Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 381–390

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 381 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण प्रथम ब्राह्मण तपः- स्वरूप - दिग्दर्शनम् प्र. उङ्ग उस- ' तपः ' शब्द का उपस्थित होपड़ा है, जिसके साथ वत्तमान युग की प्रत्यक्ष प्रभाव -समाकर्षिता भावुक – प्रज्ञाओं के द्वारा त्याग - तपस्या - बलिदान, नाम की सुप्रसिद्धा ' लोक घोषणा ' समन्वित होरही है । अतएव प्रसङ्गधिया अनिवार्य्यरूपे यह आवश्यक होजाता है कि, ' भृगूणामङ्गिरसां तपसा तयध्वम ' इत्यादि श्रुतिमूलक ' तपः ' शब्द का प्रकृतिसिद्ध तात्त्विक चिन्तन - इतिवृत्त संक्षेप से स्पष्ट कर दिया जाय, जिसके बिना हमारी प्रज्ञा श्राज की काल्पनिक त्याग - तपस्या बलिदान - परम्पराओं के महान् व्यामोहन से कदापि श्रात्म परित्राण नहीं कर सकती । सुप्रसिद्ध - पाणिनीय धातुपाठ से अनुप्राणित- ' तप ' धातु सन्ताप, ऐश्वय्र्य, तथा द ( ह्, इन तीन अर्थों से अनुप्राणित है ( १ ) । क्या एक ही - ' तप ' तत्त्व के ये तीन विभिन्न अर्थ हैं? प्रश्न का उत्तर पुरुषभात्रानुबन्ध से जहाँ ' स्वीकृति ' में दिया जायगा, वहाँ प्रकृतिभावानुबन्ध से प्रश्न का उत्तर- ' निषेधा'-त्मक ही होगा । सभी तत्त्व, सभी पदार्थ सभी विवत ' - ' एकं वा इदं विबभूव सर्वम् ' - ' एतद्वै तन ' इत्यादिरूप से जहाँ आत्मपुरुषदृष्ट्या एक ही ' ब्रह्म ' के महिमामय विवत बनते हुए अभिन्नार्थक हैं, इसी इसी अभिन्नार्थता के आधार पर जहाँ- ' सर्वे सर्वार्थवाचकाः ' सिद्धान्त व्यवस्थित हुआ है, वहाँ अपने त्रिगुणभाव से विषम - विभिन्न - पृथक भावों की सर्जिजका ' प्रकृति ' के अनुबन्ध से सन्तापार्थक तप, ऐश्वर्य्यार्थक तब, तथा हाहार्थक तप, तीनों का स्वरूप प्रकृतिभेदभिन्न प्राकृत- संस्थान - त्रिभागों के अनुपात से सर्वथा पृथक पृथक ही माना जायगा । ' तपः ' शब्द के चिरन्तन - इतिहास में प्रवृत्त होते हुए हमें सर्वप्रथम प्रकृति के उन विभक्त तीन संस्थानों का ही अन्वेषण कर लेना पड़ेगा, जिनमें ब्रह्मविवर्त्त रूप एक ही तप के प्रकृति-भेदभिन्न सन्ताप - ऐश्वर्य दाह - लक्षण विभिन्न तीन तपोभाव पृथक् - पृथक् रूपेणा व्यवस्थित, एवं प्रतिष्ठित हैं । शतपथभाध्य के अबतक के पूर्वसन्दर्भों का अवधानपूर्वक अवलोकन, मनन करने वाले पाठकों को यह त्रिटित होगया होगा कि, बिश्वेश्वर -पुरुषात्मप्रजापति का महिमामय प्राकृत विश्व प्राणादि गुणभूतों के पञ्चीकरण से ' प ' बन रहा है । अतएव प्रकृति के, किंवा प्राकृत - यज्ञात्मक - विश्व के समयात्मक, व्यष्ट्यात्मक सभी निवर्त्त ' पञ्चपर्वा – पञ्चात्मक - पाहत ही प्रमाणित हो रहे हैं, जैसाकि पूर्वसन्दर्भानुगत - ' पा‌को वै यज्ञः ' इत्यादि के समन्वय - प्रसङ्ग में विस्तार से स्पष्ट किया जाचुका है । अतएव विश्वाधिष्ठात्री प्रकृतिदेवी उप-निषदों में भी ' पपर्वा नाम से ही प्रसिद्ध हुई है, जैसाकि निम्न लिखित श्वेताश्वतर वचन से म्पष्ट प्रमाणित है-( १ ) - ' तप ' - सन्तापे - ( भ्वादिगणे ) - सन्तापार्थक- तप ' तप ' - ऐश्वर्ये - ( दिवादिगणे ) ऐश्वर्यार्थक- तप ' तप ' - दाहे —- ( चुरादिगणे ) - दाहार्थक - तप --६.४५

पृष्ठ 382

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 382 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड प्रथमश्राह्मरण

पञ्चस्रोतोऽम्बु, पञ्चयोन्युग्रवक्रां, पञ्चवाणोम्मिं, पञ्चबुद्धयादिमूलाम् ।

पञ्चात्रर्त्ता, पञ्चदुःखौघवेगां, पञ्चाषड्भेदां, पञ्चपर्वामधीमः ॥

—श्त्रे ० उप ० १ | ५ | परोरजात्मक ऋषिप्राण, रजः प्रवर्त्तक पितृप्राण, रजोभावात्मक देवप्राण, रजस्तमोऽनुगत पशुप्राण, तथा तमःप्रधान भूतप्राण, इन पञ्च प्राणों से कृतरूपा पञ्चपर्वा प्रकृति ही त्रिपर्वा पुरुष * के आधार पर पञ्चपर्वा विश्व का आतानात्मक वितान करने में समर्थ बनी हुई है, जोकि तत्तत्प्राणप्रधान पाँचों विश्वपर्व पूर्वसन्दर्भों में क्रमशः ( १ ) ऋषिप्रणमूर्त्ति स्वयम्भू, ( २ ) पितृप्राणमूर्ति - परमेष्ठी, ( ३ ) देवप्राणमूर्त्ति सूर्य्य, ( ४ ) - पशुप्राणमूर्त्ति चन्द्रमा, एवं भूतप्राणमूत्ति भूपिण्ड, ( किंवा पृथिवी ), इन नामों से यत्र– तत्र उपबर्णित हुए हैं । पञ्चभावात्मिका - पञ्चप्रागोर्मिलक्षणा - विश्वोपादानभूता क्षरप्रकृति के वे ही तथा-कथित पाँचों प्राण क्रमशः प्राणः, आप:, वाक्, अन्नम्, अन्नादः, इन पारिभाषिक नामों से भी व्यवहृत हुए हैं । और यही पञ्चपर्वा प्राकृत - उस ' विश्व ' का संक्षिप्त - तम स्वरूप परिचय है, जिसके अमुक-संस्थान - विशेषों में से ही हमें संकल्पित तीनों तपस्तत्वों को अपनी तीक्ष्णा अभ्रियों से ढूंढ निकाल लेना है । अत्यन्त अवधानपूर्वक - तालिका माध्यमेन विश्व की तथोक्ता स्वरूपस्थिति को लक्ष्य बनाने का अनुग्रह कीजिए, एवं तदाधारेणैव तपस्त्री का अन्वेषणात्मक अध्यवसाय उपक्रान्त कीजिए । १- ब्रह्माक्षरानुगता — क्षरप्रकृतिरेव - प्राणः - ( सोऽयं परोरजा - ऋषिप्राणः ) २- विष्णबक्षरानुगता - क्षरप्रकृतिरेव श्रापः - ( सोऽय रजः प्रवर्त्तकः - पितृप्राणः ) ३ – इन्द्राक्षरानुगता — क्षरप्रकृतिरेव - वाक्- ( सोऽयं रजो भावात्मक: - देव प्रारणः ) ४ - सोमाक्षरानुगता -- क्षरप्रकृतिरेव - अन्नम - ( सोऽयं रजोऽनुगतः - पशुप्राणः ) ५- अग्न्यक्षरानुगता - क्षरप्रकृतिरेव - अन्नादः -- ( सोऽयं तमोऽनुगतः - भूत प्रारण: ) १ - ऋषिप्राणमूर्ति: - स्वयम्भूः– परोरजाः २ – पितृप्राणमूर्ति: - परमेष्ठी — रनोऽधिष्ठाता ३ – देवप्राणमूर्तिः– सूर्यः -- रजोऽभिगत: ४ - पशुप्राणमूर्तिः– चन्द्रमा — रजोमूर्तिः ५ — भूतप्राणमूर्त्तिः – भूपिण्डः — मूच्छित रज: * " त्रीणि ज्योतींषि सचते स षोडशी " ( यजुः संहितायाम् ) ६४६

पृष्ठ 383

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 383 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण प्रथम ब्राह्मण ' प्रहितां संयोगः ' एवं ' प्रयुतां संयोगः ' मूलक सुप्रसिद्ध आदान विसर्गात्मक, प्रकृतिसिद्ध व्यापार से विश्व के पांचों पर्वों की प्राणमात्रा, तथा भूतमात्राओं का परस्पर आदान प्रदान हुआ करता है । इस पारस्परिक प्राण - भूतनिबन्धन आदान - प्रदान के तारतम्य से ही पाञ्चभौतिक पदार्थों के नाम - रूप- गुणात्मक-प्राकृत स्वरूपों में परस्पर विभेद उत्पन्न होता है । और यों इन मात्राभावों के आदान- विसर्गात्मक चकमण से ही विश्व की, तथा विश्वगर्भस्थ चर - अचर - प्राकृत - पदार्थों की स्वरूपस्थिति षड्भाव - विकारों से समन्वित होती रहती है । क्योंकि पाँचों हीं विश्वपर्व, एवं विश्वपत्रों में प्रतिष्ठित यच्चवावत् चर - अचर प्राणी स्व-स्व भूतमात्राओं के माध्यम से स्वस्व प्राणिमात्राओं का वित्र सनात्मक उत्सर्ग - त्याग करते रहते हैं, सभी प्राण- भूतात्मक ' स्व ' भागों का दान करते रहते हैं । अतएव सभी को समट्या व्यष्ट्या उभयथा तपोधम्र्मा, तपस्वी इसलिए कहा, और माना जासकता है कि, पूर्व में हमने तप का-- एतद्वै तप इत्याहुर्यत स्वं ददाति ' एक यह भी लक्षण किया है, जो कि श्रौत होने से सर्वात्मना मान्य है । और यों स्वमात्रादानरूपा सहज विसर्ग प्रणाली से विश्व, और विश्व के यच्चयावत् पदार्थों को अवश्य ही - ' तपस्वी ' कहा जासकता है । आदान -सापेक्षा विस-र्गात्मिका इसी तपश्चर्यां से इन तपस्वियों की स्वरूप व्यवस्थिति व्यवस्थित है । ' स्वं ददाति ' रूप विसर्ग, उत्सर्ग, किंवा त्याग अवश्य ही श्रदान, ग्रहण, किंवा संग्रह, से नित्य सापेक्ष बन रहा है । इम पारस्परिक सापेक्षता को ही ' अन्नान्नाद सम्बन्ध ' कहा गया है, जिस का स्पष्ट अर्थ यही है कि, प्रत्येक पदार्थ स्व - प्राण - भूत - तृप्ति के लिए जहाँ उत्सर्ग - परित्याग करता हुआ उन का ' अन्न ' बना रहता है, वहाँ यही स्व- क्षतिपूर्ति के लिए दूसरों से व्यक्त भूत - प्राणों का संग्रह करता हुआ, उप-निषद्भाषानुसार उन का ' भोग ' करता हुआ * उन का ' अन्नाद ' भी बना रहता है । त्याग की दशा में प्रत्येक प्रत्येक का अन्न है, भोग्य है, सोम है, तो ग्रहणदशा में प्रत्येक प्रत्येक का अन्नाद है, भोक्ता है, अग्नि है । और यों - इस सापेक्षता से सभी अन्न हैं, सभी अन्नाद हैं । ' सर्वमिदमन्त्र, सर्वमिदमन्नादः ' ( शतपथ ), - ' द्वयं वा इदं - अत्ता चैव आद्यन ' ( शतपथ ) इत्यादि ब्राह्मणश्रुतियों का यही तात्त्विक समन्वय है, जिस का निम्न लिखित मन्त्रश्रुति से अक्षरश: समर्थन होरहा है । देखिए!

श्रहमस्मि प्रथमजा ऋतय पूर्व देवेभ्यो अमृतस्य नाम ।

यो मा ददाति स इदेव मात्र दमन, मन्नमदन्तमयि ॥

- सामसंहिता पू ० ६ | १ | १० || ' मैं अन्न हूँ, और अन्न खाते हुए को मैं खा भी रहा हूँ ' इत्यर्थक - ' अहमन्नमन्नमदन्त-मद्म ' इस अन्तिम वाक्य के द्वारा स्पष्ट ही प्रत्येक पदार्थ की अन्न, श्रनादृता प्रमाणित है । अब इन अन्न - अन्नाद - भात्रों के सम्बन्ध में थोड़ा सूक्ष्मावलोकन अपेक्षित है । विसर्ग होता है ' अग्नि ' का, एवं आदान होता है - ' सोम ' का आता हुआ भाग ' अन्नात्मक सोम ' है, एवं जाता हुआ भाग अन्नादात्मक ' अग्नि ' है । अग्नि अङ्गिरस तत्त्व ' हैं, तो सोम ‘ भार्गव - तत्त्व ' है । भार्गव - सोम संकोचधर्म्मा स्नेहतत्त्व * -- " तेन त्यक्त ेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् " । — विस्तार के लिए देखिए ' ईशोपनिषद्विज्ञानभाष्य ' ६४७

पृष्ठ 384

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 384 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड प्रथमब्राह्मण है, तो आङ्गिरस -अग्नि विकासधर्म्मा तेजतत्त्व है | स्नेहगुणक सोम यदि तेजोगुणक अग्निसापेक्ष है, तो तेजो-गुणग्न स्नेहगुणक सोमसापेक्ष है । यों दोनों परस्पर नित्य सापेक्ष हैं । अतएव त्याग को संग्रहमूलक ही माना जायगा, एवं संग्रह को त्यागमूलक ही माना जायगा । सहज - भाषा में – ' त्याग ' वही ' त्याग ' कहलाएगा, जिसका उद्देश्य ' संग्रह ' होगा । एवं ' संग्रह ' वही ' संग्रह ' कहलाएगा, जिस का उद्देश्य त्याग ' होगा । संग्रहशून्य त्याग - तपस्या - बलिदान जहाँ सर्वथा निरर्थक प्रमाणित होते हुए स्वस्वरूप के मूलोच्छेदक ही माने जायँगे, वहाँ त्यागशून्य संग्रह - जड़ता का प्रवर्त्तक बनता हुआ स्वस्वरूप का यावर ही बन जायगा । अतएव दोनों का समन्वय इम सापेक्ष त्याग, तथा मंग्रह की मौलिक स्वरूप परिभाषा से ही समन्वित हो सकेगा । अतएव स्वदानात्मक तमोरूप श्राङ्गिरस -अग्निभाव के साथ अनिवार्यरूपेण परादानात्मक संग्रहरूप भार्गव - सोमभाव का भी सन्बन्ध स्वतः ही मंसिद्ध होजायगा । अतएव आदानगर्भित विसर्ग को ही, भृगु गर्भित ङ्गिरस व्या-पार को ही वास्तविक -- ' तप ' माना जायगा । इसी रहस्य को लक्ष्य बना कर भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है कि, - ' भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् ', जिस इस वचन का संस्मरण पूर्वज्रकरणों में भी हो चुका है । ( देखिए पृष्ठ ४४१-४२ ) यह तो हुई ' तपः ', शब्द की लोकानुबन्धिनी स्वरूप- स्थिति का किञ्चिदिव निदर्शन | श्रव ' तपः ' के उस सत्तासिद्ध - वैज्ञानिक - स्वरूप की ओर तपस्वी विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया जारहा है, जिन के तीन बिभिन्न प्राकृत विवत्तों का पूर्व में संस्मरण किया गया है । जिम पञ्चपर्वात्मक विश्व का पूर्व में तालिकारूपेण दिग्दर्शन कराया गया है, उस पञ्चपर्वात्मक, अक्षरप्रकृतिविशिष्ट - क्षरप्रकृतिरूप विश्य में-- ' ततसृष्टवा तदे--वानुप्राविशद् ' के अनुसार त्रिमूर्ति षोडशीप्रजापति ' आत्मप्रतिष्ठा ' रूप से प्रविष्ट हो रहे हैं, जैसा कि--' य आविवेश भुवनानि विश्वा ' - तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे ' इत्यादि --मन्त्रोपनिषत् - श्रुतियों से प्रमा--णित है । विश्वानुप्रविष्टता से ही वह त्रिमूर्ति षोडशीप्रजापति - ' विश्वचर ' विश्वात्मा ' ' विश्वेश्वर ' आदि अभिधाओं से समन्त्रित होरहा है । पञ्चपर्यात्मक समष्टिरूप एक विश्व की दृष्टि से वह ' एक ' ' विश्वेश्वर ' है, तो पृथक् पृथक - पाँच व्ययात्मक पाँच विश्वपर्वों के पार्थक्य से वह एक ही पञ्च विवर्त भावों में परि-गित होता हुआ -- पाँच ' ईश्वर ' है, जिन का साङ्केतिक नाम है ' उपेश्वर ' । विश्व का समष्ट्यात्मक ' ईश्वर ' ' एक ' है, एवं व्यष्ट्यात्मक ' उपेश्वर ' पाँच हैं, जिन का पूर्व के मनुवृषभ - प्रकरणों में रेखाचित्रों के माध्यम से दिग्दर्शन कराया जाचुका है । यों वह एक ही त्रिमूर्ति इन पाँच विश्व पर्वों में पना - अपने - त्रीणि-त्रीरिण - रूपों से विभक्त होता हुआ स्वयमपि पञ्चपर्वा प्रकृतिवत् पञ्चपर्वा, एवं त्रिः- त्रिः- मूर्ति बन रहा है । इसी तथ्य को लक्ष्य बना कर छान्दोग्यश्रुति ने कहा है—

यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेम्बो न ज्यायः परमन्यदति ।

यस्तद्वेद स वेद सर्व सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति ॥

- छान्दोग्य उपनिषत् विश्व के पाँच पर्वो में अपने तीन - तीन महिमारूपों से विभिन्न उन ' तीनों ' का क्या स्वरूप है?, प्रश्न का उत्तर है - ' तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ' मूलक ' त्रीणि ज्योतींषि सचते षोडशी ' यह मन्त्रभाग | क्या तात्पर्य? | तात्पर्य स्पष्ट है । वह प्रजापति पञ्चकल अव्ययरूप ' अमृतम् ', पञ्च-६४८

पृष्ठ 385

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 385 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण प्रथमब्राह्मण कल अक्षररूप - ' ब्रह्म ', तथा पञ्चकल ग्रात्मक्षररूप - ' शुक्रम् ' इन तीन ज्योतिर्भावों से ही त्रिमूर्ति बन रहा है । ' अमृताव्यय ' इसी की ‘ मनोवना ' ' ज्ञानज्योति ' है, ' ब्रह्माक्षर ' इसी की ' प्राणघना ' - ' कर्म्मज्योजि ' है, एवं - ‘ शुक्रक्षर ' इसी की ‘ बाग्वना ' - ' भूतज्योति ' है । मनः प्राण - वागूरूपा, अमृत - ब्रह्म - शुक्रात्मिका-ज्ञान -- क्रिया - अर्थ - शक्तित्रना इह्रीं तीनों ज्योतियों से कृतरूप विश्वात्मा विश्व के पाँचों, अर्थात् तीनों, वित्तों में प्रतिष्ठित है । प्रक्रान्त पाँच के स्थान में सहसा यह - ' तीनों ' और क्या समुपस्थित होपड़ा?, दो शब्दों में इस समस्या का भी निराकरण कर लीजिए, जिसके आधार पर ही प्रक्रान्त - ' तपः ' शब्द का सत्ता-सिद्ध तत्त्वार्थ सम्भावित है । भारतीय - व्यावहारिक – सांस्कृतिक जगत् में - ' त्रिमूर्त्ति ' शब्द का प्रसिद्ध अर्थ है - ' ब्रह्मा, विष्णु, महेश | सर्वस्वात्मक पुराणशास्त्र ही भारतीय - ' सांस्कृतिक आयोजनों ' की उसीप्रकार मूलप्रतिष्ठा है, जैसे कि स्मृतिशास्त्र भारतीय - ' सांस्कृतिक आचारों ' की, एवं ' श्रुतिशास्त्र ' ' भारतीय संस्कृति ' की मूलप्रतिष्ठा माना गया है | भारतीय - सांस्कृतिक-- लोकसामान्यप्रजा से अनुप्राणित आत्मानुगत पर्व, बुद्वय-नुगत उत्सव, मनोऽनुगत सम्मेलन, तथा शरीरानुगत समारोह, नामक चतुद्धां विभक्त यच्चयावत् भारतीय -- सांस्कृतिक - आयोजनों का केन्द्र क्योंकि पुराणशास्त्र है, एवं यह क्योंकि त्रिदेवमूर्त्ति के आधार पर ही सांस्कृतिक आयोजनों की व्याख्या करता है, अतएव लोकसामान्य में ' त्रिमूत्ति से ' त्रिदेवता ' ही परिगृहीत होपड़े हैं । तो क्या पुराणशास्त्र वैदिक-- ' पञ्चदेवतावाद ' का विरोधी है?, अब्रह्मण्यम्? ब्रह्मण्यम्!! जो पुगणशास्त्र - वेदशास्त्र के ज्ञान - विज्ञानात्मक रहस्य - पूर्ण तत्त्वों की स्वरूप - व्याख्यामात्र हो, तत्स-म्बंध में तो ' विरोध ' की कल्पना करना भी अपने आपको प्रायश्चित्त का ही भागी बनाना है । इयमंत्र सङ्गतिः | विश्व के पाँचों पर्वों से अनुप्राणित ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र - अग्नि - सोम, सुप्रसिद्ध इन पाँचों देव-तात्रों के विश्वाधारभूत पूर्वोक्त त्रिमूर्ति विश्वात्मा के मन: - प्राण - चाकू - प्रधान अमृत -- ब्रह्म - शुक्र- नामक तीन वित्तों के अनुबन्ध से अन्ततोगत्वा तीन ही प्रमुख - विवर्त्त शेष रह जाते हैं । ' ब्रह्मा ' का एक स्वतन्त्र विभाग है, ' विष्णु ' का स्वतन्त्र विभाग है, एवं इन्द्र- अग्नि- सोम, इन तीनों की समष्टि का एक स्वतन्त्र विभाग है | जैसा कि स्पष्ट किया गया है - विश्वात्मा का मृताव्यय- स्वरूप मनोभाग ज्ञानज्योतिर्म्मय है, ब्रह्माक्षररूप प्राणभाग कर्म्मज्योतिर्म्मय है, एवं शुक्रक्षररूप वाग्भाग भूतज्योतिर्मय है । ज्योति: क्योंकि अवलोकनात्मक ' आलोक ' का माध्यम बनती है, प्राणीसृष्टि में क्योंकि ' नेत्र ' ही अवलोकन के माध्यम बनते है । एकमात्र इसी अनुबन्ध से ज्योतिः का एक साङ्केतिक नाम ' नेत्र ' भी रख दिया है । स्वायम्भुव ब्रह्मा सत्यनेत्र, ऋत-नेत्र, के सम्बन्ध से जहाँ - ‘ द्विनेत्र ' है *, पारमेष्ठ्य विष्णु जहाँ भार्गव सौम्य, आङ्गिरस आग्नेय - तेजः - सम्ब-- सत्यवृतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यं ' ऋत - सत्य - नेत्रे ' सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥ - श्रीमद्भगवते ६४६

पृष्ठ 386

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 386 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड प्रथमत्राह्मण न्ध से - ' द्विनेत्र ' हैं, वहाँ सूर्य - चन्द्र- पार्थिवाग्निमूर्ति, अतएव त्रिज्योतिमूर्त्ति भगवान् महेश्वर- ' त्रिनेत्र ' नाम से ही प्रसिद्ध हुए हैं । तात्पर्य्य यही है कि, मनोमय - अमृताव्ययात्मक - ज्ञानज्योतिर्भाव का स्वायम्भुत्र ब्रह्मा से सम्बन्ध है, अतएब इहें चित्पति ' ( ज्ञानपति ) कहा गया है । प्राणमय ब्रह्माक्षरात्मक कर्म्मज्योतिर्भाव का पारमेष्ठ्य विष्णु से सम्बन्ध है, अतएव इहें ' कर्म्मवति ' । प्राणपति ) कहा गया है । एवं वाङ्मय --शुक्रक्षरात्मक - भूतज्योतिर्भाव का सौर- चान्द्र -- पार्थिव - इन्द्र - सोम - अग्नि से सम्बन्ध है, अतएव त्रिमूर्ति -त्रिनेत्र इन महेश को ' भूतपति ' ( पशुपति - वाक्पति ) कहा गया है । तदित्थं - विश्वात्मा के मनः- प्राण-बाङ् निन्ध अमृत -- ब्रह्म · शुक्रा - त्मक ज्ञान- कर्म्म - भूत - ज्योतिर्भाव के अनुबन्ध से पांच विश्वदेवताओं के तीन भी सम्पन्न होजाते हैं, जिनके आधार पर ही पुराण का ' त्रिदेवतावाद ' सुप्रतिष्ठित है । भूतज्योति-विवर्त्त ' सूर्य्य - चन्द्र - अग्नि ( पार्थिव ) भेद से तीन भागों में विभक्त है, जिनके कि साङ्केतिक नाम क्रमशः स्वज्योतिः- परज्योतिः -- रूपज्योति हैं । अतएव त्रिभूतज्योतिर्म्मय -सूर्य - चन्द्र- पार्थिवा: मक इन्द्र -- सोम--अग्नि - रूप त्रिमूर्ति का एक विवर्त्त मान लिया जाता है, और यो- ' पाँच ' विश्वपर्व विश्वात्मा के त्रित्त्वानुत्रन्ध से ' तीन ' भाव में भी परिगात हो रहे हैं, जैसाकि परिलेग्न से स्पष्ट है । १- ज्योतिषां ज्योतिः - ब्रह्मा स्वयम्भूः - श्रमृताव्ययानुगतो द्विनेत्र: -ब्रह्मा ( १ ) २- अव्यक्तज्योतिः—— विष्णुः परमेष्ठी - ब्रह्माक्षरानुगतो द्विनेत्रः- विष्णु: - ( २ ) पञ्चपर्वानुगतं विश्वम्३- स्वज्योतिः ४- परज्योतिः-५. रूपज्योतिः —— -- इन्द्र: - सूर्य्यः - सोमः - चन्द्रमाः अग्निः - पृथिवी - इन्द्र सोमाग्न्यनुगत स्त्रिनेत्र: - शिवः ( १ ) विश्वम् त्रिपर्वानुगतं -: *: पाठकों से आवेदन किया जायगा कि, ' तपः ' शब्द के मूलाधारभूत उक्त परिलेखके ब्रह्मा - विष्णु-महेशात्मक तीनों विश्व पर्वो को वे श्रवधानपूर्वक लक्ष्यास्ट करलें । क्योंकि इसी ' त्रिमूत्ति ' के आधार पर हमें ‘ तपः ' शब्द के प्रतिज्ञात -- सन्ताप -- ऐश्वर्य दाह -- नामक तीनों तपोभावों का समन्वय प्रयास करना है । स्वायम्भुव ब्रह्मा षोडशी --विश्वात्मा के मनोमय ज्ञानशक्तिघन - अमृताव्यय - रूप ज्ञानज्योतिर्म्मयरूप से प्रधान रूपेगा समन्वित होते हुए क्योंकि चित्पति हैं, ज्ञानपति हैं, अतएव स्वायम्भुव ब्रह्मा का तप कहलाएगा- ' ज्ञान-मय ' -- ' यस्य ज्ञानमययं तपः । ब्रह्मा के इसी ज्ञानमय तब को कहा जायगा -'सन्तान ' । यद्यपि लोक-* - यः सर्वज्ञः सवधित्, यस्य ज्ञानमये तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म, नामरूप, मन्नञ्च जायते ॥ उपनिषद ६५०

पृष्ठ 387

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 387 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण प्रथमवाह्मण भाषा में अमुक रूढिभावों के कारण ' सन्ताप ' शब्द - ' शोकसन्तापरूप ' से दुःखवेग से ही अनुप्राणित देखा-सुना जाता है । तथापि तात्त्विकी परिभाषा के अनुसार तो ' सन्ताप ' शब्द का दुख: वेग से यत्किञ्चित् भी तो सम्बन्ध नहीं है । अपितु क्रियाप्रधान ' तप ' नामक प्रारणात्मक तप के आधारभूत मनोमय ज्ञानशक्ति प्रधान ज्ञानीय व्यापार को ही श्र तिने ' सन्ताप ', किंवा ' संतपन ' कहा है, जैसाकि - ' तस्य श्रान्तस्य ( बाग्व्यापार-मयस्य ), तप्तस्य ( प्राणव्यापार मयस्य ), सन्तप्तस्य ( मनोव्यापारमयस्य ) तेजो - रसो निरवर्तन ' इत्यादि श्रुति से स्पष्ट प्रमाणित है । और यही अर्थ प्रमुख तात्त्विक अर्थ है । तप से ही ' ताप ' बना है । एवं ' ताप ' ही ' सम् ' उपसर्ग से - ' संताप ', किंवा ' सन्ताप ' रूप में परि-रात होगया है । श्रव्ययात्मस्वरूपबेत्ता श्रात्मनिष्ठ विद्वानों को विदित ही होगा कि, षोडशीप्रजापति का ' श्रमृतम् ' नामक ' अव्यय ' विवर्त्त ही अपने आत्ममूलक साम्य से: ' समब्रह्म ' नाम से प्रसिद्ध है । श्रमिन्नभावात्मक-एकीभावात्मक इसी ' समत्रह्म का स्वरूप संग्राहक माना गया है- ' सम् ' नामक उपसर्ग, जैसाकि - ' समित्ये-कीभावे ' इत्यादि से प्रसिद्ध है, जिस इस समब्रझात्मक अद्वय अविभक्त अव्ययात्मा के संग्राहक ' सम् ' के सम्बन्ध से ही तत्कृति ' संस्कृति ', तद्भावप्रधाना भाषा - ' संस्कृत ', एवं तदनुबन्धी आचारविशेष ' संस्कार ' आदि नामों से प्रसिद्ध हुए हैं । स्वायम्भुव ब्रह्मा का ज्ञानमय तप क्योंकि श्रव्ययब्रह्मात्मक समग्रझ की मूल-प्रतिष्ठा पर ही प्रतिष्ठित है । अतएव अवश्य ही इस ' तप ' को ' सम् ' से समन्वित होने से ' संताप ' कहा जास-कता है, जिसके अनुगमन से ज्ञानसम्पत्ति की ही अभिव्यक्ति मानी है तत्तपोयुक्त महर्षियोंनें । ' ऋषिप्रारण ' ही इस सन्तापात्मक ' तप ' की मौलिक उपनिषत् है । स्वायम्भुव उस यजुःप्राण का ही नाम ‘ ऋषि ' है, जो कि सदूषन - सद्रूप होने से ' असत् ' नाम से प्रसिद्ध है ( * ), जिसे कि पञ्चपर्वा, किंवा त्रिपर्वा विश्व का मूलप्रवर्त्त के माना गया है । ऋक्साम - रूप वयोनाधात्मक छन्द से वन्दित स्वायम्भुव ब्रह्मनिःश्वसिंत अपौरुषेय यजुर्वेदात्मक मौलिक प्राण का ही नाम स्वयम्भू ब्रह्मा का तथोक्त ' ज्ञानीय - तप ' है, जिस इस मौलिक ज्ञानीय-- ऋषितप से ही सम्पूर्ण विश्व अभिव्यक्त हुआ है । स्वायम्भुव सत्य - ब्रह्मा-रूप महदुक्थ से विनिर्गत, परमाकाशात्मक स्वायम्भुव ' महिमाकाश ' ( परमव्योम ) में श्रासमन्तात् व्यास पिप्राणप्रधान इसी ज्ञानीय तप की व्याप्ति का स्थान -- ' तपोलोक ' नाम से प्रसिद्ध है, जहाँ मात्रारूपेण स्वायम्भुव सत्य - ऋत -- सूत्रों ( नेत्रों ) के द्वारा वह विनिर्गत होकर सब में ज्ञानमात्रा का प्रसार किया करता है । सत्य -- ऋत - नेत्रों से सर्वत्र व्याप्त, स्वायम्भुव ऋषिप्राणमूर्ति, स्वायम्भुव परमाकाश में व्याप्त, सद्भावा--पन्न, अतएत्र ' असत ' नाम से प्रसिद्ध, अव्ययात्मा के ' सम् ' भावात्मक ज्ञान की प्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित, अत-: - इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये मनः स्थितम् । निर्दोषं हि समं त्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ - गीता * - श्रसद्वा - इदमग्न आसीत् । तदाहुः - किंतदसदासीदिति, ऋषयो वाच तदग्रे ऽसदा-सीत् । तदाहुः - के ते ऋषय इति, प्राणी वा ऋषयः । ६५१ - शत ० ६ | १ | १ | १ |

पृष्ठ 388

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 388 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड प्रथमत्राह्मण एव ज्ञानमय, अतएव च-- ' सम् भाव से समन्वित ज्ञानीय तपोरूप, प्रथम स्वायम्भुव सन्तापार्थक - तप का यही संक्षिप्त चिरन्तन इतिवृत्त है । त्रैलोक्य - विद्यावित् विद्वान् जानते हैं कि, लोकाधिष्ठाता विश्वाधिष्ठाता षोडशीप्रजापति का पाञ्चभौतिक शरीर ' सप्तवितस्ति ' रूप है, जैसाकि - ' सप्तवितस्तिकाय: ' ÷ से प्रसिद्ध है । भूः भुवः स्त्रः - महः -जनत् -- तपः- सत्यम्, सुप्रसिद्ध ये सात लोक ही उस लोकी प्रजापति का ( आत्मा ) सन्तव्य । हृत्यात्मक सप्त-वितस्ति -- रूप वैसा ही चतुरशीति अङ्ग लिमित शरीर है, जैसाकि गायत्र - प्राणसम्बन्ध से मानव का शरीर अष्ट-प्रादेशमित बनता हुआ चतुरशीति- अङ्ग ल है । यदि मानव अपनी प्रत्येक अवस्था ( ' वय ' ) में स्वाङ्ग लि--परिमाण से अष्टप्रादेशात्मक बनता हुआ चतुरशीतिरङ्ग लिमित - शरीरी है, तो तदभिन्न, तत्प्रतिष्ठारूप वह विश्वेश्वरप्रजापति भी स्वाङ्ग लिपरिमाण से उक्त सात वितस्तियों के मापदण्ड से चतुरशीतिरङ्ग लिमित - शरीरी ही प्रमाणित हो रहा है । सुप्रसिद्ध तथाकथित पाँचों विश्वपर्वों में प्रथम भूपिण्ड ही ' भूलोक ' है, तृतीय - सू ही - ' स्वर्लोक ' है, दोनों के मध्यम का चन्द्रोपलक्षित द्वितीय अन्तरिक्ष ही ' भुवर्लोक ' है । परमेष्ठी ' जनल्लोक ' है 1 सूर्य - तथा परमेष्ठी का मध्यन्तरिक्ष- ' महर्लोक ' है । स्वयम्भू ' सत्यलोक ' है । एवं परमेष्ठी, तथा सूर्य का ज्ञानीय ऋषिप्राणात्मक लोक ही- ' तपोलोक ' है । यों पाँच पर्वों में सात लोक श्रन्तभूर्त हैं । ये ही सुप्र-सिद्ध - भ: -भुत्रः -- स्त्रः -- महः - - जनत् - तपः- सत्यम- नाम की सप्त लोक याहृतियाँ हैं, जिन में ६ ठा लोक ही स्वायम्भुव - ज्ञानीय - तपोमय - लोक है, और इसी का नाम है- सन्तापात्मक, अर्थात् ' समत्रह्मानुगर ' तप, और यही है तीनों तपों में से ब्रह्मानुगत प्रमुख, सर्वप्रधान, सर्वप्रतिष्ठा रूप मौलिक तप, जिस इस ज्ञाना-त्मक, आत्मनिबन्धन ' ब्राह्मतप ' के बिना अन्यान्य सभी तप अप्रतिष्ठित, अतएव यातयाम ( निरर्थक ) ही प्रमाणित होजाया करते हैं । अब क्रमप्राप्त दो शब्दों में उस दूसरे ' तप ' धातु के चिरन्तन इतिवृत्त का भी अन्वेषण कर लीजिए, जिस का अर्थ माना गया है - ' ऐश्वर्य ' । सन्तापरूप ऋषितप ( ज्ञानीय तप ) ने क्या किया?, सर्व-प्रथम इस ऋषितप से क्या उत्पन्न हुआ?, प्रश्न का समाधान है - ' अप एव ससर्जादौ ' * । सर्वप्रथम ‘ अप् ’ -- तत्त्व ( प्राणात्मक ऋतधर्म्मा आपः ) ही उत्पन्न हुआ । यजुम्मूर्त्ति स्वायम्भुव -ऋषि - प्राण का ज्ञानीय-व्यापार ही सन्तापात्मक तप था । इस सन्तपनरूप तप से यजू का- ' जू ' रूप बाग् भाग उसी प्रकार ' चू '

--- क्वाहं तमोमहदहं खचराग्निर्वाभू ' संवेष्टिता एडघटस प्तवितस्तिकाः ।

क्के दृग्विधात्रिगणिताण्डपराणुचर्या वाताभ्ररोमविवरस्य च ते महिच्चम् ॥

—श्रीमद्भागवते

* सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विधाः प्रजाः ।

अप एव ससर्जादौ तासु वीजमवासृजत् ॥

— मनुः १।८ । ६५२

पृष्ठ 389

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 389 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयध्याय शतपथब्राह्मण प्रथमत्राह्मण पड़ा, जैसे कि ज्ञानी तप से मानव का जूरूप वाग्‌भाग द्रुत होपड़ता है । वह द्रुतभाग ही स्वयम्भू ऋषि-ब्रह्म ( ब्रह्म ) का वह - ‘ स्वेद ' ( पसीना ) कहलाया, जिसे ' सुवेदात्मक - अथर्ववेद ' कहा जाता है । ब्रह्म-स्वयम्भू के तप से अभिव्यक्ता यह स्वेद्वधारा ललाट से चारों ओर उसी प्रकार बह निकली, जैसे कि ज्ञानीय तप से ज्ञाननिष्ठ के वागाकाश ( ' शरीरकाश ' ) से स्वेदधारा ' ललाट ' को उपक्रम बना कर चारों ओर प्रवाहित होजाती है । ज्ञानीय - तप से सर्वप्रथम ललाट प्रदेश में हीं स्वेदकरण अभिव्यक्त होते हैं । ठीक यही स्थिति वहाँ घटित हुई | निम्न लिखित गोपथश्रुति इसी तथ्य का स्पष्टीकरण कर रही है— ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् स्वयन्त्वेकमेव । तदभ्यश्राम्बत्, समतपत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य, सन्तप्तस्य ललाटे स्नेहः, यदाद्रर्थ - श्रजायत, तेनानन्दत् । सुवेदोऽभवत् । तं वा एतं ‘ सुवेदं ' सन्तं ' स्वेद ' इत्याचक्षते । स भूयः समतपत् । तस्य सन्तप्तभ्य सर्वेभ्यो रोमगर्त्तेभ्यः पृथग् स्वेदधाराः प्रास्यन्दन्त । — गोपथब्राह्मणे १ १ २, निवेदनीय यही है कि, ऋषिप्राणात्मक ' यत् ' के व्यापार से – ' जू ' रूपा स्वायम्भुवी वाक् ही एकांश से ( यतकिञ्चिदश से ) द्रुत होपड़ी । ' सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् । वागेव सा ऽसृज्यत । सेदं सर्वमाप्नोत, तस्मादापः । यद्वृणोत् तस्माद्वाः ' ( वारि - शत ० ६ | १ | २ | ७ | ) के अनुसार यों स्वायम्भुवसन्ताप रूपा बागभाग से सर्वप्रथम तधर्म्मा अपतत्त्व ही उत्पन्न होगया, जिस इस श्रापो-द्वितीय विश्वविवर्त्त को ही - ' परमेष्ठी ' कहा जाता है, जिस का प्राप्तिधर्म्मा मैथुनी सृष्टिप्रवर्तक प्राण हो ' पितरत्राण ' नाम से प्रसिद्ध है । ' ऋषिभ्यः पितरो जाता: ' इस मनुवचन का भी यही रहस्यार्थ -समन्वय है । स्वायम्भुव ब्रह्मा के सन्ताप - रूप ज्ञानीय श्रातप ( ऋषितप ) से तद् ' जू ' रूप वाग्भाग से सर्वप्रथम उत्पन्न आपोमय परमेष्ठी सचमुच ही तो सम्पूर्ण विश्व का समृद्धिजनक महान्- ' ऐश्वर्य ' है । लोक-सामान्य में ऐश्वर्य्य - ' सम्पति ' नाम से प्रसिद्ध है । क्या स्वरूप है इस ' लोकसम्पत्ति ' का? | क्या भातिसिद्ध पत्रखण्डों ( नोटों ) का नाम लोकसम्पत्ति, किंवा लोकैश्वर्य्य है? । नेति होवाच । तो आइए! ऋषिदृष्टि के माध्यम से आज हम आप को लोकैश्वर्य्य की स्वरूप -- दिशा से परिचित करादें, जिस अपनी इस ऐश्वर्य्य - सम्पत्ति से साम्प्रदायिक - वारुणपाश में श्राबद्ध होता हुआ भारतीय मानव अनात्मवादमूलक विगत तीन सहस्रवर्षों से उत्तरोत्तर वश्चित ही होता आ रहा है । शब्दसम्पत्ति, और अर्थ सम्पत्ति, इन दोनों सम्पत्तियों की समन्वितावस्था का नाम ही है -- ' पदार्थ ', जो असंख्य - संख्या में विभक्त हैं । ' पदार्थ ' शब्द में ' पद ' और ' अर्थ ' दो भाव सन्निविष्ट हैं । ' पद ' का नाम है शब्द, एवं ' अर्थ ' का नाम है - शब्द के द्वारा गृहीत वस्तुतत्त्व । यो ' पदार्थ ' शब्द के द्वारा शब्द, और अर्थ, दोनों का संग्रह होरहा है । कैसे पदार्थ १, जो प्रकृतिसिद्ध हैं, ईश्वरीय हैं । सुवर्ण रजत ताम्र-लौह - सीसक - अभ्रक -- पारढ़ - श्रोषधि - वनस्पति- पृथिबी - वायु- चन्द्रमा - सूर्य्य - जल - श्रग्नि - पशु - पक्षी-६५३

पृष्ठ 390

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 390 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयश्रध्याय प्रथमकाण्ड प्रथमत्राह्मण मानव ऋषि - पितर - गन्ध यक्ष- आदि आदि नामों से प्रसिद्ध ईश्वरीय सृष्टि के सत्तासिद्ध पदार्थ हो वास्तव में ' पदार्थ ' हैं, जो समष्ट्या - व्यष्ट्या उभयथा ' शब्द, और अर्थ ' दोनों सम्पत्तियों से समन्वित माने गए हैं । शब्दात्मिका सम्पत्ति, तथा अर्थात्मका सम्पत्ति, इन दोनों सम्पत्तियों की मूलाधिष्ठात्री देवता ही भारतीय ' देवताविज्ञान ' में क्रमशः ' श्री: ' - ' लक्ष्मीः ' नाम से प्रसिद्ध हुई हैं । शव का नाम है - ' श्रीः ', एव अश्व का नाम है -- ' लक्ष्मीः ' । एवं इनका पारिभाधिक तात्त्विक नाम है- सरस्वती, और अम्भृणी । सरस्वतीरूपा ‘ श्रीः ’, तथा -- आम्भृणीरूपा लक्ष्मी, इन दोनों की समन्वितावस्था का नाम ही ऐश्वर्य्य ' है, जिसका मूल उद्गमस्थान है- ' आपोमय परमेष्ठी ' । कथमिति चेत्, श्रयताम्! श्रुत्वा चाप्यव-वाताम्!! 9 जिस स्वायम्भुव तप ( सन्तपनरूप ज्ञानीय तप ) से तत्त्व की उत्पत्ति बतलाई गई है, वह स्वायम्भुव-तप अपनी वागू ( जू ) के एकांश से इस आपोमय परमेष्ठी को उत्पन्न कर शेत्रांश से-- ' सोऽनया त्रय्या विद्यया सहापः प्राविशत् । तत भाण्डं निरवर्त्तत ' ( शत ० ६ | १ | १ | ५ | ) के अनुसार उस आपोमय परमेष्ठी के गर्भ में आत्मप्रतिष्ठारूप से प्रतिष्ठित होजाता है । यों अब परमेष्टी के आपोरूप, तथा तद्गर्भी-भूत ऋषिप्राणरूप, भेद से दो विवर्त्त होजाते हैं । स्वयम्भू का यजुर्भाग् यत् - जूः रूप प्रारण वाक् भेद से स्वयं द्विधा विभक्त था । ' यत् गतिप्रकृतिक ऋषिप्रारण था, तो ' जू ' स्थितिप्रकृतिक वाक्तत्त्व था । वे दोनों गति -स्थिति - भाव परमेष्ठी में समन्वित होगए । ऋषिप्राणात्मक गतिभाव तो परमेष्ठी में शब्दसृष्टि का श्राधार बना, एवं पितरप्राणात्मक स्थितिभावात्मक प्रापोभाव परमेष्ठी में अर्थसष्टि का प्रवतक बना । वहाँ की गति ( प्राण ) यहाँ - ' सरस्वती ' कहलाई, एवं वहाँ की स्थिति ( वाक् ) यहाँ आम्भृणी कहलाई । अतएव इन दोनों पारमेष्ठ्य विवतों में प्रधान ऐश्वर्य ' सरस्वती ' ही मान लिया गया, जिसकी प्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित होकर ही श्रम्भृणीदेवी श्रर्थसृष्टि में समर्थ बना करती है । अतएव आगे चलकर ' ऐश्वर्य्य ' का प्रधान स्थान सारस्वतक्षेत्र ही मान लिया गया । शब्दात्मिका ज्ञानसम्पत्ति का ही नाम है- सरस्वती, इसी का नाम है- ' श्री ', और यही है मौलिक-' ऐश्वर्य ' । एवं अर्थात्मिका भूतसम्पत्ति का नाम ही है -- आम्भृणी ' ', इसी का नाम है- ' लक्ष्मी ', और यही है ' लोकलक्ष्मी ' । श्री ही लक्ष्मी की प्रतिष्ठा है । श्रीविहीना लक्ष्मी तो कालान्तर में श्रात्यन्तिक जड़ता की प्रवर्तिका बनती हुई मानव को अलक्ष्मीभाव में हीं परिणत कर दिया करती है । ज्ञानसम्पत्ति ही अर्थात्मिका-भूतसम्पत्ति की मूलाधिष्ठात्री बना करती है । अन्यथा मूर्खो की लोकलक्ष्मी का उपभोग तो बुद्धिमान् ही कर लिया करते हैं । अतएव मानना पड़ेगा कि वास्तविक - ऐश्वर्य्यं सारस्वतन्त्र से ही अनुप्राणित है । और यही ऐश्वर्य्यरूपा सम्पत्ति का संक्षिप्ततम स्वरूप - दिग्दर्शन है । पारमेष्ठ्य - मण्डलानुगता शब्दधारात्मिका सरस्वतीधार । का ही वैज्ञानिक नाम है- अङ्गिराधारा, एवं अर्थधारात्मिका आम्भृणीधारा का ही नाम है- ' भृगुधारा ' । स्वायम्भुव - ' गति ' तत्त्व का ( प्राणात्मक ' यत्'-, तत्त्व का ) पारमेष्ठ्यरूप ही है --विकासधम्र्मा- ' तेजोभाव ' । इसी का नाम है- ' अङ्गिरा ', यही है - ' सरस्वती ', * विस्तार के लिए देखिए - ' सांस्कृतिक -- निबन्ध ' का ' दीपावलीपर्व ' नामक स्वतन्त्र प्रकरण I II