Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 51–60
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 51–60
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड पर ही मण्डलात्मक -- ' वैश्वरूय ' का वितान हुआ है, जिस वैश्वरूप्य के माध्यम से ही षाँचों विश्वपुरों में परस्पर वसुधानकोशात्मक-- वह सुप्रसिद्ध दहग़त्तरसम्बन्ध प्रतिष्ठित है, जिसके आधार पर ही पाँचों पुरों में पञ्चपुर - स्वरूप - संरक्षिका वह यशप्रक्रिया प्रकान्ता है, जिसका ' प्रहितां संयोगः - ' प्रयुतां संयोग: ' इस परिभाषाद्वयी के माध्यम से ही ऋषि ने स्वरूप - विश्लेषण किया है । विश्वस्वरूपसंस्थान के माध्यम से वस्तुस्थिति का समन्वय कीजिए । आकाशभूत - प्रधान- स्वयम्मू--नामक प्रथमपिण्ड पहिला स्पृश्य पिण्डात्मक -- पहिला वाङमय पिण्ड है । इसीके अनुरूप स्वरूप -- रखने वाले क्रमशः वायु -- तेज-- जल, --मृन् - - नामक भूतप्रधान चारों स्पृश्यपिण्डात्मक वाङमयपिण्ड क्रमशः परमेष्ठी--सूर्य्य -- चन्द्रमा - भूपिण्ड, नामक चार वाङमय पिण्ड हैं । यह अविस्मरणीय है कि यह क्रम दृष्टिमूला - सृष्टिविद्या से ही सम्बन्ध रखता है । यदि सृष्टिमूला सृष्टिविद्या के क्रम से विचार किया जायगा, तो - ' चन्द्रमा ' सर्वान्त में प्रतिष्ठित माना जायगा । क्योंकि ग्रहोपग्रहभावनिबन्धना - दर्शपूर्णमा सयज्ञानुबन्धिनी सुप्रसिद्धा ' प्रतिपदनु--चरविद्या ' से अनुगता क्रमसिद्धा व्यवस्था के अनुसार स्वयम्भू का उपग्रह सूर्य्य है, सूर्य्य का उपग्रह भूपिण्ड है, एवं भूपिण्ड का उपग्रह त्रिप्राणनिबन्धन चन्द्रमा है । सर्वान्तभावात्मिका इस अवसानात्मिका स्थिति के कारण ही चान्द्रसाम-- ' निधनसाम ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । उक्त क्रमसिद्ध श्राकाशात्मा - स्वयम्भू - पिण्ड, वाय्वात्मा परमेष्ठी - पिण्ड, तेजोमयात्मा सूर्य्य - पिण्ड, मृन्मय भूपिण्ड, एवं जलीय चन्द्रपिण्ड, इन पाँचों - वाङ् मय - महाभूतात्मक - विश्वपिण्डों के साथ ( प्रत्येक के साथ ) उस वाङमय- वषट्कारमण्डल का सम्बन्ध है, जो ' वैश्वरूप्य ' नाम से प्रसिद्ध है । पाँचों के अपने अपने महिमामण्डलात्मक - पाँच - वैश्वरूय हैं, एवं प्रत्येक में तथाकथिता साहस्री - त्रयी का स्व - स्व - पिण्डपुर-श्रवस्थानानुपात से ही उपभोग होरहा है । इन वाङमय महिमामण्डलों के अनुपात से ही पांचों विश्वपुरों का वसुधानकोशात्मक – दहरोत्तरसम्बन्ध माना गया है, जिसका निष्कर्षार्थ यही है कि, स्वयम्भू नामक श्राकाशात्मा-प्रथम - वाङमय पिण्ड के महिमामण्डलात्मक - वाक्साहस्रीमण्डलरूप वैश्वरूप्य के गर्भ में समहिममण्डल शेष चारों विश्वपर्व बुद्बुद्वत् प्रतिष्ठित है । एवमेव परमेष्ठी के महिमा - मण्डल में शेष तीनों, सूर्य के महिमा - मण्डल में शेष दोनों, एवं भूपिण्ड के महिमा - मण्डल में समहिम - चन्द्रमा गर्भभूत है । और यही वषट्कारशब्द -- निबन्धना उस पारिभाषिकी वाक्साहस्री - विद्या का संस्मरण- निष्कर्ष है, जिस से अनुप्राणित त्रिवृत् - पञ्चदश- एक विश - श्रादि स्तोमों के परिमाण - माध्यम से ही विश्वपर्वो के गणित सिद्ध - सामीप्य - और विदूरत्व का वैज्ञानिक व्यवस्थापन हुआ है । उदाहरणार्थ- ' सू ' पृथिवी से कितनी दूर है?, प्रश्न का उत्तर जहाँ आज का भूतविज्ञान श्रमुक करोड़ मीलों में देता है, वहां वैदिक - सृष्टिविज्ञान में इस प्रश्न का उत्तर होगा- ' एकविंशो वा इत-आदित्यः ’ । अर्धात् ‘ भूपिण्ड से सूर्य्यं पार्थिव - वषट्कारमण्डल के २१ वें अहर्गण पर बृहतीछन्द के केन्द्र में प्रतिष्ठित है ”, इत्यलमति - विस्तरेण ' वषट्कारशब्द ' निबन्धन - पारिभाषिक – प्रासङ्गिक - निदर्शनेन । ११ ( २ ) ५१
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श्रीः १२ - पुरोडाशमीमांसानुगत - पात्रीनिर्णेजन कर्म्म- प्रसङ्गतः “ प्रासङ्गिकी विविध वैज्ञानिकी - चर्चाएँ ” एवं ' तन्निबन्धना - विविध - परिभाषाएँ ' ३ पात्रीनिर्णेजनात्मक - क्रमप्राप्त १२ में कम्म की इतिकर्तव्यता के प्रसङ्ग में भगवान् - याज्ञवल्क्य के द्वारा जिन प्रासङ्गिक - पारिभाषिक - वैज्ञानिक तथ्यों का स्पष्टीकरण हुआ है, उन में से चतुर्विध - अग्निस्वरूप -विज्ञान, श्राप्यात्रयी - स्वरूप - विज्ञान, पश्चालम्भनविज्ञान, पञ्चप्रारणात्मक - पशुस्त्ररूप विज्ञान, अहिंसा - हिंसा - स्त्ररूपविज्ञान, प्रति कतिपय विषय विशेष महत्व रख रहे हैं, जिनमें पश्वालम्भन, पञ्चपशु, हिंसा - अहिंसा -- नुगता विषयत्रयी तो आज के दिग्देशकालानुबन्ध से निश्चयेन विशेषतम ही स्थान रखने वाली मानी जायगी । अत्र उदाहरणरूपेण अत्यन्त संक्षेप से ही इन प्रमुख विषयों का उदाहरण - स्मरण करलेना पर्याप्त होगा । ( क ) - अग्निविज्ञान - निबन्धन - पारिभाषिक स्वरूप- दिग्दर्शन – अपने पारिभाषिक -- अनुगम- - श्रर्थं से अनुप्राणित - ' चतुर्द्धा विहितो ह वा अग्रे -- अग्निरास ' इत्यादि श्रतिवचन से अनुप्राणित चतुर्द्धा विभक्त ' अग्नि ' के चतुर्विध - महिमामय - विवत्त का वेदशास्त्र में का स्पष्टीकरण हुआ है । वस्तुस्थिति तो इस दशा में कुछ ऐसी है कि, ' अग्निविद्या का विस्तारात्मक उपबृ ंहण ही सम्पूर्ण वेदशास्त्र का निष्कर्षार्थ है 1 । जिस अपौरुषेय तत्त्वात्मक स्वायम्भुव -- ब्रह्मनिःश्वसित वेद को विश्व का कारण माना जाता है, वह वेदतत्त्व भी ' ब्रह्माग्नि ' नामक अग्निविशेष ही है, जोकि ऋक्संहितान्तर्गत सुप्रसिद्ध अस्वामीय - सूक्त में -- ' वामपलित ' नामसे उपवर्णित है । ब्रह्माग्निरूप स्वायम्भुव--वामपलित - नामक ब्रह्माग्नि के आधार पर ही, इसी के प्रारम्भणधर्म से ( उपादानधर्म्म से ) जो ऋताग्नि--अभिव्यक्त होता है, उसी का नाम सुप्रसिद्ध वह-- ' आप्त्याग्नि ' है, जिस का महाभारत में एक श्राख्यान विशेष के द्वारा ' अग्निभ्रातरः ' रूप से समन्वय हुआ है । ' अग्निभ्रातरः ' रूप इस द्वितीय ' श्राप्याग्नि ' नामक ' ऋताग्नि ' का नाम ही श्रापोमय- परमेष्ठी लोक है, जोकि विश्व का क्रमप्राप्त द्वितीय पर्व माना गया है । आगे चलकर इस ऋताग्निरूप श्राप्याग्नि के गर्भ में पुनः एक अपूर्वं सत्याग्नि का केन्द्ररूपेण चयन होता है, जिसके लिए - ‘ कं स्त्रिद्गर्भ दध आपः ' कहा गया है, एवं जिसका ' तासु बीजमवासृजत् ' रूपेण मनु भगवानने स्मरण किया है । इस तृतीय - सत्याग्नि की चिति के अन्तिम परिणामरूप सञ्चितिधर्म से जिस ५२
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड श्रग्निमय- नवीन ब्रह्माण्ड की स्वरूपाभिव्यक्ति होती है, उसी का नाम है - ' सौर ब्रह्माण्ड ', जिसे हम - ' रोदसी-त्रिलोकी ' कहा करते हैं । यही क्रमप्राप्त तृतीय विश्वसंस्थान है, जिसका अग्निमयत्त्व भी स्फुट हैं ही । और ग्रागे चलिए । सौरब्रह्म । डाग्नि ही कालान्तर में अपने सर्वत्सरधर्म से सम्वत्सररूप में परिणत होजाता है । और यही सम्वत्सरप्रजापति अपने ब्रह्मौदनात्मक प्रातिश्विक वित्त से जहाँ स्वस्वरूप का संरक्षण करता है, वहाँ वित्र मनधर्म्मा प्रवर्ग्यभाग से अपने स्वरूप से पृथक होता हुआ स्वानुगत पृथिव्यादि उपग्रहों का स्वरूप - निर्माता बनता है । यही प्रजापति का सहज विस्रं सनधर्म है । सौर - देवमण्डल से प्रवर्ग्यरूपेण अपक्रान्त इसी चतुर्थ अग्नि से भूपिण्ड का स्वरूप -- निर्माण होता है । यही पारिभाषिक पार्थिव - वह मृग्याग्नि है, ज्योतिर्भावाभिभूति से ही जो ' कृष्णमृग ' नामक पारिभाषिक नाम से व्यवहृत हुआ है । और यों विश्व के क्रमप्राप्त - चतुर्थ - भूपिण्ड का भी श्रग्निमयत्त्व ही प्रमाणित होजाता है I श्रापोमय - सौम्य - चन्द्रमा, जिसका श्रापोमय परमेष्ठीवत् ऋताग्नि में हीं अन्तर्भाव है ॥ शेष रह जाता है पञ्चम- पर्वात्मक-इसप्रकार द्विविध - भावापन्न - पारमेष्ठ्य -- चान्द्ररूप ऋतधर्म्मा सुब्रह्मण्याग्नि, स्वायम्भुव ब्रह्माग्नि, सौर -सावित्राग्नि, पार्थिव - गायत्राग्नि ( मृगाग्नि ) रूपेणापि अग्नि के चातुर्विध्य का समन्वय किया जासकता है, एवं यही चातुर्विध्य की एकविधा है । ऐसे अगणित - चातुर्विध्य हैं अग्निमहिमा के, जिनमें से तत्कर्म्म में कतिपय - परिगणित - अग्निमहिमा विवर्त्तो का ही स्पष्टीकरण प्रयास हुआ है, जिन अनेकों विवर्तों में से यज्ञानुबन्ध से प्रमुखरूपेण जिन चार अग्नि भावों का तदग्निविज्ञान - प्रसङ्गतः दिगदर्शन कराया गया है, वे चारो पारिभाषिक -- अग्नि क्रमशः -- १ - रसाग्नि, २ - श्रार्त्तवाग्नि, ३- छन्दस्याग्नि, ४ - - सावित्राग्नि, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । दधि -- घृत -- मधु - रस - त्रयात्मक स्तौम्य त्रैलोक्य में व्याप्त ' रसतम् ' नामक अग्निविशेष ही ' रसाग्नि ' है, जिस के माध्यम से ही पार्थिव गायत्र -- सम्पत्ति का संग्रह हुआ करता है । उत्तरदिकस्थ - वायव्य - ' ऋताग्नि'-विशेष ही दूसरा ' आर्त्तवाग्नि ' है, जिससे ऋतुओं का स्वरूप -- निर्माण हुआ करता है । वस्तुस्वरूप को कारभाव प्रदान करने वाला वयोन ( धात्मक ग्रायतनरूप अग्निविशेष ही क्रमप्राप्त तीसरा - ' छन्दस्याग्नि ' है । एवं सृष्टि का तृतीय - पर्वात्मक - सौर- ब्रह्माण्ड स्वरूप संरक्षक -- ब्रह्मौदनात्मक - अग्निविशेष ही क्रमप्रान्त चतुथ-' सावित्राग्नि ' है । यज्ञकर्म्म- निबन्धन ( सृष्टिस्वरूप- सम्पादक- कर्म्मनिबन्धन ) इन चारों अग्नियों के पारिभाषिक -- समन्वय के द्वारा ही यज्ञसर्ग का तात्त्विक - समन्वय सम्भव है, और यही ' अग्निविज्ञान - निबन्धना ' प्रासङ्गिकी -- उदाहरणविधि का संक्षिप्त स्वरूप - दिग्दर्शन है । ( ख ) — श्राप्यायी स्वरूप विज्ञान– श्राप्त्या - त्रयी से सम्बन्ध रखने वाले रहस्यपूर्ण विज्ञान का उस सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक -- आख्यान से ही सम्बन्ध है, जिस में त्वष्ट्रा के पुत्र, अतएव ' त्वाष्ट्र ' इस उपनाम से प्रसिद्ध तीन मस्तक वाले, एवं ६ आंखों वाले ' विश्वरूप ' नामक प्रचण्ड असुर के वध का स्वरूपोपबृंहण हुआ है । प्राप्त्या के सहयोग से ही देवेन्द्र इस अद्भुत असुर को मारने में समर्थ होते हैं । पुराणशास्त्र में तो ऐसे ऐसे अद्भुत अद्भुत चरित्र पदे पदे समाविष्ट है हीं, जिन का पारिभाषिक समन्वय न करने के कारण ही हम पुराण जैसे ' ग्रार्य्य सर्वस्वशास्त्र ' को ५३
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किञ्चिदिव श्राबेदन ‘ निरी गप्य ' मानते हुए - ‘ अशक्तास्तत्पदं गन्तु ं ततो निन्दां प्रकुर्वते ' को अक्षरश: चरितार्थ करते ही रहते है । किन्तु उस समय सहसा हमारी प्रज्ञा स्तब्ध होजाती है, जब कि स्वयं वेदशास्त्र में भी हम यत्रतत्र - ऐसे ही विलक्षण आख्यानों को समन्वित देखते हैं ।. " एकता - द्विता त्रिता- नामके आध्या ब्राह्मणों के साथ क्षत्रियश्रेष्ठ इन्द्र इतस्तत: उसी प्रकार विचरने लगे, जैसे कि ब्राह्मणपुरोधा मूर्द्धाभिषिक्त राजा के साथ उसे सामयिक - परामर्श देते हुए विचरते रहते हैं । श्रागे चल कर आया - ब्राह्मणों के सहयोग से ही इन्द्र ने त्रिशीर्ष- षडक्ष- विश्वरूप असुर को मारडाला " इस श्राख्यान का आप्याग्नि कौन है? षडक्ष - त्रिशीर्ष- विश्वरूप असुर कौन है?, ' आप्त्याविज्ञान ' के द्वारा इह्रीं प्रश्नों का विस्तार से वैज्ञानिक - समन्वय हुआ है - चतुर्विद्ध-- श्रग्निविज्ञान के अनन्तर | पार्थिव सम्वत्सर -- यज्ञ से अनुगत, पार्थिव स्तोम्यत्रैलोक्यानुबन्धी- सुप्रसिद्ध त्रिवृत् - पञ्चदश- एकत्रिंश--नामक ( ६--१५-२१ - नामक ) तीन स्तोमों के भेद से तीन पार्थिव लोक व्यवस्थित माने गए हैं, जिन की समष्टि ही ' पार्थिवी स्तोम्या- त्रिलोकी ' कहलाई है । इस पार्थिवी त्रिलोकी के पृथिवीरूप त्रिवृत्स्तोम में ' भूपतिः ' नामक पार्थिव ध्रु वाग्निरूप- ( घनाग्निरूप ) अग्नि प्रतिष्ठित है, यही प्रातः सवनाधिष्ठाता - श्रष्टविध - व मुगणोपेत--शवसोनपात् -- ‘ एकता ' नामक आत्याग्नि है । पार्थिवी त्रिलोकी के अन्तरिक्षरूप पञ्चदशस्तोम में - ' भुवनपतिः ' नामक अन्तरिक्ष्य- धर्नाग्निरूप ( तग्नाग्निरूप ) वायु प्रतिष्ठित है, यही माध्यन्दिन सवनाधिष्ठाता--एकादशविध -- रुद्रगणोपेत शवसोनपात्- ' द्विता ' नामक श्राप्याग्नि है । पार्थिवी त्रिलोकी के ही लोकरूप एकविंशस्तोम में ' भृतानांपतिः ' नामक दिव्य - धरुणाग्निरूप ( विरलाग्निरूप ) आदित्य प्रतिष्ठित है । यही सायंसवनाधिष्ठाता द्वादश- श्रादित्यगणोपेत- शवसोपानत् - ' त्रिता ' नामक - आप्याग्नि है । इसप्रकार भूकेन्द्र से पृथिवी के २१ वें अहर्गण पर्य्यन्त अपनी ध्रुव - धर्म - घरुण - ( घन - तरल - विरल, किंवा चाष्प ) नामकी सुप्रसिद्धा तीन अवस्थाओं से उत्तरोत्तर सूक्ष्मभाव में परिणत होकर त्रिवृत् पञ्चदश- एकविंश रूपेण अपने तीन स्वतन्त्र - लोकसंस्थान बनाने वाला पार्थिव - त्रिविध अग्नि ही पार्थिव आपोमय अर्णव समुद्र से सर्वतः परिव्याप्त रहता हुआ ' एकता - द्विऩा - त्रिता ' नामक ' आप्याग्नि ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है, और यही ' अग्निभ्रातरः ’ रूपा श्राप्याग्नित्रयी का संक्षिप्त - स्वरूप - दिग्दर्शन है, जिन इन तीनों आत्या श्रग्नियों का ही श्रन्यत्र एक अन्य दृष्टिकोण के भेद से- " त्रयः केशिनः रूप से उपवर्णन हुआ है । उक्त तीनों श्राप्याग्नियों के सहयोग से ही रोडमी - त्रैलोक्यानुगत द्युलोक के अधिष्ठाता - ' मघत्रा ' नामक देवेन्द्र के द्वारा त्रिशीर्ष- षडक्ष - त्वाष्ट्र - विश्वरूप- का दमन होता है । ' श्रद्भिर्वा इदं सर्वमाप्तम् ' -' अहमिदं सर्वं धारयिष्यामि, सर्व जनयिष्यामि, सर्वमाप्स्यामि यदिदं किन ' इत्यादि वचनों के अनुमार अपतत्त्व ही याज़िकी - शेषानृषात्मिका - रयिप्राणमूला - दाम्पत्यसृष्टि का मूलाधार माना गया है, जैसाकि -' इति तु पञ्चम्यामाहुतात्रापः पुरुपत्रचमो भवन्ति ' इत्यादिमूला छान्दोग्योपनिषदुपवर्णिता सुप्रसिद्धा पञ्चाग्निविद्या से भी प्रमाणित है । सृष्टि के उपादानकारणात्मक पारमेष्ठय इस श्राप्यतत्त्व का ही नाम है वह - ' सुत्रह्म ', जिस के गर्भ में ' ब्रह्म ' ( तत्त्वात्मक त्रयीवेद ) प्रतिष्ठित माना गया है । ब्रह्म, और सुब्रह्म के समन्वय से ही विश्व, एवं विश्वप्रजा की स्वरूपाभिव्यक्ति हुई है । इस एक भी, एकाकार भी ब्रह्मगर्भित - सुबझरूप- श्रपतत्त्व मे विनिधाकारारित पदार्थ कैसे उत्पन्न होजाते हैं?, प्रश्न की समाधान भूमि है वह ' त्वष्टा ' नामक प्राणविशेष, जिस के समन्वय से ब्रह्म - गर्भित - सुब्रह्मरूप - आपोमय शुक्र हस्तपाद - चक्षुः- उरः -कण्ठ- श्रङ्ग लि - श्रादि * - ' समुद्रमभितः पिन्वमानम् " - ( यजुः संहितायाम् ) । ५४
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शतपथब्राह्मण २ लण्ड श्रादि रूपेण विभिन्न ग्राकारभावों में परिणत होजाता है, जैसाकि - ' त्वष्टा वै रेतः सिक्तं विकिरोति ' श्रति से स्पष्ट है | जिसप्रकार हरित - नील- पीत - रक्त- धूम्र - नीललोहित आदि सप्तविध - वर्णात्मक रूपों के प्रवर्त्तक-सौर- मघवा - नामक - देवेन्द्र है +, एवमेव – त्रिकोण --- षट्कोण - अष्टकोण - सम - विषम- तिर्य्यक् · श्रादि आदि भेदभिन्न -- आकारात्मक -- रूपों का प्रवर्तक त्वष्टाप्राण ही माना गया है । शुक्र - सहचारी - श्राप्यभावानुगत इस त्वष्ट्राप्राण को ही ' त्वष्टा ' नामक असुर माना गया है । क्योंकि श्राग्नेय -- ज्योतिर्मय प्राण जैसे -- " देवदेवता ' नाम से प्रसिद्ध है, एवमेव श्राप्यप्राण ही ' असुर ' नाम से व्यवहृत हुआ है । आकाररूपाधिष्ठता - श्रापोमय-श्राप्यप्राणधान- श्रापोमय - शुक्ररूप - सुब्रह्म - तत्त्व से संश्लिष्ट - - यह ' त्वष्टा ' नामक असुरप्राण ही सुब्रह्मरूपेण-श्राप्यतत्त्व- से अभिन्न बनता हुआ तद्रूप ही बन रहा है, और यही ' त्वाष्ट्र - विश्वरूप ' नामक वह असुर है, जिसके कारण ही तमोगुणप्रधाना- धामच्छद - भावनिबन्धना -- भूत भौतिकी - मर्त्या -- भूतसृष्टि का उद्गम हुआ है, जिस मूर्त्तसृष्टि से ही मूर्त्त -- व्यक्त - विश्व का स्वरूप अभिव्यक्त हुआ है । और यही आप्य --त्वाष्ट्र -- असुर की -' विश्वरूपता ' का संक्षिप्त स्वरूप - निदर्शन है । विश्वरूप -- पोमय प्राणात्मक त्वाष्ट्र -- असुर - मूर्त - विश्व का प्रभव बनता हुआ | -- ‘ विश्वरूप ' है, तभी तो - ' सर्वमापोमयं जगत् ' सिद्धान्त अन्वर्थ बनता है । इस विश्वरूप -- श्राप्यप्राणात्मक वाष्ट्र - असुर का जो ' मूल ' होगा, वही इसका ' मस्तक ' माना जायगा । क्योंकि- ' शिरोमूला सृष्टिविद्या ' की अपेक्षा उत्पत्ति में शिरो भाग को ही मूल माना गया है । आपोमय- सुब्रह्म का मूल प्रवर्त्तक है वह ' वाक् ’ तत्त्व, जिसे हमने ‘ यत् ’ नामक ‘ प्राण ' से समन्वित - ' जू ' रूप आकाश कहा है पूर्व के निदर्शनों में ( देखिए प्रस्तावना -- पृष्ठसं ० ४६ ) । ऋक्सामावच्छिन्ना -- यजुर्वाक् ही पोरूप में परिणत हुई है, जैसाकि -- ' सोऽपोऽसृजत- याच एव लोकात्, वागेव साऽसृज्यत ' इत्यादि शातपथी श्रुति से स्पष्ट प्रमाणित है । वह अनादिनिधना -- स्वायम्भुत्री - ‘ जु ’ रूपा -- तत्त्वात्मिका वाक् ही, ( जिस की कि मौलिक - उपनिषत् -- स्वरूपव्याख्या -- ' अग्नि ’ – ब्रह्माग्नि -- ही मानी गई है * ) ग्रापोमय उस पारमेष्ट्य - मण्डलरूप में परिणत हुई है, जिस सुब्रह्ममूर्ति ग्रापोमय-- परमेष्ठी के त्वाष्ट्र - विश्वरूप -- प्राण से ही मैथुनी सृष्टि का आकार -- विभाजन हुआ विश्वरूप - त्वाष्ट्र- ( आपोमय - शुक्ररूप - सुब्रह्म ) की मूलभूता ' वाक् ' ही तो इसका शीर्ष भाग माना जायगा । यह शीर्ष निश्चयेन त्रिपर्वा है, किंवा तीन शीर्ष - भावों को मिलाकर एक शीर्ष भाव है, जैसाकि वाक् शब्द के निर्वचन प्रसङ्ग में पूर्व के निदर्शन में स्पष्ट किया जाचुका है ( देखिए पृ ० संख्या ४८ ) । मनः - प्राण- से अविनाभूता वाक् सचमुच ही तो त्रिवृद्भावापन्ना है । और ये ही उस त्वाष्ट्र - विश्वरूप के तीन मस्तक हैं । विश्वप्रजा षड्भाव विकारों से समन्वित होकर ही स्वस्वरूप से अभिव्यक्त होती है । ये ही + रूपं रूपं मघवा वोभवीति । ÷ त्वष्टा रूपाणि पिंशति । * " तस्य वा एतस्याग्ने वयोपनिषत " —शतपथब्राह्मणे ५५
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किञ्चिदिव श्रावेदन षड्भाव त्रिकार अस्ति - जायते विपरिणमते बर्द्धते अपक्षीयते - नश्यति नामों से सुप्रसिद्ध हैं । त्रिशीर्ष-स्वाष्ट्र - विश्वरूष की भूतभौतिकी - वैकारिकी - धामच्छदा मर्त्यभाव - निबन्धना विश्वसृष्टि को विश्वस्वरूप - निर्माता त्वाष्ट्र इन ६ दृष्टियों से ही देखता है, किंवा ६ विभागों में विभक्त होकर ही भूतभौतिक सर्भ देखा जाता है । इसी नैदानिक - भाव के आधार पर त्वाष्ट्र को - ' षडक्ष ' ( ६ आँखों वाला ) मान लिया गया है । एकता – श्रान्त्याग्नि मे मानव के भूतात्मा के वैश्वानर भाग का निर्माण होता है, द्विता श्राप्त्याग्नि के सहयोग से मानव के भूतात्मा के तैजस भाग की स्वरूपाभिव्यक्ति होती है, एवं त्रिता - आ'त्याग्नि से मानवीय-भूतात्मा के - ' प्राज्ञ ' भाग की अभिव्यक्ति होती है । निष्कर्षतः पार्थिवी - भौतिकी स्तीम्या त्रिलोकी के प्रतिष्टावा-शग्सोनपात् - त्रिश्रवणीय - ध्रुव धर्त्र धरुण - भावापन्न - श्रर्थ- क्रिया -- ज्ञान- प्रधान- अग्नि-- वायु- आदित्य - नामक भूपति भुवनपति - भूतानां पति नाम्ना उपवर्णित एकता - द्विता - त्रिता - नामक श्रात्याग्नियों से ही मानवीय-यात्मक - भूतात्मा के अर्थ क्रिया- ज्ञान प्रधान वैश्वानर - तैजस - प्राज्ञ नामक तीन पर्वो का स्वरूप- सम्पादन होता है । व्यात्मक इत्थंभूत - भूतात्मा के ऊपर - प्रज्ञानमन का स्थान है, जो कि ' विज्ञानात्मा ' ( बुद्धि ) नामक सौर- इन्द्र - मनवेन्द्र से नित्य - सम्परिष्वक्त माना गया है, जैसा कि -'स वा एष प्रज्ञानात्मा ( मनः ) -विज्ञानात्मना सम्परिष्क्तः ' इत्यादि बचन से स्पष्ट है । मानव का कामार्थयोगसाधनरूप शरीर श्रापोमय त्वाष्ट्र - श्रसुरमात्र है, जिस कामार्थभोगासक्ति में समाप्लुत मानवीय भूतात्मा वारुणपाश से आबद्ध बना रहता है । आसक्तिरूप - इस पाशबन्धन का विमोक ही त्रिशीर्ष- षडक्ष - विश्वरूप असुर का पराभव है, जो कि प्रज्ञान सम्परिष्वक्त- विज्ञानेन्द्र के द्वारा ही सम्भव है । कत्र सम्भव है १, प्रश्न का उत्तर स्वयं भूतात्मा का ज्ञान-क्रिया - अर्थ - मन- पौरुष ही माना जायगा । बिना इस पौरुषरूप- श्रध्यवसाय के केवल - प्रज्ञान विज्ञानेन्द्र ( मनाबुद्धि ) चल कदापि इस श्रासुरबल को अभिभूत नहीं कर सकते I । श्रलमतिपल्लवितेन । प्रस्तुत श्राख्यान के द्वारा इसी तथ्य का अत्यन्त पारिभाषिक शब्दों में स्पष्टीकरण करते हुए ही श्रुति ने कहा है कि - ' एकता-द्विता - त्रिता- नामके श्राप्त्याओं के सहयोग से ही इन्द्र ने त्रिशीर्ष - पडत त्वाप्र- विश्वरूप का दमन कर दिया ' । अध्यात्मवत् - इस श्राख्यान का अधिदैवत तथा अधिभूत के साथ भी यथानुरूप - समन्वय द्रष्टव्य है, और यही प्रासङ्गिक - ' आत्यविज्ञान ' - अनुबन्धी संक्षिप्ततम स्वरूप - दिग्दर्शन है । ( ग ) पश्वालम्भन विज्ञान - निबन्धन - पारिभाषिक- स्त्ररूप - दिग्दर्शन – प्रकृतिमिद्ध - श्रग्नीषोमीय - श्राधिदैविक नित्ययज्ञ की स्वरूपसिद्धि का अन्यतम - माधनद्रव्य माना गया है - पशु । चिना पशु के प्रकृतिजगत् का कोई भी यज्ञ सुमम्पन्न - संसि नहीं होमकता । यज्ञकर्म्म की इत्थंभूता स्वरूपमिद्धि के लिए ही सौरसम्बत्सर- प्रजापति मे अभिन्न पार्थिव स्तोम्यत्रैलोक्य में व्याप्तन्यावापृथिव्य -यज्ञिय - प्रजापति के द्वारा द्यावापृथिव्य पञ्चविध- पशुओं का स्वरूप निर्माण हुआ है, जैसाकि - ' यज्ञार्थ ं पशत्रः सृष्टाः ' इत्यादि मनुवचन से भी स्पष्ट है । प्रकृत में दर्शपूर्णमासेष्टि नामक यज्ञकर्म की इतिकर्तव्यता प्रकान्ता है, जिसमें आहुतिद्रव्य माना गया है तण्डुलों का पिष्टद्रव्य, जिसकी पारिभाषिकी संज्ञा है - ' पुरोडाश । इसी सम्बन्ध में श्रुति ने यह प्रश्न उठाया है कि, जबकि त्रिना पशु के कोई सा भी यज्ञकर्म्म सम्भव नहीं, और दर्शपूर्ण मास में केवल पुरोडाशद्रव्य ही श्राहुति के लिए नियत है, तो फिर इस दृष्टि को यश कैसे मान ५६
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड लिया गया? | इस प्रश्न के समाधान के लिए ही श्रुति ने प्रासतिक उस - ' पश्वालम्भन - विज्ञान ' का स्वरूप - त्रिश्लेषण किया है, जिसका तत्त्वदृष्ट्या निरतिशय ही महत्त्व माना जायगा इसलिए कि— वर्त्तमानयुग के कतिपय - वेदभक्तों की युगधर्म्मनिबन्धना - दिग्देशकालानुबन्धिनी- परानुरञ्जनानुगता-निरतिशया - ‘ उदारदृष़ि '? में पश्वालम्भन का अर्थ भी केवल ' पशुस्पर्श ' ही है, एवं ' पशुत्रपात्मक - पशुमेध ' का अर्थ भी अध्यात्मावादमात्र– विमोहनात्मक - काल्पनिक प्राणविशेषमात्र ही है । प्रकृत श्रौत पश्वालम्भन-विज्ञान से अनुगत निम्नलिखित श्रौतसन्दर्भ से सर्वात्मना यह प्रमाणित होजाता है कि, पश्वालम्भन का किसी काल्पनिक - स्पर्श - काल्पनिक - प्राण- श्रादि से सम्बन्ध न होकर विशुद्ध - पशुपा ' से ही सम्बन्ध है, एवं तत् --प्राप्त्यर्थ वैधयज्ञ की स्वरूप - सिद्धि के लिए पशु का अमुक - प्रक्रिया - विशेष से प्राणवियोग ही किया नाता है -“ यदा पिष्टानि अथ लोमानि भवन्ति । संयौति -अथ मांसं भवति । सन्तत व हि स तर्हि यदाप श्रानयति - त्वग्भवति । यदा भवति । सन्ततमिव हि मांगम् । यदा शतः - अथ अस्थि - भवति । दारुण - इव हि स तर्हि भवति । दारुणमित्यस्थि । अथ यदुद्रामयिष्यन् अभिघारयति तं मज्जानं दधाति । एषा उ - सा सम्पत् - - ( पुरो-डाशानुगता -- पशुसम्पत् ), यदाहुः - याङ क्तः - पशुः - इति " | — शतपथे १२ | ३ || सुप्रसिद्ध चयनयज्ञ में जिन इष्टकाओं ( ईंटों ) का निर्माण होता है, उनमें एकवर्ष पूर्व ही-( उषा सम्भरणात्मक -- यज्ञकर्म - विशेष के साथ ही ) पञ्चपशुओं का श्रालम्बन कर उहें भूमिसात् कर दिया नाता है । एक सम्वत्सर के अनन्तर उस मिट्टी से ईटे बनाई जातीं हैं ऋत्विजों के द्वारा । तदनुबन्धी पश्वालम्भन के सम्बन्ध में वर्त्तमान युगानुचन्धिनी काल्पनिकी - करुणा के प्रतिनिधि किसी ने काल्पनिक तर्क के माध्यम से अपना यह पक्ष उठाया कि “ हिरण्य ( सुवर्ण ) भी तो अमृतप्राणात्मक ( सौर - प्राणात्मक ) है | यदि पञ्चपशुओं के श्रालम्भन से वह अमृतप्राण ही यज्ञ में अभीष्ट है, तो फिर निरपराध पशुओं को छोड़ते हुए हिरण्मय- पशु ( सोने के पशु ) ही क्यों नहीं यज्ञ में ले लिए जाते " । इस सुधारवाद का आमूलचूड़ उत्पाटन करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य को आक्रोश की भाषा में यही उत्तर देना पड़ा कि - " जो व्यक्ति ( अपने दिग्देशकालविमोहन से ) यज्ञकम्भ की तथ्यपूर्णा- विज्ञानसम्मता - चिरन्तन - पद्धतियों से एकान्ततः अपरिचित है, साथ ही जो प्रकृतिसिद्ध नित्ययज्ञकम्मों के ब्राह्मण- ( मौलिक-विज्ञान ) से अस्पृष्ट है, उस पद्धतिज्ञानशून्य - विज्ञानवचित -- प्राकृत मानव की दृष्टि में ही हिरण्मयी -- इषुकाएँ -- अमृतमयीं अमृतप्राणात्मिका - होसकतीं हैं । किन्तु जो पद्धतिरहस्य के परिज्ञाता हैं, यज्ञविज्ञान के वेत्ता हैं, उनसे तो यही आशा की जायगी कि, वे चयनयज्ञ में पाँचों पशुओं का ही आलम्भन करेंगे " * । * - हिरण्मयानि - उ - ह - एके कुर्वन्ति ' अमृतेष्टका ' इति वदन्तः । ता ह ता ' श्रनृतेष्टकाः ' । न हि तानि पशुशीर्षाणि 1 । मृण्मयानि उ हैके कुर्वन्ति - ' उत्सन्ना ५७
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किञ्चिदिव - श्रावेदन श्रागे चलकर ऐतिहासिक तथ्य का स्मरण कराते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि - " भौम- मानवप्रजा-पति ' से प्रारम्भ कर सायकायन - श्यापर्ण - नामक सुप्रसिद्ध याज्ञिक पर्यन्त तो पाँचों पशुओं का ही नियमत: श्रालम्भन होता रहा चयनयज्ञ में । श्रागे चलकर हमारे समय में ( आज से पाँच सहस्र वर्ष पूर्व --कलियुगारम्भतः किञ्चिदिव पूर्व याज्ञवल्क्य के समय में ) केवल प्राजापत्य, तथा वायव्य, नामक दो अज-पशुओं का ही आलम्भन शेष रह गया, जिसकी अगले ब्राह्मणों में वैज्ञानिकी - उपपत्ति बतलाई जारही है-· प्राजापत्यं चरका श्रलभन्ते " इत्यादिरूपेरण " । स्वयं प्रक्रान्त कम्र्मानुगत - ब्राह्मण सन्दर्भ की समाप्ति से अनुगत यह स्पष्टीकरण भी ' पश्वालम्भन ' के उक्त तथ्यार्थ का ही समर्थन कर रहा है कि - " पुरुष-अश्त्र - गौ-- श्रवि श्रज-- नामक - पाँचों के मेध्यरूप - पवित्र -भाग की उत्कान्ति से ही क्यों कि किंपुरुष गौ -: -गौर - गय - उ - नामक पाँच उत्क्रान्तमेवा - मेघशून्य - पशुओं की स्वरूपाभिव्यक्ति हुई है । अतएव कदापि इनको अशनपथानुगामी नहीं बनाना चाहिए- “ तस्मादेतेपां पशूनां नाशितत्र्यम् । अपक्रान्तमेधा ते पशवः " । पश्वालम्भन प्रयुक्त हिंसादोष से क्या यज्ञकर्म हिंसामय नहीं बन जाता!, जबकि इस यज्ञकर्म का पारिभाषिक एक नाम माना गया है- ' अध्वर ', जिसका अर्थ है - ' अहिंसक - कर्म्म '? | और फिर पशु भी तो विश्व के वैसे प्राणी हैं, जिनको स्वस्वार्थसिद्धि के लिए मारना क्या मानवधर्म्म कहा जासकता है?, इसप्रकार के आपातरमणीय - नितान्त मावुकतापूर्ण प्रश्नों के समाधान के लिए ही हमें प्रक्रान्त कर्म में-- पश्वालम्भनत्रि-ज्ञान ' का स्वरूप - विश्लेषण प्रयास करना पड़ा है, जिसके द्वारा आस्थापूर्वक यह कहा जासकता है कि, तद्विज्ञान - समन्वय के अनन्तर काल्पनिक - करुणावरुणालय - अध्यात्मवादियों की आपातरमणीया सभी कल्पनाएँ समाहित हो जायँगी, इसी निवेदन के साथ यह कर्णकटु निदर्शन अत्रैव उपश्त किया जारहा है । ( च ) पञ्चप्राणात्मक- पशुस्वरूप विज्ञान - निबन्धन - परिभाषिक- स्वरूप - दिग्दर्शन-बुद्धिवादाभिनिविष्ट - विशुद्ध - अध्यात्मवादी -- कारुणिक - मानव अपनी आध्यात्मिकी प्राण कल्पना के आदेश में यह भूल जाता है कि, ' प्राण ' की स्वरूपाभिव्यक्तित्त्व के क्षेत्र का ही नाम ' प्राणी ' है । और यो प्राण, तथा प्राणी में कोई अन्तर नहीं है । वस्तुस्थिति तो वास्तव में ऐसी है कि, विना प्राणी को वाऽएते पशव.: यद्व किञ्च - उत्सन्नमियं तस्य सर्वस्य प्रतिष्ठा । तदत्रैते पशवो गतास्ततः सम्भरामः ' इति । न तथा कुर्यात् । यो वाऽएतेषामावृतं ( पद्धतिं ), ब्राह्मण ं ( विज्ञानं ) च न विद्यात्, तस्यैतऽउत्सन्नाः स्युः । स एतानेव पञ्चपशूना-लभेत यावदस्य वशः स्यात् । तान् हैतान् प्रजापतिः प्रथम थालेभे श्यापर्णः सायकानोऽन्तिमः । अथ ह हमैता नैवान्तरेण श्रालभन्ते । अथैतमौ द्वावेवालभ्येते प्राजापत्यश्च, वायव्यश्च । तयोरतो ब्राह्मणं ( विज्ञानं ) उद्यते । ५८ - शतपथब्राहाणे ६ | २ | ४ | ३८-३८-३६ ॥
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शतपथब्राह्मण २ खराड मध्यस्थ बनाए केवल प्राण की स्वरूप - व्याख्या ही सम्भव नहीं है । क्योंकि प्राणी - रूपा मूलाभिव्यक्ति से श्रसंस्पृष्ट -- विशुद्ध प्राण तो रूप - रस- गन्ध - स्पर्श - शब्द तन्मात्राओं से अतीत बनता हुआ अपने अधामच्छद-धर्म्म से भौतिक विश्व की सीमा से सर्वथा ही बहिर्भूत तत्त्व है, जिसका कि - ' असदेवेदमग्र आसीत् ' -कितदसदासीत्? -- ऋषयो वाच तदग्रेऽसदासीत् । के ते ऋषयः १, प्राणा वा ऋपय: ' ( शतपथे ६।१।११ ) इत्यादिरूपेण यशोगान हुआ है । निष्कर्षतः- भूतानुगति के बिना केवल प्राण - प्राण का उद्घोष न केवल निरर्थक ही है, अपितु भूतशून्या ( यज्ञकर्म्मशून्या ) केवल प्राणकल्पना से तो मानव का आध्यात्मिक-प्राण कालान्तर में सर्वथा रिक्त ही बन जाता है, और उस अवस्था में तो सत्तामिद्ध भी भौतिक -- यज्ञकर्म्म--इस कल्पनावादी के लिए असत् ही ( अभावात्मक ही ) बना रह जाता है । तभी तो ऋषिने- ' प्राणो-यज्ञेन कल्पताम् ' इस तात्त्विक - प्रदेश के द्वारा अध्यात्मिक प्रारण के साथ आधिभौतिक यज्ञकर्म्म का अनुगमन श्रनित्रा माना है । मानते हैं — मेघ, किंवा मेद - ' प्राण ' की भी संज्ञा है । किंवा प्रमुखरूपेण प्राण की ही संज्ञा है । ततः किम्? । प्राण किस का नाम नहीं? । जितने भी नाम सुने जाते हैं, सभी पहिले ' प्राण ' ही तो हैं । अग्नि-वायु - विद्युत् वृष्टि - स्तनयित्नु आदि -आदि सत्र शब्द प्राणों के ही स्वरूप संग्राहक हैं, तो क्या एतद्रूप भूत - भौतिक - तथ्यों का अभाव प्रमाणित होगया एतावता ही! | पुरुष - अश्व - गौ- अत्रि- अज - नामक सुप्रसिद्ध नामपञ्चक भी प्राणपञ्चक से ही अनुनाणित है । द्यावापृथिव्य वैश्वानरप्राण- का ही नाम - ‘ पुरुषप्राण ’ है, मनोवागूगर्भित - ज्योतिर्मय - प्राण का ही नाम ' गौप्राण ' है, प्रतिफलित- सौरप्राण का ही नाम ' अश्वप्राण ' है, हरितवर्ण - प्रवर्त्तक - अान्तरिक्ष्य प्राण का ही नाम ' अत्रिः प्रारण ' है, एवं पार्थिवकपालानुगत गायत्रप्राण ही ' अजप्रारण ' है । तो क्या एतन्नामक - प्राणियों का प्रभाव मान लिया जायगा? । नेति होवाच । जिस प्राण की जिस प्राणी में प्रधानरूपेण अभिव्यक्ति रहती है, वह प्राणी तत् - प्राण के नाम से ही व्यवहृत होने लगा है । और यों पञ्चविध द्यावापृथिव्य - पुरुष - अश्वादि पाँचों प्राणों से प्रमुखरूपेण कृतात्मा प्राणी भी पुरुष - अश्वादि नामों से ही व्यवहृत होपड़े हैं । ' कूम्र्म्म ' शब्द को ही लीजिए | आदित्यप्राण-विशेष का ही नाम ' कूर्म्म ' ( कछुआ ) है । क्योंकि अमुक जलीय प्राणी विशेष में इस कूर्म्मप्राण की ही प्रधानरूपेण अभिव्यक्ति रहती है । अतएव यह प्राणी भी ' कूर्म्म ' नाम से न केवल प्रसिद्ध ही होगया है, अपितु चयनयज्ञानुगता प्राणचितियों के क्रम में अपेक्षित - प्राणात्मक - कुर्म्म की चिति के लिए ' अथ कूप-दधाति ' रूपेण कूर्म्मप्राणी ( कछुए ) का ही ग्रहण किया जाता है । केवल नीरूप - ग्राह्य - कूर्म्म-प्राण - मात्र के नामोद्घोष से तबतक यज्ञकर्म की संमिद्धि कदापि सम्भव नहीं है, जबतक कि भूतशरीरी कूर्म्म का संग्रह नहीं कर लिया जाता ।
* -- असन्नेव स भवति मुद् ब्रह्म ेति वेद चेत ।
अस्ति ब्रह्म ेति चेद सन्तमेनं ततो विदुः ॥
- उपनिषदि ४.६
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किचिदिव- श्रावेदन क्योंकि प्राणी ही प्राण का स्वरूप संग्राहक बना करता है, किंवा भूत ही प्रारण के अन्त-यमात्मक सम्बन्धानुग्रह का कारण बनता है, जिस इस तथ्य को विस्मृत कर विगत शताब्दर्थो से हमारे विद्वत्समाज ने काल्पनिक - अध्यात्मवाद के व्यामोहनरूप महान् ग्रह से ग्रस्त होते हुए भूतानुगत यज्ञ-कर्म्मनिचन्धन उस सम्पूर्ण - लौकिक - अभ्युदय से अपने श्रापको और अपने साथ साथ ही सम्पूर्ण राष्ट्र को उस सीमापर्य्यन्त पराङमुख ही प्रमाणित कर लिया है जिससे भूतानुबन्धी - ममस्त प्रचारात्मक कर्म्मसौन्दर्य्यं तो होगया है विलुप्त, एवं तत्सम्बन्ध में शेष रह गई हैं श्राचारशून्या- कल्पनाप्रसूता वैमी शून्यं - शून्यं कल्पनाएँ-मात्र, जिनसे कालान्तर में मानवीय मन सर्वथा रिक्त ही बन जाया करता है, और दुर्भाग्यवश कम्मशून्या इत्थंभूता रिक्तता ही इन काल्पनिकों की दृष्टि में उसी प्रकार ' शान्ति ' बन बैठती है, जैसेकि एक मेधावी -प्रज्ञाशील - प्रत्युत्पन्नमति भी बालक अयोग्य - अभिभावकों के निःसीम ताड़न से अपने स्नायवीय - तन्तुओं से सर्वथा शिथिल बनता हुआ जब तूष्णीरूप जड़भाव में श्राजाता है, तो तदभिभावक ऐसे विजड़ित बालक को ' योग्य ' - ' सयाना ' कहने, मान बैठने की भयावहा भ्रान्ति करने लग पड़ते हैं । अलमतिपल्लवितेन । प्रस्तुत विज्ञान - प्रसङ्ग मे प्राण, और प्राणी के रहस्यात्मक उस वैज्ञानिक स्वरूप काही स्वरूप - विश्लेषण - प्रयाम हुआ है, जिस विश्लेषण की प्रमुख - आधारभूमि पाङ ( पञ्चावयत्र ) यज्ञ से अनुगत द्यावापृथिव्य - पाँच प्राणपशुओं का स्वरूप- समन्वय ही माना गया है, एवं इन्हीं पञ्चविध प्राणपशुओं के माध्यम से पञ्चविध प्राणी पशुओं का स्वरूप- समन्वय प्रयास हुआ है, और यही प्रक्रान्त - परिच्छेद का पारिभाषिक संक्षिप्त निदर्शन है । ( ङ ) - श्रहिंसा हिंसा स्वरूप विज्ञान - निबन्धन पारिभाषिक- स्वरूप दिग्दर्शन-जिसप्रकार आज के प्रावाहिक - युगने शब्दार्थनिर्वचनानुगता पारिभाषिकी नियतार्थ- मर्यादा का उल्लंघन करते हुए त्याग - तपस्या- बलिदान - नैतिकता - समानता - मानवता - मानत्रघर्म्म आदि आदि शब्दों का दिग्देशकालधर्म्माकर्षण से आकर्षितमना बनते हुए यथेच्छ काल्पनिक अर्थ मान लिया है, तथैव उसी काल्पनिकता से आज ' हिंसा - अहिंसा ' शब्द भी समन्वित हो रहे हैं । यही कारण है कि, जिन्हें शास्त्र परिभाषा में ' धर्म्मलक्षण ' ( धम्र्म के परिचयात्मक बाह्य चिन्ह ) कहा गया है, वे श्राज स्वयं ही ' धर्म्म ' का स्थान ग्रहण कर बैठे हैं, जिसके आधार पर ही ' अहिंसा परमो धर्म: ' आदि वाक्यों पर ही आज धर्मस्वरूप का पर्य्यवसान समझा जाने लगा है, जबकि तत्त्वतः वस्तुस्थिति कुछ ओर ही है । धर्म को जब प्राकृत प्रकृतिसिद्ध मान लिया जाता है, तभी इसप्रकार की भ्रान्तियों को प्रवेशावसर मिला करता है | आज के प्रकृतिवादी मानव का ऐसा ही कुछ महान व्यामोहन है कि, ' मानव को प्रकृति के अनुसार ही चलना चाहिए ' । बात सुनने में भी प्रिय है, और बुद्धिवाददृष्ट्या मान्य भी । किन्तु मानव का स्वरूप केवल ' प्रकृति ' ही होता, तबतो उक्त ' बात ' का सर्वाङ्गीण समादर सम्भत्र था - मानवेतर उन पशु-पक्षी आदि इतर प्राकृतिक प्राणियों की भाँति जिनका अथ से इति पर्य्यन्त का ( जन्मतः मृत्युपर्य्यन्त का ) समस्त जीवनवृत्त सर्वात्मना प्रकृतिपरवश ही बना रहता है । अतएव च जिन्हें प्रकृत्या परिपूर्ण माना गया है, जबकि मानव केवल प्रकृति की दृष्टि से अपूर्ण ही माना गया है । अतएव प्रकृत्यनुगता पूर्णता के सम्पादन के लिए तो मानव के लिए स्वतन्त्ररूप से ' शिक्षा व्यवस्था ' ही करनी पड़ती है, जबकि मानवेतर