Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 241–250
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 241–250
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२५२ - उपभृत् की नैदानिकी अन्नरूपता २५३- भूयांसं कनीयांसं करोति २५४ - समृद्ध का स्वरूप - लक्षण शपथब्राह्मण २ खण्ड २५५ - जुहू, और उपभृत् से श्रनुगता श्राज्य-मात्रा के तारतम्य की उपपत्ति २५६ - शारीरिक बलात्मक- ' बल ' २५७- त्मचलात्मक- ' वीर्य ' २५८ - भूतबलात्मक ' बल ' २५६ - प्राणवलात्मक ' वीर्य्य ' १०७२ २६८- अर्थ स्थानीय विडबल २६ - प्रवर्ग्यस्थानीय - शूद्रत्रल 33 २०७३ " २७० - समृद्धिरक्षा, और बचचतुष्टयी २७१ - राष्ट्रम्मं समृद्धिपूर्वक स्वसमृद्धि का समन्वय २७२- सुपर्ण काद्रवेयाख्यान का संस्मरण 19 १०७३ २७३ – छन्द, और तदक्षर - रहस्य २७४ - द्वादशाक्षर - जगतीछन्द २७५ - एकादशाक्षर- त्रिष्टुप्छन्द २७६- अष्टाक्षर - गायत्री छन्द " " ,, " " 27 " " " 3 " २६० -बल - वीर्यानुगता श्राज्यमात्रा का तारतम्य २६१- अन्न अन्नाद की स्वरूपरक्षा, श्रौर श्राज्यमात्रा का सारतम्य २६२ - प्रजावित्त पर सत्ताधिकार का प्रश्न, और तत्समाधान २६३ - प्रजास्वातन्त्र्य, और राष्ट्रसंरक्षण २६४ - ( क ) क्षेत्र, और बिटू का समन्वयात्मक सहयोग एवं तन्मूला राष्ट्रसमृद्धि २ ९ ४ ( ख ) राष्ट्रसमृद्धि का अन्यतमसूत्र २६४- ( ग ) ब्रह्मत्रलात्मक ध्रुवापात्र २६४ - ( घ ) क्षत्रबलात्मक जुडूपात्र २६४- ( ङ ) विड्बलात्मक उपभृत्पात्र २६५ - पशु सम्पत्ति, और शूद्रभाग २६६ - ज्ञानस्थानीय ब्रह्मबल २६७ - क्रियास्थानीय क्षेत्रबल " 91 २७७ - सर्वाणि वा छन्दांसि चतुरक्षराणि १०७४ 29 " } २७८ - गायत्री छन्दस्क- जुहू का श्राज्य २७ - त्रिष्टुप् छन्दस्क - ग्राज्य २८० - जमती छन्दस्क आाज्य २८१ - अनुष्टुप् -- गायत्री- -त्रिष्टुप -- जगती नामक चार छन्दों का संस्मरण, श्रौर श्राज्य-ग्रहण २८२ - वा के द्वारा यज्ञक - सम्पादन २८३- भूपिण्डस्था श्राज्यशक्ति २८४ - यशस्वरूप - संसिद्धि के द्वार २८५- ' त्रिः सत्या वे देवाः ' २८६ - मन्त्रप्रयोगानुगता प्राज्यग्रहण व्यवस्था का समन्वय " २८७ - त्रिवृत् सम्पत्ति, और यह 19 २८८ - त्रिवृद्भाव, और श्राज्य 19 २८६ - श्राज्य ब्राह्मणोपराम इति - प्रथमकाण्डे तृतीयाध्याये - द्वितीयं ब्राह्मणम् इति द्वितीयप्रपाठके पञ्चमं ब्राह्मणम् आज्यब्राह्मणात्मकम् इति ज्यग्रहणकर्म्म १६ " " " 3 19 93 91 " 1 29 १०७५ ११३
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श्रीः ग्रथ- शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञान भाष्ये - प्रथमकाण्डे तृतीयाध्याये द्विब्राह्मणानुगतं - इध्मब्राह्मणं - तृतीयम् द्विवाह्मणानुगतं परिधित्राह्मणं चतुर्थम् [ द्विब्राह्मणात्मकं ब्राह्मणम् ] १७- इध्म - परिधि - अनुगत - कर्म्मसंग्रहः क्रमप्राप्त १७ वें कर्म्म के विज्ञानभाष्य की “ विषयस्मारकसूची ” ( पृष्ठसं ० १०७८ से १ ९ ३४ पृ ० पर्य्यन्त ) १- प्रथम काण्डान्तर्गत-- तृतीयाध्यायानुगत तृतीय--चतुर्थ- ब्राह्मण ( मूल ) २ - मूल ब्राह्मणों का अक्षरार्थसमन्वयात्मक अनुवाद ३- सूत्रप्रदर्शित - पद्धतिसंग्रह वैज्ञानिकविवेचनोपक्रम [ ११०८ ] अथ - प्रोक्षणकर्मोपपत्तिः १०७८ १०८६ ४ - ' पवित्रं वा श्राप:, मेध्या वा श्रापः ' श्रति-वचनों का संस्मरण ५- बर्हि - बेदि तथा इध्म का पवित्रीकरण ६ - मेध्यमेवैतदग्नये करोति ७- यज्ञियकाष्ठ, और ' इध्म ' शब्द का अर्थ-समन्वय 5 93 " 3 ८- कृष्णाग्नि का प्रतिरूप इध्मकाष्ठ ६- काष्ठ में प्रसुप्त ' मृग ' नामक अग्नि १० - सौरा ग्निमण्डलात्मक - श्राहवनीयमण्डल ११ - सौर - सावित्राग्नि की यज्ञरूपता १२ - ब्रह्माग्नि, और प्रवर्व्याग्नि के भेद से सौर यज्ञाग्नि के दो महिमा - विवर्त १३- अन्तर्य्यामसम्बन्धात्मक ब्रह्माग्नि १४ - बहिर्थ्यामसम्बन्धात्मक प्रवर्ग्यानि १५- पार्थिव अग्नि का प्रवर्ग्याश और गायत्र अग्नि १६ - सावित्राग्नि की कृष्णारूपता, और पार-मेष्ठ्य - सोम ही आहुति से तत् - शुक्ल-रूपत्व १७- श्रग्नि का जागरूप - रूप, " " " " " ११०६ और शुक्ल भाव " १८ - अग्नि का सुप्तरूप, और कृष्णभाव ११४
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड १६- पार्थिव - भौतिक - पदार्थों में प्रविष्ट - सु - त-कृष्ण- श्रग्नि २०- अग्नि की शुक्ल कृष्णात्मिका - जाग्रत् सुषु-त्यवस्थाद्वयी, और मन्त्रश्र ति " २१ - मृग्यमाणधर्म्मावच्छिन्न अग्नि की मृग-रूपता २२ - ' कृष्णमृग ' नामक अग्नि, और यज्ञ २३ - यज्ञभूमि - भारतवर्ष, और कृष्णमृग का स्वच्छन्द विचरण " २४ - कृष्णाजिनब्राह्मण का संस्मरण २५ - देवमण्डल से यज्ञ की पक्रान्ति, एवं कृष्णमृगरूप में तदुपलब्धि २६- इयं वै पृथिवी कृष्णाजिनम् २७ - यज्ञो वै कृष्णाजिनम् २८ - मृगरूप मृग्याग्नि, और ' खर ' ११०६ " " " " " 3 १.११२ २६- श्राहवनीय खर में प्रतिष्ठित अग्नि, और - ' श्राखरष्ठः ' का का समन्वय ३० - कठिनकाष्ठ के गर्भ में सुप्तरूप से प्रति ष्ठित ' आनरेष्ठ ' भाव ३१ – ' कृष्णोऽस्याखरष्ठः ', और प्रोक्षण ३२- प्रोक्षण कर्म के द्वारा इध्म - काष्ठ की यज्ञ-रूप में परिणति " ३३- ' यज्ञ ेन - गर्थिवयज्ञ ेन यज्ञ - दिव्याग्नि - अय-जन्त देवाः ' का संस्मरण ३४- पार्थिवाग्नि - दिव्याग्नि, और यजमानाग्नि का समन्वयात्मक यज्ञ ३५ - ६ ध्मकाष्ठाग्नि की मेध्यरूपता 11 " " " ३६ - देवताओं के लिए जुष्ट इध्म - काष्ठ " ३७- अग्नेये त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ३८ - वेदि पर बर्दि का आस्तरण ४४ - पृथिवी की प्रतिकृतिरूपा वेदि, और उस के श्रमेध्यधर्म का निराकरण ४५ - वेदिप्रोक्षण का पारिभाषिक समन्वय ११११ ४६ - वेदरसि बर्हि त्वा जुष्ट ं प्रोक्षण का समन्वय " 2 ४७- प्रोक्षणकम्र्म्मोद्द ेश्य का स्पष्टीकरण " " ४८ - वर्हि का प्रोक्षण, और तत्पारिभाषिक-समन्वय ४६ - वेनप्रतिरूप - स्थानीय दर्भ का बर्हिरूपत्त्व ५० - यज्ञिय - भौतिक - पदार्थों से अनुगत भूत, और प्राण ५१ - श्रमेध्यभावापन्न भूतभाग ५२ - भूतसंसर्ग से मेध्य भी प्राण का मे ध्यत्व ५३ - प्रोक्षणकर्म के द्वारा भूत, और प्राणा-त्मक यज्ञिय - पत्रार्थी के श्रमेध्यभाव का निराकरण ५४ - वृष्टिकर्माधिष्ठाता पर्जन्यदेवता ५५ श्राकाशस्थ मरुद्गर्भ से भूतल की और श्रागतवृष्टिजल ५६ - वृष्टिजल का विलयन ५७- श्रोषधि - वनस्पति ५७ - मूलार्द्रता, और श्रोषधि - वनस्पतियों का जीवन ५८ - मृद्भागसहित श्रोषधि - वनस्पतिमूलों का का उत्पाटन, र अन्यत्र प्ररोहरण ५६ - प्राकृतिक यज्ञकर्म्म, और जलवर्षण ' ६०- यद्व ै देवा कुवंस्तत् करवाणि ६१ - प्रोक्षणी श्राप का प्रकृतिवत् बर्हि के मूल में सिञ्चन 39 " " " 29 " " 29 " " 3 " " " " " " " ६२ - यज्ञातिशायों का फलभोक्ता यजमान 11 " ६३ - जलसेकात्मक - सिञ्चनकर्म्म १११२ ३ - ज्योतिर्म्मय - वेन रूप अप्तत्त्व, और - बर्हि ४० - मतिभीरिहन्ति, और वेन ४१ - सर्वत इव ह्ययं समुद्र:, और दर्भ ४२ - ता हैवानापूयिता श्राप, ४३ - पवित्रे करोति का संस्मरण " और ब " ११५ ६४ - यजमान के लिए समृद्धियुक्ता - श्रोषधि-वनस्पतियाँ ६५ - श्रोषधिमूलों की आर्द्रता का समन्वय ६६ - सिञ्चनकर्म का प्रधान लक्ष्य - भूप्रदेश " " " ,,
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६७ - परम्परया श्रार्द्रा मूलता की प्राप्ति ६८ - ' श्रदित्यै न्युन्दनमसि ' का रहस्यात्मक समन्वय ६६ - जीवनरसप्रदात्री भूगर्भ की श्रार्द्रता ७० - भूगर्भ में ही कृषक के द्वारा बीजवपन, और प्रोक्षणकम्मोपराम इति - प्रोक्षणकम्मोपपत्तिः अथ - प्रस्तरगृहणोपपत्तिः ७१ कुरा मुष्टिलक्षण प्रस्तर का ग्रहण ७२ - यशपुरुष के द्विविध महिमामय स्वरूप ७३ - ऋताग्नि ऋतसोमात्मक - सम्वत्सर मण्डल, और आधिदैविकपुरु ७४- सम्वत्सरयज्ञ के उत्तरायण दक्षिणायन-विश्वत् - रूप तीन प्रमुख पर्व ७५ - यज्ञपुरुष के दक्षिणोत्तर पार्श्व, और मध्यान ७६- एकविंशस्थान, और यज्ञपुरुष का मस्तक ७७ - अग्नि वायु - श्रादित्य - नाम की प्राणत्रयी, और सम्वत्सर त्रिलोकी विषयसूची १११२ ७८ - एकविंशस्थानीय श्रादित्योपलक्षित सूर्या-त्मक - ' यूप ', और यज्ञपुरुष 19 ७६ - सूर्य्यात्मक यूप का सोमाहुति से संरक्षण 17 ८० यूप का यूपस्व, और सोमाहुति 99 ८१- श्राधिदैविक-— सम्वत्सरयज्ञपुरुष, और तत्प्रतिपादक - श्र तिवचन 13 १११२ 37 " 93 19 37 17 ?? ८२-- श्रथ वा महा सुपर्ण एव यत् सम्वत्सरः सम्वत्सरस्य विषुवान्, अङ्गानि ८३- श्रात्मा मासा: ८४-- सम्वत्सरो वै यज्ञप्रजापतिः ८५ - पुरुषो वा सम्वत्सरः १११३ " ११६ ८६ - सम्बत्सरयज्ञपुरुष का मस्तको स्थान, और यूप ८७- पूपात्मक सूर्य्य, और यशपुरुष की शिखा - केश गुच्छात्मिका - शिला CE - केश - लोम, और श्रोषधि वनस्पति ६० - श्रपधिलोमानि वनस्पतीन् केशाः ६१ - पारमेष्ठ्य सोम, और श्रोषधि ६२ - त्वमिमा श्रोषधीः सोम! विश्वा ६३ - अग्निगर्भित सोम और श्रोषधियाँ ६४ - सोमगर्भित श्रग्नि, और वनस्पतियाँ ६५ - अग्नि वनस्पतिः ६६ - असो वा आदित्यो यूपः ६७- श्रादित्यां यूपः ६६ - सोमाग्नि की परम्परया केश - लोम-रूपता का रहस्यात्मक समन्वय SEE - यूपात्मक सूर्य का यशपुरुष का शिखात्त्व १०० - शिखा का स्वरूप- लक्षण, श्रौर सौर संस्था की स्वरूपस्थिति १०१ - शिलायुक्त - सम्वत्सर यज्ञपुरुष से प्रति-रूपात्मक आध्यात्मिकयज्ञ ( मानव ) के स्वरूप की अभिव्यक्ति " " १०२ - सम्वत्सर का दक्षिणायन भाग, और मानव का दक्षिणपार्श्व १११३ 95 29 " 1 " 1 17 " १११४ १०३ - उसरायणभाग, और मानव का वामपार्श्व 39 १०४ - सम्वत्सर का मध्यस्थ विश्वद्वृत्त, श्रौर मानव का मध्यस्थ- मेरुदण्ड [ रोड की हड्डी ] 39 १०५ - सम्वत्सर का त्रिवृद्भाग, और मानव का पादभाग १०६ - सम्वत्सर का पश्चादशभाग, और मानव मध्याङ्ग १०७ - सम्वत्सर का एकविंशभाग, और मानत्र का शिरोभाग १०८ - शिरो भागानुगत सौर - इन्द्रप्राण " 17 93 " " "
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड १०६ - शिखान्तस्थान से विनिर्गत सौर इन्द्रप्राण [ इन्द्रविद्य त् ] का सूर्यकेन्द्र - पर्य्यन्त एक निमेष में तीन बार गमनागमन १११४ ११० - प्राण का सूर्य्यकेन्द्रानुगत गमनागमन, २ एव मानव की शतायुः प्रवृत्ति 33 १११ - सूर्य्यस्थित मनः प्राणवाङ्मय ३६००० [ छत्तीसहजार ] संख्यात्मक ' आयुः ' नामक मनोता का आगमन, और आयुर्बल का सरक्षण ११२ - बृहती प्राणात्मक वैश्वामित्र श्रायुः प्राण " का सञ्चालन, और श्रायुः - सूत्रसंरक्षण १११५ १०३ - श्राध्यात्मिक ऐन्द्रप्राण, तथा आधिदै-विक ऐन्द्रप्राण के मध्य में श्रवसानधर्मा याम्यप्राण का श्रागमन, और आयु: -सूत्रसन्तान का विच्छेद " " ११४ - निधन का अवरोधक - प्राण - गमनागमन-लक्षण- दैनंदिन यज्ञात्मक - हर यज्ञ ११५ - अहरहव एष यज्ञस्तायते, स्वर्ग लोकं गच्छति " हरहरेनेन ११६ - शिखान्तस्थान से सूर्यकेन्द्र पर्यन्त व्याप्त महापथ ११७ - शिखान्तस्थानात्मक ब्रह्मरन्ध्र ११८ - ब्रह्मरन्धात्मक विद्यतिद्वाः ( द्वार ) और नानन्दनद्वाः ( द्वार ) " ११६ - केशान्तस्थानानुगत ब्रह्मरन्ध्र, और इन्द्रवि " १२० - सौरदिव्यप्रारण का प्रवर्ग्यभूत प्राध्या-त्मिक - शिखान्तस्थानीय - दिव्यप्राण १२१ - दिव्यप्राण के साथ तमोमय असुर-प्राण का सहज विरोध १२२ - लौह धातु का असुर प्राणप्रधानत्त्व १२३ - तोरकर्म्म संसाधिका लौहनुरिका " १११५ " 17 " " 39 " ११७ १२४ - दिव्यप्राणसंरक्षरणायैत्र शिखाधारण का शास्त्रीय आदेश १ ५ - शिखाधारण की अनिवार्यता का पारिभाषिक समन्त्रय 11 १२६ - शिखाधारण के एक अन्य प्रासङ्गिक कारण का स्वरूप - दिग्दर्शन १२७ -प्रतिरूपमर्थ्यादानुगता वेदमर्यादा का अनुगमन, और शिखाधारण 19 १२८ - यज्ञपुरुष के साथ आकृतिसमतुलन, और शिखाधारण १२६ - ' देवो भूत्वा देवं भावयेत ' लक्षणा दिव्यभावना, और शिखाधारण " " १३० - याज्ञिकी यूपमर्यादा, और शिखा-धारण १११५ " १३१ -- शिखाधारण, और आर्षधम्र्मानुब-न्धिनी यज्ञिय मर्यादा का संरक्षरण १ ९ १६ १३२ - दिव्यप्राणरक्षानुगत विज्ञान का संर-क्षण: और शिखाधारण " १३३ -स्वस्त्ययन कम्र्म्मात्मिका यज्ञिया - मङ्गल-भावना, और शिखाधारण १३४ - शिखाधारण, और शस्त्रोदश 33 १३५ - भारतीय - स्त्रस्त्ययनचिह्न, और तद्-द्वारा सुखसाधक- जातीयता - धर्म-दिव्य - विज्ञानवृद्धि - श्रादि मङ्गलभावों अभिवृद्धि १३६ - शिखाधारण से लज्जा अनुभव करने वाले आज के नवशिक्षित से लज्जिता भारतीय - दिव्य - संस्कृति १३७ - शास्त्रनिष्ठा, और शिखाधारण 33 १३८ - ' तस्य - इयमेव शिखा - स्तुपः ', और शिखाधारण '३६ - नवशिक्षितों की परिष्कृता बुद्धि और तद्वारा शिखा- सूत्र - का साभिनिवेश परित्याग 31
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विषयसूची १४० - अधःपतन की पूर्वसूचना १११६ १४१ - सभ्रान्त महानुभावों से नम्र आवेदन " " १४२ - स्व - सांस्कृतिक- गौरव का अन्वेषण, और संरक्षण प्रयास १४३ - आधिदैविक यज्ञपुरुष से श्राध्यात्मिकयज्ञ-पुरुष की स्वरूपनिष्पत्ति १४४ - आध्यात्मिक ० से वैध आधिभौतिकयश का स्वरूप- सम्पादन १४५ - शिखारूप प्रस्तर, श्रौर यज्ञ में दिव्य-प्राण का प्राधान १४६ - दर्भमुष्टिरूप प्रस्तरग्रहणात्मक शिवा धारण १४७ - शिखा के नैदानिकरूप का समन्वय १४८ - पुरस्तात् प्रस्तरग्रहण, और प्रस्तर-ग्रहणोपपत्ति- त्रिराम इति - प्रस्तरगृहणोपपत्तिः अथ सन्नहन - विस्र ' सन-स्थापनोपपत्तिः * १४६ - ' सन्नहन ' नामक ' बर्हि ' की रज्जु १५० - बन्धनरज्जुरूप सन्नहन का बर्हिः के संघात से पार्थक्य १५१- नीवीबन्धनात्मक - सन्नहनन, और तद्-वित्र सन १५२ - नीवी - विस्त्र सन, और प्रजननक की संसिद्धि १५३ -बन्धनसूत्र का वेदिकी दक्षिणाश्रोणि पर संस्थापन १५४ - नीवीबन्धन की स्थिति, और लोक-व्यवहार १५५ - वेदिका दक्षिण भाग, और अग्निप्राधान्य १५६ - अग्निप्राधान्य, और पुत्रसन्तति " 7 १११७ " " " 31 " १११७ 11 " 3 " ११८ १५७ - दक्षिणा भोणि के अनुगमन की उपपत्ति, और सनइन विस्तं सन - स्थापनोपपत्ति-विराम इति - सन्नहन - वित्र सन-स्थापनोपपत्तिः - ** -यथ- बर्हिस्तरणोपपत्तिः - ** -१५८ - प्रस्तर की शिखारूपता का संस्मरण १५६ - केश - लोम की प्रतिरूपता का प्रश्न? १६० - शिखा का अधोभाग, और केशलोम १६१ - केश - लोम -सम्पत्ति का संग्रह, और बर्हिका आस्तरण १६२ - वेदिरूपा योषा ( स्त्री ) १६३ - स्त्री का भद्रमण्डली में प्रवेश, श्रीर शिष्टाचारानुगता - लज्जात्मिका सावरणता १६४ - सावरण भाव, श्रर बर्दिस्तरण १६५ - लज्जाभाव का संरक्षण, और बर्हिस्तरण १६६ - पृथिवी के ऊसर, और उर्वरभाग १६७ - उर्वरा भूमि, और लक्ष्मी १६८ - उसर भूमि, और लक्ष्मी १६६ - ओषधियुक्त भूप्रदेश का भोग्यतमत्त्व १७०- ओषधि वनस्पति से प्राच्छ्छादित उर्वर-भूप्रदेश का जीवनीयतमत्त्व १७१ - जीवन सम्पत्ति का संग्रह, और बस्तिरण II १७२ - उपजीवनीयतम भूप्रदेश का पारिभाषिक स्वरूप - दिग्दर्शन १७३ - बर्डि की प्रभूतमात्रा का अनुगमन १७४ - बर्हि के मूलभागों का परोक्षभाव, श्रीर तत्कारण- निदर्शन १७५ - त्रिवृद्भावापन्न यश, और तीन बार स्तरणक १११७ " " १११८ 19 " " " " " 23 " " १ ९ १८ 99
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड १७६ – स्तरण कर्म्मसाधक - यजुर्म्मन्त्र का संस्मरण १११८ १७७ - दर्भतृण का भावनात्मक मसृणत्त्व ( कोमल स्पर्शत्त्व ), और निदानभाव १७८ - भावनात्मक निदानभाव, और कर्म-श्रेष्ठता का मूलाधारत्त्व, तथा बर्हिस्त-रणोपपत्ति का विराम इति - बर्हिस्तरणोपपत्तिः थ - प्रग्निकल्पोपपत्तिः १७६ - सम्वत्सरात्मक यज्ञपुरुष के एकविंश-स्तोमात्मक - शिरोभाग का संस्मरण १८० - वैधयज्ञ का शिरः प्रदेश, और श्राव-नीय कुण्ड १८१ - मुखभागस्थ - आहुतिग्राहक - अन्नादाग्नि १८२ - अन्नादाग्नि का प्राबल्य, और अन्ना-कर्षण दहन - पचनादि क्रियाश्रों का यथावत् सञ्चालन १८३ - अग्निमान्य, और पाचनक्रियादि का शैथिल्य १८४ - इध्मकाष्ठ से अन्नादाग्नि में बलाधान १८५ - शिखापर्य्यन्त व्याप्त यज्ञपुरुष १८६ - प्रस्तररूपा शिखा का आहवनीय से सम्बन्ध एवं श्रग्निकल्पोपपत्ति का उपराम इति अग्निकल्पोपपत्तिः - ** -" " १११६ अथ- परिधि - परिधानोपपत्तिः १८७ - प्राप्त्या विज्ञानानुगता परिधित्रयी का सिंहावलोकनात्मक संस्मरण 13 29 22 १८- पुरुषाग्नि- प्राकृताग्नि - विराडग्नि-सम्वत्सराग्नि नामक चतुर्द्धा विहित अग्निदेव का संस्मरण १८६ - चतुर्थ सम्वत्सराग्नि रूप - ' भूतानांपति: ' १६० - चतुर्थ - सम्वत्सराग्नि रूप - ' भूतानांपतिः ' नामक अग्नि के अवान्तर चार विवर्त्त " १३१ - पार्थिव सम्वत्सरचक्र, और गायत्राग्नि १६२ - सौर - सम्वत्सरचक्र, और सावित्राग्नि १६३ - पार्थिवसम्वत्सराग्निरूप- पार्थिव गायत्राग्नि की अवस्था चतुष्टयी " १ ९ ४ - भूपिण्ड गर्भस्थ प्राणाग्नि " " १६३ – प्राणाग्निरूप अन्नादाग्नि, और रुद्र १६६ - रुद्राग्नि की अवस्थाचतुष्टयी १६७ - एक होता, और तीन प्या, तथा रुद्राग्निचतुष्टयी पार्थिवसम्वत्सरात्मिका-गायत्ररूपा १६८ - अथन्यः स भूतानां - पतिः, सम्वत्सरः सः १६६ - गृहपति, और सम्वत्सरूपा अवस्था-द्वयी, और पार्थिव - गायत्राग्नि २०० - गृहपतिरूप अन्नादाग्नि २०१ - भूपिण्डस्थ पार्थिव अग्नि की उक्थ, और अवस्था 11 २०२ - सर्वप्रभव - हृद्य - अनिरुक्तप्रजापतिरूप " " १११६ २०३ - पार्थिवयज्ञ का यजमानरूप उक्थाग्नि २०४- पार्थिव - उषारूपा यजमानपत्नी २०५ - दाम्पत्यभाव, और पार्थिवप्रजोत्पत्ति २०५ - उक्थाग्नि की प्राणात्मिका रश्मियाँ, १११६ " " ११२० २०६ - पार्थिव अर्काग्नि की सीमा, और रथन्तरसाम 13 २०७ - अर्करूप - प्राणाग्नि की पार्थिवाग्नि, और सम्वत्सराग्नि रूपेण अवस्थाद्वयी 19 २०८ - भूपिण्डावच्छिन्न रूप प्राणाग्नि, और ' भूपति ' ११६ ,, " "
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२०६ - भूमहिमावच्छिन्न अर्करूप प्राणाग्नि, और ' भूतानां पतिः ' २१० - सम्वत्सर चक्रका स्वरूप- समन्वय की २११ - भूतानांपति: ' रूप सम्वत्सरप्रजापति त्रिवृत्- पञ्चदश- एकविंशस्तोम - मेद से अवस्थात्रय २१२ - भूतानां पतिः, श्रौर एकविंशस्तोमस्थ-श्रादित्य " २१३ – भुवनपतिः, और पञ्चदशस्तोमस्थ वायु 21 २१४- भुवपतिः, और त्रिवृत्स्तोमस्थ अग्नि 99 २१५ - भूपतिः, श्रौर भूपिण्डाग्नि २१६ - भूपति - भूपिण्डावच्छिन्नः ज्येष्ठभ्राता 33 २१७- भुवनपतिः पृथिव्यवच्छिन: -अग्निभ्राता 19 २१८- भुवनपति: श्रन्तरिदलो कावच्छिन्नः २१६ - भूतानां पतिः - दिव्यलोकावच्छिन्नः २२० - पिता प्रजापतिद्धयः २२१ - गृहपतिः - उक्थः विषयसूची ११२० 13 " 29 २२२ - श्रकविधा श्रग्निचतुष्टयों से अनुप्राणित ११२१ एक प्रश्न २२३- श्राप्या - विज्ञान के द्वारा प्रश्नसमाधन २२४ - भूपिण्डानुगत श्रवसमुद्र, और ' समुद्र-मभितः पिन्वमानम् ' २२५ - एति च प्रति च रूप- गायत्राग्नि और तद्वारा मोमापहरण का संस्मरण " २२६ - देवताओं के होत्रकर्म का सञ्चालन 13 २२७ - साम्वत्सरिक श्रग्नित्रयी के द्वारा हौत्र-कर्म के प्रति तटस्थता और वषट्कार 31 २२८ - वाक् - सीमारूप - वषट्कार २२६ श्रग्नित्रयी का समुद्र में पलायन २३० - दौत्र कर्म में नियुक्त गायत्राग्नि २३१ - समुद्रानुगत श्रासुरप्राणाक्रमण से वश का संरक्षण १३२ – सीमारूपेण स्वरूपरक्षा, और उच्छिष्ट-द्रव्य का ग्रहण, तथा श्राप्याग्नि " २३३ - पलायित श्राप्याग्नि की शुद्धावस्था, और मलिनावस्था २३४ - ब्रह्मोदन भागानुगति, और शुद्धाच्या " २३५ - प्रवर्ग्यभागानुगति, और मलिनाप्त्या " २३६ - मलिन प्याग्नि से समन्वित अतत्त्व, और तद्द्वारा भूपिण्ड की स्वरूप- निष्पत्ति " " २३७- प्रवर्ग्यात्मक विद्रव्य का संग्राहक भूपि -एडस्थ मलिन श्राव्या ११२२ २३८ - शुद्ध प्याग्नि का सन्तर्पक साम्वत्स- 19 रिहविद्रव्य २३ - प्राकृतिक नित्य - हविर्यज्ञ के प्रतिरूपभूत वैध हविर्यज्ञ का समन्वय " २४० - देवाननुविधा नै मनुष्याः २४१ - यद्वै देवा श्रकुवंस्तत् - करवाणि २४२ - परिधिपरिधान - कम्मे का पारिभाषिक समन्वय, एवं परिधान - कम्मोपपत्ति का विराम अथ- परिधि - काष्ठ- विचार २४३ - यशियवृक्ष, और परिषियों का स्वरूप-निर्माण २४४ - पलाश - विकङ्कत -- काष्म - चिल्व खदिर-उदुम्बर- नामक यज्ञातिशय से समन्वित यज्ञियवृक्षों का संस्मरण २४५ - पलाशवृक्ष का सप्रमाण स्वरूपोष-वर्णम ( १ ) ११२१ 11 " II २४६ - विकङ्कतवृक्ष का स्त्ररूपवर्णन ( २ ) ११२३ २४७ - काष्मर्य्यवृक्ष का स्वरूपवर्णन ( ३ ) ११२४ २४८ - त्रिल्ववृक्ष का स्वरूपोपवर्णन ( ४ ) 29 २४६ - खदिरवृक्ष का स्वरूपोवन ( ५ ) " 1 " 31 ११२५ ११२६ २५० – उदुम्बरवृक्ष का स्वरूपोपवर्णन ( ६ ) ११२७ २५१ - आर्द्रभाव से समन्विता परिधियों २५.२ -- जीवनीयरसात्मक श्राव भाव का संग्रह h ११२८ १२.
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२३३ - प्रात्याग्नि की परिधिरूपता, श्रौर शतपथब्राह्मण २ खण्ड अनुरूपभावात्मिका आर्द्रता २५४ -- सुराक्रमण निरोध - कुशला परिधित्रयी, और बाहुपरिमाण २५५ - विश्वावसुप्रमुख गन्धर्न, और पश्चिम-भागानुगता परिधि २५६- अन्तर्जगद्द्द्विज्ञानानुगत स्वानुगत विश्व २५७ - यजमान के विश्व की सुखशान्ति २५८ ‘ ' विश्वस्यारिष्टयै ' ' का समन्वय २५६ - दक्षिणदिशा, और इन्द्र २६० – ‘ इन्द्रस्य बाहुरसि ’, और दक्षिण - परिधि २६१ - ' उदीची दिक - मित्रावरुणौ ', और उत्तर-परिधि २६२ - ' मित्रावरुणौ - वोत्तरतः ’ ११२८ ,, 99 " " " 1 १ ९ २६ २७१ - गायत्रीछन्द के द्वारा सम्पूर्ण छन्दों का परिग्रहण २७२- समिद्ध छन्दों के द्वारा देवताओं के लिए व्यवहन २७३ - पार्थिव श्रग्नि में दिव्यतेजोयुक्त अग्नि का श्राधान और समिन्धन का एक-मात्र तात्पर्य २७४ - इविर्णहन कर्म्म में समर्थ पार्थिव श्रग्नि का दिव्यतेजोमयस्त्व २७५ - खगोलीय उत्तरस्थ कर्कवृत्त से प्रारम्भ कर दक्षिणस्थ मकरवृत्त पन्त परि-यात नगती त्रिष्टुप -पडित बृहती-श्रनुष्टुप् - उष्णिक - गायत्री नामक सप्त-विध देवच्छन्द २७६ - उदीचीदिक, और उद्गाता श्रादित्य इति - परिधि - परिधानकम्मोपपत्तिः २७७ - सम्पूर्ण छन्दों का समिन्धन अथ समिधाभ्याधानोपपत्तिः २६३ - अग्निकल्पार्थ गृहीत समिध २६४ – सभिधाभ्याधानकर्म का संस्मरण २६५ - ऋतुदेवता, तथा छन्दोदेवता का समि-न्धन, श्रौर समिधाधान २६६ छन्द, और ऋतु के समिन्धन से ही हव्यवाट अग्नि का समिन्धन २६७ - परिधित्रयी से समतुलिता सम्बत्सरा-ग्नित्रयी २६८ - गायत्राग्नि का प्रतिरूप बेघयश का श्राहवनीयाग्नि ११२६ 30 २७८ - श्रग्नि का प्रातिस्विक छन्द ' गायत्री ' २७६ - अग्निः सर्वा देवताः २८०- सर्वन्दो रूप गायत्री छन्द २८१ - माध्यम श्रग्नि २८२ -समिन्धनकर्म के द्वारा ही हौत्रक की सफलता २८३ - द्वितीया समिष, श्रौर वसन्त का समि-न्धन २८४ - सम्वत्सराद् श्रुतव रेतो आभृतम् 11 २८५ - प्रजनन कर्माधिष्ठात्रीं ऋतुएँ ११२६ 99 " 1 17 19 " " 29 १ ९ ३० " २८६ - सर्व ऋतुप्रतिष्ठा रूप वसन्त २८७ - वसन्त के समिन्धन से षड् का-समिन्धन २६ - समिद्ध ऋतुओं के द्वारा श्रग्नि में २६६ - परोक्ष, एवं प्रत्यक्षरूपेण उभयथा अग्निसमिन्धन २८ २७० - ' वीतिहोत्रं त्वा ० ' इत्यादि गायत्रीमन्त्र, और समिध का श्रभ्याधान ऋतुधर्म्म का समावेश धम्मत्मिक प्रजनन २ ९ ० - ऋतषः समिद्धाः प्रजाश्च जनयन्ति इति - समिधाभ्याधानोपपत्तिः " " " 23 19 " " " 17 १२१
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अथ मन्त्रजपोपपतिः २६१ - परिधिस्थापन के द्वारा नाष्ट्रा - राक्षसों का आक्रमण निरोध २१२ - सोरतेब, और नाम्रा राक्षसों - का सर्वनाश २१ - ' सूर्य्यस्त्वा पुरस्तात् पातु ० ' इत्यादि मन्त्र, और मन्त्रवपोपपत्तिः 31 विषयसूची ११३० " 1 यथ - विधृती - स्थापनोपपत्तिः २६४ - ' विधृती, शब्द का द्वित्त्वभाव २१५ - विश्वयशानुगता विघृतिद्वयी २ ९ ६ - धृतिशक्ति से समन्विता विधृति २६७– प्राणाग्नि, और मृताग्नि २६८ - प्राणसोम, और भूतसोम २१६- शुष्कगुणक - श्रग्नि ३०० श्रार्द्र गुणक सोम ३०१ - श्रारम्भणात्मक उपादान कारण ३०२ -स्वकार्याधारात्मिका वृतिलक्षणा प्रति ष्ठभूमि और विवृति २०२ - श्रग्निसोम का सहन द्वन्द, और तत्रि-बन्धन द्विवचनानुगत- ' विघृती ' शब्द ११३० " 15 ११३१ " " " " 39 19 ३१२ - ' कालो यज्ञं समैरयत् ' का संस्मरण ३१३ - सम्वत्सर का छन्दोरूप- श्रावपन ३१४ - खंब्रह्म, और त्राकाशायतन ३ ९ ५ - श्रचिंम्म गित्मिक ज्योतिर्भाव ३१६ - धूममार्गात्मक - तमोभाव ३१७- सूर्य्यानुगत- ऐन्द्र - मित्रकपाल ३१८ - चन्द्रमानुगत - वारुण - वरुणकपाल ३१६ - मित्रकपालात्मक पूर्वक पाल ३२० - वरुणकपालात्मक पश्चिमकपाल ३२१ - सम्वत्सरप्रजापत के कालात्मक, तथा यज्ञात्मक - विवत का संक्षिप्त इतिवृत्त ३२२ - ' कुटिलकाल ' का पारिभाषिक स्वरूप ३२३- श्राधिदैविक विश्वप्रजापति के दो चतु ३२४-- अग्नि - खोमात्मक दो भ्र ू -भाव ३२५ - प्रलयकाल का स्वरूपेतिवृत्त ३२६-- द्यावापृथिवी रूप सौर- चान्द्र - श्राग्नेय-सौम्य - कालचक्र के दो भ्र ू , और प्रति ष्ठाभाव ३२७ -- भ्र रूप दो विकृतियां, एवं अथर्ववेदीय ' वितृतीय पुण्याः ' मन्त्र का संस्मरण ३२८ - कुशात्मिका - विभृति ३२६ -- दर्भतृणविशेषों की याशिक - संज्ञा, और विधुती ३३० - विधृति - स्थापन कर्म का स्वरूपेतिवृत्त ११३० ११३२ " " 33 39 19 " " " " " " 19 " ११३३ " 2 " 1 39 37 " ३०४ - तात्पर्यार्थ - समन्वय 31 ३३१ - विघृती का तिर्य्यगाधान, और तदुपपत्ति " 1 ३०५ ऋताग्नि सोमयुग्म का पारिभाषिक-३३२ - ब्रह्म क्षेत्र, और तिर्य्यगाधान 27 स्वरूप " 1 ३०६ – सत्याग्नि सोम युग्म का पारिभाषिक स्वरूप ३३३ - स्वरूप रक्षात्मक उभयनियन्त्रण " ३०७ - सृष्टिधाराओं की प्रक्रान्ति " " ३०८ - वाय्वात्मिका ताग्निसोमद्वयी " " ३०६ - चन्द्रात्मिका सत्याग्नि सोमद्वयी " १३४ - क्षेत्र, और विट् का विवरणकर्म्म, एवं विघृती स्थापन कम्मोपपत्ति का विराम इति - विधृती - स्थापनोपपत्तिः " " ३१० - यज्ञात्मक सम्वत्सर ३११- कालात्मक सम्वत्सर 19 23 १२२