Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 361–370

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 361 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मण देवनाओं के लिए नाम बोल बोलकर उतना हीं हविद्रव्य लिया जाता है । उस सवय आज्य के लिए किसी देवता का नामोल्लेख नहीं होता! अतः ज्यग्रहण - ' महीनां पयोसि ' इस अनि-रुक्त मन्त्र से हो होता है । मही गोजाति का एक नाम है । उह्नीं का यह पय है । इसी मन्त्र के द्वारा यह आज्य यजुगृहीन होजाता है । इसी आधार पर - ' महीनां पयोऽसि यह कहा है || २२ ||

प्रथमकाण्डान्तर्गत- द्वितीयाध्याय का प्रथम ब्राह्मण उपरत ।

प्रथमकाण्डान्तर्गत- प्रथम प्रपाठक का पञ्चम ब्राह्मण उपरत ॥

१।२।११ – १११।५ । अध्यात्मयज्ञरहस्य– भाष्य ) हविःश्रवणार्थ कपालोपधान, एवं हविः पेषणार्थ यदुपलोपधान, दोनों कर्म्म एक साथ क्यों किए जाते है?, इस प्रश्न का वैज्ञानिक समाधान करते हुए महर्षि याज्ञवल्क्य अध्यात्मविज्ञान का ही स्पष्टी-करण कर रहे हैं । उनका कहना है कि अध्यात्मयज्ञ में कपालस्थानीय शिरोभाग, एवं पिष्ट पुरोडाश स्था— ' मस्तिष्क ( भेजा ) का, दोनो का निर्माण एक साथ होता है । अतः तत्प्रतिकृतिभूत हमारे इस वैध मनुष्य यज्ञ में भी वैसा ही करना उचित है । पूर्वप्रतिपादित यज्ञसम्बन्धी तत्तत् कम्मों की अध्यात्मविज्ञान के साथ तुलना करते हुए हमने ऐमा संकल्प व्यक्त किया था कि, ' पुरोडाशत्राह्मण ' में इस विषय का विषद विवेचन किया जायगा | अब वह अवसर आ गया है । अतः संक्षेप से ' अध्यात्मयज्ञ विज्ञान ' का स्वरूप वेदप्रेमी पाठकों के समक्ष उपस्थित किया जारहा है । आशा है विषय को दुरुहता को लक्ष्य में रखते हुए पुनरुक्ति - भावों की उपेक्षा न की जायगी । सनातन शास्त्र मौलिक, एवं यौगिक भेद से दो भागों में विभक्त है । मौलिकतत्त्व विज्ञानशास्त्र में ' ब्रह्म ' नाम से प्रसिद्ध है, ' एवं यौगिक तत्व ' यज्ञ ' नाम से व्यवहृत हुआ है । यज्ञ ‘ आधेय ' है, एव ब्रह्म आवार, है । ब्रह्म के आधार पर ३३ तन्तु युक्त यज्ञ का वितान होता है । आज की विज्ञानभाषा में सम-झने मात्र के लिए- यदि ब्रह्मतत्त्व को हम याधुनिक विज्ञानपरिभाषा के अनुसार ' फिजिक्स ', एवं यज्ञतत्त्व को ' केमेस्ट्री ' कहें, लो कोई क्षति न होगी । विज्ञानवेत्ता यह भलीभाँति जानते हैं कि, दो पदार्थों का रासायनिक सँयोग ( सम्मिश्रण ) होने से दोनों पदार्थों का पूर्वस्वरूप उपमार्हित होजाता है । एवं दोनों के इस रासाय-निक संयोग से एक अपूर्व नवीन पदार्थ उत्पन्न होजाता है । जिनके संयोग से यह अपूर्व पदार्थ उत्पन्न होता है, वे दोनों मौलिक हैं । इन मौलिक ब्रह्मों का सामान्य सम्बन्ध अपूर्वता का कारण नहीं बनता । ऐसा सामा-न्य सम्बन्ध तो ‘ योग ’ तम्बन्ध ही कहलाता है । दूध, और पानी का सम्बन्ध ऐसा ही है । परन्तु ' अन्तर्य्याम ' नाम से प्रसिद्ध ' ब्रन्थिबन्धन ' सम्बन्ध से दोनों का स्व - स्वरूप उपमर्द्दित - श्रभिभूत होजाता है । सोरा, एवं कोयला, दोनों में जब ऐसा सम्बन्ध होजाता है, तो तीसरा पूर्व स्वरूप उत्पन्न होजाता है । वही ६२५,

पृष्ठ 362

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 362 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मणा ' बारूद ' है । इसी सम्बन्ध को ' यज्ञ ' कहा जाता है । यही यज्ञ ' याग ' नाम से प्रसिद्ध है । ' योग ', एवं ' याग ( यज्ञ ) ' में यही महान् अन्तर है । सर्वथा मुसूक्ष्म श्रात्मतत्त्व अपने क्षरभाग के द्वारा एकमात्र इसी यज्ञसम्बन्ध के कारण विश्व एवं विश्व में रहने वाली प्रजा के स्वरूप में परिणत होरहा है । सम्पूर्ण प्रपञ्च दो मौलिक तत्त्वों का संयोगमात्र है । दो तत्त्वो के मिलने से ही यह विश्व विनिर्मित है । विश्व में दो नियतियों का ही साम्राज्य है । दूसरे शब्दों में - विश्व ' द्विनियति ' है । इसी ' द्विनियति ' का रूपान्तर - ' दुनिया ' है । दुनिया दुरङ्गी है । अर्थात् सदैव यागात्मिका द्विनियति से व्याक्रान्ता है । प्रश्न होता है कि, जिन दो तत्त्वों के संयोग से, दूसरे शब्दों में याग से यह विश्व उत्पन्न हुआ है, उन दोनों का क्या स्वरूप है?, एवं विज्ञान जगत् में वे किन नामों से प्रसिद्ध हैं? इस प्रश्न का समाधान करने के लिए मुपरिचित तेज, एवं स्नेह, टी तत्त्व ही हमारे सम्मुख उपस्थित होते हैं । तेजतत्त्व ङ्गिग है, एवं स्नेहत्तत्त्व भृगु हैं । ग्रङ्गिरा अग्नि है, एवं भृगु सोम है । अग्नितत्त्व तेजोरूप होने से त्रिशकलन-धर्मा है, एवं सोमतत्त्व स्नेहरूप होने से संकोचधर्म्मा है । जब अग्नितत्त्व में सोमतत्त्व प्रविष्ट होजाता है, याज्ञिक परिभाषा के अनुसार जब अग्नि में सोम आहुत होजाता है, तो पदार्थ का स्वरूप निष्पन्न होजाता है । अनि गतिधर्मा है, एवं सोम स्थितिधर्म्मा है । गति, और स्थिति का समुच्चय ही पदार्थ है । प्रत्येक पदार्थ वनता हुआ बिगड़ रहा है । विशकलित परमाणुओं का संगठन हीं तत्तत् पदार्थों की उत्पत्ति है, एवं यही उसका ' बनना ' है । यह क्रिया स्नेहधर्म्मा सोम पर निर्भर है । जब स्नेहसूत्र विच्छिन्न होजाता है, तो पदार्थ के परमाणु श्लथ होते हुए विक्री होजाते हैं, विखर जाते हैं । यही उस पदाथ की विष्ट है । सम्भूति सोमाहुति पर निर्भर है, एवं विनाश शुद्ध अग्नि की कृपा है । जबतक सम्भूति - मूलक सोमग्नि में आहुत होता रहता है, तभीतक यज्ञ है । जबतक यज्ञ है, तभीतक पदार्थ का जीवन है । जिस दिन सोमाहुति अवरुद्ध होजाती है, पदार्थस्वरूप नष्ट होजाता है । यज्ञ ही विश्व का जीवन है । यज्ञ के द्वारा ही ईश्वरप्रजा-पति ने सबका निर्माण किया है । ' अग्नि में सोम का आहुत होना हीं यज्ञ है ' यह सिद्धान्त व्यवस्थित हुया । यह यज्ञ प्राण-प्राणी - भूत, भेट से तीन भागों में विभक्त है । प्रणलक्षण यज्ञ श्रधिदैविक यज्ञ है, प्रारणील क्षण यज्ञ आध्यात्मिक यज्ञ है, एवं भूतलक्षण यज्ञ श्रधिभौतिक यज्ञ है । ये तीनों हीं प्राकृतिक यज्ञ हैं । इन तीनों का प्रवर्त्तक ईश्वरप्रजापति है । उसका यह यज्ञ कभी अवरुद्ध नहीं होता । इस त्रिधा विभक्त नित्ययज्ञ के आधार पर ही ऋषियोंनें ' मनुष्ययज्ञ ' किंवा ' वैधयज्ञ ' का वितान किया है, जैसा कि ग्रागे जाकर स्पष्ट होजायगा । तीनों यज्ञों में से भूतयज्ञ को अभी छोड़ते हैं, एवं शेष प्राणयज्ञ तथा प्राणीयज्ञ की ओर ही आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । प्राणीयज्ञ का मूलाधार प्राणयज्ञ है, अतः प्रधान होने से सर्वप्रथम उसी का संक्षिप्त स्वरूप उपक्रान्त होरहा है । ( १ ) - “ प्राणलक्षण आधिदैविक यज्ञ " -जिम अग्नीषोमात्मक यज्ञ का पूर्व के सन्दर्भ में दिग्दर्शन कराया गया है, वह यज्ञ ' पाङ तो वै यज्ञः ' इस अनुगमधति के अनुसार पाँच भागों में विभक्त है । अनुगमश्र तियाँ अनेक अर्थों का प्रतिपादन करती ६२६

पृष्ठ 363

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 363 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मण हैं | यज्ञ की पाङ ्मक्तता ( पञ्चावयवता ) अनेक भावों से सम्बन्ध रखती है । अतएव ' पाको वै यज्ञः ' इस रूप से इसका उल्लेख किया गया है । उदाहरणार्थ - विश्वव्यापक ' महायज्ञ ' को ( जोकि ' महायज्ञ ' ' सर्व-हुनयज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध है ) ही लीजिए । इस महायज्ञ के – स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा, पृथिवी, ये पाँच अवयव हैं । सम्वत्सरयज्ञ के – अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य, पशुबन्ध, ( अयन ), सोम, भेट से पाच अवयव हैं । प्रकारान्तर से पाकयज्ञ ( गृह्ययज्ञ - स्मार्त्तयज्ञ ), हविर्यज्ञ, महायज्ञ, अतियज्ञ. शिरोयज़ - भेद से भी यज्ञ पाङक्त है । तीन लोक, दो सन्धियाँ, इस प्रकार से भी यज्ञमूलक अग्नि पञ्च-चितिक है । प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान, भेद से अध्यात्मयज्ञ भी पाङक्त है । गुहा, आप:, ज्योति, रस, अमृत, भेदविभूतयज्ञ भी पाङक्त ही है । निदर्शनमात्र है । यज्ञ जितने भी हैं, सब पाक्त हैं । इन सत्र में से प्रकृत में सम्वत्सरयज्ञ की पाङक्तता ही अत्र अभिप्रेत है । बृहतीछन्द के मध्य में ( विश्वद्वृत्त के मध्य में ) सूर्य्य स्थिररूप से तप रहा है । इसको केन्द्र मान कर भूपिण्ड अपने अक्ष पर घूमता हुआ सूर्य के चारों ओर नियत मार्ग पर परिभ्रमण किया करता है । जिस स्थिर वृत्त पर भूपिण्ड परिक्रमा करता है, वह वृत्त ' क्रान्तिवृत्त ' नाम से प्रसिद्ध है । इस क्रान्तिवृत्त में पार्थिव गायत्राग्नि, एवं सौर सावित्राग्नि भरा हुआ है । इस स्थिर माण्डलिक प्राणाग्नि का नाम हीं ' सम्वत्सर प्रजापति ' है । अग्नि अन्नाद ( अन्न खाने वाला ) है । जबतक इसमें अन्न की आहुति होती रहती है, तभीतक यह अन्नाद स्वरूप में प्रतिष्ठित रहता है | जिस अन्न की इस सम्वत्सराग्नि में ग्राहुति होती है, वह ' सोम ' नाम से प्रसिद्ध है | अग्नि दाहक तत्त्व है, एवं सोम दाह्य है । दाय सोम की ग्राहुति से दाहक अग्नि प्रज्ज्वलित होजाता है | सोम की आहुति से ही अहोरात्र, पक्ष, ऋतु, अयन, वर्ष भेद से व्यापक अग्नितत्त्व पाँच भागों में विभक्त होजाता है । इसीलिए अग्नीषोमात्मक सम्वत्सग्यज्ञ भी पाँच भागों में विभक्त होजाता है । अहो -रात्रयज्ञ ही ‘ अग्निहोत्रयज्ञ ' है । पाक्षिकयज्ञ हा ' दर्शपूर्णमासयज्ञ ' है । ऋतुयज्ञ ही ' चातुर्मास्ययज्ञ ' है । यनयज्ञ ही ' पशुबन्धयज्ञ ' है । एवं सम्वत्सरयज्ञ ही ' सोमयज्ञ ' है । इसप्रकार एक ही यज्ञ कालपर्वभेद से पाँच स्वरूप धारण कर लेता है । इस प्राकृतिक सम्वत्सरयज्ञ के हविर्यज्ञ, सोमयज्ञ, भेद से दो विभाग समझने चाहिएँ । प्रतिष्टालण पृथिवी - ( पिण्डपृथिवी ) - यज्ञ ही हविर्यज्ञ है | एवं स्तौम्यत्रिलोकी में व्याप्त महायज्ञ, किंवा वितानयज्ञ ही सम्वत्सरयज्ञ है । भूपिण्ड का जो भाग सूर्य की ओर रहता है, उसमें सौर दिव्य प्राण की प्रधानता रहती है । सौर अग्नि ' आहवनीय ' कह— लाता है । ऐसी अवस्था में सूर्य्यानुगत पार्थिव दिव्याग्नि को हम अवश्य ही भूपिण्डरूप हविर्यज्ञ का ' आव-नीय ' मान सकते हैं । एवं सूर्य के प्रतिदिक में रहने वाला पार्थिवाग्नि पृथिवी का प्रातिस्त्रिक भाग है । यह पार्थिवाग्नि पृथिवीरूप गृह का पति बनता हुआ गार्हपत्याग्नि है । एवं दक्षिणभागस्थ वायुरूप ऋताग्नि दक्षिणाग्नि, किंवा श्रपणाग्नि है । तथा श्रोपधि वनस्पतियाँ हविद्रव्य हैं । उसी ऋताग्निरूप दक्षिणा-ग्नि से इस हवि का परिपाक होता है । परिपक्क हवि की उस दिव्याग्नि, किंवा ग्राहवनीयाग्नि में आहुति होती है । यह है प्रतिष्ठालक्षगण भूपिण्डस्वरूप हविर्यज्ञ का संक्षिप्त स्वरूप । सम्पूर्ण भूपिण्ड को गार्हपत्य समझिए । न केवल भूपिण्ड को ही, अपितु त्रिवृत्स्तोमपर्यन्त गार्हपत्य की सत्ता मानए । क्योंकि भूपृष्ठ से ऊपर त्रिवृत्स्तोम पर्य्यन्त पृथिवीलोक ( स्तोम्यत्रिलोकी के पृथिवी-६२७

पृष्ठ 364

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 364 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथमकाण्ड लोक) ही सत्ता रहती है । पञ्चदशस्तोमपर्यन्त नक्षत्राग्नि के सम्बन्ध से ' धिष्ण्य ' नाम से प्रसिद्ध दक्षिणाग्नि है | एकविंशस्तोम पर्य्यन्त दिव्य आहवनीयाग्नि है । श्राहवनीय की सत्ता यद्यपि सप्तदश स्तोम पर ही है । किन्तु सोमाहुति से वह अग्नि २१ स्तोम पर्यन्त व्याप्त होजाता है । अतः वहाँतक आहवनीय की सत्ता मानली जाती है । इसी आहवनीय में सोम की आहुति होती है । इसी आहुति से सम्वत्सरयज्ञ का स्वरूप निष्पन्न होता है । इस अग्नीषोमात्मक यज्ञ से ही सम्पूर्ण पार्थिव - विश्व का सञ्चालन होरहा है । पार्थिव - लोक - प्रजा-' वर्म्म - वेद, आदि सम्पूर्ण सृष्टियों का प्रवतक यही अग्नीषोमात्मक सम्वत्सरयज्ञ है । उत्पन्न होने वाली प्रजा का प्रभव, प्रतिष्ठा, परायण यही सम्वत्सरयज्ञ है । अतएव ब्राह्मणग्रन्थों में इसे ' प्रजापति ' शब्द से व्ययहृत किया गया है । प्रजापतिने यज्ञ के द्वारा सम्पूर्ण प्रजा ( पार्थिव विश्वान्तर्गत स्थावर जङ्गमरूप यच्चय।वत् पदार्थ ) उत्पन्न की है । इसी यज्ञ से प्रजापति अपना ' इ ' साधन कर ' काम ' बन रहे हैं । ऐसी अवस्था में ईश्वरप्रजापति के प्रतिरूपात्मक सम्वत्सरप्रजापति के अंशभूत पुरुषप्रजापति ( मनुष्य ) के इष्ट-सावन के लिए प्राप्तकाम बनने के लिए यदि कोई सर्वोत्तम साधन है, तो यही यज्ञ । यज्ञ के द्वारा यह सबकुछ प्राप्त करने में समर्थ है । इसी ' प्राजापत्ययज्ञ ' - विज्ञान को लक्ष्य में रखकर यज्ञेश्वर भगवान् मधुसूदन

कहते हैं-सह यज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।

अनेन प्रसविष्यध्वमेप वास्त्विष्टकामधुक् ॥

गीता यह है अधिदैविक ' प्राणलक्षण ' प्राकृतिक यज्ञ का संक्षिप्त निदर्शन । अत्र प्राणीलक्ष ' अध्यात्म-यज्ञ ' की ओर ही आपका ध्यान नाकर्षित किया जा रहा है । ( २ ) प्राणीलक्षण - अध्यात्मयज्ञ-शुक्र की विन्दुमात्र से विचित्राकाराकारित मनुष्य का स्वरूप सपन्न होजाता है, यह महा आश्चर्य है । स्त्री के शोणित में रेतोधा पुरुष के द्वारा ग्राहुत होने वाली यत्किञ्चित् सी शुक्रबिन्दु का परस्पर सर्वथा बिभिन्न आँख - कान - नाक- ग्रीवा - पाद - हस्त - उर - उदर - मस्तक - यादि विविध भावों में परिणत होजाना सचमुच कम नहीं है । इस आश्चर्य की निवृत्ति का उपाय है ' यज्ञस्त्ररूप - रहस्य ' को यथावत् समन्वित कर लेना । पुरुष के उत्पन्न होने में आश्चर्य । उत्पन्न होने के अनन्तर उस में केश - दन्त आदि का जो विविध परिवर्तन होता है, वह आश्वर्य्यमय । इसप्रकार पुरुष की स्वरूपस्थिति अथ से इति पर्य्यन्त मादृश प्राकृत मनुष्यों के लिए तो सर्वात्मना आश्चर्य्यमयी ही प्रमाणित होरही है । इन सम्पूर्ण श्रश्वय्यों का मूल-कारण यज्ञ ही है । यज्ञ अनेक प्रकार के हैं । विविधभावापन्न उन सब यज्ञों का अध्यात्मसंस्था के साथ सम्बन्ध होता है । प्राकृतिक अग्निहोत्र - दर्शपूर्णमास्य- चातुर्मास्य - श्रयन - सोम गवामयन – अङ्गिर-मामयन - आदित्यानामयन चयन आदि आदि सभी नित्य यज्ञों का यहाँ भोग होता है । यज्ञभेद ही सृष्टि-भेद का कारण है । उन सब यज्ञों में से प्रकृत में प्रधानरूप से ज्योतिष्टोमा परपर्य्यायक सम्वत्सरयज्ञ का ही त्र प्रमुखरूपेण ग्रहण समझना चाहिए । ६२८

पृष्ठ 365

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 365 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मण अग्नि में सोम का आहुत होना हीं यज्ञ है, यह पूर्व में कहा जाचुका है । अग्नि सात प्रकार का है । अतएव अग्नियज्ञ सात भागों में विभक्त होजाता है । इसी आधा पर ' ज्योतिष्टोम ' नाम से प्रसिद्ध इम अग्नियज्ञ के लिए ' सप्तसंस्थो वै ज्योतिष्टोमः ' - यह कहा जाता है । वे सातों सस्थाएँ यज्ञसम्प्रदाय में-अग्निम, अत्यग्निप्रोम, उक्थ्यस्तोम, पोडशीस्तोम, अतिरात्रस्तोम, वाजपेयस्तोम, आप्तोर्याम-स्तोम, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । अग्नि अन्नाद है । अग्नि सात प्रकार का है । श्रतएव उसमें बहुत होने वाला अन्न ( सोम ) नी सात भागों में विभक्त रहता है । इसी अन्नविज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' यत्सप्तान्नानि तपसाननयत् पिता ' ( उपनिषत् ) यह अनुगम प्रतिष्ठित है । सम्वत्सराग्नि त्रैलोक्याग्नि है । त्रिवृत्स्तोम - स्थानीय घना-ग्नि पार्थिवन है । यह प्राणाग्नि - पान है । यान्तरिक्ष्य तरलाग्नि वायु है । यह व्यान है । दिव्य एकविंशस्तोमस्थ विरलाग्नि आदित्य है । यह प्रारण है । तीनों हीं अग्नियाँ प्राणरूप हैं । रूप - रस - गन्ध-स्पर्श - शब्द -- शून्य - धामच्छद तत्त्व ही प्राण है । अतएव प्राणलक्षण इन उपर्युक्त तीनों हीं अग्नियों में न ताप है, न उष्मा है | इन तीनों के समन्वय से नवीन तापधर्म्मा अग्नि उत्पन्न होता है । वही पृथिवी -अन्तरिक्ष- द्यौ, इन तीनों विश्वों के अग्नि वायु - आदित्य इन तीनों नरों के नायक - अधिपतियों के ) संयोग से उत्पन्न होने के कारण ' वैश्वानर ' नाम से प्रसिद्ध है । ' आ यो द्यां भात्यापृथिवीम् -'वैश्वानरो यतने सूर्येण ' के अनुसार यह वैश्वानर त्रैलोक्य में व्याप्त है । इसी वैश्वानर में सोमाहुति होती है । इसी से पशुसृष्टि ( पुरुष - अश्व - गो- अवि - अज भेट से पशु पाँच प्रकार के हैं ) होती है । यही वैश्वानरयज्ञ साक्षात् सम्वत्सरयज्ञ है । हमारा प्रबर्त्तक यही यज्ञ है । यही सम्बत्सरयज्ञ - ' गवामयन ' नाम से प्रसिद्ध है । गवामयन नाम से प्रसिद्ध वैश्वानराग्निमय सम्वत्सरयज्ञ ही पुरुषपशु का उपादान है, इसी आधार पर - ' पुरुषो वै सम्वत्सरः ' यह कहा जाता है | सम्बत्सरयज्ञ में भूपिण्ड हविर्वेदि है । इसी पर पूर्वकथनानुसार हविर्यज्ञ निम्पन्न होता है । भूपिएड से ऊपर का त्रैलोक्य महावेदि है । इसमें सोमरूप सम्वत्सरयज्ञ निष्पन्न होता है । पुरुष का पानाग्नि गार्हपत्याग्नि है । दक्षिण पार्श्वस्थ जाठराग्नि श्रपणाग्नि है । मुखाग्नि आहवनीय है । आध्यात्मिक प्राणदेवताओं को तृप्त करने के लिए इसी में अनरूप हवि की ग्राहुति दी जाती है । सोमयज्ञ - संस्था में पुरुष का शिरोऽग्नि गार्हपत्य है । इससे प्रारम्भ कर २१ विशस्तोम पर्य्यन्त महावेदि है । इसमें वही व्यवस्था है, जोकि प्राणलक्षण मोमयज्ञ में बतलादी गई है । ऊपर बतलाया गया है कि, सम्वत्सरयज्ञापरपर्य्यायक गवामयनयज्ञ का ही प्रकृत में सम्बन्ध यद्यपि इस विषय का विशद विवेचन उसी प्रकरण में ( शत १२ काण्ड में ) किया जायगा । तथापि प्रकरण सङ्गति के लिए उस विषय का संक्षिप्त निदर्शन यहाँ भी करा दिया जाता है । गवामयनयज्ञ सम्वत्सरयज्ञ है । सम्वत्सरयज्ञ के अधिष्ठाता भगवान् सविता ( सविताप्राणात्मक सूर्य्यं ) है । ' सूर्यो बृहती मध्यूढस्तपति ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार सूर्य सम्वत्सरचक्र के मध्यस्थ ' विष्ञवृत्त ' नाम से प्रसिद्ध ' बृहतीछन्द ' पर प्रतिष्ठित है । इस बृहतीछन्द से दक्षिण की ओर का २४ अंशात्मक सम्पूर्ण दक्षिणभाग ' दक्षिणगोल कहलाता है । एवं विष्वद्वृत्त से उत्तर की ओर का २४ अंशात्मक सम्पूर्ण उत्तरभाग ' उत्तरगोल ' नाम से प्रसिद्ध है । ६२६

पृष्ठ 366

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 366 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथमकाण्ड ४८ अंशात्मक उत्तर - दक्षिण गोलात्मक इसी प्रदेश का नाम है ' सम्वत्सर ' । प्रदेश का नाम सम्वत्सर नहीं है, अपितु इस प्रदेश में रहने वाले पार्थिवाग्निमिश्रित सौर अग्नि का नाम सम्वत्सर है । पृथिवी के परिभ्रमण कारण हीं यह अग्नि सम्वत्सर नाम से प्रसिद्ध हुआ है । पृथिवी सूर्य के चारों ओर घूमती है, यह वेदाभिमत सिद्धान्त है । परिभ्रमणशीला इस पृथिवी का परिभ्रमणमार्ग सर्वथा निश्चित है । क्रान्ति-वृत्त को यह कभी नहीं छोड़ती । इसप्रकार एकमात्र क्रान्तिवृत्त को अचलभाव से पकड़े हुए पृथिवी सूर्य्य के चारों ओर घूमती है । अतएव परिभ्रमणशील यह पार्थिवाग्नि ' एकत्र विन्दौ - एकीभावेन वसन् सन् पार्थिवाग्निः सरति गच्छति ' इस व्युत्पत्ति से यह वर्ष व्यापक, दूसरे शब्दों में क्रान्तिवृत्तावच्छिन्न पार्थिवाग्नि-मण्डल ' सम्वत्सर ' नाम से प्रसिद्ध हो गया है । श्रपिच सूर्य के चारों ओर घूमने वाली पृथिवी बिन्दु - विन्दु से बक्रित होती हुई ही आगे चलती है । सौरप्राण के आकर्षण से सीधे मार्ग में न जाकर पृथिवी सूर्य्य की ओर मुड़ जाती है । प्रतिबिन्दु में होने वाली इस वक्रता के कारण हीं पृथिवी - परिभ्रमणमण्डल गोलाकार होनाता है । आप जितने भी वर्तुलवृत्त देखते हैं, सबमें यही उपयुक्त व्यवस्था है । गोल वस्तु की प्रतिविन्दु वक्रित रहती है । वक्रभाव से ही ' वन्तु ' लता ' उत्पन्न होती है । पार्थिवाग्नि का स्वरूप भी ऐसा ही है, अतएव ' सर्वत: त्सरति ' इस व्युत्पत्ति से भी इस पार्थिवाग्निमण्डल को ‘ सर्वत्सर ' कहा जाता है । ' सर्वत्सर ' ही परोक्षप्रिय देवताओं की परोक्ष भाषा में ‘ सम्वत्सर ' नाम से प्रसिद्ध होगया है । सम्वत्सर शब्द के इसी निर्वचन का स्वरूप बतलाती हुई वाजिश्रुति कहती है— " स ऐक्षत प्रजापतिः - सर्व वा अत्सारिषं य इमा देवता असृतीति । स सर्वत्सरो-भवत् । सत्सह नैं नामैतद्यत्सम्वत्सर इति " - -- शतपथ ११ कां ० १ प्र ० ६ व्रा ० ११ कं ० इस सम्वत्सराग्नि का भोग वर्ष भर में होता है । अतएव आगे चलकर वार्षिक अग्नि का वाचक शब्द काल में भी नियुक्त होगया है । आज दिन सम्वत्सर काल का वाचक माना जाता है । परन्तु विश्वास रखिए, सम्वत्सर को काल समझना गौणभाव है । वस्तुतः वर्षमण्डल में व्याप्त चर - अचर - सृष्टि का प्रभव, सोमगर्भित अग्नितत्त्व ही सम्बत्सर है | यही व्यवस्था अहः, पक्ष, श्रयन, आदि के सम्बन्ध में समझनी चाहिए । पूर्वोक्त सम्वत्सरयज्ञ में सौरमण्डल के तं न मनोताओं का भोग होता है । जिस तत्त्व के आधार पर जो वस्तु प्रतिष्ठास्वरूप अपने हृदयस्थ मनोभाव को स्वस्वरूप में सुरक्षित रखने में समर्थ होती है, दूसरे शब्दों में - जीवनसत्ता का कारणभूत हृदयस्थ मन जिस तत्त्व में ओतप्रोत रहता है, वही तत्त्व विज्ञानभाषा में ' मनोता ' नाम से प्रसिद्ध है! उदाहरणार्थ - अग्नि को ही लीजिए । अग्नि के आधार पर ही वसु रुद्र आदित्य-इन्द्र - प्रजापति, अश्विनी, आदि देवता प्रतिष्ठित हैं । एक ही अग्नि के विवर्त्त सम्पूर्ण ( ३३ ) देवता हैं | इसीलिए ' अग्निः सर्वा देवता: ' ( शत ० ) इत्यादि रूप से अग्नि को ' सर्वा देवता: ' माना जाता है | किसी भी देवता के लिए आहुति दी नाय, सबकी आधारभूमि अग्नि ही है । यह तत्त्व सत्र देवताओं का मुख है | सम्पूर्ण देवता अग्निमुख हैं । यही सबमें अग्रणी होने से ' अ ' कहलाता है । परोक्षप्रिय देवताओं की परोक्ष भाषा में यही ' अप्रि ' ' अग्नि ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । यह अग्नितत्त्व सब देवताओं का अधिष्ठाता है, दूसरे शब्दों में इसी में सम्पूर्ण देवताओं के मन ओतप्रोत हैं, अतः ' अग्नौ सर्वेषां देवानां मनांसि -६३०

पृष्ठ 367

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 367 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मण ओतानि ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार हम अग्न को देवताओं का ' मनोता ' कह सकते हैं । ( देखिए शत ० ६ कां ० ) । यही व्यवस्था ज्याति, गौः, आयु के सम्बन्ध में समझिए । विश्व के प्रत्येक पदार्थ में हम ज्योति, भूत, आत्मा, इन तीनों भावों को प्राप्त करते हैं । साथ ही में इतना अवश्य ध्यान रखना होगा कि, कहीं रूपज्योति मिलेगी, कहीं परज्योति, तो कही स्वज्योति । उदाहरणार्थ पहिले सूर्य को ही लीजिए । सूर्य्य का गोला सावित्राग्निमय है | यह सूर्य्यपिण्ड भूतभाग है | सूर्य्य के केन्द्र में रहने याला तत्त्व ग्रात्मा है । इसी आत्मतत्त्व को लक्ष्य में रखकर ' योऽसावा-दित्ये पुरुषः सोऽहम् ऐ ० उ ० ) इत्यादि कहा जाता है । साथ ही में सूर्य्यं स्वज्योतिर्म्मय है, यह तो स्पष्ट ही है । सूर्य स्वतः प्रकाशी है । इसका प्रकाश अपना प्रकाश है । चन्द्रमादि की भाँति यह अन्य किसी के प्रकाश से प्रकाशित नहीं होरहा । अत्र चलिए चन्द्रमा की ओर । चन्द्रमा पानीयपिण्ड ( जलका गोला ) है । यह पिण्ड भूत भाग है । हृदयस्थ भाग आत्मा है । चन्द्रिका ज्योति है । यह चन्द्रिका सूर्य्यज्योति से सम्बन्ध रखती है | चन्द्रा का प्रकाश अपना प्रकाश नहीं है । अपितु सौर प्रकाश से ही यह चन्द्रमा प्रकाशित होरहा है । इसी रहस्य का निरूपण करती हुई ऋक ति कहती है— अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यम् । इत्था चन्द्रमसो गृहे ।! —ऋक्संहिता वैज्ञानिक महर्षि रूपज्योति के अधिष्ठाता त्वा नाम से प्रसिद्ध आदित्य के परम मनोहर गोतत्त्व का ( रश्मियों का ) इसप्रकार ( जैसा देखा जाता है ) चन्द्रमा के घर में नमन मानते हैं । इसीलिए इस चान्द्र– ज्योति को हम ‘ परज्योति ' मान सकते हैं । भूपिण्ड भूतभाग है । केन्द्रस्थ प्राणाग्नि इस भूतपिण्ड का आत्मा है | एवं रूपज्योति ही अत्र प्रधान है । पृथिवी का स्वरूपमात्र ही हमारे लिए दृश्य बनता है । पृथिवी अपने स्वरूपमात्र को दिखलाने में समर्थ है । चन्द्रमा, एवं सूर्य्यवत् इसमें अन्य पदार्थों को अपने प्रकाश से दिखलाने का सामर्थ्य नही है । पार्थिव पदार्थमात्र में इसी रूपज्योति की प्रधानता है । साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि, रूपज्योतिर्मय जितने पदार्थ हैं, सब ' पृथिवी ' नाम से व्यवहृत होते हैं । परज्योतिर्मय यच्चयावत् पदार्थ चन्द्रमा हैं, एवं स्वज्योतिर्म्मय सम्पूर्ण पदार्थ सूर्य हैं । स्वाती नक्षत्र स्वज्योतिर्मय होने से ही ' सविता ' नाम से व्यवहृत होता है | इस निदर्शन से प्रकृत में हमें बतलाना यही है कि, त्रैलोक्य के पदार्थमात्र में प्रत्येक में ज्योति, आत्मा, भूत, इन तीनों भाव का साम्राज्य है । त्रैलोक्य का प्रभव, प्रतिष्ठा, परायण, सूर्य है । उस सू के उक्त ज्योति, गौ, आयु, ये तीन मनोता हैं । सूर्य का सूर्य्यत्त्व इह्रीं तीनों मनोताओं के आधार पर प्रतिष्ठित है । ये ही तीनों मनोता क्रमशः ज्योति, भूत, आत्मा, के आधार हैं । ज्योतिर्भाग से देवतापरपर्य्यायक प्रत्येक पदार्थ का ज्योतिर्भाग निष्पन्न होता है । गौ भाग से भूत का निर्माण होता है, एवं आयुभांग से आत्म-स्वरूप सम्पन्न होता है । ज्योति से ' ज्योतिष्टोम ' यज्ञ वा स्वरूप सम्पन्न होता है । गौ से ' गोष्टोम ', एवं आयु से आयुप्रोम की स्वरूप - निष्पत्ति होती है । तीनों हीं सम्वत्सरयज्ञ हैं । सम्वत्सर में तोनों की सत्ता है । ६३१

पृष्ठ 368

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 368 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथमकाण्ड कराना है, एवं इसका सम्बन्ध गोष्टोमा पर प्रकृत में हमें भूतप्रधान शरीर की रचना - वैविध्य का के दिग्दर्शन सम्वत्सर की ओर ही पूर्वमें आपका ध्यान आकर्षित पयिक गवामयन के साथ है | अतः ' गवामयन ' नाम के तारतम्य से ही शरीर में वैवित्र्य होगया है । किया गया है । गवामयनया में होने वालीं आहुतियों २४ - २४ - अशं के अन्तर पर पृथिवी घूमती है । यह है विष्वद्वृत्त के केन्द्र में सूर्य है । इसके चारों और पृथिवी गो है । इसका अयन ( गमन ) ही आधिदैविक गवामयन सम्वत्सर का स्वरूप परिचय गवामयन है । घन - भाव- शून्य ) तरल ग्राज्य की ब्राह्मणग्रन्थों में एक प्रश्न किया है कि, जबकि अन स्थिमत् ( हुई है? इस प्रश्न का समाधान करती आहुति होती है, तो उससे अस्थियुक्त प्रजा कैसे उत्पन्न से होजाती निस्थमत् ही है । परन्तु उस में हिरण्यश-ब्राह्मणश्रुति कहती है कि, वास्तव में श्राज्यभाग तरल श्राज्य होने की आहुति दी जाती है, अतएव प्रजा अस्थिमती कल ( सोने का टुकड़ा ) डाल कर क्योंकि तद्युक्त से सम्बन्ध है । प्रकृति के नित्य यज्ञ की प्रतिकृति होती है । इस प्रश्नोत्तर का वैधयज्ञ के द्वारा प्रकृतियज्ञ नवीन मात्मा उत्पन्न किया जाता है, जैसा कि ( नकल ) मनुष्यकृत वैधयज्ञ है । इससे आहूति के द्वारा में ग्राज्य की आहुति दी जाती है । श्राज्य प्रथमखण्ड में विस्तार से बतलाया जाचुका है । ग्रहवनीयाग्नि ' भी अपेक्षित है । एतदर्थ आाज्य में हिरण्यशकल हाला तरल पदार्थ है । उत्पन्न होने वाली प्रजायें ' अस्थि है । ( अन्न ) के रस से निष्पन्न हुआ जाता है । उधर मानुषी सृष्टि में ' शुक ' तरल पदार्थ होती है हुई यह शुरू औषधि स्वरूप धारण करती है । औषधियाँ पार्थिवीं भुक्त औषधि की राह मांसादि स्वरूपों में परिणत सकते हैं । इस शुक्र में सौर आग्नेय तेज प्रविष्ट रहता है I हूँ । अतएव तद्रसभूत शुक्र को हम पार्थिव कह में यह हिरण्यशकलरूप सौर ग्राग्नेय तेज प्रविष्ट सौर तेज हिरण्मय है । यह वन है । शुक्ररूप ग्राज्याहुति की प्रतिकृति वैधयज्ञ में श्राज्य है । सौर तेज की प्रति होजाता है । इसी से अस्थिभाव उत्पन्न होता है । शुक्र हीं विशेष प्रकार की मिट्टी में श्रन्तर्य्याम सम्बन्ध से कृति वैधयज्ञ में हिरण्यशकल है । क्योंकि सौर अग्नि तेज है । सौर तेज पवित्र है । अतएव इतर धातुयों प्रविष्ट होकर ‘ सुवर्ण ' कहलाने लगता है । सुवर्ण साक्षात् सौर की अपेक्षा सुवर्ण को अधिक पवित्र माना जाता है । होने लगता है । विश्वद्वृत्त शुक्र की ग्राहुति हुई । अत्र क्रमशः वही का सम्वत्सरयज्ञ ही रम याने इसमें पाता प्रविष्ट है, अत इसका मेरुद मेरुदण्ड बनता है । पुरुष में आये दृश्य विध्रुव पूर्णेन्द्र है । आधी मात्रा के कारण जीव ही बनता है । इस कमी की पूर्ति पत्नी से होती है । ईश्वर पर पहुँच कर मुड़ जाती है । विश्र्वरूप अर्द्धन्द्र है । पृथिवी विषुव की दोनों खोर की परमक्रान्तियों ओर से मुड जातीं हैं । त्रिषुव, और क्रान्ति का मेरुदण्ड से संलग्न पशु ( फँसलियाँ ) सीधी न जाकर हैं । दोनों विश्वरूप मेरु का केन्द्र हृदय है । यही मन है । अन्तर २४ अशंका है | अतः पशु २४ । ही बनते इसी मन पर विज्ञानसूर्य प्रतिष्ठित है पर भी ध्यान दीजिए । गवामयनयज्ञ ३६० यह तो हुआ स्थल निर्माणा व संप से सूक्ष्म की स्वरूप निर्माण निष्पत्ति होती है । इस गवामयन में प्रतिष्टित दिन में समाप्त होता है । पूरे सत्र में गवामयन, महाव्रत, उदयनीय, यादि नामों से प्रसिद्ध हैं । हर्भाग प्रायणीय, आरम्भणीय, अभिप्लव, पृष्ठथ ६३२

पृष्ठ 369

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 369 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मण प्रत्येक अभिनव में ज्योतिशेम, गोप्रोम, आयुष्टोम गोप्रोम, आयुडोम, ज्योतिलोम, इसप्रकार ६–६ स्तान होते हैं । एव प्रत्येक पृष्ठ्या हमें त्रिवृत्, पञ्चदश, सप्तदश, एकत्रिंश, त्रिरणत्र, त्रयस्त्रिश, इस प्रकार ६-६ स्तोम समन्वित हैं । वर्ष के ग्रारम्भ में प्रायणीय अतिरात्र होता है । अनन्तर पाँच मास पर्य्यत १५० अभिप्लव और पृष्ठ्य होते हैं । अनन्तर २४ दिन पर्य्यन्त तीन अभिप्लव, और एक पृष्ठय होते हैं । शेष चार दिन में एक दिन अभिजिदहः एवं तीन दिन स्वरसाम किए जाते हैं । ६ मास समाप्त हो-जाते है । परमक्रान्ति से चला हुआ यजमान ६ मास समाप्त कर विध्वत् पर पहुँच जाता है । यहाँ से पृष्ठवाभिप्लव का क्रम परिवर्तित होजाता है । पहिले के तीन दिन तीन स्वरसाम होते हैं । चौथे दिन विश्व-जिन होता । अनन्तर २४ दिन में एक पृष्ठ्य, ३ अभिप्लव होते हैं । अनन्तर १२० दिन पर्य्यन्त चार पृष्ठ्य, १६ अभिप्वल होते हैं । अनन्तर १८ दिन पर्यन्त एक पृष्ठय, दो अभिप्लव होते हैं । अनन्तर एक दिन गोलोम, एक दिन आयुष्टोम होता है । अनन्तर १० दिन पर्य्यन्त दशरात्र पृष्ठय पडह ( ६ दिन पर्यन्त ) छन्दोमा त्र्यह ( ३ दिन पर्य्यन्त ) महात्रतमहः ( एक दिन का ) होता है, अन्तिम दिन उदयनीया-त्रिरात्र होता है, वर्ष समाप्त होजाता है । आगे की तालिका से वर्षगणना स्पष्ट होजाती है— ६३३

पृष्ठ 370

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 370 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथमकाण्ड गवामयनसत्वे सम्वत्सरस्य हानि ( ३६० ) १ प्रायणीयः १ उदयनीयः ३ आरम्भणीयः १० दशरात्र भिलवाः - ४ - २४ दिन ho ३०{ अभिलवौ - २ - १२ दिन २८ पृष्ठय: - १-६ दिन पृष्ठ्य: - १-६ दिन अभिलवाः - ४ - २४ दिन ३०{ अभिप्लवाः - ४ - २४ दिन ३० पृष्ठ्य: - १-६ दिन 1 पृष्ठ्यः- १-६ दिन } अभिप्लवाः -४-२४ दिन ३० पृष्ठ्य: - १-६ दिन } ] ३० { अभिलवा: -४ - २४ दिन पृष्ठ्यः - २-६ दिन } अभिप्लवाः - ४ - २४ दिन ३०{ श्रभिप्लवाः - ४ - २४ दिन ३० पृष्ठ्यः - १-६ दिन } पृष्ठ्य: - १-६ दिन अभिलवाः - ४ - २४ दिन ३०{ अभिप्लवाः - ४ - २४ दिन { ३० पृष्ठ्य: - १-६ दिन अभिप्लवाः - ३-१८ दिन पृष्ठ्य: - १-६ दिन २४ पृष्ठ्यः - १-६ दिन अभिप्लवाः - ३-१८ दिन पृष्ठ्यः- १-६ दिन } } १ अभिजित् १ विश्वजित् J ३ त्रयः स्वरसामानः ३ त्रयः स्वरसामानः १८० ग्रहानि विषुवान् १७६ श्रहानि तथाविध पूर्वोक्त गवामयनयज्ञ ही हमारे शरीर का निर्माता है । विश्ववृत्त ही इस गवामयन सम्वत्सर की प्रतिष्ठा है । जीवात्मा क्षुद्र सुपर्ण है, एवं सम्वत्सर महासुपर्ण है । सम्वत्सर का उत्तर भाग ( उत्तर-६३४