Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 451–460

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 451–460

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द्वितीय अध्याय इ – छन्दस्याग्निः---४-सावित्राग्निः— तृतीयब्राह्मण शतपथब्राह्मण ७१५ का स्वरूप-प्रत्येक वस्तु का अपना एक ' अायतन ' अवश्य होता है । यह श्रायतन ही तद्वस्तु ' वय ' है । यह वथ समर्पक है | इसी ग्रायतन को विज्ञान परिभाषानुसार ' वयोनाघ ' कहा जाता है । वस्तुतत्त्व आयतन के उदर में प्रतिष्ठित रहता है, ( वस्तु ) उस श्रायतन से युक्त रहता है । दूसरे शब्दों में वम अपने को किया जाता है ( शत ० ८५/२६ । इस वयोरूप ग्रन्न अतएव वय को ' अन्न ' शब्द से भी व्यवहृत ' कहा जाता है । यही वत्री-उसका श्रायतन सर्वतः बद्ध रखता है, अतएव इस श्रायतन को ' वयोनाघ छन्द एक प्रकार का अग्नितत्त्व नाव याज्ञिक परिभाषानुसार ' छन्द ' नाम से व्यवहृत होता है । ही है । यही छन्दोऽग्नि - ' बाकू ' नाम से प्रसिद्ध है । इस वाक् के तत्तत् परिमाण हीं किया तत्तच्छन्दः करते - स्वरूप हैं । यह में परिणत होते हैं । अतएव श्राप्तपुरुष छन्द का – ' वाक्परिमाणं छन्द: ' यह लक्षण ' अग्नि ' ही है । इस वाक्तत्त्व ‘ तस्य वा एतस्याग्नेव गेवोपनिपत ( श ० १० कां ० ) के हीं अनुसार है । त्रैलोक्य के पदार्थ पृथिवी, नागग्नि का एकमात्र कार्य वस्तुस्वरूप की तदायतनरूप से रक्षा करना चारों प्रकार के पदार्थों को सीमित बनाने अन्तरिक्ष, द्यौ, आपः भेट से चार स्वरूपों में विभक्त हैं । इन, प्रतिमा, अत्रीवि नाम से वाले चार वाक्छुन्द ही हैं । वे ही चारों छन्द वैज्ञानिक परिभाषा में – सामान्य मा, प्रमा छन्द ' मा ' है । अन्तरिक्ष लोक, व्यवहृत होते हैं । पृथिवीलोक का, एवं तद्गत पार्थिव पदार्थों का, एवं तद्गत दिव्यपदार्थों एवं तद्गत ग्रान्तरिक्ष्य पदार्थों का सामान्य छन्द ' प्रमा ' नाम से प्रसिद्ध है । द्युलोक ' नाम से प्रसिद्ध है । याज्ञिक काछन्द्र ' प्रतिमा है । एवं ग्रापोऽगत दिकस्वरूप - सम्पादक छन्द ' अत्रीवि अनुष्टुप, नाम से परिभाषानुसार मा, प्रमा प्रतिमा, अस्त्रीवि, ही क्रमशः गायत्री, त्रिष्टुप् छन्द है जगती । जगती , दिव्य छन्द है । व्यवहृत होते हैं । गायत्री पार्थिव छन्द है । त्रिष्टुप् आन्तरिक्ष्य आग्नेय है । अतएव श्रग्नि एवं अनुष्टुप् आप्यछन्द है । पृथिवीलोक ' अग्निभू स्थानः ' ० के नि ० अनुसार ) के अनुसार अन्तरिक्ष में ' मरुत्वान् गायत्रीछन्दा कहा जाता है । ' वायुर्वेन्द्रो वान्तरिक्षस् निः ' ( या ' सूर्यो स्थानः ' के अनु-इन्द्र की सत्ता मानी जाती है । अतएव इन्द्र को त्रिष्टुप छन्दा माना जाता है । है । एवं प्राजा सार सूर्य्य सार्वदैवत्य हाता हुआ विश्वेदेव है । अतएव विश्वेदेव को जगतीछन्दा माना जाता चारों हीं छन्द-पत्यविवर्त्त को आस्सीविच्छन्दा माना जाता है । गायत्री, त्रिष्टुप् जगती, अनुष्टुप् विश्वेदेव, तथा स्याग्नि हैं । इह्नीं चारों आयतनों में क्रमशः अग्निमय वसु, वायुमय रुद्र, आदित्यमय प्रतिष्टित रहते हैं । श्रुत-आपोमय आप्त्यादेवता प्रतिष्ठित रहते हैं । सम्पूर्ण देवता ह्नीं चारों छन्दों पर छन्दोमय अश्वस्वरूप को एब वाङमय इन छन्यों को ' अश्व ' नाम मे व्यवहृत किया गया है । ग्राग्न के इसी ग्रायतन - स्वरूप है । लक्ष्य में रखकर - ' अश्वो न देववाहनः ' ( यजुः ) कहा जाता अग्नि है हैं । यह । छन्दस्याग्नि अतएव हम इसे ' सत्याग्नि ' भी मान सकते हैं । यही तीसरा चौथा है सावित्राग्नि । सौरप्राणाग्नि हीं ' सावित्राग्नि ' नाम से प्रसिद्ध है । यही प्रकृत का मुख्य सत्य स्तम्भ है | यह भी सूर्य्यकेन्द्र मे बद्ध होने के कारण ' सत्य ' ही है । सम्पूर्ण सौरदेवता निरन्तर इमी सावित्राग्नि की आराधना करते रहते हैं ।

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द्वितीय अध्याय प्रथम काण्ड तृतीयब्राह्मण प्रकारान्तर से पूर्वोक्त चारों अग्नियों का स्पष्टीकरण इसप्रकार समझना चाहिए कि पृथिवी, अन्त रिक्ष, द्य, तीन लोक हैं | तीनों लोकों के अधिष्ठाता क्रमशः अग्नि, वायु, आदित्य हैं । अग्नि रसाग्नि है, वायु वाग्नि है, आदित्य सम्वत्सराप्ति है । इन तीनों लोको की सीमा सम्पन्न करने वाला आय-तनरूप अग्नि छन्दस्याग्नि है. 1 पार्थिव रसाग्नि ' भूपति ' कहलाता है, अन्तरिक्ष्य तवाग्नि ' भुवनपति ' कहलाता है, एवं सीमासम्पादक छन्दस्याग्नि ' भूतानांपतिः ' नाम से प्रसिद्ध है । ये ही तीनो ' अग्निभ्रातरः ' नाम से प्रसिद्ध हैं । प्रकृत में ' चतुर्द्धा विहितो है आ ' से शुकाग्नि के विक्तं भूत ये ही पूर्वोक्त चार अग्नि श्रमिप्रेत है--। १- रसाग्निः- - पार्थिवाग्निः — — सत्याग्निः - भूपतिः 1 २- प्रातं वाग्निः श्रान्तरिक्षयाग्निः ऋताग्निः- भुवनपतिः शुकाग्निर ३ — सावित्राग्निः- दिव्याग्निः ——- सत्याग्निः — सर्वपतिः ४ – छन्दस्याग्निः - आयतनाग्निः सत्याग्निः -- भूतानां पतिः १ - प्रथमाग्निः गायत्राग्निः प्रपानाग्निः श्रङ्गिरोऽग्निः पतिः २ – द्वितीयाग्निः वायव्याग्निः व्यानग्निः - - - पञ्चप्रयानाः ३ – तृतीयाग्निः - श्रायतनाग्नि: छन्दस्याग्निः — त्रयोऽनुयाजाः सम्वत्सराग्निः प्राणाग्निः सावित्राग्निः ४ - चतुर्थाग्निः प्रकरण के आरम्भ में हमने पार्थिव अतिरोऽग्नि को ' हव्यवाट् ' कहा है । परन्तु वस्तुतः ' अङ्गिरो-ऽग्नि ' नामक रसाग्नि हव्यवाट् नही है, अपितु सौर सावित्राग्नि ही हव्यवाट् है । पार्थिव अङ्गिरोऽग्नि पृथिवी की प्रातिश्विक वस्तु है ।

इत एत उदारुवन् दिवस्पृष्ठान्धारुहन् ।

प्रभूर्जयो यथा पथि द्यामङ्गिरसो ययुः ॥

- यजुः सं ० उक्त भौत सिद्धान्त के अनुसार यह पार्थिव अग्नि निरन्तर पथ की ओर जाया करता है । उधर ओर आया करता है । द्युलोक से श्रागत सावित्राग्नि सत्य है । सूर्यरश्मि के सम्मुख आप एक तिल रख दीजिए, रश्मि उसे छेद उसी श्रागमनमार्ग से परावर्तित होजायगी । यही इसका सत्यभाव से सौर सावित्राग्नि निरन्तर भूपिण्ड की अतएव यह नियत पथ का अनुगामी है नहीं सकेगी, अपितु तिल से टकराकर पुन: ७१६

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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयश्राह्मरण है । यही अवस्था भूपिण्ड के अवरोध से इस मावित्राग्नि की होती है । भूपिण्ड से टकराकर सावित्राग्निपुनः परावर्तित होजाता है | जाता हुआ यह सावित्राग्नि ग्रुपथ की ओर जाते हुए अङ्गिरोऽग्नि से संश्लिष्ट रहता है | केवल इमी सहचग्भाव को लक्ष्य में रखकर हमने पूर्व में निरोऽग्नि को ' हव्यवाट् ' कह दिया है । वस्तुतः हव्यवाट् अग्नि प्रतिफलित सौरसावित्राग्नि ही है । प्रतिफलित सावित्राग्नि ही ' आदित्याग्नि ' है । अङ्गिरा और आदित्य, दोनों स्वर्ग ( सौरलोक ) लोक की ओर जारहे हैं । अङ्गिरा और आदित्य की इस स्पर्द्धा में आदित्य ही प्रथम स्वर्गलोक में जाने में समर्थ होते हैं । कारण, पार्थिव अङ्गिरोऽग्नि की अपेक्षा र प्रतिफलित आदित्याग्नि हीं अधिक बलवान् है । इसी स्पर्द्धाभाव को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं— १ – ' आदित्याश्च ह बाऽअङ्गिरसश्व उभये प्राजापत्या स्पर्द्धन्त - वयं पूर्वे स्वगं लोकमेष्यामो वयं पूर्वऽइति । त श्रादित्याश्चतुर्भिस्तोमैश्चतुभिः पृष्ठ लघुभिः सामभिः स्वर्ग लोकमभ्यप्लवन्त । यदभ्यप्लवन्त — तस्मादभिप्लवाः । अन्यञ्च इवाङ्गिरसः, -सर्वैः स्तोमैः सर्वैः पृष्ठैगुरुभिः सामभिः स्वर्ग लोकम स्पृशंस्तस्मात् पृष्ठ्यः ' । - शत ० १२ का ० २ २६ - १० - ११ इति । २ – ' द्वय्यो ह वा इदमग्रे प्रजा आसुः - आदित्याश्च वाङ्गिरसश्व ' । - शत ० ३।५ | १ | १३ | ३ - श्रदित्याश्चाङ्गिरसश्च तत् सत्त्रं समदधत | आदित्यानामेकविंशतिरङ्गिरसां द्वादशाहः ' । - तां त्रा २४।२।२ ४ – आदित्या वा इत उत्तमां सुवर्ग लोकमायन् । ते वा इतो यन्तं प्रतिनुदन्ते । ५– ( आदित्याः ) स्वर्ग लोकमायन्नहीयन्ताङ्गिरसः ' । -- तां ० ब्रा ० २४ | २ | २ ० ना ० ११६८ ६ – ' तेहादित्याः पूर्वे स्वर्ग लोकं जग्युः पश्वाङ्गिरसः पष्टयां वा वर्षेषु । - ऐ ० वा ० ४।१७ ७- ' तान् हादित्यानङ्गिरसो याजयाञ्चक्र ' । — गो ० उ ० ६।१४ उपर्युक्त प्रमाणों से यह भलीभाँति सिद्ध होजाता है कि आदित्याग्नि ही पहिले २१ विशभ्थाना-त्मक स्वर्गस्थान में पहुँचता है । यही सम्वत्सराग्नि है । यहाँ अङ्गिरा का भी समन्वय होता है । ग्रि 1७१७

पृष्ठ 454

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द्वितीयश्रध्याय प्रथमकाण्ड तृतीया स्वगत हनिद्रव्य की पहिले आदित्य में मार्पित कर देता है । इसी अभिप्राय से तान - अङ्गिरसं याज याञ्चक्र: ' यह कहा है । अङ्गिरा के द्वारा समर्पित पार्थिव सोमरूप हवि को देवता में पहुँचाना एकमात्र आदित्यात्मक सावित्राग्नि का ही का है जो अग्नि प्रतिफलित होकर सूर्य की ओर जाता है, यही ' अश्व ' नाम से व्यवहृत होना है । इस अश्वाग्नि में ( सावित्राग्नि में ) पार्थिव अङ्गिरा का भाग भी प्रविष्ट है । आन्तरिक्ष्य प्राप इसका आत्मा है । इसप्रकार पार्थिव अग्नि, सौर अग्नि, आन्तरिक्ष्य आप तीनों के समन्वय से इस ' अश्व ' का स्वरूप निष्पन्न होता है । पृथिवीपृष्ठ से सकान्त ' उपा ' इसका मुख ' है । यहाँ से २१ विंशपर्यन्त यह अश्वपशु खड़ा हुआ है । इसी के आधार पर पार्थिव गोमान और आइ वनीय अग्नि में आहुत हुआ करता है । अतः हम इस प्रतिफलित सौर सावित्राग्नि को ही प्रधानरूप से ' हव्यत्राट् ' मान सकते हैं । सौर सम्पत्सराग्नि में ही आहुति होती है, एवं सौर सम्वत्सररूप अग्नि के द्वारा ही आहुति होती है । पार्थिव अङ्गिरोऽग्नि, एम सॉर सम्वत्सराग्नि का क्योंकि एक ही स्थान पर समन्वय होता है, इस दृष्टि से पार्थिव अभिगेऽग्नि भी ' हव्यवाट् ' मान लिया जाता है यज्ञकर्त्ता यजमान सीर साम्वत्सरिक दिव्यतत्त्व को स्वमानुषात्मा में प्रतिष्ठित करने के लिए ही यज्ञ करता है । यज्ञात्मस्वरूपसिद्धि के लिए इसे इस दिव्य प्राणा को स्वात्मा में प्रतिष्ठित करना आवश्यक है एतदर्थ ही इसे आहुति देनी पड़ती है । यह आहुति कौन देता है? किस अग्नि के द्वारा यजमानदत्ता पार्थिवी आहुति सार दिव्य प्राणचाग्नि में प्रतिष्ठित होती है? आपल्याविज्ञान एकमात्र इसी प्रश्न का समाधान कर रहा है । जिस अग्नि में आहुति दी जाने वाली है, यह दिव्य है । अतः उसके सान्निध्य से यही अग्नि प्रहति पहुँचा सकता है, जो कि स्वय भी दिव्यभावापन्न हो । आहुति की तो कथा ही दूर है, यज्ञ करने का अधिकार ही यजमान को तत्र प्राप्त होता है, जबकि यह दिव्याग्नि की ' अग्न्याधान ' कर्म के द्वारा पहिले अपने शरीरस्थ मानुषाग्नि में प्रतिष्ठित कर लेता है । देवता का देवता के साथ ही सम्बन्ध होसकता है । अनाहिताग्नि यजमान साधारण यथाजात मनुष्य है । इस मानुष - भाव को दूर करने के लिए ही मत्रसे पहिले उसे उस दिव्य - सौर - तत्व को आहित करना पड़ता है । जिना अग्न्याधान के इसे अग्निहोत्र ' का भी अधिकार नहीं मिल सकता । जब केवल यज्ञ करने के सम्बन्ध में हीं यह स्थिति है, तो मुतरां यह सिद्ध होजाता है कि, दिव्याग्नि के साथ आहुति का सम्बन्ध करने का सामर्थ्य भी एकमात्र दिव्याग्नि में हीं है । पार्थिव -रसाग्नि [ अङ्गिरोऽग्नि ] लोक में जारहा है, किन्तु पार्थिव होने से यह विजातीय है । अतः प्राकृतिक नित्ययज्ञ में वह होतृप्रवरणकम्मे में अनुपयुक्त है । दूसरा अन्तरिक्ष्यताग्नि है । दिव्यानि सत्य है, यह है । इसी विजातीय - भाव के कारण यह भी ' होता ' बनने में असमर्थ है । तीसरा छन्दस्थाग्नि है । यह भी श्रायतनमात्र है । वस्तु की सीमा बनाना ही इसका एकमात्र मुख्य कर्म्म है । अतः यह भी ' होता ' बनने में असमर्थ ही है । पार्थिवाग्नि एवं प्रतिफलित सौर सावित्राग्नि, इन दोनों के सम्बन्ध से मध्यस्थ अान्तरिक्ष्य ताग्नि एवं तीनों अग्नियों का स्वरूप समर्पक, अतएव तीनों से नित्यबद्ध छन्दास्यग्नि, चारों ही लोक की ओर जारहे हैं । इन चारों में विजातीयता के कारण पार्थिव अन्तरिक्ष्य एवं छन्दस्याग्नि, इन तीनों

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द्वितीय श्रध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयत्राह्मण ग्राहवनीय अग्नि में पार्थिव औषधि -अग्नियों का दिव्य सम्वत्सराग्नि के साथ सम्बन्ध नहीं होने पाता । दिव्य है । इमीको हमने आदित्याग्नि, रसरूप आहुति का वहन करने वाला एकमात्र प्रतिफलित कर श्रग्नि ही एवं सावित्राग्नि, नाम से व्यवहृत किया है । दिव्य दिव्याग्नि भी स्वर्ग की पार्थिव अङ्गिरोऽग्नि भी ऊपर स्वग की ओर जारहा है, एवं प्रतिकलित हो रही है । इस प्रतिस्पर्द्धा में पूर्वकथनानुसार श्रीर जारहा है । दोनों में - ‘ त्रयं पूर्वम् त्रयं पूर्णम ' यह श्राप्याब्राह्मण प्रतिस्पद्धां में ' दिव्य श्राहवनीयाख्य सम्ब-आदित्य ही विजयलाभ करने में समर्थ होते हैं । सम्पूर्ण हवि का सम्बन्ध कराता है? ' त्सराग्नि के साथ चतुर्द्धा विभक्त अग्नियों में से कौनसा अग्निमर्त्य अग्नि है पार्थिव । अमृत देवताओं की दृष्टि में यह अग्नि एकमात्र इसी प्रश्न का समाधान किया गया है । पार्थिव ऋत है । यह भी सत्याग्नि के लिए मर्त्य ही है । इन मरा हुआ है । मर्त्य भावापन्न है । अन्तरिक्ष्य ऋताग्नि दृष्टि में मर्त्य ही है । इसी विज्ञान को लक्ष्य अग्नियों को सीमित बनाने वाला छन्दस्याग्नि भी अमृताग्नि की ( छन्दस्याग्नि ), ऋताग्नि ( वाय-में रखकर श्रुति कहती है - प्रथम ( अङ्गिरसोऽग्नि ), द्वितीय हुए अपने आपको पानी के समर्पित कर व्याग्नि ), तीनों ही मर गये । यज्ञकम्म से विमुख होते दिया । अनुसार त पारमेष्ठ्य अपतत्त्व भूपिण्ड सत्य है । यह ऋत से वेष्टित है । ऋतमेव ' परमेष्ठी , तीनों के ही इस पारमेष्ठ्य पार्थिव अर्णव-है । उत्क्रान्त अङ्गिरसेोऽग्नि, वायव्य ऋताग्नि, छन्दस्याग्नि समुद्र * में लीन रहते हैं । , आन्तरि-यद्यपि सावित्राग्नि भी पारमेध्य समुद्र में ही लीन रहता है । कारण- पार्थिव अङ्गरोऽग्नि गायत्र -- त्रैष्टुभ - जागत, भेद-क्ष्य ऋताग्नि, एव प्रतिफलित दिव्य आदित्याग्नि, तीनी का स्वरूपसमपर्क के बीच में पारमेष्ठ्य अत्र-भिन्न छन्दस्याग्नि, चारों ही अग्नि द्युलोक की ओर जारहे हैं । में व्याप्त - भूपिएड हैं । परन्तु इन चारों में मर्त्यभाव समुद्र है । द्य ुलोक की ओर जाने वाले चारों हीं अग्नि समुद्र ऋत छन्दस्याग्नि, ये तीनों तो सर्वथा मरे के कारण अमृतभावापन्न सौर देवताओं की दृष्टि में अङ्गिरा है । मरा नहीं है । अर्थात् हैं । परन्तु चौथा सावित्राग्नि अमृताग्नि है । यह केवल पानी में व्याप्त हुए कहती है— ' मत्ये ' नहीं, अपितु अमृत है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति ' चतुर्द्धा विहितो 2 । सयम् ( अङ्गिरसोऽग्नि ० ) स प्राधन्त्रत् । यं ( ( ऋताग्नि प्रतिकलितः ० ) स प्रबाधन्यत् । यं । छन्दस्याग्निं स प्राधन्वत् । योऽयमेत ग्निः सारसावित्राग्निः ) स भीषा निलिल्ये । सोऽपः प्रविवेश । इति । * रोदसी, कन्द्रसी, संयती, इन तीनों त्रैलोक्यों के क्रमशः श्रर्णव, सरस्वान नभस्वान् इस पार्थिवसमुद्र , नामक तीन समुद्र हैं । प्रकृत स्तौम्यत्रिलोकी का रोदसीत्रैलोक्य में अन्तर्भाव है । अतएव ' का जनक माना को हमने — ' अर्णव ' नाम से व्यवहृत किया है । यही समुद्र ' पार्थिव - सम्वत्सर गया है ७१६

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द्वितीयश्श्रध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मण प्रतिफलित आदित्याग्नि प्राणदपान व्यापार करता हुआ ही युलोक की ओर जाता है । यही गति प्रासादपानद्व्यापार है । दूसरे शब्दों में वीचिरूप में परिणत होता हुआ ही यह अनि ऊपर जाता है । वीचि में कम्पन है । इमी कम्पन - भाव में परिणत होता हुआ ग्रादित्याग्नि आर्त्तयसमुद्र में व्याप्त होता है । इस कम्पनविज्ञान को लक्ष्य में रखकर ही स भीपा निलिल्बे ' कहा है । जिसकी प्रतिष्ठ उच्छिन न हो, और वह गतिमत् चन जाय, वही भय किञ्चिचलने ' के अनुसार ' भय ' 1 किंवा ' भीषा ' है । आप सड़क पर जारहे हैं । यदि सावधानी से आप आधगज ढालू भूमि पर पैर रख देंगे, तो भी आत्मा अविचाली रहेगा, भय न होगा! परन्तु असावधानी से प्रमादावस्था में एक वितस्तिमात्र ढालू प्रदेश में भी श्रापका पैर स्वलित हो जायगा, तो आत्मा किञ्चिञ्चलित होजायगा । श्रात्मा मे धक्कासा लगेगा । किञ्चिच्चलना-बस्थारूप भय का यही प्रत्यक्ष निदर्शन है प्रतिफलित सीर अग्नि चलता है, परन्तु प्रतिष्ठा नहीं छोड़ता । यही ' भीषा निलिल्ये ' है । प्रकरण के आरम्भ में हम पलता आए हैं कि, सौर सावित्राग्नि दो स्वरूपों में परिवात कर भूपिण्ड से सम्बन्ध रखता है । साक्षाद्रूप से सौर तेज भूपिण्ड की ओर निरन्तर आता रहता है । साथ ही भूलिएट से टकराकर प्रतिफलित होता हुआ वहीं सीरतेज, किंवा सावित्राग्नि चुलोक की ओर जाया करता है । जाता हुआ मीरतेज अग्निजवान है, एवं आता हुआ सौरतेज इन्द्रप्रधान है । " यथाग्निगर्भा पृथिवी तथा यरिन्द्रा गर्भिणी " इस आप्त सिद्धान्त के अनुसार भूपिण्ड में अग्नि की प्रधानता है । इसी की प्रधानता से भूपिण्ड से सम्बन्ध कर द्युलोक की ओर जाने वाला, एवं अन्तरिक्ष्य - समुद्र में लीन होने वाला सौरतत्व अग्निप्रधान बन जाता है, एवं द्युलोक से साक्षादूरूप से आनेवाला सौरतत्व इन्द्रमय रहता है । इधर से सीर अग्नि जारहा है । यही ' मेध्य अश्व ' है, जिसका कि विशद निरूपण ' अश्व-' मेथ ' नामक ' अतियज्ञ करना में किया जाने वाला है । उधर से सौर इन्द्र चारहा है । अग्नि और इन्द्र, दोनों का अन्तरिक्ष्य अर्णवसमुद्र में सम्बन्ध होजाता है । अग्नि और इन्द्र, दोनों यहाँ मिल जाते है । इन्द्र सच देवताओं के ( सौर देवताओं के ) उपलक्षण है । पार्थिव देवता अग्निप्रधान है, अतः पार्थिव देवताओं के सम्बन्ध में जैसे " अग्निः सर्वा देवनाः " यह निगम प्रचलित है, एस इन्यप्रधान यु देवता ( सोग्देवताओं ) के सम्बन्ध में “ इन्द्रः सर्वा " देवता " वह प्रसिद्ध है । इन्द्रप्रधान सीरदेवता अमृत है इसकी दृष्टि में प्रम - द्वितीय तृतीय अग्नि मरे हुए हैं । उनके साथ इन मौरदेवताओं का सम्बन्ध नहीं होने पाता । सम्बन्ध होता है एकमात्र सजातीय प्रतिकलित सीर अमृताग्नि के साथ ही इससे समन्ध कर इन्द्र अक्षरों को मारने में समर्थ होते हैं । प्रति-फलित सीर अग्न का ही जाते हुए इन्द्रप्रधान मीरदेवताओं के साथ यान्तरिच्य समुद्र में ) सम्बन्ध होता है, अन्यों का नहीं । सौग्देवताओं ने उस ग्रग्नि का पहिचान कर बलात् पानी में से उसे पृथक कर अपने में मिला लिया 1 ' याच काच बलकृतिरिन्द्रकम्मैव तन ' ( या. नि ) इस नैगमिक सिद्धान्त के अनुसार बलप्रयोग एकमात्र इन्द्र का ही धर्म है । यही ऐन्द्रबल ' सह ' नाम से प्रसिद्ध है - सहने की, दूसरों पर प्रभाव डालने की शक्ति इसी सोच का कार्य है । देवताओंने इसी ऐन्द्रवल के प्रभाव से उस आगच्छत् सौर अग्नि के साथ सम्बन्ध स्थापित किया, इसी ऐन्द्रयल का लक्ष्य में रखकर अति कहती है-" सोऽपः प्रविवेश ते देवा अनुविद्य सहसैवाद्स्य आनिन्युः " |

पृष्ठ 457

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राहाण तृतीयब्राह्मण किसी समाज का कोई व्यक्ति यदि अन्य समाज में चला जाता है, एवं वही समाज यदि उस बिछुड़े हुए को कहीं देख लेता है, तो उसे पहिचानता हुआ वह समाज बलात् उसे अपने में मिला लेता है । वही स्थिति यहाँ है । जो सौर अग्नि बिछुड़ कर भूलोक की ओर चला गया था । वह आज पहिचाना जाकर बलात् उसी ऐन्द्रदल मे मिला लिया गया । इसी अभिप्राय से ' अनुविद्य ' कहा है । पार्थिव ( प्रतिफलित सौर ) न के द्वारा ही भूलोकस्थ हवि द्युलोकस्थ सौर सम्वत्सर नामक आहवनीय अग्नि में आहुति होता है । ' अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुतिष्ठते ' के अनुसार पार्थिव प्रतिफलित सौर अग्नि अपने विकलन -धर्म से हु पार्थिव ओषधिरसरूप हवि का विशकलन कर डालता है । वह रस प्राणरूप में परिणत होता हुआ प्राणरूप अमृतभावापन्न सौर देवताओं में प्रतिष्ठित होजाता है । इस ग्राहुतिकम्मं से दिव्य सौर देवताओं का प्रतिफलित सौर ग्रग्नि के साथ जो सम्बन्ध होता है, वही कर्म्म ' होतृप्रवरण ' कहलाता है । प्रकृतियज्ञ में दिव्य प्राणदेवता स्वयज्ञ की सिद्धि के लिए अग्नि का होतृत्त्वेन वरण किया करते हैं । तदनुसार ही नित्य प्राकृतिक यज्ञ की विधा के अनुसार वितत होने वाले इस ' मनुष्ययज्ञ ' में भी आहुति के लिए अग्निमूर्ति होता का वरण किया जाता है । चारों हीं अग्नि भूपिण्ड से द्युलोक की ओर जारहें हैं । परन्तु चारों में से सजातीय - सम्बन्ध के कारण केवल प्रतिफलित सौर अग्नि के साथ ही दिव्य सौर देवताओं का सम्बन्ध होता है, यही तात्पर्य है । चारो अग्नियों में से पार्थिव अग्नि केवल पार्थिव अन्न का परिपाक करता है । अन्न को विशकलित कर द्युलोक में पहुँचा देना इस पार्थिव अङ्गिरोऽग्नि की शक्ति से बाहिर है । श्रुतः इसे ऋषिने वरणकम्मं के अयोग्य ठहराया है । आन्तरिक्ष्य वायव्याग्नि ' विद्युत ' है । प्राणियों में ' ओजबल ' का सञ्चार करना एकमात्र इसी का मुख्य कार्य्य है । आकाश में जो विद्युत् का सञ्चार देखा जाता है, वह भी इसी वायव्याग्नि की महिमा है । L समय समय पर विविधरूप से देखे जाने वाले आकाश के क्षणस्थायी प्रकाशपुञ्जों को देखकर साधारण मनुष्य ' नक्षत्र ' टूटने का अनुमान लगाया करते हैं । परन्तु यह सर्वथा भ्रान्ति है । नक्षत्र सर्वथा स्थिर पदार्थ हैं । उन की स्थानच्युति से तो प्रलय होजाता है । * ' न क्षरति ' इस व्युत्पत्ति से नक्षत्र क्षरण-भाव से । विच्युति से ] सर्वथा रहित हैं । नक्षत्र सर्वथा अविचाली हैं । वे कभी नहीं टूटा करते । उपर्युक्त वायव्याग्नि आकाश में बड़े वेग से इतस्ततः प्रवाहित है । इस वायव्याग्नि को -- ' मरुत् ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । रोदसी - त्रैलोक्य में स्थिररूप से व्याप्त रुद्रतत्त्व से इस मरुद्वायु का जन्म होता है । मरुत् से ' समीरण ' नाम के ' वात ' का प्रादुर्भाव होता है । जिसे साधारण मनुष्य ' वायु ' कहते हैं, जिसके स्पर्श का अनुभव होता है, जो वायुतत्त्व वाहकशक्ति के द्वारा एक दूसरे पदार्थों के रस को लेकर एक दूसरे पदार्थों की कमी पूरा करता हुआ ' भैषज्ययज्ञ ' किया करता है, वही ' समीरण ' नामक वायु ' वात आत्रात भेषजम ' के अनुसार ' वात ' नाम से प्रसिद्ध है । ' वात ' शब्द एकमात्र बहने वाले स्पर्शधर्म्मा वायु में हीं निरूढ है । इसका जनक ' मरुत् ' है । * सूर्य सर्वथा स्थिर है । भूपिण्ड सूर्य के चारों ओर स्थिरभाव को लक्ष्य में रखकर वैज्ञानिकोंनें – ' एतद्वै - अनपरा के अनुसार सूर्य को ' नक्षत्र ' नाम से व्यवहृत किया है । ७२१ क्रान्तिवृत्त पर घूमता है । सूर्य्य के इस नक्षत्रं यत् सूर्य्य: ' ( श ० २।२।२६ )

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मण मरुद्वायु की सात अवस्थाएँ हैं । इन्द्रप्राण के प्रवेश से प्रत्येक मरुत् सप्तधा २ विभक्त होजाता है । इसप्रकार सात सप्तकों के '४२ मरुत ' हो जाते है इनका अनक पूर्वोक्क रुद्राग्नि, किया रुद्रवायु है । इसी विज्ञान के आधार पर — ' मरुतो रुद्रपुत्रासः ' यह कहा जाता है । इन ४६ सौ मरुतों की गति भिन्न भिन्न है । कोई पूर्व से पश्चिम, कोई पश्चिम से पूर्व, दक्षिण से उत्तर उत्तर से दक्षिणा हमप्रकार बड़े बेग से प्रवा हित रहता है । जैसे भूषिगड पर नदनदी धाराएँ भिन्न भिन्न पथ से प्रवाहित रहती हैं, ठीक इसीप्रकार आकाश में वायु धाराएँ इतस्ततः प्रवाहित हैं । इनके पारस्परिक आघात - प्रत्याघात से अग्नि उत्पन्न हो-जाता है । इसी की तारा, धिष्ण्या, उल्मुक, वत्र, ये चार अवस्थाएँ प्रत्यक्ष हैं । मानलीजिए - एक वायु पूर्व से पश्चिम की ओर जारहा है, एक पश्चिम से पूर्व की ओर आरहा है । दोनों के प्रान्तभाग का यदि स्पर्श होजाता है, तो क्षणमात्र के लिए घर्षण से ' अग्नि ' उत्पन्न होजाता है, यही ' तारा टूटना ' है । यदि अधिक बेग से पर्पगा होता है, तो अधिक ' ज्वाला ' निकल पड़ी है । यही ' धियया ' किंवा ' बिन ' है । यदि और भी अधिक वेग होता है, तो बँधा हुआ प्रकाश निकलता है । मूल में यह थोड़ा होता है । किन्तु इसका अवसान विशाल होता है । यदि एक वायु दूसरे वायु पर आरूढ होनाता है, तो महान् शब्द के साथ यह ज्ज्वालापुञ्ज निकलता है । वह इतना घन होता है कि, उसे आकाश में ही विशकलित होने का अवसर नहीं मिलता, अपितु वह: में गिर पड़ता है या यह लोह में गिर पड़ता है, तो लौहा फौलाद बन जाना है । जिस स्थान पर गिरता है, वहाँ का धरातल चित्रमित्र दोजाता है । तत्समीपवर्ती वृक्षादि जल जाते हैं । यही ' च ' है । वज्र का उदय तभी होता है, जबकि दोनों वायु समान बल वाले होते हैं । यदि एक वायु निर्बल होता है, तो माल वायु निर्बल की स्वग्राकमा से अभिभूत कर देता है । ऐसे समय में विस्फोटन नहीं होता, अपितु निर्बल वायु धक्का वा कर भूपिण्ड की ओर जाता हुआ किसी पर्वतकन्दरा में, भूगत्तों में, अथवा ओर कहीं, जहाँ मी रिक्तम्थान मिलता है, वहाँ प्रविष्ट होजाता है । इससे वहाँ का प्रदेश विकम्पित हो पड़ता है । यही वायव्य भूकम्प ' कहलाता है । तथोक्त नारा - धिन्या उल्मुक - वन्त्र, इन चारों में ' तारा ' उत्पात सदा ही हुआ करता है । विशे-पतः जब सूर्य्य ' मघानक्षत्र ' पर आता है, तत्र तो यह चरित्र सर्वथा द्रष्टव्य बन जाता है । शेष तीनों का अधिक प्रकोप वर्षा में होता है । प्रकृत में बतलाना केवल यही है कि, इस वायव्याग्नि के उक्त कार्य्यं हैं । ऋतभाव के कारण यह भी हविर्वहन करने में असमर्थ ही है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर इस द्वितीय अग्नि को भी ऋषि ने प्रवरणम् के अयोग्य ही ठहराया है । तीसरा म्हस्याग्नि ' प्रयोनाश्रमात्र है । वस्तु का वहन करना ही ' वयोनाथ ' का कार्य है । छ तो आकारमात्र है । उसका काम वस्तुस्वरूप- सम्पादन करना है, न कि हविर्वहन करना । अतः इसे भी ' प्राधन्वन ' कोटि में ही अन्य माना गया है । अब शेष रह जाता है— प्रतिफलित र अग्नि । यही एकमात्र हव्यवाहक बनता है । यह उत्तर की ओर जाता हुआ आपोमय समुद्र में प्रविष्ट हो-G च्याप्य वाकय, आग्नेय, ऐन्द्र, मेट मे भूकम्प चार प्रकार के होते हैं । इनका विराट विवेचन ' ग्रहणविज्ञान ' में देखना चाहिए । ७२२

पृष्ठ 459

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 459 का मूल पृष्ठ
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण पड़ता है । ' सहोबल ' के द्वारा सौरप्राणवेत्ता इसे निकाल कर अपना यज्ञ सिद्ध कर लेते हैं । यही निष्कर्ष है । प्रतिफलित सौर अग्नि पानी में प्रविष्ट है । इसमें सौम्य अन्नरस प्रतिष्ठित है । इसके सम्बन्ध से यह अग्नि प्रज्ज्वलित रहता है । अन्नाद अग्नि तभीतक प्रज्ज्वलित रहता है, जबतक कि उसके साथ अन्न ( सोम ) का सम्बन्ध रहता है | बिना अन्न के प्राग्नेय प्राण पर ग्राम वारुग्ण प्राण का आक्रमण होजाता है | उदा-हरणार्थ अध्यात्मयज्ञ को ही लीजिए । जबतक शारीराग्नि में अन्नसोम की आहुति होती रहती है, तबतक शरीराग्नि प्रदीप्त रहता है । ग्राहुति के अवरोध करने पर, अथवा अवरोध होजाने पर अग्नि मूर्च्छित हो– जाता है | चिरकाल पर्य्यन्त यदि ग्रन्नाहुति अवरुद्ध होजाती है, तो अन्नसत्ता पर प्रतिष्ठित रहने वाला शारीर अन्नादाग्नि उत्क्रान्त होजाता है । उसी समय शरीरस्थ आषोमय वरुण का साम्राज्य हो जाता है । शरीर मड़ने लगता है । प्रकृतियज्ञ में जत्र इन्द्रप्रमुख देवताओं का हवि के कारण आपोमय मण्डलम्थ सौर अग्नि के साथ सम्बन्ध हुआ, तो शेष पानी दूषित होगया । दूसरे शब्दों में अन्नमय अग्नि का देवताओं के साथ सम्बन्ध होगया, और वारुणाग्नि वहीं रह गया । यही अग्नि का ' निष्ठीवन ' ( भूँकना ) है । यह सौर अग्नि आन्त— रियाः से निकला है, ग्रान्तरिक्ष्य प्रापः में यह प्रतिष्ठित रहता है, इसलिए ' अप्सु भवा: ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इस अग्नि को ' आपल्या ' कहा जाता है । अपिच देवताओं के द्वारा यह अग्नि आप्त ( प्राप्त ) हुआ है, इसलिए- ' देवैराप्ताः ' के अनुसार भी इसे ' आप्त्याः ' कहा गया है । अपिच यह पोमय अग्नि है, इसलिए भी इसे ' आपल्या ' कहा जासकता है! श्रपिच यह देवताओं के साथ ' ऐकात्म्यभाव ' को ' प्राप्त रहता है, इसलिए भी इसे आपल्या ' ' कहना उचित है । सौर दिव्यप्राण ' त्रिसत्य ' है बिना त्रित्त्वभाव के देवता का कोई कार्य नही होता | कारण स्पष्ट है । अव्ययपुरुष मनोमय होने से ज्ञानप्रध न है, क्षरपुरुष वाङमय होने से अर्थप्रधान है | एव मध्यस्थ अक्षर-पुरुष प्राणमय होने से क्रियाप्रधान है । मनोमय अव्यय आत्मसृष्टि का अधिष्ठाता है, प्राणमय अक्षर देवसृष्टि का अधिष्ठाता है, एवं वाङमय क्षरपुरुष भूतसृष्टिका सञ्चालक है । आत्मा - देवता - भूत, तीनों की प्रतिष्ठा क्रमशः अव्यय - अक्षर - क्षर - पुरुष हैं । इन तीनों का विकास क्रमशः स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा, पृथिवी, इन पाँचों विश्व - श्रवयवो में होता है । स्वयम्भु परमेष्ठी, दोनों ज्ञानप्रधान हैं, यहाँ अव्यय का विकास है | यही प्रजापति की श्रात्मसृष्टि है । चिदात्मा की योनि ' अव्यक्त ' नाम से प्रसिद्ध स्वयम्भू – गर्भित ‘ महानात्मा ' नाम से प्रसिद्ध परमेष्ठी है । पृथिवी चन्द्रमा, दोनों में अर्थ की प्रधानता है | चन्द्रगर्भिता पृथिवी ही भूतसृाष्ट की अधिष्ठात्री है । विश्व के हृदय - स्थानीय सूट में अक्षर का विकास है । यह सौर अक्षर - ' अक्षरमिति व्यक्षरम ' के अनुसार ह -- द -- य भेद से ' यक्ष ' है । ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र की समष्टि ही ' अन्तर्यामी ' अक्षर है । यही प्राणमय देवताओं की विकासभूमि है । देवप्राण त्र्यक्षर से बद्ध होने के कारण ह्रीं ' त्रिसत्य ' है । विना त्रिभाव के देवता की स्वरूप निष्पत्ति नहीं होती । इसी विज्ञान के आधार पर - ' त्रिः सत्या वै देवाः ' यह अनुगमन वचन प्रचलित है । ७२३

पृष्ठ 460

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 460 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयत्राह्मण १ - श्रव्ययपुरुषः - आत्मसृष्टिः - स्वयम्भूः - परमेष्ठो २- श्रत्तरपुरुषः- देवसृष्टिः– सूर्य: ३ - क्षरपुरुषः — भूतसृष्टिः - चन्द्रमाः - पृथिवी हृ — इत्येकमक्षरम् । द – इत्येकमक्षरम् -‘अक्षरमिति त्र्यन्तरम् ' - ' त्रिः सत्या वै देवाः ' यम् - इत्येकमक्षरम् पिच - देवप्राण अग्नि वायु - आदित्य - भेद से त्रिधा विभक्त है । एक ही तत्त्व की घन तरल-विरलावस्था अग्नि - वायु आदित्य हैं । तीनों एक वस्तु हैं । तीनों का समुचितरूप ही ' देवता ' है । इसलिए भी ' देवता ' को ' त्रिसत्य ' माना जाता है । इस त्रिसत्यभाव के कारण हीं वह आप्त्याग्नि त्रिधा विभक्त हो जाता है । सौरप्राणाग्नि देवता है । उसके भी अग्नि वायु - आदित्य- ये तीन हीं रूप हैं । तीनों देवता क्रमशः प्रातःसवन, माध्यन्दिनसवन, सायंसवन, इन तीन सवनों के अधिष्टाता हैं । इसी त्रिसत्य से वह आदित्याग्नि त्रिधा विभक्त होजाता है । अग्निदेवता से सम्बन्ध रखने वाला आप्त्या ' एकता ' है, वायु से सम्बन्ध रखने वाला आपल्या ' द्विता ' है, एवं आदित्य से सम्बन्ध रखने वाला श्रप्या ' त्रिता ' है । अग्नि के साथ एकता प्राप्त्या का सम्बन्ध है । वायु में द्विगुण - मात्रा है । श्रादित्य में त्रिगुणा - मात्रा है । एक आत्या-ग्नि की ही प्रथम - द्वितीय - तृतीय -- भेद से तीन अवस्थाएँ समझिए । तीनों का क्रमश: अग्निवायु - इन्द्र के साथ सम्बन्ध होता है । तीनों प्राप्त्या एक वस्तु हैं, तीनों देवता एक वस्तु है । अवस्थाभेद से ही आया-भेद है, एवं अवस्थाभेद से ही देवता का भेद है । सम्वत्सरयज्ञे त्रीणि सवनानि १ - प्रातः सवनम् - अग्निप्रमुखवसूनाम् - एकता, २ – माध्यन्दिनं सबनम् - वायुप्रमुख – रुद्राणाम् — द्विता, ३-- सायं सवनम् - इन्द्रप्रमुख - आदित्यानाम् - त्रिता, देवताओं में सबसे प्रधान ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ देवता इन्द्र है । इधर प्राप्तयों में सबसे प्रधान ' त्रिता ' नामक आाप्या है | इसी का इन्द्र के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है । सम्वत्सर - त्रिलोकी में द्युलोक का अधिष्ठाता ' म वा इन्द्र ' है । ' त्रिता ' नामक आत्या इसीके साथ रहते हैं । इन्द्र के ब्रहण से जैसे सब देवताओं का ग्रहण हो जाता है, एवमेव त्रिता से एकता, द्विता नामक दोनों प्राप्त्यों का भी ग्रहण होजाता है । तात्पर्य यही है कि, देवताओं की त्रिसत्यता के कारण एक ही आत्याग्नि की तीन अवस्थाएँ होजातीं हैं । ये तीनों हीं आयादेवता देवताओं के उत्तरोत्तर प्राचत्य के कारण उत्तरोत्तर प्रबल हैं । कारण इसका यही है कि, ७२४