Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 481–490

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण होता हुआ भी पुरीष के सम्बन्ध से बुद्धि का व्याघातक है । अतः इसे न खाना हीं श्रेयस्कर है । जत्र और वस्तु ( स्थावर ) हमें मिल जाती है, तो फिर जिह्वास्वाद के वशीभूत होकर माँस खाना— ' मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि ' का विरोध कर प्रत्यवाय का ही भागी बनना है । सात्त्विकभावों की रक्षा के लिए माँस ग्रहण अनुचित है, परन्तु अप्राकृतिक नहीं I । यदि प्राकृतिक ही होता, तो ' पञ्च पञ्च नखा भक्ष्याः- न मांसमश्नीयात् ' इत्यादि वचनों का कोई मूल्य ही नहीं रहता । प्राप्त वस्तु का ही निषेध चरितार्थ होता है । ' न मांसमश्नायात् ' यह सामान्यविधि नहीं है । अपितु अपवाद है | ब्रह्मौदन के रक्षक व्रतों ( नियमों ) का विधान करती हुई श्रुति कहती है— “ न मांसमश्नीयात्, न ख्रियमुपेयात् । यन्मांसमश्नीयात्, यत्त्रियमुपेयात् - निर्वीर्य्यः स्यात् । नैनमग्नरुपनमेत् ” ( तै ० ना ० ११६७ - ८ ) इति । यदि इस उक्त श्रुति को ' विधि ' परक मान लिया जायगा, तो स्त्री के सम्बन्ध का भी निषेध प्राप्त होगा, जो कि – ' प्रजातन्तु मा व्यवत्सो ' के विरुद्ध पड़ेगा । अतः इसे विशेष विवि मानना हीं उचित होगा । प्रकृतिसिद्ध मासाशन की प्रवृत्ति का ऋषियोंनें निरोध किया, एवं परम श्रावश्यक समझ कर पशुप्राशन का विधान किया । इतना होने पर भी इन विषयों को कलिवज्यं माना गया । नियोगविधि शास्त्रीय है । परन्तु कलह - प्रधान इस कलियुग में स्वभावतः मनुष्यों का आत्मा निर्बल रहता है । यदि उनको नियोग की आज्ञा शास्त्रकार दे देते, तो बड़ा अनर्थ होजाता । नियोग के बहाने व्यभिचार का मार्ग निष्कण्टक चन जाता । अतएव दूरदर्शी ऋषियोंनें नियोग को कलिवज्य माना । यही अवस्था यज्ञ की है । ' जनमेजयात्-जनमेजयान्तम् ' इस पुगणसिद्धान्त के अनुसार विशेषतः * त्रेतायुग पर्य्यन्त एवं साधारणतः द्वापरयुगान्त के जनमेजय के सर्पयज्ञ पर्यन्त ही यज्ञों की प्रधानता रही । इसके अनन्तर यज्ञकाण्ड से क्रमश: श्रद्धा उठती ही गई । यहाँतक कि, आगे जाकर पञ्चपश्वात्मक चितियज्ञ में केवल प्राजापत्य श्रज पशु का श्रालम्भन ही शेष रह गया । पुष्कर ( आजकल ' बुखारा ' नाम से प्रसिद्ध ) निवासी प्रजापति ( ब्रह्मा ) से प्रारम्भ कर सायका-यन नाम से प्रसिद्ध श्यापर्ण पर्यन्त पुरुष - अश्व - गो- अवि - अज - इन पाँचों पशुओं का ही आलम्भन होता रहा | परन्तु याज्ञवल्क्य के समय में केवल प्राजापत्याज, वायव्याज इन पशुओं का ही श्रालम्भन शेष रह गया । ( देखिए, शत ० १ ० ४ ब्रा ३८ कं ० ६ कां ० ) । आज तो यज्ञविद्या सर्वथा विलुप्तप्राय ही होगई है । आज का युग ' उपासनायुग ' है । यज्ञ का तो एकमात्र प्रयोजन ' हवाफ़िल्टर ' करना हीं रह गया है । मनमानी पद्धतियाँ बन गई हैं । यथेच्छ - अधिकार मिल गए हैं । कलि की कृपा से सबकुछ विडम्बना * गार्हपत्य -- दक्षिणाग्नि- श्राहवनीय, भेद से वितानयज्ञ ' त्र ' ताग्नियज्ञ ' कहलाता है । इसी त्रेताग्नि के सम्बन्ध से यह युग ‘ त्रेतायुग ' कहलाया है । इस विषय का विशद विवेचन ' मन्वन्तर - स्वरूप - परिचय ' नाम के निबन्ध में देखना चाहिए । ७८५

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- द्वितीयश्रध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयत्राह्मता होरही है | अतीचनागतज्ञ ऋषि इस युगमाहात्म्य को समझते थे । उहें यह विदित था कि, इस युग में स्वत-एव मनुष्य इन्द्रियलोलुप होते हैं । ऐसी अवस्था में यदि यज्ञ में पशुवध की श्राज्ञा दे दी गई, तो अनर्थ हो जायगा | अतएव नियोगवत् इसे भी उन्होंनें कलिवज्य - प्रकरण में हीं स्थान दे दिया । इसप्रकार कलियुग में केवल स्मार्त्त ' यज्ञों की ही प्रधानता रह गई । यह सबकुछ होने पर भी यदि कोई धर्मपरायण वर्त्तमान में ' वितानयज्ञ ' करना चाहे, तो उसे ध्यान रखना पड़ेगा कि, बिना पशु की आहुति के उसका यज्ञ सर्वथा निरर्थक है । प्रथम तो वह यज्ञ करे ही नहीं, यदि करै, तो उसे अवश्य ही पशु का आलम्भन करना यज्ञ में पशु को मारा जाता है । इसमे हिंसादोष ' भी होता है, एवं उस के परिहार के लिए, दक्षिणा का विधान भी किया गया है । केवल हिंसा की विभीषिका से यज्ञ जैसा श्रेष्ठतमकर्म्म छोड़ बैठना बुद्धिमानी नहीं । यदि ऐसी विपत्तिपतियाँ उठाई जायेंगी, तब तो आप कोई भी कर्म्म न करसकेंगे । कारण-" सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ” -- गीता उक्त प्राप्त सिद्धान्त के अनुसार कोई भी कर्म्म सर्वथा दोषरहित नहीं है । भोजन - शयन - बदन -चलन आदि सभी कम्मों में असंख्य वायव्य जीवों का हिंसाजनित प्रत्यवाय मिश्रित मानना क्या युक्तिसङ्गत होगा?! इमलिए अन्ततो गत्वा आपको इसी सिद्धान्त का आश्रय लेना पड़ेगा कि, धम्र्माधर्म्म - हिंसा-श्रहिंसा, आदि भाव श्रतीन्द्रिय पदार्थ हैं । इनके सम्बन्ध में शास्त्र हमारे लिए जो निर्णय करे, वही ठीक है । वही मान्य है । जो शास्त्र हमें ' मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि ' यह आदेश करता है, वही अपवादरूप से विशेष स्थल के लिए ' अग्नीषोमीयं पशुमालभेत ' यह श्राज्ञा भी देता है । दोनों के लिए शब्दप्रमाण सामान्य हैं । इसी निर्माय को लक्ष्य में राव कर ' अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ' यह कहा गया है । इस सूत्र का व्याख्यान करते हुए सर्वश्री शङ्कराचार्य कहते हैं । तस्यानिष्टमपि " यत् पुनरुक्त पशुहिंसादियोगादशुद्व माध्वरिकं कर्म्म, फल-मत्रकन्पते, इत्यतो मुख्यमेवानुशायिनां ब्रीह्यादिजन्मास्तु गौणीकल्पनान थिकेति, तत् परि-ह्रियते । न, शास्त्रहेतुच्चाद्धर्म्माधर्म्मविज्ञानस्य । अयं धर्मोऽयमधर्म्म -- इति शास्त्रमेव विज्ञाने कारणम् - अतीन्द्रियच्चात्तयोः । अनियतदेशकालनिमित्तत्त्वाच्च । यस्मिन् देशे काल निमित्ते च यो धर्मोऽनुष्ठीयते स एव देशकालनिमित्तान्तरेष्वधम्र्मो भवति । न शास्त्राते धर्माधर्म्मविषयं विज्ञानं न कस्यचिदस्ति । शास्त्राच्च हिंसानुग्रहाद्यात्मको ज्योतिष्टोमो धर्म्म इत्यनवधारितः । स कथमशुद्ध - इति शक्यते वक्त म् । ननु- ' न हिंस्यात् व भूतानि इति शास्त्रमेत्र भूतविषयां हिंसामधर्म्म इत्यत्रगमयति: बाढम् । उत्सर्गस्तु मः । अपवाद:: - - ' अग्निीषोमीयं पशुमालमेत ' इति । उत्सर्गापवादयोश्च व्यवस्थित-विषयच्चम् । तम्माद्धि शुद्ध कम्मं वैदिकम् । शिष्टं रनुष्ठीयमानत्च्त्वात्, श्रनिंद्यमानत्त्वाच्च ' । - ३ ० १ पा ५ सू ० इति ७४६

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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण तृतीय । झण तथाकथित प्रकरण से पाठकों को यह आभास होगया होगा कि, यज्ञ में अवश्य ही पशु का आलम्भन होता है । यज्ञविद्या प्रकृति की प्रतिकृतिमात्र है । जैसा प्रकृति में हो रहा है, ठीक वही कर्म्म इस वैधयज्ञ में किया जाता है । अतः सर्वप्रथम पश्वालम्भन सम्बन्धी प्राकृतिक नित्य यज्ञका स्वरूप ही पाटकों के सम्मुख उपस्थित किया जारहा है । दो वस्तुओं को रासायनिक सम्मिश्रण से समन्वित कर उह्न अपूर्ण स्वरूप प्रदान करने वाजी प्रक्रियाविशेष का ही नाम यज्ञ है । यह यज्ञ शब्द का सामान्य अर्थ है । प्रकृति - पुरुष का सम-न्त्रितरूप पहिला यज्ञ है । बिना इस याज्ञिक समन्वय के सृष्टि नहीं हो सकती । इसी याज्ञिक समन्वय को लक्ष्य में रखकर - ' तत्न, समन्वयात् ' ( व्या ० सू ० ) यह कहा जाता है । प्रकृति - पुरुष का समन्वितरूप श्रप्रजापति है । ' षोडशी ' नामसे प्रसिद्ध ' पुरुष प्रजापति ' प्रकृति के साथ युक्त होकर ही यज्ञरूप में परिणत होते हैं । एवं ये ही ' प्रजोत्पत्ति ' के कारण बनते हैं । षोडशकल प्रजापति अग्निप्रधान है एवं ' प्राण - आपः - बागादि ' भेदभिन्ना पञ्चकला प्रकृति सोमप्रधाना हैं । अग्नितत्त्व वृषा है । सोमतत्त्व योषा है । प्रश्नोपनिषद्विज्ञान के अनुसार वृातत्त्व ' प्राण ' है, गोषातत्त्व रयि है । रथि और प्राण के समन्वय से ही प्रश्नोपनिषत्ने सम्पूर्ण विश्व की उत्पत्ति मानी है । विश्वसृष्टि का अधिष्ठाता अग्नीषोमात्मक - ( वृषा - योषात्मक, -- रयिप्राणात्मक ) यज्ञ पाङक्त ( पञ्चावयत्र ) है । ' पाको नै यज्ञः ' यह अनुगम वचन है । श्रतएव इसकी पाङता अनेक प्रकार से है, जिसका कि विशद निरूपण पूर्व - प्रकरणों में यत्रतत्र विस्तार से किया जाचुका है । प्रकृत में हमें केवल द्यावा-पृथिबी से सम्बन्ध रखने वाले पाङक्त यज्ञ की ओर ही विज्ञ पाठकों का ध्यान आकर्षित करना है । द्यावापृथिवी में क्रमशः ‘ यथाग्निगर्भा पृथिवी, तथा द्यौरिन्द्र ेण गर्भिणी ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार पृथिवी का अतिष्ठात्रा देवता अग्नि है, एवं द्यलोक का अधिष्ठाता देवता इन्द्र है । तत्त— लोक का अधिष्ठाता देवता ही तसल्लोक का ' प्रजापति ' कहलाता है । इस परिभाषा के अनुसार अग्नि भूलोक का प्रजापति है, एवं इन्द्र द्युलोक का प्रजापति है । ये दोनों हीं प्रजापति श्रादानविसर्गात्मक यज्ञ के द्वारा रोदसी बिश्व के प्रभव बने हुए हैं । प्रजापति इस यज्ञ के द्वारा निरन्तर विस्रस्त होता रहता है । सूर्य ( इन्द्रप्राणमय ) का भाग प्रवर्ग्यरूप से सूर्य से पृथक होकर श्रीषधि - नस्पति आदि का निर्माण किया करता है । इससे सौरभाग खर्च होता है । यही प्रजापति की विस्रस्ति है । सूर्य उदाहरणमात्र है । विश्व के यच्चयावत् पदार्थ [ चेतन एवं अचेतन ] निरन्तर विस्रस्त होते रहते हैं । प्रतिक्षा उनके तर परमाणु विस्रस्त [ [ ] होते रहते हैं | परन्तु साथ ही तत्तत्षदार्थों के केन्द्रस्थ विष्णु की ग्रशनाया से आकर्षित अन्नाहुति के द्वारा यह विस्रस्त भाग सहित भी होता रहता है । सम्पूर्ण पदार्थ अपने भाग को प्रवर्ग्यरूप से अन्न बना रहे हैं, एवं दूसरों के प्रवर्ग्यान्न को लेकर अन्नाद [ भोक्ता ] बन रहे हैं । ' सर्वमन्नम् - सर्वमन्नादः ' यह सहज नियम है । अन्न अन्नदात्मक इसी नित्ययज्ञ का निरूपण करती हुई ऋश्रुति कहती है-अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्व देवेभ्योऽमृतस्य नाम । यो मा ददाति स इ देवभावत श्रहमन्नमन्नमदन्तमद्मि ॥ - सामसंहिता ७४७

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मण पदार्थों से विस्वस्त होने वाला तत्त्व अग्नि है, एवं आहुत होकर विस्तभाग की पूर्ति किया करता है, वह ' सोम ' शनाया के द्वारा जो तत्त्व वस्तुगत अग्नि में नाम से प्रसिद्ध है । ऐसी अवस्था में ' यज्ञ शब्द का ' अग्नि में सोम का बहुत होना ' यह निष्कर्ष निकल आता है । आहुत होने वाला सीम अन है । यह आहुत होकर ' ऊकू " रूप में परिणत होता है, कर्क अन्ततोगत्वा ' प्राणाग्नि ' रूप में परिणत हो-जाता है । प्राणाग्नि वित्रस्त होता रहता है । शनाया के द्वारा प्राणाग्नि के आकर्षण से पुनः अन्नाहुति होती है । इसप्रकार अन्न से ऊर्क, ऊर्क से प्राण. प्रारण से अन्न, अन्न से ऊर्क, यह धारावाहिक क्रन निरन्तर चलता रहता है | इसी आधार पर यज्ञ का – ' अन्नोर्क प्राणनामन्योऽन्यपरिग्रहो यज्ञः ' यह लक्षण किया जाता है । ' तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार प्राणाग्नि ' बाकू ' तत्त्व है । इस वाक् से प्राण की पुष्टि होती है । प्राण से चित्त ( मन ) की पुष्टि होती है । हम जो अन्न खाते हैं, वह प्रथम वाग्रूप प्राणाग्नि में आहुत होता है । दूसरे शब्दों में पहिले उसकी वागग्नि पर चिति होती है । अनन्तर रस - मल के क्रमिक विकलन से वह मन का पोषक बनता है । सप्त धातुओं की क्रमिक चिति के अनन्तर वह अन्न शुद्ध चान्द्रसोम में परिणत होता हुआ मन का स्वरूप- समर्पक बनता है । दूसरे शब्दों में हुत अन्न स्थूल पार्थिव भूतभाग के द्वारा ' धातुचिति ' रूप में परिणत होता हुआ अन्त में मन घर चित होता है । सोमचिति के कारण ही मन ' चित्त ' कहलाता है । मन का स्वरूप ' अन्नचिति ' पर ही निर्भर है, इसी आधार पर –'अन्नमयं हि सौम्य मनः ' यह कहा जाता है । यह मन इन्द्रियों के द्वारा खर्च होता रहता है । इस कमी को पूरी करने के लिए मन प्रशनाया के द्वारा प्राणाग्नि के माध्यम से पुनः अन्न का आकर्षण करता है । इसप्रकार बाक्, और चित्त का जो उत्तरोत्तर चितिक्रम है, वही यज्ञ का साधक बन जाता है । इसी आधार पर यज्ञ का ' वाचश्चित्तस्योत्तरोत्तरिक्रमो यज्ञः ' यह लक्षण भी किया जाता है । वथा यज्ञ का ' अग्नौ सोमाहुतिर्यज्ञः ' यही फलितार्थ निकलता है । समष्टिरूप से, एवं व्यष्टिरूप से, उभयथा सम्पूर्णं पदार्थ ' अग्नीषोममय ' ही हैं । इसी आधार पर - ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' यह निगमश्रुति प्रतिष्टित है । उक्त सन्दर्भ से यह भलीभांति सिद्ध होजाता है कि, यज्ञस्वरूपसिद्धि के लिए अग्नि में सोम का आहुत होना नितान्त आवश्यक है । आहुत होने वाला यह सोम - हत्रि, पशु, राजा, वाज, ग्रह आदि भेट से अनेक भागों में विभक्त है । ग्राहुतिद्रव्यस्वरूप सोम की विजातीयता से एक ही अभियज्ञ अनेक प्रकार का होजाता है । व्रीहियवादि ओषधियों में भी सोम है । इस सोम से निष्पन्न होने वाला यज्ञ ' हविर्यज्ञ ' कहलाता है | अग्निहोत्र - दर्शपूर्णमास- चातुर्मास्य आदि इष्टियों में इस अन्नसोम की ही आहुति दी जाती है | अतएव ये सब ' हविर्यज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध हैं । एवं पशुबन्ध में पशुपागत सोम की आहुति होती है । बिना ' पशुत्रपा ' की आहुति के पशुबन्धयज्ञ का स्वरूप ही निष्पन्न नहीं हो सकता । पशु अपेक्षित नहीं 1 गत सोम अपेक्षित है । वह बिना पशुवध के अप्राप्त है । अत: अगत्या इस यज्ञ की सिद्धि के लिए पशु का आलम्भन करना पड़ता है । राजा सोम से निष्पन्न होने वाला यज्ञ ' राजसूय ' है । वाजसोम से निष्पन्न होने वाला यज्ञ ‘ बाजपेय ' है । ग्रह ( बल्लीसोम ) से निष्पन्न होने वाला यज्ञ ' ज्योतिष्टोम ' है, एवं पञ्चपशु - ग्रहसोम दोनों से निष्पन्न होने वाला यज्ञ ' चिति ', किंवा ' चयनयज्ञ ' है । इसमें पाँचों पशुओं का, ७४८

पृष्ठ 485

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द्वितीय वाय शतरथवाह्मण तृतीयब्राह्मण और ग्रह मोम का, दोनों का सम्बन्ध रहता है । अत: इतर यज्ञों से इसे उत्कृष्ट माना जाता है । यहाँतक कि, कर्म्मकाण्डप्रधान यज्ञों में एक चयनयज्ञ ही ऐसा यज्ञ माना गया है, जो ' कम्मं होता हुआ भी ज्ञानैकसाध्या श्रमृतत्त्वप्राप्ति का कारण बन जाता है । चयनयज्ञ के लिए ही ' नामृतत्त्वस्य टु- श्राशास्ति, ऋते चयनात ' यह सिद्धान्त प्रसिद्ध है । पुरुष - श्रश्त्रो - अत्रि- अज, ये के रसों के तारतम्य से इन पाँचों प्राकृतिक पाँचों पशु द्यावापृथिव्य हैं । पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, तीनों पशुओं का स्वरूप निष्पन्न होता है । इन पाँचों में पुरुषपशु ही सर्वश्रेष्ठ, अतएव सर्वप्रधान है । अतः प्रथम इसी का स्वरूप उपस्थित किया जाता है । १- पुरुषपशुः-पार्थिव अग्नि अन्तरिक्ष्य अग्नि [ वायु ], एवं दिव्य अग्नि इन्द्र ] इन तीनों प्राणाग्नियों के समन्वय से वैश्वानर का स्वरूप निष्पन्न होता है । प्राणाग्नित्रयमूर्त्ति यह वैश्वानरतत्त्व ही ' पुरुषपशु ' कहलाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-“ इमे वै लोका पूः । अयमेव पुरुषों योऽयं पवते । सोऽस्यां पुरि शेते तस्मात् पुरुषः " - श ० १३,६,२,१, वैश्वानरपुरुष के इसी व्यापक स्वरूप का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है-“ स यः स वैश्वानरः - इमे स लोकाः । इयमेव पृथिवी विश्वम्, अग्निर्नरः । अन्त-रिक्षमेव विश्वम्, वानरः । द्यौरेव विश्वम्, आदित्यो नरः । ते ये तऽइमे लोका इदं तच्छिरः, हृदमेव पृथिव्योषधयः श्मश्रूणि तदेतद् विश्वं वागेव । अग्निः स नरः । मो-परिष्टादस्य भवति । उपरिष्टाद्धस्था अग्निः । इदमेवान्तरिक्षम् । तस्मादेतदलोकम् । अलो-कमिव ह्यन्तरिक्षम् । तदेतद् विश्वं प्राण एव । वायुः स नरः स मध्येनास्य भवति । मध्येन-ह्यन्तरिक्षस्य वायुः । शिर एव द्यौः । नक्षत्राणि केशाः - तदेतद् विश्वं चतुरेव । आदित्यः स नरः । अवस्तच्छीर्णो भवति । अवताद्धि दिव आदित्यः । तदस्यैतच्छिरो वैश्वानरः । आत्मायर्माग्निश्चित: । आत्मानमेवास्य तत् संस्कृत्य शिरः प्रतिदधाति ” । - शत ० ० ६१२ प्र ० ३ ० ३-४-५-६ कं ० १ उक्त वैश्वानरपशु श्रग्निप्रधान बनता हुआ वृषामूर्त्ति है । जिस प्राणी में इसकी प्रधानता होती है, वह पशुसृष्टि में पुरुष ( मनुष्य ) कहलाता है । पुरुष उस प्राकृतिक पुरुषपशु की प्रतिकृति है । इतर पशुओं की अपेक्षा यह उस विराट् की सन्निहित प्रतिकृति है । कारण, वैश्वानर त्रैलोक्य में व्याप्त है । उधर प्रजापति भी त्रैलोक्य में व्याप्त है । अग्न्यवच्छेदेन वह अर्थशक्तिमय है, वायु व छेदेन वह क्रियाशक्ति-मय है, एवं इन्द्रावच्छेदेन वह ज्ञानशक्तिमय है । इतर पशुओं की अपेक्षा इसमें ज्ञान - क्रिया - अर्थ - का पूर्ण विकास है । इसी आधार पर इस पुरुषपशु के लिए - ' पुरुषो वै प्रजापतेर्ने दिनम् ' यह कहा जाता है । यजुःसंहिता का सुप्रसिद्ध पुरुषसूक्त इसी विराट्मूर्ति पुरुषपशु का निरूपण करता है । ७४६

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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मण त्रिवृत्स्थानीय श्रग्नि पहिली साहस्री है, पञ्चदशस्थानीय वायु दूसरी साहस्त्री है, एवं एकविशस्थानीय आदित्य तीसरी साहस्री है । अग्निप्रधान सहस्रमण्डल वैश्वानररूप है, वायुप्रधान सहस्रमण्डल हिर-एयगर्भमय है, एवं आदित्यप्रधान सहस्रमण्डल सर्वज्ञरूप है । पार्थिव वैश्वानर एककल है, ग्रान्तारक्ष्य हिरण्यगर्भ अविध धिष्याग्नि के सम्बन्ध से अकल है, एवं दिव्य सर्वज्ञ एककल है । सम्भूय १७ कलाएँ होजातीं हैं । यही दशकल विराट् पुरुष है । यही ईश्वरप्रजापति है । वैश्वानर - तैजम - प्राज्ञमूर्त्ति पुरुषपशु है । यह पार्थिव प्राण की प्रधानता से ' वैश्वानर ' कहलाता है । सहस्रमूर्ति ईश्वर की यदि कोई साक्षात् प्रतिमा है, तो वह यह पुरुषपशु ही है । इसी आधार पर निम्नलिखित निगम वचन प्रतिष्ठित हैं— १ – “ पुरुषो वै सहस्रस्य प्रतिमा ' ( यजुः सं ० १३ | ४२ ) – ( शत ० ७।५।२।१७ ) | २ - " प्राजापत्यो बैं पुरुषः " ( तै ० ब्रा ० २/२/५३ ) । ३. - " पुरुषः प्रजापतिः " ( शत ० ६।२।१।२।३ ) । ४ - " पुरुषा हि प्रथमः पशूनाम् " । शत ० ६ । २ । १ । १८ ) । ५ – “ पुरुषः पशूनाम् " ( अधिपतिः ) । तां ० ब्रा ० ६।२।७ ) । ६ – “ पोडशकलो वै पुरुष ” ( तै ० ब्रा ० १/७/५/५ ) । ७- " स वाऽय ं पुरुषः सर्वासु पूर्षु ' ( पृ ० अ ० दिवि च ० ) पुरि शयः " ( शत ० १४ | ५ | ५ | १८ ) । २- अश्व पशुः -दूसरा है श्रश्वपशु । अश्वपशु का स्वरूप ग्रापमय सॉरनेज से निष्पन्न होता है । सूर्य का सावित्र तेज ( जोकि सावित्रतेज ' सावित्री ' नाम से प्रसिद्ध है ) भूपिण्ड की ओर आता है । भूपिएड से टकरा कर यह सौरतेज आन्तरिक्ष्य अर्णवसमुद्रगत ग्रपतत्त्व से संश्लिष्ट होता दुआ भूपिण्ड से टकरा कर पुनः अपने सौरलोक की ओर जाता है । पार्थिवप्राण से संलिष्ट होकर लोकालोक - पर्य्यन्त वितत होता हुआ यही सौरतत्त्व ' अश्व ' नाम से व्यवहृत होता है । ग्रप्तत्त्व का अभिमानी देवता वरुण है । अतएव अश्व को ' बारुणपशु ' माना जाता है | परन्तु यह शुद्ध बारुण ही नहीं है । अपितु जो ग्रनरिक्ष्य अपूतत्त्व सौरतेज से संश्लिष्ट होजाता है, वही अपूतत्त्व अश्व की योनि बनता है । अतएव यह वारुण होता हुआ भी ' साँय्यपशु ' माना जाता है । शुद्ध वारुण पशु तो ' महिप ' ( भैंस, भैंसा ) है । वरुण, और इन्द्र में परस्पर विरोध है । अश्व में इन्द्र ( सौरप्राण ) की प्रधानता है, एवं महिष में वरुण की प्रधानता है । अतएव इन दोनों पशुओं में सहज वर है । इसी आधार पर - ' अश्वमाहिन्य ' न्याय प्रतिष्ठित है । आन्तरिक्ष्य प्रापोभाग इसका आत्मा ( शरीर ) है । पतत्त्व ऋतप्रधान होता हुग्रा प्रतिष्ठा शून्य है । अतएव तत्प्रधान अश्वपशु सर्वात्मना अपने शरीर को प्रतिष्ठित रखने में असमर्थ है । अश्वपशु जब भी बड़ा होगा, एक पैर भूपिण्ड से असंपृष्टवत् ही रक्खेगा । सूर्य्यरश्मियों की प्रतिष्ठा सौरकेन्द्र है । सूर्य्य के केन्द्र से चारों ओर से रश्मियों का प्रसार होता है । केन्द्रबिन्दु तद् वस्तु का ' अ ' ( धुरा ) कहलाता है । पृथिवी ७५०

पृष्ठ 487

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण का प्राजापत्याग्निमय केन्द्र उसका अक्ष है । इसके आधार पर भूपिण्ड अहोरात्र में अपने स्थान पर घूम जाता है । इसी से ' दैनंदिनगति ' का स्वरूप निष्पन्न होता है । अक्ष के सम्बन्ध से ही यह पार्थिवर्गात ' स्वाक्षपरि-भ्रमण ' ' नाम से प्रसिद्ध है । सूर्य्य भी भूपिण्डवत् अपने अक्ष के आधार पर स्वस्थान पर घूमता रहता है, जिसका कि प्रत्यक्ष प्रमाण सूर्य्यगत विभिन्न स्थान- स्थित माठर - कपिल - दण्डादि चिह्नों का स्थान परिवर्तन है । यह स्थान ही ' आत ' है । इसी से रश्मियों का विनिर्गम हुआ है । अक्षिस्थान से विनिर्गत सौर-रश्मियाँ ही ' मरीचि ' नाम से व्यवहृत होती हैं । सूर्य अग्निमय है । इससे अनन्त ( सहस्र ) रश्मियाँ निकलतीं हैं । अनन्त रश्मिगत अनन्त सौरप्राण अनन्त रुद्र हैं । इन सब पर उस एक सूर्य का शासन है । यही ' क्षेत्ररुद्र ' कहलाता है । रश्मिस्थ मरीचिमय प्राण विराट है । ' एको रुद्रो न द्वितीयाय ' यह वही सूय्य है । इसी क्षत्र, एवं विद्रुद्र - सम्पत्ति का निरूपणा करती हुई यजुःश्रुति कहती है—

असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुः सुमङ्गलः ।

ये चैनं रुद्रा अभितो दिक्षु श्रिताः सहस्रशो वैषां हेड ईमहे ॥

— यजुः संहिता सूर्यप्रजापति के अक्षिभाग से विनिर्गत रश्मियों के घर्षण से जो पानी उत्पन्न होता है, वही अर्णव समुद्र की प्रतिष्ठा बनता है । चतुर्विध पानियों में से यही सौरपानी ' मरीचि ' नाम से प्रसिद्ध है । ये ही रुद्राग्नि के हैं । सौर जागर्भित यह अश्रु भाग प्रजापति का अक्षि ( हृदय ) है । हृदय ही ऋक्साम के वितान से बहिर्म्मण्डल का कारण बनता है । यही अक्षिभाग पूर्व कथनानुसार रूप में परिणत होता है । यही ' अ ' पृथिवी से संक्रान्त होकर ' अश्व ' रूप में परिणत होता है । रुद्रतेज अतिप्रग्वर है । वही इस पशु का जनक है । अतएव इतर पशुओं की अपेक्षा अश्वपशु को ' वीर्यवत्तम ' माना जाता है । अान्तरिक्ष्य अब्रूगर्भित रौद्रतत्त्व ही ' विद्युत् ' है । यह विद्युत आपोमयी है । अान्तरिक्ष्य ग्रापः ही इसकी प्रतिष्ठा है । ' यदेतदा विद्योतते विद्य न ' ( केनोपनियत ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार यह विद्मत् ' इन्द्र ' है । आपो-मय इन्द्र देवताओं में ' बीर्य्यवत्तम ' है । श्रतएव तत्प्राणप्रधान अश्व भी वीर्यवत्तम है । इसी लिए तो अश्व को सौर्य ( ऐन्द्र ) - पशु मानना युक्तिसङ्गत होता है । अश्वपशु वास्तव में सौरी इन्द्रविद्यत् का ही प्रतिमान है । पोमय यह अश्वपशु भूपिण्ड से सूर्य पर्य्यन्त व्याप्त है । प्रातःकाल से सायं पर्य्यन्त इस अश्व की व्याप्ति है । उषाकाल उपक्रमचिन्दु है, वृषाकपायी उपसंहारबिन्दु है । उषा मस्तक स्थान है । वृषाकपायी पृष्ठ स्थान है | सौग्त्रैलोक्य में मूर्त्ति इन्द्रप्राणप्रधान यह अश्वपशु खड़ा है । इसका सम्यक् परिज्ञान ही वेद का सम्यक परिज्ञान है | सूर्य्य त्रयीमूर्त्ति है । यही वाजिरूप में परिणत होकर जिज्ञासुओं को वेद का स्वरूप चतला रहा है । भगवान् याज्ञवल्क्य ने इसी वाजिरूप सूर्य्य से वेदतत्त्व प्राप्त किया था । इस द्यावापृथिव्य अपप्रधान प्राणात्मक अश्त्रपशु की जिस प्राणी में प्रधानता रहती है, प्राणियों में वही पशु ‘ अश्व ’ नाम से प्रसिद्ध है । पूर्व में अश्वपशु के सम्बन्ध में जो जो स्वरूप बतलाएँ हैं, निम्नलिखित श्रौत वचनों से उन सत्र की पुष्टि होजाती है— ७५१

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मगा १ - " प्रजापतेर्वा अयश्वयत् । तत्परापतत् । तदश्वोऽभवत् । तदश्वस्याश्वश्वम् । तद्देवा श्रश्वमेधेन प्रत्यदधुः " ( ता ० ब्रा ० २१ । ४ । २ ) । २– “ अथ यदश्रु संक्षरितमासीत्, सोऽश्रुरभवत् । अश्रुर्ह वै तमश्व इत्याचक्षते परोक्षम् ” ( शत ० ६ | १ | १।१।१ ) । ३ – “ अद्द्भ्यो हवा अग्रेऽश्वः सम्बभूव । मोद्द्भ्यः समभवन्नमर्गः समभवत् । सर्वो हि नैं समभवत् । तस्मान्न सर्वैः पद्भिः प्रतितिष्ठति । एकैकमेव पादमु-दच्य तिष्ठति " ( शत ० ५१।४।५ ) ४ – “ अत्योऽसीत्याह । तम्मादश्वः सर्वान् पशूनत्येति । ( तै ०० ३०८ । १ । ६ ) ५ - " अप्सुयोनिर्वा अश्वः " ( तै ० ना ० ३ । ८ । ४ । ३ ) । ६ ७ -३ - " श्रश्वः पशूनामोजिष्ठो बलिष्ठः " ( तै ० ब्रा ० ३ । ८ । ७/२ ) । - अश्वः पशूनामन्नादो वीर्य वत्तम: ' ( तै ० ३८ । ७ । १ ) । ८- " क्षत्रं वा श्रश्वो विडेतरे पशवः " ( शत ० १३ ।२।२।१५ ) । - " इन्द्रो वा अश्वः " ( कौ ० ब्रा ० १५।४ ) । १० -- " असौं वा आदित्यो ऽश्वः " ( तै ० ब्रा ० ३।६।२३।२ ) ११ – “ सौय्यों वा श्वः " ( गो ० ब्रा ० उ ० ३ । १६ ) । १२ -- वारुणो हि देवतयाऽश्वः " ( तै ० त्रा ० १।१२।६ ) । १३ - - " रश्मिना वा श्रश्वो यत ईश्वरो वा अश्वोऽयतऽधृतोऽप्रतिष्ठितः पराः परावतं गन्तोः " ( शत ० १३ । ३ । ३ । ५ ) । १४ -- “ समुद्र एवास्य बन्धुः, समुद्रो योनि ः ” ( शत ० १०।६।४।१ ) । १५-- " उषा वाऽश्वस्य मेध्यस्य शिरः " ( शत ० १० । ६ । ४ । १ ) । १६ - - " प्रतूर्त वा जिन्नाद्रव वरिष्ठामनु संवतम् । दिवि ते जन्म परममन्तरिक्षे तव नाभिः पृथिव्यामधि योनिरित् ' ( यजुः सं ० ११।१२ ) । ३ - गौषशुः -ती मग गौ पशु है । इस गौतत्त्व का प्रयत्रस्थान आपोमय परमेष्ठी है, विकासस्थान सूर्य है, एवं व्याप्तिस्थान त्रैलोक्य है । सम्पूर्ण भौतिक प्रपञ्च, सम्पूर्ण यज्ञ इसी ' गौतत्त्व ' पर प्रतिष्ठित हैं । भूत की जननी यही मोममयी गाँ है । परमेष्ठी सोमलोक है । देवता - क्रमानुसार परमेष्ठी के देवता विष्णु हैं । पारमेष्ठव सोम के सम्बन्ध से ही विष्णु ' सोमवंशी ' माने जाते हैं । इसी मनःप्राणवाङमय प्रजापति के ७५२

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द्वितीय अध्याय शतथपब्राह्मण तृतीयब्राह्मण प्राण भाग से गौतत्त्व उत्पन्न होता है । सौम्यप्रारण गौ का आत्मा है । सौर अग्नि गौ का शरीर है । अतएब इसे अमृत की नाभि कहा जाता है, आग्नेयी माना जाता है । सूर्य सहस्ररश्मि है । इसके सम्बन्ध से यह गौतत्त्व सहस्रधा विभक्त होजाता है । सहस्रधा विभक्त गौ के ३३३ रूप पार्थिव वसुदेवता के साथ स.श्लष्ट रहते हैं, ३३३ विभाग अन्तरिक्ष्य रुद्रदेवता के साथ युक्त रहते हैं, एवं ३३३ रूप दिव्य आदि-त्य के साथ सम्बन्ध रखते हैं । एक बच्ची हुई गां ' कामगत्री ' ( पुराणभाषा के अनुसार ' कामधेनु ' ) नाम से प्रसिद्ध है । त्रिधा विभक्त उक्त गौतत्व स्व स्व स्थान में हीं अपना अपना प्रभुत्व रखते हैं, परन्तु यह कामगवी अग्निरुद्र आदित्य तीनों के साथ युक्त रहती है । अहोरात्र में एकवार प्रत्येक प्राणी के साथ किसी न किसी समय अवश्य ही इस कामगवी का सम्बन्ध होता है । जिस समय मनुष्य के साथ इस कामगत्री का सम्बन्ध होता है, उस समय इसके मुख से जो कुछ निकलता है, वह सर्वथा सत्य होजाता है । वह समय अज्ञात है । अतएव शास्त्र का – ' शुभं व्रज्ञान - शुभं यत् ' यह आदेश है । लोक में भी — ' सदा शुभ ही बोलो । किसी को बुरा मत कहो, विदित नहीं, किस समय तुह्मार मुख से क्या निकल जाय ' यह प्रसिद्ध है | ‘ बह समय ' इसी कामगत्री का भोगकाल है । पारमेष्टय - सौम्यप्राणमयी गौं सूर्य्य के साथ युक्त होकर रश्मिरूप में परिणत होजाती है । सौर रश्मियाँ लोकालोक पर्यन्त व्याप्त हैं । गौप्राणमयीं ये राश्मय - उस विष्णुदेवता के गांव के ' शृङ्ग ' ( सींग ) हैं । इमी विज्ञान का लक्ष्य में रखकर श्रुति-कहती है-' या ते धामान्धुश्मसि गमध्ये यत्र गावो भूरिशृङ्गा प्रयासः । अत्राह तदुरुगायस्व विष्णोः परमं पदमवभारि भूरिः ॥ ' इस गौतत्वको रुद्रों की माना, वसुओं की कन्या, एवं आदित्यों की बहिन बतलाया जाता है । द्वादश आदित्यों की समष्टि सूर्य है । पांप्रगायन विज्ञान का निरूपण करते हुए हमने भृगु - अङ्गिरा -त्रि - भेदभिन्न परमेष्ठी के तीन मनोता बतलाए हैं । श्रङ्गिरा की अग्नि, यम, आदित्य, ये तीन अव-स्थाएँ हैं, एव भृगु की अप् - वायु सोम, ये तीन अवस्थाएँ हैं । हमने सौम्या को ही गोतत्त्व बतलाया है । इसका जनक त्रयीगर्भित अमूर्ति मनःप्राणवाङ्गमय परमेष्ठी प्रजापति ही हैं । इधर परमेष्ठी ही नि-रस आदित्य का जनक है | गौ - आदित्य, दोनों एक ही परमेष्ठी की सन्तान हैं । ऐसी अवस्था में हम अव-श्य ही इस गौतत्व के लिए ' स्वसादित्यानाम ' यह कह सकते हैं । रुद्र आन्तरिक्ष्य देवता हैं । ये प्राणप्रधान हैं । इस प्राण से ( रुद्र से ) मरुत् उत्पन्न होता है, मरुत् से मारुत ( स्पर्शधर्म्मा वायु ) उत्पन्न होता है । मारुत का पितामह रुद्रप्राण उसी सौम्य गौप्राण से उत्पन्न होता है । गौतत्त्व को हमने प्रजापति के प्राण से उत्पन्न बतलाया है । प्राण ऋततत्त्व है । इधर अन्तरिक्ष्य रुद्र भी प्राणात्मक होता हुआ ऋत ही है । ऋत का प्रथमरूप पारमेष्ठ्य गौरूप प्राण ही है । स्वयम्भू सत्य है, पारमेष्ठ्य भार्गवतत्त्व ऋत है । यही आगे होने वाली ऋतसृष्टियों का जनक है । ऐसी अवस्था में उस प्राण-प्रधान मौलिक गौरूप ऋततत्त्व को हम अवश्य ही इस श्रान्तरिक्ष्य ऋतरूप रुद्रतत्त्व का जनक मान सकते हैं । इसी आधार पर ' माता रुद्रणाम् ' यह कहना उचित होता है । ७५३

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मा हमने मृत सोम की गति का श्रामा बतलाया है, एवं शरीर आग्नेय बतलाया है । सौररश्मियाँ स्वयं अग्निप्रधान हैं | यही तो इस गौतत्त्व का शरीर है । यह उसी सोमतत्व पर निर्भर है । आप जो गौ की प्रकाशमूर्ति देख रहे हैं, वह ' वं ज्योतिपा त्रितमो ववर्थ ' के अनुसार सोमाहुति का ही प्रभाव है । अग्नि-तत्त्व ' अग्निर्भूस्थान: ' इस नैरुक्त - सिद्धान्त के अनुसार भूलोक की वस्तु मानी जाती है । भूलोकस्थ अग्नि घनता के तारतम्य से, एवं गायत्री - छन्द के सम्बन्ध से अष्टधा विभक्त है । पार्थिव अग्नि की ये आठ -स्थाएँ हीं ' अष्टवसु ' कहलाते हैं । गीतत्व के स्थूलभाग का ( दृश्यात्मक शरीर भाग का ) नम्मांग इस पार्थिव वागग्नि पर ही निर्भर है । इसी आधार पर इसके लिए - ' दुहिता बसनाम् ' यह कहा जा-सकता है । बसु - रुद्र आदित्य ही सम्पूर्ण देवता हैं । सब का गीतत्त्व के साथ घनिष्ट सम्बन्ध है । पृथिवी-अन्तरिक्ष - य - प: - भेद से लोकसंस्था चार भागों में विभक्त है । इन चारों में क्रमश: 33, 333, कु, के, इस क्रम से सहस्रधा विभक्त गौतत्त्व प्रतिष्ठित है, जैसाकि पूर्व में बतला दिया गया है । यदि सोम-मय गौतत्त्व न होता, तो यज्ञ असम्भव था । यज्ञ न होता, तो विश्वसृष्टि असम्भव थी । श्रतएव हम गौतत्त्व को विश्व, एवं विश्वगत सम्पूर्ण प्राणियों का जनक मान सकते हैं । गौतत्त्व लोकरूप है । चारों लोकों में व्याप्त है | ३३ देवताओं का आत्मा है । मृतसोम का केन्द्र है । ऐसे इस प्राकृतिक गौपशु ( प्राणा-मक पशु ) में ही पार्थिव गौपशु का निर्माण होता है । इस प्राणी में वही प्रारण विद्यमान है । यह उसकी साक्षात प्रतिकृति है । दोनों अभिन्न हैं । वह गौतस्व श्रग्न्यवच्छेदेन ऋग्वेद का, बायु अच्छेदेन यजुर्वेद का, आदित्यावच्छेदेन सामवेद का, एवं अवच्छेदेन अथर्ववेद का अधिष्ठाता है । बड़ी अवस्था तत्त्रतिमाभूत इस गौषशु की है । इसीलिए वेदतत्त्वमर्मज्ञ महर्षियोंनें आत्मा में वेदविद्या को विकसित करने का एकमात्र उपाय ' गौसेवा ' ही माना है । सत्यकाम जाबालि गौसेवा के प्रभाव से ही ब्रह्मविन बने थे । कहना न होग । कि, आय्यावर्त्त गोधन के इस महत्त्व को समझते हुए भी इस ओर से आज उदासीन होता हुआ द्रुतगति से नाश की ओर ही अग्रेसर होरहा है । गोपशु सबकी प्रतिष्ठा है । इसी उभयविध ( प्राणात्मक एवं प्राणीरूप ) गोतत्त्व का अभिन्न दृष्टि से निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं— ' माता रुद्राणां दुहितानां स्वस्वादित्यानाममृतस्य नाभिः प्रनुवोचं चिकितुषे जनाय मागामनागादितिं वधिष्ट ॥ - ऋक्सं ० वही सोमरस जगन्माता गौ के स्तनों में प्रतिष्ठित रहता है । जो गुण श्रमृतसोम के बतलाए जाते हैं, श्रायुर्वेदज्ञोंनें भी वे ही रासायनिक गुण गोदुग्ध के माने हैं, जैसाकि वाग्भट्ट कहते हैं-स्वाद पाकर स्निग्धमोजस्यं धातुवद्धनम् । प्रायः पयः

' तत्र गत्र्य तु जीवनीय रसायनम् ।

चतक्षीण हितं मेध्य बल्यं स्तन्यकरं परम् ॥

= अष्टाङ्गहृदये ७५४