Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 441–450
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 441–450
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण
स निनयति - " त्रिताय त्वा द्विताय वैकताय त्वा " - ( १ ० २३ मं ० ) इति ।
पशुर्ह वा एष आलभ्यते यत्पुरोडाशः ॥ ५ ॥
पुरुष ह वै देवा पशुमालेभिरे । तस्यालब्धस्य मेघोऽपचक्राम । सोऽश्वं प्रविवेश । तेऽश्वमालभन्त । तस्यालब्धस्य मेघोऽपचक्राम । स गां प्रविवेश । ते गामाल-भन्त । तस्यालब्धस्य मेघोऽपचक्राम । सोऽविं प्रविवेश । तेऽविमालभन्त । तस्याल-aar मेधो ऽपचक्राम । सोऽजं प्रविवेश । तेऽजमालभन्त । तस्यालब्धध्य मेधो ऽपच-क्राम ॥ ६ ॥
स इमां पृथिवीं प्रविवेश । तं खनन्त इवान्वीपुः । तमन्वविन्दन् । ताविमौ बीहि-यवाँ | तस्मादप्यतावेतर्हि खनन्त इवैवानुविन्दन्ति । स यावद्वीर्यवद्ध वा श्रस्यैते सर्वे पशव आलब्धाः स्युः, तावद्वीर्यवद्धास्य हविरेव भवति य एवमेतद् वेद । अत्रो सा सम्पद् - यदाहुः पाङ ्मक्तः पशुरिति ॥७ ॥
यदा पिष्टानि, अथ लोमानि भवन्ति । गदाप आनयति, अथ त्वग्भवति । यदा संयोति, अथ मांसं भवति । संतत इव हि स तहि भवति, सन्ततमिव हि मांसम् । यदा शृतः, अथाथि भवति । दारुण इव हि स तर्हि भवति, दारुणमित्र ह्यस्थि । अथ यदु--द्वासयिष्यन्नभिघारयति --- तं मज्जानं दधाति । एषो सा सम्पद् - गदाहुः पाक्तः पशुरिति ॥८ ॥
सगं पुरुषमा लभन्त - स किम्पुरुषोऽभवत् । यावश्वं च गाञ्च तौ गौरव गवयश्वा-भवताम् । यमविमालमन्त -- स उष्ट्रोऽभवन् । यमजमालभन्त -- स शरभोऽभवत । तस्मा-देतेषां पशूनां नाशितव्यम् । अपक्रान्तमेधा हैते पशवः ॥६ ॥
इति पुरोडाशप्रकरणम् इति प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्याये तृतीयं ब्राह्मणम् द्वितीयप्रपाठके च प्रथमं ब्राह्मणम् ७०५
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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मण ( अनुवाद ) - पहिले अग्नि चार भागों में विभक्त था । सो ( श्रध्यु नें ) जिस अग्नि का होत्र के लिये वरण किया, वह पलायित होगया । दूसरे अग्नि का वरण किया । वह भी पलायित होगया । जिस तृतीय अग्नि का वरण किया, वह भी पलायित ही होगया । एवं आज जो अग्नि ( यज्ञ में ) विद्यमान है, भयानुबन्ध से वह तिरोहित होगया । वह जल में प्रविष्ट होगया । उसका देव-ताओं नें अन्वेषण कर अकस्मात् पानी में से निकाल लिया । ( बलादानीयमान ) उस अग्नि ने पानी की ओर ' हे आपः तुमने मुझे अपने में छुपने का आश्रय नहीं दिया, तुम्हारे आश्रय न देने से ही देवता बलात्कार से बिना मेरी इच्छा से मुझे लेजा रहे हैं, इसलिये तुम दुषित होजाओ ' यह कहते हुए भूँक दिया ' । इसी से ( अग्नि के निष्ठीवन से ) एकता, द्विता, त्रिता, ' आप्त्या ': उत्पन्न हुए ॥ १ ॥
वे तीनों श्राप्या इन्द्र के साथ उसी प्रकार विचरने लगे, जैसेकि आज एक पुरोहित ब्राह्म-रम् राजा के साथ अनुगमन करता है । उस इन्द्र ने जिस समय तीन मस्तक वाले त्वष्टा के पुत्र, श्रतएव ' स्वाष्ट्र ' नाम से प्रसिद्ध विश्वरूप मारा था, उस समय ( इनके साथ रहने वाले ) इन श्रात्त्या - देवताओंनें भी इस विश्वरूप को बध के योग्य समझा, अर्थात् ' इसे मारने में कोई दोष नहीं है, इस दुष्ट को मार ही देना चाहिए ' इसप्रकार आप्त्यानं त्त्वाष्ट्र के मारने में अपनी सम्मति ही प्रकट की थी । यही नहीं, जब इन्द्र त्वा को मारने लगे, तो प्राप्त्योंनें ही इस कृत्य में विशेष सहायता प्रदान की थी । उन्होंनें विश्वरूप का पर्य्याप्त ( जी मर कर ) हनन किया था । अन्त में ' त्रिता ' नाम के आप्त्या ने हीं उसे मारा था । अर्थात् त्वाष्ट्र असुर त्रित के हाथ से मार गया था । परिणाम इसका यह हुआ कि इन्द्र इस हत्या के दोष से सर्वथा विमुक्त होगये । कारण कि वे देवता थे ॥ २ ॥
इस घटना से वहाँ उपस्थित हुए देवताओंने कहा कि, इस हत्या का पाप इह्रीं श्राप्त्यों को लगे, जिह्वान कि, स्वाष्ट्र के वध का समर्थन किया । उस हत्या के दण्ड का क्या स्त्ररूप होगा?, इस प्रश्न के उपस्थित होने पर अन्त में यही निर्णय हुआ कि ' यज्ञ में जो कुछ दूषित भाग हो, उसको इनके साथ ही संप्लिष्ट कर दिया जाय । इसप्रकार यज्ञ में जो पात्रिनीर्णेजन अङ्ग ुलि-प्रणेजन को आया के लिए डालते हैं, उससे इस श्राप्त्यों को उसी दोषभाग से संश्लिष्ट करते हैं || २ || ( इस पातक को तथोक्त प्रकार से अपने ऊपर आया देख कर ) आया देवताओंनें पर-स्पर निश्चय किया कि, श्रपन भी इस पाप को अपने से अन्य ही किसी में डालदें । किस में ७०६
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द्वितीयअध्याय शतथपब्राह्मण तृतीयब्राह्मण डालें?, इस प्रश्न के उपस्थित होने पर निर्णय हुआ कि ' जो यजमान दक्षिणा शून्य हविसे यजन करे, उसी में यह पाप सक्रान्त हो ' । इसलिये दक्षिणाशून्य हवि से यजमान को भुलकर भी यज्ञ नहीं करना चाहिये । यज्ञसम्बन्धी पाप्मा भाग आप्त्यों में संश्लिषु होरहा है । आप्ल्या देवता स्वपाप्मा उसमें डाल देते हैं, जो बिना दक्षिणा की इवि से राजन करता है || ४ || ( श्राप्त्या देवता यजमान में अपने पाप को संश्लिषु न करदे, इस आपत्ति से बचने के लिए ही ) देवताओं ने दर्शपूर्णमासयज्ञ में इस दक्षिणा का विधान किया, जो कि अन्वाहाय है । यह दक्षिण न होजाय, यही इस दक्षिणा - विधान का तात्पर्य था । उन आप्यों के लिए पृथक पृथक् नयन करता है । निनयनार्थ उपस्थित जल को तप्ताङ्गार से पाता है । ऐसा करने से आन्त्यों की अन्नरूपा यह जलसम्पत्ति परिपक्क होजाती है । आप्त्यों के लिए निन-यन क्यों किया जाता है?, इस की उपपत्ति बतलाड़ी गई । अत्र पद्धति बतलाते हैं ) वह अध्य ' पाय ' गुलिप्रक्षालनमाप्त्येभ्यो नियति - अभितप्य प्रत्यगसंस्यन्दमानं त्रिताय त्वेति प्रति-मन्त्रम् ' ( का ० श्रौ ० सू ० २१६/२६ ) इस के अनुसार ' त्रिताय त्वा निनयामि, द्वितायत्वा निनयामि एकताय त्वा निनयामि ' ( यजुः सं ० १।२३ ) इन मन्त्रों को बोलता हुआ क्रमशः निनयन करता है । यहाँ जो यह पुरोडाश है, वह पशु का ही आलम्भन किया जाता है । अर्थात् यह पुरोडाश पशुस्थानीय है । इसे पशु की ही प्रतिकृति समझना चाहिए, यही तात्पर्य्य है ॥५ ॥ ॥
देवताओंने सत्र से पहिले पुरुषपशु का आलम्भन किया । उस आलब्ध पशु का मेघ-भाग अपक्रान्त होगया । वह अश्वपशु में प्रविष्ट हागया । देवताओंने ( मेघभाग की प्राप्ति के लिए ) अव पशु का श्रालम्भन किया । आलब्ध अश्वपशु का मेघ अपक्रान्त होगया । यह गोपशु में प्रविष्ट होगया । देवताओं ने गोपशु का आलम्भन किया । आलब्ध इस गोपशु का मेध अपक्रान्त होगया | अपक्रान्त होकर यह अज ( भेड़ ) पशु में प्रविष्ट होगया । देवताओंने विपशु का आलम्भन किया । आलब्ध अविपशु का मेघ अपक्रान्त होगया । अपक्रान्त होकर यह ( क ) पशु में प्रविष्ट होगया । देवताओंने पशु का आलम्भन किया । श्रालब्ध पशु का मंत्र अपक्रान्त होगया ॥ ६ ॥
वह मेघभाग पृथिवी में प्रविष्ट होगया । स्थान स्थान पर भूमि निखनन करते हुए देव-ताओंने उस मेव का अन्वेषण आरम्भ किया । अन्त में उन्होंने अपक्रान्त मेध को उप-लब्ध कर लिया । वहीं अपक्रान्त मेध यह चाँवल, और ' यब ' है । ( प्रारम्भ में मेधरूप श्रीहि, और यत्र को देवताओंने भूमिनिखनन के द्वारा हूँढा था ) यही कारण है कि, आज भी कृषक भूमि के खनन के माध्यम से ही मेधसम्पत्ति प्राप्त करते हैं ।
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द्वितीयध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मण पुरुष – अश्व - गो- अवि अज- ये पाँचों पशु आलब्ध होकर इस यजमान के लिए जिस मात्रा से पर्याप्त होते हैं, वह सम्पूर्ण मात्रा एकमात्र इस पुरोडाश से हो प्राप्त होजाता है, जो कि यजमान इस रहस्य को जानता है । इस हवि से वह यज्ञसम्पत्ति प्राप्त होजाती है, जिस के लिए कि सम्पद् रहस्यत्रेता ' पाङ क्तः पशुः ' यह कहा करते हैं ॥ ७ ॥
कैसे पुरोडाश से पशुसम्पत्ति प्राप्त होजाती है?, इस का उल्लेख करती हुई ि कहती है--जब यह हरिद्रव्य पिष्ट अवस्था से युक्त रहते हैं, तब इन में लोम है । जब पानी डालत हैं, तब त्वग्भाव सम्पन्न होजाता है । जब पानी को इस में मिलाते हैं, तब माँस सम्पत्ति आजाती है । उस समय यह फैलता जाता है । माँस फैला हुआ सा ही है । जब पक होजाता है, तो अस्थि भाव का उदय है । उस समय ( पक्कावस्था में ) यह कठिन सा होजाता है । हड्डी भी दारुण सी ही हैं । जब इसे ठंढा करते हुए इस में घृत डालते हैं, तो मजाभाव का समावेश करते हैं । यही वह सम्पत है, जिस के लिए कि- ' पाङ क्तः पशुः ' यह कहा करते हैं ॥॥। सो जो कि ( मेधप्राप्ति की कामना से ) देवताओंनें पुरुष का आलम्भन किया, वह किंपुरुष बना । अव गौ के आलम्भन से क्रमशः गौर एवं गवय पशु उत्पन्न हुए । त्रिपशु के आलम्भन से उष्ट्रपशु उत्पन्न हुए । अजपशु के आलम्भन से शरभपशु उत्पन्न हुआ, इसलिये इन पशुओं का ( किंपुरुष - गौर गत्रय - उम्र - शरभ पशुओं का मांस नहीं खाना चाहिए । कारण, ये पाँचों पशु
अपक्रान्तमेव हैं । ये अमेय पशु हैं ॥ ६ ॥
प्रथमकाण्डान्तर्गत द्वितीयाध्याय का तीसरा, एवं दूसरे प्रपा-ठक का पहिला ब्राह्मण – उपरत ( भाष्य ) – पुरोडाश सम्पन्न होचुका है । पुरोडाश के सम्बन्ध में अत्र - पात्र निर्णेजन नामक कर्म्म अवशिष्ट रहा है । पुरोडाश के सम्पन्न होने के अनन्तर पात्री में अध्वर्यु हाथ धोता है । उसकी अङ्ग-लियों में, किंवा हाथों में जो पिष्टभाग लगा रहता है, यह सत्र धोकर उस पुरोडाशपात्री में डाल दिया जाता है । पात्रीस्थित मलयुक्त पुरोडाश के अंश से युक्त इस पानी का क्या उपयोग १, प्रकृत में इसी प्रश्न का समा-धान किया गया है । मानुषव्यवहारवत् इस पानी को यथेच्छ नहीं डाला जाता । श्रपितु - विहार के उत्तर भाग में ' सफ्य ' से तीन खड्ड प्राक्संस्थ बनाए जाते हैं । वे तीनों खड्ड परस्पर में सर्वथा प्रसङ्ग ( बिना मिले हुए ) रहते हैं पात्री, एवं अङ्ग लिहस्तप्रक्षालित जलको प्रथम उस पात्री में ही रक्खा जाता है । गार्हपत्याग्नि में से उल्मुक ( जलती हुई तृणमुष्टि ) लाकर पहिले इस प्रक्षालित जलको ( जिस में कि कुछ पुरोडाश का भी ७०८
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण श्रंश रहता है ) तपाते हैं । साथ ही जिन यों के लिये यह जल डाला जाता है, वे देवताविशेष हैं, श्रुत-एव देवतोद्द ेशेन यजमान के द्वारा त्याग भी किया जाता है । तात्पर्य यही है कि अध्वर्यु क्रमशः -' त्रिताय वा निनयामि " " द्विताय त्वा निनयामि " - " निनयामि " * एकताय त्वा उक्त मन्त्र बोलता हुआ प्रतिमन्त्रोच्चारण - क्रम से उपयुक्त गर्भो में नत्र प्रक्षालित जल डालता है, तो यजमान-" इदं त्रितायाप्त्याय न मम " -- " द्वितायाप्त्याय न मम ” “ श्र एकताया प्त्याय न मम " इस क्रम मे त्याग करता है । श्रध्वर्यु ' का यह कर्म्म नियन नाम से प्रसिद्ध है, एवं यजमान का यह कर्म्म प्रतिनिनयन नाम से व्यवहृत होता है | यही कर्म्म पात्री निर्णेजन नाम से प्रसिद्ध है । इस कर्म के अनन्तर — अन्वाहाय दक्षिणारनाधिश्रयति " ( का ० श्र ० सू ० २२६ २८ ) के अनुसार अध्वर्यु अन्वाहार्य: नाम से प्रसिद्ध श्रोदनको परिपाक के लिए श्रपणाग्नि नाम से प्रसिद्ध दक्षिणाग्नि पर रखता है । बिना पशुसम्पत्ति के यज्ञ नहीं होसकता । प्रत्येक यज्ञ में पशु का मेघभाग अपेक्षित है । इस के. लिए पशु का आलम्भन करना भी श्रावश्यक होजाता है । परन्तु हम देखते हैं कि, इस हविर्यज्ञात्मक दर्श-पूर्णमास यज्ञ में पशु का अभाव है । आहुति के स्थान में प्रकृत में पुरोडाश का ही ग्रहण किया गया है । ऐसी अवस्था में पशु के बिना कभी सम्पन्न न होने वाली यज्ञसम्पति का प्रभाव होजाता है । इस प्रभाव की पूर्ति के लिए प्रकृत ब्राह्मगा में प्रसङ्गागत श्रालम्भन -- विज्ञान का भी निरूपगा किया गया है । इसप्रकार इस ब्राह्मण में प्रधानरूप से १ - श्राप्याविज्ञान – दक्षिणा विज्ञान, ३ – अ लम्भनविज्ञान, इन तीन त्रिषयों का निरूपण किया गया है । तीनों में कमप्राप्त प्रथम श्रान्त्याविज्ञान की ओर ही विज्ञ पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । आप्त्याविज्ञानम श्राप्याविज्ञान का मूलाधार ‘ चतुर्द्धा विहितो ह वा अग्रे ऽग्निरास ' यही अनुगमश्रुति है । निगम, अमु गम शब्दों का अर्थ पूर्व के प्रकरणों में विस्तार से बतलाया जाचुका है । अतः प्रकृत में केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि, नियताथ का प्रतिपादन करने वाले श्रौतवचन ' निगम ', एवं अन्वर्थ का निरूपण करने वाले श्रौतवचन ' अनुगम ' कहलाते हैं । उपर्युक्त अनुगम की यही स्थिति है । ' पहिले अग्नि चतुर्द्धा विभक्त था, इस अनुगम का यही शब्दार्थ है । अग्नि का यह चातुर्विष्य अनेक प्रकार का है । अनेक प्रकार * यद्यपि मूलसंहिता में निनयामि पढ नही है, परन्तु मीमांसानुसार श्राकाङक्षा से ' निन-यामि ' का अध्याहार करना आवश्यक होजाता है । ÷ दर्शपूर्णमास में दक्षिणास्थान में नियत श्रोदन ही “ अन्वाहार्थ्य " कहलाता है । अध्वर्यु -होता - उद्गाता - ब्रह्मा ये चारों ऋत्विक तृप्त होजायें, इतना श्रोदन परिपक्क होता है । इसका परिपाक प्रणीतापात्रम्थ जल से, श्रथवा लौकिक जल से ही होजाता है । यह अन्वाहार्यद्रव्य दक्षिणा स्थानीय है । इस का परिपाक श्रपणाग्नि में होता है, इसलिए भी श्रपणाग्नि को - - ' दक्षिणाग्नि ' कहा जाता है । 508
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मण से अग्नि चतुर्द्धा विभक्त है । सब का संक्षेपसे संग्रह करने के लिए ही ऋषिने सामान्यतः - चतुर्धा विहितः " यह कहा है । प्रसङ्गात् दो तीन विभागों का प्रकृत में भी दिग्दर्शन करा दिया जाता है । पुरुष, प्रकृति बिराट्, सम्वत्सर, भेद से अग्नि चतुर्द्धा विभक्त है । अव्यय - अक्षर - क्षर - परा-की समष्टि पुरुष है, जैसा कि पूर्व के प्रकरणों में विस्तार से बतलाया जाचुका है । इस पुरुष-त्रयी में मध्यस्थ मध्यम - पुरुष अक्षर है । इसकी ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - अग्नि- सोम ये पाँच कलाएँ है । यह अक्षराग्नि ही " पौरुषाग्नि " है । यही विश्व का सञ्चालक है । यह प्रथमाग्नि है । वस्तुस्वरूपस-मर्पक अग्नि प्राकृताग्नि है । हिरण्यगर्भ नाम से प्रसिद्ध दशविध ऋपिप्रारण की समप्रिरूप आर्षे-यानि विराग्नि है, एवं चयनयज्ञ का अधिष्ठाता सौर अग्नि ही ' सम्वत्सराग्नि है । इसप्रकार एक ही अग्नितत्त्व अवस्थाभेद से चार भागों में विभक्त होरहा है । १ – पौरुषाग्निः ( “ पुरुषोग्निः ” शत • १०।४।१।६ ) । २ – प्राकृताग्निः । ३ – विराडग्नि: ( ' विराडग्निः ' शत ० ६ २ २।३४ ) । ४ – सम्वत्सराग्निः ( ' अग्निर्वाव सम्वत्सरः ' तै ० ब्रा ० २।१।५२ ) । प्रकारान्तर से ब्रह्म- सुब्रह्म - शुक्र - भत, मेद से अग्नितत्त्व चतुर्द्धा त्रिभक्त है । प्राणमय स्वायम्भुव अग्नि ' ब्रह्माग्नि ' है । यही अग्नि- ' वाग्नि ' सायाजुपाग्नि ' ' वेदाग्नि ' - ' प्राणाग्नि ' - ' सत्याग्नि ' आदि विविध नामों से प्रसिद्ध है । पारमेष्ठय ऋताग्नि ' सुब्रह्माग्नि ' कहलाता है । ब्रह्माग्नि, एवं सुब-झाग्नि के संयोग से उत्पन्न होने वाला, ' स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमत्रणम् ' ( ईशोपनिषत ) इत्यादि रूप ने उपवर्णित संसार का बीजरूप अग्नि ' शुक्राग्नि ' नाम से प्रसिद्ध है । एवं तेजोऽग्नि चौथा भूताग्नि है । यह ' वसु ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । जिसे साधारण मनुष्य अग्नि ( तापयुक्त ज्वालायुक्त अन्नादि का परिपाक करने वाला प्रत्यक्ष दृष्ट स्थूल अग्नि ) समझते हैं, वही भूताग्नि है । इसी भूताग्नि को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने कहा है-अग्निं तं मन्ये यो वसुरस्तं वयन्ति धेनवः । स्तवन्त आशवोऽस्तं नित्यासो वाजिन इषं स्तोतृभ्य आ भर । --ऋक् सं ० ५ मं । ६ सू.। १ मं. ऋषि कहते हैं कि, हम अग्नि ( भूताग्नि ) उसे समझते हैं, लोक में जो ' बसु ' नाम से प्रसिद्ध है, एवं सूय्यस्त पर जिस से किरणें निकला करती हैं । इसप्रकार प्रकरान्तर से भी अग्नि की चार अवस्थाएँ होजाती हैं ।
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण १ - ब्रह्माग्निः -- मौलिकोऽग्निः सत्याग्निः, यजुरूपः । त्रयीरूपो वा । २ – सुब्रह्माग्निः - श्रापोऽग्नि ' ताग्निः - अथर्वरूपः । ३ – शुक्राग्निः -- ब्रह्मसुब्रह्मयोगादुत्पन्नो विश्ववीजः ४ – भृताग्निः - प्रत्यचद्रष्टस्तापधर्म्मा वसुरग्निः यजमऱ्यांदा के अनुसार भी अग्नितत्त्व चतुद्धां विभक्त है । अग्नि की ये चारों अवस्थाएँ — क्रमशः १ - आहित, २ - उद्धृत, ३ - प्रहृत, ४- विहृत, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । [ देखिए शत ० ब्रा ० ११ का । ८ । २ । १ । ] । ये चारों ही अग्नि - विवर्त्त ' चित्याग्नि के अवान्तर भेद हैं । यह अधिलोक, अधिदैव, अधियज्ञ, अधियाज्ञिकदैव भेट से चार स्थानों में विभक्त है । पृथिवी अन्तरिक्ष - योः आपः ये चारों स्तोम्यलोक भी इह्नीं चारों अग्नियों से निष्पन्न हुए हैं, एवं इन चारों लोकों को में प्रतिष्ठावारूप से प्रतिष्ठित भी ये ही चारों हैं । इसीप्रकार कुण्ड, एवं कुण्डों में देवरूप से प्रतिष्ठित भी ये ही चारों हैं । सौरप्रजापति अपने अग्नि का प्रवर्ग्यरूप से भूलोक में आाधान करते हैं । दूसरे शब्दों में सौर अग्नि ही पृवृक्त होकर भूसंस्था का स्वरूप - समर्थक बनता है । श्रत व इसे - ' आहिताग्नि ' कहा जाता है । त्रिवृरूप पृथिवी - स्थान में यही अग्नि प्राणदेवताओं के द्वारा प्रतिष्ठित किया जाता है, अतएव इसे - ' उद्ध ताग्नि ' कहा जाता है । यही न सप्तदश ( १७ ) स्तोमरूप आहवनीयाख्य उत्तरावेदिस्थ द्युलोक में जाकर प्रतिष्ठित होता है । दूसरे शब्दों में यही अग्नि प्राणदेवताओं के द्वारा ग्राहवनीयरूप स्वर्गप्रदेश में लेजाया जाता | अतएव इसे ' प्रहृताग्नि ' कहा जाता है । ग्रन्नादि का परिपाक करने वाला ' शामित्राग्नि ' नाम से प्रसिद्ध अग्नि ही चौथा ' हिताग्नि है । शतपथब्राह्मण के ११ वें काण्ड में - पाशुकचेदिनिरूपण में इन चारों का विशद निरूपण किया गया है । यहाँ नाममात्र ही उद्धृत कर दिए गए हैं ।
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द्वितीय अध्याय १ - पृथिवी. महितचित्याग्निः २ – अन्तरिक्षम् उद्ध तचित्याग्निः प्रथमक गड तृतीयब्राह्मण - अधिलोकम् ३– द्यौः प्रहृतचित्यग्निः ४ – आपः " विहृतचित्याभिः १ - अग्निः --आहितचित्याग्निः २- वायुः ' उद्घृत चित्याग्निः – अधिदैवम् ३ - श्रादित्यः " प्रहृतचित्याग्निः ४ – चन्द्रमाः विहृतचित्याग्निः १ – गार्हपत्यकुण्डम् ’ ' ' ’ आहिताग्निः २ – दक्षिणाग्निकुण्डम् " उध्दताग्निः ३ – श्राहवनीयाग्निकुण्डम्'प्रहृतानिः ४ - शामित्रशाला - " विहृताग्निः - अधियज्ञम् १ – गार्हपत्याग्निः आहितः २ – हविः श्रपणाग्निः.... ' ' उद्घृत: -अधियाज्ञिकदै बम् ३ - आहवनीयाग्निः प्रहृतः ४ - पशुपाग्निः ..विहृतः ७१२
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द्वितीयअध्याय शतपथब्राह्मण तृतीय ब्राह्मण तथोक्ता अग्निविधाओं में से द्वितीया विधा के शुक्राग्नि का ही प्रकृत से सम्बन्ध है । शुक्राग्नि की चार अवस्थाओ को लक्ष्य में रखकर ही श्रुति ने- ' चतुर्द्धा विहितो ह वा अ निरास ' यह कहा है । यहाँ ' अ ' शब्द का – ' हवियज्ञ से पहिले ', यही अथ समझना चाहिए । प्रकृतिसिद्ध नित्य हविर्यज्ञ का भूपिण्ड से सम्बन्ध है । सुप्रसिद्ध श्रान्त्या श्रग्नियों का इसी भूपिण्डावच्छिन्न हविर्यज्ञ से सम्बन्ध समझना चाहिए । आज यद्यपि यह श्रायाग्नि सम्मिलित होकर एकरूप से प्रतीत हो रहे हैं, परन्तु हविर्यज्ञ-स्वरूपनिष्पत्ति से पहिले यह अग्नितत्त्व - १ - रमाग्नि, आर्त्तत्राग्नि, ३ - छन्दस्याग्नि, ४- सावित्राग्नि, इन नामों से ही प्रसिद्ध था । यही अग्निचतुष्टयी स्ताम्यत्रैलोक्य, एवं तत्प्रतिष्ठ प्रजा का बीज है, उपादान-कारण है, अतएव इसे - ' शुक्राग्नि ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । इस की प्रथमावस्था का नाम हीं ' रसाग्नि ' हे । १ - रसाग्निः ---भूपिण्ड के केन्द्र में अपनी प्रतिष्ठा रखने वाला, भूपिण्ड से निकल कर २१ वें अहर्गण पर्यन्त अपनी व्याप्ति रखने वाला, त्रिवृत पञ्चदश- एकविंश - स्तोमरूप पृथिवी अन्तरिक्ष - द्यौ, इन तीनों लोकों में क्रमशः वृधि ( घनरस ) घृत ( तरलरस ) मधु ( विरलरस ) रसरूप में परिणत रहने वाला प्राणात्मक पार्थिव अग्नि ही जोकि याज्ञिक परिभाषा के अनुसार ' चितेनिधेय ' नाम से प्रसिद्ध है ] ' रसाग्नि ' नामक प्रथमाग्नि है । इसी रसतम अग्नि से पार्थिव साममण्डल निष्पन्न होता है, अतएव पार्थिव साम ' रथन्तर ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । आपः फेन - मृत् - सिकता - शर्करा- अश्मा - अयः-हिरण्य, भेद से भूपिण्ड अष्टाक्षर होता हुआ गायत्रसम्पत्ति से संयुक्त है । अतएव यह निर्गच्छत् रसाख्य पार्थि-प्राणाग्नि भी ' गायत्री ' नाम से प्रसिद्ध है । यही गायत्री सुपर्णरूप में परिणत होकर २१ विंशम्तोम के ऊपर भाग में प्रतिष्ठित, वायव्य गन्धर्व प्राण से सुरक्षित, पारमेष्ठ्य सोमापहरण करने में समर्थ होती है । जैसे सावित्राग्नि आदित्य कहलाता है, एवमेव इस पार्थिव प्राणाग्नि को अङ्गिरोऽग्नि कहा जाता है । अङ्गि— रोऽग्नि भूपिण्ड से निकल कर निरन्तर द्युलोक की ओर जाया करता है, एवं श्रदित्याग्नि सूर्य्यपिण्ड से निकलकर निरन्तर भूपिण्ड की ओर आता रहता है । इसप्रकार आदित्य, और अङ्गिरा में निरन्तर स्पर्धा चलती रहती है । प्रकृत में केवन यही बतलाना है कि, चनादि तीन अवस्थाओं में परिणत रहने वाला पार्थिव प्राणाग्नि ही ' रसाग्नि ' है । यही रसाग्नि दिव्य सौरदेवताओं के लिए पार्थिवान्नरूप हवि का वहन करता है । अतएव इसे ' ह्व्यबाट् ' कहा जाता है । सम्पूर्ण पार्थिवरस निर्गच्छत् इसी पार्थिव प्राणाग्नि में आहुत होकर ' आदित्य ' नाम से प्रसिद्ध सौराग्नि में आहुत होते रहते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् मनु कहते हैं—
अग्नौ ( रसाग्नौ ) प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते ।
आदित्याज्जायते वृष्टिवृष्ट ेरन्न ं ततः प्रजाः ॥
— मनुः इसी हव्यवाट् अग्नि का स्वरूप - निरूपण करती हुई शुक्लश्रुति कहती है-७१३
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड
शेषे वनेषु मातृषु सन्त्वा मर्त्ता इन्धते ।
तन्द्रव्यं वहसिहविष्कृदादिद्द वेषु राजसि ॥
- यजुः संहितायाम् तृतीयब्राह्मण दिव्य सौर प्राण देवताओं का यजमानात्मा में ] सम्बन्ध इसी रसाग्नि के द्वारा होता है । यही श्रह्लाता है, अतएव इसे ' होता ' भी कहा जाता है । यही देवताओं का दूत है । ' अग्नि दूतं वृणीमहे , एवं होता है । इसी विज्ञान को होतारं रत्नधातमम ' के अनुसार यह ग्माग्नि देवताओं का दूत है लक्ष्य में रखकर ब्राह्मणश्रुति कहती है । ' उभयं वाऽएतदग्निर्देवानां होता च दूतश्व ' । यह रसाग्नि सहृदय, एवं मशरीरी है, रसाग्नि को ‘ सत्याग्नि ' कहा जासकता है । अग्नि के - श ० १२४१५२४ । तव सहृदयं सशरीरं सत्यम् ' इस लक्षण से इस इसी सत्यधर्म को लक्ष्य में रखकर ' अग्ने नय सुपधा है । अध्यात्मदृष्ट्या राये ० ' इत्यादि कहा जाता है । नियतमार्ग ही का सुपथ संक्षिप्त है स्वरूप । सत्यभात्र - निदर्शन ही है नियतमार्ग । यही ' अपानाग्नि ' है । और यही प्रथमाग्नि २ - तवाग्निः- है । इसी अग्नि से ओषधि, दक्षिणादिक़ से उत्तर की ओर जाने वाला अग्नि अग्नि हीं आर्त्तत्राग्नि को ' श्रपणाग्नि ' नाम से व्यवहृत किया वनस्पतियों का परिपाक होता है । तव वैज्ञानिकोंनें इस तव केन्द्रशून्य होता हुआ । ऋत है । उत्तर है । यह अग्नि वायव्य है, वायुरूप है । अर्थात् ऋतधर्म्मा, इसी ऋताग्नि ऋतसोम के उद्ग्राम, निग्राभ दिकम् ऋतसोम निरन्तर दक्षिण की ओर जाया करता है ॥ ऋताग्नि, एवं ऋतसोम से उत्पन्न होने से ही ( चढाव - उतार ) से ऋतु का स्वरूप सम्पन्न होता है ऋतु में प्रतिष्ठित वायव्याग्नि का ही नाम ' आर्त-वसन्तादि काल - अवयव ' ऋतु ' नाम से प्रसिद्ध हैं । इस का प्रवेश होता है, तभी उसमें प्रजोत्पत्ति -- सामर्थ्य afa ' है । स्त्री के शोणित में जब इम ग्राव अग्नि कहलाती है । प्रकृति के यच्चयावत् पदार्थ अपनी आता है । आत वाग्नि के प्रवेश से ही श्री ' ऋतुमती ' [ पञ्चावयवता ] के अनुसार-अपनी ऋतु में ही उत्पन्न होते हैं । यह तवाग्नि पाङ , इन क्लयज्ञ पांच की भागों पाक्कता में विभक्त है । ये विभाग ७२ - ७२ १- बसन्त, २- ग्रीष्म, ३ वर्षा, ४- हेमन्त शिशिर प्रत्येक ऋतु में प्रातः सवन, माध्यन्दिनसवन, अहोरात्रों के होते है । १६, ४०, १६, क्रम से क्रमशः के १६ दिन प्रातःसवन है, यही ऋतु की सायंसवन, इन तीन तीन सवनों का भोग होता १६ है । वृद्धावस्था प्रारम्भ है । यज्ञकर्त्ता यजमान के नवीन देवात्मा बालावस्था है । ४० ष्टिन युवावस्था है । अन्त के है । इहें तृप्त करने के लिए बी ' पद्मप्रयाज ' करने के साथ इन पाँचों ॠतुदेवताओ का भी सम्वन्ध रहता ' नाम से प्रसिध्द है । और यही है ' आत ' वाग्नि ' पड़ते हैं । अध्यात्मदृष्ट्या यही वायव्याग्नि - ध्यानाग्नि का संक्षिप्त -- स्वरूप - निदर्शन । में किया जायगा । * इस विषय का वैज्ञानिक विवेचन आगे आने वाले ' होतृप्रवरण ' ब्राह्मण