Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 41–50
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 41–50
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड पञ्चावयत्र विश्व की, एवं तद्गर्भीभूता प्रजा की स्वरूप व्यवस्थिति श्रानुपूर्बी से व्यवस्थित है । तीनों हीं तपस्वी हैं, किन्तु तीनों के तपोभावों का स्वरूप सर्वथा पृथक् पृथक् है । ब्रह्मा का तप ' सन्तापात्मक ' है, विष्णु का तप ' ऐश्वर्यात्मक ' है, एवं रुद्र का तप दाहात्मक है । सन्तापात्मक ब्राह्मतप ज्ञानप्रधान है, ऐश्वर्यात्मक तप श्रेष्ठतम - कम्मरूप * यज्ञप्रधान है, एवं रुद्र का तप भूतप्रधान, किंवा अर्थ-प्रधान है | ज्ञान - क्रिया - अर्थ - नाम से सुप्रसिद्धा शक्तित्रयी की अधिष्ठात्री ब्रह्मा - विष्णु - रुद्र - नाम की सुप्रसिद्धा देवतात्रयी से अनुगता तपस्त्रयो का नाम ही ' तपश्चर्या ' है, गैर तन्निबन्धन तपोनाव ही ' तप: ' शब्द का वह चिरन्तन - इतिवृत्त है, जिस के गर्भ में ही इन तीनों तपोभावों का ' वसुधानकोश ' रूपेण समन्वय होरहा है । बड़े डिब्बे में छोटा डिब्बा, छोटे डिब्बे में इस से भी छोटा डिब्बा, इसी दहरोत्तर - सम्बन्ध का पारि-भाषिक नाम है ' वसुधानकोश सम्बन्ध ' । ज्ञानशक्ति - प्रधान ब्राह्म - तप सर्वाधार - सर्वप्रतिष्ठारूप वह महतो-महीयान् तप है, जिसके आधार पर ही आगे के वैष्णव, तथा रौद्रतप स्वस्वरूपेण प्रतिष्ठित रहा करते हैं । ' ब्रह्म वै सर्वस्य प्रतिष्ठा ' - ' यस्य ज्ञानमयं तपः ' इत्यादि श्रुतिवचन इसी ज्ञानमय - ब्राह्मतप का यशोगान कर रहे हैं, जिस के तपन - सन्तपन - रूप सन्ताप - धर्म से ही सृष्टिस्वरूप की अभिव्यक्ति मानी है गोपथब्राह्मण ने अपने उपक्रम में ही - ‘ तस्य तप्तस्य - सन्तप्तस्य ललाटे स्वेदोऽजायत ' इत्यादि रूपेण | लोक में - आज रूढिवाददृष्ट्या ‘ सन्ताप ' शब्द का अर्थ ' शोक - परिताप ' आदि होपड़ा है । किन्तु तत्त्वपरिभाषादृष्ट्या ‘ सन्ताप ’ शब्द का अर्थ है -- वैसा - ग्रात्यन्तिक- प्रचण्ड संघर्ष, जिस का उत्तर परिणाम अवश्य ही ' शान्ति ' है । इसी सन्तपनात्मक प्रचण्ड - संघर्ष का ' संक्लिश्य यप्सु प्राविध्यत् ' इत्यादिरूपेण अभिनय किया जाता है । मुसूक्ष्म-प्रचण्डतम - ज्ञानात्मक श्राभ्यन्तर संघर्ष का ही ज्ञानात्मक, अतएव सुसूक्ष्मतम आभ्यन्तर प्रचण्ड - संघर्ष का ही नाम ' सन्ताप ' है, जिस इस स्वायम्भुव - ज्ञानात्मक - सन्तापधर्म्मा प्रथम तपोभाव का उत्तर - परिणाम है- शान्तिरूप-आपोमय - पारमेष्ठ्य - मण्डल का ग्राविर्भाव, जिस इस स्वेदरूपा शान्तिजलधारा - श्रम्भोधारा - से स्वयम्भू - ब्रह्मा-पुलकित - श्रानन्दित होपड़ते हैं, और श्रानन्दमयी यही सन्तानात्मिका तपोमयी वारिधारा आगे चलकर सम्पूर्ण संसृष्टिरूपा - सृष्टि की जननी बनती है । यही ज्ञानात्मक सन्तापधर्म्मा सर्वप्रतिष्ठारूप वह ' तप ' है, जिस को आधार बनाए बिना आगे के दोनों तप सर्वथा यातयाम ही बन जाया करते हैं । स्वयम्भू - ब्रह्मा के ज्ञान - सन्तपनात्मक परिपक्कज्ञानात्मक - श्रादितप से जो वारिधारा सर्वतः ऋतरूपेण व्याप्त - प्राप्त - परिव्याप्त होगई, वही इस प्राप्तिरूप - व्याप्तिधर्म से ' अपोलोक ' कहलाया, जो- ' परमेष्ठी ' नाम से प्रसिद्ध है, एवं जिस का अधिष्ठाता देव ' विष्णु ' कहलाया है । सन्तापधर्म्मा - ज्ञानीय तप से समुद्भूत वैष्णव- परमेष्ठी - लोक का ऋतधर्म्मा- ' वारि ' रूप ' श्रापः ' तत्त्व अपने स्नेह, तथा तेजोगुण से उभयत्मिक बन रहा है | स्नेहगुणक वही तत्त्व ' भृगु ', कहलाया है, एवं तेजोगुणक वही अपतत्त्व ' अङ्गिरा ' कहलाया है । यों सन्तापात्मक - स्वायम्भुव - ज्ञानीय तप से आविर्भूत वैष्णव प्रापः -तत्त्व का भृग्वङ्गिरोमयत्त्व प्रमाणित हो— नाता है + । स्नेहगुणक - भार्गवतत्त्व ही दाह्यगुणक - सोमतत्त्व है, एवं तेजोगुणक आङ्गिरसतत्त्व ही दाहकगुगणक-अग्नितत्त्व है । * - यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म्म ( शतपथे ) ।
+ - आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् ।
अन्तरैते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसोऽनुगाः ॥
४१ — गोपथब्राह्मणे
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किञ्चिदिव श्राबेदन भार्गव सोम, तथा श्राङ्गिरस अग्नि, इन दोनों दाह्य - दायक तत्वों के रासायनिक- सम्मिश्रण से आविभूत उभयात्मक - अपूर्वभावात्मक तथ्य का नाम ही सिद्धकर्मात्मक- ' यज्ञ ', है, जैसा कि ' अग्नी सोमाहुति-र्यज्ञ: ' लक्षण से स्पष्ट है । पारमेष्ठ्य - विष्णु - अक्षर से अनुगत, स्वायम्भुव ब्राह्म- तप के आधार पर प्रतिष्ठित- भार्गवाङ्गिरस्-अग्नीषोमात्मक - प्रकृतिसिद्ध इत्थंभूत प्रथमयज्ञ से ही उस ऐश्वर्य की स्वरूपाभिव्यक्ति हुई है, जिसका सौर-ब्रह्माण्ड में व्यक्त विश्वरूप से आज हम साक्षात्कार कर रहे हैं । विश्वात्मक व्यक्त - ऐश्वर्य पारमेष्ठ्य उस विष्णुदेवता के तप का ही महत्त्व है, जो वैष्णव- श्रापोमय - तप भृगु, और अङ्गिरा के सम्मिश्रणात्मक– अग्नीषोमात्मक - भाव से अनुप्राणित है । इसी मध्यस्थ- वैष्णव- याज्ञिक तप का ब्राह्मणश्रुति ने- ' भृगूणा-मङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् ' रूपेण संस्मरण किया है । यही यज्ञकर्मात्मक - ' कर्म्मशक्तिप्रधान ' वह पारमेष्ट्य-तप है, जिसके द्वारा ही समस्त ब्रह्माण्ड वी अभिव्यक्तिरूप व्यक्त - ' ऐश्वर्य्य ' का वितान हुआ है । अतएव इस ' कर्म्मशक्ति ' घन - भार्गवाङ्गिरस - पारमेष्ठ्य- वैष्णवतप को अवश्य ही ' ऐश्वर्य्यार्थवतप ' मान लिया जासकता है, माना ही गया है । स्वायम्भुव - ज्ञानमय - सन्तापात्मक ब्राह्मतप के आधार पर पोमय पारमेष्ठ्य ऐश्वर्य्यात्मक - वैष्णव- तप की अभिव्यक्ति हुई । तदनन्तर क्या हुआ?, प्रश्न का उत्तर स्पष्ट है । आपोमय- परमेष्ठी - विष्णु के ऐश्वर्य्यात्मक तप से तद्गर्भ में बीजरूप से जिस हिरण्मयाण्ड का स्वरूप निर्माण हुआ अग्नि की चिति सञ्चिति के द्वारा, वही हिरण्मयाण्ड सौरसम्वत्सर ब्रह्माण्ड की वेला कहलाई, एवं तत् केन्द्रवर्ती - ताप- प्रकाश- युक्त ( अग्नि - इन्द्र - समन्वित ) उस प्रचण्डतम भास्वत् - पिण्ड की अभिव्यक्ति होपड़ी, जोकि ज्योतिर्मय पिण्डाएट आज अस्मदादि सर्व-साधारण की भाषा में ' त्रयीमय - त्रिगुणमूर्ति भगवान सूर्य्यनारायण ' नाम से प्रसिद्ध है, जिस इस क्षात्रतेजोमय ( प्रचण्ड तेजोमय ) सूर्य्यं का ही व्यक्त विश्व में एकाकी असपत्न साम्राज्य है । यही महर्षि श्वेताश्वतर की भाषा में क्षत्रमूर्ति एकाकी वे रुद्र भगवान् है, जिद्द उपासकवर्ग उभयतो नमस्कार से तुष्ट- शान्त करते रहते हैं । ' एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः ' से उपवर्णित यह सौर क्षत्ररुद्र अपने प्रचण्डतम । ददानधर्म से आदित्य नाम से, रुद्धभावों को द्रुत करने के कारण ' रुद्र ' नाम से प्रसिद्ध होते हुए रोदसीब्रह्माण्ड के भाग्यविधाता ही बने हुए हैं । ऐसे प्रचण्डाग्निमूर्ति इस सौररुद्र को पारमेष्ठ्य देवता अजस्र - सोमाहुति से उपशान्त करते हुए इह्ने – ' शिव ' स्वरूप में परिणत करते रहते हैं - विश्वैश्वर्य्यसंरक्षणकामनयैव । विशुद्ध अध्यात्मक, अतएव-दाहक - वही रूप - घोरवोरतम ' रुद्र ' है, एवं सोमात्मक वही शान्ततमरूप अघोररूप ' शिव ' है । यो॑ रुद्र ही रुद्र, और शिव, नामक द्विविध - महिमा भावों में परिणत हो रहे हैं, एवं यहीं बात कुछ समझने जैसी है । सौर - क्षत्र - रुद्र - का स्वरूप - निर्वचन करते हुए श्रुति ने कहा है – ' सोऽरोदीत्, तद्रुद्रस्य रुद्र-स्त्वम् ', जिस निर्वचन का निष्कर्षार्थ यही है कि, रुद्र का प्रातिस्विकधर्मा - वह प्रचण्ड ' दाइ ' ही है, जिसका उदर्क - रोदनकर्म्म ही माना गया है । रोदनधर्मात्मक रुद्र की दाहकता ही विश्वैश्वर्य की अन्यतमा विधातिन ) मानी गई है । अर्थात् जहाँ, जिस क्षेत्र में विशुद्ध - निष्कैवल्य - दाहकधर्मा - रुद्र का ही प्राधान्य होजाता है, वहाँ रोदन - शोक - परिताप - ऐश्वर्य्य - विनाश के अतिरिक्त और कुछ भी तो शेष नहीं बचता । रुद्र किस अवस्था में रोदनरूप नाशधर्म के प्रवर्त्तक जनते हैं?, प्रश्न का उत्तर है - वैष्णव- भार्गवाङ्गिरस - ऐश्वर्यार्थक - पारमेष्ठ्य तपोभाव से पृथक रहने वाले निष्कैवल्य - रुद्र । यदि रुद्र के साथ पारमेष्ठ्य - ऐश्वर्य्यप्रवर्तक - यज्ञात्मक - कर्म समन्वित होजाता है, तो वे ही रुद्र अपनी दाहकता का परित्याग करते हुए ' शिवस्वरूप ' में परिणत होजाते II
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड हैं, और वैष्णवतपोयुक्त सौर रुद्र रुद्रत्व से शिवत्व में परिणत होते हुए ऐश्वर्य्यविनाश - विरोध के स्थान में ऐश्वर्य्य - संग्रह - संरक्षण में ही प्रवृत होजाते हैं । और यही सौररुद्रानुगत - तपोभाव का दाहार्थक वह चिर-न्तन इतिवृत है, जिसके प्रसङ्ग से ही यहाँ शिवस्वरूप का प्रसङ्ग भी समुपस्थित होपड़ा है । उक्त सन्दर्भ के आधार पर हमें अत्र इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा कि, संयती नाम की ब्राह्मी-त्रिलोकी के अधिष्ठाता श्रव्यक्तमूर्ति - ज्ञानप्रधान –स्वयम्भू ब्रह्मा, क्रन्दसी नामकी वैष्णवी - त्रिलोकी के अधिष्ठाता व्यक्ताव्यक्तमूर्ति कर्मप्रधान - परमेष्ठी - विष्णु, एवं रोदसी नाम की सौरी - ( ऐन्द्री ) - त्रिलोकी के अधिष्ठाता व्यक्तमूर्ति - अर्थप्रधान - भूतप्रधान - रुद्र, इन तीनों अक्षरदेवताओं की क्रमानुगता ज्ञान - क्रिया-अर्थ - नाप की तीनों शक्तियों से अनुगत, सन्ताप - ऐश्वर्य - दाह - भावनिबन्धन - त्रिविध- तपोभाव ही- ' तपः ’ शब्द का संकलनात्मक - वह - चिरन्तर - इतिवृत्त है, जिस का अथर्व संहिता में क्रमशः विस्तार से स्वरूप -स्पष्टीकरण हुआ है * | सन्तापार्थक तप ब्राह्मतप है, एवं यह ज्ञानप्रधान तप है । ऐश्वर्य्यार्थिक तप वैष्णवतप है, एवं यह कर्म्मप्रधान तप है । तथा दाहार्थक तप सौर - रौद्र - तप है, एवं यह अर्थप्रधान तर है । इस प्रकार तपोभाव सर्वथा विभिन्न तीन सृष्टिधारात्रों में विभक्तरूपेण व्यवस्थित होरहा है । नात्मक - ब्राह्म तप को आधार बनाए बिना कम्र्मात्मक वैष्णवतप सर्वथा निरर्थक है, एवं वैष्णवतप को आधार बनाए बिना अर्थात्मक रौद्रतप सर्वथा व्यर्थ है । इसी तथ्य के आधार पर पर हमें इस निष्कर्ष पर भी स्वत: ही पहुँच जाना पड़ता है कि, ज्ञानात्मक तप के आधार पर प्रतिष्ठित कम्र्मात्मक तप ही अर्थात्मक तप की स्वरूप प्रतिष्ठा है । ज्ञानशक्ति से समन्वित -सन्तापार्थक स्वायम्भुव ब्राह्मप का संग्राहक ‘ तपः ’ शब्द, क्रियाशक्ति से समन्वित - ऐश्वर्य्यार्थक पारमेष्ठ्य वैष्णवतप का संग्राहक ' तप ' शब्द, एवं अर्थशक्ति-से समन्वित - दार्थक - सौर - रौद्रतप का संग्राहक ' तप: ' शब्द, तीनों स्वरूपतः - श्राकारतः - श्रभिन्न- प्रतीत होते हुए भी अपने धातु - प्रकृति - प्रत्ययानुबन्ध से सर्वथा विभिन्न हैं, और इस विभिन्नता का श्रेय है शब्दशास्त्र के द्रष्टा शब्दविज्ञान साक्षात्कर्त्ता भगवान् - पाणिनि की एतदनुबन्धिनी सुप्रसिद्धा उस धातुत्रयी को, जिस में-' सन्ताप ' - ‘ ऐश्वर्य्य ’ – ‘ दाह ' अर्थों के संग्राहक विभिन्न तीन धातुओं का ही संग्रह हुआ है । ' तप सन्तापे ' - ' तप ऐश्वर्ये ' - ' तप दाहे ' रूपेण । सन्तापार्थक तप से अनुगत ' तपः ' शब्द स्वायम्भुव - ज्ञानप्रधान ब्राहा तप का ही संग्राहक है, तो ऐश्वर्य्यार्थ तप धातु से समन्वित ' तपः ' शब्द पारमेष्ठ्य - क्रियाप्रधान - वैष्णावत का ही संग्राहक है, एवं दाहार्थक तपधातु से निष्पन्न ' तपः ' शब्द सौर-प्रधान - रौद्रतप का ही अनुग्राहक है, और यही ' तपः ' शब्द की वह संक्षिप्ततमा पारिभाषिकी विभक्ता रूपरेखा है, जिस के समन्वय के बिना केवलभावेन गृहीत ' तप'- ' तपस्या ' - ' तपश्चर्य्या ', आदि लोकानुत्रन्धों से अर्थ के स्थान में उसीप्रकार अनर्थ ही सम्भावित बन जाता है, जैसे कि ब्राह्मतप, एवं - वैष्णवतप से प्रात्यन्तिकरूपेण पराङमुख, निरपेक्ष आजका ' तपस्यानुगत ' तपः शब्द अर्थ के स्थान में अनर्थ का ही जनक बनता रहा है | कथमिति चेत् १, श्र ूयताम्! अत्त्वा चाप्यवधार्य्यताम्!! तथोक्त त्रिविध देवानुगत - त्रिविध- तपोभाव ‘ त्रिःसत्या वै देवाः ' इत्यादि पारिभाषिक - अनुगम - सिद्धान्त के अनुसार आधिदैविक - अध्यात्म- अधिभूत-प्रकरण * -देखिए - ‘ दिग्देशकालस्वरूपममांसा ' नामक निबन्धान्तर्गत आथर्वण- कालसूत्र का समन्त्रय-II
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किञ्चिदिव- श्रावेदन भेदेन तीन संस्थानों के साथ समन्वित हो रहे हैं, जिन में से प्रकृत में मानवसंस्थानुप्राणिता अध्यात्मसंस्था की दृष्टि से ही तत्प्रासङ्गिक प्रश्न का समाधान - प्रयास - समीचीन होगा । मानव के अध्यात्म में आत्मसमन्विता, अतएव समभावापन्ना - समत्त्व - योगान्विता - ' सत्त्त्रबुद्धि ' स्वायम्भु - ब्राह्मतप की अभिव्यक्ति का क्षेत्र माना गया है । इत्थंभूता बुद्धि से समन्वित, बुद्धि से नियन्त्रित, श्रतएव - सहजरूपेणैव सत्त्वगुणान्वित ' सर्वेन्द्रिय ' नामक ' प्रज्ञानमन ' ही पारमेष्ठ्य - वैष्णव - तप का अभिव्यक्ति क्षेत्र माना गया है । और ऐसे प्रज्ञानमन से अनुगता ' सुरुचि ' से समन्वित ' शरीर ' ही सोर - रौद्र तप की अभिव्यक्ति का क्षेत्र माना गया है, जो रौद्र-दाहात्मक - शारीरक - तप - पूर्व - कथनानुसार पारमेष्ठ्य - ऐश्वर्य्यत्मक तपोभाव से समन्वित होता हुआ । ' शिवरूप ' में ह्रीं परिणत रहता है । तदित्थं बुद्धितन्त्रानुवर्ती सन्तापात्मक ज्ञानशक्ति से समन्वित ब्राह्मतप, मनस्तन्त्रानुवर्ती - ऐश्वर्य्यात्मक-क्रियाशक्ति से समन्वित - वैष्णवतप एवं शरीरतन्त्रानुवर्ती शिवभावात्मक अर्थशक्ति से समन्वित शैक्तप, इन तीनों तपों की ' एकत्र ' समन्वयमूर्ति मानवश्रेष्ठ के इस समन्वयात्मक तपोऽनुष्टान से निश्चयेन ऐहिक, तथा । मुष्मिक सभी पुरुषार्थ अन्वर्थ प्रमाणित होते रहते हैं क्या, होते रहते थे उन पुरातन -युगों में, जिनमें ज्ञानात्मक ब्राह्मतप ही सर्वप्रधान था, तदाधार पर कम्र्म्मात्मक वैष्णुवतप प्रतिष्ठित था, और उदाधार पर प्रतिष्ठित दाहात्मक तप को भी शिवभाव में हीं परिणत होजाना पड़ता था । और आज.१ और आन १, इस प्रासङ्गिक प्रश्न का भी समन्वय कर लीजिए । ब्राह्मतपोरूपा ज्ञानचर्य्या श्राज सर्वथैव अभिभूता प्रमाणित होचुकी है, किंवा बलपूर्वक ज्ञानोपासना को ' उपेक्षा ' की कोटि में ला खड़ा किया है । मनोऽनुगता यज्ञात्मिका - कर्म्मपद्धति का स्थान भी दिग्देशकालानुगत -सामयिक - यथेच्छ - काल्पनिक - कम्मोनें श्रात्यन्तिकरूपेण अपहृत कर लिया है, और शेष रह गया है शरीरानुबन्धी वह दाहात्मक तप, जिसे मान की भाषा में - ' श्रम ' कहा जासकता है । अवश्य ही उस ' श्रम ' का ' पाणि ' रूपेण भगवान् वेदव्यास ने मुक्तकण्ठ से यशोगान ही किया है, जिस श्रमरूप - पाणिसमन्वित - शारीरिक तप को मनोबुद्धिनिबन्धन परिश्रमाश्रमभाव शिवभाव में परिणत किए रहते हैं । किन्तु ज्ञानरूप आश्रम एवं यज्ञरूप मानसिक परिश्रम से वञ्चित केवल शरीरतपोरूप श्रम तो विशुद्धा वैसी रुद्रविभूति ही मानी गई है, जिसका परिणाम - ' सोऽरोदीत ' के अतिरिक्त और कुछ भी तो नहीं है । भगवान् करे! भारतीय मानव अपनी इस केवल भमात्मिका - तपोवृत्ति के तथाविध भीषण - परिणाम को लक्ष्य बनावे, एवं तत्परित्राण के लिए श्रुति स्मृति - पुराणादि श्रार्षशास्त्र सिद्ध-यज्ञात्मक - ऐश्वर्य्यसंसाधक मानसिक परिश्रमानुबन्धी पारमेष्ठ्य तप को, एवं तत्प्रतिष्ठा रूप - बुद्धयनुगत-आश्रमानुबन्धी- स्वायम्भुव तप को अपने शारिरिक श्रमरूप तप की प्रतिष्ठा बनाता हुआ अभ्युदय - निःश्रेयस का भोक्ता प्रमाणित हो, इसी मङ्गलकामना के साथ ' दसवें - कर्म्म ' ( १० ) से सम्बद्ध ' तप ' शब्द का संक्षिप्त-चिरन्तन- इतिवृत्त उपरत होरहा है । १० ( १ )
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श्रीः ( ११ ) - पिष्टेनोदकमिश्र तन -पुरोडाशसम्पादनात्मक - कर्म्मप्रसङ्गतः -समन्विता - प्रासङ्गिकी ' वषट्कार ' - शब्द - निबन्धना - परिभाषा २ वैदिक-क - सृष्टिविज्ञान के गरिमा - महिमामय - प्राङ्गण में ' वौक् - षट् ' - ' वौषट् ’ – ‘ वाक् - पट् ' श्रादि विभिन्न भावों से अनुप्राणित सुप्रसिद्ध - ' वपट्कार ' शब्द का भी एक विशेष ही महत्त्व सुप्रतिष्ठित है । वस्तुस्थिति तो कुछ ऐसी है कि - ' वषट्कारात्मिका बाक्लाहस्री - विद्या ' के आधार पर ही वैदिक विज्ञान का गरिणत - सिद्धान्तात्मक– ज्योतिष्चक्र - निबन्धन ( खगोलीय ) समन्वय सुव्यवस्थित, एवं प्रतिष्ठित है । जिसप्रकार वर्त्तमान भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में गणितानुगत - भावों का ' मील ' नामक परिमाण - विशेष के आधार पर समन्वय किया जाता है, तथैव भारतीय - वौदिक - विज्ञान से सम्बन्ध रखने वाले सापेक्ष - दूरत्त्व - श्रादि का व्यवस्थापनसूत्र वषट्कारात्मक वह साहस्री भाव ही है, जिसके पारिभाषिक सहस्र प्राणात्मक - गौतत्त्व- के माध्यम से ही तद्द्व्यवस्थाओं का नियमन हुआ है ऋषिप्रज्ञा के द्वारा । अतएव मानना पड़ेगा कि, वषट्कारा-नुगता, किंवा वषट्कारात्मिका वाक्- साहली - विद्या के पारिभाषिक - समन्वय के बिना वेदानुगत किसी भी सृष्टि-विज्ञान का यत्किञ्चित् भी समन्वय सम्भव नहीं है । प्रस्तुत ११ वें कर्म में प्रसङ्गतः वाक्साहस्री - विद्या से अनुगत उस महत्त्वपूर्ण ‘ वषट्कार ' शब्द के ही पारिभाषिक - तथ्य का स्पष्टीकरण - प्रयास हुआ है, जिसका अत्र दो शब्दों में संस्मरणमात्र कर लिया जाता है उदाहरणधियैव । स्पृश्य - पिण्डात्मक प्रत्येक भौतिक वस्तुपिण्ड पञ्चमहाभूतात्मक है । अर्थात् गुण - अणु - रेणु - भूत-नामक पूर्णस्थ इन चार वर्गों के क्रमिक - पञ्चीकरण से अन्ततः स्थूलरूप में परिणत, अतएत्र ' महाभूत ' इस पारिभाषिक नाम से समन्वित आकाश - वायु - तेज - जल - मृत् - इन पञ्च पञ्चीकृत भावों के अन्तर्य्यात्मक एकत्र समन्वय से ही प्रत्येक वस्तुपिण्ड का स्वरूप निर्माण हुआ है । पाँचों ही पञ्चीकृत हैं । अतएव पञ्चीकृत पाँचों से क्रमश: पाँच जातियों के ही वस्तुपिण्डों की अभिव्यक्ति हुई है इस पाञ्चभौतिक - महा - विश्व में, जिसकी प्रकृति इस पञ्चभावानुबन्ध से ही ' पञ्चपर्वा ' नाम से प्रसिद्ध हुई है, जैसा कि - ' पञ्चपर्वामधीमः ' इत्यादि श्वेताश्वतरवचन से प्रमाणित है । पञ्चमहाभूतात्मक पञ्चीकृत पांचों भौतिक - पिण्डो में एक एक महाभूत तो प्रधान है, एवं शेष चार चार महाभूत गौण हैं । श्रुतएव - वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वाद: ' के अनुसार पञ्चात्मक भी प्रत्येक भूतपिण्ड प्रसिद्ध होता है उस प्रधानभूत विशेष भूत के नाम से ही, जो तत्संस्था की पञ्चीकरणप्रक्रिया की आधारभूमि बना रहता है | एवं इस दृष्टि से अक ( पिण्ड - वायुपिण्ड - तेजः पिण्ड - जलपिण्ड --मृतपिण्ड -- प्रधानत्त्वेन ४५
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किञ्चिदिव आवेदन पाँच महाभूतात्मक वस्तुपिण्ड अभिव्यक्त होरहे हैं इस पाक ( पञ्चावयव ) विश्व में, जो पाँचों पिण्ड क्रमशः स्वयम्भूपिड ( श्राकाशात्मा ), परमेष्ठीपिण्ड ( वाय्वात्मा ), सूर्य्यपिण्ड ( तेजोमय ), चन्द्रपिण्ड ( जलीयपिण्ड ( १ ) ), एवं भूपिण्ड ( मृतपिण्ड ), इन नामों से वैदिक - सृष्टिविज्ञान में सुप्रसिद्ध हैं । पाँचों ही पिण्ड ( प्रत्येक ) पञ्चीकरण के सम्बन्ध से यद्यपि पञ्चात्मक हैं । तथापि प्रधानत्त्वेन पाँचों आकाशादि प्रधान अभिधाओं से ही समन्वित होरहे हैं । उक्त पाँचों महाभूतों में सर्वादिभूत आकाशभूत ' ही वह मौलिक भूत है, जिसके बलानुगत - रन्थिबन्धन से ही शेष वाय्वादि चारों महाभूत अभिव्यक्त हुए हैं । आकाशभूत का उत्तर परिणाम वायुभूत है, तदुत्तर परिणाम तेजोभूत है, तदुत्तर उदर्क जलभूत है, और सर्वान्त का परिणाम मृद्भूत है । अतएव मानना पड़ेगा कि - पाँचों हीं भूत आकाशभूत से अभिन्न बनते हुए श्राकाशात्मा ही हैं, अवकाशमय ही हैं । और यह श्राकाशतत्त्व अत्यन्त ही रहस्यपूर्ण है वैदिक - सृष्टिविज्ञान का, जिसके स्वरूप - समन्वय के आधार पर ही वैदिक - भूत भौतिक विज्ञान सुसमन्वित है ( २ ) । तत्त्वात्मक नित्यकूटम्थ - जिस पीरुषेयवेद का पूर्वप्रकाशित शतपथ - प्रथमखण्ड के कृष्णमृगचर्म्मप्रकरण में विस्तार से स्वरूप - विश्लेषण किया गया है ( देखिए प्रथमक । एडानुगत प्रथमखण्ड - पृष्ठ सं ० ४६५ से ५३६ पर्य्यन्त ), उस सृष्टिमूलभूत तत्त्वात्मिका त्रयीविद्या का सुप्रसिद्ध ' यज्ज ' वेदात्मक - ' यजुर्वेद ' ही आकाश का स्वरूप- परिचायक है । गतिप्रकृतिक प्राणभाव ही ' यत् ' है, एवं स्थितिप्रकृतिक वागभाव ही ' जू ' है, और इत्थंभूत - गति - स्थिति - रूप प्राण - वाग्भावों को समन्वितावस्था ही ' यज्ज ' है, जिसे परोक्षप्रिय महर्षि -' यजुः ' कहा करते हैं, जो कि वयोरूप यजुः ऋक्सामरूप क्योनाध से छन्दित रहता हुआ ' छन्दोवेद ' नाम से प्रसिद्ध है स्पष्ट है कि, प्राणानुगत वाग्भाव ही ' जू ' है, और इसीका लोकव्यावहारिक नाम है - ' आकाश ' । ( ३ ) वागुरूप आकाश में कम्पन उत्पन्न कर देने वाला प्राणरूप यद् भाग ही ' श्वा ' नामक मघवेन्द्र है । अतएव जूरूपा आकाशात्मिका ' वाक् ' को श्रुति ने इन्द्रपत्नी माना है ( ४ ) । इन्द्रात्मक - यत् - प्राण से अनु-( १ ) - तरणिकिरणसङ्गात् - एष पानीय - पिण्डः | दिनकर दिशि चञ्चच्चन्द्रिका मिश्चकास्ते ॥ - सिद्धान्ततत्त्वविवेक ( २ ) यह संस्मरणीय है कि, वर्त्तमान भूतविज्ञान की दृष्टि में आकाश नामक कोई तत्त्व नहीं है । प्रकाशित निबन्धों में यत्र तत्र इस भ्रान्ति का निराकरण कर दिया गया है । ( ३ ) - जूराकाशे सरस्वत्यां पिशाच्यां यवने स्त्रियाम् ( कोशवचन )
- वाचं देवा उपजीवन्ति बिश्वे वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः ।
वाचमा विश्वा भुवनान्यर्पिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी ॥
तैत्तिरीय ब्राह्मण ४६
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ग्रहीता इन्द्र- पत्नीरूपा - ' जू ' रूपा वाक् ही वह श्राकाशतत्त्व है, जिसकी मर्त्यचलानुगता चिति - संचिति से ही उत्तर की भूतचतुष्टयी अभिव्यक्त हुई है, जैसा कि तैत्तिरीयोनिषत् की सृष्टिविद्या में विस्तार से निरूपित है । वहाँ बतलाया गया है कि, ग्रात्मा से आकाश सम्भूत है, इससे वायु, वायु से तेज, तेज से जल, एवं जल से मृत् नामक अन्तिम महाभूत अभिव्यक्त हुआ है * । प्रश्न यही है कि, तैत्तिरीयश्रुति का ' आत्मा ' कौन है? । प्रश्न का समाधान है - सृष्टिसाक्षी वह मनः प्राण - प्रधान सृष्ट्यन्मुख विश्वात्मा, जिसकी अधिष्ठान भूमि मुक्ति-साक्षी आनन्द - विज्ञान - प्रधान - मुक्त्युन्मुख वह विश्वातीतात्मा ही बना हुआ है, जिसका उपनिषदोंनें - नेति नेति रूपेण यशोगान किया है । श्रानन्दघन - विज्ञानमनोरूप - मुक्तिसाक्षी - श्रव्ययात्मा की सक्षी में प्रतिष्ठित मनोऽनुगत प्राण तत्त्व ही वह विश्वात्मा है, जिसका तैत्तिरीय उपनिषत् में - ' तस्माद्वा एतस्मादात्मनः आकाशः सम्भूतः ' इत्यादिरूपेण संस्मरण हुआ है | आनन्द - विज्ञान - गर्भित - मन से अनुगत यत् - रूप- गतिप्रकृतिक— ' एकर्षि ' नामक अप्राणात्मक ' अव्ययप्रारण ' ही तैत्तिरीय का वह पारिभाषिक श्रात्मा है, जिससे जूरूप - श्राकाश-नामक ' वाग् भाव ही सर्वप्रथम अभिव्यक्त होता है । और यों अत्र ' वाक् ' रूप आकाश के समन्वय से श्रानन्दविज्ञानगर्भित - मनोऽनुगत प्राणरूप आत्मा की स्वरूप - व्याप्ति वागाकाश पर्य्यन्त होजाती है । अतएव बृहदारण्यकश्रुतिने सृष्टिसाक्षी आत्मा का अन्ततोगत्वा - ' स वा एष आत्मा वाङमयः प्राणामयो - मनोमयः ' यही लक्षण मान लिया है, जिसका अर्थ है - " श्रानन्दघन - विज्ञान गर्भित मन: - प्राण - वाङमय- सृष्टिसाक्षी तत्त्वविशेष ", जिसका स्वयं तैत्तिरीयने भी ' पञ्चकोशविद्या ' के माध्यम से विस्तार से यशोगान किया है । तथोक्ता प्रासङ्गिकी पञ्चभूतसृष्टि के माध्यम से श्रत्र हमें स्वत एव इस तथ्य पर पहुँच जाना पड़ा कि, पञ्चमहाभूतात्मक- विश्व का मूलभूत - ' आकाश ' नामक वह महाभूत ही है, जो - ' जू: ' रूप - स्थितिप्रकृतिक, ‘ वाक् ’ तत्त्व ही है । वागुरूप यह आकाश ही क्योंकि बलग्रन्थि के उत्तरोत्तरभावी क्रमिक संघात से शेष चारों भूतों में परिणत हुआ है, अतएब पाँचों ही भूतों को, किंवा पूर्वोक्त स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य्य - चन्द्र - भूः - नामक पाँचों ही भूतभौतिक - स्पृश्यपिण्डों को ' वाङ्मयपिण्ड ' मान लिया जासकता है । यही आकाशात्मिका मनः-प्राणगर्भिता - वाक् की सर्वभूतव्याप्ति का संक्षिप्ततम निदर्शन है, जिस के आधार पर ही ' वाचीमा विश्वा भुवनान्यपिता ' - ' अथो वागेवेदं सर्वम् ' इत्यादि निगम व्यवस्थित हुए हैं । यही आकात्मिका विश्वव्याप्ता सर्वरूपिणी सर्वात्मिका वाग्देवी उम प्रस्तुत ' वषट्कार ' शब्द के चिरन्तन - इतिवृत्त की आधारभूमि बनी हुई है, जिस के माध्यम से ही हमें अत्र तन्निबन्धना वाक्सहस्री का दो शब्दों में स्मरणमात्र कर लेना है । ' बाकू ' शब्द का रहस्यात्मक अर्थ है ' मनः प्राण- गर्भित तत्त्वविशेष ' । अर्थात् उ स तत्त्व का ही नाम ' वाक् ’ है, जिस के गर्भ में मन, और प्राण प्रतिष्ठित हैं । तभी तो बृहदारण्यकोक्त मनः प्राणवाङ्मय - लक्षण श्रन्वर्थं प्रमाणित होता है । किस आधार पर, कैसे ' वाक् ' का अर्थ " मनः प्राणगर्भिततत्त्व " होगया?, प्रश्न का समाधान वैदिक - विज्ञानानुगता अक्षरवर्णनिबन्धना अत्यन्त रहस्यपूर्णा उस ' संकेत विद्या ' " * -तस्माद्वा - एतस्मादात्मन श्राकाशः सम्भूतः, आकाशाद्वायुः, वायोरग्निः, अग्नेरापः, अद्द्भ्यः पृथिवो ( मृत् ) । ४७ — तैत्तिरीयोपनिषदि
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किञ्चिदिव श्रवेदन पर ही अवलम्बित है, जिस के समन्वयाधार पर ही वैदिक - पारिभाषिक शब्दों का तत्त्वार्थ समन्वित होता है | तद्विद्यानुसार ' मन ' का सङ्केतात्मक नाम है- ' अ ' कार, और प्रारण का साङ्केतिक नाम है. ' उ ' कार । वास्तविक - सहज स्थिति है - मनः प्रारण वाक् ' यह । किन्तु सृष्टिधारा में मध्यस्थ गतिशील प्राण ही प्रथम स्थान ग्रहण कर लेता है । प्राण के गमन से ही तदाधारभूत मन को भी सृष्टिकर्म में समन्वित होना पड़ता है, जैसाकि दैनिक अनुभवों से स्पष्ट है । हमारा सालस मन कर्म की ओर प्रवृत्त नहीं होना चाहता । किन्तु सवितृप्राण २१ प्रबल प्रेरणा से जब हमारा ' प्राण ' बलपूर्वक अनिच्छन्नपि कर्म में प्रवृत्त होपड़ता है, तो हमारा अनिच्छा-भावानुबन्धी मन भी न न करता हुआ भी अन्ततोगत्वा तत्कर्म में प्रवृत्त ही पड़ता है । इसी आधार ऋषि-प्रशाने- " चरँ वेति - चरैवेति " रूपेण प्राणव्यापार के प्राथम्य को ही कम्र्म्मसिद्धि का प्रमुख द्वार माना है । अतएव स्पष्ट है कि- ' मनः- प्रारण - बाक् ' रूप सहज भी क्रम सृष्टिकर्मानुगति में प्राण को प्रथम स्थान देता हुआ ।- ‘ प्राण – मन – चाक् ' हम रूप में परिणत होजाता है, जिसका सङ्केताक्षरनिबन्धन यही निष्कर्ष निकलता है कि- ' अ ' ( मन ) - 3 ( प्राण ) - बाकू ' के स्थान में ' उ - ( प्राण ) ' अ ' ( मन ) बाकू ' यह क्रम सम्पन्न होजाता है । उकार को ' व ' कार यणादेश होजाता है । ' उ - अ अच ' के स्थान में ' व- अ- अच ' स्थित होजाती है, और दीर्घत्वेन ' ' वाच् ' रूपेण - ' वाक् ' शब्द निष्पन्न होजाता है, जिस का स्पष्टतम यही रहस्थार्थ निकलता है कि, जो तत्त्वविशेष स्वस्वरूपाभिव्याप्ति - प्रसार के लिए उ, और रूप प्राण, तथा मन की सतत याञ्चा करता है, अपेक्षा करता है, प्राणमनोगर्भित वैसा तत्त्रविशेष ही ' उ - अ - अच् ' इस मङ्केताक्षरविधा से ' वाक् ' रूप में परिणत हो रहा है । ऐसा है यह ' वाक्तत्त्व ' और इत्थंभूत मनः प्रासा गर्भित-पाञ्चभौतिक -- वाक्तत्त्व से कृतम्प पाञ्चभौतिक - पञ्च - स्पृश्यपिण्डों का ही है यह वाङमय - चिरन्तन - इतिवृत्त -निकर्ष, जिसे आधार बना कर ही अत्र “ वाक् " निबन्धन " वषट्कार " शब्द का समन्वय अन्वे-ष्टव्य है । पञ्चमहाभूतात्मक – पञ्चपर्वा - महाविश्व के पाँचों हीं विश्वपर्व वाङमय हैं, यह पूर्व - निवेदन से स्पष्ट होजाता है । वस्तुपिण्ड का साङ्केतिक नाम है- ' स्पृश्यपिण्ड ', जिस वाङ् मय - धामच्छद - भूतभौतिक पिण्ड का केवल स्पर्श ही सम्भव है । श्रतएव भूतपिण्ड का हम स्पर्शमात्र ही कर सकते हैं, देख नहीं सकते उसे । तो फिर किसे देखते हैं?, इस रहस्यपूर्ण प्रश्न का उत्तरप्रदान करने वाली दुरधिगम्या विद्या का ही नाम है-' वाक्साहस्रीविद्या ', जिस का अत्यन्त पारिभाषिकी भाषा में ही ऋषिने निम्नलिखित मन्त्र से संस्मरण किया है-महस्रधा पञ्चदशान्युक्या यावद्यावापृथिवी तावदित्तत् । सहस्रधा महिमानः सहस्रं यावद्ब्रह्मविष्ठितं तावती वाक् —ऋक्सं ० || वा को हमने प्राण, तथा मन से समन्वित बतलाया है । मनस्तत्त्व वाङमय विएड के केन्द्र में प्रतिष्ठित रहता है, एवं तदनुगत गतिशील - अधामच्छद प्राणतत्त्व वस्तुकेन्द्र में उक्थरूप से अपनी मूलप्रतिष्ठा सुरक्षित रखता हुआ अर्करूप से पहिले तो वाङमय - स्पृश्यभावनिबन्धन वस्तुपिएड में व्याप्त होता है । अनन्तर इस वस्तु पिएड ( स्पृश्य पिएड ) को केन्द्र बनाता हुआ यही प्रकत्मक प्राण बड़ी दूर पर्य्यन्त अपना एक स्वतन्त्र मण्डल - बनता है, जो मण्डल संख्यानुगति से एकसहस्र - संख्यात्मक मान लिए गए हैं । ४८
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शतपथब्राह्मण २ टण्ड यही चर्हिर्नण्डल प्राणप्रधान मनोवाग्गर्भित वह साहस्री - मण्डल है, जिस का हम मण्डलों के तारतम्य से साक्षात् -. कार तो कर सकते हैं, किन्तु जिस का धामच्छदत्त्वेन हस्तादि से संस्पर्श कदापि सम्भव नहीं है । यही स्पृश्य, और दृश्य का वह श्रान्यन्तिक- पार्थक्य है, जिसका स्वरूपबोध - वाङ मय - वघट्कारविज्ञान के स्वरूप समन्वय पर ही अवलम्बित है । स्पृश्यपिण्ड भी मनः प्राणवाङ मय है, एवं दृश्यमण्डल भी मनःप्राण - वाङमय ही है । अन्तर दोनों में केवल यही है कि, स्पृश्यपिण्ड जहाँ प्राण - मनो - गर्भिता वाक को प्रधान बना रहा है, वहाँ दृश्यमण्डल मनो-वाक् - गर्भित प्राण को प्रमुखता प्रदान कर रहा है । वाक्प्रधान वस्तुपिण्ड ' पिण्ड ' है, एवं प्राणप्रधान वस्तुमण्डल ' मण्डल ' है । स्पर्श पिएड का ही सम्भव है, तो दर्शन मण्डल का ही होता है । मण्डलानुगत - अर्कात्मक प्राण की अवयवात्मिका व्याप्ति की पारिभाषिकी संज्ञा है- ' स्तोम ' ( राशि-स्तूप - ढेर - समूह ) । मनोवागूगर्भित - प्राणतत्त्व ही स्वाभाविक - गतिधर्म से " गौ: " है, जो रूप-मनोवाक्प्राणमय - गौतत्त्व अभिप्लव - पृष्ठ्य - रूपेण दो स्तोमभागों में परिणत रहता है । रश्मिभावात्मिका प्राणसमष्टि ही अभिप्लवस्तोम है, एवं मण्डलभावात्मिका प्राणसमष्टि ही पृष्ठ्यस्तोम है, जिन दोनों रहस्यपूर्ण -प्राणविध - स्तोमों का तत्प्रकरण - भाष्य में विस्तार से स्पष्टीकरण कर दिया गया है । केन्द्र से बहि: परिधि पर्य्यन्त वस्तु पिण्डाकारत्वेन उत्तरोत्तर बृहन्मण्डलों में परिणत होने वाले प्राणमण्डल ही ' पृष्ठ्यस्तो म ' कहलाए हैं, एवं केन्द्र से बहि: परिधि पर्य्यन्त रश्मिरूपेण - सून्यप्रमुख - वितायमान- प्राणसमूह ही ' अभिप्लवस्तोम ' नाम से व्यवहृत हुए हैं, जिन इन दोनों के स्वरूप - समन्वय के बिना वैदिकी - सृष्टिविद्या का समन्वय स्वप्न में भी सम्भव नहीं है । हाँ, तो मनोवाक् - गर्भित - प्राण - रूप गौतत्त्व मण्डलसाहस्री के अनुबन्ध से सहस्र - संख्या में विभक्त रहता है, जिन इन सहस्र - वाङमय - प्राणों की त्रिंशत् - त्रिंशत् ( ३० - ३० ) प्राणराशि से जो एक स्वरूप अभिव्यक्त होता है— उसीका पारिभाषिक नाम है - ' अहर्गण ' । फलतः १००० प्राणात्मक गौतत्त्वों के ३०-३० के अनुपात से ( ६०६० गौतत्त्वों के ) ३३ ( तैतीस ) अहर्गण होजाते हैं, शेष रह जाते हैं - दस गौप्राण, यही ' चतु-स्त्रिंशः प्रजापतिः ' रूप चौतीसवाँ - ' सर्वप्रजापति ' नामक पारिभाषिक वाङ मय -- प्रजापतिदेवता है । ३३ ग्रह-र्गणों में से आरम्भ के तीन अहर्गण वस्तुपिण्ड में भुक्त हैं । अतएव वस्तुमण्डल में ३० ही अहर्गण शेष रह नाते हैं, जिनका युग्मरूपेण जो तत्त्वात्मक समन्वय होता है, उसीका नाम है - ' वषट्कार ' । वस्तु पिण्डभुक्त - तीन अहर्गणों में वस्तुमण्डलयुक्त ३० अहर्गणों में से ६ अहर्गणों के समावेश से जो वाक् प्राणमय एक स्वतन्त्र स्तोम का स्वरूप सम्पन्न होता है, उसी का नाम है - ' त्रिवृतस्तोम ' ( अर्थात् ६ अहर्गणों की समष्टिरूप स्तोम ) । इसमें अयुग्मरूपेणैव श्रागे के ६ अहर्गणों के समावेश से – ' पञ्चदशस्तोम ' का, और ६ के समावेश से-' त्रिणवस्तोम ' का, एवं और शेषभूत अन्त के ६ अहर्गणों के समावेश से - ' त्रयस्त्रिशस्तोम ' का स्वरूप-सम्पन्न होता है । इन ३३ सों अहर्गणों का केन्द्रभूत एक सप्तदशम - अहर्गण - पृथक और मान लिया गया है, जो ‘ उद्गीथप्रजापति ' का स्वरूप समर्पक बनता है । इसप्रकार त्रित् - ( ६ ) - पञ्चदश ( १५ ) -सप्तदश ( १७ ) - एकविंश ( २१ ) – त्रिणव- ( २७ ) - त्रयस्त्रिंश ( ३३ ) - रूपेण वाङ् मय प्राण के, किंवा प्राणमयी - महिमा -रूपा सुसूक्ष्मा वाक् के ६ ( छह ) विभिन्न स्तोम होजाते हैं । एक ही मूलवाकूतत्त्व का स्तोमानुबन्धी यह षड्धा - विभाजन है । यही वाक् का प्रकार है, और यही वाकषट्काररूप ' वषट्कार ' शब्द का संक्षिप्त्ततम-चिरन्तनेतिवृत्त है re
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किञ्चिदिव आवेदन वाक् के बट्काररूप वषट्कार का ही नाम है ' वाक्साहस्री मण्डल ', जिसके गर्म में वेदसाहसी लोकसाहस्री बाक्साहस्री - नाम की तीन व्यष्टिरूपा श्रवान्तर - साहसियाँ प्रतिष्टित मानीं गई है, जिस इस साहस्री - त्रयी की आधारभूमि है हुवाक्षरत्रयः । वस्तुपिण्ड के केन्द्र में मनोगर्भित जिस ' प्राण ' तत्त्व की उक्थ-रूपेण पूर्व में प्रतिष्ठा बतलाई गई है, वह हृदयस्थ प्राण हृदय में प्रतिष्ठित रहता हुआ स्वयं भी ' हु - द - यम् ' रूपेण त्र्यक्षरात्मक - अक्षरप्राण ही है, जिसका ' ह ' नामक एकाक्षर श्राहरणधर्म्मा विष्णु है, यही आगति-धर्मा प्राण है । ' द ' नामक एकाक्षर खण्डनधर्म्मा- ' इन्द्र ' है, यही गतिधर्मा प्राण है । एवं ' यम् ' नामक एकाक्षर नियमनधर्म्मा ब्रह्मा है, और यही गतिसमुच्चयधर्म्मा स्थितिरूप - प्रतिष्ठाप्रारण है । इसप्रकार तीन अक्षरों की समन्वितावस्थारूप व्यक्षरमूर्ति - हृदयस्थ प्राण के आधार पर ही मनोवागु गर्भिता वाक्साहस्री के तीन महिमा - त्रिवर्त्त निष्पन्न होजाते हैं मनः- प्राण - वाकू की गौण प्रधानवृत्ति के कारण, जिसका निष्कर्ष यही है कि— मनोवागूगर्भिता प्राणप्रधाना साहसी का ही नाम बैष्णवी साहसी है, यही ' लोकसाहसी है, जिसका ' हृ ' अक्षरात्मक ' विष्णु ' नामक अक्षर से ही प्रधान सम्बन्ध है । मनः प्राणगर्भिता वाक् प्रधाना साहस्री का ही नाम ' ऐन्द्री साहसी ' है, यही ' बाक्माहसी ' है, बिसका ' द ' क्षरात्मक ' इन्द्र ' नामक अक्षर के साथ ही प्रधान सम्बन्ध माना गया है । एवं ' प्राण- बाग् - गर्भिता - मनः - प्रधाना साहस्री का नाम ही ब्राह्मी-साहस्री है, यही ' वेदसाहस्री ' है, जिसका ' यम् ' अक्षरात्मक ' ब्रह्मा ' नामक अक्षर के साथ ही प्रधान सम्बन्ध माना गया है । इसप्रकार ब्रह्माक्षररूप प्रतिष्ठात्तत्त्व के आधार पर प्रतिष्ठित इन्द्र - विष्णु की गत्यागति-धर्म्मावच्छिन्न श्रब्र्मूला पारस्परिक प्रतिस्पर्द्धा से होने वाले ब्राह्म - वैष्णव - ऐन्द्र- प्राणों के बीरणरूप - अर्कात्मक ऊर्ध्ववितान से एक ही वाक्साहस्री के उक्त गौण प्रधान - क्रम से तीन साहास्रयाँ अभिव्यक्त होजातीं हैं, जिन इन तीन साहस्त्रियों के अवारपारीण - ऊर्ध्व - अधः - तिर्य्यक् - सर्वतोभावी वितान से एक विधापि साहसी प्रारम्भ में त्रिसाहस्रीरूप में परिणत होती हुई ' सहस्रधा महिमानः सहस्रम् ' रूपेण असंख्य - भगणित - साहस्री- विज्ञान भावों में विभक्त होजाती है, जिनकी प्रधानभूता साहस्री त्रयी का ऋषि ने निम्नलिखितरूपेणैव संस्मरण किया है— उभा जिग्यधुर्नपराजयेथे, न पराजिज्ञे कतरश्च नैनोः । इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम् ॥ ( ऋक्संहितायाम् ) किं तत् सहस्रमिति? इमे लोका: ( लोकसाहस्री - वैष्णवी ) इमे - वेदा: ( वेदसाहस्री - ब्राह्मी ) थो - वाक् - इति ब्र ूयात् ( वाक्माहत्री - ऐन्द्री ) - ऐतरेय आरण्यके उक्का साहस्री - त्रमी में मनः प्रागभिंता वाक्प्रधाना ऐन्द्री साहसी का ही क्योंकि वाङमय वषट्कार से प्रत्यक्ष सम्बन्ध है | श्रुतएव यज्ञकर्म्म में एकमात्र इन्द्राक्षरदेवता के लिए ही ' इन्द्राय वौषट् ' रूपेण बघटकार-रूपेण श्राहुति का विधान हुआ है । वैसे तो सभी प्राणदेवताओं की आधारभूमि वाङमय वषट्कार ही बना हुआ है, जैसा कि – ' देवपात्रं वा एष वषट्कारः ' निगम से स्पष्ट है । ऐसा है यह वषट्कार, जिसके आधार ५०