Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 341–350

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 341–350

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ७३५ - बायु नैवोद्धृतं तोयं वायुरेव प्रवर्षति, और कादम्बिनी ७३६- कृष्णवस्त्र -- धामच्छदमेघ --कृष्ण - जल --कृष्णमरुत् श्रादि से अनुप्राणित- प्राति-निध्यभावों का समन्वय ७३७- प्रकृतिविरुद्ध - गमन, और अनावृष्टि-श्रतिदृष्टि - जनित दुष्काल ७३८ - जनपदविद्धसिनी- करकापात - उल्कापात-श्राग्नेय - वारुण - ऐन्द्र - वायव्यादि भूकम्पों का प्रहार, और मानव का उत्पीड़न ७३६ - ऋषिप्रदिष्ट चिकित्सामार्गात्मक यज्ञकर्म की शरणीकरणीयता का संस्मरण ७४० - अभक्ष्य भक्षण, श्रगम्यागमन, अस्पृ-श्य - स्पर्श, देव - द्विज- श्राचार्य्य - शुश्रूषा-परित्याग, सच्छास्त्र निन्दा, मलिनीकरण-संकरीकरण - जातिभ्रंशकर श्रादि पातक-श्रतिपातक - महापातक - रूप - निन्द्य श्रस-त्कर्म्मो में प्रवृत्ति, मर्य्यादोल्लंघन, कल्पित - साम्यवादघोषणा, सर्वोपरि दुराग्रह - श्रादि श्रादि श्रधर्मपथों के १४६४ " " 1 20 अनुगमन से संतुब्ध - संत्रस्त श्राज का मानव समाज १४६५ ७४१ - बुद्धिगम्या -भाषा से अनुप्राणिता श्र ति सिद्धा वृष्टिविद्या का परिचयोपराम ७४२ - सम्वत्सर की ऋतुत्रयी " ७४३- ' त्रयो वा ऋतवः सम्वत्सरस्य ' का संस्मरण " ७४४ - सर्दी - गर्मी, और बरसात ७४५ - त्रयी का द्वयी में अन्तर्भाव ७४६- शीतकाल, और ' श्यालू ' ७४७ - उष्णाकाल, श्रौर – ' उह्वालू ' ७४८ - ऋतुद्वयी का एकर्स में अन्तर्भाव ७४६ - लोकप्रसिद्ध - शीत, और ' सोम ' ७५० - सोम के दो महिमा - विवर्त 23 " 1 " " 3 39 " ७५१ - ' ऋतसोम ' के पारिभाषिक स्वरूप - का उदाहरण - माध्यम से समन्वय ७५ २- श्रान्तरिक्ष्य - प्राणात्मक दिक्सोम, और उसका भौतिकरूप ७५३ - ताग्नि का स्वरूप- समन्वय ७५४ - सत्याग्नि, और सत्य - सोम का स्वरूप-समन्वय ७५५- ताग्नि, और श्रुतसोम के अन्तर्य्या-मात्मक- समन्वय से ' ऋतु ' नामक -१६६ 39 39 पूर्वभाव की स्वरूपाभिव्यक्ति १४६७ ७५६ - ' ऋतं नात्येति किचन ' का रहस्यात्मक-समन्वय ७५७ - वसन्तादि षड्ऋतुओं का निर्वचना-त्मक - रहस्यार्थ समन्त्रय ७५८ - ऋतलक्षण- पार्थिव अग्नि, और ऊष्मा ७५६ - ऊष्मा की चरम सीमा, और जलवर्षण ७६० - विभिन्न तत्त्वों का एकत्र समन्वय, और त्रुष्टि का उद्गम ७६ १ - जलवर्षक पारिभाषिक मेघ ७६२ - मेहनधम्र्मात्मक मेघ का पारिभाषिकार्थ-समन्वय ७६२ - अश्मा सोमात्मक- जलावरोधक वृत्रप्राण ७६४- गत्यावरोधक नमुचिप्राणासुर ७६५ – इन्द्र के द्वारा नमुचि का शिरश्छेद, और जलवर्षण ७६६ – रुद्रात्मक - रुद्धद्रवणधर्म का संस्मरण ७६७- ' अग्नेरापः ' सिद्धान्त का पारिभाषिक-समन्वय ७६८ - वृष्टिधर्माधिष्ठाता पर्जन्यवायु के वैज्ञानिक स्वरूप का समन्वय, एवं-तन्निबन्धना मन्त्र ति का संस्मरण ७६६ - इन्द्रधनुष की उत्पत्ति का निमित्तभूत-पज्ज्येन्य- वायु " " " 21 " " " १४६८ " " " " " 1 " } 20 " १४६६ 21 २१३

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७७० - सप्तवर्णात्मक - इन्द्रधनुष का समन्वय विषयसूची स्वरूप-१४६६ ७७१ - सौररश्मियों का तिर्य्यगभाव और इन्द्रधनुष ७७२ - इन्द्रधनुष के दर्शन का निषेध, और तत्कारण - समन्वय ७७३ – ' पर्ज्जन्या द्रप्सा मधुमन्त ईरते ' इत्यादि रहस्यात्मक मन्त्र का संस्मरण ७७४ - मेघत्रयी से अनुगत जलवर्षण ७७५ - ' यज्ञाद्भवति पर्ज्जन्यः ' का तात्त्विक स्वरूप- समन्वय ७७६- ' तपोजा ' इति का संस्मरण ७७७ - श्रग्नेर्वै धूमो जायते ७७८ - धूमाद् श्रभ्रम् ७७- अभ्राद् - वृष्टिः ७८० - श्रग्नेर्वा एता जायन्ते ' ७६१ - उल्कापात का समन्वय ७६२ - तारापात का स्वरूप - दिग्दर्शन ७६३ - धिष्ण्यापात का समन्वय १४७२ 39 39 " ७६४- वज्रपात की स्वरूप - महिमा १४७० " II 32 19 " ७६५ - चतुर्विघ- भूकम्पों का प्रासङ्गिक स्वरूप-संस्मरण ७६.६ -‘कृष्ण - बरण - मधुर मेघ - गगन भरथो-समन्तात ' इत्यादि सङ्गीतपद्य का संस्मरण, और वर्षा का लौकिक-वर्णन ( टि ० ) ७६७ - अभ्रसमाप्लावन के अनन्तर उच्च-" " रित - ' यज ', और विद्युत्सवार १४७३ ७६८ - ' ये यजामहे ' और स्तनयिनुरूप-गर्ज्जन- तर्ज्जन 33 ७६६- बीषट्, और जलवर्षण 22 11 ७८१ - तस्मादाह तपोजा - इत ७८८२ - वृष्टिविज्ञान निबन्धन - वज्र्ज्जन्य विज्ञान का स्वरूप विराम ७८३ - कष्मा - ऊमस, श्रौर जलवर्षण ७८४ - ' ओश्राषय ', और पुरोधात ( पर्ज्जन्य ) का आविर्भाव " ७- स्तु- भौषट्, और अभ्र की अभि-व्यक्ति ७८६ - विद्युत् श्रौर स्तनयित्नु ( चमक, और गर्जन ) के रहस्यपूर्ण पौर्वापर्य का तात्त्विक स्वरूप- समन्वय ७८७ – दृश्यस्थिति, और वस्तुस्थिति का पार्थक्य - प्रतिपादन ७- विद्यु त्पात का स्वरूप- स्पष्टीकरण ७८६ - ' वायुः खात् - शब्दस्तत् ' इत्यादि-प्रातिशाख्य - सिद्धान्त का संस्मरण ७६ • - सर्वाध: - स्थित मेघस्तर, और तत्संघर्ष-वनित - विद्युत् प्रवाह १४७१ १४७२ 13 11 19 19 ८००- श्राश्रावण प्रत्याश्रावण - कर्मानुगता-रहस्यपूर्णा वृष्टिविद्या का उपराम इति - वृष्टिविज्ञानमुपरतम् ८०१- महत्त्वपूर्ण श्राश्रावण - प्रत्याश्रावणकर्म्म का संस्मरण ८०२ - सम्वत्सरप्रजापति की पाँच व्यष्टियां, और सप्तदश प्रजापति ८०३- अमृत - नवव्याहृत्यात्मक - नादापन-कर्म का संस्मरणात्मक समन्वय, और आधिदैविक - परोक्ष - फल का स्वरूप-दिगदर्शन ८०४ - श्रधिभौतिक प्रत्यक्ष फल का स्वरूपेतिवृत्त-विराम, और बिराह गोरूपधरा माता पृथिवी का दोहन ८०५ - दोहन कर्मानुगत - गोवत्स ८०६ - पार्थिव अग्नि, और बिराड़ गौ ८०७ - अग्निहोत्रविज्ञान ब्राह्मण का संस्मरण २१४ १४७३ " " 33 १४७४ 39 "

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८०८ - दशकल- विराडग्नि, और तन्निबन्धन गोतत्त्व शतपथब्राह्मण २ खण्ड १४७४ ८०- दशाक्षरविराट् - छन्द, और विराड्गौ " " ८१० - विराड गौ का रहस्यात्मक दोहन, और सर्व्वकामपूरक - प्रक्रान्त स्रु ग्ब्राह्मणोपराम १४७४ पञ्चम- अध्याय में द्वितीय, एवं चतुर्थ- प्रपाठक में तृतीय-' गुब्राह्मण ' नामक ब्राह्मण - अत्र- उपरत ( वृष्टिविज्ञानात्मक ) इति - सुगादापनं -- श्राश्रावणं- प्रत्याश्रावणंच २२ ११५

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श्रीः अथ - शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्ये - प्रथमकाण्डे त्रिब्राह्मणात्मकं प्रयाजन्राह्मणम् उपक्रान्तम् २३ -- ऋतुयजनात्मकं प्रयाजकर्म्म क्रमप्राप्त २३ वें कर्म्म के विज्ञानभाष्य को “ विषयस्मारकसूची ” ( पृष्ठसं ० १४५७ से १५४२ पृ ० पर्य्यन्त ) १- प्रथमकाण्डान्तर्गत पञ्चम- पष्ठ अध्याया नुगत त्रिब्राह्मणात्मक प्रयाजब्राह्मण मूल ) १४७५ २- मूलब्राह्मण का अक्षरार्थसमन्वयात्मक अनुवाद १४८५ ३ - सूत्रानुगत पद्धति संग्रह - १५२५ पृष्ठ से १५४२ वें पृष्ठ - पर्य्यत ( अत्रैव - द्वितीय-खण्डोपरामः ) इति - शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्य- प्रथमकाण्डानुगत-द्वितीयखण्ड संक्षिप्ता - विषयस्मारकसूची उपरता श्रग्रिम - तृतीय - खण्ड कौ * -त्रिब्राह्मणात्मक - प्रस्तुत- प्रयानब्राह्मण की वैज्ञानिक विवेचना क्रमप्राप्ता ही प्रतीक्षा कर रही है । २१६

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श्रीः शतपथब्राह्मण - प्रथमकाण्डानुगत - द्वितीयखण्डान्तर्गत कतिपय - परिलेखों की सूचो ( १ ) - सर्वत्सरात्मकः - सम्वत्सर मण्डल परिलेखः ( चक्र सम्वत्सर प्रतिकृतिरियम् ) - पृष्ठ सं ० ६३७ ( २ ) - अग्न्यात्मक - कालात्मक - मम्वत्सर चक्र - त्रयी - स्वरूप - परिलेखः ( क ) - मत्तासिद्धः - सम्वत्सरः- कालात्मकः ( ख ) - भातिसिद्धः - सम्वत्सरः- कालात्मकः - पृष्ठसं ० ६३८ ( ३ ) - ( १ ) वागापोऽग्निः शुक्रत्रय वितान - परिलेखः - पृष्ठसं ० ६६४ ( ४ ) - ( २ ) - पार्थिव सम्वत्सर- चक्रानुगत- सामत्रयी - परिलेखः 1 ) -सौर- पार्थिव - सामातिमान परिलेखः - पृष्ठसं ० ६६५ - पृष्ठसं ० ६६६ पृ ० सं ० ८८६, तथा ८६० के मध्य में -( ७ ) - केसर पर्वत - परिलेखः - पृष्ठसं ० ८६५ ( ६ ) -- अष्टदलकमलात्मकः- पाद्यभुवन कोशपरिलेखः ( ८ ) - लघुसप्तर्षि - परिचायक - परिलेखः - पृष्ठसं ० ८६५ ( ६ ) - परिभ्रमणात्मक - बृहत् - सप्तर्षि - परिलेखः पृष्ठसं ८६६ २१७

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विषयसूची ( १० ) - मरुमूला देवविलोकी - परिलेख, ( ११ ) भारतोयद्वीपपरिलेखः - पृष्ठ ० सं ८८ - पृष्ठसं ० ६०८ ( १२ ) - देवत्रिलोकी, तथा असुरत्रिलोकी स्वरूप परिलेखः - पृष्ठसं ० ६१८ ( १३ ) - महानात्मविवत्त त्रयी - स्वरूप परिलेख: ( १४ ) - देवासुरभाव - समन्वय - परिलेखः- पृष्ठसं ० ६२०-६२१ के मध्य में - पृष्ठसं ० ६२१ ( १५ ) - चतुर्द्धा विभक्त - श्रग्नि - परिलेख: ( १६ ) - बैधयज्ञवेदिपरिलेखः ( १७ ) - अग्निहोत्रशालापरिलेखः ( १८ ) - दर्शपूर्ण मास विहारपट्टपरिलेखः - पृष्ठसं ० ६२५ - पृष्ठसं ० ३० - पृष्ठ सं ० ३१ - पृष्ठसं ० ६३० ( १६ ) - श्रदिति - दिति - पृथिवी - परिलेखः ( २० ) - द्वादशव्याहृतिपरिलेखः ( २१ ) - त्रिविध- दाम्पत्यभावपरिलेखः - पृष्ठसं ० - पृष्ठसं ० ६४४ - पृष्ठसं ० ६८० ( २२ ) - पार्थिव नवलोकात्मक- विवर्त्त - परिलेखः - पृष्ठसं ० २३४४ उपरता - चेयं परिलेखसूची -२१८

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श्रीः शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञान भाष्य - प्रथमकाण्डानुगत द्वितीयखण्ड २ संक्षिप्ता - विषयस्मारक - पूची उपरता

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Animation S अथ शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्ये द्वितीयोऽध्यायः

पृष्ठ 349

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अथ - शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्ये द्वितीयोऽध्यायः अथ प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् प्रथमप्रपाठके च पञ्चमं ब्राह्मणम् १० - उपवेषसम्पादनम् अग्नौ कपालापधानेन हविः - परिपाकम ( मूल ) स वै कपालान्येवान्यतर उपपदधाति, पदुपले अन्यतरः । तद्वा एतदुभयं सह क्रियते । तद्यदेतदुभयं सह क्रियते ॥ १ ॥

शिरो ह वा एतद्यज्ञस्य यत्पुरोडाशः । स यान्येवेमानि शीर्ष्णः कपालानि, एतान्येवास्य कपालानि, मस्तिष्क एव पिष्टानि । तद्वा एतदेकमङ्गम् । एकं सह करवाव,

समानं करवावेति । तस्माद्वा एतदुभयं सह क्रियते ॥२ ॥

स यदेनेनाग्नि धृष्णिववोपचरति, तेन धृष्टिः । श्रथ यदेनेन यज्ञ उपालभते, उपेत्र

चा एनेनैतद्वे वेष्टि । तस्मादुपवेषो नाम ॥ ३ ॥

तेन प्राचोऽङ्गारानुगृहति - ' पाग्ने अग्निमामादं जहि निष्क्रव्यादं सेध ' ( १ अ ० १७ मं ० ) इति । अयं वा श्रमात् येनेदं मनुष्याः पक्त्वा श्रश्नन्ति । अथ येन

पुरुपं दहन्ति, स क्रव्यात् । एतावेवैतदुभावतो ऽपहन्ति ॥४ ॥

अथाङ्गारमास्कौति — ' आ देवयजं वह ' - ( १ ० १७ मं ) इति । यो देवयाट्,

तस्मिन् हवींषि श्रपयाम, तस्मिन् यज्ञं तनवामहा - इति । तस्माद्वा कौति ॥ ५ ॥

तं मध्यमेन कपालेनाभ्युपदधाति । देवा ह वै यज्ञं तन्वानास्ते असुर - रक्षसेभ्य आस-ङ्गाद् विभयाञ्चक्रः, नेनोऽधस्तान्नाष्ट्रा रक्षांस्युपोत्तिष्ठानिति । अग्निर्हि रक्षसामपहन्ता । ६१२

पृष्ठ 350

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प्रथमकाण्ड तस्मादेवमुपधाति । तद्यदेष एव भवति नान्यः । एष हि यजुष्कृतो मेध्यः । तस्मान्म-ध्यमेन कपालेनाम्युपदधाति || ६ || स उपदधाति ' ध्रुवमसि पृथिवीं दृह - १ ( १ ० १७ मं ० ) इति । पृथिव्या एव रूपेणैवदेव हं हति । एतेनैव द्विषन्तं भ्रातृव्यमत्रबाधते - ' त्रह्मवनि वा क्षत्रवनि सजाववन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय " ( १ ० १७ मं ० ) इति । वह्नीनें यजुः प्वाशीः, तद् ब्रह्म च क्षत्रं चाशास्ते । उमे वीर्ये । भूमा नैं सजाताः, तद् भृमानमाशास्ते । उपदधामि भ्रातृव्यस्य वधायेति - यदि नाभिचरेत् । यद्य अभिचरेद् - अमुष्य वधायेति यात् । श्रभिनिहितमव सव्यस्य पाणेरङ गुल्या भवति ॥ ७ ॥

अथाङ्गारमाह्कौति । नेदिह पुरा नाष्ट्रा रक्षांस्याविशानिति । ब्राह्मणो हि रक्षमाम-पहन्ता । तस्मादभिनिहितमेव सव्यस्य पाणेरङ गुल्या भवति || ८ || श्रथाङ्गारमध्हति - " अग्ने ब्रह्म गृभ्णीष्व " - ( १ ० १८ मं ० ) इति । नंदिह पुरा नाष्ट्रा रक्षांस्याविशानिति । श्रग्निर्हि रक्षसामपहन्ता । तस्मादेवमध्हति ॥ ॥ अथ यत्पश्चात्तदुपदधाति - ' घरुणमस्यन्तरिक्षं दृह " - ( १ ० १८ मं ० ) इति । अन्तरिक्षस्यैव रूपेणैतदेव दृहति । एतेनैव द्विषन्तं भ्रातृव्यमथवाधते - " ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय " - ( अ ० १८ मं ० ) fa 1 112011 अथ यत्पुरस्ता तदुपदधाति - " घर्धममि दिवं दृध्द " - ( १ ० १८ मं ० ) इति । दिव एव रूपेणैतदेव इति । एतेनैव द्विपन्तं भ्रातृव्यमत्रबाधते - " ब्रह्मवनित्वा क्षत्रवनि सजातच न्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वघाय " - ( १ ० १८ म ० ) इति ॥।११ ॥ अथ यद्दक्षिणतस्तदुपदधाति - " विश्वाभ्यस्त्वाशाभ्य उपदधामि १ - ( १ ० १८ मं ० ) इति । स यदिमाँल्लोकानति चतुर्थमस्ति वा न वा । तेनैवैतद् द्विषन्तं भ्रातृव्यम-वत्राधते । अनद्धा वै तद्- यदिमाँल्लोकानति चतुर्थमस्ति वा न वा । श्रनद्धो तद् यद् विश्वा आशाः । तस्मादाह - ' विश्वाभ्यस्त्वाशाभ्य उपदधामि ' इति । तूष्णीं वैवेतराणि कपालान्युपदधाति । “ चितस्थोर्द्धचितः " - ( १ अ ० १८ नं ० ) इति वा ॥ १२ ॥

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