Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 461–470
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 461–470
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द्वितीयाध्याय शतपथब्राहाण तृतीयब्राह्मण त्याग्नि प्रतिफलित सौर अग्नि है । अतः त्रिवृत्स्थानीय एकता, और अग्नि पृथिवी के सम्बन्ध से स्वस्वरूप से पूर्ण विकसित नहीं है । यही अवस्था पञ्चदश स्थानीय आन्तरिक्ष्य द्विता अग्नि की है । एकविंश - स्थानीय द्युलोक में रहने वाला त्रिता अग्नि स्वस्थान में जाता हुआ पूर्ण विकसित होजाता है । इसी अभिप्राय से आगे जाकर तिने ' त्रिता ' अग्नि को ही ' विश्वरूप ' वा असुर के वध में प्रधान माना है, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । I इन त्याग्नियों की दो अवस्था हैं । श्रात्याग्नि का जो भाग ( हविर्युक्त भाग ) इन्द्रप्रमुख देवताओं के साथ रहता है, वह तो शुद्ध है । किन्तु जो भाग पानी में हीं रहता है, वह आत्या दोघाक्रान्त है । उत्क्रान्त होने वाले पार्थिव अन्नरस में मल भी रहता है । प्रत्येक अन्न में रस, मल, दोनों रहते हैं । ऊपर की ओर जाते हुए आया मलरस से युक्त अन्न को लेजा रहे हैं । पानी वारुण है । वारुण पानी हीं मल की प्रतिष्ठा है । मलभाग वरुण में ही रह जाता है, रसभाग को आत्याओं के सहयोग से देवता ले लेते हैं । निदर्शन अध्यात्मयज्ञ है । हम जो अन्न खाते हैं, वह शारीरिक पोमय त्याग्नि में हीं प्रतिष्ठित होता है | रसभाग प्राणेन्द्रियों - देवताओं के साथ युक्त होजाता है । एवं मलभाग उसी शारीर आपोभाग में रह जाता है । वह अपानप्राण के धक्क े से ' स्वेद ' ( पसीना ' ) बन कर निकलता रहता है, स्थूलभाग मूलद्वारों से बाहिर फेंक दिया जाता है । अध्यात्मयज्ञ का मलभाग शरीर के पोमय आत्या में हीं प्रतिष्ठित रहता है । पसीना - कक - लाला - मूत्र - मल- ये सब हवियुक्त त्याग्नि से परित्यक्त पदार्थ हैं । सत्र आपोमय वारुण भाग में प्रतिष्ठित हैं । यही अवस्था अधिदैवत यज्ञ की है । शुद्ध प्राप्त्याओं से प्रक्षिप्त ( फेंका हुआ ) मल-भाग अान्तरिक्ष्य आपोमय प्रात्याओं में हीं प्रतिष्ठित रहता है । इसी विज्ञान का स्पष्टीकरण करते हुए ऋषि कहते हैं— इति ” । “ सोऽपोऽभितिष्ठेवावष्ठयूतास्थ या अप्रपदनं स्थ याभ्यो वो मामकामं नयन्ति, सौर पोमय अग्नि हीं आया है । यद्यपि यह है सौर सम्वत्सर की वस्तु । क्योंकि वही तो भदृष्ठ पर आके प्रतिफलित होता हुआ सौर सम्वत्सर की ओर जारहा है । परन्तु पृथिवी के साथ सम्बन्ध होने के कारण यह पृथिवी के आकर्षण से आकर्षित रहता है । पृथिवी से आकर्षित रहने पर भी द्यु लोकस्थ इन्द्र के सहोबल से इमे द्युलोक देवताओं के साथ समन्वित होना पड़ता है । इसी आकर्षण – विज्ञान को लक्ष्य में रखकर – ' याभ्यो वो मामकामं नयन्ति ' कहा है । स्त्रतएव यह अग्नि यदि मौरदेवताओं के आकर्षण से आकर्षित रहता, तत्र तो — ' प्रकामम् ' कहने की आवश्यकता न थी । परन्तु स्वतः तो यह पार्थिव आकर्षण से ही आकर्षित है । ऐन्द्र - वलप्रयोग के द्वारा ही यह प्राच्या देवताओं में सम्मिलित होता है । सम्पूर्ण कण्डिका का निष्कर्ष यही हुआ कि, चतुर्द्धा विहित अग्नियों में से सावित्राग्नि ही इन्द्रदेवताओं के समीप हवि पहुँचता है । यह ग्रापोमय होने से आया है । इसके मलयुक्त - रसयुक्त दो रूप हैं | रसयुक्त भाग का देवताओं से सम्बन्ध है, एवं मलयुक्त भाग का वरुणमण्डल से सम्बन्ध है । शुद्ध प्याग्नि इन्द्र-प्रमुख देवताओं के साथ रहता है । देवत्रयी के कारण सवनभेद से इसकी तीन अवस्थाएँ होजाती हैं । ये ही तीनों अवस्थाएँ क्रमशः एकता, द्विता, त्रिता, नाम से प्रसिद्ध हैं ॥ १ ॥
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द्वितीय श्रध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयत्राह्मण १ – ' श्रादित्यो वै ब्रह्म ' ( जै ० उ ० ब्रा ० ( ४६ ) २– ' ब्रह्म वा अग्निः ' ( को ० ब्रा ० ६ १ | ५ ) ३ – ' ब्रह्म ह्यग्निस्तस्मादाह ब्राह्मणेति ' ( शत ० ११४/२/२ ) ४ - ' अग्ने महाँ असि ब्राह्मण भारतेति ' ( श ० १।४।२।२ ) ब्राह्मण हैं । वर्णों इत्यादि उक्त निगम - वचनों के अनुसार अग्नितत्त्व ही प्राकृतिक नित्यदेवताओं में ' कहलाता है | ' ब्रह्म ' वह में भी जिसके आत्मा में यह ' आप्याग्नि ' प्रधान रहता है, वह भी ' ब्राह्मण रहने वाले ताधर्म्मा अग्नि की अग्नि है, जो सर्वथा शान्त हो । पानी में रहने वाला अग्नि प्रज्ज्वलित के सम्बन्ध से पानी को लोक में अपेक्षा अधिक बलवान् होता हुआ भी ऊपर से शान्त रहता है । इसी अग्नि ब्राह्मण ऊपर से सर्वथा शान्त ‘ ठंढी आग ' कहा जाता है । यही ब्राह्मणवर्ण का वास्तविक स्वरूप है सम्पादक । श्रन्याग्नि हीं देवताओं के रहता है, परन्तु उसका अन्तरात्मा प्रदीप्त रहता है । ब्राह्मणवर्ण - स्वरूप- ११४ २१२ ) के अनुसार इसे लिए हत्रि का भरण करता है, अतएव ' एष हि देवेभ्यो हव्यं भरति ' ( शत ० ' भारत ' * कहा जाता है । ' यह ब्राह्मणमूर्ति - भारत, किया ' एष हि देवेभ्यो हव्यं भरति दा लोकस्थ तस्माद्भरतोऽग्निरित्याहुः इन्द्र के साथ संयुक्त ( शत ० १२५१८ ) के अनुसार ' भरत ' नाम से प्रसिद्ध अत्याग्नि रहता है । = १ – ' क्षत्रं वा इन्द्र: ' ( तै ० ब्रा ० २।१६।३ ) २– -'नत्रं राजन्यः ' ( ऐ ० ब्रा ० ८ ६ ) ३ – ' एन्द्रो वे राजन्यः ' ( तै ० ब्रा ० ३ | ८ | २३ | २ ) हैं । जिस वर्गा के आत्मा में इत्यादि उक्त नैगमिक - सिद्धान्तों के अनुसार इन्द्र देवताओं में क्षत्रिय वह ) कहलाता है । यह क्षेत्र इन्द्र, और यह इन्द्रप्राण प्रधान रहता है वह भी वर्षों में ' राजन्य ' इन्द्र ( क्षत्रिय का पुरोहित है । अग्नि अभिगन्ता है, इन्द्र कर्त्ता ब्रह्म आत्याग्नि, दोनों परस्पर सङ्गत रहते हैं । अग्नि नहीं रह सकता । कारण इन्द्र के यज्ञरूप है । बिना अग्निब्रह्म के क्षेत्र इन्द्र एक क्षणमात्र भी प्रतिष्टित । ' इतः प्रदाना ह्येते । उपजीवन्ति ) ' इस राष्ट्र का स्वरूप – सम्पादन एकमात्र इस अग्निब्रह्म का ही कार्य्यं ' नाम है की आहुति से ही युलोकम्थ इन्द्रप्रमुख देवता श्रांत सिद्धान्त के अनुसार भूलोक से जाने वाली ' श्यैत योगशिकोने दौष्यन्ति भरत के सम्ब-* भारतवर्ष क्यों कहलाया?, इस प्रश्न का भरत यद्यपि को तन्नामकरण में प्रधानता दे रहे हैं । न्ध से समाधान किया है, और अद्यतन इतिहासवेत्ता ऋषभदेव कहलाया है । ' अग्निभू स्थान: ' के अनुसार परन्तु वैदिकमतानुसार अग्नि के सम्बन्ध से ही यह देश भारतवर्ष ' विख्यात है । इस विषय का विशद विवेचन शत-पार्थिव अग्नि ही भरत है । इमीके सम्बन्ध से ' भारतवर्ष पथ के तत्प्रकरण में हीं किया जायगा । ७२६
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्म गा तृतीयब्राह्मण जीवित रहने में समर्थ होते हैं । ब्रह्म ज्ञानशक्ति है, क्षत्र क्रियाशक्ति है । ज्ञान का विकास किया ( कर्म्म ) से ही होता है, क्रिया की प्रतिष्ठा ज्ञान ही है । ज्ञान बिना क्रिया के यद्यपि विकसित नहीं होसकता, परन्तु वह स्वप्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित रह सकता है । उसका स्वस्वरूप उच्छिन्न नहीं होसकता । परन्तु क्रिया में यह बात नहीं है । क्रिया की उत्पत्ति ही बिना ज्ञान के असम्भव है । ज्ञान से इच्छा का विकास होता है, इच्छा से ऋतु-( यत्न- चेष्टा - अन्तर्व्यापार ) होता है । ऋतु से क्रिया ( कर्म - बहिर्व्यापार ) होती है, जैसा कि अभियुक्त कहते है-ज्ञानजन्या भवेदिच्छा इच्छाजन्यं क्रतुर्भवेत् । क्रतुजन्यं भवेत् कर्म तदेतत् कृतमुच्यते ॥ * ज्ञानमय मन से इच्छा का विकास होता है । वह इच्छा ' इदं मे म्यान ' - ' इदं कुर्वीय ' इस क्रतुभाव से मंश्लिष्ट रहती है । क्रतु, और कम्र्म में अन्तर है । प्राणव्यापार ऋतु हैं । एवं वाग्व्यापार ( स्थूल-शरीर का व्यापार ) कम्म है । श्रर्द्धाङ्ग का रोगी उठने की इच्छा करता है । तदनुकूल प्राणव्यापार भी करता है, चैत्रा करता है, परन्तु स्थूलशरीर उठने में समर्थ नहीं है । अतएव उसकी यह चेष्टा व्यर्थं जाती है | इस— प्रकार ऋतु, और कर्म्मका भेद स्पष्ट प्रतीत होता है । जिसे दार्शनिक यत्न, किंवा चेा कहते हैं, वही ' ऋतु ' है । ' ऋतु ' शब्द ही नैगमिक परिवर्तन से ' कृत ' रूप में परिणित होगया है । वस्तुतः— ' सयदेव मनसा कामयते - इदं मे स्थान, इदं कुचय - इति स एव ऋतु: ' ' हृत्सु ह्ययं क्रतुर्मनोजवः प्रविष्टः ’ -शर ३२३ | ४ | ७ - 212121? इत्यादि के अनुसार चेष्टा ' कतु ' शब्द से ही व्यवहृत होती है । प्रकृत में हमें इस प्रपञ्च से केवल यही बतलाना है कि, किया की प्रतिष्ट । ज्ञान ही है । ज्ञान ही ब्रह्म, किंवा ब्राह्मरण है, यही आप्याग्नि है । क्रिया क्षेत्र, किंवा क्षत्रिय है, यही सौर इन्द्र है । दोनों अन्तरिक्ष में सम्मिलित रहकर ही वाष्ट्र सुर वध में समर्थ होते हैं । इन्द्र असुरों को मारते हैं, परन्तु श्राप्याग्नि की सहायता से । यही अवस्था मनुष्यों में समझनी चाहिए । यदि राजा के समीप योग्य पुरोहित होता है, तो वह राजा अपने शत्रुओंों को परास्त करने में समर्थ होता है | बिना ब्राह्मण पुरोहित के निर्मूल होता हुआ राजा शत्रुओं से परास्त होजाता है । इसी ब्रह्मविज्ञान को लक्ष्य में रखकर शातपथीया- श्रुति कहती है-‘ ब्रह्मं व मित्रः, क्षत्रं वरुणः । अभिगन्तैव ब्रह्म, कर्त्ता चत्रियः । ते तेऽग्रे नाने-वासतुः – ब्रह्म च क्षत्रं च । ततः शशाकेव ब्रह्ममित्र ऋते चत्राद् वरुणात् स्थातुम् । * इच्छाजन्या कृतिर्भवेत्, कृतिजन्यं भवेत्कम्मं ( लौकिक - पाठान्तर ) ।
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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मण न क्षत्रं वरुणः - ऋते ब्रह्मणो मित्रात् । यद्ध किंच वरुणः कर्म्म चक्रेऽप्रनतं ब्रह्मणा मित्रेण । न हैवास्मै तत् समानृधे ।........... सोऽएव पुरोधा ।... तस्मादु क्षत्रियेण कर्मकरिष्यमाणेनोपसत्तव्य एव ब्राह्मणः । सं हैवास्मै तद्ब्रह्मप्रसूतं कर्म्म -अर्घ्यते ' - शत ० ४१।३।१-२-३-४-५-६ । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर याज्ञवल्क्य कहते हैं कि, जैसे लोक में ब्राह्मण पुरोहित राजा का अनु-सरण किया करता है, इसी प्रकार आत्या इन्द्र के साथ विचरने लगे । भूविड, और सूर्य के मध्य में आपोमय प्राण प्रतिष्ठित रहता है, यह पूर्व में बतलाया जाचुका है । लोकसृष्टि का अधिष्ठाता यही आपोमय श्रासुर तत्त्व है, जैसाकि पूर्व के ' अपांप्रणयन ' कर्म में विस्तार से बतलाया जा चुका है । सोऽमिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः । एव ससर्जादा तासु बीजमवासृजत् ॥ ( मनुस्मृतौ ) अप्सु तं मुञ्च भद्र ते लोका ह्यप्सु प्रतिष्ठिताः । पोमयाः सर्वरसाः ममापोमयं जगत् || ( महाभारते ) ' श्रद्भिर्वा इदं सर्वमाप्तम् ' ( श ० ६ | १ | ११८ ) ' तदब्रवीत् - ' आमि: ' ( स्वेदधाराभिः - तद्रूपाभिरद्भिः ) श्रहमिदं सर्व धार-मिष्यामि, सर्व जनमिष्यामि सर्णमास्यामि यदिदं किञ्च । तद् धाराणां धाराचम्, तज्जायानां जायाच्चम्, तदपामपचम् ' । - गो ० ० ० १२ उक्त श्रौतस्मार्थ - प्रमाणों के अनुसार अपतत्त्व ही मैथुनी सृष्टि का मूलाधार है । सृष्टि का उपादान-द्रव्य ब्रह्मगर्भित यही ' सुब्रह्म ' है । ब्रह्म एव सुब्रह्म के समन्वय से ही विश्व, एवं तद्गता प्रजा का निर्माण हुआ है । यह तत्त्व विश्व का उपादान अवश्य है, परन्तु इस एक ही तत्त्व से विविध आकार वाले भूः - भुवः स्वः- आदि लोक उत्पन्न होते हैं, इस का मुख्य कारण ' त्वष्टा ' जाण है । अपतत्त्व शुक्र है । इस शुक्र के भिन्न भिन्न आकार में परिणत करने वाला ' त्वाप्राण ' ही है ' ' त्वष्टा वै रेतः सिक्तं त्रिकिरोति ' ' ष्टरूपाणि ( आकारात्मकानि रुषारिण ) विशतु ' के अनुसार जैसे हरित - नील पीतादि वर्णों का अधिष्ठाता मघवा इन्द्र है, एवमेव ग्राकाररूप का अधिष्ठाता त्वष्टाप्राण है । अतएव सृष्टिप्रवर्तक इस अप-तत्त्व को हम अवश्य ही - ' त्वा ' कह सकते हैं । यही विश्व का उपादान है । ' सर्वमाषोमयं जगत् ' के अनु-सार यही विश्वरूष में परिगत होरहा है, अतः इसे विश्वरूप नामसे व्यवहृत किय गया है । सत्प्राण जैसे ऋषि है, मौर प्राण जैसे देवता नामसे व्यवहृत होते हैं, एवमेव श्राध्या ' असुर ' कहलाता है । इसी आधार पर त्वाष्ट्र विश्वरूप इस ग्रान्तरिक्ष्य मलयुक्त प्राप्त्याप्राण को ' असुर ' कहा जासकता है ।
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राहाण तृतीयब्राह्मण पूर्व में हमनें त्याग्नि के विशुद्ध, एवं मलयुक्त ये दो स्वरूप बतलाए हैं । पुनः उनकी ओर ग्रापका ध्यान आकर्षित किया जाता है । हवियुक्त विशुद्ध प्रात्याग्नि को एकता - द्विता - त्रिता - भेदभिन्न ' आप्त्या ' देवताओं के साथ सहयोग मानिए । शेष बचे हुए मलयुक्त आमच्या को यही विशुद्ध वाक भाग है । इसमें भी अग्नि है अवश्य क्योंकि पानी बिलयनं च तेजः संयोगान " ( कणाददर्शन ) इस सिद्धान्त के अनुसार अनुपपन्न है । अग्नि ब्राह्मण है । इसलिए इस त्वाष्ट्र विश्वरूप अत्रमूर्त्ति मान सकते हैं । जिसप्रकार किलात, और आकुली, ब्रह्मासुर हैं, इसी-अग्नि के सम्बन्ध से असुरब्राह्मण है । यह देवताओं का विद्वेषी है । समझिए । एवं इनका इन्द्रप्रमुख ' त्या विश्वरूप ' असुर समझिए की तरलता - " अपां संगातो बिना अग्नि के सम्बन्ध के सर्वथा अमुर को हम ' आसुरब्राह्मण ' प्रकार यह त्वाष्ट्र विश्वरूप भी सीरदेवता ( इन्द्र के सम्बन्ध से ) प्रकाश के अधिष्ठाता है । प्रप्तस्थ प्रकाश का विरोधी है । आन्तरिक्ष्य आपोमूर्ति यह त्वाष्ट्र असुर निरन्तर सार देवताओं पर आक्रमण किया करता है परन्तु पार्थिव विशुद्ध आप्याग्नि के द्वारा लाए हुए सोममय हविद्रव्य से बलवान् बनते हुए देवता इस असुर को मारा करते हैं । ' त्व ज्योतिपातिमा ववर्थ ' ( ऋक् सं ० ) के अनुसार सौर प्राण में निरन्तर आहुत होने वाला सोम हीं प्रकाश का अधिष्ठाता है । पूर्वोक्त प्राप्त्याओं में से युलोकस्थ इन्द्र के साथ तातीय सवना-धिष्ठाता त्रिता श्राप्या का सम्बन्ध होता है, जैसाकि पूर्व में बतलाया जाचुका है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - " शश्वद्ध त्रित एव जघान, यह कहा गया है । बच्य विश्वरूप त्वाष्ट्र के साथ इन्द्र का परिचय आत्त्या के द्वारा ही होता है । सजातीय सम्बन्ध के कारण आत्या ही आपोमूर्ति त्वाष्ट्र का परिचायक है । प्या का हविचल ही ववका कारण है । आप्याग्नि यदि इन्द्र के साथ इवि का सम्बन्ध न कराता, तो विश्वरूप का पता लगना तो दूर था, वह स्वयं ही अपना स्वरूप खो बैठता आल्या के द्वारा आहुति का जाना ही यह सिद्ध करता है कि, आप्त्या ही विश्वरूप को मारने के लिए इन्द्र को प्रेरित करता है । प्रेरित क्या करता है, दूसरे शब्दों में हव्यवाहक होने से वही त्याष्ट्र वध का मुख्य कारण है । यह हम अनेक बार निवेदन कर चुके है कि, वैदिक विज्ञान के अनुसार कोई भी पदार्थ जड़ नहीं है । सबमें अव्ययपुरुष का विदंश प्रतिष्ठित है । इस व्यापक चैतन्यवाद के अनुसार विश्वरूप त्याष्ट्र को भी केवल जड पदार्थ नहीं माना जासकता । इसी आधार पर तो श्रीषधि वनस्पति के एक पत्र ( पसे ) को छिन्न भिन्न करने पर भी सन्तान हिंसा समझती है । ऐसे अवस्था में प्राध्याग्नि के सहयोग से यदि सौर इन्द्रदेवता त्वाष्ट्र विश्वरूप पर श्राक्रमण कर उसे निर्बीर्य्य बना देता है, तो यह व्यापार कैसे हिसाभाव से पृथक किया जासकता है । प्राकृतिक - रहस्य - वेत्ताओं की दृष्टि में अवश्य ही यह कार्य हिंसामय है । त्वाष्ट्र विश्वरूप र पूर्वकथनानुसार ब्राह्मण है । इस हिंसादोष से इन्द्र प्रतिमुक्त होजाता है । कारण, इन्द्र ( सौर-देवता ) दोषों से असङ्ग है । इधर आया पानी के सम्बन्ध से आसक्तिधर्म्मा है । ' श्रद्धा वा आप ' के अनुसार आत्या श्रद्धारस द्वार से युक्त है । अद्धारस यह तत्व है, जो आगत भावों को तत्पदार्थ के साथ संश्लिष्ट कर देता है । ' मेध्या वा आप: ' प्रसिद्ध ही है । इसी मेध्यभाव के कारण उस हिंसादोष का भागी प्राप्त्या देवता ही होता है । अपिच ऐसा होना न्यायप्राप्त भी है कारण, प्राप्या ही तो पूर्वकथनानुसार प्रधानारूप से विश्वरूप के वध का कारण है । एवं - ' हन्ता की अपेक्षा से तत्परिचायक, तत्समर्थक, उत्प्रेरक, एवं प्रधानरूप से तत्सहयोगी के साथ ही विशेषरूप से हत्याका सम्बन्ध होता है " यह धर्मशास्त्र का भी सिद्धान्त है । ७२६
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द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मण तलाया है । पाठकों को स्मरण होगा कि, अपांग्र-श्रु तिने त्वाष्ट्र विश्वरूप को तीन मस्तक हमने वाला अपतत्व को सर्वजगत् का उपादान बतलाया था, जैसाकि जनकर्म्म की विविध उपपत्तियाँ बतलाते हुए है । विश्व का उपादान विश्वरूप त्वाष्ट्र तत्त्व है । अप्-इस प्रकरण में पूर्व भी निवेदन किया जाचुका उपादान तत्त्व बनता है । ऋक् साम - यजुः की समर्थ तत्त्व ही केवल उपादान नहीं हैं, अपितु ब्रह्मगर्भित हैं । वयोनाध हैं । इससे छन्ति यत्- जू ( वाक् - प्राण ) मूर्ति ही ब्रह्म है । इनमें ऋक्साम केवल श्रायतनमात्र में भी जू रूप वाग्भाग ही विश्व का उपादान है । ' सोऽपोऽसृजत यजुः ही विश्व का उपादान है । बजु इस वागू भागसे सर्वप्रथम मैथुनी सृष्टि की कामना से पूर्वोक्त वाच एव लोकान् ' ( श ० ६ | १ | १ | ६ ) के अनुसार है । यही पूर्वोक्त ब्रह्मगर्भितब्रह्म नाम का विश्वोवादभूत अप्तत्त्व उत्पन्न होता है । यह तस्य वेदवाङ्मय विश्वरूप में परिणत होरहा है । इसी आधार पर ' अथ वागवेद शुक्रतत्व है । वाङ मुर्ति यही अपतत्व विश्वा भुवनान्यर्पिता ' इत्यादि श्रौत सिद्धान्त प्रतिष्ठित हैं । सर्वम ' ( ऐ ० श्रा ० ) ' वाचीमा रही अनादिनिधना सत्यावाक् विश्वरूप में परिणत हो श्रवरूप में परिणत होकर ही यह वेदमयी नित्या गया है । वाक् प्राण के बिना अनुपपन्न है, तो प्राण त्रिना है । अतएव अत्रमूर्ति त्वाष्ट्र को विश्वरूप हैं मान । ये लिया तीनों सृष्टि के साधारण अनुबन्ध हैं । कोई भी कार्य, कोई मन के अनुपपन्न है, तीनों अविनाभूत - शक्तिमय मन प्राण वाक् के समन्वय के सम्भव नहीं है । ये ही भी सृष्टि बिना इन ज्ञान- क्रिया- अथ । वाङ मुख से वह ब्रह्मगर्भित शुकस्वरूप विश्वरूप त्वा विश्व तीन तत्त्व विश्वरूप त्वाष्ट्र के तीना मस्तक उपादानानुकूला हैं क्रिया करता है, एवं मनोमुम्ब से तदनुकूल काम का का उपादानकारण बनता है, प्रागामुख मे भी साधन अपेक्षित रहते हैं । परन्तु मनः- प्राण - वाकू तीनों मुख्य उदय होता है । सृष्टिप्रक्रिया में और ओर गया है । अन्य स्थान पर इसे पडक्ष ( छह आँख-हैं । मुखस्थानीय हैं | अतएव उसे ' त्रिवीर्प ' बतलाया । वाला ) भी कहा गया है पाटकौशिक ही उपलब्ध करता है । अपिच-यह अपने आपमें उत्पन्न होने वाली विश्वप्रजा , भेट की से दो दो वृत्तियों का विकास रहता है । सा मनः- प्राण - बाक तीनों में ही सम्भूति, अमम्भूति । इन ६ वृत्तियों से यह सर्वद्रष्टा बना हुआ है । इसलिए भी उसे मे सम्भूति, एवं मुमुन्ना से विनाश होता है अपिच विश्वरूप त्या त्रैलोक्य में प्रतिष्टित होरहा है । भूलोक में ' बडक्ष ' मानना न्यायप्राप्त हो जाता है से । रिक्त नहीं है । तीन स्थानों में यह अपनी व्याप्ति रखता है, इसलिए भी पानी है, एवं द्युलोक भी पानी है । भी इसे ' त्रिशीप ' कहा जासकता । अध्यात्म - परिभाषानुसार इसे ही ' महान ' कहा श्रपिच - वही अपतत्त्व शुक्र है । पारमेष्टय है घन तरल- विग्ल - भेद से अपू - वायु- सोम इनमें जाता है | वह महत्तत्त्वरूप अतत्त्व बनता , किवा है शुक्रतत्त्व । त्रिविध अवस्थापन्न महत् स्वरूप यह तत्त्व ही विदात्मा परिणत होकर ही चिदात्मा की योन का उपादान बनता है । इस की इन तीन अवस्थाओं को लक्ष्य के सम्बन्ध से आध्य - वायव्य - सौम्य जासकता जीवों है । में यकर भी इसे ' त्रिशाप ' कहा त्र्यश्चि — महतस्वरूप इस पारमेष्टय जन्म से आकृति - प्रकृति - अहृतिभाव का कता है । तत्व में ही पृथिवी - चन्द्रमा सूर्य के ' माना दर्शपूर्णमाम जास-होता है, इस भावत्रयी से भी इसे ' त्रिशीर्ष ७३०
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द्वितीयअध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण अपिच - केवल सूर्य के दर्शपूर्णमाम से इस तत्त्व में सत्त्व - रज - तम इन तीन गुणों का उदन होता है, इसलिए भी इसे ' त्रिशीर्ष ' मानने में कोई अपत्ति नहीं है । इसप्रकार मनः - प्राण - वाक्, पृथिवी -अन्तरिक्ष - यौ, -घन - तरल - विरल, - श्राकृति - प्रकृति - अकृति, सत्त्व - रज - तम आदि अनेक प्रकारों सेत्वाष्ट्र विश्वरूप का ' त्रिशीर्ष ' भाव सिद्ध होजाता है । ऋषिको सत्रका ग्रहण अपेक्षित था । अत: नियत शीर्षभाव को आगे न रखते हुए उन्होंने सामान्यरूप से - ' त्रिशीर्षाणं त्वाम् ' यही कहा है । इसी नित्यासिद्ध-विज्ञान का निरूपण करती हुई अति कहती है— ' तऽइन्द्र ेण सह बेरुः- यथेदं ब्राह्मणो राजानमनुचरिति । स यत्र त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रं विश्वरूपं जघान ० " ॥२ ॥ इति ॥
सौरप्राण इन्द्र है, आायातत्त्व वरुण - प्रधान है । अतः उसी के साथ हिंसा दोष का सम्बन्ध होना न्यायप्राप्त है, यह पूर्व में बतलाया जाचुका है । सौरप्राणरूप देवताओं की सम्मति से निश्चित हुआ कि, हिंसाजनित यह दोष उहीं यास्याओं के साथ संक्रान्त हो, जिह्नोंनें त्रिशीर्ष त्वाष्ट्र के वधका समर्थन किया । उस हिंसाजनित पाप्मा का आत्या से सम्बन्ध कराने का क्या प्रकार है?, इस प्रश्न के उपस्थित होने पर यह निर्णय हुआ कि, यज्ञ में जो दूषित भाग है, उसे इहें दे दिया जाय । तात्पर्य यही है कि, हिंसाजनित दोष से ग्राप्त्या का स्वरूप दोषयुक्त होजाता है । शुद्ध आप्या के द्वारा लाए गए हवि से देवता बलवान् बन गए । वारुण त्वाष्ट्र आपोमय असुर मारा गया । मलभाग वारुण श्राप्त्या के साथ सङ कान्त होगया । नित्यसिद्ध प्राकृतिक यज्ञ में रहने वाला पार्थिव मलभाग अन्तरिक्ष्य इह्रीं श्रान्त्यों में प्रतिष्टित रहता है । शुद्ध हवि मौरप्राणदेवताओं में बहुत होजाता है । इसी नित्यसिद्ध प्राकृतिक यज्ञ के अनुसार इस मनुष्ययज्ञ का ' त्रितान ' किया जाता है । तदनुसार ही देवता - स्थानीय ऋत्विक् श्रज्ञसंसृष्ट दूषित पानी को प्यों के लिए ही डालते हैं ॥ ३ ॥
उपर्युक्त दोष का निराकरण करने वाला एकमात्र हविद्रव्य है । हृवि की आहुति से ही अग्नि प्रज्ज्वलित होता है । इसी से देवता बलवान् होते हुए असुरबध में समर्थ होते हैं । जिस यजमान का हवि पर पूर्ण स्वत्त्व रहता है, वही इस दोष को श्राप्त्या के ऊपर डालने में समर्थ होता है । इस इवि को स्वाधिकार में रखने के लिए दक्षिणादान आवश्यक है । क्योंकि, हवि में यज्ञकारथिता - होता, श्रध्वर्यु, उड़गाता, ब्रह्मा, इन चारों ऋत्विजों का मनःप्राणवाङमय ग्रात्मा भी सम्मिलित रहता है । इनके आत्म-प्रवेश से ह ि पर यजमान का पूर्ण अधिकार नहीं होता । ऐसी अवस्था में हवि निर्बल बनता हुआ दोष-मार्जन में असमर्थ रहता है । इसलिए प्रत्येक यज्ञ मे दक्षिणा * प्रदान नितान्त अपेक्षित है । अपिच हवि को कूटन, पीसने, पकाने में जो हिंसा होती है, उसे दूर करने का उपाय भी यही दक्षिणाद्रव्य है । बिना * प्रकरण आवश्यकता से अधिक विस्तृत होगया है, अतः प्रकृत में दक्षिणा - विज्ञान का निरूपण नहीं किया जासकता । आगे आने वाले ' दक्षिणा ब्राह्मण ' में ही इस विषय का तात्त्विक विश्लेषण किया नायगा ।
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द्वितीय अध्याय प्रथमका एड तृतीयब्राह्मण दक्षिणा के यज्ञ नष्ट है । निष्कर्ष यही हुआ कि, जो यजमान स्त्रयज्ञ में दक्षिणा नहीं देता, उसका हवि सर्वा-त्मना उसके अधिकार में न रहता हुआ निर्बल बन जाता है । ऐसी अवस्था में आयों में रहने याला दोष यज्ञकर्त्ता यजमान के साथ संक्रान्त होजाता है । इस दोष से बचने के लिए अवश्य ही दक्षिणाटान करना चाहिए । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर - ' त उ तेऽऊचुः । उएनो गच्छन्तुः ' इत्यादि कहा है || ४,५३ अध्यात्म- अधिभूत- अधिदैवत - अध्यात्माधिभूत - अध्यात्माधिदैवतादि - भेट भिन्न आठ भागों में विभक्त आख्यानोपाख्यानों में से प्रकृत का ' आत्योपाख्यान ' ' अध्यात्माधिभूतादिदैवत ' नाम के आख्यान से सम्बन्ध रखता है | अधिदैवतमण्डल के साथ भी इस आख्यान का सम्बन्ध है । अत्रतक के प्रकरण से केवल उसी का स्वरूप विज्ञ पाठकों के समक्ष उपस्थित किया गया है । अध्यात्मसंस्था के साथ भी इस आख्यान का घनिष्ठ सम्बन्ध है, एवं आधिभौतिक ( ऐतिहासिक ) प्रपञ्च से भी इसका सम्बन्ध है । इनमें क्रमप्राप्त आध्यात्मिक सम्बन्धी प्रात्याविज्ञान की ओर ही आपका ध्यान आकर्षित किया जाता है । आध्यात्मिक -- आप्त्याविज्ञान ' तासां त्रिवृनं त्रिवृतमेकैकां करवाणि ' ( छा ० उ ० ६३ ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार- तेज, अप ू , अन्न, इन तीन तस्त्रों के त्रिवृत्करण से ही अध्यात्मसंस्था का निर्माण हुआ है । शेष भूतप्रपञ्च, एवं आत्मप्रपञ्च का इह्रीं तीनों में अन्तर्भाव होजाता है । अक्षरात्ममक्षरपरात्परविशिष्ट षोडकल अमृतात्मा चिदा-त्मा है । इसकी योनि ' पारमेष्ठ्य महानात्मा ' है । यह महान् आपोमय ' ' है । अपतत्त्व की अ वायु, सोम, तीन अवस्थाएँ हैं । इह्रीं तीन तत्त्वों के साथ उपयुक्त चिदात्मा का सम्बन्ध होता है । अतः विश्व में केवल - आप्य, वायव्य, सौम्य, मेदभिन्न तीन हीं चेतनजीव उपलब्ध होते हैं । इसप्रकार अमृतात्मा ( चिदात्मा ) का पतत्त्व में ( भृगुभाग में ) श्रन्तर्भाव होजाता है । ६६ संख्या में विभक्त आध्यप्राण असुर हैं, २७ संख्या में विभक्त वायव्य प्राण गन्धर्व हैं, ८ संख्या में विभक्त सौम्य प्रारण पितर हैं । इन तीनों का अन्तर्भाव भी इसी प्रपतत्त्व में हैं । ' त्रय्या विद्यया सहापः प्राविशन् ( श ० ६६ ११५ । ) के अनुसार ऋक्सामार्वाच्छन्न ‘ ऋषि ' नामाख्य यजुर्मूर्त्ति त्रयीब्रह्म भी इसी अप्नत्त्व में प्रविष्ट रहता है | श्रुतः १२ संख्या में विभक्त ऋषिप्राणों का भी तत्त्व में हीं अन्तर्भाव होजाता है । आगे बतलाए जाने वाली तेजः कला, एवं अनकला का मी इसी तत्त्व में अन्तर्भाव होजाता है । क्योंकि तेजोमूर्ति सूर्य्य अपतत्त्वान्तर्गत अङ्गिराभाग की विरलावस्था का ही विकासमात्र है, एवं अन्नमयी पृथिवी ' अद्भ्यः पृथिवी ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार श्रापोमयी ही है । ' यत् किञ्च जगत्यां जगत तन् सर्वमप्सु प्रतिष्ठितम् ' यह प्राप्त सिद्धान्त चरितार्थ होजाता है । सबका इस श्रापोमय तत्त्व में बीजरूप से अन्तर्भाव है । अतएव ऋषियोंनें इस तत्त्व को प्रज्ञान, विज्ञान, भूतात्मा, कम्र्मात्मा, आदि सत्र की अपेक्षा ' महानात्मा ' ( ( बहुत बडा आत्मा ) माना है । यही इस महान् की महत्ता है । जिस महान के उदर में - विश्वव्यापक घोदशी प्रजापति भी ' गर्भी ' बन रहा हो, उसकी महत्ता का क्या ठिकाना है । इसीप्रकार रस - श्रसृक् - कफ - लाला - स्वेद आदि श्रब्भागों का भी इसी तत्त्व में अन्तर्भाव है | शरीरसंस्था के अध्यक्ष प्राणतत्त्व का भी इसी अप्तस्व में अन्तर्भाव है । ' आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्व-७३२
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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण ङ्गिरोमयम् ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार अङ्गिरा भी आपोमय है । अङ्गिरा की अग्नि वायु - श्रादित्य तीन अवस्थाएँ हैं । अग्नितत्त्व से वागिन्द्रिय का विकास होता है, वायुतत्त्व से प्राणेन्द्रिय का त्रिकाम होता है, आदित्यतत्त्व से अतुरिन्द्रिय का विकास होता है । भृगु की विरलावस्थारूप सोम दिक-भारवर भेद से दो भागों में विभक्त है । भातर सोम ' इन्दु ' नाम से व्यवहृत होता है, एवं दिक्सोम ' ब्रह्मणस्पति नाम से प्रसिद्ध है । इनमें से दिक्सोम से श्रोत्रेन्द्रिय का निर्माण होता है, एव भास्वरसोम से इन्द्रियमन की स्वरूप - निष्पत्ति होती है । इसप्रकार षोडशी आत्मा, ऋषि, पितर, गन्धर्व, असुर, पचेन्द्रिय, शरीरगत तरलद्रव्य इन सबका उपयुक्त तत्त्व में अन्तर्भाव होज।ता है | तेज - अन्न- आपः तीनों में प्रधानता अप्तत्त्व की ही है । इसी भूयस्त्वविज्ञान को लक्ष्य में रखकर " च्या-त्मकत्त्वात्तु भूयत्त्वात् " ( शा ० द ० १२ ) इस भिक्षुसूत्र के सम्बन्ध में यह कहा जासकता है कि – 6 “ वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचमो भवन्ति 1 । ( लां ० ५।३ बृ ० आ ० उ ० ६ २ ) इति प्रश्ने पर्जन्य पृथ्वी पुरुप योषित्सु पञ्चस्वग्निषु श्रद्धा सोमवृष्टयन्नरेतो -रूपाः पञ्चाहुतीदर्शयिच्चा x x इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ” ( छा ० उ ० ५६ ) इति निरूप्यते । -- नन्त्रपां पुरुषाकार परिणामत्रतीते-गच्छता जावेन तासामेव परिष्वङ्गः प्राप्नोति न सर्वेषां भूतसूक्ष्माणामिति चेन्न - पु -पुरुष-देहारम्भकारणामपां व्यात्मकत्वात् तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणि ( छा ० उ ० ६।३ ) इत्यषां त्रिनृत्करणश्रुतेः । दृश्यते च देहः सार्वभौतिकः । त्रयाणामपि तेजोऽव -नानां देहे कार्योपलब्धेः । देह।रम्भकद्रव्यस्य सार्वभौतिकत्वेऽपि तस्याप्यदेन व्यपदेशस्त्वपा भूयस्त्वादुपपद्यते । शुक्रशोणितलक्षणे देहबीजे द्रवद्रव्यबाहुल्यदर्शनात् । उत्पन्ने च शरीरे इतरभृतापेक्षयाऽस्त्यपामेव बाहुल्यम् | बाहुल्याच्चाप्श - देन सर्वेषां भूतहृदमाणा-मुपादानम् ” । दूसरा है तेजस्तत्त्व । बिंज्ञानात्मा, ३३ देवता, आदि का इसी में अन्तर्भाव है । सौरतत्त्व ' तेज ' है । यह इन्द्रप्राणमय है । वही विज्ञान ( बुद्धि ) का अधिष्ठाता है, जैमाकि " धियो यो नः प्रचोदयात " इत्यादि से स्पष्ट है | एवं इन्द्रप्राण ही देवप्राण का अधिष्ठाता है । इसी आधार पर - ' इन्द्रः सर्वा देवताः ' -' चित्रं देवानामुद्गान् ' इत्यादि कहा जाता है । तीसरी है अन्नकला । शरीरगत स्थूलधातु, मन ( प्रज्ञाना-त्मा ), आदि का इसी में अन्तभाव है । १ तेजस्तत्त्व वाङ्मय था, २ अन्नतत्त्व मनोमय है । एवं ३ अपतत्त्व प्राणमय है । १ – तेजोमयी वाक् ( छा ० उ ० ) २ – अन्नमयं हि सौम्य मनः ( छा ० उ ० ) ३ – पोमयः प्राण: ( छा ० उ ० ) ७३३
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द्वितीयअध्याय १ -- श्राप: - प्राणः २ -- अन्नम् — मनः ३- तेजः -- वाक् प्रथमकाण्ड - " स वा एष श्रात्मा वाङ् मयः प्राणमयो मनोमय: --( बृ ० आ ० उ ० ) । तृतीयत्राभरण... शरीर आपोमय है । ' प्राणाग्नय एवैतस्मिन् पुरे जागर्ति ' ( प्र ० उ ० ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार इस श्रापोमय शरीर में प्राणाग्नि सदा जाग्रत रहता है । अपतत्त्व में व्याप्त प्राणाग्नि हीं आध्या-त्मिक ‘ आप्त्या ' देवता है | यह प्राणाग्नि बस्तिगुहा - उदरगुहा - उरो गुहा भेद से तीन स्थानों में व्याप्त हो-रहा है । आधिदैविक —– स्तौम्यत्रिलोकी के अग्निमय त्रिवृत् पृथिवी - भाग से बस्तिगुहा का निर्माण होता है । यहाँ प्रतिष्ठित रहने वाला पार्थिवाग्नि ' पान ' नाम से व्ययहृत होता है । वायुमय पञ्चदश अन्तरिक्ष से उदरगुहा का निर्माण होता है । यहाँ प्रतिष्ठित रहने वाला अन्तरिक्ष्य प्राणाग्नि ' व्यान ' नाम से प्रसिद्ध है | एवं आदित्यमय एकविंश द्युलोक से उरोगुहा का निर्माण होता है । यहाँ प्रतिष्ठित रहने वाला प्राणाग्नि ' प्राण ' नाम से व्यवहृत होता है । एक ही पार्थिव प्राणाग्नि की अपान - व्यान- प्राण, ये तीन अवस्थाएँ हैं । ये ही तीनों आध्यात्मिक- ' एकता, द्विता त्रिता ' नाम के आप्त्या देवता हैं विदैविक विज्ञान का निरूपण करते हुए, हम बतला आए हैं कि, विश्वरूप त्वाष्ट्र आपोमय ही है । तत्त्व ही मैथुनी सृष्टि का मूलप्रभव है । इस विश्वबन्धमूलक तत्त्व के बन्धन से निकलने का एकमात्र उपाय है- पूर्वोक्त ' त्रिता ' नाम के आत्या से युक्त प्रज्ञान को विज्ञानात्मा के अनुगत कर देना । प्रज्ञानमन प्राणाग्निमय है । त्रिताग्नि की कृपा से ही मनकी स्वरूप निष्पत्ति होती है । कारण स्पष्ट है । शारीरिक प्राणाग्नि हीं ' अशनाया ' रूप में परिणत होकर अन्नादान की इच्छा करता है । अन्न प्राणाग्नि में आहुत होता है । प्राणाग्नि में हुत अन्न ' ऊर्क ' रूप में परिणत होता हुआ रस - मल के क्रमिक विशकलन से शुद्ध सोमरूप में आता हुआ वही अन्नरस ‘ मन ' बनता है । ऐसी अवस्था में हम मन को अवश्य ही प्राणाग्नि पर प्रतिष्ठित मान सकते हैं । दूसरे शब्दों में ' त्रिताग्नि ' ही मन का निर्माता है । अतएव मन को ' अग्नि ' भी कहा जाता है । ( देखिए शत ० १० १ २ ३ ) | आत्याग्निमय होने से ही मन में अतिधर्म का समावेश होता है । इसी श्राप्त्यादेवतामूलक मन के श्राप्तिधर्म को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-" मनसा वा इद सर्वमाप्तम् ( शत ० १ | ७ | ४ | २२ ) इति । इससे प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि, इस आध्यात्मिक विश्व में आप्त्यादेवता - आप्याग्नि-मय प्रज्ञानमन ही है । यह मन मध्यस्थ है । इसकी दृष्टि - विश्वरूप त्वाष्ट्र की ओर भी है, एवं बन्धनविमोक करने वाले सौर इन्द्रमय विज्ञानात्मा की ओर भी है । आपको यह ध्यान रहना चाहिए कि, मनुष्य की वृत्ति यज्ञ - श्रयज्ञ, भेद से दो भागों में विभक्त रहती है । प्रकृति के अनुकूल विज्ञानबुद्धि के आधार पर जो कर्म्म किए जाते हैं, ' यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म्म ' इस मौत सिद्धान्त के अनुसार वह कर्म्म श्रेष्ठतम कम है । यही क यज्ञकर्म्म है । ऐसा कर्म्म सर्वथा आसक्तिशून्य होता है । क्योंकि प्रकृति के अनुसार व्यवस्थित होता हुआ । यह कर्म्म ' नियतकर्म्म ' बनता हुआ आत्मार्थ बन जाता है । इसी यज्ञकर्म्म का निरूपण करते हुए " यज्ञार्थान कर्म्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्म्मबन्धनः " ( गीता ० ) यह कहा जाता है । ७३४