Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 271–280

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 271–280

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७६७ - सन्तरस, और सप्त उपरस ७६८ - सप्तविष, और सप्त उपविष ७६६ - सप्तक- भाव-- परिणति के सम्बन्ध में प्रमाणभूत श्रुति- सन्दर्भ शतपचत्राह्मण २ खण्ड ७७० - मानव का सप्तचितिक प्राणाग्नि ७७१ - मरुद्वायु का संयोग, और प्राणाग्नि की स्वरात्मिका ध्वनि के रूप में परिणति ७७२ - बहिर्म्मण्डल में व्याप्त सुसूक्ष्म - वाक्-तत्त्व का समुद्र ७७३ - कर्णशष्कुलियों पर प्रतिष्ठित मन पर तरङ्गभावापन्ना ध्वनि का श्राघात, और स्वरों की अभिव्यक्ति ७७४- नादात्मक - श्रुतिसमन्वित -- स्वरभावापन चितेनिधेयाग्नियुक्त चित्याग्नि की सुप्ता-वस्था, और जाग्रदवस्था ७७५- सुप्तावस्थापन्न चित्याग्नि, और रात्रिकाल 17 ७७६ - जाग्रदवस्थापन्न चित्याग्नि, और ग्रहः काल ७७७ - अहःकालात्मक - सूय्यंसत्तानुगत काल ७७८ - सूर्य्यं सत्ताकाल, और गायत्री- त्रिष्टुप् जगती ७७६ - गायत्री, और होराचतुष्टयात्मक प्रात: काल ७८० - त्रिष्टुप, और मध्याह्न ७८१ - नगती, और सायङ्काल-७८२ - प्रातः, और मन्द्रस्वर ७८३ - मध्याह, और मध्यस्वर ७८४ - सायं, और तारस्वर ७८५ – प्रातः - मन्द्र, और उरः स्थानानुगति ७८६ - मध्याह्न - मध्य, और कटस्थानानुर्गात ७८७ - सायं - तार, और शिरःस्थानानुगति ७८८ - स्वरोच्चरण के कालानुबन्धी- वैज्ञानिक-नियमों का संस्मरण १२४६ | ७६३ - देवाननुविधा वै मनुष्याः 23 १२४७ ७६४ - रात्रि का सुप्त, अतएव विश्रान्त अग्नि १२४८ ७६४ - प्रातः तारस्वरोच्चारण से सम्भावित उरःक्षत " ७६६ - त्रिः - सत्रनानुगता स्वर मर्यादा " १२४७७६७ - मर्य्यादानुगत 21 ७८६ - सिंह - शार्दूलादि का उच्चारण, और मन्द्रस्वर " ७६० ~ चक्रवाकादि का उच्चारण, और मध्यस्वर ७६१ - हंस - मयूरादि का उच्चारण, और तारस्वर 31 ७६२ - प्रकृतिवद् बिकृति कर्त्तव्या " " " " " यथासमय यथास्थान-स्वरोच्चारण, और स्वरमाधुर्य्य ७ ९ ८ - शब्दोच्चारण से समतुलिता कर्म्म - प्रवृत्ति, और नियमानुगमनात्मक भयःपन्था ७६६ - अल्पारम्भ का क्षेमकरव ८००- उपक्रमानुगत मन्द्रस्वर ८०१ - नैष्ठिक मानव का स्वल्पारम्भ, और कासमाप्त ८०२ भावुक मानव का महारम्भ, और कार्य्य की पूर्णता ८०३ - उपक्रमस्थान, और नादात्मक स्वर ८०४ - मध्यस्थान, और श्रुत्यात्मक स्वर ८०५ - अन्तःस्थान, और स्वरात्मक स्वर ८०६ - उरः स्थानानानुगता नादप्रधाना ध्वनि, और ' हिङ्कार ' ८०७ - कष्टस्थानानुगता श्रुतिप्रधाना ध्वनि, और ' प्रस्ताव ' ८०८ - शिरःस्थानुगता स्वरप्रधाना ध्वनि, और ' उद्गीथ ' ८०६ - उद्गीथात्मक - स्वरभाव, और लोक-भाषानुगत सङ्गीतानुगत- ' टीप ' ८१० - पाणिनीयशिक्षा का संस्मरण, और स्वरो-चरणादि निबन्धना मर्यादाओं का समन्वयात्मकोपराम ८११ - नाद श्रति स्वर भावों की सङ्गीतानुगता-उच्चारणादि व्यवस्थाओं का समन्वयो-पराम ८१२ - विश्वोत्पत्ति, और शब्दतन्मात्रा ८१३ - शब्दतन्मात्रा मूला पञ्चतन्मात्रा का नाम स्मरण १२४६ 33 19 " " 19 " १४३ " "

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विषयसूची ८१४ - शब्दतन्मात्रात्मक रहस्यपूर्ण तत्त्व, और अपौर-तद्रूप - क् - यजुः - साम - नामक पेय - तत्वात्मक वेद ८१५ - पिण्डभावानुगत - ऋग्वेद ८१६ - गतिभावानुगत - यजुर्वेद १२४६ " 99 ८१७ -- मण्डल भावानुगत सामवेद " ८१८ - पिण्डका धामच्छदत्त्व - समन्वय ८१६ - पिण्डानुगत सुप्रसिद्ध षड्भावविकार ८२० -- परिवर्तनात्मक विकारभाव, और तन्नि-बन्धन गतितत्व ८२१ - रश्मिमण्डलात्मक - मण्डल मात्र ८२२ -- मण्डलात्मक दृश्यजगत् ८२३ - पिण्डात्मक - स्पृश्यजगत् ८२४- ऋक - यजुः साम - का मौलिक स्वरूप, और भगवान् तित्तिरि " " ८३४- प्राभ- मूर्च्छना - नाति -- क्रम - तान - आरोह-अवरोह - वादी - संवादी - नाद - श्रुति स्वर-आदि विभिन्न विभूतियों से सुसमन्वित, नृत्य - गीत वाद्य - भेद से तीन प्रक्रमों में विभत्त शास्त्रीय सङ्गीत के नाद - अति-स्वर - नामक - प्रतिष्ठास्तम्भों का मूला-धार- ' हिङ्कार ' तत्त्व, और प्रकृत - या शिक " कर्म ८३५ - स्वरात्मक साम के माध्यम से हिङ्कार की अभिव्यक्ति ८३६ – ' नामामा - हिङ क्रियते ' इत्यादि श्रुति का समन्वय " ८३७ श्रुति का 22 ८२५ - केन्द्रात्मक - ऋङ मय - धामच्छद -- दृश्य-वस्तुपिएड, और तदनुप्राणित - नादतत्व १२५० ८२६ - विएड - मण्डलान्तर्वर्ती यजुम्र्म्मय - गतिभाव, और तदनुप्राणित श्रतितत्त्व ८२७ - पिण्ड केन्द्र से उपकान्त प्राजरश्मि - मण्डल रूपेण सहस्रभावापन्न साममय - मण्डल, श्रीरतदनुप्राणित स्वरतव ८२८ - नाद, और ऋपिण्ड ८२६ -- श्रुति, और यजुगंति ८३० - स्वर, और साममण्डल ८३१ - स्वर - साम और पारिभाषिक ' स्वरसान ' ( त्रयः स्वरसामान:) ८३२ - ' गीतिषु सामाख्या ' का संस्मरण ८३३ - सामात्मक स्वर, किंवा स्वरात्मक साम, और सङ्गीत का मूलमतिष्ठत्त्व 21 39 11 23 " ' हिङ्कार ' शब्द पारिभाषिक रहस्यात्मक-८३८ - हिङ्कार शब्द समन्वय प्रसङ्ग से अनु-प्राणिता - सङ्गीतानुगता - नाद - श्र ुति स्वर-त्रयी का संस्मरण " ८३- श्रुति -- स्वर - प्राम - स्वरूप- चक्रात्मक परिलेख ८४०- ० सङ्गीतानुगता पारिभाषिकी जाति-तालिका १२५.० 39 " " ” 19 १२५१ १२५२ 21 इति - सङ्गीतानुगतं नाद - श्रुति - स्वर - स्वरूप - दिग्दर्शनम् # ८४१ - प्रकृतानुसरण, श्रौर नाद श्रति स्वर-त्रयी के आधार पर प्रतिष्ठित - नृत्य - गीत-वाद्यात्मक सङ्गीत = १२- सङ्गीत का आत्मसंविद् - विरोधी ' बाग्लादोप ' प्रवर्त्तकत्व ८४३ - सङ्गीत का बुद्धिनिष्ठा - विरोधी " ' माल्व्यदोष ' - प्रवर्त्त कत्त्व ८४४ - प्रतिज्ञात उभयदोष के स्वरूपानुबन्ध से किञ्चिदिव निवेदन १२५३ 12 " " " १४४

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शतपथब्राझा २ खण्ड ८४५ - ग्राग्ला, और माल्व्यदोष, एवं तत्प्रसङ्ग से- तमसो ' मा ज्योतिर्गमय ' श्रुति का पावन संस्मरण ८४६ - सृष्टि के मूलभूत आभू, और अभ्व का संस्मरण ८४७ - श्रा से अनुप्राणित ' रस ' का संस्मरण ८४८ - भ्व से अनुप्राणित ' बल का संस्मरण ८६ - यत्, और जू का संस्मरण ८५० - तेज, और स्नेह का संस्मरण ८५१ ज्योति, और तमः का संस्मरण ८५२ - भू - स्व की प्रथमा, द्वितीया, तृतीया एवं चतुर्थी अभिव्यक्ति ८५३ - विश्वातीत परात्परब्रह्म का संस्मरण ८५४ - नेजत्, और एजत् ८५५ - स्थिति, और गति ८५६ - श्रत्यन पिनद्ध - विश्वातीततत्त्व ८६६ - परमेष्ठी- संस्थान, और वृत्रवरुण ८७० - सूर्य - संस्थान, और इन्द्र - मित्र १२५३८७१ - वृत्रापोमय स्नेहमय- वरुरूप परमेष्ठी 19 " 19 22 13 " " " " 29 ८७२ - पारमेष्ठ्य वरुण की अपरिपक्का, एवं परिपक्वावस्था ८७३ - परिपक्कावस्थापन वरुण, और तदनु-प्राणित गन्धर्व, तथा पितर ८७४- अपरिपक्वावस्थापन्न वरुण, और तदनु-प्राणित वृत्रप्रमुख असुर ८७५- दिव्यभावपन्न परिपक्व पतत्त्व, और गन्धर्व, तथा पितर ८७६ - श्रासुरभावापन्न श्रपरिपक्क अपतत्त्व, और वृत्रादि श्रसुर ८७७ - वरुण की परिपक्वावस्था, और भृगुतत्त्व १२५५ " " " " " " " " " 32 ८७८ - वरुण की अपरिपक्क वस्था, और वरुणतत्त्व " " 3 ८७६ - ( भृगुर्वै वारुणि का संस्मरण ) " } 22 " " ८५७ - ( क ) - श्राभू - श्रम्वात्मक तत्त्व ८५७ ( ख ) - उपनिषत् - वचन का संस्मरण ८५८ - विश्वातीत विभिन्नभाव ८६६ - विश्वात्मक - विभिन्नभाव ८६० - ' अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाह-मर्जुन! ' का संस्मरण ८६१ - ते जोलक्षण ज्योतिर्भाव, और तदभिन्न-इन्द्रतत्त्व ८६२ - स्नेहलक्षण तमोमाव, और तदभिन-वरुणतरव ८६३ - इन्द्रात्मक - मित्रभाव ८६४ - मित्रावरुणौ, और तूदही ८६५ - समष्टयात्मक त्रयीब्रह्म का संस्मरण ८६६ - स्वयमे वोदुबभौ -और स्वयम्भूः ८६७ ( क ) इन्द्र मित्र की अभिव्यक्ति ८६७- ( ख ) -त्रृत्र - वरुण की अभिव्यक्ति ८६७ ( ग ) - ज्योतिर्म्मय- इन्द्रमित्र ८६८ - तमोमय- वृत्र वरुण ८० - पितु स्थानीय - वरुणभाव १२५४८८ ९ - पुत्र- स्वानीय - भृगुभाव II 17 " " " " " " 11 " " 1 11 " २ - गोपथब्राह्मण वचन के द्वारा वस्तु-स्वरूप का स्पष्टीकरण ८८३ तस्मात् स भृगुर्वारुणिः - भृगुतत्व की भौतिक स्वरूप - व्याख्या का समन्वय - श्राग्नेय - वायव्य- ऐन्द्रप्राण से समन्वित परिपक्क भर्जनशील - पारमेष्ठ्य श्राप्यतत्व की भृगुरूपता ८८६ - वरुणस्य भर्गः - त्रेधा - अपतत् ८८७ - श्रापः - वायुः सोमः, और भृगुत्रयी - वायुरापश्चन्द्रमाः- इत्येते भृगवः ज्यात्मक भार्गव श्रायप्राण, और तदनुप्राणित सुर ८० यात्मक - भार्गव - वायव्य प्राण, और तदनुप्रातिण- गन्धर्व १४५ 22 १२५६ " " " " " " II 37

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विषयसूची १ त्मक मार्गव - म्यान, श्रीर तदनुप्राणित- पितर ८६२ - श्रायुर- प्राणात्मक वारुणमार्गव आाप्य. प्राण से अनुगत अप्सराप्राण ८६.३ - श्राप्न्य - अप्सराप्राण का साङ्केतिक नाम-' सुरा ' ८६४ - पितृप्राणात्मक भार्गवप्राण, और ' सोम ' ८६५ - वारुण - सोम, और सुराभावों का पारिभाषिक समन्वय ८६६ - पारमेष्ट्य- भार्गव - बारुण सुरा - भाव, और निबन्धन श्राम्ला और माल्ल्य नामक प्रचण्ड दोष ८६७ - श्राग्ला, और माल्व्यदोषों से समन्वित " नाद अति - स्वर - भावापन भी सङ्गीत का काल्वालीकृतत्व ८६८- इदमत्रावधेयम् ८६६ रामः श्रर ज्योतिः ६०० वरुणात्मक तमोभाव ६०१ - इन्द्रात्मक ज्योतिर्भाव ६०२ - तमोमय वरुण और मुरा ६०२- ज्योतिर्मय इन्द्र और सोम 1 ६०४ सुरा, और सोम से अनुगता भौतिकी दृष्टि ६०५ - पञ्चाग्निमूला श्रन्नोत्पत्ति ६०६ - स्नेहमयी श्रद्धा की सोमरूप में परिणति ६०७ अन्नका प्रथम मौलिक स्वरूप, और सोम 39 ६०६ - ' वर्षा ' का स्वरूप - दिग्दर्शन ६०६ - गायत्राग्नि, और वर्षाजल " १०'अन्न ' की स्वरूप परिभाषा ६११- वैश्वानर अग्नि में अन्नात्मक सोम की श्र ६१२- पुरुषाग्नि में हुत धन का विशकलन ६१३- नानुगत रस, और मलभाव ६१४-रसानुप्राणित रेतीमा ६१५ - शुक्र और शोणित ६१६ - वृपा और योषा १२५६ ६१७ - प्रात्रेयी अस्पृश्या योषित् १२५७ " " १२५८ " ६१८ - अस्पृश्यता के सम्बन्ध में तत्त्वदृष्टि का समन्वय ६.१६ लोक - सावित्राग्नि - श्रद्धा - सोम, और तदनुप्राणिता प्रथमाहुति ६२० अन्तरलोक पज्यन्याग्नि - सोम और द्वितीयाहुति २१ भूलोक गायत्रानिवृष्टि - सोम और तृतीया हुति १२२- अध्यात्मलोक, वैश्वानराग्नि, अन्न, सोम, और चतुर्थी । हुति ६२३- योपिल्लोक, प्रावाग्नि, शुक्र, सोम, और पञ्चमी ति २४- पञ्चाग्निविद्या सन्दर्भ ६. २५ - रासायनिक सम्मिश्रण, और अन्नोत्पत्ति ६२६ - अप्तवानुगत वरुया, और आसुरभाव ६२७- दिव्यमावानुक से समन्वित रसात्मक न ६२८ - श्रसुरभावानुबन्ध से समन्वित मलात्मक-अन ६२६ - वरुणानुगत सुराभाव ६३० - इन्द्रानुगत सोमभाव ६३१ - वरुणानुबन्धी- मलात्मक आासुर दोषभाव ६३२ - इन्द्रानुबन्धी- रसात्मक- दिव्य गुणभाव ६२३- आमुरी और देवी सम्पत् ६२४- ' गुण ' और ' दोष ' का पारिमाधिक अर्थ - समन्वय ३५ - वारुख प्रामुर - मलात्मक - सुराभाव, और और ' तम ' ६३६ - ऐन्द्र- दिव्य रसात्मक सोमभाव, और ज्योति 21 ९ ३७ - ' तमसो मा ज्योतिर्गमय ' का सिंहाव-29 १४६ लोकनात्मक संस्मरण १२५८ १२५६ " १२६० " 17 " " " 39

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६३८ - सङ्गीत की निरतिशया दोषाक्रान्तता, शतपथब्राह्मणा २ खण्ड और तदनुप्राणित काल्वालीकृत - तिहास का समन्वयोपक्रम ERE. - सोम, और सुरा के निष्कर्षात्मक स्वरूप का संस्मरण ६४० - मलात्मिका मादकता, और असुर-भावापन्ना सुरा ६४१ - रसात्मिका मादकता, श्रौर दिव्यभावापन्न सोम ६४२ - प्रत्येक अन्न में रसमलात्मक - सोम - सुरा-भावा की संस्थिति ६४३ - भूतदृष्टि द्वयी से अनुप्राणिता - सुर - सोम-६४४ - प्राणदृष्टि से अनुप्राणिता सुरासोम-द्वयी ६४५ - अन्नगता मादकता से अनुगता तन्द्रा, और निद्रा ६४६ - श्रन्न की मादकता का समन्वय ६४७ - वारुण मलभ्ाव की ' विष ' -रूपता, और तद्द्वारा जीवनीय शक्ति का हास, किंवा श्रभिभव ६४८ - ऐन्द्र- रसभाव की ' श्रमृत ' रूपता, और तद्वारा जीवनी - शक्ति की श्रभिवृद्धि, किंवा अभिव्यक्ति ६४६ - प्रजापति का पूर्व शिल्प, और कण्ठ-स्थित ' विषयन्त्र ' ६५० - विषयन्त्र के द्वारा मुक्तान्न के विष, एवं अमृत - भाग का विभाजन ६५१ - विषयन्त्रानुग्रह, और मानव की अन्न-गत विष से रक्षा ६.५२ - पतन- जृम्भा -तन्द्रा - श्रालस्य श्रादि विष-प्रभावों का समन्वय १२६० " " " " " 39 " 33 ३५३- मनात्मक सुरा रूप - विष ६५४ - रसात्मक - सोम रूप - अमृत 92 ६५५ - जीवन विवातक सुरारूप विष 11 ६५६ - जीवनसंरक्षक मोमरूप अमृत ६५७ - अन्न की सुरा- सोमान्विता - उभयरूपता दिग्दर्शन ६५८ - ‘ अनृतं - पाप्मा - तमः सुरा ' ( १ ) " । ६५६ - अभिमाद्यन्निव हि सुरां पीत्वा-I वदति ' ( २ ) ६६० - ‘ तस्मात् सुरां पीत्वा रौद्रमनाः ' ( ३ ) ६६१ - ' यदस्य रामलमासीत्, सा - सुरा-अभवत् ' ( ४ ) ६६२ - स्फिगीभ्यामेवास्य भामोऽवत् - सा सुरा अभवत् - अन्नस्य रसः ( ५ ) ६६३ - अपां वाऽएप ओषधीनां रस:, यत्सुरा ' ( ६ ) ६६४ - ' अन्न ' - सुरा ' ( ७ ) ६६५ - ' प्रजापतेर्वा एते अन्धसी - यत् सोम-` श्च, सुरा च ' ( = ) ६६- ‘ सत्यं वै श्रीर्ज्योतिः सोमः ( ६ ) ६६७ - ' एप वै सोमो राजा - अन्नाद्यम् ( १० ) " ६६ = - ' एतद्वै देवानां परमं - अन्न ', यत्-सोमः ' ( ११ ) ६६६- एतद्वै, परमं अन्नाद्य यत्सोमः ( १२ ) ६७० - ' अन्नं वै सोमः ' ( १३ ) ६७१ - ' प्राणः सोमः ' ( १४ ) १७२ - ' आपः सोमः सुतः ' ( १५ ) ६७३- ' सौम्या श्रोषधयः ' ( १६ ) " ६७४ - सुरा, और सोम - नामक विरुद्ध प्राणों से कृप्तमूर्ति अन्न " ६७५ — उभयप्राणात्मक अन्न की आहुति से वैश्वानराग्नि का प्रज्ज्वलन ६७६ - जातिभ्रंशकर - दोष, और तत्प्रवर्त्तिका सुरा ( टिप्पणी ) ६७७- मलिनीकरण - दोष, और तत्प्रवर्त्तक सीधु ( टि ० ) ६७८ - सङ्करीकरण - दोष, और संप्रवर्तक-आसव ( टि ० ) १२६१ " " " १२६२ " " ,, " 17 " " } "

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६७६ ब्राह्मणो मदिरां पीत्वा ब्राह्मण्यादेव डीयते ' टि ० ) ६८० - गौड़ी- पैष्टी - माध्वी- रूपा सुरात्रयी ( टि ० ) ६.८१ - सुरा वै मलमन्नानाम् ( टि ० ) ६ = २ - पाप्मा च मलमुच्यते ( टि ० ) ६८३- तस्मात् न सुरां पिबेत् ( टि ० ) ६८४ - अन्नात्मक वैश्वानराग्नि का ही नाद-श्रुति स्वरात्मिका सङ्गीत प्रतिष्ठा भूमिका-प्रवर्त्तकत्व ६८५ - विशेषष्टिबिन्दु ६८६ - सङ्गीत का व्यञ्जनात्मक मर्त्यभाग ६८७ - मर्त्यभाग का अन्नमलात्मक सुराप्राण-से सम्बन्ध ६८८ - सङ्गीत का स्वरात्मक अमृतभाग ६८६ - श्रमृतभाग का अन्नरसात्मक सोमप्राण से सम्बन्ध ६६० - सुराभाव, और सङ्गीतानुगत पार्थिव-क्षरात्मक व्यञ्जन ६६१ - सोमभाव, और सङ्गीतानुगत सौर-अक्षरात्मक - स्वर ६६२ - परम्परानुगत वक्तव्यनिष्कर्ष ६६३ - सोमरसात्मक स्वरतत्त्व ६६४ - स यदाह - स्वरोऽसीति, सोमं वा एतदाह । एष वै सोमः सूर्यो भूत्त्वा श्रमुष्मिल्लोके स्वरति । तत् - यत्-स्वरति तस्मात् स्वरः । तत् स्वरस्य-स्वरत्त्वम् ६६५ - गोपथवचन का अक्षरार्थ- समन्वय ६६६ - पारमेष्ठ्य - सोम की दाह्यरूपता ६६७ - सौर सावित्राग्नि की दाहकरूपता विषयसूची १००१ - ' सूय्यों ह वा अग्निहोत्रम् ' १२६३ १२६२ " " 37 20 १२६३ " " 19 " " " " ६६८ - कृष्ण भावात्मक पारमेष्ट्य सोम " ६६६ - ज्योतिर्विहीन- सावित्राग्नि १००० - सोमाहुतिरूप अग्निहोत्र 39 २ - त्वं ज्योतिषावि तमो ववर्थ ३ - सौरप्रकाशात्मक रश्मिमय- साममण्डल ४- स्वरसाम का संस्मरण ५- विश्वान्धकार का निवर्त्तक सोम 39 " " ६- दत्थंभूता सुरा, और इत्थंभूत सोम १२६४ ७- मलात्मिका दोषपूर्णा- मादकता की प्रबर्त्तिका सुरा ८ - रसात्मिका गुणान्विता मादकता का प्रवर्त्तक- सोम ६- मृतप्राणी का शव - शरीर, और उसका सोमशून्यत्त्व १० - पवमान सोम, और शुचिता ११ - सोम का अभाव, और दौर्गन्ध्य १२- क्रव्यादग्नि प्रिय - सुरात्मक शव - गन्ध १३ -सुराजनित - मलीमस - भौतिक- दुर्गन्धि-मल - किट्टादिदोषों का निवत्त के पवित्र गाय- सोम १४- तप्ततनु, और गाङ्ग ेय- सोम १५ - प्रतप्तठनु, और मलात्मिका सुरा १६ - सोम, और सुरा के आधिदैविक-चिरन्तनेतिवृत्त का पारिभाषिक - सम-न्वय १७ सोम, और सुग - तत्वों के आधिदै विक स्वरूपानुपात से आध्यात्मिक-स्वरूप का संक्षिप्ततम समन्ययोपक्रम १८ - अध्यात्म संस्था, और उसके सुप्रसिद्ध आत्मा, बुद्धि, मनः, शरीर - नामक चार पर्व १६- बुद्धिपर्व, और तत्प्रभव - सूर्य २० - मन: पर्व और तत्प्रभव - चन्द्रमा २१ - शरीरपर्व, और तत्प्रभव - भूपिण्ड " २२-- सौरी - बुद्धि १४८ १०२३- चान्द्र मन 73 " 1 17 " " "

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१०२४ • - पार्थिव ( भौम ) शरीर शतपथब्राह्मण २ खण्ड २५- दिग्देशकालातीत तुरीय श्रात्मस्व २६- आत्मा और बुद्धि का एक स्वतन्त्र युग्म १२६४ २७- मन, और शरीर का एक स्वतन्त्र युग्म १२६५ २८ सोममय - मन और आधिदैविक सोम-तत्त्व २६ - सुरामय शरीर, और आधिदैविक-सुरातत्त्व ३० - मन का प्रभव सोमात्मक चन्द्रमा ३१- शरीर का प्रभव- श्रापोमय पार्थिवप्राण ( आपः पुरुषवचसो भवन्ति ) ३२ याद - अप्तस्व और आप्यवारुण सुराप्राण ( वारुणी ) ३३- सुरा, श्रीर सोम के साक्षात् प्रतीक आध्यात्मिक सुरा, और सोम ३४ - सोमात्मक मन की विभिन्ना अवस्था द्वयी ३५ - इन्द्रियभोगात्मक फलकामुक मन ३६ - मनोज्योति का श्रभिभव ३७- भूतात्मा के बन्धन - कारण का समन्वय ३८ - बुद्धियुक्त - बुद्धि योगनिष्ठ मन का + अनासक्तत्त्व -३६ - मतात्मा के बन्धन विमोक का समन्वय ४० - सौरी बुद्धि से युक्त नियन्त्रित सत्त्वमन " ४१-- सौरी बुद्धि से वियुक्त - अनियन्त्रित तमोमन ४३ - माल्व्यदोष का सिंहावलोकन ४४ - बुद्धि का सहजगुणात्मक ' पूति ' तस्व 17 " 33 " " १२६६ " II १०५० - मध्ये एकल एव स्थाता ५१ - निष्ठात्मक सूर्य्य ५२ - नैष्ठिक सूर्य से प्रसूता बुद्धि की स्व-तः- सिद्धा नैष्टिकता ५३ - दक्षवृत्तानुगत चन्द्रमा का परिभ्रमणा-त्मक चाञ्चल्य ५४ - बुद्धि के निष्टात्मक, समन्वय १२६६ " 39 स्थिरधर्म्म का १२६७ ५५ - नक्षत्राधिपति चन्द्रमा का प्रतिद् विलक्षण - परिवर्तन ५६ प्रकृत्यैव स्थिरधर्म से वचित चन्द्रमा 19 ५८- चान्द्रमन की चञ्चलतानुगता भावुकता ५६ - क्षणे तुष्टाः क्षणे नान्द्री मनोजसि 11 ५१ - बुद्धि नियन्त्रण से पराङ मुख स्वच्छन्द मन " ६० - मनोववर्ती मानव की अस्तव्यस्ता मावभङ्गिमा ६१- मनोराज्ये विचरणशील मायुक - मानवों की अस्थिरवृत्तियों का स्वरूप दिगदर्शन " ६२ - धृतिगुर्णाविरोधी निष्ठाविरोधी - गाम्भी--विरोधी भयानकतम मानसदोष ६३ - मानसदोषरूप ' माल्यदोष ' ६४ - सोमानुचन्घी - मानस - माल्न्यदोष ६५ गुण और दोष की सापेक्षता से अनु प्राणित आश्चर्य्यमय - रहस्यात्मक विपय एवं तत्समन्वय प्रवास , ६६ - रसात्मक- निवृत्तिप्रधान मन ६७ - चलात्मक प्रवृत्तिप्रधान मन ६६ - सात्विक मन और तमोरूप मन " ६६- शुक्ल चन्द्रमा और कृष्णचन्द्रमा ४५- ' धिय: ' और बुद्धि ४६ - स्थिरता, और धृति " ४७ - नितरां स्थिति, और निष्ठा ४- निष्ठा, और नैष्टिक 99 ७० - मन्मनाभाव और उन्मनाभाव " 1 १०७१ - गुण - दोष - विभूति का यथास्थान पारि-भाषिक समन्वय, और सर्व सुस्थम् १०४६ - निष्ठया हि प्रतिष्ठा स्यात् 33 13 19 39 " १४६

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१०७२ - बुद्धिनिबन्धना, स्थिरता लक्षणा निष्ठा से अनुप्राणित भै ७३ - पुरुषार्थ कर्म्मनित्रन्धन पौरुष ७४- गन्धर्व्व- श्रप्सरा- प्राण निबन्धन -- सौम्य मन से अनुप्राणित सङ्गीत ७५ - सङ्गीत के द्वारा पौरुषानुगत धैर्य का चिकम्पन ७६ - सङ्गीतानुगता घृतिविच्युति, और तद-नुप्राणित माल्व्यदोष विषयसूची १२६७ 39 71 १२६८ " " ७७ - ' सुरा ' से समतुलित माल्व्यदोष ७८८ - श्राचारनिष्ठात्मक कर्त्तव्यपथानुगमन 33 ७६- तत्वचिन्तनानुगत - मनन ८० - धैय्र्य - निबन्धन निष्टापथ ८१ - निष्ठा पथोपासक भारतीय ब्राह्मण ८२ - निष्ठापथविरोधी - सङ्गीत ८३ - ' तस्माद् ब्राह्मणो न नृत्येत, न गायेत ' का संस्मरण ८४ - मैत्रायणीश्रुति के द्वारा सुरा, माल्व्य, धैर्य, सोम, आदि गुण, दोप- विभूतियों का पारिभाषिक-स्पष्टीकरण ८५ - पाप्मना श्रात्मानं नेत् सृजा- इति ८६ - माल्व्यदोषापेक्षया भी भयानकतम -श्राला दोष ७- मार्गव - सोम, और मन 39 21 37 39 39 १०६६ - ' पुमान् वै सोमः ' ( तै ० ) ६७ – ' स्त्री - सुरा ' ( तै ० ) ६८- ततत्त्व का पारिभाषिक संस्मरण ६६ - सत्यतत्व का पारिभाषिक संस्मरण ११०० - सत्यं ऋतेऽधाय १ - ऋतं सत्येऽधायि २ - मन, और शरीर का ' ऋत ' प्रधानत्त्व ३ का ऋतघनत्व, और तद्रूप पारिभाषिक श्रनृतत्त्व ४- सदूधनप्राण की पारिभाषिकी सद्-रूपता ५- ' सत्यं वै श्रीज्योतिः सोमः ' ६ - ग्रनृतं पाप्मा - तमः सुरा ७- ऋत सोमात्मक चन्द्रमारूप गन्धर्व ८ तपोमयी पृथिवीरूपा श्रमरा ६- चन्द्रमा और पृथिवी का युग्म १११० मन, और शरीर का युग्म ११- सोम, और सुरा का युग्म १२ - गन्धर्व, और अप्सरा का युग्म १३ - मानसिक - शारीरिक कामभोग -- हास-परिहात आमोद - प्रमोद - गन्ध - सुगन्ध-मिथुन भाव - क्रीड़ा आदि निष्ठाविरोधी विवरां ', और तत्समर्थक- शास्त्रीय वचन १४- गन्धेनैव च रूपेण च गन्धर्वाप्सर-सश्चरन्ति ( १ ) १५ - योषित्कामा वै गन्धर्वाः ( २ ) १६ - स्त्रीकामा वै गन्धर्वा: ( ३ ) १७- सोमो गन्धाय ( ४ ) ८८- भार्गव - वरुण प्रपतत्त्व, और शरीर ८६ - चारभावापन्न - वारुण पेय व समुद्र १२६६० - एमूषवराह, और पार्थिव परमाणु सवठन " 1 ६१ - परमाणु का संघठन, और भूपिण्ड " " ६२ वराह भगवान के द्वारा पृथिवी का उद्धार " E - भूपिएड के स्वरूप निर्माण का नाविक सिंहावलोकन " ६४- मोक्का - सौम्य - मन, और पुरुषभाव ३०६५ - भोग्य- श्राप्य - शरीर, और स्त्रीभाव " १८ वो मे, मोदो मे, प्रमोदो मे, तन्मे युष्मासु ( ५ ) १६- उपद्रवं गन्धर्वाप्सरोभ्यः प्राय-च्छत ( ६ ) १ ९ २० - गन्धर्वाप्सरसो वै मनुष्यस्य प्रजाया वा प्रजात्रावेशते ( ७ ) १२६६ " 33 19 27 " " " 2 " " 27 " १२७० " " 37 ,, " " " " " " " 97 १५०

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शपथब्राह्मण २ खण्ड ११२१ - ' गन्ध'- इत्यप्सरस उपासने ( ८ ) १२७० २२- किन्नु तेऽस्मासु - अप्सरस्सु इति?, हासो मे, क्रीड़ा मे, मिथुनम्मे ( ६ ) " २३- सुरा, और सोम का शरीर - मनो-निबन्धन प्राध्यात्मिक स्वरूप, श्रौर तत्समन्वय २४ - पार्थिव पारिभाषिक- ' इरारस ' का संस्मरण 22 २५- वारुण - विमोहन श्रासुरधर्म्म " २६ - पार्थिव - इरारस की मादकता 29 २७- पार्थिव - इरारस से अनुप्राणिता सुरा २६ - पार्थिवन का सुरा - सोमात्मकत्त्व २६ - मदप्रवर्तिका इरा यस्याः सा मदिरा ३० -- श्रावरणात्मिका तमोमयी - निद्रा- तन्द्रा आलस्य - दीर्घसूत्रता - भय - क्रोध - श्रादि ग्रासुरभावों की प्रवर्तिका सुरात्मिका मोहमदिरात्मिका योगमाया, और तद्-द्वारा जगद्विमोहन ३१ - श्राप्य चारुया - उन्मादभावों की पारि भाषिक संज्ञा, श्रीर ' आला ' नामक -महान् दोष ३२ - ' ग्ला ' शब्द का धातु - प्रकृति - प्रत्य-यादि निबन्धन - समन्वय ३३ - लोकव्यवहारानुगता - स्वस्थता, और प्रकृतिस्था - शब्दद्वयी " " " " १२७१ ३४ – मानव की अध्यात्मसंस्था, और पुरुषभाव, ३५-३६ - मानवीय पारिभाषिक - पुरुष ३७ - मानवीया पारिभाषिकी प्रकृति १ ९ ४३ - प्रकृतिस्थ मानव की स्वरूप - परिभाषा १२७१ ४४- श्रात्मप्रसाद, श्रौर बौद्धिकी निष्ठा ४५ - श्रात्मानुगता शान्ति ४६ बुद्धधनुगता तृप्ति ४७ - मनोऽनुगता तृष्टि ४८ - शरीरानुगता पुष्टि ४६ -- तुष्टि से समन्विता पुष्टि का पारिभाषिक-समन्वय ५० - श्रात्मानुगत । शान्ति, और स्वस्थिति ५१ - बुद्ध यनुगता तृप्ति, और स्वस्थता ५२ - मनोऽनुगता तुष्टि, और परस्थिति ५३ - शरीरानुगता पुष्टि, और प्रकृतिस्थिति ५४ - प्रसादगुणान्वित - संविद्भाव ५५ - प्रसादगुणात्मिका श्रानन्दस्वरूपा निव्यक्ति का संस्मरण ५६ - लोकजीवन - निबन्ध मङ्गलपर्व, और हर्षोल्लासपरम्परा ५७ - प्रसादगुण का अभिभव, और तत्प्रयुक्ता हानि ५८ - आत्मशक्ति की क्षोभरूप में परिणति ५६ - ( क ) - मानसिक सत्त्वप्रेम की भोमासक्ति रूप में परिणत " " " " " " II 19 " " " १२७२ ५ ९ - ( ख ) शारीरिक पुष्टि की क्षयरूप में परिणति 19 : ६० - सामुद्र - वारुण - महान् दोष का आग्ला-रूपत्व ६१ - सुरापी - श्रा ग्लामानव 29 " " 23 " " " 11 और प्रकृतिभाव 11 ६२ - सुरानुगत लादोष " " ६३ - अग्ला दोषानुगत पारिभाषिक - समन्वय ६४ - सर्वविनाश का सूचक -: श्राङ ' उपसर्ग, " ३८ - पुरुषनिबन्धना पारिभाषिक की स्वस्थता ३६ - प्रकृतिनिबन्धना पारिभाषिककी प्रकृति-20 और ग्लादोष ६५ - आसमन्तात् ग्लानरूप आग्लादोष ६६ - शास्त्रात्मिका - श्राचारनिष्ठा के द्वारा उभयदोष - निवृत्ति का पथप्रदर्शन ११६७ - आचारात्मिका निष्ठा के कर्म्म - भक्ति-ज्ञान - रूप तीन सुप्रसिद्ध प्रक्रम " " " स्थता ४० - पुरुषरूप श्रात्मभाव, और ' स्व ' ४१ - ' स्व ' स्वरूपानुगता स्थिति, और त्वस्थता " ११४२ - स्वस्थ मानव की स्वरूप परिचय " " 22 13 १५१

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११६८ - श्राचारधर्म के शैथिल्य के अमुक-कारणों का स्वरूप - दिग्दर्शन ६६ - आचारधर्म की श्रभिभूति, और शेषभूत - अनाचार ७०-- सङ्गीत के प्रति हमारा आत्यन्तिक-' आदर ' भाब, किन्तु १ ७१ - मानसिक- सोमभाव, तथा शारी-रिक सुराभाव से अनुप्राणित माल्व्य, और भग्लादोषों से और तत्प्रवर्त्तक सङ्गीत " " हृत्कम्प, ७२ - अकिञ्चित्करा हमारी मान्यता, और सङ्गीत ७३ - महर्षियों की नैष्ठिकी दृष्टि का संस्मरण मात्र ७४ - सङ्गीत का निष्ठा के क्षेत्र में प्रवेश निषिद्ध, और वेदाज्ञा ७५ - श्राग्लादोष के पारिभाषिक स्वरूप के सम्बन्ध में गोपथ तिवचन का संस्मरण ७६- आत्मबुद्धिसम्मत विषयसूची १२७२ 39 " " 9 १२७३ सांस्कृतिक - कोश का अन्यतम - चिन्तक नैष्ठिक ब्राह्मण ७७ - मनः शरीर - सम्मत माल्व्य, तथा श्रग्लादोष ( क्रान्त श्रतएव काल्वाली-कृत इत्थंभूत - नर्त्तन - गायन - वाद्यात्मक सङ्गीत, और तनिबन्धना लोक-भावुकता ७८ - तनरररीम् ताक - धिना धिन - डिड डा-डिड् - डा - डा -आदि - भावसमन्विता मङ्गीत - परम्परा, और निष्ठा की स्वरूप विस्मृति ७६ ज्ञानात्मिका याचारनिष्ठा, और मानव का आत्मपर्व ११८० - कम्र्मात्मिका श्राचारनिष्ठा, और मानव का बुद्धिपर्व १ ९ ८१ - श्रात्मानुगत मननात्मक - श्रनुशील-नात्मक - ज्ञानप्रधान सूक्ष्मतम आचार १२७३ ८२ - आचारनिष्ठा में सङ्गीत का प्रवेश श्रात्यन्तिकरूपेया निषिद्ध 37 ८३ - बुद्धयनुगत- श्राचारणात्मक कर्म्म-प्रधान आचार, और तत्रापि मनो-व्यासङ्ग के प्रवेश का निरोध 12 ८४ - मनोनिबन्धन - भक्तिमार्ग का संस्मरण १२७४ ८- मानसिक - भक्तिकाण्ड के अनुबन्ध से प्रचण्ड - मदा - सूत्र के नियन्त्रण-द्वारा ईश्वरभक्ति - समन्त्रित शास्त्रीय-सङ्गीत का समादार, एवं श्रमुक पर्वो त्सव यज्ञादि - कविशेषों के लिए तदनुमोदन ८६ - भारतीय प्राच्य - शास्त्रीय सङ्गीत की प्रमुख आधार भित्ति - ईश - संस्मरण ८७- इत्थंभूत शास्त्रीय सङ्गीत का समादर - वीणावादनतरा भगवती - शारद - डमरू वादक भगवान् शङ्कर ६० - विश्वसंहारक ताण्डवनृत्य के प्रवर्त्तक महाकालेश्वर ६१ - वेणुवादक भगवान् नन्दनन्दन ६२ - तुम्बुरु - तान - निमग्न गन्धर्वर्षिन्तुम्बुरु ६३ - ब्रह्मनादसमाप्लुत - गन्धर्वर्षि नारद ४- धर्मनिरपेक्ष- ईश्वर भावना से असं सृष्ट आज के नर्त्तन - गायन - वादन-रूप- मन: शरीर निबन्धन - व्यासों का भारतीय संस्कृति के नैष्ठिक प्राङ्गण में श्रात्यन्तिकरूपेण प्रवेश-निषिद्ध ११६५ गोग्य ठि के द्वारा तथाविध सङ्गीतानुगमन का ब्राह्मणप्रज्ञा के लिए प्रनण्ड - विशेष " 3 23 ,, " " 27 १५२