Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 281–290

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 281–290

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ११६६ - स्वरभावानुबन्धी मण्डलात्मक - साम के प्रसङ्ग से उपात्ता सङ्गीत चर्चा १२७४ ६७ - वत्तं मानयुगानुबन्धी- मनः शरीरानुगत आत्मबुद्धि शून्य, अतएव माल्व्य, तथा आना - दोष - समाकान्त दोषों से समाप्लुत ' सांस्कृतिक आयोजनों ' के काण्ड ताण्डवों का नग्न चित्रण ६८ प्रकृतिमिद्ध प्रकान्त - सामात्मक हिङ्कार का संस्मरण १६- मण्डलात्मिका सामसम्पत्ति और तदनुबन्धिनी यज्ञपरिपूर्णता १२०० नादात्मक स्वर के द्वारा शब्दाभि व्यक्ति १२०१ डिङ्कार - समन्ययोपक्रम २ - स्वरसन्धानात्मक दिशार ३- हिं - हि --- और दिङ्कार ४- हिङ्कार - नाम - समन्वय ५- प्राकृतिक - यज्ञ, और तदावश्यक सम्पत्ति रूप साम ६ समान विकार का समन्वय ७- प्राकृतिक सामतस्व का संग्राहक हिङ्कार ८ - हृद्यभाव का स्वरूप - समर्पक हिङ्कार ६- श्रनिरुक्त भावात्मक हृद्य हिङ्कार १० मन्त्र का आदि, और तदनु प्राणित- ' हिं- हिं- श्रोम् ' रूप सप्रणव-१२७५ १२१७ नासाका अवरोध, और सानु-नासिक विङ्कार १८ मन्त्र, और बात ऋङ १ ९- सामिधनियों का अनुवचन १२७५ और दिव्याग्नि का श्राधान २० या नृपा का दाम्पत्यभाव और प्रजनन कम् २१- वात्मयजनन की कामना, और हिङ्कारपूर्वक सामिधेनी - ऋचाओं का अनुवचन २२- हिङ्कारपूर्वक अनुवचन की द्वितीया उपपत्ति का समन्वय २३- हिङ्कार रूप कृपाप्राण २४ - क - रूप - योरामाण 29 २५ श्रनिरुक्त प्राणतत्त्व " २६- निरुका बाग्देवी 37 " " . और १२७६ " " " 29 31 १२ - मण्डलभाव का संग्राहक प्रोङ्कार १३ सप्रणव हिङ्कारोवारण का सोपपतिक समन्वय १४- नादात्मक प्राणसम्बन्धी विकार १५ - नादप्राण की उत्तरावस्था, और हिङ्कार १२१६ नावास्थानस्थित दिङ्कारप्राण और जीवनला श्वास - प्रश्वास " 17 १५.३ २०- प्राण का प्रातिस्थिकरूप, और अनि-रुक्तता २८ - उपांशु रूप से हिङ्कारानुगमन, प्राण की अनिरुक्तता का संस्मरण २६- उपांशु उच्चारणोपपत्ति - समन्वय--रूपा तृतीया उपपत्ति ३० मत्रीत आसम् अनु इत्यादि उपसगों से अनुप्राणित- सात्विक प्रयो धनों का दिग्दर्शनोपक्रम ३१ - आगमनभान, और ' आठ ' उपसर्ग ३२- गमन ( प्रयाण ) भाव, और ' प्र ' उपसर्ग ३३- उभयत्तीक वस्तुसमन, उपसर्ग और ' सम् ' २४ वस्तुपृष्ठानुगत सम्बन्ध की अमि-व्यक्ति, और ' नु ' उपसर्ग १२३५ - महारम्म उपसर्गभाव " 93 " 28 99 ११ द्वयभाव का संपादक हिङ्कार "

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१२३६- सामिधेनी चाची के उपसर्ग - निधन प्रवती धावती समवती अनुक्ती आदि नामों का संस्मरण ३७- प्रकृत दर्शपूर्णमा सपश ( इष्टि ), और पार्थिवाग्नि में सावित्ररूप दिव्या-ग्नि का आधान २८ - सावित्राग्नि की गायत्राग्निरूप में परिणति का रहस्यात्मक समन्वय २६ प्राणात्मक सोरतेजोमय ' सावित्र ' तत्त्व का स्वरूप दिग्दर्शन ४० - भूपिण्डरूपा गौ ४१ - गौ के गर्भ में प्रतिष्ठित सौर तेज की विषयसूची १२७६ १२७७ गायत्रीरूप में परिणति ४२ - गायत्री शब्द का पासनिक निर्वाचन " ४३ - गायत्री तत्व के विभिन्न दो वित्त का संस्मरण ४४- पार्थिव गायत्रीरूपा भूलगायत्री ४५ - सौर- सावित्र तेन का प्रतिफलन, और ज्योतिषी - प्राणगायत्री ४६- सौर - तेजोमयी- गायत्री, और सामि धन्यनुवचनकम्म ४७- तेजोमयी सौर - गायत्री के अवान्तर दो महिमामय विवर्त ४८ - छायामयी गायत्री ( १ ) ४६ प्रकाशमयी गायत्री ( २ ) ५० - पार्थिवी भूतगायत्री ( १ ) " " " " " १२५६ – गमनात्मक ' प्र ' भाव और गायत्री १२७८ ५७ - महत्त्वपूर्ण विप्रतिपत्तिका स्वरूप-विश्लेष ५८ - श्रागमनभाव और सौर - सावित्रतेज ५६ गमनभाव और सौर - गायत्रतेज ६० - सूर्य्यानुगत सावित्री सहज सम्बन्ध, और ६ ) पृथिव्यनुगत सहज - सम्बन्ध और गायत्री ६२ - ' गायत्री ' प्रयोगानुगता विप्रतिप्रति का निराकरण ६३- छन्द-द- देवता - स्वर - युक्ता मन्त्रवाक् आकर्षण, और ' एति ' भाव का ६४- यज्ञनिवन्धन पारिभाषिक एतिप्रति भाव, और विप्रतिपत्ति का समन्वय ६५ एति - ति - भाव और आधिदैविक गायत्रभाव का समावेश ६६ -- श्वास - प्रश्वासात्मक - उदान, और प्राण ६७ -- एति प्रति भावनिबन्धना उपपत्ति का समन्वय द्वितीया ६८: कानुगत एति प्रति भाव और गायत्री ६६ तृतीया उपपत्ति का तास्विक समन्वय ७० - यज्ञपुरुषानुबन्धी श्रात्मभाव, और शारीरभाव का सस्मरण " ७१ मोग्यशरीर, श्रीर भोगायतन " " ७२ धामाका अन्तर्षित " ७३ - श्रात्मा का बहिर्वित्त " १२७६ " " ५१ - दिव्या ज्योतिर्म्मयी देवगायत्री ( २ ) ५२ - दिव्या छायामयी पितृगायत्री ( ३ ) ५३ - गायत्री से अनुप्राणित- रहस्यात्मक एति - भाव और प्रेति भाव 3 ५४ - एक प्रासङ्गिक प्रश्न, और तत्समा-धान - प्रयास १२५५ - श्रागमनात्मक ' आ ' सावित्री भाव, और " " १५४ ७५ विद्यात्मक पशुभाव ७५ पशुर्गानुबन्धी एति, और में विभाव ७६- बहिबिंत्तलक्षणा पशुसम्पत्ति का संग्रह " ७७- अन्तर्चितलचणा शरीरसम्पत्ति का संग्रह १२७८ देवात्मा में पशुसम्पत्ति का आधान और एति प्रति की चतुर्थी उपपत्ति का समन्वय

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१२७६ - बहिर्वित्तलक्षणा बाह्या पशु - मम्पत्ति क । स्वरूप - दिग्दर्शन शतपथब्राह्मण २ चण्ड ८० - भुत भौतिक पदार्थों से अनुप्राणित-सम्भूति और विनाशधर्म्म ८१ - विश्व, और संसार ८२ - दर्शनविशेष का क्षणिक - वाद ८३ - गतिभाव श्रागतिभाव के गर्भ में समाविष्ट ८४ - गातिभावानुबन्धी - विनाशधर्म्म ८ - श्रागतिभावानुबन्धी - सम्भूतिधर्म्म ८६ - सम्भूति, और विनाश का सह-समन्वय ८७- चल, और विनाशभाव ८८ श्रचल, और सम्भूतिभाव ८६ - चलाचलमिदं सर्वम् १२७६ I " " " " " ६० - चल भाव, और प्रेसि ६१ - अचल भाव, और एति ६२ - आदान विसर्गात्मक छति प्रति भाव १२८० ६३ - विप्रं सनात्मक क्षरणधर्म से प्रजापति ६४ - क्षतिपूरक भैषज्ययज्ञ ५ - श्रचंश्चरति, और सौररश्मियों का प्राणन अपानन - व्यापार ६५ - वाणन श्रमानन - गति का उदाहरण के द्वारा स्वरूप - समन्वय ७- एति प्रति भावापन्न - गायत्र प्राण की विश्वव्यापकता का समन्वय ६८ - गायत्री वा इदं सर्वम् ' ६६ - एति प्रति भावात्मक - श्रनुवचन की पाँचवीं उपपत्ति १३०० - आधिदैविक आध्यात्मिक आधि भौतिक - यज्ञके समन्वय से अधियज्ञ ( मानवकृत- वैधयज्ञ ) का स्वरूप निर्माण " 1 " 2 १३०१ - एति - प्रति - रूपा लोकसमृद्धि का पारिभाषिक - समन्वय २ - सामिधेनी- कम्र्मानुगत अवान्तर - प्रश्नों की वैज्ञानिकी - उपपत्ति का समन्वयोपराम ३ - सामिधेन्यमुवचन - कर्मानुबन्धिनी प्रथमा ऋचा का पावन संस्मरण ( १ ) ४- ऋतुपरक प्रथममन्त्रार्थ - समन्वय ५- अग्निपरक - प्रथममन्त्रार्थ समन्वय ६ - अग्निपक्ष की राद्धान्तता, और प्रथममन्त्र ७ - बाज अभिनव त्रिम्मन्त घृताची-रूप यज्ञाग्नि के स्वरूप संरक्षक - भाव ८ - वाज, और अन्न E- वाज का पारिभाषिक विशेष अर्थ १०- पारमेष्ट्या तत्त्वत्रयी ११- वानात्मक पारमेष्ठ्य सोम १२ - सीमापहरण करनेवाली गायत्री २३- ' वीय्यं ' वै वाजाः ' १४ - चान्द्र सोम, और हविर्यज्ञ १५ - ज्योतिर्म्मय सोम, और ज्योतिष्टोम यज्ञ १६ - वाज सोमानुगत - वाजपेययज्ञ १७- ब्रह्मणस्पतिरूप वाजात्मक- सोम १८ - वाजपेय यज्ञात्मक संस्मरण बृहस्पतिसव का १६- बृहस्पतिः पूर्वेषामुत्तमो भवति २०- इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः २१- बृहस्पतिग्रह, और लुब्धकबन्धु २२ – ब्रह्मात्मक ब्राह्मण, और पारमेष्ठ्य-बृहस्पति २३ - सौर क्षत्रात्मक - इन्द्र २४ - ब्रह्म वै वाजपेयः २५- वाज, और बाजी - प्राण २६- श्रश्वजातिविशेष, और वाली १३२७ - वाजरस की सर्वव्याप्ति का पारिभाषि-समन्वय १५५ १२

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१३२८ - वाजो वै पशवः ( १ ) २६ - ओषधयः खलु वै बाजा: ( २ ) ३० - ऋतवो वै वाजिनः ( ३ ) ३१ - श्रग्नि - समद्ध'क वाजरस विषयसूची १२८२ १३५५ - वर्हि श्राप, और वेनतत्त्वका संस्मरण १२८४ " 1 ५६ - दिव्याग्निगत- पितर, और अग्निष्वात्ता " " ५७ - सोमगत- पितर, और सोमसत् " ३२ - पारमेष्ठ्य वाज के द्वारा ब्रह्माग्नि का समद्धन ३३ - सौरवाज के द्वारा सम्वत्सराग्नि का प्रज्ज्वलन ३४- चान्द्रवाज के द्वारा श्रोषध्यग्नि का पोषण ३५ - श्रोषधिवाज के द्वारा शारीराग्नि का सन्तर्पण ३६ - अग्निस्वरूप रक्षक- वाजतत्त्व ३७ - पक्षाग्निरूप अभिद्यव ' ३८ - श्रवयवरक्षानुगता श्रववयी की रक्षा ३६. - ' अभिद्य ' नामक पर्वाग्नियों के द्वारा अवयवी अग्नि का स्वरूप - रक्षकत्त्व ४०- हवि से अनुगत श्रोषधिरूप अन्न, और भौतिक शरीर " 1 ४१ - अन्न, और भूत का मर्त्यपशुत्व ४२ - ' हविष्मन्तः ' और पशु ४३ - अन्तरिक्षस्था श्राज्यमात्रा ४४- श्राज्याहुति, और अग्नि की समिद्धता ४५ - जुहू- स्थानीय ' घृताची ' ४६ -- स्वर्गसुखार्थी- ( सुग्नुयु ) यजमान ४७ - प्रथम - सामिधेनी- मन्त्रार्थ - समन्वय II 11 १२८३ ४८ - द्वितीय - सामिधेनी- मन्त्र का पावन संस्मरण ४६ - याज्ञिकी परिभाषा, और भूलोकरूप ' बर्हि ' ५० श्राग्नेय सौम्य - समशीतोष्ण - पितर ५१ - अन्नवितरों का संस्मरण ५२ - सूर्य्य लोकोपलक्षित - उष्णभाव ५३ - चन्द्रलोकोपलक्षित - शीतभाव १३५४ - भूलोकोपलक्षित - समशीतोष्णभाव ५८ - भूलोकगत पितर, और बर्हिषत् ५६. - पार्थिव तत्त्व, तथा दिव्य अग्नि-तत्त्व के समन्वय से पार्थिवप्रजा का समुद्भव ६० - बर्हि शब्दों की अनेकधा व्याप्ति ६१ - ' अग्निः सर्वा देवता: ' का संस्मरण ६२ - अग्निकर्म का वैधयज्ञ की दृष्टि से समन्वय, और मन्त्रार्थ - स्पष्टीकरण " " " 1 " " 1 ६३ - श्राङ - उपसर्ग, और आवती ऋचा १२८५ ६४ - ब्राह्मण की सप्तम कण्डिका का निष्कर्ष " " ६५- ' प्र ', लौर परागभाव 19 ६६ – ‘ आ ', और भाव 19 ६७ - ' प्रवो वाजा अभिद्यवे ' " " " 14 " " " ६८ - ' अग्न याहि वीतये ' ६६.- एक प्रासङ्गिक मत, और उस का वैज्ञानिकत्व ७० श्रुति के शब्दों में मन्त्र के वैज्ञानिक-अर्थ का स्पष्टीकरण ७१ अन्नसम्पत्ति, पशुसम्पत्ति, वीर्य्य-सम्पत्ति, एवं भोग्यशक्ति चतुष्टयी का संस्मरण ७२ अन्नसम्पत्ति, और वाज ७३ पशुसम्पत्ति, और हविष्मन्तः ७४ श्रभिद्यवात्मक पक्षभाव ७५ घृताची- पद, और श्रग्निवीर्य्यात्मक-अन्नादवीर्य्य ७६ मन्त्रोपात्त अत्यन्त रहस्यपूर्ण-' घृताची ' पद ७७ पुरातन मानुषेतिवृत्त के द्वारा ' घृताची ' पद का समन्वयोपक्रम १३७८ वेदशास्त्र सम्मत मानवेतिवृत्तों का सर्वात्मना समर्थन 21 " " " " 33 " " " 23 " " " " " १५.६

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड १३७६ – स्वयम्भू ब्रह्मा के मानसपुत्र ' विवस्वान् ' १२८५ | १४०२ - ' तन्त्वा घृतस्नवीमहे ' का उच्चारण, ८०- सूर्य्यवंश के आदिप्रवर्त्तक विवस्वान् ८१ - विवस्त्रान् के श्रद्धादेव, और यम नामक पुत्र ८२ - वैवस्वतमनु का संस्मरण ८३ - मनुर्वैवस्वतो राजेत्याह, तस्य मनुष्या विशः ( प्रजा: ) " 99 ८४ - भारतवर्ष के प्रथम सम्राट - श्रद्धादेवमनु ८५ - उत्तरकुरुक्षेत्र, और प्रथमसम्राट् की आवास भूमि 19 93 सम्बन्धाभाव ८६- प्रथम सम्राट का भारत से साक्षात्-८७ - प्रथमसम्राट के इक्ष्वाकुप्रमुख - दस पुत्र, एवं ' इला ' नाम की कन्या - सूर्यवंशवर्त्तक- भारतीय - सम्राट् - इक्ष्वाकु - चन्द्रवंशप्रवर्तिका ' इला ' ६० - सूर्यवंशोत्पन्न महाराज- ' निमि ' ६१ - विदेहराज्य, और अयोध्याराज्य का अभेद ६२ - अयोध्याधिपति वसिष्ठ - महर्षि कुलपुरोहित ६३ - निमि के यज्ञिय पुरोहित - महर्षि - गोतम ६४ - पारस्परिक अभिशाप, और निमिकी मावशेषता १२८६ 39 " 13 " " 13 ५- मन्थन के द्वारा निमिका पुनरुज्जीवन ६६ - मन्थनानुगत मिथिभाव " " " ६७ - मिथिभावानुवन्धी ' माथव ' शब्द ६८ - ' विदेष- माथव ' 93 EE - विदेह माथव की भीषण प्रतिज्ञा, और स्वतन्त्र - राज्य संस्थापन संकल्प १४००- अग्निदेव का मुखरूप आहवनीय में स्तम्भन, और अयोध्या का परित्याग 19 १ - पुरोहित - गोतम की सम्बोधन परम्परा, और विदेह माथव का मौनवत १२८७ १५७ और माथव के मुख में अग्निका प्रज्वलन ३ - श्रग्निप्रज्ज्वलनस्थान, और विदेह का स्वतन्त्र राज्यनिर्माण ४- सदानीरा पय्यन्त व्याप्ति विदेहराज्यकी ५- सरस्वती क्षेत्र, और सदानीरा ६ - करतोया - सदानीरा - बाहृदा - नदी ७- शङ्ख, और लिखित के धर्मानुबन्धी-पावनचरित्र का संस्मरण ८- कुरही, और गण्डकी ६- करतोया विलंघनात् रूपा प्रायश्चित्तसीमा १०- कौसलविदेहों की मध्यसीमा 21 ११- पुरोहित गोत्रानुबन्धी - क्षत्रियो वैवाहिक सम्बन्ध १२८७ II " " " १२८८ के १२ - विदेह देश, और याज का तिरहुत १३ - मिथिमथु माथ, और मैथिल १४- श्राख्यान के संक्षिप्त स्वरूप का विराम 11 १५ - ' घृताच्या ' पद, और अग्नि में प्रचण्ड-वीर्य का प्रधान १६- ' वीर्य्यमेवास्मिन् दधाति ', और महत्वपूर्ण - घृताची- पद का समन्वयो-पराम १७ - ' देवाजिगाति सुम्नुयुः ' मन्त्रभाग का पारिभाषिक - समन्वय १८ - अग्नि का महत्त्व - प्रतिपादन १६- अनिरुक्तभावापन्ना त्राग्नेयी - ऋचा २० - श्रनिरुक्त - भावोपपत्ति " 19 19 29 १२८६ २१- ' वीतये ' पदानुगत - रहस्यार्थ का उपक्रम 23 २२ - लोक सम्पत्ति के मूलाधिष्ठाता - परमेष्ठी " " २३- पांयनकर्मोपपत्ति का संस्मरण " १४२४ – ' प्राणा वा आप: ', और ' आपो वै प्राण: ' " 21 29 १२६०

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१४२५- ' श्राषोमयः प्राणः ' २६ - ' वागेव साऽसृज्यत ' २७- श्रम्भः - मरीची- मरः - श्रापः - का संस्मरण २८- अपतत्त्व की सर्वव्याप्ति के सम्बन्ध श्रुतिवचन २६- आपोमय परमेष्ठी के सुप्रसिद्ध मनोता-भृगु, और अङ्गिरा ३० - पारमेष्ठ्य - समुद्र में अभिव्याप्त अग्निपुञ्जरूप - ' धूमकेतु ' ३१ - सहस्र- धूम केतु ( टि ० ) ३२ ( क ) - महस्रमपरे वदन्ति केतूनाम् ( टि ० ) ३२ ( ख ) - किरण- वक्रशिव - विशिष्त्र ब्रह्मदण्ड-विकच तस्कर - श्रादि धूमकेतु " ३३ - एक धूमकेतु के द्वारा एक रोदसी-त्रिलोकी ( सौरब्रह्माड ) की अभिव्यक्ति 21 ३४- धूमकेतुरूप अग्निपुञ्ज का प्रथम-वर्ण्य, और तद्द्वारा सूर्यम्वरूप की अभिव्यक्ति ३५ - सत्य - अग्निपिण्ड की अभिव्यक्ति ३६ - गतिशील - धूमकेतु ३७ - धूमकेतु से उत्पन्न सूर्य्य का स्वस्थाने-गतिशीलत्त्व एवं परमेष्ठी के परितः सूय्यं का परिभ्रमण ३८ - सौरझाएड से पूर्वा - स्थिति का संस्मरण ३६- ऋत- पारमेष्ठ्य - समुद्र में प्रचण्डवेग से परिभ्रममाण- गतिशील धूमकेतुरूप अग्निपुञ्ज ४० - गतिविभेदानुगत घूमकेतु ४१ - प्रतिबिन्दु गति का पारिभाषिक - वैषम्य, और गतिशील धूमकेतु ४२ - केन्द्रानुगत - गतिवैषम्य से अनुप्राणिता समानगति १४४३ - घटिकायन्त्रोदाहरण के माध्यम से वस्तुस्थिति का अंशतः स्वरूप- समन्वय विषयसूची १२६१ 22 " 99 II " 27 १५८ १४४४ - सत्यभावशून्य - ( केन्द्र रहित ) ऋताग्नि-पुञ्जरूप धूमकेतु की सहज स्थिति का संस्मरण ४५ - सूर्य के उपग्रहों का सममण्डलात्मक परिभ्रमण ४६ - अग्निपुञ्जरूप धूमकेतुओं का विषम-मण्डात्मक- परिभ्रमण ४७ - त्रिंशत् सहस्रवर्षावधि से अनुप्राणित-धूमकेतु - परिभ्रमणकाल ४८ - केन्द्रविरहित धूमकेतु का परिभ्रमणारम्भ ४६ - पारमेष्ठ्य वगहवायु के द्वारा संवरण, और व्याप्ति धर्म्म से केन्द्र निर्माण का उपक्रम ५० - श्रग्निपुञ्जखण्डों की प्रवर्ग्यरूप में परिणति ५.१ - प्रवग्यंखण्डों से क्रमश: शनैश्चर-बृहस्पति देवसेनाग्रह ( १०८ ) - मङ्गल -भूपिण्ड - बुध - आदि ग्रहोपग्रहों की स्वरूपाभिव्यक्ति ५२ - केन्द्रस्थित -- अग्निपुञ्ज के श्राधारपर गतवैषम्य से ग्रहोपग्रहों की स्वरूपा-भिव्यक्ति ५३ - सूर्यपुत्र शनैश्चर १२६२ ५४ - विधि के अलातचक्र की परिभ्रमणलीला 30 ५५ - सूर्य से अन्यान्य ग्रहों की उत्पत्ति-परम्परा की उपकान्ति 21 ५६ - पारिपार्श्वक नामक सौरग्रहों का संस्मरण ५७ - यज्ञप्रक्रिया, और विश्वाभिव्यक्ति ५८ - यज्ञप्रक्रियोपराम, और विश्वविलयन ५६ श्रह रागम, और विश्वाविर्भाव ६० - रात्र्यागम, और विश्वति भाव ६१ - ' धाता यथा पूर्व पल्पयत् ' निबन्धन धारावाहिक - सनातन चक्र १४६२ - न विश्वमूर्ते रवथार्म्यते वपुः " " " 37 27 " 1 "

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड १४६३ - दृष्टिपथानुगामी ज्योतिर्मय उपग्रहों का सूर्योपग्रहत्व ६४- श्रनुष्णाशीत - भूपिण्ड की सुर्योपग्रह -स्व के सम्बन्ध में एक विप्रतिपत्ति, एवं तन्निराकरण प्रयास ६५ – स्वज्योति: - प्रज्योति: —रूपज्योति: -श्रज्योति: -भेदेन ज्योतिर्विवत्तों का संस्मरण ६६ - स्वतः - प्रकाशित ज्योतिर्म्मण्डल, और तद्रूप - ‘ स्वज्योति’र्भाव १२६२ 31 23 ६७ - पारिभाषिक - ‘ सूर्य्य ’, और स्वज्योतिः १२६३ ६८ - स्वाती - चित्रा - लुब्धक अभिजित् - आदि स्वज्योतिर्धन - नक्षत्रों का सूय्यत्त्व ६६ - स्वातीरूप सविता ७० - अन्य प्रकाश से प्रकाशित वीघ्र - पिण्ड, और तद्रूप ' परज्योति'र्भाव ७१ - पारिभाषिक ' चन्द्रमा ', और ' पर-ज्योतिः ' ७२ - शनैश्चर के आठ, बृहस्पति के चार, मङ्गल के दो, भूपिण्ड का एक पर-ज्योतिर्मय उपग्रह, और तत्संख्या-नुगत - पारिभाषिक- चन्द्रमा ७३ – वीघ्रधर्म्म की अभिव्यक्ति, और चाक-चिक्य ७४ मृद्भाव की अधिकता, और प्रकाश-रश्मियों के प्रसार का निरोध ७५ - रूप, और ज्योतिः भाव ७६ - रूपात्मक ज्योतिर्भाव और रूप-ज्योतिः ७७ - चतुर्थ - श्रज्योतिर्विभाग का स्वरूप-समन्वय १४७८ - वायु, चन्द्रलोकस्थ गन्धर्वप्राण-अष्टविध चान्द्र- सौम्यजीव आदि का ज्योतिर्म्मयत्त्व " " " १४७६ - पारदर्शकता के प्रतिबन्धक त्रिप्राण का संस्मरण ८० - पृथिवी का पारम्परिक ज्योतिर्भाव, और विप्रतिपत्ति का निराकरण ८१ - ग्रहोपग्रहभाव के माध्यम से संस्मर-णीय - सूर्य्य, और पृथिवी ८२ - सूर्य का प्रारम्भिक महतो महीयान् अलातचक्रत्त्व ८३ - आज के त्रैलोक्य - विभाजन का यार-भ्भ में अभाव, और द्यावापृथिवी का अभिन्नत्त्व ८४ - हस्तस्पर्श - समतुलित - द्यलोकात्मक-सूर्य्य, और प्रारम्भस्थिति का संस्मरण " ८५- ' उन्मृश्या हैव द्य रास ' " " ८६- प्रवर्ग्य - भागानुबन्धा ग्रहोपग्रहभावों का दृष्टिभेद से स्वरूप - समन्वय ८७- प्राजापत्य मन का ज्ञानप्रधानत्त्व १२६३ " " १२६४ II 19 31 29 23 - प्राजापत्या वाक का अथप्रधानत्त्व 33 ,, " " " " " " " " 2 " " 12 - प्राजापत्य प्राण का क्रियाप्रधानत्त्व ६० - प्राजापत्या गति का अर्करूप से बाह्य वितान ६१ – देवगति ( प्राणगति ) के माध्यम से लोकविभाजन ६२ - त्रिसंस्थप्रजापति का संस्मरण ६३- सृष्टिनिमित्तभूत अक्षरप्रजापति ९ ४ - ब्रह्मलक्षणा स्थिति, और इन्द्रलक्षणा गति ६५ - विष्णुलक्षणा श्रागति, और गतिश्रयी से भिन्न हुद्याक्षर - प्रजापति ६६- त्र्यक्षरात्मक एकाक्षरमूर्ति प्रजापति ६७ – ‘ तानेतैरेव त्रिभिरक्षरैव्यनयत् ', और गतित्रयी का समन्वय १४६८ - श्रुति का ' वीतये ' पद, और उसके ' वी ' ' त ' ' ये ' रूप तीन अक्षर १२६५ 19 १५६

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 288 का मूल पृष्ठ
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१४६६ - लोकविज्ञान विज्ञान निधन अन्ना नादविज्ञान का संस्मरण १५०० - देवताओं के द्वारा त्रैलोक्य का निर्माण, और तत्सम्बन्ध में प्रश्न १५०१ प्रश्न समाधानात्मिका ' इतः प्रदाना-झ से उपजीवन्ति ' अति का संस्मरण २- लोकानुगना श्रन्नसम्पत्ति, और तत् प्रदान- द्वारा देवसन्तर्पण ३- पृथिवी अन्तरिक्ष - यी रूप व्यचरा त्मक तीनों लोकों की अन्नानुगता जीवन सत्ता, और ' वीतये ' रूपा श्रक्ष-त्रयी ४- यशसम्पतिरूपा लोकसम्पत्ति का वरी यस्त्व ५- ' भारत ' नामक ब्राह्मण अग्नि से प्रार्थना ६- श्रग्न श्रायाहि वीतये ' का पारिभा षिक समन्वय ७- ' गवानी व्यदातये ' का पारिभाषिक समन्वय ५- ' यजमान ' शब्द का पारिभाषिक अर्थ समन्वय ६ - यज्ञसम्पत्ति के भोला वास्तविक यजमान १० न होता सरिस बर्हिषि मन्त्रभाग का पारिभाषिक समन्वय ११- क्रमप्राप्त तृतीया सामिधेनी चा का पावन संस्मरण १२ - मन्त्रोपात्त ' वाजा ' पाद, और तदुपल-छित त्रिवृत्स्तोमात्मक भूलोक और १५१३ - मन्त्रोपात्त - ' घृताच्या ' पद, तदु-पलक्षित पञ्चदशस्तोमात्मक अन्त रिइलोक विषयसूची १२६५ 39 " " १२६६ १५१४ - मन्त्रोपात - ‘ अभियव ' पद, और तदुपलचित एकविशस्तमात्मक द्युलोक १५ श्रायाहि वीतये ' इत्यादि प्रथ ममन्त्र और पृथिवी का संग्रह १६ तं वा खमिदुमि ० इत्यादि द्वितीय-मन्त्र, और अन्तरिक्ष का संग्रह १७- स नः पृथुश्रवाय्यम् ' इत्यादि तृतीय मन्त्र, और लोक का संग्रह १८ मन्त्रोच ' पद और पार्थिवा ग्निपर्व १६- मन्त्रोपरात ' पुतेन ' पद, और आन्त पर्व २० - मन्त्रोपात्त- ' पृथु ' पद, निर्व १२६६ " और दिव्या-27 २१- मलोको पलक्षित - यज्ञाग्नि का आह्वान, और अग्न श्रयाहि ० ' २२- ' इत एत उदाहन् ' मूलक अङ्गिरा-अग्नि का संस्मरण २२ अधिसम्बभूव २४ अराः सम्बभूव २५- अथ यदङ्गारा अवशान्ताः पुनरुददी-प्यन्त - अथ बृपतिरभवत् २६ - तेजः स्नेह - तत्वों का अन्तर्यामात्मक सम और वस्तुस्वरूपनिष्पति २७- अङ्गिरा के त्रिविध महिमा - विवत्त २८ - भृगु के त्रिविध महिमा - विवत ' २६ - स्नेदलक्षण । भृगुत्रयी का संकोचभाव २०- तेजो - प्रतिरात्रयी का विकास भाव ३१- भृगुत्रयी, और हृदयानुगतित्व ३२- अङ्गिरात्री, और परिध्यनुगतित्व ३३- अङ्गरसात्मक अङ्गिरा १५२४ रिसोऽधीयान ऊर्ध्वंस्तिष्ठति " 17 १२६७ " 19 39 " १६०

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 289 का मूल पृष्ठ
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शतपथब्राह्मण २ बण्ड १५.३५ रोजी निधन मत और प्राण ३६- प्रत्यचदृष्ट अङ्गार, और भूतात्मक २७- भूतप्रतिष्ठारूप तत्त्वभाव, और प्राणा-त्मक अङ्गिरोऽग्नि ३८ - प्राणात्मक अधि ३६. - तत्प्राणपरीक्षक - तद्यशोनामान्वित अङ्गिरा नामक मानव महर्षि का संस्मरण ४० - अन्नागमन से प्राणोद्दीप्ति, और पर-परया संसिद्ध ' मतरक्षा कर्म ४१ - ' समिद्भितम ङ्गिरस ऐन्वत ' का समन्वय ४२ - ' सामिधेनी ' पद का समन्वय २३- समिद्ध अग्नि में वीर्य्याधान, और सामि-धेनीपद ४५ - ' यविष्ठ्य ' रूप अग्नि का प्रातित्विक नाम ४६ - अजर - अमर, अतएव नित्ययुवा यविष्ठ्य-अग्निदेव ४७ - समिन्धन पक्रिया के इतिहास संस्मरण, और मन्त्रार्थ - समन्वय ४८ अन्तरिक्ष लोक - सम्पत्ति का संप YE. - क्रमप्राप्त - चतुर्थी सामिधेनी चा का पावन संस्मरण १२६७ 23 23 " १२६८ " १५५८ - क्रमप्राप्त पञ्चमी सामिधेनी ऋचा का पावन संस्मरण ५६ ताप और अग्नि का प्रातिश्विक चम् ६० प्रकश और इन्द्र का प्रातिश्विक धम्र्म्म ६१- इन्द्रसम्बन्धानुगामी चन्द्रमा ६२ - तापविरहिता चन्द्रिका " ६३ – ताप, और प्रकाश का पृथग्धस्व ६४ - यज्ञाधिपति वृषा - इन्द्र ६५ कृपा इन्द्र से समन्विता यज्ञाग्नि की वृषारूपता का समन्वय ६६ - क्रमप्राप्ता ६ टी सामिधेनीचा का पावन संस्मरया ६७ - अग्नि के अश्वस्वरूप का संस्मरण ६८- इन्द्रयुक्त दिव्याग्नि का अश्वरूपत्व ६६ तरणिकिरणसङ्ग से पानीय - पिण्डात्मक चन्द्रमा के अद्ध भाग की प्रकाशरूप में परिणति १५.७०- सूर्यदिमनुगत दृश्याद भूभाग प्रकाशमयत्त्व ७१ अप्रकाशित शेषाद्ध भाग का ७२ - दिति श्रदिति की स्वरूप स्थिति ७३ - अध्वरवन्त त्रिचोपपत्ति का स्मरण ७४- भूछाया का पारिभाषिक स्वरूप ७५ श्रदितिभाग के अप्रत्यक्ष का समन्वय ७६ - अग्नि के अश्वस्वरूप का इतिहच ७७- अश्वो न देववाइन ' का संस्मरया ७८ - मन्त्रादि में पठित नकार का पारि-भाषिक अर्थ १२६ ९ 17 29 29 29 29 " 23 52 99 " 33 " ५० - इयं श्रयं इदं, और पृथिवीलोक 19 " 99 ७६ - मन्त्रमध्य में पठित इवार्थक नकार " ५१ - एषः, और अन्तरिक्षलोक ५४ - श्रसौ - श्रदः श्रर द्युलोक -५३- पृयु, और य लोक औरद्य ५४ - श्रवणीयद्य लोक ५५ - सर्वसुखैकसाधक द्य लोक ५६ वाव्य - दिव्यलोक १५५७ - सुवीर्य्य लोक " 33 " " १६१ ८०- ' तं हविष्मन्त ईडते ' का संस्मरण ८१ - भावशुद्धि का प्रवत ' के स्तुतिकर्म्म ८२ - ' नम उक्तिं विधेम ' ८३ वाचिकोपासना, और अग्नि १५८४ कम्पासना, और अग्नि " " " " १३.१

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१५८५ - क्रमप्राप्ता सातवीं सामिधेनी चा का पावन संस्मरण ८६ - मन्त्राथ समन्वय ८७- क्रमप्राप्ता आठवीं सामिधेनी - ऋचा का पावन संस्मरण - पार्थिव अग्नि के होतृत्त्व का वैज्ञानिक-समन्वय, और मन्त्रश्रुति ८६ - अन्तःशक्तिरूप प्राणतत्त्व ६० - विविधरूप युक्त ऋषिप्राण विषयसूची १३०१ ६१ - सौर, और पार्थिव प्राणद्वयी का संस्मरण " 1 ६२ - स्वज्योतिर्धन -सूर्य्य, और रूपज्योतिर्धना पृथिवी " ६३ -- देवदेवता, और असुर " 39 " १३०२ ६४ - ' अस्माकमेवेदं खलु भुवनम् ' का संस्मरण,, ६५ तेनेमां सर्वां पृथिवीमविन्दन्त, श्रौर पृथिवी रूपा वेदि ६६ -- देवता, और असुरों की सनातन-स्पर्द्धा से अनुप्राणित क्रान्तिवृत्तीय-परिभ्रमण - विज्ञान ६७ -- ' अश्वो न देववाहनः ' मन्त्रभाग का पारिभाषिक समन्वय ६८ - दिति रहस्यात्मक स्वरूप- समन्वय " " " EE. - अदिति का रहस्यात्मक स्वरूप- समन्वय " १३०३ १६०० - ' प्राजापत्याः पस्पृधिरे ' का संस्मरण १- आज के युग का दुराग्रहात्मक भ्रान्त तर्क, और तन्निराकरण २- भूपिण्ड के तात्त्विक स्वरूप का संस्मरण " ३ - गायत्री और पृथिवी: वै ४- ' या वैसा गायत्री आसीत्, इयं सा पृथिवी ' का रहस्यात्मक समन्वय ५- प्रथयत्, और पृथिवी ६- अदिति, और पृथिवी १६०७ - दिति, और पृथिवी 33 " 1 29 29 23 " १६०८ - देवता, और असुरों के मध्य में प्रति-ष्ठित परिभ्रममाण - भूपिएड का तात्त्विक १६२ समन्वय ६- देवता, और असुरों के द्वारा गायत्री का आह्वान १०- देवताओं के दूत ( प्रतिनिधि ) अग्निदेव " " ११- असुरों के अग्रदूत सहरक्षा " १३०३ 19 १२ - श्रग्नि, और सहरक्षा का स्वरूप- समन्वय " १३ - दिव्यप्राणापेक्षा श्रासुरप्राण की बलवत्ता,, १४ - ज्वालाग्नि की अपेक्षा भस्माग्नि की बलवत्ता १५ -- दैनंदिन गति, और भूपिण्ड का स्वाक्ष-परिश्रमण १६ – उभयप्राणों का समानाकर्षण " " १३०४ १७- उभय - प्राणगतियों में एक की बलवत्ता " १८ - श्राकर्षण बलों की प्रचण्ड - प्रतिद्वन्द्विता 99 १८ देववाकर्षण की बलवत्ता, श्रौर भूपिण्ड का देवप्राण की ओर श्राभिमुख्य २० - असुरों के प्रति भूपिण्ड की उपेक्षा २१ - देवानुगत भूपिण्ड की साम्वत्सरिक-गति में परिणति २२ - इन्द्र, और भूपिण्ड की साम्वत्सरिक गति " " २२- पार्थिवपरिभ्रमण - विज्ञानानुगत - ऋङ-मन्त्र का संस्मरण २३- पश्चिमदिगनुगता - असुर प्राणगति के अनुग्रह से भूपिण्ड का सूर्य्य - गह्वर-प्रवेश अवरोध २४ - पूर्वाकर्धा की प्रचलता के परिणाम २३- इन्द्रप्राणाका का महत्त्व, भूपिण्ड की बिन्दु चिन्दु का पूर्व की और आकर्षण २६ - सर्वत्र - मावापन्न ' सम्वत्सर ' शब्द के 27 39 " १३०५ " " " रहस्यात्मक पारिभाषिक अर्थ का समन्वय, १६२७ - सम्पूर्ण भूपिण्ड का देवमण्डलोपल-क्षित दिव्य आग्नेय - सम्वत्सरानुगतस्त्व " Y