Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 471–480

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 471–480

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द्वितीयध्याय निष्कर्ष है । अधिभूतसम्बन्धी - आप्त्या विज्ञान-तृतीया शतपथब्राह्मण ७३५ परन्तु उक्त यज्ञकर्म्म की सिद्धि तभी होती है, जत्रा के आत्यारूप प्रज्ञानमन विज्ञान से अनुगत रहता है | विज्ञान सौर इन्द्रमय है, प्रज्ञान पार्थिवेन्द्रमय है । प्रज्ञान में प्रज्ञा - प्राण, दो भाग हैं । इनमें प्रज्ञाभाग सोम है, प्राणभाग इन्द्र है । प्रज्ञासोम स्नेहतत्त्व है । उधर विश्व स्नेहमूलक है । इस म्नेहवृत्ति के कारण हीं तो मन ग्रासक्तिमूलक विश्व की ओर झुका रहता है । उधर इन्द्रप्राण अस है । इसका सौर इन्द्र के साथ सम्बन्ध रहता है । अतएव प्राणापेक्षमा प्रज्ञान विज्ञान की ओर झुकता हुआ बन्धन से पृथक होने की भी इच्छा किया करता है । परन्तु हम पार्थिव हैं । सूर्य हमसे दूर पड़ता है । अतएव प्रकृत्या प्रज्ञान का प्रज्ञाभाग हमारे में प्रचल रहता है । अतएव तन्मूलक आसक्तिभाव हमारे में प्रधान रहता है, एवं इन्द्रप्राण निर्बल रहता है । इसप्रकार विज्ञान से विरहित प्रज्ञान उत्तरोतर कामनाओं के कुचक्र में श्राबद्ध होकर विश्व की सुरी विभूतियों की ओर अग्रेसर होता रहता है । यही ' प्रज्ञापराव ' कहलाता है । प्रकृति -विरुद्ध कर्म करना यज्ञियकर्म है । इससे वासना - संस्कार दृढ होजाता है । विश्वरूप त्वाष्ट्र का बल बढ़ जाता है । यदि यज्ञकर्म्म को अपना लिया जाता है, तो - प्रज्ञान विज्ञान से अनुगत हुआ विश्वबन्धन को छिन्नभिन्न करने में समर्थ होजाता है । इसप्रकार यज्ञकर्म्म ( निवृत्तिकर्म्म - निष्कामकर्म्म ) के द्वारा सबल बनता हुआ प्रज्ञान विज्ञानेन्द्र के साथ विचरता हुया आसुरभाव के वध का कारण बन जाता है । यद्याप – ' ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात कुरुते ' इम स्मार्त्त सिद्धान्त के अनुसार बिज्ञानात्मा ( बुद्धि ) को मलभाग का नाशक माना जाता है | परन्तु विज्ञान आसुर भाव का नाश नहीं करता । प्रज्ञान हीं आसुर भाव को नष्ट करने में समर्थ होता है । मनोनिरोध ही दूषित वृत्तियों को नष्ट कर सकता है । आप बहुत बुद्धिमान् हैं । परन्तु मन पर यदि अधिकार नहीं है, तो एकाकी विज्ञान कुछ भी नही कर सकता । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर – ' मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो: ' इत्यादि रूप से मन को ही बन्धन, और मुक्ति, दोनों का कारण माना जाता है । हाँ, बन्धनविमोक के लिए विज्ञान का साथ रहना नितान्त अपेक्षित है । विज्ञानबल से प्रज्ञान का बन्धनमूलक प्रज्ञाभाग श्रश्र होजाता है, एवं मुक्तिमूलक प्रारणभाग सबल बन जाता है । इसी सम्पूर्ण आध्यात्मिक चरित्र को लक्ष्य में रख कर ऋषिनं प्रजानरूप प्रात्या को विश्वरूप असुर के वध का कारण माना है, एवं सौरविज्ञानेन्द्र को इस हिंसादीन से प्रतिमुक्त माना । इसी आधार पर विज्ञानात्मा के लिए-' असङ्गो ह्ययं पुरुषो न सज्जते, न व्यथते, न रिष्यति ' ( बृ ० ग्रा ० ) इत्यादि कहा जाता है । प्रज्ञानमन से कामना का उदय होता है, तद्गत प्राण से विक्षेप का जन्म होजाता है, एवं तत्प्रतिष्ठ वाक्तत्त्व आवरण का जनक है | काम - विक्षेप - आवरण हीं विश्वरूप त्वाष्ट्र के विश्व का सञ्चालन करने वाले मुख्य साधन हैं । मुस्थानीया ये ही तीनों वृत्तियाँ इसके तीन मस्तक हैं । बुद्धिमान् मनुष्य का कर्त्तव्य है कि, " वह निष्कामकर्म के द्वारा प्रज्ञानमन को विज्ञान से अनुगत करता हुआ काम - विक्षेप - आवरण-मूलक त्या सुरभाव को न करता रहै " श्रध्यात्मसम्बन्धी आत्याचरित्र का यही संक्षिप्ततम विज्ञानभाष्य के पूर्वसन्दर्भों में अष्टविध देवताओं का स्वरूप चतलाते हुए हमनें भौमस्वर्ग का दिग्दर्शन कराया था । वहाँ बतलाया गया था कि, यज्ञ - ऋषि - देवगन्धर्व - असुर आदि भेदभिन्ना जो

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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पत्राह्मण ब्यवस्था आधिदैविकजगन में है, ठीक वही व्यवस्था भगवान् भौम - ब्रह्मा के द्वारा इस भूलोक में भी विद्यमान थी । उस युग में- ' यदेवेह तद्मुत्र ' यह सिद्धान्त सर्वात्मना चरितार्थ होरहा था । स्वर्ग के अध्यक्ष इन्द्र थे, अन्तरिक्ष के वायु थे । भूलोक के अग्नि थे । यहाँ के सम्राट् तो मनु थे, एवं ' शत्रसोनपात्( इन्द्र के प्रतिनिधि ) अग्नि थे । स्वर्णाधिष्ठाता इन्द्रविभ्राट् की ओर से भारतवर्ष की देखरेख के लिए अग्नि ही नियत थे । किसे भारतवर्ष का शव सोनपात बनाया जाय?, देवमण्डली में जब यह प्रश्न उपस्थित हुआ, तो सर्वसम्मति से निर्णय हुआ कि, अग्निजातीय देवता ही इस कार्य के लिए उपयुक्त हैं । उन का यह निर्णय प्रकृति के अनुकूल भी था । क्योकि -'अग्निर्भूस्थान: ' इस प्राप्त सिद्धान्त के अनुसार इस भूलोक के अधिष्ठाता अग्नि ही हैं । पार्थिव प्रजा का भरण - पोषण करना, पार्थिव हव्य को सौर दिव्य देवताओं में पहुँचाना [ जिसका कि स्वरूप पूर्व के आत्याविज्ञान में बतलाया जाचुका है ], ये सब इसी अग्नि के काय्यं हैं । अतएव वैधयज्ञ के द्वारा तदात्मभूत ' मनुष्य अग्नि ' को ही उपयुक्त कार्य के लिए नियुक्त करना उचित था । अग्निजातीय देवताओं में से जब एक को कहा गया, तो उसने अम्वीकृत कर दिया । यही दूसरे ने किया । तीसरे से कहा गया, तो वह छुप गया । इन्द्र ने उसे ढूंढ कर इस कार्य के लिए बाध्य किया । उस समय भारतवर्ष पर -स्वष्टा के पुत्र त्रि.ीर्ष - पडत विश्वरूप के आक्रमण हुआ करते थे । इन्द्र दूर रहते थे । अतएव वे इसके गुप्त श्राक्रमगों से अपरिचित थे । परन्तु भारताग्नि इस रहस्य से परिचित थे । अतः इनकी सहायता से ही इन्द्र विश्वरूप को मारने में समर्थ हुए थे । ग्रान्त्या देवता - सम्बन्धी आधिभौतिक [ ऐतिहासिक ] चरित्र का यही संक्षिप्त निदर्शन है । त्रिशीर्ष पद त्वाष्ट्र कहाँ रहता था?, उसका आक्रमण भारतवर्ष पर क्यों होता था?, इत्यादि प्रश्नों का समाधान आगे आने वाले दर्शष्टिविज्ञान में किया जायगा । अभी विस्तार-भय से इस ' आप्त्या विज्ञान ' प्रकरण को अत्रैव उपरत किया जारहा है । इति आप्त्या विज्ञानम् पश्वालम्भन विज्ञानम् चिना पशु के कोई भी यज्ञ निष्पन्न नहीं होसकता । इस दर्शपूर्णमासयज्ञ में भी पशु की आवश्य--कता है | पञ्चम - कण्डिका से आगे का ब्राह्मणभाग उसी पशुतत्व का निरूपण करता है । वैदिक विज्ञान से पूर्ण परिचय प्राप्त न करने के कारण आज विद्वत् -- समाज में कितने हीं विषयों पर व्यर्थ का कलह देखा * | यह एक ' पदविशेष ' का वाचक है । सम्राट की ओर से तदधीन राष्ट्रों में जो प्रतिनिधि रहता है, उसीके लिए ' शत्रसोनपात् ' शब्द प्रयुक्त होता है । आज की भाषा में सम्भवतः यही – ' प्रति-निधि ' - ' राजदूत ' कहलाया है । अग्नि इन्द्र की ओर से भारत में इसी पदविशेष पर प्रतिष्ठित थे, जैसाकि ---' अग्नि दृतं वृणीमहे ' इत्यादि से सतित है । ७३६

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण मुना जाता है | क्या सनातनधर्मी, क्या आर्यसमाजी, एवं क्या अन्य सम्प्रदायवादी, सभी अभि-निवेश से आक्रान्त होकर व्यर्थ के विवादों से कलिसमुन्नतिमूलक कलह का ही बीजारोपण कर रहे हैं । फलतः देश की संघटनशक्ति प्रतिदिन उत्तरोत्तर क्षीण ही होती जारही है । क्या ही उत्तम हो, यदि सभी वर्ग अज्ञान-मूलक इन क्षुद्र विसंवादों को छोड़ कर ऐकमत्य होकर राष्ट्र को समुन्नत करने का यश प्राप्त करें । सभी सम्प्रदायों के लिए ' वैदिकसाहित्य ' आराध्यदेव है । सभी स्वमतपोषण के लिए वेद को ही आगे रखते हैं । फिर क्या कारण है कि, एक ही प्रमाणभित्ति के आधार पर प्रतिष्ठित विद्वत् समाज में परस्पर मतभेद हो-रहा है? | हमारी साधारण बुद्धि जहाँतक विचार करती हैं, उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि, वेद के क्रमिक स्वाध्याय का अभाव ही इस विसंवाद का मुख्य कारण है । हम आज की प्रवृत्ति देखते हुए इसी निश्चय पर पहुँचते हैं कि, विद्वद्गण स्व स्व विषय को सिद्ध करने के लिए ' कहीं का ईट - कहीं का रोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा ' इस किंवदन्ती को ही चरितार्थ कर रहे हैं । प्रकरण पर कोई ध्यान नहीं, शब्दों के तात्पर्य्यार्थ का कोई विचार नहीं, जहाँ एक शब्द भी अपनी ओर झुकता हुआ मिला, तत्काल वह प्रमाणरूप से आगे कर दिया जाता है । " श्राद्ध, मूर्तिपूजन, वेद ईश्वर प्रणीत हैं. ब्राह्मणभाग वेद नहीं है केवल संहितामात्र ही वेद है, वेद में पश्वालम्भन से पशु स्पर्शमात्र विहित है । वेद में विधवा के साथ देवर के नियोग का विधान है ", ऐसे ऐसे विषयों को लेकर सब प्रमाणधारी अपनी अपनी महत्ता प्रकट कर रहे हैं । इन सब विप्रतिपत्तियों से एक तटस्थ निशा का किसी निश्चित निर्णय पर पहुँचना कठिन होरहा है । यही कठिनता हमारे सुप्रसिद्ध ' पश्वालम्भन ' के सम्बन्ध में भी विद्यमान है । यह विषय सभी की दृष्टि में आज महाभयावह बन रहा है । जिज्ञासा करने पर भी विद्वान् इस ओर से अपना निश्चित निर्णय अभिव्यक्त कर देने में कुण्ठित से होजाते हैं । इसलि र हम यह आवश्यक समझते हैं कि, इस विषय पर विशेषरूप से प्रकाश डाला जाय । तदर्थं हो निम्नलिखित पश्वालम्भनसम्बन्धी सन्दर्भ उपकान्त होरहा है । “ ईश्वरीय सृष्टि में जो स्थान हमारा ( मानवजाति का ) है, वही स्थान पशुवर्ग का है । हम में जैसे चेतना का विकास है, वैसे ही पशु भी चेतन ( ससंज्ञ ) जीव ही हैं । ऐसी अवस्था में मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए चेतन दृष्या सजातीय पशु का वध करै, यह मनुष्यता के विरुद्ध है । ' किमी प्राणी को दुःख मन दो ' ( मा हिंस्यात् - सर्वा भूतानि ) यह हमारे शास्त्रों की ही आज्ञा है । यद्यपि कितने हीं महानुभाव पशुवध को ( यज्ञसिद्धि के लिए ) शास्त्रसम्मत बतलाने हैं । परन्तु उहें यह ध्यान रखना चाहिए कि, एक ही शास्त्र दो विरुद्ध श्रज्ञाएँ नहीं देसकता । जो शास्त्र एक स्थान पर –'मा हिंम्यात् सर्वा भूतानि ' - ' मा गामनागादिति वधिष्ट ' इत्यादिरूप से स्पष्ट शब्दों में सर्वत्र ' हिंसा बुद्धि ' रखने का आदेश देता है, वही दूसरे स्थान पर पशुवध की आज्ञा दे, यह असङ्गत, अतएव सम्भव है । एक विषय में एक ही न्यायाध्यक्ष दो विभिन्न निर्णय नहीं कर सकता, यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है । ७३७

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द्वितीय अध्याय यद थोड़ी देर के लिए अभ्युपगमवाद से तो एसी अवस्था में उन प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मण हम यज्ञ ' पशुवध ' आवश्यक मानलेते हैं, को हिंसा से रोकने का हमारे प्रज्ञाकोश में क्या समाधान शेष रह जाता है । ' द्वारा आए दिन असंख्य मूक पशु तलवार के घाट उतार दिए जाते हैं । हम चीत्कार करते ही रह जाते हैं । पशुवध - सिद्धान्त को मानते हुए यदि हम वह इस व्यर्थ की हिंसा को रोकने की प्रेरणा देते हैं, तो हमारा यह प्रयास व्यर्थ जाता है । जब हमारा शास्त्र स्वयं श्राद्ध - यज्ञादि में पशुवध को आवश्यक समझता है, तो फिर अन्य सम्प्रदायवालों के ' शरअ ' ( शास्त्र ) 1 के विरुद्ध हम कैसे आवाज उठा सकते हैं । जैसे हमारा शास्त्र पशुबलि की श्राज्ञां देता है, एवमेव बे........... भी शरत्र की श्राज्ञानुसार ' करने के पूर्ण अधिकारी हैं । इसप्रकार कल्पित पशुवध के अभिनिवेश में पड़कर हम एकप्रकार से अन्य सम्प्रदायों के द्वारा होने वाली पशुहिंसा के समर्थक ही बन जाते हैं । कहना न होगा कि, इस दुराग्रह से राष्ट्र का पशुबल क्षीण ही होरहा है । इस विप्रतिपत्ति से बचने का एकमात्र उपाय है - पशुवध -सम्बन्धी प्रक्षिप्त वचनों का परित्याग एवं ' मा हिम्बात् सर्वा भूतानि ' इत्यादि वास्तविक सिद्धा-न्तों का ग्रहण । स्वाथियोंनं स्वार्थवश ही पशुवध समर्थक वचनों से शास्त्र को कलङ्कत कर रक्खा है । ' जिस पशु का यज्ञ में वध किया जाता है, वह मरता नहीं, अपितु सीधा स्वर्ग जाता है ' इत्यादि हेत्वाभासों के द्वारा पशुवधममर्थक सम्भवतः पशु का ही हित सिद्ध करते हैं । परन्तु ऐसे उत्तरों का शिक्षित समाज की दृष्टि में कोई मूल्य नहीं । हमें यह मान लेने में कोई भी आपत्ति नहीं है कि, पशुवध - मानवता, शास्त्र आदि सभी दृष्टियों से विरुद्ध है । यदि एतत्समर्थक वचन कहीं उपलब्ध होते हैं, तो उन्हें प्रक्षिप्त ही समझना चाहिये ” । यह है पश्वालम्भन के सम्बन्ध में निर्णेताओं का निर्णय । उक्त पक्तियाँ वास्तव में ' चारु - वाक ' है । ऐसे सुन्दरभाव किसे प्रिय न लगेंगे । ' किसी प्राणी को कष्ट मत पहुँचाओ ' यह शास्त्र का बड़ा उदात सिद्धान्त है | परन्तु अवधानपूर्वक सूक्ष्मदृष्टि से देखिए, क्या आपको इस सामान्य सिद्धान्त का कहीं अपवाद नहीं मिलता? | जिस व्यक्ति ने चोरी से समाज में अशान्ति उत्पन्न कर रक्खी है, जो समाज का बोर शत्रु • है, उसके बघ को क्या ग्राप ' पुण्यप्रद ' नही समझेगे? | यदि सिंह ने ग्राम में उत्पात मचा रखा है, तो उसे मारना क्या धम्म होगा? | आपके मतानुसार शास्त्र तो अहिंसा के विरुद्ध आज्ञा दे नहीं सकता । सर्वत्र ' माहियात सर्वा भूतानि ' ही रहेगा । क्यों?, ठीक है न? । इसी आधार हम कह सकते हैं कि, शास्त्रीय वचनों का जबतक मीमांसा - शास्त्र के द्वारा नियत-हेतुता - अमर - प्रमङ्ग - उपोद्घात काय्यैक्य निर्वाहकैक्य आदि मूला सङ्गतियों के द्वारा यथावत् सम-न्वय नहीं कर लिया जाता, तबतक तत्सम्बन्ध में बिना सोचे समझे अपना मनमाना निर्णय प्रकट करना व्यर्थ का साहसमात्र ही है | मदा – ' धर्मस्य सूक्ष्मा गतिः ' इस सिद्धान्त को सम्मुख रखते हुए ही शास्त्रीय-७३८

पृष्ठ 475

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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण प्राङ्गगा में प्रवेश करना चाहिए । उदाहरणार्थ पहिले हम हिंसा - श्रहिंसा के पदार्थत्त्व की ओर ही आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । किसी जीव को किसी भी प्रकार से पीड़ा पहुँचाना हिंसा है, एवं सर्वात्मना उसे संतुष्ट रखना अहिंसा भाव है । शास्त्र का सिद्धान्त है, कि हिंसा से प्रत्यवाय होता है, एवं श्रहिंसाधर्म-परिपालन से आत्मा का अभ्युदय होता है । हिंसा पाप का कारण है, एवं अहिंसा पुण्य का कारण है । हम आपसे शास्त्रीय - मवदा को थोड़ी देर के लिए दूर रखते हुए प्रश्न करते हैं कि – “ हिंसा से पाप होता है, एवं हिंसा से पुण्य होता है ", दूसरे शब्दों में- " हिंसा से हिंसक का आत्मा पनि हो जाता है, एवं हिंसा से श्रात्मा उन्नत होजाता है, " इसके लिए आपके प्रज्ञाकोश में क्या प्रमाण है? | किसी मनुष्य के आपने चाकू से बृण ( घात्र ) कर दिया । यही हिंसा हुई । इससे उसे दुःख भी बहुत हुआ । यहाँतक तो आपका अनुभव भी काम करेगा । परन्तु " इस दुःख से पाप होगा " यह आप कथ-म सिद्ध नहीं कर सकेंगे । एवमेव किसी भूखे को आपने अन्न से तृप्त कर दिया । बिना अन्न के उसका प्रज्ञानात्मा व्याकुल था । अन्न की प्राप्ति से वह सुखी होगया । " इस सुख से आपको पुण्य हुआ ”, इसके लिए भी आप प्रत्यक्ष, अनुमान -भेदभिन्न कोई भी प्रमाण उपस्थित नहीं कर सकेंगे । आप कहते हैं— " दुःख - सुख - पाप - पुण्य के कारण हैं " । ठीक इसके विपरीत हम कहते हैं— " यदि किसी को दुःखी किया जाता है, तो पुण्य होता है । एवं सुखी किया जाता है, तो पाप लगना है " । हमारा विचार ही नहीं, अपितु यह दृढ निश्चय है कि, शब्दप्रमाण के अतिरिक्त अन्यान्य उत्तर-सहस्रों से भी आप यह सिद्ध नहीं कर सकेंगे कि, हिंसा से पाप होता है, एवं अहिंसा से पुण्य होता है । कारण स्पष्ट है । पाप, और पुण्य का सम्बन्ध मुसूक्ष्म अतीन्द्रिय आत्मा के साथ है । अतएव यह इन्द्रियातीत तत्त्व है । अतीन्द्रियार्थद्रष्टा आत्मपुरुषोंने इस सम्बन्ध में जो व्यवस्था करदी है, वही हमारे लिए मान्य है । मनुष्य अनृतसंहित है । परन्तु देवतुल्य श्राप्तपुरुष ' सत्यसंहिता वै देवाः ' के अनुसार सत्यसंहित हैं । उनका वचन हीं हमारे लिए प्रमाण है । किस कर्म में हिंसा है?, किस में अहिंसा है?, कौन ' वर्म्म है?, इन सत्र अतीन्द्रिय भावों का निर्णय हम साधारण मनुष्य नहीं करसकते । अपने बुद्धिबल के आधार पर प्रत्येक विषय का निर्णय कर बैठना अनुचित है । भगवान् कृष्ण ' तपुरुष थे । साक्षात् सच्चिदानन्दब्रह्म थे | उनकी वाणी पर न उस समय सन्देह था, न श्रार्य - सन्तान आज उनके आदेश के विरुद्ध भोलती । वे स्वयं सच्चिदानन्द भी शास्त्रमर्यादा को ही धम्र्म्माधर्मनिर्णय में प्रधान मानते हैं । हमारे लिए क्या कर्त्ता -व्य है?, क्या कर्त्तव्य है?, इसका निर्णय कैसे किया जाय?, इसका समाधान करते हुए भगवान् मघु-सूदन कहते हैं—

' यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्त्तते कामकारतः ।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थिता ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म्मऋतु ' मिहार्हसि ' ॥

७३६ - गीता

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द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मण शास्त्रनिष्टा के सम्बन्ध में हरिवंशपुराण में, एवं महाभारत में एक बडा सुन्दर उपाख्यान आय । है । भीष्म श्राद्ध करते हैं । शास्त्र की आज्ञा है कि, पितरों की तृप्ति के लिए मन्त्रवाक् के द्वारा कुशमुष्टि पर ही यथाविधि पिण्डदान करना चाहिए । जिस समय उस श्राद्धकर्म में पिण्डदान का अवसर आता है, उस समय पिण्ड - ग्रहण करने वाले प्रेतात्मा का हाथ ( पिण्ड लेने के लिए ) निकल पड़ता है । उपस्थित मण्डली को बड़ा आश्चर्य होता है । परन्तु - ' शास्त्र की आज्ञा हाथ में पिण्डदान की नहीं है, इसलिए हम इस हाथ पर पिण्ड नहीं रख सकते ' यह कहते हुए भीष्म हाथ पर पिएड नहीं रखते, अपितु पिण्डदान की इतिकर्त्तव्या शास्त्राज्ञानुसार ही पूरी करते हैं । उसी समय आकाशवाणी होती है कि, “ हम तुझारी शास्त्र-निष्ठा पर अत्यन्त प्रसन्न है । हम प्रसन्न होकर तुझे वर देते हैं कि, तुम्हारा यह कर्म सर्वात्मना सफल हो " । इसी शास्त्रनिष्ठा के आधार पर प्रातःस्मरणीय श्रीकुमारिल भट्ट - ' यदि वेदाः प्रमाणं स्युः ' कहते हुए. गिरिशिखर से कूद पड़ते हैं । फिर भी उनका कुछ नहीं बिगड़ता । इन निदर्शनों से आपको यह मान लेने में कोई भी आपत्ति नहीं होगी कि, पाप - पुण्य, धर्म्म - अधर्म, कर्म - श्रकर्म्म, आदि के सम्बन्ध में एकमात्र शास्त्र ही शरण है । यदि आप शास्त्र की अवहेलना कर स्वबुद्धिचल से ही काम करेंगे, तो आप कोई व्यवस्था न कर सकेंगे । पारलौकिक विषयों को छोड़ दीजिए । बिना शब्दप्रमाण के तो आपके लौकिक-कायों का निर्वाह भी कठिन होजायगा । सम्पूर्ण औषधि - वनस्पति - विज्ञान, लौकिक सम्पूर्ण व्यवहार — वृद्धत्र्यबहारमूलक शब्दप्रमाण पर ही निर्भर है । आप बाजार में बैठने वाले अपने से भी श्रज्ञ पन्सारी के शब्दों पर विश्वास कर के ही तो वस्तुएँ ले आते हैं । इन्द्रियगोचर विषयों में भी आपको जब शब्दप्रमाण की ही शरण लेनी पड़ती है, तो फिर जो अतीन्द्रिय - विषय हैं, उनके सम्बन्ध में शब्दप्रमाण के अतिरिक्त आपकीनसा अन्य मार्ग निकाल सकते हैं? । भगवान् व्यासने हिंसा, अहिंसा, भाव की मीमांसा करते हुए - ' अशुद्धमिति चेन्न शब्दान् ' ( ३ अ ० १ पा ० ६ अ ० २५ सू ० ) यह सूत्र हमारे सम्मुख रखा है । ' यज्ञकर्म में पशुहिसा होती है । एव यह हिंसा ' मा हिंस्यात सर्वा भूतानि ' इस श्रौत सिद्धान्त के विरुद्ध पड़ती हुई प्रत्यवाय का कारण बनती है । ऐसी अवस्था में हम कह सकते हैं कि, हिंसाभावापन्न आध्वरिककर्म अशुद्ध है । इसी आपत्ति का निराकरण करते हुए पुराणपुरुष कहते हैं कि, धर्माधर्म्म की मीमांसा का हेतु शब्दशास्त्र ही है । वह यदि यज्ञ में पशु-वध की आज्ञा देता है, तो वह निर्दुष्ट कर्म्म है । जो शास्त्र सामान्यरूप से ' न हिंस्यान सर्वा भूतानि ' यह आज्ञा देता है, वही अपवादरूप से – ' अग्नीषोमीयं पशुमालभेत ' यह वचन भी हमारे सम्मुख रखता है । देश - काल - पात्र के आधार पर ही धर्माधर्म्य का निर्णय होता है । जो एक स्थान पर धर्म है, वही अन्य स्थान पर धर्म बन जाता है । इसी आधार पर धर्म का निम्न लिखित लक्षण किया जाता है-→ ' देशे काल उपायेन द्रव्यं श्रद्धासमन्वितम् । प्राप्ते प्रदीयते यत् सकलं धर्म्मलत्तणम् ॥ ' - या ० स्मृ ० श्र ० ६ ७४०

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द्वितीयश्रध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण धर्म्माधर्म्म के विवेक लिए श्रुति, स्मृति, सदाचार, आत्मपूत लक्ष्य, एवं संकल्पजकाम, इह्न मुख्य मान गया है । इसप्रकार -श्रुति: स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । सम्यक् संकल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम् ॥ ' उक्त स्मार्त्त सिद्धान्त के यथार्थ तात्पर्य को न समझते हुए कितने हीं भ्रान्त पुरुष " स्वस्य च प्रियमात्मनः ' को आगे रखते हुए कहते हैं कि, " जब शास्त्रने हमें-- ' तुझारे आत्मा को जो अच्छा लगे, वही धर्म है ' यह श्राज्ञा दे रक्खी है, तो फिर हमें जो कार्य अपने अन्तरात्मा के विरुद्ध प्रतीत होते हैं, उह क्यों करैं । हमारा आत्मा स्वप्न में भी पशुहिंसा का समर्थन नहीं करता । अतः उसे न करना हीं हमारे लिए धर्म है " । हेतु बड़ा सुन्दर है । परन्तु श्राइए, देवें इसमें कितना तथ्य है? । एक सन्निपात का रोगी अन्न माँगता है । उस की हार्दिक? प्रेरणा है कि, वह अन्न प्राप्त करै । परन्तु वैद्य अन्न नहीं देता । आपके धर्म्म-लक्षण के अनुसार तो वैद्य अन्न न देकर अधर्म ही कर रहा है । इसी प्रकार आपका अन्तरात्मा चाहता है । कि, हम मद्यपान करें । क्या आत्मा की यह विषयैषणा धर्ममुलिका है? । भगवान् मनुने अनृतसंहित मनुष्यो की स्वाभाविक इच्छाओं का उल्ल ेख करते हुए कहा है कि-न मांसभक्षणे दोषो न मद्य न च मैथुने 1 । प्रवृत्तिरेषा भृतानां निवृत्तिस्तु महाफला ॥ मांस - मद्य - मैथुन की प्रवृत्त होना स्वभाव है । इनकी ओर से आत्मा को हटाना उचित है । इसके लिए ग्रात्मत्रल अपेक्षित है । बात यह है कि, हमारे अध्यात्मजगत् में प्रज्ञान ( मन ), और विज्ञान ( बुद्धि ) में परस्पर स्पर्द्धा चलती रहती है । प्रज्ञान पार्थिव है, विज्ञान सौर है । चान्द्र सोम ओषधियों में प्रविष्ट होकर बुद्धि का अधिष्ठाता है । के प्रकरणों में हमारे मन का उपादान बनता है । एवं सौरतत्त्व ऋत - सत्य की मीमांसा करते हुए बतला श्राए हैं कि, सोम ऋततत्त्व है, अग्नि सत्यतत्त्व है । विचालीभाव ऋत है, अत्रिचालीभाव सत्य है । ऋतसोमात्मक मन विचाली है । सूर्य्य हमसे ( पार्थित्र प्रजा से ) दूर पड़ता है । अतएव स्वभावतः हम में ऋतसोमात्मक मन की प्रधानता रहती है । जिस वस्तु में प्राण होता है, वह वस्तु ‘ मत् ' कहलाती है । ‘ सामान्ये सामान्याभावः ' इस सिद्धान्त के अनुसार प्राण में प्राण नहीं रहता । अतएव प्राण को ‘ असत् ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । यही अवस्था ऋतशब्द की है । ऋत में ऋत नहीं रहता, अतएव ऋत को ' अमृत ' कहा जाता है । अव्ययपुरुष मनः - प्राण - वाङ मूर्ति है । मन में मन, एवं प्रारण में प्राण नहीं रहता । इसी आधार पर मुण्टक-श्रु तिने प्राणमनोमूर्ति श्रव्यय के लिए - ' अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यतरान् परतः परः ' रह कहा है । कहना यही है कि ऋत, किन्तु अनृत शब्द से व्यवहृत चान्द्रसोम ही मन का उपादान है । जीवसृष्टि में यह ऋतसोम ही प्रधान है । इसी विज्ञान के आधार पर - ' श्रहमस्मि प्रथमजा ऋप्तस्य ' ( ऋकसं ० ) यद्द् कहा जाता है । ऋत क्योंकि अनृत है । इसी आधार पर - ' अनृतसंहिता वै मनुष्याः ' यह निगम प्रतिष्ठित ७४१

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प्रथमखण्ड तृतीयब्राह्मण है । हममें प्रकृत्या मन की ही प्रधानता है, यह उक्त कथन से भलिभांति सिद्ध होजाता है । मन ऋत होने से केन्द्र सत्यानुग्रह से वञ्चित है । श्रतएव यह कभी एक विषय पर स्थित नहीं रहता । यदि इसमें स्थिरता सकती है, तो उसी सौरसत्य - विज्ञान के प्रवेश से । सीरता अग्निप्रधान होता हुआ सत्य है ' चित्रं देवानामुद्गान ' हम ओत सिद्धान्त के अनुसार सीखा ही देवता है वे ' सत्याग्निमय ' हैं । इसी आधार पर ' सत्यसंहिता वै देवाः ' यह निगम प्रतिष्ठित है । मनोमूर्ति प्रज्ञानात्मा बाह्यात्मा है, एवं विज्ञानात्मा अन्तरात्मा है । वैश्वानर - तैजस एवं प्राज्ञ -से समन्धित प्रज्ञानात्मा कर्ता है, विज्ञानात्मा कारयिता है । इसे ही गीता में ' क्षेत्रज्ञ ' नामसे व्यवहुत किया गया है । प्रज्ञान स्वतः प्रचल रहता है । विज्ञानबल के लिए शास्त्राध्ययन - तपादि अपेक्षित हैं । दूसरे शब्दों में- प्रज्ञान सिद्ध है, एवं विज्ञान साध्य है । ऋतप्रधान मन ' निम्नगामी ' है । क्योंकि ऋततत्त्व पार-मेष्ठ्य है, एवं परमेष्ठी आयोग्य है अपूतत्व का निम्नगामित्व प्रत्यक्ष है । आपको यह मान लेने में कोई आपत्ति नहीं होगी कि, यदि मन को विज्ञान के शासन से पृथक् पर दिया जाता है, तो मन स्वतन्त्र होता हुआ अपने ऋतमूलक अन्तभाव से आत्मपतन का ही कारण बन जाता है । विज्ञानसारथि के पृथक् होते ही मनोमय प्रग्रह ( लगाम ) ढीला पड़ जाता है । लगाम के ढीली पड़ते ही इन्द्रियाश्व शरीर-रथ में प्रतिष्ठित रथी श्रात्मा को उत्पथ ले जाते हैं । विपरोत मन की दया, अकारण कारुण्य, दुयं-सनों में प्रवृत्ति आदि मन के स्वाभाविक धर्म है । विज्ञान में स्वतः सिद्ध जितना बल रहता है, तदनुसार वह मनका निरोध करता रहता है । मनुष्य मन की प्रेरणा से ही असत्कम्मं में प्रवृत्त होना चाहता है, परन्तु उसी क्षण भीतर से ध्वनि आती है कि अरे! यह का बुरा है । इसे मत करो । यह ध्वनि उभी अन्त-रात्मा ( बुद्धि ) की है । साथ ही विचार उठता है कि आज आज करले,, कल नहीं करेंगे, यह विचार मन का है । यदि विज्ञान निर्बल होता है, तो मन का विजय होजाता है । फलतः मनुष्य असत् कारयों में पच होजाता है । स्वस्थदशा में भूख लगना विज्ञानसकृत मन की इच्छा है । यही अनासक्तिमूला इन्च्छा है । आपने पेटभर भोजन कर लिया है । बाजार जाते है । वहाँ चाट खाने की इच्छा होती है । यह विशुद्ध मन की इच्छा है ॥ यही आसक्तिमूला होती हुई बन्धन का कारण बन जाती है । सद्सन का कर्त्त व्याकस व्य कर्त्तव्याकर्त्तव्य का विवेक करना बुद्धि का काम है । हठात् निर्णय कर बैठना मन का काम है । मन के साथ बिना बुद्धि का योग किए मन इसी प्रकार अन्डवर निर्णय कर डालता है I स्वयं वीर अर्जुनने भी इसी मन की कृपा से धोका खाया था । निरपराधों को मारना बुरा काम है, यह कौन नहीं मानता । परन्तु परिस्थिति देखना आवश्यक है । अर्जुनने क्षात्रधर्म का महत्त्व न समझते हुए ' न योत्स्ये ' कह डाला | भगवान्ने उसे सावधान किया । ' बुद्धियोगमुपाश्रित्य मचितः सततं भव ' का आदेश दिया । अर्जुन सँभल गया । परिणाम में विजय - भूति श्री की प्राप्ति हुई । यही अवस्था हमारी है । हम मन की कृपा से यह समझ बैठते हैं कि अरे निरपराध पशु को मारना अनुचित है । हम उस महाफल को भूल जाते हैं, जोकि यज्ञ से मिलता है, जिसका कि विवेचन हम अनुपद में ही करने वाले हैं 1 ऐसी ' दया ' आत्मा का संकल्प नहीं है, अपितु मन का संकल्प है । जबतक बिवेकशीला बुद्धि को मन के साथ युक्त नहीं कर दिया जाता, तबतक यह संकल्प सम्यक संकल्प नही कहला सकता । सम्यक संकल्प काम बुद्धियोग पर ही निर्भर है । यही स्वस्य ७४२

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 479 का मूल पृष्ठ
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द्वितीय अध्याय शतपत्राह्मण तृतीयब्राह्मणप्र प्रियमात्मनः ' है । ' मन भाया सो किया ' यदि उक्त वाक्य का यही अर्थ है, तब तो यह अर्थ नहीं, आपतु अनंथ है । शान्तवृत्ति से विचार कीजिए- ' स्वस्थ ' क । क्या अभिप्राय होना चाहिए? | वर्त्तमान शिक्षाप्रणाली से रँगे हुए, “ खाना पीना मौज उड़ाना " ( Eat drilk and be mony ) इस जघन्य सिद्धान्त की आराधना करने वाले महानुभाव ही ' स्वस्य च ' का ' मनभाया ' अर्थ करते हैं । शास्त्रीय वचनों के अर्थ में भी वे आज अपनी इसी मनोवृत्ति को प्रधानता देने लग पड़े हैं । छोड़िए शास्त्रीय मर्यादा को । ऐहलौकिक विषयों पर ही दृष्टि डालिए । समाजशास्त्रियों की ऐसी कुछ मान्यता है ( जिसमें भारतीय शास्त्र सहमत नहीं है ) कि, जिस कार्य से अनेक व्यक्तियों का उपकार हो, एवं अल्प व्यक्तियों की हानि हो, वह कार्य अच्छा है । जीवधारियों में मनुष्य का मूल्य अधिक है । कारण स्पष्ट है । इसी में इन्द्रियों का पूर्ण विकास है । श्रुतश्व स्थावर - जनम - विश्व के श्रभ्युदय का उत्तरदायित्व इसी पर प्रतिष्ठित है । जिस राष्ट्र का मनुष्यसमाज स्वस्थ- सुशिक्षित होत्ता है, उस राष्ट्र का व्यवसाय समृद्ध होता है । पधि - वनस्पति- नद- नदी -आदि स्थावर संपत्ति, पशु - पक्षी - श्रादि जङ्गमसंपत्ति भी उम्री राष्ट्र में सुससृद्ध रहती है । इसलिए यह आवश्यक होजाता है कि, मनुष्यसमाज को पूर्ण रूप से सुशिक्षित एवं स्वस्थ बनाने के लिए जो भी कार्य्य किए जायँ, वे निदुष्ट माने जायँ । कहना न होगा कि, भारतीय शास्त्र के मर्म्म से अपरिचित, भारतीय याज्ञिक पशुवध पर आपेक्ष करते हुए पाश्चात्य विद्वान् ( डाक्टर ) केवल शरीर चिकित्सा के लिए ही लेबोरेट्रियों ( Tapotray ) में प्रतिदिन असंख्य निरपराध प्राणियों का वध कर डालते हैं । वर्त्तमान चिकित्सापद्धति ( डाक्टरी ) में इओन ( Injunction ) सर्वेसर्वा न रहा है । निरपराध अश्वादि पशुओं का श्रृङ्खलाओं से नियन्त्रण कर सूचिका के प्रयोग से उनके शरीरस्थ कीटाणुओं के द्वारा इन के ट्यत्र ( ' T'ude ) सम्पन्न करना क्या हिंसाभाव से रहित कार्य है! । मनुष्य के शरी-रस्थ अस्थियों की जैसी रचना है, प्रायः वैसी ही रचना ददुर ( मेढक ) शरीर की है । इन जीवित प्राणियों के शरीर को चीर कर वैज्ञानिक अपना अनुभव बढ़ाने में ' हिंसा नहीं समझते । दुर्बलता को दूर करने के लिए जलजन्तु ( मत्स्यादि ) के तैल का ( कार्लिवर आयल का ) आज कितना अधिक प्रचार है, यह मी तिरोहित नहीं है । प्रशिक्षित, शिक्षत, सभी उक्त कार्यों का हृदय से अनुमोदन कर रहे हैं । उन्हें इनमें हिंसा प्रतीत नहीं होरही । इन कार्यों को ये ईश्वरीय कार्य समझते हैं । क्यों?, वही मनुष्यसमाज की रक्षा । अनेक व्यक्तियों का उपकार । ऐसी अवस्था में यदि हम यज्ञ के द्वारा अधिक लाभ सिद्ध करदें, तो कोई कारण नही रहा जाता, जिसमे यज्ञिय पशु की हिंसा पर आक्षेप किया जाय । कितने हीं महानुभाव यह भी कहा करते हैं कि, माँस अप्राकृतिक भोजन है । मनुष्य की उदर-पूर्ति के लिये ईश्वरनेधि, वनस्पति का ही निर्माण किया है । बात ठीक है । हम भी मांस को मनुष्य का आवश्यक अन्न नहीं समझते । कारण - मांस की मात्रा जीवनसत्ता के लिए जितनी मात्रा में अपेक्षित है, उतनी मात्रा श्रमधि - वनस्पतियों में भी रहती है । गेंहू, माष आदि में माँस की मात्रा विद्यमान है । माष ( उर्दू ) तो माँस की साक्षात् ही प्रतिकृति है । अतएव माष को यज्ञिय माना है । आपको यह ध्यान रखना चाहिए कि, शरीरगत रम असृक् मांसादि धातु तमीतक शरीर में सुरक्षित रह सकते हैं, ७४३

पृष्ठ 480

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 480 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयमाण जनतक कि तसद्धातुओं को ससद्रस्य मिलते रहते है । मांसरचा के लिए माँस अपेक्षित है रुधिरक्षा के लिए. रुधिर अपेक्षित है । यही स्थिति इतर धातुओं के सम्बन्ध में समझनी चाहिए । वे सत्र मात्राएँ तारतम्य से औषधि वनस्पतियों में भी विद्यमान हैं । आप माँस के लिए प्रश्न उठाते हैं । हम कहते हैं— सोना - ताँबा - चाँदी - लोहा आदि धातु- उपधातु विष उपविषादि भी प्राकृतिक अन्न हैं । पालक की परीक्षा कीजिए 1 उसमे आपको ताम्र अधिकमात्रा से उपलब्ध होगा । इसीप्रकार सब अन मे मात्रातार-तम्य से धातु - विषादि विद्यमान हैं । आवश्यकतानुर इनका स्वतन्त्ररूप से भी प्रयोग करना आयुर्वेद लाभप्रद मानते है । ऐसी अवस्था में मांस को अप्राकृतिक मानना साहस है । पशु के शरीर में रक्तयुक्त जो विमान पिण्ड है, सम्भवत: आपने उसे ही माँस समझ रक्खा है । परन्तु मांस तो एक विशेष प्राण है । यह प्राण ब्राह्मणग्रन्थों में ' पुरी ' शब्द में से व्यवहृत हुआ है ( देखिए - ०८७४१६ ) । यह जिस भौतिक द्रव्य में रहता है, वह भी ' तानस्यात्ताच्यम् इन न्याय के अनुसार ' माँस ' शब्द से ही व्यवहृत होने लगता है । मत्स्य में इस पुरीषप्राण का । प्रभाव है ॥ अतएव अतएव माँस माँस - - मत्स्य मत्स्य पृथक माना जाता है ' माँस-मच्छी ' यह भेदमूलक व्यवहार प्रसिद्ध है । वही ' पुरीष ' ' माप ' ( उढे ) में विद्यमान है । अतएव उसे माँस की प्रतिकृति माना जाता है । जो हानि - लाभ माँस भक्षण में हैं, वही ' माघ ' ( उर्द ) के भक्षण में है । यदि माँस अप्राकृतिक अन्न होता, तो मनुष्य उसे पचा नहीं सकता था । हम देखते है कि, मनुष्य माँस मुख में डालता है । इसके दाँत अन्नवत् उस पर व्यापार करते हैं, और वह भक्षित माँस को पचा जाता है । हां, जो प्राणी ( सिंहादि ) मांसाशी है, उनका मांस अवश्य ही अप्राकृतिक है । इनका मांस अवश्य ही त्याज्य है । आप कहते हैं मांस अप्राकृतिक अन्न है, किन्तु श्रुति पहती है-१ – ' एतदुइ वे - परमन्नाद्य यन्मांसम् ' ( श ० ११।१ / ७ / ६ २ – अन्नमुपशोर्मासम् ' ( ०६५२२४ ) माँ को अप्राकृतिक अन मानने वाले महानुभावों का ध्यान हम माँसाशी मनुष्यों की संख्या की ओर आकर्षित करते हैं । केवल भारतवर्ष को छोड़ दीजिए । आपको यह मान लेने में कोई आपत्ति नहीं होगी कि, भारत को छोड़कर समस्त एशिया, युरोप, अमेरिका आदि में निवास करने वाले मनुष्य E प्रतिशत मांसभक्षी हैं । भारतवर्ष में भी कश्मीर, सिन्ध, पंजाब, बंगाल, मिथिला, आदि प्रान्तों को छोड़ दीजिए । केवल यूपी गुजरात राजपुताना को लीजिए 1 यहाँ भी मुलतान ईसाई - राजपूत - अन्त्यज जातियों को छोड़ दीजिए I मांस न ग्याने वालों में से बच जाते हैं यूपी - गुजरात - राजप ताने के उच्चवंशी ब्राह्मण - वैश्य | क्या विश्व की जनसंख्या के समतुलन में माँस न लाने वालों की संख्या का कोई मूल्य है? ॥ के लिए ' परममन्नाद्यम ' कहा है । माँस व्यापक अन्न है । हम इस वृत्ति का बतलाना केवल यही है कि, माँस अवश्य ही प्राकृतिक अन्न है । तभी इसीलिए तो श्रुतिने माँम स्वागत नहीं करते | इससे हमें तो - ' न मांसभक्षणे दोषो.... प्रवृत्तिरेपा भूतानाम् ' यह मनुवचन चरितार्थ होता है । ऋषियों की दृष्टि में यह प्रवृत्ति बुरी जबतक इतर अन्न से जीवनयात्रा का मुवाररूप से निर्वाह होनाय एवं सुलभता से नत्रतत्र ग्रन्नसामग्री मिलती रहे, तबतक पशुमांस को न खाना हीं उत्तम पक्ष है । पशुमांस अन्न