारिभा धिक समन्वय १०४ - पुरुषयज्ञ का कौशलात्मक वितान १०५ - पाञ्चभौतिक शरीर, और यज्ञकर्ता यज्ञसंस्थान १०६ - भूतात्मा, और यज्ञकर्त्ता यजमान १०१ - वैश्वानराग्नि, श्रीर होता 19 १०८ - श्वासप्रश्वासात्मक वायु, और अध्व १०६ - हृदयस्थ प्रज्ञानमन, और ब्रह्मा ११० - उदानप्राण, श्रीर उद्गाता १११ - मूलाधारमण्डल, और गार्हपत्यकुण्ड ११२ - अपानाग्नि, और गाईपत्याग्नि १ ९ ३ - जाठराग्नि और दक्षिणाग्निकुण्ड ११४ - बाठराग्नि और दक्षिणाग्नि ११५ - शिरोमण्डल, और श्राहवनीयकुण्ड ११६ - प्राणाग्नि, और श्राहवनीयाग्नि ११७ - केश - लोम, और बर्हि ( दर्भ ) ११८ - श्रस्थिसमूह, और समिध काष्ठ ११६ - द्रवद्रव्य, और प्रणीता १२. अन्न, श्रातिद्रव्य १२१- दक्षिणभुजा - चरण, और जुहू १२२ - वामभुजा चरण, और उपभृत् १२३ - मध्याङ्ग ( धड़ ), और ध्रुवा १२४ - सर्वाङ्गशरीर सञ्चारीप्राण, श्रीर त्रुव १२५ - शरीरप्रदेश, और वेदि १२६ - पुरुषसंस्था की यज्ञानुगता प्रतिरूपता का सर्वात्मना समन्वय " " 33 13 " " , " 23 " " 33 76 " १३८ - चित्याग्नि, और पुराण गार्हपत्याग्नि १३६ - त्रिवृत्तीमान्त पार्थिव महिमा प्रदेश, और नूतन गार्हपत्यकुगड १४० - त्रिवृत्स्तोमपरिच्छिन- पार्थिव घनाग्नि, और नूतनगापा १४१ - पञ्चदशस्तोमान्त - पार्थिव महिमाप्रदेश, और धिष्ण्याग्निकुण्ड १४२ - पञ्चदशस्तोमपरिच्छिन- श्रष्टविध - नाच-त्रिकाग्नि, और धिष्ण्याग्नि १४३ -- एकविंशस्तोमान्त- पार्थिव- महिमाप्रदेश, श्रौर श्राहवनीयकुण्ड १४४ -- एकविंशस्तोमपरिच्छिन्न सौर दिव्याग्नि, और आहवनीयाग्नि 19 १४५ - लोकालोकसीमान्तामुगत ' वेन ' नामक श्रप्तत्त्व, और ब १४६ - पार्थिव उरु - अन्तरिक्ष में व्याप्त श्रश्मा-सोम, और समिधकाष्ठ 13 19 " " 19 " " " 11 29 ?? 11 "

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१४७ -- श्रान्तरिक्ष्य - मरीचि श्राप:, और प्रणीता, विषयसूची तथा प्रोक्षणी १०६६ १४८ - पार्थिव ष सोम, पृथिन्युपग्रह - भूत-चान्द्रोम, और श्राहुतिद्रव्य १४६ - भूतिण्ड, और हविर्वेदि १५० - भूमहिमा, और महावेदि १५१ - एकविंशस्तोमावच्छिन्न द्यु लोक, और जुहू १५२ - पञ्चदशस्तोमावच्छिन्न अन्तरिक्षलोक, और उपभृत् १५३ त्रिवृदनुगत भूपिण्ड, और ध्रुवा १५४- त्रैलोक्य - संचारी- वायव्यप्राण, और स्र व १५५ -- पॉथिंव - आधिदैविकयज्ञ का स्वरूपेतिवृत्त, एवं तत्प्रतिरूप प्राध्यात्मिक यज्ञ १५६ - श्राध्यात्मिकयज्ञ का प्रतिरूप अधिभूत-यज्ञ ( मनुष्यकृत वैधयज्ञ ) १५७ - पार्थिव त्रैलोक्य, श्रीरविप्रतिपत्ति १५८- पृथिवी में पृथिवी, और महती विप्रतिपत्ति १५६ - ' श्रस्या एवेमे सर्वे लोकाः प्रभवन्ति ' इत्यादि पारिभाषिकसूत्र के माध्यम से विप्रतिपत्तियों का निराकरण " १६०-- अष्टविध त्रिलोकी - विवर्त्त नुगता सौम्य -त्रिलोकी का संस्मरण १६१ - श्रग्निगर्भित भूपिण्ड १६२ -- भौमाग्नि, और प्रजापति १६३ - श्रमृत - मृत्यु - मय प्रजापति १६४ - रसाग्नि - प्राणाग्नि देवाग्नि १६५ -- रसाग्निलक्षण- प्रजापति १६६ -- रसाग्नि का त्रिधा रसन, और पार्थिव-त्रैलोक्यरूप स्तौम्य - त्रैलोक्य का वितान " १६७ - अग्निरस की अवस्थात्रयी, और स्तोम्य-त्रिलोकी के तीन प्रतिष्ठावा देवता १६८ स एष प्राणाग्निस्त्रेधा विहितः १६६ - वास्थानीय भूपिण्ड, और हृदयस्थ-रसाग्नि " " " 29 " २०६७ 33 १०६७ " " " 2 १७० - त्रिविध यज्ञों की क्रमसद्धा मौलिक-उपपत्तिलक्षण - स्वरूपोपनिषदों का उपराम १०६८ १७१ -- पुरुष प्रयत्नसाध्य - वैधयज्ञ की आध्यात्मिक-यज्ञानुगता प्रतिरूपता का तात्त्विक समन्वय " 1 १७२ - पृष्ठ, एवं आज्य नाम की तत्त्वद्वयी का संस्मरण १७३ - पृष्टस्वरूप - दिग्दर्शन १७४ - आाज्यस्वरूप - दिग्दर्शन १७५ - तेजो वैश्राज्यम् १७६ - अग्नेर्वा एतद्रूपं यदाज्यम् १७७ - प्राणो वा आज्यम् १७८ - घृत की प्राणात्मिका शक्ति १७६ - जीवनीयशक्तिप्रदाता घृत १८० - जुहू - क् वादि की पृष्ठरूपता १८१ - श्राज्यपरिपूर्ण जुह्वादि १८२ - पुरुषप्रतिरूपता की संसिद्धि १८३ - श्राज्यग्रहण, श्रौर देवात्मा का स्वरूप १८४ -- शरीरात्मक पुर, श्रौर पुरुषात्मा १८५ श्राकार, और वस्तुतत्त्व १८६ - श्रायतनरूप बाह्य आकार, और वयो-नाव १८७ - वयोना, और छन्द १८८- छन्दोरूप वयोनाध से नद्ध वयोरूप-वस्तुतस्व १८ ९ - वयुनका स्वरूप - दिग्दर्शन " " 27 11 " " 17 " " " " " १०६६ " 79 " " ११० -- सर्वमिदं वयुनम् " १६१ वयुन, और आध्यात्मिक संस्था का 17 " १६२ - ऋतुस्नाता स्त्री, और श्रत्रिप्राण " 21 २०६८ प्रथम पव १६३ - ऋतुमती, और आत्रेयी ११४ - श्रग्नि, और सोम की ऋत - सत्य- मेदेन अवस्थाद्वयी १६५ ऋताग्निसोमद्वयी का उद्माम, और निग्राम " 77

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विषयसूची १६६ - ताग्नि के दाम्पत्य से ऋतु का जन्म १०६६ १६७ - ऋतु और छन्द का समन्वय १ ९ ८ ऋतु और छन्द से शरीर का निर्माण १६६ - कर्मभोक्ता औपपातिक जीवात्मा का ऋतु छन्दोमय शरीर में प्रवेश २००-- आत्मा, वस्तुतत्त्वरूप वय, बाह्य काररूप यवनाथ, रूपा पर्वत्रयी २२१ - विषमवत्त'नक्षेत्रात्मक शरीर २२२ व्यवहारजगत् और ' जामिदोष ' २२३ - आत्मापेक्षया देवताओं का अवरत्त्व २२४ अन्तरिक्ष भावना वे पशवः २२६- मृतपन्तरिक्षस्य २२५ -- ऋतवश्छन्दांसि पशवः " २२७-- श्राज्यग्रहण की अवता १०७० " १०७१ 39 " " २०१ वस्तुतस्व और देवता २२८- चतुदीत आज्य की उपपति २०२ बाह्याकार और छन्दोदेवता २०३ - ऋतुरूप प्रयाजदेवता २०४- माह्माकारात्मक छन्द और अनुषाजदेवता २०५ - प्रयाजानुयान से पुररूप शरीर का निर्माण २०६ श्रावापादेवता रूप प्रधानदेवता और श्रात्मा -" २२६-- नामग्रहण का अभाव और अमिता 11 २३० श्राज्यग्रहणप्रक्रियानुगता अमुक विशेषता २३१ - विशेषता का सोपपत्तिक समाधान 33 19 १०७० २०७ - पृष्टस्वरूपनिर्मापक ऋतुतत्त्व, एवं छन्द-स्तत्व २. देवता छन्द २०६ - इष्टि - पशु- सोम त्रयी का हवि द्रव्यत्व २१० प्रयानुयाजदेवताओं का आहुतिद्रव्य और ज्य २११ - देवदत्त की उभयात्मकता २१२- भूतात्मा और देह का समन्वय २१३ -भूतात्मा और देह का परिवर्तन , २१४- नाममगा का अभाव और अन्यम २१५ - एवम् तेषाम् का समन्वय २१६ - ' जामि ' रूप महान दोष २१७ समदर्शन, और विवर्तन की वैशा निकता २१८ मर्ता श्रात्मदृष्टि और आत्म साम्य २१६ - विषमवर्त्तनरूपा विश्वदृष्टि, श्रर प्रकृतिभेद २२० - समदर्शन क्षेत्रात्मक श्रात्मा " २२२ - ' निदान ' शब्द का पारिभाषिक अर्थ समन्वय २३३- दक्षिणास्तात्मक निदानभाव २२४ - दक्षि हस्त - तात्पर्य - समन्वय २३५ - कमल, और भूपिण्ड के निदान भाव का तात्त्विक समन्वय " २३६- आपो वै पुष्करपर्णम् २३७ - कमलपत्रात्मक भूपिण्ड " २४० - पुष्करपर्श, और भूषिण्ड II " " " " 17 १०७२ " २३८ - काल्वालीकृता पृथिवी २३१ - धनभावात्मक अपतत्व और पुष्करपणं श्रृप्तत्व, २४१ प्रजापति का पद्मासन २४२ - निदान भावानुगत जुहू, और उपमृत् का स्वरूप विचार " " " २४२ - दक्षिणहस्त, और उ जुहू " २४४ -- वामहस्त, और उत् २४५ - पुरुष का दक्षिणा और शुभशकुन २४६ पुरुष वा वामाङ्ग और श्रशुभशकुन २४७ स्त्री का वामाङ्ग, और शुभशकुन – २४८ स्त्रीका दक्षिणाङ्ग, और अशुभशकुन २४६ - दक्षिण हस्तानुगत - यजमान, और जुहू २५०- बाम हस्तानुगत -५४ मानशत्रु और उपमृत् 17 २५.१ - जुहू की नैदानिकी अन्नादरूपता 29 " " 11 ११२