Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 371–380

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 371–380

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शतपथब्राह्मण गोल ) इस सम्वत्सरमुपर्ण का उत्तरपक्ष है । दक्षिण भाग ( दक्षिण गोल ) दक्षिणपक्ष है । मध्यस्थ विषुवान् श्रात्मा ( धड़ ) है | इसी महासुपर्णं का निरूपण करती हुई वाजिश्रुति कहती है-" अथ ह वा एष महासुपर्ण एव यत् सम्वत्सरः । तस्य यान् पुरस्ताद् विषुवतः -पण्मासानुपयन्ति - सोऽन्यतरः पक्षः । अथ यान् षड़परिष्टात् - सोऽन्यतरः । श्रात्मा विपुवान् " । शत -- १२ / २।३।७ श्रुति ने विष्वद्द्घृत को ' आत्मा ' बतलाया है । सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त रहने वाला तत्त्व ही ' आत्मा ' कहलाता है । इधर विश्वद्वृत्त केवल सम्वत्सर यज्ञात्मक खगोल के मध्य भाग में हीं प्रतिष्ठित है । सम्पूर्ण सम्वत्सरचक्र में विश्वद् की नत्र व्याप्ति ही नही है, तो ऐसी अवस्था में विष्वत् को सम्वत्सररूप मुपर्ण का आत्मा कैसे बतलाया गया?, इस प्रश्न के समाधान के लिए हमें छन्दोविज्ञान का ही आश्रय लेना पड़ेगा । पूर्व में छन्दःस्वरूप का विशद निरूपण करते समय हमने कहा है कि, शब्द, एवं अर्थ, दोनों में छन्दो व्यवस्था समान है । नियत अक्षर, एवं नियत अर्थ सम्मिलित होकर ही छन्द का स्वरूप चना डालते हैं । उपर्युक्त विश्वद्वृत्त ' बृहतीछन्द ' है, ६ अक्षर की समष्टि बृहतीछन्द है । ६ की संख्या आने से ‘ बृहती ' का स्वरूप सम्पन्न होजाता है । इसी का नाम छन्दः सम्पत्ति है । विष्वद् नाम से प्रसिद्ध बृहतीछन्द के दक्षिण भाग में क्रमशः - गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, इन तीन छन्दों की सत्ता है । एवं पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती, ये तीन छन्द उत्तर भाग में प्रतिष्ठित हैं । गायत्री-उष्णिक् - अनुष्टुप् – ये तीनों क्रमशः ६,७,८, अक्षर के छन्द हैं । पक्ति, त्रिष्टुप् जगती, तीनों क्रमशः १०–११–१२ – अक्षरों के छन्द हैं । मध्यस्थ ' बृहती ' नवाक्षर छन्द है । कहने को उसके दोनों ओर के मिलकर ६ छन्द हैं । वस्तुतः जो गायत्री है, वही जगती है । जो उष्णिक् है, वही त्रिष्टुप् है । एवं जो अनुष्टुप् है, वही पङक्ति है | तात्पय्यं इस समानता का यही है कि, विष्वद् से दक्षिणोत्तर १२–८–४ – इन अंशों के क्रम से ६ औं छन्द समान हैं । चतुष्पदा गायत्री षडक्षरा है । उसकी समकक्षा वाला जगतीछन्द द्वादशाक्षर है । दोनों मिलकर १८ अक्षर हैं । अठारह अक्षर के ६-६ अक्षर के अनुपात से दो बृहती छन्द होजाते हैं । उष्णिक् के सम्मुख समकक्षास्थ त्रिष्टुप् के ११ - दोनों के सम्मिलित १८ हैं । यहाँ भी दो बृहती-छन्दों का भोग है | अनुष्टुप् के ग्राट, तत् समकक्षास्थ पङक्ति के १०, दोनों के सम्मिलित १८ हैं । यहाँ भी दो बृहतीछन्द हैं | मध्य का बृहती तो बृहतीछन्द है ही । तदित्थं सभी छन्दों का बृहतीछन्द में अन्तर्भाव है, जैसाकि निम्न लिखित तालिका से स्पष्ट होनाता है— ६३५

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प्रथमकाण्ड द्वादशाक्षरा जगती - १२ एकादशाक्षरा त्रिष्टुप् - ११ पङक्ति – १० ६-१० + ८ + १८ | ११ + ७ + १८ | १२ + ६ + | १८ दशाक्षग नवाक्षग बृहती अष्टाक्षरा अनुष्टुप् -सप्ताक्षरा उष्णिक -७ षडक्षरा गायत्री ६ सम्पूर्ण सम्वत्सर में नवाक्षर बृहतीछन्द का ही साम्राज्य है । गणितशास्त्र में ६ संख्या को ही सर्व -संख्या मानने का भी यही रहस्य है । सचमुच नवसंख्या ( नौ ) में सत्र संख्याओं का समावेश होजाता है । प्रतिष्ठा - स्वर इसी बृहतीविज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं— " स वा एष सम्वत्सरो बृहतीमभिसम्पन्नः " । - शतपथे बृहतीछन्द सम्पर्ण छन्दों का स्वराट् है । बृहती वर्द्धनशील है । बृहती प्रतिष्ठा है । बृहती के इह्रीं स्वरूपों को लक्ष्य में रख कर निम्न लिखित श्रुतिवचन हमारे सम्मुख उपस्थित हो रहे हैं-१ – “ बृहती – बृहते द्धिकर्म्मणः ” ( दे ० ३।११ । ) । -२ – “ बृहती मर्य्या ययेमान् लोकान् व्यापामेति तद्वृहत्या बृहचम् ” ( तां ० ब्रा ० ७।४।३ ) । ३ - " बृहती वा छन्दसां स्वराट् ” ( तां ० ब्रा ० १० । ३ । ८ । ) । 2 ४ - " बहती हि सम्वत्सरः " ( शत ० ६ | ४ | २ | १० | ) । ५. - " बृहत्यां भूयिष्ठानि सामानि भवन्ति " ( तां ० ७।३।१६ । ) । यह है खगोल के, दूसरे शब्दों में आधिदैविक यज्ञपुरुष के मेरुदण्ड - स्वरूप बृहतीछन्द का संक्षिप्न्त निदर्शन | यही बृहतीछन्द आध्यात्मिक विश्व का ( जीवशरीर का ) मेरुदण्ड बनता है, जैसाकि पूर्व में बत--लाया जाचुका है । विष्ववृत्त के केन्द्र में हमने सूर्य की सत्ता बतलाई है । इस सूर्य्य के चारों ओर परिक्रमा लगाती हुई पृथिवी वर्ष में दो बार विश्वद् पर आती है । ' क्रान्ति ' शब्द का अर्थ है ' दूरी ' | पृथिवी, और विधवत् की दूरी का ' पतन ' जिस चिन्दु पर होता है, वही ' क्रान्तिसम्पात ' नाम से प्रसिद्ध है । वासन्त, शारद, भेद से दो सम्पातबिन्दु हैं । २२ मार्च को वासन्तसम्पात होता है, २१ सितम्बर को शारदसम्पात होता है । ' समरात्रिं दिवे काले विपुत्रद् विपुत्रं च तत् ' ( श्रमरकोश ) के अनुसार दोनों सम्पातकालों में पृथिवी विष्वद् पर रहती है । उत्तरगोल से दक्षिणगोल में प्रविष्ट होती हुई पृथिवी जब विष्वद् पराती है, तत्र वासन्त -- सम्पात होता है । एवं दक्षिणगोल से उत्तरगोल में प्रविष्ट होती हुई पृथिवी जब विष्यत् पर श्राती है, तत्र शारद सम्पात होता है । इस सम्वत्सर में - सूर्य - पृथिवी - अन्तरिक्ष- इन तीन लोकों की सत्ता है । पार्थिवाग्नि, अन्तरिक्ष्य वायु, दिव्यादित्य, तीनों का भोग एक ही सम्वत्सर में है । इसीसे ६३६

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शतरथब्राह्मण ( १ ) - सत्सरात्मकः सम्वत्सर मण्डल परिलेख: -( चक्रसम्वत्सर प्रतिकृति रियम् ) विष्वद्वृत्त सूर्य्यः भूषिष्ठः ६३७ न्ति IIII क्रा हमारा निर्माण होता है । पार्थिवाग्नि भूतप्रधान है । इससे अन्न के द्वारा पञ्चभौतिक, अतएव बाङ्-मय शरीर का निर्माण होता है । आन्तरिय वायु से प्राणतत्त्व का सम्बन्ध है, एवं आदित्य से ज्ञानघन मन का सम्बन्ध है । इसप्रकार वाङ्मयी पृथिवी, प्राणमय अन्तरिक्ष, एवं मनोमय आदित्य से मनःप्राणवाङ्मयी अध्यात्मसंस्था का निर्माण होता है । आगे के दोनों रेखाचित्रों से विष्वद्वृत्ता--नुगत सौर- पार्थिव - चान्द्र, तीनों सम्वत्सरों का स्वरूप - समन्त्रय गतार्थ हैं |

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( २ ) - अग्न्यात्मक - कालात्मक - सम्वत्सरचक्र - नयी स्वरूपपरिलेख: -( क - सत्ता सिद्धः सम्बत्सरः- अग्न्यात्मकः ( ख ) - भातिसिद्ध: - सम्बत्सरः– कालात्मकः स : T का ला कः सौर सम्वत्सरः सावित्राग्निमयः मय्य पार्थिवसम्वत्सरः गायत्राग्निमयः .. अदितिर्देवमयी अहः व सं व त् पाथकी स रः विशुद्ध ज्योतिर्म्मण्डलम् नात्रतमः देवसोमः चान्द्र सम्वत्स सौम्यः का ला भ कः का त्त b

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शतपथब्राहाण उपर्युक्त त्रैलोक्य में लोक - लोकी, दो भेद हैं । लोक भूत है, लोकी भूतप्रतिष्ठ देवता है । पृथिवी भूत है, अपानाग्नि देवता है । अन्तरिक्षरूप वायु भूत है । तत्रस्थ व्यानाग्नि देवता है । आदित्य भूत है । प्राणाग्नि देवता है । मूलद्वार में अपानाग्नि प्रतिष्ठित है । हृदय में व्यानाग्नि की सत्ता है । ब्रह्मरन्ध्र में प्राणाग्नि का साम्रज्य है । यही प्राणाग्नि स्त्प्राण - महाजन - श्रादि विविध नामों से प्रसिद्ध है । यह इन्द्रप्राण है । ' या च का च बलकृतिरिन्द्रकम्मैव तत् ' [ या ० निरुक्त ] के अनुसार यही लरूप स्मृत्प्राण का अध्यक्ष है । स्पृत्प्राण जिस में प्रबल रहता है, वही कुछ पुरुषाथ कर सकता है । अपानप्राण पार्थिव है | यह मूलद्वार से चलकर हृदयस्थ विज्ञानसूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगाता है । पार्थिवाग्नि -- ' तस्य वा एतस्याग्नेव गेोपनिपत् ' इस सिद्धान्त के अनुसार ' वाकू ' है । इधर मूला--धारस्थ ग्रपानाग्नि पार्थिव है । यही अध्यात्म की पृथिवी है । यही वाक् है । प्राणोदान - व्यापार की मूलभूता गति यही वाक् - गति है । वाकू का आरम्भ ही आध्यात्मिक सम्वत्सरयज्ञ की आरम्भणीयेष्टि है । भौतिक प्रपञ्च का ग्रारम्भ यहीं से होता है । जबतक मूलाधारस्थ वाक्तत्त्व प्रतिष्ठित है, तभीतक सम्पूर्ण भूत स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित हैं । सौर स्पृत्प्राण का ' अयन ' प्रायणीयेष्टि है । आरम्भ भूत से होता है, प्रयाग प्रारण से होता है । दूसरे शब्दों में -- प्राणगति प्रायरण है, अपानगति आरम्भ है । प्रायणीय, और आरम्भणीय के अनन्तर अभिप्लव, और पृष्ठ्य होते हैं । रुधिर की गति अभि'लव है । रक्त का सञ्चरण [ दौड़ ] ही अभि'लव है । उस सञ्चरण की सीमा पृष्ठ्य है । उदाहरणार्थ हाथ को लीजिए । हृदय से प्रारम्भ कर अंश ( स्कन्ध ) बाहु,, दो, हस्त ये चार खण्ड अङ्ग लि - पर्यन्त हैं । हृदय से स्कन्धपर्यन्त एक युग्म है । स्कन्ध से बाहुपर्य्यन्त दूसरा युगम है । चौथा पाणि है । ये ही चार खण्ड चार ‘ अभिप्लव ' हैं । प्रत्येक में प्रातः सवन, माध्यन्दिनवन, सायं - सवन, ये तीन तीन सबन हैं । पूर्व-खण्ड का सायंसवन उत्तरखण्ड का प्रातः सवन है । इस पारम्परिक सवनग्रन्थिबन्धन से चारों खण्ड पृथक् पृथक् होते हुए भी परस्पर बद्ध हैं । सब को मिला कर एक पृष्ठ्य है । आगे जाकर - गायत्री, त्रिष्टुप, जगती, विराट्, पङ्क्ति, इन छन्दो से पाँच अंगुलियाँ बनतीं हैं । कनिष्ठिका गायत्री से सम्बन्ध रखती है । गायत्रीछन्द सब में छोटा है । अतएव तत्सम्बन्धिनी कनिष्ठिका सब अंगुलियों में छोटी है | अनामिका का निर्माण त्रिष्टुप् से हुआ है । त्रिष्टुपछन्द इन्द्रदेवता का है । इन्द्र आत्मा है । अमृतप्रधान है । श्रतएव दिव्यकार्य्य इसी अङ्ग लि से किए जाते हैं । ' अनया वै भेषजं क्रियते ' ( शतपथ ब्राह्मण ) इस श्रौत आदेश के अनुसार बच्चे को इसी अनामिका से औषधि देनी चाहिए । मध्यमा की जननी विराट् है । तर्जनी जगती से सम्बन्ध रखती है । इस में असुर प्राण है । अतएव जप, यादि दिव्य-काय्यों में इस का बहिष्कार है । अंगुष्ट को जननी पङक्ति है । इसप्रकार अभि'लव - पृष्ठ्य - भेद से शरीर रचना में वैचित्र्य होजाता है । यद्यपि इस विषय में ज्ञातव्य बहुत कुछ है । परन्तु विस्तार अधिक होजाने से यहाँ केवल दिग्दर्शनमात्र ही करा दिया गया है । शिरोभाग में ४ कपाल प्रत्यक्ष हैं । दो पूर्ण कपाल हैं, दो पश्चिम कपाल हैं । प्रत्येक में पुनः दो दो खण्ड हैं । कपाल में चणक भरकर पानी डाल दीजिए । १२ घन्टे में आठों कपाल पृथक् पृथक् होजा-६३८

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प्रथमकाण्ड यँगे । इन श्राटों कपालों में मस्तिष्क ( भेजा ) ) सुरक्षित रहता है शिरःकपाल, मानो एक जैसा चमस ( कटोरा ) हो, जिस का बुध्न । यही आध्यात्मिक पुरोडाश है । ऐसा है यह ( पैंदा ) तो ऊपर है, एवं त्रिलभाग नीचे है । [ शिर ] इसी में सम्पूर्ण आध्यात्मिक प्राणदेवताओं का यशोरूप मस्तिष्क [ भेजा ] भरा हुआ है, प्राण जिस, इस प्राणात्मक चमस ये सात के तीर पर दो श्रोत्रप्राण, दो चक्षुःप्राण, दो नासाप्राण, एक वाङमय श्राग्नेय आध्यात्मिक ऋषि विराजमान हैं । देखिए!

अग्बिलश्चमस ऊर्ध्वघ्नस्तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपम् ।

तस्यासत पयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदाना ॥

सम्पूर्ण देवता इसी की ग्राहुति से जीवित हैं । आधिदैविक वहाँ सम्वत्सरयज्ञ आठ कपाल से निर्मित थे, यहाँ पुरुषयज्ञ भी जाट के गुप्त रहस्यों को ऋषियोंनें समझा । तदनुसार वैधयज्ञ का विधान किया का विधान । किया गया । वैधयज्ञ में श्राट ही मृण्मय कपाल बनाए गए । मस्तिष्क के स्थान में पुरोडाश जाता है?, इत्यादि प्रश्नों की यही कपाल क्यों बनाए जाते हैं?, उन में पुरोडाश साथ साथ ही क्यों श्रुति रक्खा कहती है-सक्षिप्त उपपत्ति है । इसी कपालविज्ञान को लक्ष्य में रखकर तान्ये “ शिरो ह वा एतद्यज्ञस्य यत् पुरोडाशः । स यान्येवेमानि शीर्ष्णः कपालानि सह-बास्य ( वैधयज्ञस्य ) कपालानि । मस्तिष्क एव पिष्टानि । तद्वा एतदेकमङ्गम् । एकं

करवाच, समानं करवावेति । तस्माद्वा एतदुभयं सह क्रियते " ॥१२ ॥

अग्नि क्रव्यात् है, अन्न का परिपाक करने वाला अग्नि आमान् है, शव को भस्मसात् । अग्नि करने एक वाला ही है, वही स्थानभेद से एवं देवताओं के हवि का वहन करने वाला अग्नि इव्यवाट् है ही है । साधारण लौकिक अन्न का छन्द तीन गुणों से युक्त होजाता है । इस भेद का मूलकारण छन्दोभेद छन्द पृथक् है । प्रकृत में हव्यवाहन अग्नि अपे-दूसरा है, शव अन्य छन्द से छन्दित है, एभं पुरोडाश क्रव्यात् का, धर्म्म अनपेक्षित हैं । मन्त्रशक्ति के द्वार । उह्नीं क्षित है । अग्नि में तीनों धर्म हैं । इन में श्रामात् बनाया जाता है । को दूर कर इस बैध अग्नि को निष्कैवल्यरूप से हन्यबाद ही है । पार्थन की प्रकृतिजगत् में — ' यथानिगर्भा पृथिवी ' के अनुसार भूषिएड अग्निप्रधान । भूपिण्ड का निर्माता ‘ आप्त्या ’ वारुणाग्नि, प्रवर्ग्याग्नि, ब्रह्मौदनाग्नि, भेद से तीन के अवस्थाएँ सलिलरूप रहतीं ऋत हैं तत्त्व के गर्भ में प्रविष्ट वही नामक जलीय - अग्नि हीं वारुणाग्नि है । अगर्वसमुद्र कमशः आपः - फेन - मृत् - सिकता, शर्करा-अग्नि अपने तेजोभाव से उस आपोद्रव्य को परिपक्व करता हुआ रहा है । श्राप्य - वारुण- प्राण ही आमुर अश्मा -- त्रयः - हिरण्य रूपों में परिणत कर भूषिएड का स्वरूप निर्माता जायगा बन । औषधि - वनस्पतिरूप - पार्थिव अन्नों है । अतएव तन्मय पार्थिव अग्नि को असुरभावापन्न ही माना कि भूतप्रधान है, अतएव इस रूप से देव-का परपाक भी इसी श्राप्य श्रसुर- वारुणाग्नि से होता है, जो परिपाक करने वाला यही प्राय वारुणाग्नि प्राण के लिए असमन्वित है । शरीरसंस्था में चतुर्विध अन्न का है । आमाशयानुबन्ध से ' श्रमात् ' नाम से प्रसिद्ध होगया ६४०

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शतपथब्राह्मण दूसरा वह भूताग्नि है, जिसे भूपिण्डम्थ श्रग्नि श्रपना मल बना कर बैंक देता है, बैंकता रहता है । जीवनी प्राणरस से शून्य भूत - भौतिक- पदार्थों का भरा यही प्रवर्ग्यानि करता रहता है, जिस के आधार पर ही निर्ऋतिदेवता प्रतिष्ठित हैं । यही शवान्नभक्षक - प्रवर्ग्यभक्षक — क्रव्यात् अग्नि है । एव अपने विशुद्ध प्राणरूप से नही पार्थिव अग्नि अदितिमण्डल के द्वारा स्तौम्य - यज्ञिय देवताओं के लिए पार्थि + अन्नगत विशुद्ध अमृतसोम - रस का वहन करता हुआ देवभावानुवन्धी हव्यवाट् अग्नि है, ब्रह्मनाग्नि है, जिसे अध्यात्म में हम ' प्राणाग्नि ' कहा करते हैं । यो एक ही अग्नि के तीन महिमा -विवर्त्त होजाते हैं, जो मात्रातारतम्य से अग्निमात्र में विद्यमान हैं । तीनों में से यज्ञकर्म में तीसरा दिव्यभावा-पन्न हव्यवाट स्वरूप ही संप्राय है, यही सन्दर्भ - निष्कर्ष है ॥ ३४ ॥

सहरा अग्निसुर है, शुद्ध अग्नदिव्य है । ऐसा अङ्गार, जिस के चारों ओर रक्षा [ भस्म ] लगी हुई हो, ज्वालाशून्य वही अग्नि ' सहरक्षा ' है । ' सहरक्षा नै असुराणां दूत आस ' [ शतपथ १।११३ ] के अनुसार भस्मलित अङ्गार अवश्य ही खासुर होता हुआ दिव्ययज्ञ का विरोधी है । इस भस्मरूप श्रासुर-भाव के निराकरण के लिए ही अङ्गारों के भस्म को हटाया जाता है । इस से अग्नि का शुद्ध रूप व्यक्त होजाता है | यही शुद्ध अग्नि देवया है । देवताओं के साथ पुरोडाश का सङ्क्रमन कराने में यही अग्नि समर्थ है । भूपिड के साथ सौर सावित्र तेज संक्रान्त होता है, और वह भूपृष्ठ से संलग्न हो सूचीमुख बनता हुश्रा, साथ ही पार्थिव प्राणाग्नि से संश्लिष्ट होता हुआ पुनः सूर्य की ओर प्रतिफलित होजाता है । यही श्रदितिमण्डलगर्भित ' देवदूताग्नि ' है, जिसका ' अग्नि दूतं वृणीमहे होतारं रत्नधातमम् ' इत्यादि रूप से यशोगान हुआ है | जिस प्रकार का यह ज्योतिर्मय प्राणाग्निमण्डल है, ठीक उसी प्रकार का भूपिण्ड के दक्षिणोत्तर पार्श्वों को उपक्रम बनाता हुआ सूर्य्य - विसद्ध दिन में भी पूर्व प्रतिफलन के आधार पर एक प्राणाग्निमण्डल बन जाता है, जिसे कि - ' दितिमण्डल ' कहा गया है । यह भाग तमोमय है, भूभामय है, यही ग्रहण / वद्या में - ‘ सैंहिकेयराहु ' है, जिसकी प्रतिच्छाया से चन्द्रग्रहण हुआ करता है । तमोमय भूभाप्राण ही वह - ' रक्षा ' प्राण है, जो ज्योतिर्म्मयप्राण का अवरोधक बनता हुआ ' सहरक्षा ' नामक आसुराग्नि कह-लाया है । ध्यान रहे, यह पूर्वोक्त वारुणाग्नि से पृथक् वस्तुतत्त्व है । यह सहरक्षा ही ' असुराणां दूत श्रस ' के अनुसार - असुरदूताग्नि कहलाया है । इसप्रकार अदिति - दिति भेद से पार्थिवप्राणाग्नि के दैत्र - आसुर, ये दो प्राणाग्नि - विवर्त्त ' होजाते हैं, जो क्रमशः यज्ञ सम्पादक, तथा यज्ञबिरोधी हैं । प्रत्यक्ष भूताग्नि में निर्धूम-भूताग्नि यज्ञसम्पादक दैवाग्नि का प्रतीक है, एवं सधूम - सहरक्ष - ( राख सहित ) मलिन भूताग्नि यज्ञविरोधी श्रासुराग्नि का प्रतीक है । दोनों में से इस पुरोडाशसम्पादनात्मक यज्ञिय - दैवकर्म्म में शुद्ध दैवाग्नि ही अभि-प्रेत है । तन्प्राप्त्यर्थं ही भस्म निराकरणपूर्वक अङ्गारों को विशुद्ध बनाया जाता है || ५ || अङ्गार का जो भाग भूमि पर प्रतिष्ठित रहता है, वह श्रासुरभाव से प्राक्रान्त रहता है | कारण उस श्रधोभाग में वायु प्रविष्ट नहीं होसकता । ' यद्वै वानो नाभिवाति, तत् सर्वं वरुणदैवत्यम् ' [ कौ ० ब्रा ० ] के अनुसार निवास्थान में श्रासुरप्राणाविष्ठाता वरुणदेवता का साम्राज्य रहता है । सचमुच अधोभाग में अग्नि प्रज्वलित नहीं रहता । सब ओर से भस्म को हटा देने पर भी नीचे की ओर से भस्मसम्बन्ध को हटाना ६४१

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प्रथमकाण्ड कठिन है । उस ओर से मुरों के ग्रासङ्ग का भय नहीं हटाया जासकता । इस विप्रतिपत्ति को दूर करने के लिए यजुः पूत मध्यम कपाल के साथ इस ग्रङ्गार का सम्बन्ध किया जाता है । यजुः साक्षात् अग्नि है । ब्रह्म- देव भूत- पशु भेद से अग्नि चार प्रकार का है । इसी ग्राधार पर ' चतुर्द्धा विहितो हवा अ अग्निर स ' [ शतपथ १ | १ | १५ ] यह कहा जाता है । त्रह्माग्नि वेदाग्नि है । इसी को यजुः सम्बन्ध से ' सार्वयाजुपाग्नि ' भी कहा जाता है । यही ' प्राणाग्नि ' नाम से भी प्रसिद्ध है । यह अग्नि स्वायम्भुव है । सौराग्नि देवाग्नि है | पार्थिवाग्नि भूताग्नि है । प्रवयग्नि पश्वग्नि है । यजुर्म्मन्त्र शब्द-मय है, यजुरग्नि अर्थरूप है । शब्दार्थ का अभेद है । यजुम्मन्त्र साक्षात् यजुरग्नि है । यह अग्नि राक्षसों का हता है । तयुक्त कपाल मे श्रङ्गार का सम्बन्ध करने पर अवश्य ही असुरों के ग्राम का भय विलुप्त होजाता है || ६ || विश्व के सम्पूर्ण पदार्थ घन - तरल - विरल, इन तीन अवस्थाओं से आक्रान्त हैं घनावस्था ही निचिडावस्था है | तरलावस्था प्रसिद्ध है । विरलावस्था वा पावस्था है । इसी नावावस्था के लिए ' धूम ' शब्द प्रयुक्त होता है | उदाहरणार्थ एक कर्पूर की डली सामने रखिए । कपूर्रखण्ड घन है, टोस है । उसके प्रत्येक अवयव निचिड हैं । इस खण्ड को अग्नि पर चढ़ा दीजिए । कपूर पिचल जायगा । यही तलावस्था है । अधिक अग्नि के संयोग से कपूर धूम्ररूप में परिणत होकर उड़ जायगा । यही तीसरी विग्ला-वस्था है । प्रत्येक पदार्थ अग्नि - सोमात्मक है । सोमगर्भित अग्नि ही वस्तु है । इस अग्नि की ही उपयुक्त तीन अवस्थाएँ होतीं हैं | घनाग्नि पृथिवी है । तरलाग्नि अन्तरिक्ष है । विरलाग्नि व लोक है । जिस पर हम सब चराचर प्राणी प्रतिष्ठित हैं, उसी का नाम पृथिवी नहीं है । अपितु बनावस्थापन्न यच्च-यावत् पदार्थ पृथिवी है । तरलावस्थापन्न सम्पूर्ण पदार्थ वायु हैं । एवं चिरलावस्थापन्न सभी पदार्थ श्रादित्य हैं । अग्निमयी पृथिवी तत्तत् पदार्थों की घनावस्था है, वायु तरलावस्था है, एवं आदित्य विरलावस्था है । यही ततत् पदार्थों की प्राणावस्था है । उपर्युक्त इह्रीं तीनों अवस्थाओं के लिए ब्राह्मणग्रन्थों में क्रमशः ध्रुव - धरुण - धर्त्र शब्द प्रयुक्त हुए हैं । वन पदार्थ ' त्र ' हैं । तरल पदार्थ धरुण हैं । विरल पदार्थ धर्त्र हैं । धर्त्र, और धरुण की प्रतिष्ठा ध्रुव है । क्योंकि ध्रुवावस्था ही धर्च, और धरु गावस्था की जननी है । भव पृथिवी का पय्य है । हमारी प्रतिष्ठा है । दिव्ययज्ञ में ग्रासुर प्राण विघ्न वाधरूप से निरन्तर यज्ञकर्त्ता यजमान की प्रतिष्ठा उच्छिन्न करने का प्रयास करते रहते हैं । उनके इस प्रयास को विफल करने के लिए प्रतिष्ठात्तत्त्व प्राप्त करना आवश्यक है । उसी प्रति-ष्ठातत्त्व को प्राप्त करने के लिए, एव प्राप्त प्रतिष्ठा से भ्रातृव्यों के प्रयास को विफल करने के लिए- ' ध्रुत्र-मसि ' इत्यादि मन्त्र बोलते हुए कपालोपधान किया जाता है । पशु अनुचर - प्रजा - स्त्री - द्रव्य - भूमि-आदि अनेक प्रकार के वित्त हैं । इन सब वित्त में श्रेष्ठ वित्त ब्रह्मत्रीयं, और क्षत्रवीर्य्य हैं । ज्ञानशक्ति ही ब्रह्मत्री है, एवं क्रियाशक्ति ही क्षत्रवीय्यं है । जिस मनुष्य में ज्ञान, और क्रिया, दोनों सम्पत्तियाँ बिद्य-* श्रामङ्ग एक प्रकार का निष्फल आक्रमण है । राक्षसबुद्धि वाले मनुष्यशरीरधारी असुरों की यह स्वाभाविक वृत्ति है । इसी आसन के लिए ' छेडछाड़ ' शब्द प्रयुक्त होता है । यही लोकभाषा में ' आसङ्गा-द्वारी ' नाम से प्रसिद्ध है । III

पृष्ठ 379

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 379 का मूल पृष्ठ
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राहाण प्रथमब्राह्मण मान हैं, वह सब कुछ प्राप्त करने में समर्थ है । कर्म्मठ, एवं ज्ञानी पुरुष के कोश में असम्भव शब्द क । अभाव है । इन दोनों के चिना पुरुष पुरुषाभास है । वीड्वीर्य्य से सम्बन्ध रखने वाला अर्थ, एवं पूषाप्राण - प्रधान से ' सम्बन्ध रखने वाला पशु भाग, दोनों हीं तत्रतक सर्वथा निरर्थक हैं, जबतक कि इहें ज्ञान, और कम्म शूद्र के आश्रित नहीं बना दिया जाय । ब्रह्म, और क्षेत्र, के अतिरिक्त एक तीसरा व और है । वह है ' भूमा ' । आप में ज्ञान की मात्रा भी पार-पूर्ण है । आप कर्म्मट भी हैं । किन्तु आपकी इच्छानुसार कर्म करने वाले अनुयायी यदि आपको नहीं मिलते हैं, तो आप उस कार्य्य ' को कभी समृद्ध नहीं कर सकते । किसी भी कार्य्यं को यदि भूमाभावापन्न ( वृद्धिंगत ) करना हो, तो इसके लिए मजातों की आवश्यकता है । समानकक्ष समानधर्म्मा सहयोगी अपेक्षित हैं । जिसके प्रज्ञा-कोश में ब्रह्मवीर्य्य - क्षत्रवीर्य्य, एवं सजातसंपत्ति, विद्यमान है, उसके लिए कोई भी कार्य्य असम्भव नहीं है । इह्रीं तीनों संपत्तियों को प्राप्त करने के लिए ' ब्रह्मत्र नित्या क्षत्रत्रनित्वा - सजातवनित्वा ' इत्यादि मन्त्र का प्रयोग किया जाता है । यजमान स्वयं ज्ञान, और कर्म से युक्त है । इधर इसके सहकारी ऋत्त्विक् भी ऐसे ही हैं 1 ऐसी अवस्था में इसका यज्ञकर्म अवश्य ही सफल है । ७८६ । १० । ११ । पृथिवीलोक को आप प्रत्यक्ष देख रहते हैं । सूर्य्यप्रतिष्ठारूप द्युलोक का भी आप साक्षात् कर रहे हैं । दोनों के मध्यस्थ अन्तरिक्ष का भी प्रत्यक्ष हो ही रहा है । इसप्रकार तीनों लोक श्रापके लिए ' श्रद्धा ' ( प्रत्यक्ष ) हैं । परन्तु छौथा पारमेष्ठ्य लोक अनुमानगम्य है । ' अस्ति वै चतुर्थो देवलोक आपः ' ( कौ * ब्रा ) के अनुसार चौथा लोक केवल शब्दप्रमाणगम्य है । हम अधारण कोटि के मनुष्य ' त्रिदित नहीं चौथा लोक है, अथवा नहीं ' इसी विचिकित्सा में लगे रहते हैं । हमारी यह विचिकित्सा तत्रतक सत्य है, जबतक कि हम दृष्टि प्राप्त कर उसके द्वारा चौथे लोक को देख न लें । क्योंकि ' अस्ति न वा ' यही हमारा सत्यभाव है । एवं यज्ञ में सत्यानुपालन का आदेश है, एवं ' जैसा मन में हो वैसा कहना ' यही सत्य है । अतः इसी सत्यरूप श्रद्धाभाव को लक्ष्य में रखकर - ' विश्वाभ्यस्त्वा श्रशाभ्यः ' यह बोल कर दक्षिण भाग की ओर कपालोपधान किया जाता है । अनद्धा चतुर्थलोकवत् विश्व- आशाएँ भी अन्नद्धा ही हैं || १२ || आसाहित्य के प्रत्येक शब्द में कुछ न कुछ निगूढ रहस्य पिनद्ध ( सुगुप्त ) रहता है । ' भृगु और अङ्गिरा के तप से ' इत्यादि वाक्यसन्दर्भ के भृगु, अङ्गिरा और तप ये तीनों हीं शब्द अत्यन्त रहस्य-पूर्ण हैं, जिनमें से सर्वप्रथम ' तप ' शब्द की ओर ही आपका ध्यान आकर्षित किया जाता है । " सांसारिक सम्पूर्ण कर्मों को छोड़ छाड़ कर एकान्त में शून्य श्रारण्य में जाकर ईश्वरचिन्तन करना हीं तप, किंवा तप-श्चर्य्या कहलाती है ” आजदिन सर्वसाधारण में, एवं वैदिक विज्ञान की गहनाटवी से अपरिचित कुछ एक विद्वानों में तप का उक्त लक्षण ही प्रचलित, एवं मान्य है । हम इस लक्षण का विरोध नहीं करते । तप का उपयुक्त लक्षण भी होसकता है । परन्तु व्यापकार्थ को अपने उदर में रखने वाले तप का उपयुक्त अर्थ कर बैठना अनुचित है । ईश्वरप्राप्त्युपायभूत कायक्लेश, अनशन, एवं योगमार्ग की कठिन साधनाओं को ही तप मानने वाले विद्वानों से हम पूँछते हैं कि, यदि ऐसा है तो — १-- ' ' प्रजापतिर्वा इदमग्र एक एवासीत् । सोऽकामयत - सोऽश्राम्यत् । स तपोऽतप्यत । तस्य तप्यमानस्य तेजोरसो निरवत्तताग्निः " ( शतपथ ) ६४३

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 380 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयाध्याय प्रथमकागद २ - असौ वा आदित्यस्तपः ( शत ७ | १ | ५ | ) ३ - तपः स्विष्टकृत् ( शत ० ११।२।७ / १८ ) ४ - तपो वा अग्निः ( शतः ३ | ४ | ३ | २ | ) ५- तप श्रासीद् गृहपतिः ( तैच्ब्रा ० ३ | १२ | ६ | ६ ) ६ - एतद्वै तपो यो दीक्षित्वा पयोव्रतोऽसत् ( श ० ५१८ ) ७- भृगूणामङ्गिरसां तपसा तथ्यध्वम् ( शतपथ ) प्रथमत्राह्मण इत्यादि श्रौतवचनों का आपकी मान्यता में कैसा? और क्या समन्वय होगा? | क्या ईश्वर - प्रजापति किसी अन्य ईश्वर की प्राप्ति के लिए योगसाधनरूप तप में अनुरक्त हैं? । इन सब विप्रतिपत्तियों के निराकरण के लिए एकमात्र निम्न लिखित लक्ष्ण को ही लक्ष्य बनाना पड़ेगा । तप का यथार्थ, एवं अव्याप्ति प्रतिव्याप्ति-दोष - रहित व्यापक लक्षण करते हुए महर्षि तित्तिरि कहते हैं— ' एतद्वै तप इत्याहुर्यत् स्वं ददाति ' - तै ० ब्राह्मण प्राप्त महर्षि उसे ही ' तप ' कहते हैं, जो कि अपने आप को दे देता है । तात्पर्य इस का यही है कि-श्रध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक, तीनों में से किसी भी तत्र को प्राप्त करने के लिए जो व्यापार किया जाय, वही तप है । परन्तु वह व्यापार ' तप ' तभी कहलाएगा, जबकि उसमें अपने आत्मा का समर्पण होगा | आप अन्य वस्तु को अपने में लाना चाहते हैं । इसके लिए पहले आपको अपने आप में स्थान बनाना पड़ेगा । जिस स्थान पर आप प्राप्त वस्तु रखना चाहते हैं, उस स्थान के प्रारण को विसर्जित करना पड़ेगा । यदि बिना प्राणदान के दूसरे शब्दों में बिना आत्मबलिदान किए कि आप किसी कि सम्पत्ति को ले लेंगे, तो आप उससे उचित लाभ स उठा सकेंगे । प्राणपातमूलक परिश्रम के द्वारा जो सम्पत्ति - लाभ होता है, एवं उससे आत्मा में जैसी शान्ति प्राप्त होती है, वैसी शान्ति व्यर्थ की आई हुई सम्पत्ति से कथमपि सम्भव नहीं है । प्रथम तो बिना आत्मसमर्पण के लाभ हो ही नहीं सकता । यदि छलछिद्रादि श्रासुरी माया के द्वारा, एवं अन्यान्य कुचक्रों से लाभ हो भी जाता है, तब भी उससे वास्तविक शान्ति नहीं मिल सकती । प्रत्येक वस्तु की प्राप्ति के पहले आप अपना प्राणदान करें । पहले बलिदान, फिर प्राप्ति । यही व्यापक सिद्धान्त है | यदि आप कुछ लेना चाहते हैं, तो पहिले कुछ अपना समर्पण कीजि, यही तप है । प्रजा-पति सृष्टि की कामना करते हैं । इसके लिए वे अपने प्राण की आहुति देते हैं । यही है तप की वास्तविक स्त्ररूप - परि-भाषा । वाक् - श्रोत्र - हस्त - पाद - आदि सभी का व्यापार तप है । परन्तु सर्वश्र ेष्ठ तप मृगु, और अङ्गिरा का ही है । भृगु सोमतत्त्व है, एवं अङ्गिरा अग्नितत्त्व है । अग्नि के क्रमिक चयन से शरीर बना है, एवं सोम से औषधि ( अन्न ) के द्वारा मन बना है । केवल शरीर से कर्म्म करना अङ्गिरा का तप है, एवं केवल मनोराज्य में विचरण करना भार्गव तप है । दोनों हीं तप अधूरे हैं । दोनों के समन्वय से जो तप का स्वरूप निष्पन्न होता है, वही ' तेजिष्ठ तप ' है । मनोयोग- पूर्वक शरीर से जो व्यापार किया जाता है, वही ग्रन्यर्थ तप है । उसी तपः-सम्पति की प्राप्ति के लिए ' भृगुणामङ्गिरसां तपमा तप्यध्वम् ' कहा गया है । ६४४