Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 491–500

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 491–500

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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण प्रमाणों पर प्रति-श्रचतक गौपशु के सम्बन्ध में हमने जो कुछ बतलाया है, वह निम्नलिखित ष्ठित है--१ – ' इमे वैं लोका गौः ' ( शत ० ६ । ५ । २ । १७ ) । २ – ' यद्धि किंचान ' - गोरेव तत् ' ( शत ० २२ । ४ । १३ ) । ३ – ' यज्ञो ने गौः ' ( तै ० ब्रा ० ३२६ ३ ) | ४ -- ' साहस्रो वाऽएप शतधार उत्सः ( यजुः १३ / ४६ ) यद् गौः ' ( शत ० ७५ २ ३४ ) ५ - ' स हैष मोमोऽजत्रो ( यजुः १३।४३ ) यद्गौः ' ( शत ० ७५२११६ ) ६ – ' वैश्वदेवी वैं गौः ( गो ० ब्रा ० उ ० ३।१६ ) ७ – ' आग्नेयी वै गौः ' ( शत ०७२ / १६ ) ८ - गौर्वा इदं सर्वविभत्ति ' ( शत ० ३।१०।१४ ) । ६ – ' नैते सर्वे पशवो यदजावयश्वारण्याश्च । एते वै सर्वे पशवो यदगव्याः ’ १० ' प्राणो नैं सोमः ' ( शतः ६ । ३ ६ ४५ ) ( तै ० ना ० ३६६२ ) । ११ - ' ( प्रजापतिः ) प्राणाद्गाम् ( निरमिमीत ) ( शत ० ७ | ५ | २ | ६ ) ४ - विपशुः-चौथा पशु ( भेड़ ) है । इसका प्रधान सम्बन्ध श्रान्तरिक्ष्य आपोभाग से है । यह पशु सदा मूलतत्त्व ' दिक्सोम ' है । ऋततत्त्व से ( श्रृप्तत्त्व से ) वेष्टित रहता है । पञ्चाग्निविद्या के अनुसार वृष्टि ' उत्पन्न का होता है । इस सोम की आदित्याग्नि में ' श्रद्धा ' ( सोम की मौलिक श्रवस्था ) की आहुति से ' सोम होजाता है, यही चन्द्रमा ऋत - सत्य, भेद से दो अवस्थाएँ होजातीं हैं । कुछ सोम तो पिण्डरूप में परिणत का ' सहृदयं सशरीरं है । इसी को सायतन - सशरीर होने से ' सत्य ' सोम कहा जाता है । क्योंकि सत्य रूपाधिष्ठाता सौर इन्द्रप्राण सत्यम् ' यही लक्षण है । सायतनभाव के कारण ही इस चन्द्रपिण्ड के साथ चान्द्र - साय-का ( रश्मियों का ) सम्बन्ध होजाता है । इसीसे यह चान्द्र सोम प्रकाशयुक्त होजाता है । तन सोमगत - प्रकाश वास्तव में सूर्य का ही प्रकाश है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में एखकर श्रुति कहती है-' अत्राह गोरमन्यत नाम त्वष्टुरपीच्यम् । इत्था चन्द्रमसो गृहे ' कुछ सोम इतस्तत: दिशाओं में व्याप्त में बहुत होकर ' वृष्टि ' का कारण बनता है । - ऋकसं ० होजाता है | यही सोम वायु के द्वारा पर्जन्याग्नि इसी अभिप्राय से छान्दोग्यभुति कहती है-७५५

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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मण ' पर्जन्यो वाव गौतमाग्निः । तस्य वायुरेव समित् । अभ्र धूमः । विद्युदर्चिः । शनिरङ्गाराः । ह्रादुनयो विस्फुलिङ्गाः । तस्मिन्न तस्मिनग्नौ देवाः सोमं राजानं जुह्वति । तस्याहुतेर्वर्षं सम्भवति ' - छा ० उ ० ५ प्र ० ५ खं ० ४ - ५ खं ० दिशाओं में व्याप्त रहने के कारण हीं यह सोम ' दिक्सोम ' कहलाता है । यह निरायतन है, अतएव-' अशरीरं अहृदयं ऋतम् ' इस लक्षण के अनुसार हम इसे ऋत मान सकते हैं । यही दिक्सोम - ' दिशः श्रोत्रे ' ( यजुः ) के अनुसार ईश्वरप्रजापति का श्रोत्रेन्द्रिय - स्थानीय है । इमी टिकमोम मे हमारी श्रोत्रेन्द्रिय का निर्माण होता है । इसी दिकमोम से / जिसे हमने वृष्टि का अधिष्ठाता बतलाया है ) अविप्राण का विकास होता है । वृष्टि होने पर सर्वत्र ' हरियाली ' होजाती है । यह हरितभाव सोमगत इसी अवि: प्रारण की महिमा है । यह विशेषतः अन्तरिक्ष्य पशु है । इसका विशेष सम्बन्ध पृथिवी से है, द्युलोक से नहीं । अत-एव इसे पार्थिवपशु भी माना जाता है । यही कारण है कि, पार्थिव अजपशु, एवं आन्तरिक्ष्य अविपशु का ‘ भेड़बकरी ' इत्यादि रूप से सहयोग बतलाया जाता है । प्रहविज्ञान के अनुसार उपपशुप्रह से अजपशु उत्पन्न होता है, एवं अन्तर्यामग्रह से श्रविपशु उत्पन्न होता है । उपांशु - अन्तर्याम, दोनों ग्रह सहचारी हैं । इसलिए ये दोनों पशु भी साथ रहते हैं । साथ रहने वाले इन दोनों ग्रहों में उपांशु की आहुति पहिले होती है, अन्तर्य्याम की ग्राहुति पीछे होती है । यही कारण है कि, मेड़बकरियों के झुण्ड में पहिले ( आगे - आगे ) जपशु चलता है, पीछे - पीछे विपशु चलता है । उपांशु की आहुति के अन-न्तर ऊर्ध्वभाग की ओर उसका उन्मार्जन होता है, एवं अन्तर्य्याम का रुख नीचे की ओर रहता है । अतएव अजपशु उछलता, कुदता, ऊपर की ओर ग्रीवा रखता हुआ चलता है, एवं अविपशु नीचे की ओर जमीन सँघता सा चलता है । ( देखिए शत ० ४/५/५ ) । निष्कर्ष यही है कि, विपशु जपशु से मिलता जुलता है । अबिपशु के उपर्युक्त धम्मों का निरूपण करते हुए निम्नलिखित श्रुतिवचन हमारे सम्मुग्व श्राते हैं— १ - - ' इयं वा ( पृथिवी ) अविः । इयं हीमाः सर्वाः प्रजा अवति ' २– - शत ० ६।१ / २ / ३३ | - ' वारुणी ( आपोमयी अत एव ऋतरूपा ) त्वाष्ट्री चाविः ' ३ – ' अन्तर्यामपात्रमेवान्ववयः प्रजायन्ते ' - शत ० ४ | ५ | ३ | - शत ० २२०

४ - - ' अवि नाम देवता, ऋते नास्ते परिवृता ।

तस्या रूपणे वृक्षा हरिता हरितत्रजः ॥

- अथर्व सं ० १० कां ० ४ ० सू ० ३१ मंत्र ५ -- ' ( प्रजापतिः ) श्रोत्रात् - अविम् ( निरमिमीत ) ' - शत ० ७५ | २० | ७५६

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द्वितीयअध्याय ५-- अजपशु: -शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण पाँचवाँ पशु ' अज ' है । यह प्रधान रूप से ' पार्थिवपशु ' है । अतएव हम इसे अग्निप्रधान मान सकते हैं पार्थिव प्रजापति भूकेन्द्र में प्रतिष्ठित है । ' प्रजापतिश्चरति गर्भे ' यह निगम प्रसिद्ध है । केन्द्रम्थ अग्निमूर्ति प्रजापति के आधार पर ही भृपिण्ड प्रतिष्टित है । अतएव इस प्राजापत्यतत्त्व को पृथिवी का अक्ष ( धुरा ) माना जाता है | यह अज्ञाग्नि पूर्वकथनानुसार निरन्तर विस्रस्त होता रहता है | विस्रस्त भाग ही ' प्रवर्ग्य ' ' उच्छिष्ट ' आदि नामों से व्यवहृत होता है । यही उच्छिष्ट पार्थिवाक्ष भाग अजपशु का उपादान बनता है । जो स्थान प्रवर्ग्याग्नि से निष्पन्न होने वालीं ओषधि वनस्पतियों का है, वही स्थान इस अजपशु का है | ओषधि वनस्पतियाँ हमारे अन्न में उपयुक्त होतीं हुई भी क्षीण नहीं होती । क्योंकि यह प्राजापत्य अन्न है । यही अवस्था इस पशु की है । इतर पशुओं की अपेक्षा यद्यपि इसका व्यवहार अधिक होता है । परन्तु यह क्षीण नहीं होता । पार्थिव-प्रजा के लिए प्रधान अन्न ' अज ' कहा जाता है । यह निरन्तर श्रद्यमान होता हुआ भी ' क्षीण ' नहीं होता । श्रुतएव इसे ' अज ' कहा जाता है । सम्वत्मरप्रजापति ईश्वरप्रजापति है । सम्पूर्ण विश्व का उपादान बनता हुआ भी यह मूलरूप से उच्छन्न नहीं होता । हम यदि लौकिक कार्य्यकारण भावों को देखते हैं, तो हमें विदित होता है कि, कार्य्योत्पत्ति के अनन्तर ' कारण ' उच्छिन्न होजाता है । दूध से मलाई उत्पन्न हुई, अच दूध नहीं | लोह से जङ्ग उत्पन्न हुआ । कालान्तर में सम्पूर्ण लोहा जङ्ग बन गया । श्रच लोहे की कहीं सत्त । नहीं । परन्तु ईश्वरीय - संस्था में यह बात नहीं है । प्रजापति के प्रवर्ग्यभाग से निरन्तर पदार्थ उत्पन्न होते रहते हैं, परन्तु वहाँ कभी कमी नहीं होती । इसी आधार पर तो प्रजापति के लिए - " एष नित्यो महिमा ब्रह्मणो न कर्म्मणा वर्द्धते नो कनीयान ' यह कहा जाता है । सम्वत्सरप्रजापति सम्वत्सर में तीन बार प्रसवकर्म्म करता है । इधर अजपशु भी एक वर्ष में तीन सन्ततियों का अधिष्ठाता बनता है । प्रजापति मनःप्राणवाङमय है । प्राणभाग से जैसे गौ पशु उत्पन्न होता है, एवमेव वाग्भाग से अजपशु उत्पन्न होता है । वाक्तत्त्व - ' तस्य वा एतस्याग्नेर्वागैवोपनिषत् ' इस श्री सिद्वान्त के अनुसार अग्नि ही है । यह स्थूल धातु है । इसी से ध्रुव भूलोक बना है । अन्तरिक्षादि धर्त्र ( तरल ) सृष्टियाँ हैं । परन्तु पृथिवी ध्रुव है । अतएव इसे ' कपाल ' कहा जाता है । इस कपालरूप ( ध्रुवभावयुक्त ) भूपिण्ड में अग्नि प्रतिष्ठित है । इस अग्नि का ही नाम ' रस ' है ( देखिए शत ६ का ० ) । इस रस की ब्रह्मौदन - प्रवर्ग्य, दो अवस्थाएँ हैं । ब्रह्मौटन की तीन अवस्थाओं से अग्नि वायु - श्रादित्य, भेदभिन्ना देवसृष्टि होती है, एवं जो उच्छिष्टभाग भूकपाल से संश्लिष्ट रहता है, बही इस अजपशु का उपादान बनता है । इस प्राणात्मक पशु की जिस प्राणी पशु में प्रधानता होती है, वह भी ' अज ' नाम से व्यवहृत होता है । जपशु की उपर्युक्का स्वरूपसिद्धि के लिए निम्नलिखित श्रौत प्रमाण हमारे सम्मुख उपस्थित होरहे हैं-१ - - " अथ यः कपाले रसो लिप्त आसीत् सोऽजो ऽभवत् " । ( शत ० ५ | १ | १ | ११ ) २-- " तस्याचिभ्यामेव तेजोऽस्त्रवन् । सोऽजः षशुरभवत् " । ( शत ० २१ / ७ / १।२ । ) ७५७

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द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मण ३ -- " ( प्रजापतिः ) वाचोऽजम् ( निरमिमीत ) " । ( श ० ७ । ५ । २ । ६ । ) ४ -- " वाग्वाऽजः " ( गो ० ब्रा ० उ ० ३।१६ । ) । पुरुष - अश्व - गौ - वि - ज - इन पांच पशुओं में हीं इतर सत्र पशुओं का अन्तर्भाव है । अतएव दह्न ' सर्वपशु ' माना जाता है, जैसाकि वाजिश्रुति कहती है— ' पुरुषोऽश्वो गौरविरजो भवन्ति । एतावन्तो नै सर्वे पशवः ' । ( शत ० ६।२।४ ) तथाकथित पाँचों प्राणपशुओं से ही प्राणी पशुओं का निर्माण होता है । प्रकरण के आरम्भ में हमने पाँचों पशुओं को ' द्यावापृथिव्य ' बतलाया है । द्यावापृथिवी त्रैलोक्य है । अष्टविध - त्रिलोकियों में से प्रकृत में सम्बत्सररूप - स्तोम्य - त्रिलोकी ही अभिप्रेत है । स्तौम्य - त्रिलोकी में अग्नि वायु - आदित्य, इन तीन ग्राग्नेय देवताओं का साम्राज्य है । तीनों में दो सन्धियाँ पड़तीं हैं । इसप्रकार सम्वत्सराग्नि पञ्चविध होजाता हैं । यही अग्नि की पाँच चितियाँ हैं । इसी आधार पर ' पचितिकोऽग्निः ' यह कहा जाता है । पञ्चाग्नि के कारण ही सम्वत्सरयज्ञ ' पाक्त ' कहा जाता है । इस सम्वत्सर का पञ्चचितिक अग्नि विस्रस्त होकर सर्वप्रथम पार्थिव उषा में बहुत होता है । पार्थिव उषा ' योनि ' है, सम्वत्सराग्नि ' रेत ' है । इस की आहुति से जो नवीन अग्नि उत्पन्न होता है, वह ' कुमार ' नामसे व्यवहृत होता है । पृथिवी में श्राकर सम्वत्सराग्नि अपनी स्वतन्त्र सत्ता खोता हुआ मूर्च्छित होता है, अतएव ' कौ म्रियते ' इस व्युत्पत्ति में इसे ' कुमाराग्नि ' कहा जाता है । पृथिवी की एक साम्बत्सरिक परिक्रमा से तथोक्त कुमाराग्नि का स्वरूप निष्पन्न होता है । यही कुमाराग्नि आगे जाकर १ – रुद्र ( अग्नि ), २ – शर्व ( प ), ३ – पशुपति ( ग्रेोषधि ), ४ – उम्र ( बायु ), ५ – अशनि ( विद्युत् ), ६ – भव ( पर्जन्य ), ७ – महादेव ( चन्द्रमा ), ८– ईशान ( आदित्य ), इन आठ स्वरूपों में परिणत होजाता । ये आठ विवर्त एक ही अग्नितत्त्व की आठ अवस्थाएँ हैं । ' अग्निर्वा रुद्र: ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार यही अष्टमूर्ति शिव है । व्यष्टिरूप से यही ' चित्राग्नि ' नाम से प्रसिद्ध है, एवं समष्टिरूप से यही ' कुमार ' हैं । कुमार ' नत्रम ' है । इसी के तथोक्त आठ भेद हैं । यह चित्राग्नि ही आगे जाकर पुरुष अश्वादि- पाँच पशुओं के रूपमें परि-णत होता है । कुमाराग्नि रुद्र है । वही इन पाँनों पशुओं का अधिष्ठाता है, तत्र रुद्र को ' पशुपति ' माना जाता है । इसप्रकार वह विस्वस्त सम्वत्सराग्नि ही कुमार - चित्र रूपमें परिणत होता हुआ अन्ततः पञ्चपशु रूप में परिणत होजाता है । ' पश्वग्नि ' सम्वत्सराग्नि का अन्तिम परिणाम है । सम्वत्साग्नि विस्रस्त हुआ था । उसे प्रजापतिने अन्तमें इन पशुओं में ही प्राप्त किया । वहाँ उसने अपने रूपको प्राप्त किया । यहीं प्रजापतिने अपने विस्रस्त रूपको देखा, अतएव ' अपश्यत् तस्मात् पशवः ' इस व्युत्पत्ति से यह अग्नि ' पशु ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । इह्रीं पशुओंों से प्रजापति ने अपने विस्रस्त भाग का सस्कार कर अपनी कमी पूरी की ( देखिए! शत ० ६ कां ० १ ० ३-४ बा ० ) । तात्पर्य यही है कि, सम्वत्सरप्रजापति का अग्निभाग पशुनिर्माण में विस्रस्त ( खर्च ) होता रहता है । हम ( पशु ) उसके अग्निभाग को लेकर ही उत्पन्न हुए हैं । इस से प्रजापति में कमी होजाती है । इस ७५८

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण कमी को पूरी करने के लिए प्रजापति हमारा आलम्भन कर देते हैं । श्रालम्भन से हमारे ( पशुओं के ) शरीर का अग्नि उत्क्रान्त होकर प्रजापति के सम्वत्सराग्नि में चित होकर उसके विस्तभाग को | पुन; संहित-परिपूर्ण - कर देता है । इसप्रकार हम उसे खाकर ( उसके श्रग्निभाग को लेकर ) जीवित हैं, एवं अन्ततः वह हमें खाकर अपना स्वरूप प्रतिष्ठित रखने में समर्थ होता है । आदान- विसर्गात्मक यह ' भैषज्ययज्ञ ' निरन्तर होता रहता है । उसका अग्नि हमारे में चित होता रहता है, तो हमारा अग्नि उसमें चित होता रहता है । यग्निचिति के सम्बन्ध से ही यह यज्ञ ' अग्निचित्या ' - ' अग्निचयन ' - ' चिति ' आदि नामों से प्रसिद्ध है । सम्वत्सरप्र जापति को हमने ' अग्निमूर्ति ' बतलाया है । यह अग्नितत्त्व ' श्रद्ध हो प्रजापतेरात्मनो मत्यमासीद्ध ममृतम् ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार अमृत - मर्त्य भेद से दो भागों में विभक्त है । ' अमृताग्नि ' याज्ञिक परिभाषानुसार ' चितेनिवेय ' कहलाता है । एव मर्त्याग्नि ' चित्य ' नामसे प्रसिद्ध है । स्थूल भूताग्नि चित्याग्नि है: सूक्ष्म प्राणाग्नि चितेनिधेयाग्नि है । भूताग्नि भूत है, प्राणाग्नि देवता है । देवता, एवं भूत रूप से ही प्राजापत्याग्नि का विकास होता है । भूतप्राणमय सम्वत्सराग्नि से उत्पन्न होने वाले उपर्युक्त पाँचों पशु भी भूतप्राणमय ही हैं । वहाँ भूतचिति ॠतुरूप है । १ - वसन्त, २ - प्रीष्म, ३ - वर्षा, ४ - शरत, ५ - हेमन्त शिशिर ये पाँच ऋतुएँ पाँच भूताग्नि हैं । इनसे शरीर का निर्माण होता है । पशुओं का शरीर मर्त्य है । इसनें भी मज्जा, अस्थि, स्नाव, मांस, मेद, ये पाँच मर्त्या चितियाँ हैं । वहाँ अग्नि, वायु, आदित्य, २ सांध्य प्रारण भेद से पाँच प्राणचितियाँ हैं । तदनुसार ही यहाँ भी - प्राण, अपान, समान, उदान, ये पांच प्राणाचितियां हैं । दोनों का स्वरूप अभिन्न है । प्रजापति पशुओं के भून- प्राण, दोनों भागों का एकसाथ ही अपने में चयन नहीं करते । अपितु चयन से पहिले प्राण - भूत दोनों चितियों का विशकलन कर देते हैं । पहिले पशु का प्रारण निकल जाता है | यह प्राणचिति स्वतन्त्ररूप से होती है । भौतिक शवभाग शेष रह जाता है । अग्निदाह से यह भी क्रमशः स्वतन्त्ररूप से प्रजापति के भूतभाग में चित होजाता है । इसप्रकार सम्बत्सरप्रजापति स्वयज्ञसिद्धि के लिए पाँचों पशुओं का आलम्भन क्रिया करते हैं । पशुत्रों के आलम्भन से ही वह अमृतभावापन्न बन रहा है । यदि पार्थिव पाँचों पशुओं का आलम्भन न होता, एवं केवल नित्य नवीन पशु उत्पन्न ही होते रहते, तो कुछ ही समय में सम्वत्सरप्रजापति श्रपनी प्रतिष्ठा खोबैठते । परन्तु ऐसा नहीं होता । उसे आलम्भन करना पड़ता है । आलम्भन के अनन्तर जो उभयविध अग्निभाग उसमें जाता है, इसी से वह एकप्रकार से जीवित है । इसी आधार पर - ' इतः प्रदाना ह्येते ( उपजीवन्ति ) ' यह निगमवचन प्रतिष्टित है । सम्पूर्ण प्रपञ्च का निष्कर्ष यही हुआ कि सम्वत्सरप्रजापति स्वस्वरूपसिद्धि के लिए तद्द्वारा, एवं अमृतत्त्वप्राप्ति के लिए निरन्तर पाँचों पशुओं का आलम्भन किया करते हैं । और प्राकृतिक पश्वालम्भन का यही संक्षिप्त स्वरूप निदर्शन है । जिस प्रकार पिता, पुत्र, पत्नी, स्वामी, इत्यादि शब्द सापेक्ष हैं, उसी प्रकार ' प्रजापति ' शब्द भी स्वामी सेवक भावानुबन्धिनी सापेक्षता से नित्य समन्वित है । जैसे पुत्र पिता की, पत्नी पति की एवं स्वामी सेवक की अपेक्षा रखता है, उसी प्रकार प्रजापति प्रजा की अपेक्षा रखता है । बिना प्रजा के जिस प्रकार ७५६

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयमा बागा ' राजा ' शब्द निरथक है, उसी प्रकार चिना प्रजा के ' प्रजापति ' शब्द का भी कोई मूल्य नहीं है । इसी सापेक्ष भाव को लक्ष्य में रख कर आप्तपुरुष प्रजापति का श्रात्मप्राणपशुसमष्टिः प्रजापतिः ' यह लक्षण किया करते हैं । आत्मा भोक्ता है, प्राण भोगसाधन है, एवं पशु भोग्य है । भोक्ता, भोगसाधन, एवं भोग्य की समष्टि ही प्रजापति है । समष्टि एवं यष्टिरूप से सच में तीनों माय विद्यमान हैं । इसी आधार पर ' प्रजापतिस्त्वे वेदं सर्व ' यदिदं कि ( शत ० ब्रा ० ) यह निगम प्रतिष्ठित है । वह तत्त्व, जो स्वयं आत्मनिर्भरता रखने में समर्थ न हो, ' पशु ' है । जिस तत्त्व पर आत्मप्रजापति भोग्यरूप से दृष्टि स्वता हो, वहीं पशु है सम्बत्सर प्रजापति का वह भाग 1 जिस से प्रजापति अपने विस्तभाव की पूर्ति करता है, वही पशु है । सम्वत्सरप्रजापति का वित्रस्तभाग प्रवचन कर सबसे पहिले पार्थिव उपाग्नि में बहुत होता है । उषा ' योनि ' है, सम्वत्सराग्नि का प्रवर्ग्यभाग ' रेत ' है । अन्तरिक्ष में याप्त मातरिश्वा वायु ' रेतोधा ' है पृथिवी की एक साम्यत्सरिक परिक्रमा से पार्थिव उषा में शिक सम्बत्स -राग्नि पृथिवी की वस्तु बन जाता है । दूसरे शब्दों में अपनी स्वतन्त्र सत्ता से अभिभूत होता हुया पृथिवी में मूर्ति डोजाता है, पृथिवी वस्तु बन जाता है । अतएव ' की म्रियते ' इस व्युत्पत्ति से यह प्रयग्नि एक सम्वत्सर के अनन्तर ' कुमार ' नाम से व्यवहृत होने लगता है । आगे जाकर यह कुमाराग्नि ऋष्टविध चित्याग्नि के रूप में परिणत होता है । चित्राग्नि हीं यागे जाकर पचपशुरूप में परिणत हुआ है, जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । प्रकृत में उक्त सिंहावलोकन से यही बतलाना है कि, प्रजापति के भौग्य केवल ' पञ्चपशु ' ही बनते हैं । यह लोक में प्रसिद्ध है कि, जब किसी व्यक्ति की किसी पर दृष्टि पड़ती है, तो कहा जाता है - ' अमुक व्यक्ति की अमुक बात पर दृष्टि पड़ गई । भोगेच्छा में हिसूत्र को ही प्रधानता दी जाती है । इसी दृष्टिभाव को लक्ष्य में रखकर ' पशु ' शब्द का ' यद पश्यन -- तस्मात् पशुः ' यह निर्वचन किया जाता है । श्रात्मा पशुपति है, प्राण पाश है, एवं वाग्भाग पशु है । तीनों की समष्टि ही पशुपति है । प्रत्येक वस्तु के साथ तीनों भाग नित्य सम्बद्ध हैं चीटियों के दल को देखिए । वहाँ एक अतिस्थूल चींटी सच पर शासन करती हुई ही चलती मिलेगी । ग्रहस्थसंस्था में एक प्रजापति अवश्य होगा । बालक्रीड़ा में एक बालक सम्पूर्ण बालमण्डली का अवश्य ही अधिष्ठाता बन जायगा । अन्य पशुओं का मृगेन्द्र स्वाभाविक शासक मिलेगा । निदर्शनमात्र है । सर्वत्र प्रजापति की सत्ता मिलेगी । इसी आधार पर तो - प्रजापते न वदेतान्यन्यो विश्वा जानानि परिताबभूव इत्यादि मन्यन्त चरितार्थ होती है । ' पशु भाग्य है. पशुपति भोता है ', यह पूर्व के निदर्शन से भलीभांति सिद्ध होजाता है । भोका-तत्त्व को विज्ञानभाषा में ' अन्नमन्ति ' इस व्युत्पत्ति से ' अन्नाद ' नाम से व्यवहृत किया जाता है, एवं भोग्य को ' असे ' इस व्युत्पत्ति से ' अन्न ' कहा जाता है । अन्नाद अग्नि है, एवं अन्न सोम है । ऐसी अवस्था में हम पशु को सोम, एवं पशुपति को अग्नि नाम से व्यवहृत कर सकते हैं । पशु अन्न है । इसे हमने ' वाक् ' कहा है । जिन रश्मियों से केन्द्रस्थ पशुपति पशु को अपना अन बनाता है, हृदय से चारों ओर अशनाया-रूप से वितत होने वाला वह रश्मिभाग ही ' प्राण ' नाम से प्रसिद्ध है । एवं जहाँ से प्राण उठता है, वह मूलतत्त्व [ आत्मा ] ' उक्थ ' नाम से व्यवहृत होता है । पूर्वोक्त आत्मा, प्राण, पशु, ही क्रमश: उक्थ--७६०

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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मगा तृतीयब्राह्मण अर्क - अशीति है । उक्थ अनादाग्नि है, अर्क अग्निरश्मियां हैं, एवं अशीति पशु अन्न है । इसी अशीतिरूप पशु की आहुति से उक्थाग्नि स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रहता है । ' उक्थ ' नाम अशीति के सम्बन्ध पर ही प्रति-ष्ठित है । बात यथार्थ है । जत्रतक शारीराग्नि में अन्नसोम की आहुति होती रहती है, तभीतक वह अग्नि अभिव्यक्त रहता है । उक्थाग्नि का आख्यान [ नाम, प्रसिद्धि ] अशीति पर ही निर्भर है । अशीति ही महदुक्थ के विवम्त भाग को पूर्ण कर आप्यायित करती रहती है । इसी सहज - प्राकृत विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-' अशीतिभिर्हि महदुक्थमाख्यायते ' ( शत ० १० । १ । २।६ ) ' आत्मा महदुक्थम् ' ( शत ० १०/१/२/५१ ) आत्मा ‘ उक्रू ' है | अन्न ' थम् ' है । ' श्रम ' प्रतिष्ठाभाव का द्योतक है । ' उ ' प्राग्ा का, एवं ' क ' कार वाक् कायोतक है । आत्मा स्वयं मनः प्रधान है । मन बिना प्राण, वाक के अनुपपन्न है । वाक् में उ - प्र - क् इतने अक्षर हैं । ' उकार ' प्राण का वाचक है, ' अकार ' मन का वाचक है, एवं ' ककार ' वाक् का वाचक है । आत्मा में अकारकला का अन्तर्भाव है । शेष उकार ( प्राण ), ककार वाक् ) चचते हैं । इन दोनों का अकारात्मक ( मनोमय ) आत्मा के साथ नित्य सम्बन्ध है । अतएव श्रात्मा के लिए ' स वा एष आत्मा-वाङ्मयः प्राणमयो मनोमय: यह लक्षण किया जाता है । इसी त्रिपुटि - भाव को लक्ष्य में रखकर ऋषि ने ग्रात्मा को ' उक् ' शब्द से व्यवहृत किया है । इस अन्नादरूप उक् ( आत्मा ) की प्रतिष्ठा अन्न है । वहीं आत्मा ठहरता है । अतएव अन्न को - ' थम ' शब्द से व्यवहृत किया गया है । ' उक् - थम ' दोनों की समष्टि ही ‘ उक्थम् ' है । अन्नान्नाद की समधि ही उक्थ है । अग्निसोम उक्थ है । आदित्य चन्द्रमा उक्थ है । ' समुदाये दृष्टः शब्दा अवयवेष्वपि वर्तन्ते ' इस सिद्धान्त के अनुसार श्रात्मा भी उक्थ कहलाता है, एवं अन्न भी उक्थ कहलाता है । पशुभाग आत्मा की वाकू कला है । यह वाक् अमृता - मर्त्या भेट से दो भागों में विभक्त है । श्रमृतावाक ' इन्द्र ' नाम से प्रसिद्ध है । यह इन्द्र ( जो कि ' श्वा ' नाम से प्रसिद्ध है ) - ' नेद्रादृते पवते धाम किञ्चन ' के अनुसार सर्वत्र व्याप्त है । कोई स्थान इस इन्द्रतत्व से शून्य नहीं है । जिसे आप शून्यस्थान समझते हैं, वहाँ भी उक्त ' वा ' इन्द्र व्याप्त है । ' श्वा ' इन्द्र के अवस्थान से ही ' शुने हितम् ' इस व्युत्पत्ति से वह स्थल शून्य कहलाता है । यही सृष्टि का आलम्बन है । यही अमृताकाश है । इसे ही ' परमे व्योमन ' कहा जाता है । यही सत्रका अध्यक्ष है । मर्त्यावाक् इन्द्रपत्नी है । यही मर्त्याकाश है । जिसके लिए ' तस्माद्वा-एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः यह कहा जाता है । वह आकाश ' इन्द्रपत्नी ' नाम से प्रसिद्ध है । यही मर्त्या-काश है । यही विश्व का उपादान है । यही वाक्तत्त्व उत्तरोत्तर होने वाली बलचितियों के कारण क्रमशः वायु, तेज, जल, मृत् रूप में परिणत होता हुआ पञ्चभूतस्वरूप में परिणत होजाता है । दृश्य प्रपञ्च पञ्चभूत का समुच्चय है । पञ्चभूत का मूल उपादान ' वाकू ' ( मर्त्यावाक् ) है । इसी विज्ञान के आधार पर - ' अथो वागेवेदं सर्वम् ' - ' वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता ' इत्यादि निगम वचन प्रतिष्ठित हैं । विश्व की भाँति ही विश्वज्योति है । मान ज्ञान ७६१

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द्वितीय अध्याय प्रकाण्ड • ततीयब्राह्मण है । ज्ञान प्रकाश है । आँख खोलने के साथ ही विश्वप्रपञ्च हमारे सम्मुख ग्राजाता है । यह एक प्रकार की ज्योति है । यदि वाङ ्ममय पञ्चभूत न होते, तो विश्वजोति का अभाव था । ऐमी अवस्था में हम वागूरूप पशुको अवश्य ही विश्व जोति मान सकते हैं । अपि पञ्चभूत ही हमारे अन्न हैं । बिना अन्न के सर्वत्र अन्धकार है । इसीलिए भी अन्नपशु को, किंवा पशुअन्न को विश्वज्योति ( सर्वज्योति - सत्रका प्रकाश ) कह सकते हैं । पशुसोम की आहुति से ही अन्नादाग्नि प्रदीप्त होता है । अग्नि में सोम की आहुति होना हीं यज्ञ है । ऐसी अवस्था में ' तास्रख्यात्ताच्छच्यम् ' इस न्याय के अनुसार यज्ञस्वरूप - समर्पक होने से इस पशु को ' यज्ञ ' भी कहा जासकता है । प्रत्येक वस्तु को हमने ' प्रजापति ' कहा है, साथ ही उसमें आत्मा प्राण - पशु - इन तीन कलाओं की सत्ता बतलाई है । आत्मतत्त्व ' प्रजापतिरति गर्भेऽन्तरजायमानः ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार वस्तु के केन्द्र में हृदयाकाशस्थ दहराकाश ( दभ्राकाश ) में प्रतिष्ठित रहता है । प्राणतत्त्व ( जोकि रूप - रस- गन्ध-स्पर्श - शब्द से अस्पृष्ट तत्त्व है ) वस्तु में सर्वत्र व्याप्त रहता है । पाञ्चभौतिक क्षरपरमाणुत्रों को एकसूत्र में बद्ध रखकर नियत काल पय्यन्त वस्तुपुद्गल को स्व स्वरूप में प्रतिष्ठित रखने वाली शक्ति ही ' प्राण ' है । यही दार्शनिक भाषा में ' कूटस्थ अक्षर ' नाम से प्रसिद्ध है । यही प्राणतत्त्व ब्राह्मणग्रन्थों में ' विधर्त्ता ' नाम से व्यवहृत हुआ है । जिस दिन यह प्राण वस्तु से निकल जाता है, उस दिन वस्तुगत परमाणु श्लथ होजाते हैं । फलतः बस्तुस्वरूप ही उच्छिन्न हो जाता है । तीसरा है वाक्तत्व । यही ' क्षरः सर्वाणि भूतानि ' के अनुसार ' विपरिणामी ' होने से ' क्षर ' नाम से प्रसिद्ध है । जिसे आप चर्म्मचक्षुत्रों से देखते हैं, जो वस्तु का शरीर है, वही बागुभाग है । यही पूर्वपरिभाषानुसार ' पशु ' है । इसी आधार पर वाकूपिण्ड ( प्रत्येक वस्तु वस्तु के दृश्य स्थूल पाञ्चभौतिक पिण्ड ) को ' पशु ' माना जाता है । उत्पन्न होने वाले पदार्थमात्र पशु हैं । इनमें - माता- पिता - पुत्र तीन भाग सम्मिलित रहते हैं । माता का शोणित, पिता का शुक्र, एवं तीसरा औपपातिक श्रात्मा, तीनों के समन्वय से प्राणी पशु का स्व-रूपळनिष्पन्न होत । हैं । अपिच प्रकारान्तर से – गर्भ, उल्व, जरायु, मेट से भी प्राणी पशु तीन भावों से नित्य आक्रान्त है । इसी आधार पर पशु को ' त्रिवृत ' माना जाता है । पूर्व में पशु के सम्बन्ध में जो कुछ विशेषताएँ बतलाई गई हैं, वे निम्नलिखित श्रौत बचनों से स्पष्ट होजातीं हैं— १ – ' एष ( अग्निः ) उऽबोक्, तस्यैतदन्न थम्, तदुक्थम् ' | ( शत ० १० | ४ | १ | ४ ) २ –'आदित्यो वा उक् । तस्य चन्द्रमा ( सोम ) एव थम् । ( शत ० १० ६ । २ । ६ ) ३ ' पशुर्वे प्रत्यक्षं मोम: ' ( शत ० ५ | १ | ३ | ७ ) ४ – ' सोम एष प्रत्यक्षं यत् पशु: ' ( कौ ० प्रा ० १२।६ ) ५- ' पशवा वा उक्थानि पशवो विश्वं ज्योतिः ' । ( तां ० ब्र ० १६।१०।२ । ) ६ – ' पशवो यज्ञः ' ( शत ० ३ | १ | ४१६ ) -७६२

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द्वितीयश्रध्याय ७ - ' व पुर्हि पशवः ' ऐ ० ब्र ० ५।६ ) शतपथब्राह्मण — ' त्रिवृद्धं पशवः - पिता, माता, पुत्रः । अथो गर्भ, उल्वं, जरायुः ' ८-( शत ० मा ६२२ ) तृतीयब्राह्मण पूर्वप्रकरण से यह निर्विवाद सिद्ध होजाता है कि, बिना पशु के यश कटापि सम्पन्न नहीं होसकता । यज्ञार्थ पशुहिंसा निवार्थ है । पशु की उत्पत्ति एकमात्र यज्ञ के लिये ही हुई है । यज्ञ आत्मा का स्वरूप हैं । इसके लिए यदि पशु का आलम्मन किया जाता है, तो पशु ' स्वादिष्ट ' ( आत्मोपयोगी ) है । यदि मन-स्तुष्टि के लिए पशुका मारण किया जाता है, तो यह ' मदिष्ट ' है । इन्द्रिय- लोलुपता से माँस खाना मन को प्रसन्न करना है । यही ' मदिष्ट ' भाव है । यह प्रत्यवाय का कारण है, आत्मपतन का हेतु है । आसुरी बुद्धि बाले नरराक्षस ही इस वृत्ति को प्रधान मानते हैं । परन्तु जो दैवीसम्पत् - युक्त ' देवपद ' भाक वैज्ञानिक मनु-ब्य हैं, वे केवल यज्ञसिद्धि के लिए ही पशु का श्रालम्भन करते हैं । उनके लिए पशु इन्द्रियतृप्ति का साधन नहीं, अपितु श्रात्माभ्युदय का कारण है । दह्रीं दोनों उत्तमाधम वृत्तियों का उल्लेख करते हुए महर्षि ताण्ड्य – कहते हैं-* - पशुवपानुगत - ' मेघ ' के सम्बन्ध में आजकल के कल्पनाभक्त विद्वान् परानुरञ्जनरूपा भावुकतामात्र के संरक्षण - व्यामोहन से व्यामुग्ध बनते हुए पश्वालम्भन, तथा पशुमेध, आदि शब्दों के काल्पनिक-अर्थों का मर्जन करते हुए अपनी दिग्देशकालानुबन्धिनी लोकैषणा को सफल करते रहने के लिए श्राकुल ब्याकुल बने हुए हैं, जैसाकि उनके समाचारपत्रानुबन्धी व्यामोहक सामयिक - लेखों से स्पष्ट है । प्रस्तुत पश्त्रालम्भनमीमांसा से उन काल्पनिक - अध्यात्मवादियों का उद्बोधन होगा, ऐसी आशा की जासकती है । निरूपित इस श्रौतसन्दर्भ के साथ साथ ही निम्नलिखित स्मार्त्त- सन्दर्भ की ओर भी हम उन कल्पनाभक्कों का ध्यान आकर्षित करेंगे, जिस सन्दर्भ के द्वारा विस्पष्ट शब्दों में पश्चालम्भन समर्थित है—

१- नात्ता दुष्यत्यदन्नाद्यत् प्राणिनोऽहन्यहन्यपि ।

धात्रैव सृष्टा धायाश्च प्राणिनोऽतार एव च ॥

२ - यज्ञाय जग्धिर्मा सस्येत्येष देवों विधिः स्मृतः ।

श्रतोऽन्यथा प्रवृत्तिस्तु राक्षसो विधिरुच्यते ॥

३ - कीच्या स्वयं वाप्युत्पाद्य परोपकृतमेव वा ।

देवान् पितृ श्चार्चयित्वा खादन्मांसं न दुष्यति ॥

४ - नाद्यादविधिना मांसं विधिज्ञोऽनापदि द्विजः ।

जग्ध्वा ह्यविधिना मांसं प्रत्य तैरद्यतेऽवशः ॥

५ न तादृशं भवत्येनो मृगहन्तुर्धनार्थिनः ।

यादृशं भवति प्रेत्य वृथा मांसानि खादतः ॥

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द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मण ' स्वादिष्टा नै देवेषु पशव आसन्, मदिष्टा असुरेषु ' - तां महात्राः ८४२ सभी यज्ञों में पशु अपेक्षित हो, यह बात नहीं है । सोमतत्त्व सब यज्ञों में अपेक्षित है, परन्तु अवस्था-न्तर मे । कहीं त्रिःसोम पर्याप्त है, कहीं वाजसोम पर्याप्त है, कही ग्रहसोम ( वल्लीसोम ) अपेक्षित है, तो कहीं पशवपागत सोम ही काम में लाया जाता है । प्रवृति के नित्ययज्ञ भिन्न भिन्न सोमों से निष्पन्न होते हैं । उह्नीं के आधार पर वैध यज्ञों का आविष्कार हुआ है । अतः उन प्राकृतिक यज्ञों में आहुतिद्रव्य की जो व्यवस्था ऋषियोंनें उपलब्ध की है, उसी का वैधयज्ञों में विधान किया है । किसी यज्ञ में हवि का विधान देखकर सर्वत्र हवि का विधान मान लेना, एवं पशुविधान देखकर सर्वत्र पशुवपा की कल्पना करना नितान्त असङ्गत है । ऋषियोंनें सूत्रग्रन्थों में तत्तत् यज्ञो की जो तत्तत् पद्धतियाँ बतलाई हैं, वे ही हमारे लिए मान्य हैं । तदनुगमन में हीं हमारा अभ्युदय | अपनी मनोवृत्ति के अनुसार कल्पित पद्धतियाँ बना डालना, शब्दों के मनमाने अर्थ कर बैठना, अपने कल्पित सिद्धान्त से विरुद्ध शास्त्रीय वचनों को प्रक्षिप्त मानलेना विक्षिप्तता के अतिरिक्त और क्या माना जासकता है? । प्रकरण के आरम्भ में हम बतला चुके हैं कि, यज्ञ में पशु अपेक्षित नहीं है -अपितु प्रधानरूप से ( प्रधान देवता के लिए ) ' पा ' अपेक्षित है । क्योंकि वपा में हीं वह प्राणदेवता प्रतिष्ठित रहता हैं । यज्ञ के द्वारा हम अपने मानुषात्मा को आधिदैविक प्राणदेवता के साथ ( ग्रन्थिवन्धन- सम्बन्ध के द्वारा ) संलग्न कर देते हैं | हमारा मानुषात्मा पार्थिव प्राणप्रधान है । उधर दिव्य देवप्राण सौरप्राण - प्रधान है । इस विजा-तीयभाव के कारण दिव्यप्राण का मानुषात्मागत पार्थिव प्राण के साथ योग नही होसकता । इस विप्रतिपत्ति को दूर करने के लिए ही ' पशुत्रपा ' को मध्यस्थ बनाना पड़ता है । साक्षात्कृतधर्म्मा ऋषियोंनें अनन्तकाल की परीक्षा के अनन्तर यह निश्चय किया कि, तत्तत् प्राणदेवता तत्तत् पशुवपा में प्रतिष्ठित हैं । अतः तत्तग्रज्ञ-विषयों में उह्नोंने तत्तत् पशुओं का विधान किया । दिव्यप्राण सौरप्राण है । यह असुरों का विरोधी है । श्रुतः वपा निकालने के वे ही उपाय ऋषियोंनें निर्णीत किए, जिनसे कि असुरप्राण का वपाप्राण पर आक्रमण न हो । लोहधातु श्रासुर धातु है । अतएव शस्त्र से आलम्भन न कर ' मुष्टि ' के आघात से ही आलम्भन का विधान किया गया । श्रालम्भन करते समय जो पशु का शब्द निकलता है, वह दुःखमय होता हुआ श्रासुर है । अतः उसका भी बलात् निरोध किया गया ।

६ - नियुक्तस्तु यथान्यायं यो मांसं नाति मानवः ।

स प्रेत्य पशुतां याति सम्भवानेकविंशतिम् ॥

७- असंस्कृतान् पशून् मन्त्रैर्नाद्याद्विप्रः कदाचन ।

मन्त्रैस्तु संस्कृतानद्याच्छाश्वतं विधिमास्थितः ॥

= -बज्ञार्थ पशवः सृष्ट्वा स्वयमेव स्वयम्भुवा ।

यज्ञस्य भूत्यै सर्वस्य तस्माद्यज्ञे वधोऽवधः ॥

- मनुः ५। ३० से ३६ पर्य्यन्त ७६४