Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 351–360

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 351–360

पृष्ठ 351

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शतरथब्राह्मण प्रथागारैरभ्यूहति- " भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् " - ( १ श्र ० १ = मं ० ) इति । एतद्वै तेजिए तेजो यद् भृग्वङ्गिरसाम् । सुतप्तान्यसन्निति - तस्मादेवमभ्यूहति ॥१३ ॥

अथ यो दृषदुपले उपदधाति - स कृष्णाजिनमादत्ते -- " शम्र्मासि " ( १ ० १६ मं ० ) इति । तदवधूनोति — " अवधूतः रक्षोऽवधूता अरातय १ ( १ ० १६ मं ० ) इति । सोऽसावेव बन्धुः । तत् प्रतीचीन ग्रीवमुपस्तृणाति - " अदित्यास्त्वगसि प्रति त्वा-दिति " ( १ ० १६ मं ० ) इति । सोऽसावेव बन्धुः ॥१४ ॥

पदमुपदधाति धिषणासि पर्वती प्रति त्वादित्यास्वग् वेत्तु " - ( १ ० १६ मं ० ) इति । घिषणा हि, पर्वती हि प्रति त्वादित्यास्त्वग् वैच्चिति । तत्संज्ञा--मेवैतत् कृष्णाजिनाय च वदति - नेदन्योन्यं हिनसात इति । इयमेवैपा पृथिवी रूपेण ॥१५ ॥

अथ शम्यामुदीचीनाग्रामुपदधाति - “ दिवस्कम्भनीरसि " - ( १ ० १६ मं ० ) इति । अन्तरिक्षमेव रूपेण । अन्तरिक्षेण हीमे द्यावापृथिवी विष्टब्धे । तस्माद ह - दिव-स्कम्भनीरसीति ॥१६ ॥

थोपलामुपदधाति - " धिषणासि पार्वतेयो प्रति त्वा पर्वती वेत्त " - ( १ श्र ० १६ मं ० ) इति । कनीयसी षा दुहितेव भवति । तस्मादाह पार्वतेयीति । प्रति त्वा पर्वती वेच्विति । प्रति हि स्वः संजानीते । तत् संज्ञामेवैतद् पदुपलाभ्यां वदति - नेदन्योन्यं हिनसात इति । द्यौरेवैषा रूपेण । हनू एव दृषदुपले । जिह्वव शम्या । तस्माच्छम्यया समाहन्ति । जिह्वया हि वदति ॥ १७ ॥

अथ हविरधिवपति - " धान्यमसि धिनुहि देवान् " - ( १ ० २० मं ० ) इति ।

धान्यं हि । देवान् धिनवदित्यु हि हविगृह्यते ॥ १८ ॥

श्रथ पिनष्टि -- " प्राणाय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा दीर्घामनुप्रसितिमायुषे धाम् ' -- ( १ अ ० २० मं ० ) इति । प्रोहति -- " देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृ-भगात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा " - ( १ ० २० मं ० ) इति ॥ १६ ॥

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पृष्ठ 352

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प्रथमकाण्ड तद्यदेवं पिनष्टि । जीवं वै देवानां हविरमृतममृतानाम् । अथैतदुलूखलमुसलाभ्यां पदुपलभ्यां हविर्यज्ञं घ्नन्ति ॥ २० ॥

स यदाह प्राणाय - त्वोदानाय त्वेति तत्प्राणोदानौ दधाति । व्यानाय त्वेति, तद् व्यानं दधाति । दीर्घामनुप्रसितिमायुषे धामिति, तदायुर्दधाति । देवो वः सविता दिरण्य-पाणिः प्रतिगृभ्णात्वच्छिद्र ेण पाणिना, सुप्रतिगृहीतान्यसन्निति । चक्षुषे त्वेति तच्चतु-fafa | Cara ो

भवन्ति । एवमु हैतज्जीवमेव देवानां हविर्भवत्यमृतममृतनाम् ।

तस्मादेवं पिनष्टि । विषन्ति पिष्टानि, अभीन्धते कपालानि ॥ २१ ॥

आज्यं निर्वपति । यद्वा आदिष्टं देवतायें हविगृह्यते - यावद्देवत्यं तद् भवति । तदितरेण यजुषा गृह्णाति । न वा एतत्कस्यै चन देवतायें हविगृह्णन्नादिशति - यदाज्यम् । तस्मादनिरुक्तेन यजुषा गृह्णाति - " महीनां पयोऽसि " - ( १ ० २० मं ० ) इति । मह्य इति ह वा एतासामेकं नाम यद् गवाम् । तासां वा एतत् पयो भवति । तस्मादाह--महीनां पयोऽसीति । एवमु हास्यैतत् खलु यजुषैव गृहीतं भवति । तस्माद्वे वाह - महीनां पयोऽसीति ॥ २२ ॥

इति प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् प्रथमप्रपाठके च पञ्चमं ब्राह्मणम् ७ – उपवेष का सम्पादन, अग्नि पर कपालों का स्थापन, एवं तद्-द्वारा ( पुरोडाशसम्पत्ति के लिए ) हविद्रव्य का परिपाक ( अनुवाद ) १ – हविद्रव्य का परिपाक कपालों में होता है । एतदर्थ कपाल का उपधान होता है । यह उपधान ' गार्हपत्यखर ' के अपरार्द्ध में होता है । इसमें पिष्ट इविद्र व्य रक्खा जाता है । एवं अङ्गारों से इसका यथाविधि परिपाक किया जाता है । असम्पन्न ( अपरिपक्व ) यज्ञिय अन्न ‘ हवि ' कहलाता है । एवं वही सम्पन्न परिपक्क ) होकर ' पुरोडाश ' नाम से त्र्य-बहृत होने लगता है । इस ‘ इष्टि ' में ' आग्नेयपुरोडाश ', ' अग्निषोमीय - पुरोडाश ' भेद से पुरोडाश द्रव्य दो भागों में विभक्त है । इसी भाग - क्रम के अनुसार कपाल भी दो भागों में विभक्त ६१६

पृष्ठ 353

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शतपथब्राह्मण हैं । श्राग्नेय कपाल आठ हैं, अग्नीषोमीय कपाल एकादश हैं । आग्नीध नाम से प्रसिद्ध श्रध्व-का सहकारी ऋत्त्विक जलसे प्रक्षालित कपालों को लेकर गाईपत्यखर के पश्चिम भाग में पूर्वपश्चिम - क्रम से क्रमश: श्राग्नेयपुरोडाश सम्बन्धी आठ श्राग्नेय कपालों को रखता है, एव गार्हपत्य के उत्तर भाग में पूर्व - पश्चिम - क्रम से क्रमश: अग्निषोमीय - पुरोडाश - सम्बन्धी ग्यारह अग्नीषोमीय - कपालों का उपधान करता है । इन कपालों का उपधान निम्नलिखित क्रम मे होता है । मध्य में मुख्य प्रथम कपाल रहता है । इसके पश्चिम में दूसरा, पूर्व में तीसरा, दक्षिण में चौथा, चतुर्थ के पूर्व - एक कपाल का व्यवधान छोड़कर पाँचवाँ चतुर्थ पञ्चम के मध्य में छठा, चतुर्थ के पश्चिम में सातवाँ, सातवें के पश्चिम में आठवाँ । सत्र के उत्तर में - नवम, दशम, एकादश कपालों का पूर्वक्रम से उपधान करना चाहिए । श्रग्नीषोमीय एकादश कपालों का यही उपधानक्रम है । अग्नीषोमीय - एकादश- कपालोपधान क्रम - परिलेखः पूर्वा उदीची ११ ५ ६ १० ४ ६ ८ दक्षिणा एवं आगे लिखित क्रम श्राग्नेय अष्ट कपालों का समझना चाहिए । श्रपणस्थान में स्थित मध्य श्रृङ्गार में मध्यकपाल ( मुख्य कपाल - प्रथमकपाल ) रक्खा जाता है । मध्यम कपाल के पश्चिमभाग में द्वितीय कपाल, मध्यमकपाल के पूर्व भाग में तृतीय कपाल के दक्षिण भाग में चतुर्थकपाल, चतुर्थकपाल के पूर्वभाग में पचम कपाल, चतुर्थकपान के पश्चिम भाग में पष्ठकपाल, मध्यम कपाल के पश्चिम भाग में स्थापित द्वितीय कपाल के उत्तर में सप्तम कपाल, सप्तम कपाल के पूर्व में कपाल का उपधान होता है, जैसाकि अनुपद में ही पद्धति - कमनिरूपण में स्पष्ट होजायगा । ६१७

पृष्ठ 354

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प्रथमकाण्ड आग्नेय- अष्टाकपा लोपधान - सम्बन्धी -क्रम - परिलेख: -पूर्वा उत्तरा ७ ८ ३ १ E दक्षिणा प्रकृत में इस से हमें केवल यह बतलाना है कि, कपालोपधान करना आग्नीध का कर्म्म है, दृपदुपल से हविद्रव्य का पेपण करना अध्वर्यु का कर्म्म है । तात्पर्य्य यही है कि, हविःपेपण, और कपालोपधान दोनों सहकारी कर्म्म हैं । दोनों एकसाथ होते हैं । ऐसी अवस्था में एक ही ऋत्विक् तो एक साथ दोनों कर्म्म कर नहीं सकता । श्रतः अध्वर्यु पेषणार्थ उसी काल में पदुपल का ( हत्रिः पेषणार्थ ) उपधान करता है, एवं आग्नीध उसी काल में कपालों का उपधान करता है । कपालोपधान बहिरङ्गकर्म है । श्रतः श्रध्वर्यु की अपेक्षा बहिरङ्ग आग्नीध्र ही यह कर्म्म करता है । एवं पेषण कर्म्म आहुतिस्त्ररूप- सम्पादक बनता हुआ । अन्तरङ्गकर्म्म है । अतः आग्नीध की अपेक्षा अन्तरङ्ग अध्वर्यु ही पेषणकर्म करता है । द्वितीय अध्याय के इस प्रथम ब्राह्मण में प्रधानरूप से इह्रीं दोनों कम्मों की श्रावृत् ( पद्धति ) बतलाई गई है । ऋत्विजों के मध्य में ' अग्नी ' नाम का एक ऋत्त्विक् कपालों का उपधान करता है, एवं अन्यतर ( अध्वर्यु ' ) ऋत्विक् ( हविः पेषणार्थ ) दृपदुपल का उपधान करता है । इसप्रकार ' पेशोपधाने युगपन् ' ( का ० श्री ० सू ० २ | ४ | २४ ) के अनुसार ये दोनों कर्म्म एकसाथ किए जाते हैं । सो जोकि ये दोनों कर्म्म एकसाथ किए जाते हैं, ( उसकी उपपत्ति बतलाते हैं ) || १ || ६१८

पृष्ठ 355

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शतपथब्राह्मण यह यज्ञ का मस्तक है, जोकि ' पुरोडाश ' है । इस मस्तक - सम्बन्धी जो कपाल ( खोपड़ी ) हैं. वे ही इस यज्ञ के कगल हैं । मस्तिष्क ही पिठुद्रव्य ( पिसा हुआ पुरोडाश ) है । इसप्रकार ( मनुष्य में ) कपाल - स्थानीय कपाल, एवं पुरोडाश - स्थानीय मस्तिक, दोनों मिलकर ' शिर ' ' मस्तक ', आदि नामों से व्यवहृत एक अङ्ग है । ( हम भी अपने यज्ञ में ) दोनों को एकसाथ बनावें, समान बनावें, इसलिए उपर्युक्त दोनो कर्म्म एकसाथ किए जाते हैं ॥ २ ॥

जिन अङ्गारों से हविद्रव्य का परिपाक किया जाता है, उन्हें हस्ताकृतियुक्त जिस काट-दण्ड से इस्ततः किया जाता है- ' अङ्गारविभजनार्थं काष्ठमुपवेश: ' ( सा ० भा ० ) के अनुसार ही काष्ट ' उपवेप ' नाम से प्रसिद्ध है । सो जो कृत्त्विक् ( आग्नीध्र ) कपालों का उपधान करता है, ' धृष्टरीत्युपवेषमादाय ' ( का ० श्र ० २२ | ४ | २५ ) के अनुसार ' धृष्टिरसि ' ( १ ) ( यजुः १।१७ ) यह् मन्त्र बोलता हुआ उपवेप उठाता है । वह आग्नीध्र इस हस्ताकृतियुक्त काष्ट से श्रङ्गाराग्नि का वर्पण करता है । अर्थात् जिस प्रगल्भता के साथ, सौकर्य के साथ काष्ठ से अग्नि को इधर उवर किया जासकता है, उसप्रकार हाथों से ( जलने के भय से ) वैसा नहीं किया जासकता । अतः प्रगल्भार्थक ' ञिधृषा ' ( स्वा ० १० २३ ) धातु से धृष्णोति - अनेन ' इस करणत्र्युत्पत्ति से इस काष्ठखण्ड को ' धृष्टि ' कहा जाता है । इस काष्ठखण्ड से अङ्गारादि को यथावत प्राप्त करने में समर्थ होता है । इस उपवेप से अङ्गारों के द्वारा यज्ञ का परिवेन करता है | उसका स्वरूप - सम्पादन करता है | अतः व्याप्त्यर्थक ' विप्ल ' धातु से ( जु ० उ ० १३ ) ' वेवेष्टीव अनेन ' इस व्युत्पत्ति से इस काष्ठ को ' उपवेष ' नाम से व्यवहृत किया जाता है || ३ || इस उपवेप से ( वह अग्नी ) ' अपाग्न इत्यङ्गारान् प्राचः करोति ' ( का ० श्रौर २।२।४।२५ ) के अनुसार ' अपाग्ने अग्निमामदं जहि निष्क्रव्यादं सेध ' ( २ ) ( यजुः १।१७ ) यह मन्त्र बोलता हुआ गार्हपत्यखरस्थ अपरभागीय अङ्गारों को पूर्वभाग में लेजाता है । कारण इसका यही है कि, ' खर ' के अपरार्द्ध भाग में कपालोपधान का विधान है । अतः इस स्थान को रिक्त करने के लिए यहाँ से श्रङ्गारोदूहन आवश्यक है । वह अग्नि ग्रामात् है, जिससे कि ( १ ) प्रज्ज्वलित, ग्रतएव तीव्र अङ्गारों को यह उपवेष इतस्ततः करने में समर्थ है, इसलिए कहते हैं - हे उपवेष! आप धृष्टि हैं । अर्थात् प्रगल्भ हैं । एकत्रात और ध्यान में रखनी चाहिए । यदि यज्ञकर्त्ता ब्राह्मण है, तो उसका उपवेत्र पलाशशास्त्रा का होता है । क्योंकि ' पालाशो वै ब्रह्म ' के अनुसार ' पलाश ' ब्रह्मवीर्य्य - युक्त है । इसी आधार पर - ' मूलतः शाखां परिवास्य - उपवेपं करोति ' ( सा ० भा ० १।१७ ) यह कहा जाता हैं । २- हे अग्ने! ग्राप अपने आमात् क्रव्यात् स्वरूप का परित्याग कीजिए । शेष भाग्य में स्पष्ट होगा | ६१६

पृष्ठ 356

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प्रथम का एड मनुष्य अन्न का परिपाक किया करते हैं । एवं जिससे पुरुष को जलाते हैं, क्रव्यात्हैं । इह्रीं दोनों भाव को इस ( देवप्राणमय ) यज्ञ से ( उक्त मन्त्र के द्वारा ) पृथक् करते हैं || ४ || अङ्गारोहनानन्तर- ' आ देवयजनमित्यङ्गारमाहृत्य ' ( का ० श्र ० २ | | २ ४ | १६ ) के अनुसार ' आ देवयजं वह ' ( १।१७ ) यह मन्त्र वोलता हुआ ऋत्विक् ( पुरोडाश के श्रपणार्थ ) श्रृङ्गारों का बिभाग करता है । जो अग्नि देवयाट् ( देवताओं का यजन करने वाला ) है, उसी में हम हविद्रव्य का परिपाक करें, उसी में यज्ञ को वितत करें, इसी ( देवभावप्राप्ति के ) लिए अङ्गारों को विभक्त करता है ॥ ५ ॥

' देवयजनं वह ' इस मन्त्र से पूर्व दिशा में लेगए हुए श्रङ्गारों में से मध्य के एक श्रङ्गार को उपवेप के द्वारा पुरोडाश - श्रपणस्थान में लाकर वहाँ उसे प्रतिष्ठित कर श्राग्नी उस प्रतिष्ठित अङ्गार के ऊपर एक कपाल रखता है । अङ्गार के ऊपर कपाल क्यों रक्खा जाता है?, इस की उपपत्ति बतलाते हैं | यज्ञ का वितान करते हुए देवता असुरों के आक्रमण से भयत्रस्त होपड़े । ' असुर राक्षस हमारे इस हवि के नीचे से न निकल पडें देवताओं के भय का यही कारण था । श्रग्नि राक्षसों का नाशक है । इसलिए इसप्रकार ( श्रङ्गार के ऊपर ) कपालोपधान करते हैं । अन्य कपालों में से यही एक मध्यकाल असुरों को नष्ट करने में समर्थ है । अन्य कपाल नहीं । क्योंकि यही यजुष्कृत् ( मन्त्रवल से युक्त ) होता हुआ मेध्य है । इसलिए मध्यम कपाल से ही प्रथम उपधान करते हैं || ६ || कर्म्म का ब्राह्मण ( उपपत्ति - विज्ञान ) बतला दिया गया । अत्र पद्धति बतलाते हैं । यह आग्नीध - ' वमसि पृथिवीं दृह ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य बधाय ' ( १।१७ ) यह मन्त्र बोलना हुआ कपाल को अङ्गार पर रखता है । ' वमसि पृथिवी दृ'ह ' यह बोलता हुआ आग्नीध्र पृथिवी के स्थिररूप के द्वारा कपाल को स्थिर बनाता है । इसी स्थिर, एव दृढभाव से यह आग्नीध द्वेप करने वाले भ्रातृव्य को नष्ट करता है । यजुर्मन्त्रों में पुत्र प्रजा धन आदि अनेक प्रकार की आशी: हैं । अर्थात् भिन्न भिन्न मन्त्रों से भिन्न भिन्न फल प्राप्त किए जाते हैं । उन सब में से प्रकृत में ' ब्रह्मवनिच्वा क्षत्रिवनिच्या ' इस मन्त्र भाग से ब्रह्म, और क्षेत्र की कामना की जाती है । सम्पूर्ण विश्व में ये ही दोनों वीर्य हैं । भाई बन्धु ( जातिबन्धु ) सजात हैं, समानवंशज हैं । सजातवर्ग ही मनुष्य की भूमा ( समृद्धि ) है । ' सजातवनि ' से इसी भूमाभाव की याचा की जाती है । इन सम्पूर्ण भावनाओं को रखता हुआ आग्नीध्र अन्त में ' उपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय ' यह बोलता हुआ कपाल रखता है । ऐसा यह तभी बोलता है, ६२.

पृष्ठ 357

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शतपथब्राह्मण जब कि किसी पर अभिचार की आवश्यकता न हो । यदि सचमुच में यजमान का कोई प्रत्यक्ष में चल शत्रु है, एवं उसे नष्ट करना है, तो आग्नीध को चाहिए कि " अमुष्येति द्विपच्छदे-अभिचरन् ” के अनुसार उक्त वाक्य में उस शत्रु का नाम और समाविष्ट करदे | ' उपदधामि -सांस्कृतिक - पारतन्त्र्यस्य वधाय ' इत्यादिरूप से नामोल्लेख करदे, यही तात्पर्य है । कपालो -पचानानन्तर वह आग्नीध बाम हस्त से कपाल का स्पर्श किए रहता है । स्पर्श किए हुए ही || दक्षिण हाथ से अन्य अङ्गार का हरण करता है । अन्य अङ्गारोपधान, एवं कपाल के च्यवच्छेद से मध्य में असुर राक्षस प्रविष्ट न होजायँ, इसीलिए ऐसा किया जाता है । ब्राह्मण राक्षसों का अपहता है । इसलिए आग्नीध यामहाथ की अङ्ग लि से कपाल का स्पर्श किए रहता है || ८ || अनन्तर — ' अग्ने ब्रह्म गृभ्णीष्व ' यह मन्त्र बोलता हुआ वामहस्त की अनामिका अङ्ग लि से स्पृष्ट कपाल में अङ्गार रखता है । पुरोडाशपण के पूर्व ही कपाल में असुर राक्षस प्रत्रिष्टु न हो पड़े, इसीलिए कपाल में अङ्गार रक्खा जाता है । अग्नि राक्षसों का नाशक है । इसलिए इसी से कपाल को युक्त करते हैं ॥ ६ ॥

मध्यम कपाल के उपधानानन्तर ' धरुणमिति पश्चात् ' ( का ० श्रौ ० २ | ४ | ३० ) के अनुसार मध्यम कपाल के पश्चिम भाग में प्रथमोपहित कपाल से संलग्न कर - धरुणमस्यन्तरिक्षं दृह ब्रह्मवनित्वा ० ' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ आग्नीध द्वितीय कपाल रखता है । अन्तरिक्ष में जो दृढ़ता है, उसीसे इस दूसरे कपाल को युक्त करते हैं । शेष पूर्व से गतार्थ है ॥ १० ॥

द्वितीय कपालोपधानानन्तर ‘ पुरस्ताद्धमिति ' ( का ० श्र ० २ | ४ | ३१ ) के अनुसार-' धमसि दिवं ' ह ' यह मन्त्र बोलता हुआ श्राग्नीध्र मध्यम कपाल के पूर्वभाग में प्रथमोपहित कपाल से संलग्न कर उसके पूर्वभाग में तृतीय कपाल का उपधान करता है । द्युलोक में जो दृढ़ता है, उसीसे इस तीसरे कपाल को युक्त करते हैं । शेष भाग पूर्व से गतार्थ है || ११ || तृतीय कपालोपानानन्तर ‘ विश्वाभ्य इति दक्षिणतः ' ( का ० श्र ० २१४१६२ ) के अनु-सार ' विश्वाभ्यस्त्वा श्राशाभ्य उपदधामि ' यह मन्त्र बोलता हुआ आग्नीध प्रथम कपाल के दक्षिण भाग में प्रथमोपहित कपाल से संलग्न कर चतुर्थ कपाल का उपधान करता है । पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ -- इन तीनों लोकों से अतिरिक्त चौथा लोक है, अथवा नहीं - यह संदिग्ध वित्रय है । उसी मुग्धभावापन्न चौथे लोक से यह अपने ( यजमान के ) शत्रुओं को निकालता है । ६२१

पृष्ठ 358

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प्रथमकाण्ड तीनों लोकों का अतिमरण करने वाला चौथा लोक अनद्धा ( अप्रकट ) है । यह है, अथवा नहीं, यह स्पषुरुप से नहीं कहा जासकता । इधर ये विश्वा आशाएँ ( सम्पणं दिशाएँ एवं आशाएँ ) अनद्धा हैं । इसी सजातीय भात्र को लक्ष्य में रखकर ' विश्वाभ्यस्त्वा आशाभ्यः यह कहा गया है । इसप्रकार प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ - ( मध्यम - पूर्व - पश्चिम - दक्षिण ) इन चारों कपालों का उपधान तो समन्त्रक होता है, एवं इतर ( शेष बचे हुए ) कपालों को वह आग्नीध्र तूष्णीं ही रख देता है | अथवा शेष चार आग्नेय कपालों को ' समं विभज्य द्वेो दक्षिणत एवमुत्तरत ' श्चित-स्थेति ' ( का ० श्रौ ० सू ० २ ४ ३३ ) के अनुसार ' चितस्थोर्ध्वचितः ' यह मन्त्र बोलता हुआ दो मध्यम कपाल के उत्तर में, एवं दो मध्यम कपाल के दक्षिण में, इस क्रम से रखदे || १२ || इसप्रकार आग्नेय अष्टाकपालोपधानानन्तर - ' भृगूणा मित्यङ्गारें र भ्यूहति ' ( का ० श्री २।४।३७ ) के अनुसार‘भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् ' यह मन्त्र बोलता हुआ आग्नीध अङ्गारों से कपालों को आच्छादित करता है । यह अतिप्रखर तेज है, जोकि भृगु - अङ्गिरा का तेज है । हमारेकपाल ष्ट प्रखर तेज से सुतप्त होजायँ, इसीलिए उक्त मन्त्र के द्वारा अङ्गारों से कपालों को आच्छादित किया जाता है ॥ १३ ॥

इति - कपोलापधानम् ब्राह्मण के प्रारम्भ में हीं वतलाया गया है कि कालोपधान, और पदुपलोपधान साथ साथ होता है । कपालोपधान आग्नीध करता है, एवं हविः पेपरणार्थ दृपदुपलापधान अवका क है । जो ऋत्विक् ( श्रध्वर्यु ) कपालोपधान के साथ हपदुपलोपधान करता है, वह ‘ शर्म्मामीति ’ यह बोलता ‘ कृष्णाजिनमादते - पूर्ववत् प्रतिकृष्णाजिनम् ' ( २ | ५ | २ ) के अनु-सार कृष्णमृग चर्म्म उठाता है । अनन्तर - ' अवधूत रक्षोऽवधूता अरातय: यह बोलता हुआ मृगचर्म्म को झाड़ता है | इसका वही प ूर्वोक्त तात्पर्य है । अनन्तर - अदित्यास्त्वगसि प्रतित्वा दितिर्णेत ' यह मन्त्र बोलता हुआ अध्य ' इसे प्रतीचोनग्रीव विद्वाता है । इस की भी वही पक्का उपपत्ति है ॥१४ ॥

कृष्णमृगचर्म्मास्तरणानन्तर- ' तस्मिन् पदं धिषण | सीति ' ( का ० श्र ० २५ ३ ) के अनु-सार अध्वर्यु ' कृष्णमृगचर्म्म पर - धिपणासि पती प्रतित्वादित्यास्त्वग् वेत्त ' ( १११६ ) यह मन्त्र बोलता हुआ बिछे हुए कृष्णमृगचर्म पर हृपन ( सिल ) रखता है । पेपणीय तण्डुलों को अपने ऊपर धारण करने के कारण यह दृषत् ' धिषण । ' ( धारणशीला ) है । पर्वत की श्रवयव ६२२

पृष्ठ 359

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शतपथत्राह्मण भूता होने से ' पती ' है । मृगचर्म्मरूप अदिति पृथिवी के चर्म के साथ इसका सम्बन्ध प्रकट कराने के लिए इस सजातीय सम्बन्ध के द्वारा दोनों के हिंस्रकभाव को दूर करने के लिए ही ' प्रतिवा ' इत्यादि कहा है । पृथिवी अन्तरिक्ष- द्यौ तीनों में निदान के अनुसार यह पन् पृथिवी रूप से मृगचर्म पर प्रतिष्ठित समझनी चाहिए ॥ १५ ॥

हृपदुपधानानन्तर ‘ पश्चाच्छम्यामपोहत्युदीची- ' दिव ' इति ( का ० श्रो ० २१५१४ ) के अनुसार ' विकम्भनीरसि ' यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु हपत के पश्चिम भाग में शम्या को उत्तरा प्रतिष्ठित करता है । तीनों लोकों में से यह शम्या अन्तरिक्ष का रूप है । मध्यस्थ अन्त-रिक्ष के आधार पर ही उपक्रमोपसंहार - स्थानीय प्रथिबी, एवं द्यु लोक स्वस्थान में स्थित हैं । इसी आधार पर शम्या के लिए ' दिवः स्कम्भनीरसि ' यह कहा है ॥ १६ ॥

शम्या को प्रतिष्ठित करने के अनन्तर र- ' पद्य पलां धिपणा सोति ' ( का ० ० २२५५ ) के अनुसार ' धिपास पावतेयी प्रतिया पर्वती वेत्त ' ( १।१६ ) यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु हपत् के ऊपर उपल ( लोढी ) को प्रतिष्ठित करता है । यह उपल पत् की अपेक्षा छोटी सी होती है । अतः निदान के द्वारा यह उस पत की कन्या है । हृपत् पर्वती है । उसकी कन्या होने से उपल ‘ पार्वतेयी ' है । ' अपना अपने को पहिचान लेता है ' यह एक साधारण नियम है । इसी स्वाभाविक सम्बन्ध को अभिव्यक्त करने के लिए ' प्रतित्वा पर्वती ' इत्यादि कहा है । स्त्र का स्व से परिचय होजाने से एक दूसरे पर हि सावृत्ति न रक्खें, यही तात्पर्य है । निदान के अनुसार यह उपल ग्रु रूपा है | चम्म - दृपत् उपल - शम्या आदि से ही यज्ञपुरुष का स्वरूप निर्माण किया जाता है । इनमें दृपत - उपल यज्ञपुरुष के ' हनू ' ( पत् पर्वहनु, उपाल पश्चिम हनु ) हैं । दोनों के मध्यस्थ शम्या ' जिह्वा ' है । हनूमध्यस्था जिह्वा ही शब्द प्रयोग करने में समर्थ है । श्रतएव यहाँ इस वैध यज्ञ में भी ऋत्विग्गण जिह्वा - स्थानीया शम्या से ही पत् के आधार पर ' समाहनन ' करते हैं ॥ १७ ॥

अनन्तर - ' धान्यमसीति तण्डुलानोप्य ' ( का ० श्र ० २३५२६ ) के अनुसार - ' धान्यमसि धिनुहि देवान् ' ( १।२० ) यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु ( पेपणार्थ ) दृघत् पर हवि का आव-पन करता है । यह हविद्रव्य तृप्ति का साधक होने से ' धिनोति ( प्रीणयति ) आत्मगतान् देवान् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' धान्य ' है । यह यज्ञिय देवताओं को तृप्त करै, इसीलिए तो यहाँ इसका ग्रहण किया जाता है । ऐसी अवस्था में इसके लिए ' धान्यमसि ० ' इत्यादि कहना उचित ही है || १८ | ६२३

पृष्ठ 360

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प्रथमकाण्ड विराव पनानन्तर- ' पिनष्टि प्राणायत्वेति प्रतिमन्त्रम् ' ( का ० श्र ० २२५६ ) के अनुसार-' प्राणाय वा पिनष्मि ', उदानाय वा पिनप्मि, व्यानाय च्चा पिनष्मि ' ( १८२० ) यह मन्त्र बोलता हुआ व हविः पेपण करता है । अनन्तर - दीर्घामिति कृष्णाजिने प्रोहति ' ( २ | ५ | ७ ) के अनुसार ' दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रांत-गृभ्णाच्चच्छिद्रेण पाणिना ' ( १।२० ) यह मन्त्र बोलता हुआ पि हवि को दृपन के नीचे बिछे हुए मृगचर्म्म पर स्थापित कर देता है ॥ १६ ॥

अध्वर्यु ' ' प्राणाय स्वा ० ' इत्यादि रूप से जिस प्रयोजन को लक्ष्य में रखकर इत्रिःपेपण करता है, वह बतलाते हैं । अमृतभावापन्न देवताओं का हवि जीवलक्षण ही होता है I । अमृतात्माओं के लिए अमृत अन्न हीं उपयुक्त होता है । इधर उलूखल - मुसल से, एवं द्रपद- उपल से ऋि यज्ञमूर्ति हवि को कूट पीसकर निर्जीव बना देते हैं । कुटा पिसा अन्न मर्त्य है - जीब नहीं | श्रुतः जबतक जीवस्वरूपसम्पादक प्राण - उड़ान ( अपान ), व्यान का पिठु हवि के साथ सम्बन्ध नहीं करा दिया जाता, तबतक यह इत्रि अजीव है । मत्य है । अतएव देवान्न मर्यादा से रहित है । इस आपत्ति को दूर करने के लिए ही ' प्राणाय स्वा ० ' इत्यादि वोल कर हविःपेपण किया जाता है || २० || सो जो कि अध्वर्यु ' ' प्राणाय त्वा उदानाय त्वा ' बोलता है, इससे इस पिए, अतएब निर्जीव हवि में प्राणोदान का समावेश करता है । ' व्यानाय त्वा ' से व्यान का समावेश करता है । ' दीर्घामनु ० ' इत्यादि से दीर्घ आयु का सन्निवेश करता है । हमारा यह हवि देवता के हाथ से गृहीत होता हुआ सुगृहीत बनें, इसलिए ' देवो वः ' इत्यादि वोला जाता है । ' चक्षुषे त्वा ' से चक्षुरिन्द्रिय का समावेश किया जाता है । जीवित व्यक्ति के ये ही लक्षण हैं । इन सबसे इस-प्रकार युक्त होता हुआ पिहवि देवताओं के लिए ' जीव ' बन जाता है । अमृतात्माओं के लिए श्रमृतान्न वन जाता है । इन्हीं कारणों को लक्ष्य में रखकर उक्त प्रकार से हविः पेपरण करते हैं । ऋत्विक् त्रिपीसते हैं । उधर कपालों को तप्त करने के लिए अन्य ऋत्त्विक् अङ्गारों को प्रज्ज्वलित करते हैं ॥ २१ ॥

जिस समय अध्वर्युळे हविः पेपण करता है, उसी समय ब्रह्मा ' पिष्यमाणेषु निर्वपत्य-न्यो महीनामित्याज्यम् ' ( का श्र ० २।५।६ ) के अनुसार सम्पूर्ण पिष्ट हवि में श्राज्य ( घृ d ) डालते हैं । तात्पर्य्य यही है कि, सूत्रकार के मतानुसार पेषण, और श्राज्य - निर्वाप, दोनों कर्म्म एक साथ होने चाहिएँ । इस यज्ञ में देवताओं के लिए जितना हविद्रव्य अपेक्षित होता है, तत्त-III