Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 251–260
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 251–260
पृष्ठ 251
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण २ खण्ड अथ- कस्थापनकम्र्म्मोपपत्तिः ३३५ - विधृती के ऊपर ' प्रस्तर ' का स्थापन ३३६ - कपात्रों का वेदि पर संस्थापन ३३७ - ' सेदं प्रियेण धाम्ना ० ' इत्यादि मन्त्र का संस्मरण " ११३३ " ३३८- ' श्रु वा असदन् ', और स्पर्शक ३३६ - कूस्थापनकर्म्म का उपराम इति - प्रथमकाण्डे तृतीयाध्याये इध्म - परिधि - लक्षणं -द्विब्राह्मणात्मकं ( ३-४ रूपं ) ब्राह्मणम् इति - इध्म- परिध्यनुगत - कर्म्मसंग्रहः १७ ११३४ " II
पृष्ठ 252
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
• sit: • अथ - शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्ये - प्रथमकाण्डे-तृतीयाध्याये चतुर्थाध्याये च ब्राह्मणचतुष्टयात्मकं - सामिवेन्यनुवचननामान् १८- सामिधेन्यनुबचमक क्रमप्राप्त १८ वें कर्म्म के विज्ञानभाष्य की ' विषयस्मारकसूची ' ( पृष्ठ सं ० १ ९ ३५ से १३३५ पर्य्यन्स ) तृतीय अध्याय में पञ्चम, तथा तृतीय - प्रपाठक में द्वितीय ब्राह्मण सामिधेनी - ब्राह्मणानुगत - प्रथम - ब्राह्मण १- प्रथमकाण्डान्तर्गत - तृतीय- चतुर्थ- श्रध्या यानुगत - ब्राह्मणचतुष्टयात्मक - सामिवेन्यनु-बचनब्राह्मण ( मूल ) २- मूलब्राह्मणों का अक्षरार्थसमन्वयात्मक अनुबाद ११३५ ३- सूत्रानुगत पद्धति संग्रह १२४ ११५२ ११६१
पृष्ठ 253
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण २ खण्ड वैज्ञानिक - विवेचना २२- अन्द्रो हवं बहसि २३ - श्रादिद्द वेषु राजसि सामिधेनी- ब्राह्मणानुगत- प्रथमत्राह्मण २४ - भूताग्नि का द्यु लोक में गमन १ ४ - यज्ञेतिकर्त्तव्यतानुगत- श्रग्निसमिन्धन ५- ' अग्निरु वै यश: ' ६ - यशकर्म की मूल प्रतिष्ठा, और अग्नि ७- दैविक - भौतिक - श्रात्मिक- मेदभिन्न- त्रेता-ग्नियों का समन्वय, और देवात्मा ८- खगोलीय पार्थिव - त्रिणाचिकेत नामक सप्तदश स्वर्गस्थान में प्रतिष्ठित दैवात्मा ६ - देवात्मा के रश्मिरूप प्राणों का यजमान के साथ ग्रन्थिबन्धन सम्बन्ध ११६७ १०- दैवात्मा का प्राणदेवताओं के साथ बन्धन " ११ - श्रायुर्भोगानन्तर दैवात्मा कर्षणाकर्षित यन-मान के भूतात्मा का स्वर्गगमन " १२ - यज्ञातिशय की समाप्ति के अनन्तर भूतात्मा का पुनः मृत्युलोकागमन १३ - क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोके वसन्ति १४ - यज्ञफलसिद्ध्यर्थं अग्निश्रयी का अपेक्षित ग्रन्थिबन्धन १५ - श्राधिभौतिक - पार्थिव गायत्र- श्रग्नि १६ - आध्यात्मिक - शारीराग्नि १७- श्राधिदैविक - सौर -सावित्र श्रग्निं १८- पार्थिव श्रग्नि की प्रवर्ग्यरूपता ११ - सावित्राग्नि की कृष्णरू में परिणति २०- ' शेषे वनेषु मात्रो ' का संस्मरण २१- ' सन्त्वा मर्तास इन्धते ', श्रौर श्रग्नि का " " " 31 11 " २५- स्वाभाविकी - श्रग्निगति, श्रीर यज्ञसम्वन्ध सेतत् श्रसंस्पर्श २६ - यज्ञकर्मणि उपयुक्त विशेष - श्रग्नि का संस्मरण २७ - यज्ञातिशयरूप देवात्मा के मौलिक स्वरूप का समन्वय २८ - श्राकर्षणानुगत - स्वर्गरुल, और देवात्मा २६ - भूताग्नि का सामान्यरूपेण प्रज्ज्वलन ३० - सामान्य प्रज्ज्वलनकर्म्म, और इध्म नामक काठ का प्रक्षेप ३१ - ' इन्धन ' रूप सामान्य- प्रज्ज्वलन ३२ - दिव्याग्नि का प्रतिरूप श्राहवनीयाग्नि ३३- दिव्याग्नि सम्बन्धरूप समिन्धनकर्म ३४ - दिव्यातिशय के सम्बन्धरूप समिन्धन से वञ्चित भूताग्नि की अयज्ञियता एवं श्रात्यन्तिक निरर्थकता ३५ – निरर्थक - स्वाहा - स्वाहा, और यज्ञविद्या पर कल - प्रक्षेप ३६ - ऋषिप्रदिष्ट सुप्रसिद्ध सामिधेन्यनुवचन-फर्म का महत्त्व ३७- लोकस्थ - प्राण देवताओं की प्राणात्मकता ३८ - रूप - रस- गन्ध - स्पर्श - शब्द - शून्यत्त्वे सति-अधामच्छदत्त्वमेव प्राणत्वम् ३ ९ - महती - विप्रतिपत्ति, और तत्समाधानोप-37 " 31 11 " " 6 33 " 9 " " कम ४० - ' स्वरसमन्वय ', और विप्रतिपत्ति का निराकरण " " 9 नागरण १२५ ४ ९ - पृथिवी और सूर्य्य - कक्षाओं की अभिन्नता 19
पृष्ठ 254
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४२ – सूर्योपमद्दभूता पृथिवी ४३ – सूर्य्य, और पृथिवी का पारस्परिक-श्राधाराधेय - सम्बन्ध ४ - गौरूप सूय्ये, और रश्मिरूप शृङ्ग विषयसूची ११६८ ६६ – स्वतः सिद्धा अपौरुषेया मन्त्रात्मिका विज्ञानवाक ११६६ " ४५ - गोशन के आधार पर पृथिवी का बहुन 19 1 ४६ - सौरप्राणात्मक - ' स्वर ' तत्व ४७ - पार्थिवभूतात्मक ' व्यञ्जन ' ४८ - स्वरात्मक सू की स्वर्लोकता ११६६ ४ ९ - ' स्वरहर्देवाः सूर्यः ' " " ५० व्यञ्जनवाक्_ • और अनुष्टुप् 36 " " ५१ - स्वरवाक, और बृहती ५२ -स्वराधार के बिना व्यञ्जनोचारण- श्रस-म्भव ५१ - सूर्य्याधार के बिना पृथिवी की स्थिति असम्भव ५४ - पार्थिवी व्यञ्जनवाक् 21 अनुस्यूतसौर-13 ५५ - श्रमुष्टुब्लक्षण । पार्थिवी वाक " स्वरतत्व का अन्वेषण ६७ - ऋषियों के अन्तःकरण में वेदतत्वा-त्मक मन्त्रों का स्वत: आविर्भाव ६८ - मङ्गलमूर्ति विधि का संस्मरण, श्रीर सामिधेन्यनुवचन कम्मं का उपक्रम ६६ - श्राहवनीयाग्नि में अपेक्षित दिव्यप्राण का सम्बन्ध ७० - उभयाग्नि का एकीभाव, और यशस्व-रूप की संसिद्धि ७१ - एकीभावात्मक - समिन्धनक ७२ - कर्म्म की अभिधा का समन्वय ७३ - होता के द्वारा मन्त्रों का उचारण ७४ - गायत्री छन्द, और श्रग्निदेवतानुगता-स्वरलहरी ७५– सत्यसंहित - प्राणदेवताओं का स्वरवाक् के द्वारा आकर्षण, एवं अग्नि में तत्-प्रवेश १२०० " 19 13 11 " " 21 ५६ - दिव्यतश्वात्मक स्वरूप इन्द्र ५६ - नियमित स्वर सन्धान, और दिव्यप्राण-का आकर्षण ५८- स्वरविशानुगता रहस्यपूर्णा परीक्षा ५६ - दिव्य लोकस्थ अग्नि - इन्द्र - वरुण श्रादि-त्यादि प्राणदेवताओं की छन्दः सम्पत्ति का श्रन्वेषण, श्रौर स्वरमाध्यम से तत् संग्रहोपाय- प्रदर्शन ६० - श्रनुरूप - स्वर - बर्ण- मात्रा - युक्त - मन्त्र-प्रयोग, और तन्निबन्धना इष्टसिद्धि ६१ - प्रतिकूल - स्वर - वर्णादि - युक्त मन्त्रप्रयोग, और तनिधना महती विनष्टिः ६२ - स बाग्वज्रो यत्वमानं हिनस्ति ६३ - विप्रतिपत्ति का समाघान ६४ - वेदमन्त्र का मन्त्रत्त्व ६५ - मन्त्र का अपौरुषेयत्त्व 17 ७६ - देवप्रवेश से अग्नि का एकीभावात्मक " " " 17 " " " " 31 ७७ - सामिधेनी चाएँ ७८- ' समिन्धे- एताभि ' गमिः ७६ - अध्वय्यु के द्वारा अग्नि की इष्म से इवभाव में परिणति ८० होता के द्वारा मन्त्रों से अग्नि की समिद्ध भाव में परिणति ८१ - प्राणाग्नि के स्थिर - सम्बन्ध के लिए अपेक्षित - भूत का माध्यम ८२ - भूतद्वारेणैव प्राणाकर्षण ८३- प्राणस्त्ररूपसम्पादक - अमुकसंख्यामित-सामिधेनीमन्त्र, और प्राणसम्पति ८४ - भूतश्वरूपसम्पादक - श्रमुकसंख्यामित-इध्म - काष्ठ ८५ - यावत्सामिधेनी- मन्त्र समतुलित नाष्ण काष्ठ 27 31 " 1 " १२६
पृष्ठ 255
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८६ - इन्धन, और समिन्धन - कर्म से पूर्व-भाव में परिणत श्रग्निदेव ८७- समिद्धाग्नि के प्रति श्रग्न्युपासक भूसुर का नमन - अध्वर्यु कृत इन्धनकर्म, एवं होता के द्वारा कृत समिन्धनकर्म के सम्बन्ध में प्रश्न - ( क ) पार्थिव अग्नि का वायु से ही प्रज्ज्वलन ८ - ( ख ) वायुरूप प्राकृतिक अध्वर्यु ', इन्धनरूप प्रज्ज्वलन शतपथब्राह्मण २ खण्ड १२०० " १२०१ और " " ६० - पार्थिव मूलाग्नि का द्युलोकस्थ दिव्या-ग्नि के समन्वय से समिन्धन ११ - पार्थिव अग्नि होता, और तद्द्वारा समिन्धनकम् २- यद्वै देवा श्रकुर्वंस्तत् करवाणि ३ - सामिधेन्यनुवचनकर्म्म की संक्षिप्त उप-पत्ति का उपराम ६४ - प्रतिरूपानुगता सजातीय मर्य्यादा, श्रौर समिन्धनकर्म्माधिकार १५- ' अग्नये समिथ्यमानायानुव्र हि ' का संस्मरण ६८ - श्रग्नि का गायत्री छन्दोऽनुगतत्त्व " " " " " १०८ - गायत्री का प्रातिश्विक वीर्य्य १०६ - मनः प्राण - वाङ मय श्रात्मा की धातुत्रयी " 9 ११० - कारण - सूक्ष्म - स्थूल शरीरत्रयी 3.7 १११- मनोऽनुगत कारणशरीर, और पराक्रम ११२ - प्राणानुगत सूक्ष्मशरीर, और वीर्य्य ११३ - बागनुगत स्थूलशरीर, और बल ११४ - मनस्वी मानव, और पराक्रम ११५ - प्राणवान् सिंह, और वीय्यं ११६ - बलवान् हाथी, और बल ११७ - प्राणशक्ति, और ' वीर्य्य ' भाव ११८ - ' वीय्यं वै गायत्री ' का समन्वय १११ - ब्रह्मवीर्य्यात्मिका सामिधेनी ऋचाओं में क्षत्रवीर्य का प्रधान १२० - अभिगन्ता ब्रह्म, और कर्त्ता क्षत्रिय १२१ - ब्रह्मसम्पत्ति, और क्षेत्रसम्पत्ति का संग्रह 91 १२२ - ब्रह्मवीर्य्यात्मक श्राग्नेय गायत्री छन्द " " १२३ - क्षत्रवीर्य्यात्मक ऐन्द्र - त्रिष्टुच्छन्द " " १२४-११सामिधेनी ऋचाएँ, और एका-दशाक्षर - त्रिष्टुब्छन्दं १२५ - यज्ञ की पारिभाषिकी स्वानुरूपा सम्पत्ति १२६ - अनुरूपता, और ' रूपसमृद्धि ' १२०२ " 3 " " " " 11 " " " " " १२७ - विश्वयज्ञानुगता दृष्टि " १२८ - महाविश्वयज्ञ की प्रारम्भभूमि " " 33 १२६ - ' वेदा: - सूत्र - नियतिः - सत्यम् ' रूप 17 १२०३ ६६- ब्रह्मवीर्य्यप्रवर्त्तक- अग्निदेव १०० - क्षत्र वीर्य्यं प्रवत्त के इन्द्रदेव १०१ - विषीर्य्यप्रवर्त्तक विश्वदेव १०२ - पूषाप्राण, और शूद्रभाव १०३ - सामिधेनी ऋचाओं का पारिभाषिक श्रग्निमयत्त्व १०४ - छन्दोमर्य्यादानुगत गायत्री छन्दस्कत्त्व १०५ - ब्रह्मात्मिका गायत्री, और शक्तिविशेष 39 १०६ - गायत्री की ब्रह्मरूपता, तथा वीर्य्यरूपता की विशेषता का समन्वय १०७ - गायत्री छन्द का ब्रह्मवीर्य्यात्मकत्व 27 29 " " 13 " १२०२ २२७ त्रिवृद्भाव, और यज्ञसम्पत्ति १३० - विश्व का प्रथम यज्ञिय पर्व • स्वयम्भू, और तदनुप्राणिता त्रिवृत्सम्पत्ति १३१ - द्वितीय यज्ञियपर्वप - रमेष्ठी, और - इट्-ऊर्क - भोग - रूपा त्रिवृत्सम्पत्ति १३२ - तृतीय - यज्ञपर्व सूय्यं, और ज्योति: -गौ: -श्रायुः- रूपा त्रिवृत्सम्पत्ति १३३ - चतुर्थपर्व चन्द्रमा, और रेतः - श्रद्धा-यशः- रूपा त्रिवृत्सम्पत्ति 22 "
पृष्ठ 256
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विषयसूची , और बाकू - गौ: द्यौ -: -१३४ - पञ्चमपर्व भूपिण्ड रूपा त्रिवृत्सम्पत्ति ) विश्ययज्ञ की १३५ पाङक्क ( पञ्चावयव त्रिवद्भावापन्ना महती सम्पत्ति - याप्: - श्रग्नि १३६- शुक्र विज्ञान निबन्धन । वाक् श्रौर विश्व-रूपा श्रमृता शुक्रत्रयी, यश का उपक्रम शुक्रत्रयी, १३७ – अग्निः - आपः - वाक् - रूपा मर्त्या और विश्वयज्ञ का उपसंहार की अग्नि-१३८ - यज्ञप्रवर्तक- यज्ञियदेवताओं वायु आदित्य रूपा त्रिवृत्सम्पत्ति १३६- वैध - यज्ञानुगता - दीक्षा - सुत्या - उपसत्-त्रयी, और त्रिवृद्भाव पर उपसंहृता, १४० -तीन पर उपक्रान्ता, तीन और यज्ञसम्पत्ति १४१ - सामिधेनी कम्मौनुगता उपक्रमोपसंहारा-नुगता त्रिवृत्सम्पति , और प्राय-१४२ - प्रथम मन्त्र का त्रिवृद्भाव 93 णीय अनुवचनात्मिका त्रिवृत्सम्पत्ति और १४३ - अन्तिम मन्त्र का त्रिवृद्भाव, 13 उदयनीय - अनुवचनात्मिका त्रिवृत्सम्पत्ति उप-१४४- त्रिः त्रिः- अनुवचन की संक्षिप्ता-पत्ति का विराम यश-१४५ - संख्यानुगता प्रतिरूपता, और सम्पत्- का संग्रह विश्राम, १४६-११ मन्त्रों का १५ मन्त्रों पर 31 और चत्र - इन्द्र का संस्मरण १४७- इन्द्र की प्रहारशक्ति, श्रीरविद्युत् १४८ - विद्युदुरूप वज्र, और तदनुप्राणिता-पञ्चदश संख्या - सम्पत्ति १४ ९ प्रजापति का उर, और बाहु, एवं तदनुगत- पञ्चदशस्तोम १५० - पञ्चदशस्तोमानुगत त्रिष्टुप्छन्द १५१ - त्रिष्टुब भुगत - त्र - इन्द्र १२०३ 99 " " " १५२ - श्रग्निब्रह्म का ब्राह्मणत्व १५३ - शस्त्रप्रहार से विदूर ब्राह्मण: | १५४ - न वा अयं कञ्चन हिनस्ति १५५ - शत्रुविनाश, और यज्ञ पर श्राक्रमण करने वाले असुर अपेक्षित १५६ -- असुराक्रमण - निरोध के लिए ऐन्द्र चात्रतेज १५७- पञ्चदशसख्यानुगत श्रायुध क्षात्रतेजोयुक्त-१५८ - वज्ररूपा सामिधेनियों का अनुवचन १३६-- पञ्चदश संख्या नुगता प्रथमा उपपत्ति का विराम १६० - पक्षानुगता १५ रात्रियाँ १६ ९ - अमास ( पक्ष ) का परिप्लव, श्रौर सम्वत्सरयज्ञ की स्वरूप- सम्पत्ति १६२ - पञ्चदश सख्यानुगता द्वितीया उपपत्ति " का विराम १६३- श्रवयवी के बिना अवयवों की १६४ - प्राकृतिक पक्षाग्नि - सोम द्वयी, तत्प्रतिरूपा -दर्श - पूर्णं - मासद्वयी १२०३ 17 II १२०४ 37 पूर्णता और " १६५ - पञ्चदश संख्यानु गता --- अवयवी रूपा तृतीया उपपत्ति -पूर्णता, और १६६ - अहोरात्र यज्ञ का प्रतिरूप श्रग्निहोत्र १६७ -- पञ्चयज्ञ का प्रतिरूप दर्शपूर्ण मास १६८ ऋतुयज्ञ का प्रतिरूप चातुर्मास्य १६६ - श्रयनयज्ञ का प्रतिरूप - पशुबन्ध १७० - सम्वत्सरयज्ञ का प्रतिरूप ज्योतिष्टोम १७१ - सम्वत्सरयज्ञ की अनुरूपता, और पञ्च-" दशसंख्यानुगता चतुर्थी उपपत्ति १७२ - गायत्री छन्द के तीन चश्मा १७३ - प्रतिचरण की अष्टाक्षरता १७४ - एका त्रिपढ़ागायत्री, और २४ अक्षर १५ सामिषेनी-१७५ - गायत्री छन्दरका ऋचाएँ, और समष्टथात्मक ३६० अक्षर 31 " 31 " :::: १२८
पृष्ठ 257
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१७६ -- पञ्चदश संख्यानुगता शतपथब्राह्मण २ खण्ड सम्वत्सरसम्पत्ति, और पञ्चमीउपपत्ति -, १७७ -- ( क ) दर्शपूर्णमास में अपेक्षिता काम्येष्टि १७७-- ( ख ) काम्येष्टि, और १७ सामिधेनी-ऋचाएँ १७८ समिध्यमान समिट्टवती - मध्यस्था चा १७६- श्रभीष्टकामानुगता काम्येष्टि १८०- सर्वकाममूर्ति का मूलाधार सर्वप्रजापति १८१ - भूगर्भस्थ हृद्य श्रनिरुक्तप्रजापति १८२ - श्रनिरुक्तप्रजापति का महिमामय-मण्डलात्मक - वघट्कार १८३ - प्रजापति का सर्वरूप, और सर्वप्रजापति १८४ - सर्वप्रजापति, और ' स: ' १८५ - सत्रह की समष्टि, श्रोर सम्वत्सर-प्रजापति १८६ - सप्तदश संख्यानुगत- सातदशप्रजापति १८७ - कामपूरक - सप्तदशप्रजापति १८८ - सप्तदश संख्या नुगता सामिधेनी ऋचाओं की उपपत्ति का विराम १८६ - काभ्येष्टि के देवता का उपांशु रूप से यजन १६० - श्रनिरुक्तभाव का संग्राहक - उपांशुभाव १६१ - सवरूप का संग्राहक - श्रनिरुक्त भाव १६२ - शब्दशक्ति की अवछिन्नता १६३ - समष्टि, श्रौर - ' सर्व ' शब्द १६.४ - सर्वकामसमृद्धि, और उपांशुयजन १६५ - लौकिकी शिक्षा, और उपांशुमाव १६६ - कर्म की अनिरुक्तता, और तत्र वीर्य्या-धान १६७ - कर्म की निरुक्तता, और वीर्य्यपात १६८ - आत्म प्रजापति की शक्ति का पात, और निरुक्त भाव १६६ - यत् किञ्च प्राजापत्यं यज्ञे क्रियते उपां-श्वेव तत् क्रियते १२०४ " 1 " I " २०० - कार्य्यसिद्धि का अन्यतम शत्रु बाह्य-प्रदर्शन २०१ - मतान्तरानुबन्धिनी १२०५ २१ सामिधिनी -93 ऋचाएँ एवं तदुपपत्ति का निष्कर्ष २०२ - परमवैज्ञानिक भगवान् याज्ञवल्क्य के द्वारा मतान्तर का सहेतुक - निराकरण " 1 २०३ - पद्धतिविरुद्ध - श्रनुवचन " " २०४ - प्रायणीय - उदयनीय - भाव १२०५ " 2 " " " 13 11 19 12 २०५ - त्रिद्भावानुगता सम्पत्ति का संस्मरण २०६ - लोकत्रय सन्तानसम्पत्ति का संग्राहक-त्रिवृद्भाव २०७ - प्राणत्रय सन्तानसमृद्धि का संग्राहक-त्रिवृद्भाव २०८ - लोकत्रय वितान का कारण २०१ - एक के तीन परस्पर बद्ध - वितान २१० - निदान भावानुगता त्रिवृत्सम्पत्ति २११- श्रादिदैविक - प्राध्यात्मिक - लोकत्रय का अविच्छिन्न - वितान २१२ - सामिषेनी ऋचाओं के उच्चारण से अनुगत धारावाहिक प्रवाह, और श्रवि-चित्ररूपेण लोकवितान २१३ - अनवानन् - झुङ मन्त्रोचारण के सम्ब-न्ध में श्वास - प्रश्वासादि का विज्ञान-सम्मत निर्णय " २१४- विश्रामानुगता सन्तानधारा २१५ -- एकैकानुवचनपक्ष का समन्वय २१६ - लोक सम्पत्ति प्राप्ति का समन्वय २१७ -- ' एकैकामेवाननवानन् ' का पारिभाषिक-समन्वय २१८ - अहोरात्रों की संग्राहिका सामिधेनी ऋचाएँ २१६ - महोरात्रों का ( परिप्लवनात्मक ) सतत-चङक्रमण, एवं ऋङ मन्त्रों का परस्पर बन्धन 27 १२०६ " 1 " " 19 " १२.७ " " " " " " } १२६
पृष्ठ 258
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२० - विच्छेद रहित ग्रहोरात्रपर्व तन्निबन्धना सामिधेनी ऋचाएँ २२१ - सन्ततभावानुगत उच्चारण विषयसूची और १२०७ २२२ - विच्छेदरूप छिद्र, और तत्र सम्भावित-शत्रु का प्रवेश 99 २२३- अहोरात्र सम्पत्तिरूप भोग्य - परिग्रह २२४ - सन्ततानुवचननानुगता ऋचाएँ यजमान का १२०७ सामिधेनी तृतीयाध्याय में पञ्चम, एवं तृतीयप्रपाठक में द्वितीय ब्राह्मण - त्र उपरत सामिधेनी - ब्राह्मणानुगत प्रथम ब्राह्मण अत्र उपरत १ तीसरा अध्याय समाप्त ३ अथ चतुर्थ अध्याय - उपक्रान्त ४ चौथे अध्याय में प्रथम, एवं तीसरे प्रपाठक में तृतीय- ब्राह्मण सामिधेनी - ब्राह्मणानुगत द्वितीय - ब्राह्मण २२५ - श्राग्नेयी- सामिधेनी २ २३१ - श्रग्निस्वरूप प्रातिपूर्वक ब्रह्मवीर्य्याधान १२०८ २२६ - गायत्री छन्द २२७- एकादश ( ११ ) मूल संख्या २२८ - श्राद्यन्त के मन्त्रों की त्रिरावृत्ति १२६ - पञ्चदश [ १५ ] संख्यासम्पत् २३० - त्रिचद्वय का श्रनवानन् - उच्चारण " २३२ - प्रातिश्विक- गायत्रवीर्य्याधान " २३३ - क्षत्र वीर्य्याधान " २३४ - प्रायणीयोदयनीयानुगता - यज्ञिया - त्रिष्ट-" " " सम्पति का संग्रह 17 37
पृष्ठ 259
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण २ खण्ड २३५ - वज्रसम्पत्ति त्रिसम्पत्ति - श्रहः सम्पत्ति-संग्रह २३६- श्रनिरुक्त भावानुगता सर्वसम्पत्ति का सत्रह २३७ - लोक - प्राण - सम्पत्ति का संग्रह २३८ - अहोरात्र की अनन्यभोग्यता २३६ - प्रथमब्राह्मण के परिगणित विषयों का सिंहावलोकनात्मक संस्मरणोपराम २४० - [ क ] प्राकृतिक - यज्ञ का प्रतिष्ठाधरा-तलात्मक सत्यत्व २४० - [ ख ] प्रजापति की सन्तान, प्राजापत्य | २६७ - प्रत्येक वस्तुपिण्ड की यज्ञरूपता १२०८ | २६८- प्रत्येक यज्ञसंस्था के पदम् और पुन: -" " " " " " पदम् भाव २६ - वस्तुपिण्डरूप पदम् और वस्तुमण्ड-लरूप- पुन: पटम् २७० - वस्तुपिण्ड - वस्तुमहिमामण्डल - वस्तुतत्त्व-मेदेन त्रिपर्वा पदार्थ २७१ - पिण्डात्मिका अन्तः सीमा " 9 २७२ - मलात्मिका बहिःसीमा २७३ - मूर्ति, और ऋग्वेद " २७४ - मण्डल, और साम और २७५ - वस्तुतत्त्व, और यजुः " २४१ - प्रजापति के दायाद - [ सम्पत्ति ] -भोक्ता देवदेवता, और असुर २४२ -- प्रजापति को सञ्चितसम्पत्तिरूप सत्य-श्रनृत - युग्म २४३ -- श्रद्ध - श्रद्ध - रूपेण सत्य, और नृत का विभाजन २४४ - श्रद्ध श्रनृत से सन्तुष्ट देवदेवता २४४ - श्रद्ध ' सत्य से सन्तुष्ट - सुरवर्ग २४६ - पूर्ण - अनृत के इच्छुक असुर २४७- पूर्ण सत्य के इच्छुक देवता २४८- इच्छासाफल्य " " " २८० - यजुर्वेदात्मक- रसवेद 99 19 " 33 , " " २६२ - सत्य, और यज्ञ का सम्बन्ध २६३ - त्रयीविद्या का संस्मरण २६४- त्रयीवेदात्मिका यज्ञप्रतिष्ठा २६५ - त्रयीवेद के आधार पर प्रजापति के यज्ञवितान का साफल्य २६६ - त्रयीवेदोत्पन्न श्रग्निवाय्वादि देवताओं का परस्परस्परसङ्गम, और तद्रूपयज्ञ 19 " 29 " 3 २७६ - त्रयीविद्या के गर्भ में भूतोपलब्धि २७७– “ त्रय्यां वाव विद्यायां सर्वाणि भूतानि " २७८- ऋग्वेदात्मक छन्दोवेद २७६ - सामवेदात्मक- वितानवेद २८१ - छन्दोलक्षण ऋग्वेद के द्वारा वस्तुम्-तियों का निर्माण २८२ - विवानलक्ष्या सामवेद के द्वारा वस्तु-मण्डलों का निर्माण २८८३ - रसलक्षण - यजुर्वेद के द्वारा मूर्तिमण्ड-लन्तर्वर्त्ती रसात्मक गतिभाव की अमि व्यक्ति २८४ - सामरूप श्रादित्य २८५ - स्वरविज्ञान का संस्मरण, और साम २८६ – स्वरात्मक - सामरूप - श्रादित्य २८७ - स्वरात्मक प्राणदेवताओं का यजन, और यज्ञ २८८ - पिण्डात्मिका ऋक्, और पद्यभाव २८६ - गतिरूप यजुः, और गद्यभाव २० - वितानात्मक साम, और गेयभाव २६१ - श्रवसानभूमि, और साम २ २-- वर्त्ती_लवत्तात्मक सहस्रमण्डल, और साम * २५० से २५६ पर्य्यन्त की संख्या का क्रम भ्रान्तिवश रह गया है । २४६ - कृत्स्नसन्य की त्रैलोक्य वितान - कामना २६० – यश के श्राधार पर वाक्सत्य का त्रैलो-क्य में वितान २६१ - ( यज्ञं कृत्त्वा सत्यं तनत्राम है ) १२०६ १२०६ " " " " " 11 " 1 " " 39 " 1 " " " 9 19 " १२१० 39 " " " 9 " " " " " १३१
पृष्ठ 260
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६३ - सहस्रवर्मा सामतत्व २६४ सम्वत्सरयज्ञ के वितान की इयत्ता २६ - रथन्तरसाम का संस्मरण २६६ - त्रयस्त्रिविध ( ३३ ) यज्ञिय प्राणदेवता २६७-- ये स्थ त्रयश्च त्रिंशच्च २६८ - मनोर्देवा यज्ञियासः २६६ - वितानात्मक साम से उभयतः परिगृहीत यज्ञमंण्डल ३०० - सामव्याप्ति का विचार ३०१ - सामभाव, और तदनुगत सात श्रवान्सर पृष्ठ ३०२ - हयपृष्ट, और ' हिङ्कार ' ( १ ) ३०३ - स्पृश्यपृष्ठ, और ‘ प्रस्ताव ' ( २ ) ३०४- त्रिवृत्पृष्ठ, और ' आदि ' ( ३ ) ३०५ – पञ्चदशपृष्ठ, और ' उद्गीथ ' ( ४ ) ३०६ - सप्तदशपृष्ठ, और ' प्रतीहार ' ( ५ ) ३०७ - एकविंशपृष्ठ, और ' उपद्रव ' ( ६ ) ३०८ - पारावतपृष्ठ, और ' निधन ' ( ७ ) ३०६ - हृद्य पृष्ठ ( १ ) ३१० - त्रिवृदन्तर्भ पृष्ठ ( ६ ) - ( २ ) ३११ - पञ्चदश पृष्ठ ( १५ ) - ( ३, ३१२ - सप्तदशपृष्ठ ( १७ ) - ( ४ ) ३१३ - एकविंशपृष्ट ( २१ ) - ( ५ ) ३१४- त्रयस्त्रिशपृष्ठ ( ३३ ) ( ६ ) ३१५ - श्रष्टाचत्वारिंशत्पृष्ठ ( ४८ ) ( ७ ) विषयसूची १२१० | ३२३ – पारावतस्थान, और सर्वोङ्कार " ३२४ - हिङ्कारात्मक प्रणवसाम के ग्रहण से सम्पूर्ण सामों का परिग्रहण " " ३२५ - सङ्गीतदृष्टि से अनुप्राणित हिङ्कार 19 " 17 " 1 १२११ 11 " 3 " " " 19 ३१६ - प्रकारान्तरेण वा सप्तविधं सामोपासीत १२१२ ३१७ - विभिन्न प्रकारेण वा सप्तविधं सामो-पासीत ३१८ - सामतत्त्व, और उसका प्रकृतियज्ञ-प्रतिष्ठात्त्व " " ३१६ - सामानुगत हृद्यभाव, और हिङ्कार 33 ३२० - उपक्रमाबन्दु और प्रणवोङ्कार ३२१ - हिङ्कारात्मक प्रणवसाम " ३२२- सप्तदशस्थान, और उद्गीथोङ्कार " ३२६ - नाद - स्वर -श्रुति त्री - का संस्मरण, और तन्निबन्धन सङ्गीत ३२७ - सङ्गीत की मलमितिरूप नादब्रह्म ३२८ - नादब्रह्म के आधार पर क्षति का समुत्थान ३२६- श्रति के द्वारा स्वर की अभिव्यक्ति सङ्गीतानुगत - नादश्रुति - स्वर स्वरूप - दिग्दर्शनम् १२१२ १२१३ " 19 13 ( पृ ० सं ० १२१३ से १२५३ पर्य्यन्त ) -- * ३३० - सामानुगत हिङ्कार का संस्मरण ३३१ - व्यात्मक सङ्गीत, और तत् स्वरूप-मीमांसा ३३२ - ( क ) आत्मबुद्धि - समन्विता संत्रि-मूलानिष्ठा से संस्पृष्ट सङ्गीत ३३२ - ( ख ) नैष्ठिक, अतएव संस्कृतिनिष्ठ ब्राह्मण के लिए नियन्त्रित सङ्गीत ३३३ – ' तस्माद् ब्राह्मणो न नृत्येत न ' गायेत ' श्रति का संस्मरण ३३४ - मानवीय मन का महान्दोष ' आग्ला ' ३३५ - मानवीय शरीर का महान् दोष-' माल्व्य ' ३३६ -- मनोऽनुगत अग्ला दोष का उत्तेजक-प्रवत्त के गायन वादन ३३७- शरीरानुगत माल्व्यदोष का उत्तेजक-प्रवर्त्तक - नर्त्तन -गायन - वादन ३३८ - श्रग्ला के द्वारा श्रात्मानुगता संवित् की अभिभति १२१३ 19 " 1.J " " 92 23 " १३२