Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 261–270
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 261–270
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३३६- माल्व्य के द्वारा बुद्धयनुगत घृतिगुण का अभिभव शतपथब्राह्मण २ खण्ड ३४० - सङ्गीत का शरीर प्रधान नृत्याङ्ग, और माल्य दोष ३४१ - सङ्गीत का मनःप्रधान गायनाङ्ग, और आग्लादोष ३४२ - प्रकृतिसिद्ध पञ्चपर्वा विश्व के चतुथं ' चन्द्रमा ' नामक पर्व से मन की स्वरूप-निष्पति ३४३- भूपिण्डात्मक अन्तिम पर्व से शरीर का स्वरूप निर्माण ३४४ - सौम्य गन्धर्व - प्राण की आवासभूमि-चन्द्रमा ३४५- श्राप्यप्राणात्मक - श्री सराप्राण की आवास भूमि भूपिण्ड ३४६ - मनोऽनुगत चान्द्रगन्धर्व प्राण के द्वारा गायनात्मक संगीत की प्रवृति ३४७ - शरीरानुगत अप्सराप्राण के द्वारा नर्त्त-नात्मक सङ्गीत की प्रवृत्ति ३४८ - हास - परिहास- प्रमोद - प्रमोद - क्रीड़ा रति-मनः शरीर - निबन्धन, प्राण - समन्वय * मनोविभूतयः ( १ ) गन्धर्वाप्सरा ३४६ - सौ वै सोमो राजा विचक्षणश्च-न्द्रमाः ( १ ) ३५० - चन्द्रमा गन्धर्वः ( २ ) ३५१ - रूपमिति गन्धर्वा उपासते ( ३ ) ३५२- योषित्कामा वै गन्धर्वाः ( ४ ) ३५३ - स्त्री - कामा वै गन्धर्वाः ( ५ ) ३५४ - मनो मे, रेतो मे, पुनः सम्भूतिम्र्मे, चन्द्रमसि ( ६ ) ३५५ - गन्धो मे, मोदो मे, प्रमोदो मे, तन्मे-युष्मासु - गन्धर्वेषु ( ७ ) १२१३ 39 " * - शरीरविभृतय ( २ ) ३५६ - इयं वै पृथिवी भूतस्य प्रजा ( १ ) ३५७ - अद्द्भ्यः पृथिवी ( २ ) ३५८ - गन्ध इत्यप्सरस - उपासते ( ३ ) ३५६ - किन्तु मेऽस्मासु?, इति- हासो मे, कीडा मे, मिथुनम्मे ( ४ ) ३६०- गन्धेनैव च रूपेण गन्धर्वाप्सरसश्चरन्ति ३६१ - चान्द्रमनोऽनुगत गन्धर्वप्राण " " ३६२ - पार्थिव शरीरानुगत अप्सराप्रावा ३६३ - गन्धर्नप्राणानुगत तुम्बुरुप्राण " ३६४- अप्सरा प्राणानुगत नारदप्राण 19 " " 83 " 19 29 १२१४ " " 39 " अमृतप्राण १२१४ " 1 22 3.9 " " " ३६५- ( क ) - प्राणात्मक ऋषिभाव, और तुम्बुरु - नारद रूप ऋपिप्राण ३६५ - ( ख ) तुम्बुरु, और माङ्गलिक- ' तकार ' ३६६ - नारट, और माङ्गलिक- ' नकार ' ३६७ - ऋषिप्राण, और माङ्गलिक ' रकार ' ३६८- " त - न - र - री - म् ", और सङ्गीताधार-भूत तुम्बुरु - नादर ऋषियों का श्राद्यचात्मक - माङ्गलिक - संस्मरण ३६६ - गन्धर्वप्राणात्मक मन, और तुम्बुरुप्राण ३७० - अप्सराप्राणात्मक शरीर, और नारदप्राण ३७१ - शरीरानुगत चित्य - चितेनि घेयरूप मर्त्यभूत और ३७२ - श्रमृत - मृत्यु - मय प्रजापति ३७३ – केन्द्रस्थ प्रजापति, और प्राणमहिमा-त्मक - मण्डल ३७४ - प्राणमण्डल की नादरूपता २७५ - नादमण्डल के गर्भ में प्रतिष्ठित - श्रुति-स्वरात्मक सङ्गीत ३७६- प्राजापत्य अग्नि ( कायाग्नि ), और सङ्गीत ३७७ - वायव्यप्राण, और सङ्गीत ३७८ - उदात्तादि - स्वर, और सङ्गीत ३७ - मन्द्र - मध्य - तारस्वरत्रयी, और सङ्गीत 99 11 " " १२१५ 3
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३८० - व्यञ्जन भावात्मिका ध्वनिर्भावोपेता वैखरीत्राक्, श्रौर सङ्गीत ३८१ - सङ्गीताधारभूत नादब्रह्म का संस्मरण ३८२ - ' नादब्रह्म - तदानन्द मद्वितीयमुपास्महे ' ३८३ - ज्ञानजनित - भावनात्मक संस्कारपुञ्ज ३८८४ - कर्म्मजनित - वासनात्मक संस्कारपुञ्ज ३८५ - संस्कारपुञ्जद्वयी से सम्पुटित कर्म्मभोक्ता-कर्मात्मक- देही ३८६ - सौरी - बुद्धि का सहयोग, और कर्मात्मा की जीवनयात्रा का सञ्चालन ३८७- शुभाशुभसंस्कारानुगत- शुभाशुभ भोग ३८८ - भौतिक विषयानुगता श्रर्थकामना, और ३८६- श्रात्मा बुद्धि - मन की समन्वितावस्था, और विषयसूची १२१५ " " " 1 ' मानव की इच्छा ' का तात्विक स्वरूप १२१६ ३६० श्रात्मेच्छा का बुद्धि में सक्रमण " 1 ३६१ - बुद्धि के द्वारा तदिच्छा का मनोराज्य में आगमन ३६२ - मनोद्वार से तदिच्छा का इन्द्रियानुधावन २६३ - मानसेच्छा का महान् परिणाम शब्दोत्पत्ति 17 ३६४ - सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त वैश्वानराग्नि " ३६५ -- यो द्यां भात्यापृथिवीम् ३३६ - वेश्वानरो यतते सूर्येण २६७- भूपति भुवस्पति - मुवनपति रूप वैश्वानराग्नि ३६८ - वैश्वानराग्नि का शरीर में प्रचण्डरूपेण ध्वनिपूर्वक प्रज्ज्वलन १६६ - वैश्वानर की श्रुति, और दृष्टि ४०० - वैश्वानर का शब्द, और नादात्मकभाव,, ४०१- अनाहतभाव- निबन्धन- नाद ४०१ - आधिदैविक घोरघोरतम - प्रचण्डनाद, और योगमाया के अनुग्रह से तत्परो-क्षता, एवं सृष्टि की स्वरूप - रक्षा ४०३ - नादानुगत वैश्वानराग्नि, और छान्दोग्य-भति 22 13 19 39 ४०४ - आत्मबुद्धिसमन्विता मानसेच्छा का प्रथमाघात, और वैश्वानराग्नि ४०५ - आघात से प्रत्याहित वैश्वानर - श्रग्नि का तत्रैव व्याप्त वायव्य प्राण पर श्राघात 11 ४०६ - वायव्याघात से शब्दोत्पत्ति 39 ४०७ - वायुः खात् - शब्दस्तत् ४०८- श्रग्नि - मरुत् - का संयोग, और ध्वन्या-त्मिका वाक्_ ४०६ - शब्दमयी वैखरी की अभिव्यक्ति का रहस्यात्मक समन्वय ४१० - अग्निर्वाग्भुत्त्वा मुखं प्राविशत् का समन्वय, औरवाङमयाग्नि ४११ -- शब्दोत्पत्ति का मूलप्रवर्तक वाङ्मय - अग्नि ४१२ - ब्रह्मग्रन्थि, और पानप्राण ४१३- ब्रह्महृदय, और व्यानप्राण ४१४ - ब्रह्मकण्ट, और उदानप्राण ४१५- ब्रह्मरन्ध्र, और ऐन्द्रविज्ञानप्राण ४१६ - प्रन्थि हृदय - कण्ठ- रन्ध्र - भेद से वैश्वा-नराग्नि के चार प्रतिष्ठान - बिन्दु ४१७- पञ्चमस्थानात्मक - श्रास्य माव ४१८- ब्रह्मग्रन्ध्यनुगत श्रतिसूक्ष्मनाद " ४१६ - ब्रह्महृदयानुगत- सूक्ष्मनाद ४२१ - ब्रह्मरन्ध्रानुगत अपुष्टनाद ४२० - कण्ठानुगत - पुष्टनाद ४२२ - श्रास्यानुगत- कृत्रिमनाद ४२३- ' नाद ' शब्द के निर्वचनात्मक समन्वय-का संस्मरण ४२४ - अनल, और श्रनिल - सहयोगानुगता शब्दोत्पत्ति ४२५ - महर्षि शाकायनि, ४२६ - शब्द के प्रति श्रग्नि को ही उपादान-मयत्व - संसाधन ,, 19 17 31 " 33 " 3 ,, 11 23 " १२१८ 21 और वायु का अग्नि-" 21 कारणत्व १२१७ ४२७- शब्द के प्रति बायु को निमित्तकारणता " १३४
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ४२८- शब्दोपादानभूत अनल का भौतिक, एवं प्राणात्मक रूप ४२६ - प्राणानल का भूतानलप्रतिष्ठाव ४३० - श्रमृताग्निरूप ' प्राण ' ४३१- नकार- दकार - का साङ्केतिक समन्वय ४३: - श्रव्यक्त- प्राणाग्नि, और ' न ' कार ४३३ - व्यक्त - भूताग्नि, और ' द ' कार ४३४ - ' नाद ' शब्द का पारिभाषिक समन्वय ४३५ - नकार दकार की समन्वितावस्थारूप-वैश्वानराग्नि का तात्त्विक - समन्वय ४३६ - नाद के पञ्चभावानुगत पञ्चस्थानानुगत-पञ्चविध - महिमा - विवर्त्त ' ४३७- नादात्मक - वैश्वानराग्नि ४३८- हृत्प्रक्रम - कण्ठप्रक्रम- शिरः प्रक्रम - भेद से नादात्मक वैश्वानर के तीन सामान्य प्रक्रम ४३६ - नादप्रक्रमों की तारादि व्यवस्था ४४० - नाद - श्र ति - स्वरात्मक सङ्गीत के मर्मज्ञ शाङ्ख देव - महाभाग १२१८ " " " " " 23 " " " " " " " " " १२१६ ४४१ - स्वर - राग - प्रकीर्ण- प्रबन्ध - ताल- वाद्य नृत्यादि अध्याय- समन्वित - सङ्गीतशास्त्र ४४२ - सङ्गीतवचनों के साथ पाणिनीय-शिक्षावचनों का अद्भुत - साम्य ४३ - नादात्मक वैश्वानर - श्रग्नि की त्रिविध-स्वरों के रूप में अभिव्यक्ति ४४४ - वायु का सहयोग, और वैश्वानर की स्वररूप में परिणति ४४५ - श्राधिदैविक- वैश्वानर का तात्त्विक-स्वरूप - समन्वय ४४६ - पार्थिवयज्ञ का त्रिवृद्भावापन्न प्रात-सवन, और अष्टाक्षर - गायत्री छन्द ४४७- प्रातःसवनीय पार्थिव गायत्राग्नि, और मन्द्रस्वर ४४८- पञ्चदशभावापन्न माध्यन्दिन सवन, और एकादशाक्षर त्रिष्टुप्छन्द " " १२२० ४४६ - माध्यन्दिनसवनीय आन्तरिक्ष्य त्रैष्टुभ-वायु और मध्यस्वर ४५० - एकविंशभावापन्न - सायंसवन, और द्वाद-शाक्षर जगतीछन्द ४५१ - सायं सवनीय - दिव्य - नागत - श्रादित्य, और तारस्वर ४५२ – अधिदैवत का यथानुरूप प्रतिरूप - मान-बीय अध्यात्म ४५३ - पृथिवीलोक, और आग्नेय - प्राण ४५४ - अन्तरिक्ष लोक, और वायव्यप्राण ४५५- दिव्यलोक, और ऐन्द्रप्राव ४५६- श्रधिदैवतरूप अण्ड से अनुगत वैश्वानर ४५७ - अध्यात्मरूप पिण्ड से, अनुगत वैश्वानर " ४५८- इति नु - अधिदैवतम् और वैश्वानर 93 ४५६ - इति नु श्रध्यात्मम्, और वैश्वानर ४६० - छन्दोभेदानुगता सवनत्रयी, और नादमेद " " ४६१ - त्रिप्रक्रमात्मक नाद के नाड़ी - भेद - निब-न्धन २२ अवान्तर विवर्त्त " ४६२ - नाद के अवान्तर विवर्त्ता ', र ' श्रुति ' भाव ४६३ - सुषुम्णा नाड़ी का संस्मरण ४६४ - हृदयानुगत - मन्द्रनाद से अनुप्राणिता २२ मन्द्रश्रतियाँ ४६५ – कण्ठानुगत - मध्यनाद से अनुप्राणिता २२ मध्यश्रुतियाँ ४६६ - शिरोऽनुगत - तारनाद से अनुप्राणिता २२ तारश्रुतियाँ ४६७ - श्रुतियों का तालिका के द्वारा संकलन ४६ = - वैश्वानराग्नि का धोधूयमान ध्वन्या-त्मक शब्द, और नाद ४६६ - नादध्वनि की श्रवणगोचरा अभिव्यक्तियाँ १२२० " " " १२२१ 17 11 " १२२२ " १२२३ ४७० - क्रमप्राप्त - स्वरभाव का संस्मरण " ४७१ - सङ्गीतानुगत सहज माधुर्य, और ' स्वरतत्त्व ' ४७२- मधु रम्नात्मक सूर्य्य " " १३५
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४७३ - ( आदित्यो नै देवमधु ) ४७४- पृथिवीलोक का दधिलोकत्व ४७५ - अन्तरिक्ष लोक का घृतरूपत्त्व ४७६ यु लोक का मधुरूपत्व ४७७ - पार्थिव अग्नि, और दधिभाग ४७८ प्रान्त बावु, और घृतभाग ४७ ९ - दिव्य आदित्य और मधुभाग ४८० दधि हैवास्य लोकस्य रूपम् ४८१ - वृतमन्तरिक्षस्य ( रूपम् ) ४८२ - मध्वमुष्य ( रूपम् ) ४८२ - श्राग्नेय - दधिरसात्मक - पार्थिव - - नादब्रह्म न ४६४ - वायव्य - मृतरसात्मक आन्तरितितस्व ४८५ - ऐन्द्र- मधुरसात्मक - दिव्य स्त्ररतत्त्व ४८६ प से अभिन्न शब्द के स्फोट-स्वर -04 ञ्जन - नामक तीन महिमा-विवचों का संस्मरगा ४८७- परब्रह्मानुगत अध्यय ४८८ - शब्दब्रह्मानुगत स्फोट ४८ ९ - परब्रह्मानुगत श्रक्षर ४६० - शब्द ब्रह्मानुगत क्षर ४६१- परब्रह्मानुगत क्षर विषयसूची १२२३ ५०१ - शब्दतन्मात्रात्मक श्राकाशभूत की " } बलग्रन्थि के द्वारा वायुरूप में परिणति १२२४ १२२४५०२ - स्पर्शतन्मात्रानुगत वायु " " " " " 29 39 19 " " 19 ४०२ वायु से रूपतन्मात्रात्मक तेज की अभिव्यक्ति ५०४- तेज से रसतन्मात्रात्मक जल की अभि-व्यक्ति ५०५ - जल से गन्धतन्मात्रात्मक मृद्भाग की अभिव्यक्ति ५०६ तन्मात्रात्मक शब्दादि गन्धान्त सूक्ष्म तत्व एवं तत्पञ्चीकरणा से अनुभूर्ती की अभिव्यक्ति ५०७ - श्रणुभूतों के पञ्चीकरण से रेणुभूत की अभिव्यक्ति ५०८ - रेणुभूतों के पञ्चीकरण से महाभूतों की अभिव्यक्ति ५०६ - महाभूतात्मक आकाशात्मा स्वयम्भू - पुर " ५१०-वाय्वात्मा परमेष्ठी - पुर " ५११-तेजोमय सूर्यपुर ५१२-आपोमय चन्द्रपुर ५१३-४६२- शब्दझानुगत व्यञ्जन 39 ५१४- पञ्च पञ्चात्मिका ४६३ - पोडशीघ्रजापति का पूर्वरूप, और ५१५- पञ्चपर्वाचीमः 23 १२२५ 19 " " " " 93 विश्वातीत दिवस ' ४६४ - प्रजापति का उत्तररूप और विश्वविव ४ ९ ५ विश्वातीसावस्था, और परखावियत्त ' ४६६ - विश्वावम्था, और शब्दब्रह्म विवर्त्त ४६७ वस्तुत्व का तात्पर्यार्थ समन्वय ४६८ श्राकारा वायु - तेज - जल मृद् भावा-त्मिका - पञ्चमहाभूतान्विता सृष्टि और विश्वावस्था ४६६ - सर्वादिमूल भूतात्मक श्राकाशभूत ५०० - श्राकाशभूताधिष्ठात्री सर्वभूताधिष्ठात्री-शब्दमात्रा और भौतिक विश्व " मृणमय- भूपुर पञ्चपर्वा विश्वप्रकृतिः ५१६ विश्वमूलकारण भूता - सर्वादिलक्षणा श्राकाशात्मिका - ( गुणभूतानुगता ) शब्द-तन्मात्रा ५१७ - प्रथमा शब्दतन्मात्रा के पञ्चीकरण से ही अन्ततः विश्वरूपोद्भव ५१८ - विश्व की शब्दब्रह्मरूपता का समन्वय ५१ ९ शब्दमिवास्ति ५२० - शब्द, और अर्थ का औत्पत्तिक-सम्बन्ध ५२१ ' पासिद्धिः ' का रहस्यात्मक समन्वय ५२२ - स भूरिति व्याहरत् पृथिव्यभवत् इत्यादि बचन का तात्त्विक समन्वय १३६ " 37 " 0 "
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ५.२३ - शब्दब्रह्मरूपा ईश्वराभिव्यक्ति ५.२४ - विश्वातीत परब्रह्म के संस्थानक्रम से सर्वात्मना समतुलित विश्वात्मक शब्द-ब्रह्म का संस्मरण ५२५- परात्पर व्यय - अक्षर - क्षर रूप विश्वा-तीत परब्रह्मविव ५२६ - द्ध मात्रा स्फोट - स्वर - व्यञ्जन रूप विश्वात्मक शब्दब्रह्म ५.२७ - " शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परंब्रह्माधि-गच्छति ५२८ - दृष्टिमूला -सृष्टिविद्या का संस्मरण ५२६-- भूपिण्ड, और व्यञ्जनात्मक शब्द-ब्रह्म ५३० --सूर्य्य, और स्वरात्मक शब्दत्रह्म 93 ५३१ - परमेष्ठी, और स्फोटात्मक शब्दब्रह्म 19 ५३२ – स्वयम्भू, और अर्द्ध मात्रात्मक " शब्दब्रह्म ५३३ - शब्दब्रह्मात्मकं विश्वम् ५३४ - नादानुबन्ध से शब्दब्रह्म की स्वरूपो-पासना का उपराम ५३५ - श्रुति से अभिव्यक्त - स्वर का सीता-नुगत मौलिक - माधु ३३६ - भूः श्रन्तरिक्ष - सूर्य्य- त्रयी के अनुबन्ध से स्वर के माधुर्य का समन्वय - प्रयास ५.३७ – केन्द्रस्थ - प्राजापत्य वैश्वानराग्नि की नादब्रह्मरूपता ५३८८ - नादब्रह्म की अन्तरिक्षानुगता वायव्या-वस्था, और श्रति ५३६ - श्रुति की द्युलोकानुगता आदित्यावस्था, और स्वर ५४० - घनावस्थापन्न - नादतस्व ५४१ - तरलावस्थापन्न स्वरतत्त्व ५४२ - विरलवस्थापन - स्वरतव ५४३- भूपिण्ड -- श्रग्नि - दधि- धनभाव, नादतत्व और २२५ ५४४ - अन्तरिक्ष- त्रायु- घृत - तरल भाव, और श्रुतितत्त्व १२२६ 71 " १२२६ ?? ५.४५ -द्य लोक.-- सूय्यं -- मधु - विरल भाव, और स्वरतत्व ५४६ - सूर्य्यानुगत ' मधु ' तत्त्व, और तद--भिन्न स्वर का माधुर्य ५४७ - ' श्र श्रा - इ - ई - उ - ऊ ' आदि सुप्रसिद्ध-स्वर, एवं ' क - ल - ग - घ - श्रादि सुपरि-सिद्ध व्यञ्जन ५४८ - अकारादि सम्पूर्ण स्वरों की सूर्य्य से अभिव्यक्ति ५४६- ककारादि सम्पूर्ण व्यञ्चनों की भूपिण्ड से उत्पत्ति ५५० - मौर- स्वर -विवर्त्त " 21 37 03 22 ५५.१ - पार्थिव व्यञ्जन - विवर्त्त ' ५.५२ - व्यञ्जनवाक् की अनुष्टुत्र रूपता ५५३ -स्वरवाक की बृहती - रूपता ५५४ - अग्निगर्भा भूपिण्डात्मिका पृथिवी ५५५ - इन्द्रगर्भिणी सूर्य्यात्मिका द्यौः " ५५६ - उभयानुगत ग्रहोपग्रहभाव 97 31 , I ५५७ - भूविएड का साम्वत्सरिक क्रान्तिच पर परिभ्रमण, और वार्षिकगति ५५८ - पृथिवी का श्राधारभूत सूर्य्य ५५६ - सप्त - पूर्वापरवृत्तात्मक अहोरात्रवृत ५६० - श्रहोरात्र वृत्तात्मक सप्तदेवच्छन्द ५६१- मध्यस्थछन्द की सर्वाधिका बृहत्ता, और तद्रूप ' बृहतीछन्द ' " 17 " 1 II 19 " " " " 6 १२२७ 13 ५.६२ - बृहती, विष्वद्, विषुव और श्रान का- ' इक्वेटर ' ५६३ - बृहती से अनुप्राणित बृहत्साम ५६४- बृहत्सामात्मक- बृहतीछन्द के केन्द्र में स्थिररूप से प्रतिष्ठित सूर्य्य ५.६५ – बृहत्, और बृहद् भाव ५६६ - बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः १२२८ " " " 71 १३७
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५६७ प्त वै देवच्छन्दांसि ५०६ देवछन्दों का प्रदरसख्यानुगत परिमाण ५६६- दिव्य - मधु रसमय वातप्राण ५०० बात स्वतत्व ५७१ नवार बृहती छन्द, और स्वरतत्त्व ५७२ - नवबिन्दुनों में वितायमान स्वरतत्त्व ५७३ - उक्थात्मक स्वरचिम्ब ५७४ - अर्काका स्वरश्मियाँ ५७५- मझौदनात्मक केन्द्रस्थ - स्वर ५७६ - प्रवर्ग्यात्मक परिधिस्थ स्वर ५७७ - नव बिन्दुनों के केन्द्र का बिन्दुद्वय, और स्वरप्रतिष्ठान ५७८ सप्तचिन्दु समूह, और सप्त - व्यञ्जन-संस्थान ५७६ - सप्त व्यञ्जन, और तत्प्रतिष्ठारूप एक स्वर ५८० - भूः भुवः स्वः जनत् सत्यम् रूप व्यञ्जनस्थानीय सातलोक, एवं सप्तम्य-अनात्मक विश्व की मूल प्रतिष्ठारूप अक्षरात्मक एक - स्वरब्रह्म ५८१ - प्रातिशाख्य का ' रूयर्कट ' उदाहरण, और एक स्वरानुगत सात - व्यञ्जन ५८२ - सैघा स्वरस्य सन्तनानुगता - सहजस्थितिः ५८३ - वितानात्मक सन्तननधर्म और स्वर ५८४ एक विन्द्वात्मक व्यञ्जनों में बिताना-त्मक ' सम्प्रसारण ' का अत्यन्ताभाव ५८५ - जायस्व म्रियस्व - धर्म्मा- व्यञ्जन ५८६ ५८६ - क्षरात्मक मक भूत किंवा भूतात्मक दर सर्वाभिनि ५८८- स्वर का अक्षरव ५८६ - ' न दीयते ' रूप अमृत धर्म, और स्वर ५६० - अक्षयभावापन्न- स्वर विषयसूची १२२८ " " " " १२२६ " " 21 " १३८ ५११ - व्यञ्जनाधारभूत स्वर के माधुर्य से ( स्वर सन्धानात्मक अनुग्रहकाल में ) मानों का भी माधुर्य ५६२ अक्षराभिन्न- अमृतस्वर की सन्तनन-शक्ति ४६३ - स्वर का सम्ननात्मक स्थायी संस्कार, और तत्प्रान्तरूपा च ५६.४ कु टयाणी की काल्यालीकृतान्बय से कृमिकीटादि का इरा ५६.५- भक्षणरूप - चर्व्वण, और चर्व्वणा ५६६ - इन्द्र राणात्मक स्वर की सन्तनन - रूपा और उसका चर्व्वणव्यापार चञ्च, श्रौर ५६७- महत्त्वपूर्ण चुं मारा ' शब्द ५६८- " अनुष्ट ुभमनुच चूर्य्यमाणमिन्द्र - निचि-स्युः कवयो मनीषा " ५६.६ - मर्त्यक्षात्मक - व्यञ्जन, और तद्रूपा आग्नेयी अनुष्टुपू - वाक् ६०० - अमृत - अक्षरात्मक - स्वर, और तद्रूपा ऐन्द्री बृहतीवाक ६०१ - बृहतीवाक - पति इन्द्र के द्वारा अनुष्ट प-रूपा व्यञ्जनवाक् का चर्व्वण, और ऋङ मन्त्रार्थ - समन्वय ६०२ मत्यभूतों के माध्यम से अमृत सम्पत्ति का संग्रह ६०३ लौकिक उदाहरण के माध्यम से प अनाधारभूत स्वर की मधुरसानुगता मधुरिमा का समन्वय प्रयास ६०४ प्पनभोग छत्तीस व्यञ्जन ' नामक आभाणक का प्रासङ्गिक - संस्मरण ६०५ - भोज्य- चर्व्वं चोष्य- लेह्य - भेद भिन्न सुस्वादु पदार्थ ६०६ - स्वादु - और अस्वादु भावों का तुलना-त्मक समन्वय ६०७ - समीकरण, और स्वादु भाव १२३० १२३१ II
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६०८ विषमता, और पश्वादु - भाव -शतपथब्राह्मण २ खण्ड ६: ६ - भोज्यादि व्यञ्जनों का अमृतात्मक स्वर-भाग, एवं तन्निबन्धन स्वादुरस ६१०- मधुशून्य व्यञ्जनों का यातयामत्व ६११ - तर - वादुज्यान ६१२ - यो वै शिवतमी रसः, और स्वर ९ १३ - सौर - बाई - इन्द्रप्राणात्मक मधु की घट्-त्रिंशत्- बृहती ( ३६०००० ) संख्याओं में परिणति ६१४- अहोरात्रपरिचनात्मक राई - मधु प्राण, श्रौर मानव का शतायुर्जीवन ६१५- बृहतीछन्द के २६ अर ६१६ - प्रत्येक अक्षर की सहस्रभाव में परिणति, और दत्तीसहजार अहोरात्रात्मक शता युगकाल ६१७ - सायं प्रातः का अन्नयज्ञात्मक भोब यज्ञ, और सौर मधु रसकी तत्र भ्याप्ति १८- श्रवण - दर्शन - गमन - हसन शयन आदि यच्चयावत् भावों में मधुरूप स्वरतत्त्व का साक्षात्कार ६१ ९ जीवन में मधु रसानुभूति का अमाव और श्रायुःप्रवर्तक- विश्वामित्रप्राण-६२० स यत्करणीयं मन्येत- कुर्य्यात् ६२१ - कदन का सुप्रसिद्ध श्रप्रीति करव, एवं कर्याकटुव ६२१ - कनक का भी मधु रसात्मक स्वर से समन्वय ६२२ - ' कलावन्त का तो रोना भी गाना है ' इत्यादि किंवदन्ती का समन्वय ६२३- ' सम् ' भाषात्मक ( एकीभावात्मक ) समीकरण से सम्पन्न - ' सङ्गीत ' तत्त्व ६२४- मधुर स्वर- रसात्मक रोदन ६२५ - स्वरानुगत माधुर्य रोदनकर्म का मुहम-१२३१ 19 " 21 93 " " " १२३२ ६२६- ' रुरुदुः सुस्वरम् ' ( भागवत ) १२ २० लोकयानुगतयच्चयावत् - पदार्थों में, कम्मैकलापों में, शारीरिक - ऐन्द्रियक चेष्टा में सर्वत्र स्वरसामात्मक सौर-मधु - रस की प्रतिष्ठारूपेण व्याप्ति का समन्वय ६२८ - स्वरानुग्रह से ही व्यञ्जनों की स्वरूप-सत्ता का संरक्षगा ६२६- स्वरात्मक - सीर - सङ्गीत का व्यञ्जनात्मक विश्व की जीवनसत्ता के लिए अनि-वाय्र्यस्य ६३० - प्रकृतिसिद्ध स्वरात्मक महासङ्गीत का पावन संस्मरण ६२१ सतवत प्राणात्मक तुम्बुरु - नार-दादि ऋषियों के स्वरूप के द्रष्टा एत शामक मानव - महर्षियों के द्वारा दिव्य भावापन नाद - श्रति - स्वरात्मक लोक-सङ्गीत का वितान ६३२ - मधुरिमा का प्रमुख प्रवर्तक- नन्द प्रद श्रालापात्मक स्वरतत्त्व का यशो-वर्णनम ६३२ - पम - गान्धारादि लोकसङ्गीता-नुगत स्वरों का संस्मरण ३४- अक्षयत्मक स्वरसामी से अनुप्राणित स्वरतत्त्व ६३५ – स्वर, स्व: -और स्वर्गसुख ६३६ - श्रालापधर्म की अनुगत, और स्वर-सन्धान २७- ' अनुरणन ', श्रीर पारिभाषिक श्रालाप ६१८ - सङ्गीत - श्रवण नन्दानुगत मनोनिमज्जन-रूप- कम्पन, और अनुरणनात्मक-श्रालाप ६३६ - ' अनुरगान ' का वर्तमान लौकिकरूप-' समा बैंच जाना ' ६४० - एकीभावात्मक सङ्गीत का ' सम ' भाव
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विषयसूची ६४१ - स्वरात्मक स्वर की परब्रह्माक्षर से अ ६४२ सङ्गीत के हृदयानुगत नादब्रदा से समुत्थित २२ श्रुतियाँ ६४३ - श्रुति के द्वारा कण्ठद्वार से सप्तधा विभक्त एवं विनिर्गत ' स्वर ' भाव ६४४ सङ्गीताचार्य के व्यञ्जनात्मक वर्ण ( बोल ) ६४५ - आलाप संलाप - यदि धों से सम न्वित स्वरसन्धान की सङ्गीतज्ञ के लिए एवं श्रोतृवर्ग के लिए आनन्दरूपता ६४६ - श्राज का भूतप्रधान व्यञ्जनप्रधान - जड़-जीवन ६४७ जड़ीभूत मनस्तत्र के सा सुखावह काखधनभूत लोकसङ्गीत ६४८ - स्वरसन्धानात्मक - वास्तविक सङ्गीत के आनन्द से असं आज के विजति मन ६४ ९ - जड़ता के भीतिक अनुबन्धों को, तदनुप्राणित काल्वालीकृत नर्तन गाय-नादिरूप उद्दामवासनात्मक दीनतम उगकर विजृम्भणों को सीतोपाधि-प्रदान और भारतीय - मूल - सस्यों का उपहास ६५० प्रकान्त स्वरप्रसन से धनुप्राणित निष्कर्ष ६५१– ' स्वत एत्र रञ्जयति श्रोतृवर्गचित्तम् ' रूप स्वरतत्व ६५२ स्वयं हि राजते यस्मात् तस्मात्- ' स्वर ' इति स्मृतः ६५३ गीत को सङ्गीत - मान ६५४ सङ्गीतको स्वर मान ६५५ - स्वर को अक्षर - मान ६५६ ( क ) – दिनमान सूरब, रैन मान चन्दा ६५६ ( ख ) - प्रथममान श्रोङ्कार १२३३६५६ ( २ ) सङ्गीतशास्त्रानुगता स्वरमहिमा का यशोवर्णन " 31 " 1 97 ६५७ - उर: - स्थान, और मन्द्रनाद ६३८ - कण्ठ- स्थान, और १२३३ १२३४ " " मध्यनाद 37 ६५६ शिर स्थान और तारनाद ६६० मन्द्रनाद, और मन्दश्रुति ६६१ - मध्यनाद, और मध्यम ति ६६२ - तारनाद, और सार ति ६६३ - त्रिनृत् पृथिवी अग्नि - गायत्री- प्रात: -सवन, और मन्द्रस्वरमहिमा ६६४- पञ्चदश अन्तरिक्ष वायु - त्रिष्टुप् माच्य न्दिन सवन, और मध्यस्वरमा ६६५ एकविंश - यू लोक आदित्य जगती-सांयसवन और तारस्वरम हिमा ६६६ - त्रिः स्थानभेद से तीन प्रमुख भागों में विभक्त सप्तस्वरों की शुद्धस्वररूपता का समन्वय ६६७- भुतियों का तारतम्य और स्वरों के सांयोगिक अवान्तर द्वादशविध - महिमा विवर्त्त ६६८ - यौगिक स्वरात्मक विकृतस्वरों का संस्मरण ६६६ द्वादशविध विकृतस्वरों की तालिका 97 17 १२३५ * अन्यदपि किञ्चित् प्रासङ्गिक स्वरसम्बन्धे एवं ६७० परब्रह्मानुगत अर्थों का ' आम्भृणीकुल ' ६७१ - आम्भृणीकुल।नुगत वर्ण -- जाति - छन्द-ऋषि देवता आदि की व्यवस्थाएँ ६७२- शब्दानुगत सारस्वतकुल, एवं तदनु-गता व्यवस्थाएँ ६७३ – स्वरों के वर्ण, जातियाँ, छन्द, ऋषि, देवता, आदि का नाम संस्मरण 79 १२३६ १२३७ 37 III
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ६७४ - शृङ्गार - वीर - करुणा श्रादि रसों से अनु-प्राणित सप्त स्वर ६७५ – काकल्यन्तर - स्वर का संस्मरण १२३७ " } ६७६ - स्वर वर्णादि भावों के संग्राहक श्लोक १२३८ ६७७ - तालिका के माध्यम से श्वर के ऋषि-देव - छन्द - कुल - वण - जाति - वर्ण - रसभाव-अभिव्यक्ति भूमि श्रादि महिमा - भावों का स्पष्टीकरण ६७८ - व्यञ्जन के आधारभूत स्वरतत्त्व के सप्तविध - महिमा - भावों के तात्त्विक-कारण का अन्वेषण प्रयास ६७६ - स्वर, और अक्षर की अभिन्नता ६८० - अव्यय, और तत्साङ्केतिक नाम ' मन ' ६८१ - अक्षर, और तत्साङ्केतिक नाम - ' प्राण ' ६८२ - दर, और तत्साङ्केतिक नाम ' वाक ' ६८३ - षोडशीपुरुषात्मक पुरुषरूप परब्रह्म ६८४ - श्रालम्बनात्मक अधिष्ठान कारण ६८५ - निमित्तकारणात्मक समवायिकारण ६८६ - उपादानकारणात्मक - समवायिकारण ६८७- शब्दात्मक - पाञ्चभौतिक- पञ्चपर्वा विश्व की, तथा पञ्चात्मिका विश्वप्रजा की अभिव्यक्ति ६८८ - सैषा स्थितिः ६८६ - अक्षर का सर्वप्रवत्त कत्त्व - समन्वय ६६० - ऋषिशब्द का तात्त्विक निर्वचन ६६१ - सृष्टिमूल भूत - अक्षररूप स्वर - प्राणात्मक-निमित्तकारण की सप्तर्षि - रूपता का पारिभाषिक- समन्वय ६६२ - सप्तर्षि - रूप स्वरात्मक - प्राण के सात संस्थान ६६३ - सप्तावयव चित्यपुरुष ६६४ - सन्तमूर्ति - श्रीरूप- चितेनिधेय - पुरुष ६६५ - सप्तपुरुष का तालिका के माध्यम से दिग्दर्शन १२३६ १२४० " " 77 " " १२४१ " | ६६६ - चित्य, और चितेनिधेय - पुरुषों का सम-न्वय ६६७ -- सन्तानां पुरुषाणां श्रीः ६६ - सप्तप्राणात्मरूप प्रजापति, और छन्द ६६६ - छन्द के अनुपात से छन्दित वस्तु का सन्निवेश ७०० - ' विश्व ' नाम का उदय ७०१ - लोकप्रसिद्ध ' सञ्चा ' किंवा ' साँचा ' ( ढाँचा ), और छन्द: पुरुष ७०२ - अक्षरात्मक स्वर का मूलाधारत्त्व ७०३ - मानवोदाहरण से वस्तुतत्त्व का सम-न्वय ७०४ - मानव का धड़, और मध्याङ्ग ७०५ - मध्याङ्ग में चार प्राणों का प्रतिष्ठापन ७०६ - विभागचतुष्टयी, और चत्वार श्रात्मा ७०७ - मानव के दक्षिण - वाम- हस्त पादरूप -दक्षिणोत्तर पक्ष ७०८ - शिरोभाग से उपक्रान्त, ब्रह्मग्रन्थि पर उपसंहृत लम्ब यष्टिवत् वितत सुप्रसिद्ध मेरुदण्ड ( रीड की हड्डी ) के अन्त में प्रतिष्ठित त्रिकास्थिगत प्रतिष्ठाप्राण रूपा पुच्छ प्रतिष्ठा ७०६ - मेरु का तनन, और शरीरयष्टि की ऋजुता ७१० ( क ) - अधिक श्रमानुगता, किंवा वाद्ध-क्यानुगता शरीरयष्टि, और पुच्छ-प्रतिष्ठाप्राण का शैथिल्य ७१० ( ख ) - पुच्छप्राण के शैथिल्य से शरीर यष्टि की वक्रभाव में परिणति ७११ - सप्त - चित्व - भागों का सार भागात्मक श्रीः- तत्त्व, और उसका ' शिरस्त्व ७१२ - मानव - प्रसङ्गतः पशुशरीरानुगत सप्त-पुरुष - पुरुषात्मक चित्यभाव का संस्मरण १२४१ 29 91 १२४२ 22 " " 27 " 2 " 1 १४१
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७१३ - सप्त - चित्यक्रम की चर चर चड़-चेतन - भावनिबन्धन यच्चयावत् पदार्थों में समष्टिव्यष्टयात्मिक व्याप्ति ७१४ - चर - अचर पार्थिव भूतसर्ग के सक सम्वत्सर - प्रजापति के महासुपर्णात्मक सप्तावयव - स्वरूप का संस्मरण विषयसूची ७३६-" देश ( २३ ) १२४४ ७४०-प्रसिद्ध पर्वत ( २४ ) 99 १२४२ २४१-धान्य ( २५ ) १२४६ २४२-राज्यान ( २६ ) २४३-" वार ( २७ ) 13 २४४-मर ( २८ ) ७१४- त्रिपुरुष पुरुषात्मक शोशी प्रजापति-७४५-" विश्वात्मा के विश्वभावकी सर्वव्याप्ति ७४६-का संस्मरण १२४२ ७४७-७१६ - सप्त - पुरुष - पुरुषात्मक विश्वप्रजापति ७४८-देवच्छन्द ( २६ ) ज्योतिष्टोम ( ३० ) ऊर्ध्वप्रजातन्तु ( ३१ ) अभःप्रजातन्तु ( ३३ ) " " 99 के समष्टि - व्यति भावनिबन्धनक ७४६ - सप्त - सङ्गीत - स्वर की सर्वव्याप्ति का संस्मरण ७१७ सप्त आध्यात्मिक - इन्द्रियाण ( १ ) ७५० -- सप्त - स्वरोच्चारण " ( RE ) 19 ( ३४ ) " ७५१ - सप्त - महिमाभावों का विस्तारात्मक समन्वय ७५२ - सप्तपुरुष -सात ऋषि - सप्त अहोरात्रवृत्त-- सत्तचक्र- सप्त-सप्तकपाल- सप्तकर्ण होता - सप्ततन्तु सप्त श्रदितिपुत्र- सप्त-मरुद्गण सप्त संस्करण ६७५३ -- सप्तगण, · आदि सप्तकों का और सप्ततथ्यः ७६४ - सतनामा और सप्त निधन ७५५ - सप्तपद, और सप्तपुत्र ७५६ - सप्तचितिक प्रजापति ७५७ - महिमामय विस्तार ७५८-- सप्तक - संस्मरण ७५६ - अगणित सप्तकभाव ७६० - वेदस्वाध्यायानुगति ७६१ सप्तमुख्य और सप्तरश्मि ७६२ - सप्तरात्र और सत ७६३- सप्तवर्षा और सप्तस्व ७६४ - सप्तदूत और सप्ताह ७६५ स्वर की सप्तनाव परिणति का तात्विक समन्वय ७६६ - सप्तधातु और सप्त - उपचा ७१८-श्रर्चिर्भाव ( २ ) ,, 11 ७१६-होम ( ३ ) 11 ७२०-लोक ( ४ ) 99 ७२१-अग्निमिद्धा ( ५ ) 99 ७२२-अग्नि ( ६ ) " ७२३-अप्सरा ( ७ ) " ७२४-आवरण ( ८ ) ७२५-कली ऊर्ध्वलोक ( ६ ) १२४४ " ७२६-अधीनोक ( १० ) " ७२७– ( ११ ) 71 39 ७२८-( १२ ) " ७२६-पितर ( १२ ) " 37 ७३०-देवपुरी ( १४ ) 11 ७३१-सप्तद्वीप ( १५ ) 37 ७३२-सप्तमुद्र ( 14 ) 77 | ७३३-सप्त - वायु ( १७ ) 99 | ७३४-पाताल ( १८ ) ७३५-नरक ( १६ ) ७३६-स्वर्ग ( २० ) 91 ७३७-पर्वत ( २१ ) 17 " ७३८-नदी ( २२ ) II 17 99 19 " 39 23 " " 11 17 १०४६ 39 19 19 31