Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 501–510
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 501–510
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द्वितीयश्रध्याय शतपथब्राह्मण तृतीयब्राह्मण ' हमेदस्तु पासा ' के अनुसार हृदयस्थान में एक श्वेत झिल्ली के आकार का सर्वशरीर - प्रति-। यही ' मेद ' कहलाता है । इसीके द्वारा ष्टारूप जो सोममय स्निग्ध धातु है, वही ' वपा ' नाम से प्रसिद्ध है यः कर्त्ता यजमान स्व- श्रात्मप्राण को दिव्य देवता के साथ मिलाने में समर्थ होता है । अतएव ' मेघृ सङ्ग-गमने ' के अनुसार इसे ' मेघ ' कहा जाता है । ' मेघ ' एक प्रकार की चर्बी ( घृत ) है । यही तत्ततपशु का प्रयतन है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-१- ' मंदो ने मेधः ( श ० ३ | ८ | ४ | ६ ) २ - ' पशु मेघः ' ( ऐ ० ब्रा ० २।६ ) ३- ' मेधो वाश्राज्यम् ' ( तै ० ब्रा ० ३ || १२ | १ ) सर्वत्र पशुमेध ही अपेक्षित हो, यह बात नहीं है । मेघ - ग्रहण - व्यवस्था यज्ञस्वरूप पर ही निर्भर है । जैसा यज्ञ होगा, तदनुरूप ही मेघ अपेक्षित होगा । उदाहरणार्थ चयनयज्ञ द्यावापृथिव्य यज्ञ है । अतः यहाँ द्यावापृथिव्य, पूर्वप्रतिपादित पाँचों पशु अपेक्षित रहते हैं । सोमयज्ञ सम्वत्सरयज्ञ है । उस की प्रतिकृति अजपशु है । अतः वहाँ इसी की प्रधानता रहती है । प्रकृत दर्शपूर्णमामयज्ञ का केवल भूविएड के साथ सम्बन्ध है : यहाँ पार्थिव मेधरूप श्रीहि यत्र से ही काम चल जाता है । भूपिएड सत्र यज्ञों की प्रतिष्ठा है । इस पर उत्पन्न होने वाले श्रीहि यत्र में आशंकिरूप से उक्त पाँचों पशुओं का मेघभाग विद्यमान है । पुरुपपशु का मेघ भाग अश्व का उपादान बनता है, अश्त्र का मेघ भाग गाँ में आता है । गौ का मेघ भाग आन्तरिक्ष्य अविपशु में मंकान्त होता है, एवं अत्रि का मेघभाग पार्थिव श्रज पशु में आता है । अज में पाँचों रस हैं । श्रतएव अज को ' सर्वपशु ' माना जाता है । और प्राणात्मक इसी पशु के मेघ भाग से श्रीहि यत्र की पुष्टि होती है । यज्ञविज्ञान के प्रारम्भिक समय में देवता पदभाक् महर्षि यज्ञ के मम्बन्ध में श्रध्यवसायपूर्वक अपना तत्त्वान्वेषणात्मक परीक्षणकम्मं ( शुष्केष्टियों के द्वारा ) सतत प्रक्रान्त रखते थे । जब वे दर्शपूर्णमास यज्ञ करने लगे, तो मेघसम्पत्ति की उ आवश्यकता प्रतीत हुई । तदर्थं सर्वप्रथम उह्नोंनें ( परीक्षा के लिए ) पुरुष-पशु का आलम्भन किया । परन्तु उह्नोंनें आगे जाकर यह निश्चय किया कि, पुरुष का मेध तो गौ में संक्रान्त रहता है । अतः यदि इसीसे काम चल जाय, तो पशुश्रेष्ठ पुरुष का ( दर्शपूर्णमास की स्वरूप सिद्धि के लिए ) क्यों श्रालम्भन किया जाय । यह सोचकर उह्नोंनें गौ का आलम्भन किया । गौतत्त्व में भी वह पार्थिव अंश न मिला, जो पार्थिवप्रधान दर्शपूर्णमास में अपेक्षित था । अविका श्रालम्भन किया गया । वहाँ भी वे कृत— कार्य्य न होसके । अज का श्रालम्भन किया गया । वहाँ भी पूर्णतया अभीष्ट फलसिद्धि न हुई । अन्ततोगत्वा वे इस निश्चय पर पहुँचे कि - त्रीहि यव में वही मेघभाग विद्यमान है । एवं इससे दर्शपूर्णमास यथावत् सम्पन्न होसकता है । इस चरम परीक्षा के अनन्तर दर्शपूर्णमास में पुरोडाशरूप इसी पशु का विधान कर दिया गया । प्रकारन्ति से विचार कीजिये । पुरुष को प्राणवियोग होने के अनन्तर यदि शीघ्र ही नहीं जला दिया जाता है, तो वह सड़ने लगता है । थोड़ी देर में ही तद्गत वायु दुर्गन्ध युक्त होजाता है । कारण इसका यही ७६५
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड तृतीयब्राह्मण है कि, पुरुष का मेध अत्यन्त शीघ्र उत्क्रान्त होजाता है । एवं मेघ ही शरीर में ऐसा तत्व है, जो तद्गत दोषयुक्त वारुण भाव को नष्ट कर शरीर को पवित्र बनाए रखता है । पुरुष की अपेक्षा श्रश्व का मेघ ( प्राण-वियोग होने पर भी ) कुछ देर में उत्क्रान्त होता है, अतः यह पुरुषशत्र की अपेक्षा देर में सड़ता है । अश्व की अपेक्षा गी और भी अधिक विलम्बसे सड़ती है । गौ की अपेक्षा अवि, एवं सर्वापेक्षया अज का मेध अत्यधिक काल में उत्क्रान्त होता है । यही कारण है कि, इतर पशुओं का मांस शीघ्र ही दुर्गन्ध देने लगता है, दूषित होजाता है । जबकि अजमाँस बहुत समय पर्य्यन्त दूषित नहीं होता । अतएव मांस को ' खाद्य ' पशु मान लिया गया है । प्रचार भी अधिक मांस का ही सुना जाता है । इसी अभिप्राय से श्रति कहती है--' एष एतेषां पशूनां प्रयुक्ततमो यदजः ' ( श - ब्रा -२ / ८ ) अज की अपेक्षा भी बीहि यव का मेघ चिरस्थायी है, यह स्पष्ट ही है । दर्शपूर्णमास प्रकृतियज्ञ है । मौलिक यज्ञ है । प्रतिष्ठायज्ञ है । अतः यहाँ वही मेघ उपयुक्त होसकता है, जो कि चिरस्थायी हो, प्रतिष्ठाभाव से युक्त हो । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषियोंने इस यज्ञ में ' पुरोडाशपशु ' को ही प्रधान माना है । पाँचों पशुओं का जत्र प्राण उत्क्रान्त होजाता है, यदि पाँचों को नहीं जलाया जाता है, तो उत्क्रान्त-मेधा ये पांचों पशु मिट्टी में मिल जाते हैं । उस मिट्टी से जो प्रवर्ग्य पशु उत्पन्न होते हैं, उन्हें श्रमेध्य पशु माना जाता है । उनमें मेधभाग यत्किञ्चित् भी नहीं रहता । मेषभाग बुद्धिवर्धक है । श्रमेध्य मांसभाग बल-वर्धक बनता हुआ आसुर है । दिव्यबुद्धि को नष्ट करता है । दिव्यविज्ञानशक्ति का, विवेकभाव का समूल विना-शक है । ऐसे अमेध्य पशु पाँच हैं । पुरुष से ' किपुरुष ' उत्पन्न हुआ है । अश्व से ' गौर पशु ' उत्पन्न हुआ है । गौ से ' गत्रयपशु ' उत्पन्न हुआ है । श्रविपशु से ' उष्ट्रपशु ' उत्पन्न हुआ है । एवं अज से ' शरभपशु ' उत्पन्न हुआ है । उत्क्रान्तमेधा पञ्च पशुओं के प्रालब्ध भाग से ही इन श्रमेध्य पञ्च पशुओं का विकास हुआ है । ये पाँचों ' उपपशु ' नाम से भी प्रसिद्ध हैं । याज्ञवल्क्य कहते हैं कि, ये पाँचों उपपशु ' उपक्रान्तमेघा ' हैं । इनमें श्रारभाव - वद्ध'क शुद्ध ' श्रामिष ' भाग ही है । अतः इनका माँस नहीं खाना चाहिए । ऐसा माँस ' अवैध ' है । वैधमाँस पर ग्राक्षेप करने वालों को मुकुलितनयन बनकर ही ' तस्मादेतेषां पशूनां - ना-शितव्यम् । अपक्रान्तमेधा हैते पशत्र: ' इस निषेधवाक्य के मर्मस्थल का अन्वेषण तथा समन्वय -प्रयास करना चाहिए । पश्वालम्भनमीमांसा - प्रकरण के आरम्भ में हीं हमने कहा था कि, चिना पशु को कोई भी यज्ञ सम्पन्न नहीं होसकता । इस यज्ञ में पशु के स्थान में ' पुरोडाश ' किया जाता है । पाङक्त पशु के समन्वय से तो पाङक्त यज्ञ का स्वरूप निष्पन्न होजाता है । यज्ञसम्पत् सर्वात्मना गतार्थ होजाती है । परन्तु पुरोडाश में बह यज्ञसम्पत् कैसे प्राप्त होगी!, इसी प्रश्न का निराकरण करते हुए निदान के आधार पर पुरोडाश में ' पाक-पशुसम्पत्ति ' का समन्वय अभिव्यक्त करते हुए - ' यदा पिष्टान्यथ लोमानि ' इत्यादि कहा गया है, जो कि अनुवाद से ही गतार्थ है ॥ ६,७,८,६, ७६६
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द्वितीय व्याय शतपथब्राह्मण व्रतोपायन के सम्बन्ध में तीन विकल्प है । इनमें इस पुरोडाश सम्पादन के अनन्तर मध् तोशयन की इतिकर्त्तव्यता सम्पादन करने का विधान है । इति परोडाशसम्पादनम् इति विर्ब्राह्मणाध्यायः प्रथमः । इति - प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्याये तृतीयं ब्राह्मणम् द्वितीयप्रपाठके च प्रथमं ब्राह्मणं उपरतम् ७६७
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श्रीः अथ वेदिब्राह्मणाध्यायः अथ - प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्यायं चतुर्थं ब्राह्मणम् द्वितीयप्रपाठके च द्वितीयं ब्राह्मणम् १२ - वेदिकाकरणम् – बंदिस्वरूप सम्पादनम् तत्रादौ स्तम्बयजुर्हरणम्, भू – विशोधन । तस्य स्फ्यस्तृतीर्थं ( मूल ) -इन्द्रो ह वृत्राय वज्र ' प्रजहार । स वा प्रहृतश्चतुर्द्धाऽभवत् यावद्वा । अथ यत्र प्राहरत्तच्छकलो-वायावद्वा, ग्रुपस्तृतीयं वा यावद्वा, रथस्तृतीयं नाम - यदशीर्यत । एवमु स चतुर्द्धा S शीर्यत । स पतित्वा शरोऽभवत् । तस्माच्छरो बच्चोऽभवन् ॥१ ॥
संन्याधे | ग्रुपेन ततो द्वाभ्यां ब्राह्मणा यज्ञे चरन्ति शरेण च । राजन्यबन्धवः द्वाभ्यां राजन्यबन्धवः || २ || च म्फ्येन च ब्राह्मणाः, रथेन च एवमेष एतं पाप्मनं यत् पयमादत्ते - यथैव तदिन्द्रो वृत्राय वमुदच्छत् || ३ || । तस्माद्वैस्यमादत्ते द्विपते भ्रातृव्याय बत्रमुद्यच्छति पूष्णो हस्ताभ्यामाददे-तमादत्ते - देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां ] इति । सविता वै देवानां प्रसविता, तत्सत्रि-s ध्रकृतं देवेभ्यः [ १ ० २४ मं ० । श्रश्विनावध्वर्यू, तत्तयोरेव बाहुभ्या-तृमृत एवैनमेतदादत्त े अश्विनोर्बाहुभ्यामिति । पूषा भागदुधः, ततस्यैव हस्ताभ्यामा--मादत्त े , न स्वाभ्याम् । पूष्णो हस्ताभ्यामिति । तस्य न मनुष्यो भर्त्ता । तमेताभिर्देवताभि--दत्त, न स्वाभ्याम् । वत्रो वा एषः रादत्ते ॥ ४ ॥
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द्वितीययव्याय शतपथत्राह्मगा चतुथब्राह्मण श्राददेऽध्वरकृतं देवेभ्य इति । अध्वरो वै यज्ञः, यज्ञकृतं देवेभ्य इत्येवैतदाह । तं
सव्ये पाणौ कृत्वा दक्षिणेनाभिमृश्य जपति । संश्यत्येवैनमेतद् - यज्जपति ॥ ५ ॥
स जपति - इन्द्रस्य बाहुरसि दक्षिण: - [ १ अ २४ मं ० ] इति । एष वै वीर्य्य-वत्तमो य इन्द्रस्य बाहुर्दक्षिणः । तस्मादाह -- इन्द्रस्य बाहूरमि दक्षिण इति । सहस्रभृष्टिः शततेजाः [ १ ० २४ मं ० ] इति । सहस्रभृष्टि स वज्र आसीच्छततेजाः । यं तंवृत्राय प्राहरत, तमेवैतत् करोति ॥ ६ ॥
" वायुरसि तिग्मतेजाः " -- ( १ ० २४ मं ० ) इति । एतद्वै तेजिष्ठं तेजः--यदयं योऽयं पवते । एष हीमांल्लोकांस्तिर्यङनुपवते । संश्यन्येवैनमेतद् -- द्विषतो वधः-( १ अ ० २२ मं ) इति । यदि नाभिचरेद् । यद्यु अभिचरेत् अमुष्य वध इति ब्रूयात् । तेन संशितेन नात्मानमुपस्पृशति, न पृथिवीम्, नंदनेन वज्रेण संशितेनात्मानं वा
पृथिवीं वा हिनसानीति । तस्मान्नात्मानमुपस्पृशति, न पृथिवीम् ॥ ७ ॥
देवा वा असुराश्व उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे । ते ह स्म यद्ददेवा असुरान् जयन्ति - ततो हस्मैवैनान् पुनरुपोत्तिष्ठन्ति ॥ ॥ ते ह देवा ऊचुः - जयामो वा असुरांस्ततस्त्वेव नः पुनरुपोत्तिष्ठन्नि, कथं न्वेनान-नपज जयेमेति ॥ ६ ॥
सहाग्निरुवाच- उदश्चोत्रे नः पलाय्य मुच्यन्त इति । उदञ्चो ह स्मैवैषां पलाग्य मुच्यन्ते ॥२० ॥
स हाग्निरुवाच --- अहमुचरतः पर्येध्यामि, अथ यूयमित उपसंरोत्स्यथ । तान् संरु -ध्यैभिश्च लोकैरभिनिधास्यामः - यदुचे माँल्लोकानति चतुर्थम् । ततः पुनर्न संहास्यन्त इति ॥ ११ ॥
सोऽग्निरुचरतः पर्येत् । अथ मे इत उपसमरुन्धन् । तान् संरुध्यैभिथ लोकैरभि-न्यदधुः - यदु चेमांल्लोकानति चतुर्थम् । ततः पुनर्न समजिहत । तदेतन्निदानेन यत् स्तम्बयजुः ॥ १२ ॥
सः -- योऽसावनीद् उचरतः पर्येति । अभिरेवैष निदानेन । तानध्वय्युरेवेत उपसं--रुणद्धि । तान् संरुध्यैभिश्च लोकैरभिनिदधाति - यदु चेमाँल्लोकानति चतुर्थम् । ततः पुनर्न ७६६
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द्वितीयव्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थब्राह्मण सञ्जिते । तस्मादप्येत सुरा न सजिहते । येन ह्य वैनान् देवा अवाबाधन्त, तेनैवैनान-प्येतर्हि ब्राह्मणा यज्ञेऽत्रबाधन्ते ॥ १३ ॥
यउ एव यजमानायारातीयति, यथैनं द्वेष्टि, तमेवैतदेभिश्व लोकैरभिनिद-धाति यदु चेमाँल्लोकानति चतुर्थम् । स वा एभिश्व लोकैरभिदघद् यदु चेमाँल्लोका ---नति चतुर्थम्, अस्या एव सर्व हरति । अस्यां हीमे सर्वे लोकाः प्रतिष्ठिताः । किं हि हरेद् -- ययन्तरिक्षं हरामि दिवं हरामीति हरेत्, तस्मादस्या एव सर्व हरति ॥ १४ ॥
अथ तृणमन्तर्द्धाय प्रहरति - नेदनेन वज्र ेण संशितेन पृथिवीं हिनसानीति । तस्मा-तगमन्तर्द्धाय प्रहरति ॥१५ ॥
स प्रहरति- " पृथिवि देवयजन्योषध्या ते मूलं मा हि ५ सिषम्यू " - ( १ अ ०-२५ ) इति । उत्तरमूलामिव वा एनामेतत्करोत्याददानः । तामे तदाह - श्रोषधीनां ते मूलानि मा हिंसिषमिति । " ब्रजं गच्छ गोष्ठानम् ' - - ( १ ० २५ मं ० ) इति । श्रभिनिधास्यन्न वैतदनपक्रम कुरुते । तद्धयनपक्रमि यद् व्रजेऽन्तः । तस्मादाह ब्रजं गच्छ गोष्ठानमिति । ' वर्षतु ते द्यौः -- ( १ ० २५ मं ० ) इति । यत्र वा अस्यै खनन्तः क्रूरीकुर्वन्ति - श्रपघ्नन्ति । शान्तिरापः, तदद्भिः शान्त्या शमयति, तदद्भिः सन्दधाति । तस्मादाह - वर्षतु ते द्यौरिति । ' वधान देव सवितः परमत्स्यां पृथिव्याम् ' - ( १ न०-२५ मं ० ) इति । देवमेवैतत्सवितारमाह । अन्धे तमसि बधानेति - यदाह - पर रह्यां पृथिव्यामिति । ' शतेन पारौ: - ( १ ० २५ मं ० ) इति । श्रमुचे - तदाह- " योऽस्म. उन् द्वेष्टि यश्च वयं द्विष्मस्तमतां मा मौकू " - ( १ ० २५ मं ० ) इति । यदि नामि-चरेद् | यद्य, श्रभिचरेद् अमुमतो मा मौगिति ब्रूयात् ॥ १६ ॥
अथ द्वितीयं प्रहरति- " अणररुं पृथिव्यै देवयजनाद् वध्यासम् " - ( १ अ०-२६ मं ० ) इति । अररुर्ह वै नामासुररचसमास । तं देवा अस्य अपात । तथो एचैनमेतदेषोऽस्या अपहते । " वनं गच्छ गोष्ठानं वर्षतु ते द्यौर्बधान देव सवितः परमस्यां पृथिव्यां शतेन पाशैर्योऽस्मान् देष्टि यश वयं द्विष्मस्तमतो मा मौक् ” -- (? अ ० २६ नं ० ) इति ॥ १७ ॥
तमग्नीदभिनिदधाति - ' अररो! दिवं मा पप्त ' इति । यत्र नै देवा अररुमसुररच-समपात, समपिपतिषत् । तमग्निरभिन्यदधात् - अररो । दिव ' मा पप्त इति । स ७७०
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द्वितीयअध्याय शतपथब्राह्मगा चतुर्थत्राह्मण न दिवमपतन् । तथो एवैनमेतदध्वयु रैवास्माल्लोकादन्तरेति । दिवोऽध्यशीत् - तस्मादेव करोति || १८ || अथ तृतीय प्रहरति - द्रप्सस्ते द्यां मा स्कन्निति । अयं वा अस्यै द्रप्सः यमस्या इमं रसं प्रजा उपजीवन्ति । एष ते दिव ं मा पप्तदित्यनैतदाह - " व्रजं गच्छ गोष्ठानं वर्षतु ते चौधान देव सवितः परमस्यां पृथिव्या ५ शतेन पार्योऽस्मान् द्वेष्टि यच वयं द्विष्मस्तमतो मा मौकू ' - [ १ ० २५ मं ० ] इति ॥ १६ ॥
सत्रिजुषा हरति । त्रयो वा इमे लोकाः । एभिरेवैनमेतल्लोकैरभिनि--दधाति । श्रद्धा नैं तत- यदिमे लोकाः, श्रद्धो तत् - यद्यजुः, तमात् त्रियजुषा हरति ॥ २० ॥
तूष्णीं चतुर्थम् । स यदिमाँल्लोकानति चतुर्थमस्ति वा न वा, तेनैवैतद् द्विषन्तं भ्रातृव्यमवबाधते । अनद्धा तद्- यदि माँल्लोकानति चतुर्थमस्ति वा न वा अनद्धो तद् -- यत तूष्णीम्, तस्मात्त ' णीं चतुर्थम् ॥ २१ ॥
इति प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्याये चतुर्थ ब्राह्मणम् द्वितीयप्रपाठके च द्वितीयं ब्राह्मणम् ( अनुवाद ) - जिस समय इन्द्रने वृत्रासुर के वध के लिये ( अपने हाथ से ) वजू छोड़ा, ( उस समय ) वह फेंका हुआ बजू ( वृत्रासुर के शरीर से टकरा कर ) चार भागों से विभक्त होगया । उसका एक तृतीयांश, अथवा अनुमानतः इतना हीं भाग तो ' स्फ्य ' बन गया । तृतीयांश, अथवा अनुमातः इतना हीं भाग ' रथ ' बन गया । एवं जो भाग ( खण्ड ) सर्वथा छिन्न भिन्न होगया था, वह उस वृत्र के शरीर से टकरा कर भूमि पर गिरकर ' शर ' बन गया । यह शीर्ण होकर गिरा, श्रतएव वज्रका यह भाग ' शर ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । इस तथाकथिक प्रकार से ( इन्द्र के द्वारा प्रक्षिप्त वजू ) चतुर्द्धा विभक्त होगया ॥ १ ॥
तभी से ( तथाकथित चारों वजू खण्डों में से ) दो खण्डों से तो ऋत्विग् ब्राह्मण यज्ञ में प्रचार करते हैं । ( काम लेते हैं ) । शेष दो खण्डों से योद्धा राजन्य क्षत्रिय युद्ध ग्रूप, रूफ्य, से त्राह्मण काम लेते हैं, एवं रथ, और शर से राज-में काम लेते हैं । और न्यबन्धु काम लेते हैं ॥ २ ॥
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द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थब्राह्मण सो जोकि यजमान ( दक्षिणाक्रीत यजमान का प्रतिनिधि अध्वर्यु यज्ञ में ) सफ्य ग्रहण करता है - ( इसकी उपपत्ति यही है कि ), आरम्भ में जैसे इन्द्रने वृत्रासुर के लिये वजू उठाया था, ठोक उसो प्रकार यह यजमान पाप्मारूप द्वेष करने वाले शत्रुओं के लिये वजू ही उठाता है । इसी ( प्रयोजन के ) लिये ' फ्य ' का ग्रहण करते हैं ॥ ३ ॥
इस इष्टि में ' फ्य - ग्रहण ' क्यों किया जाता है? इस प्रश्न की उपपत्ति बतला दी गई । पद्धित बतलाते हैं-वह अध्वर्यु - देवयत्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामाददेऽध्वरकृतं देवेभ्यः ' यह मन्त्र बोलता हुआ पय उठाता है । सविता देवता देवताओं के प्रेरयिता हैं । सो ( उक्त मन्त्र से ग्रहण करता हुआ अध्वर्यु ) सविता देवता से प्रेरित होकर ही एफ्य का ग्रहण करता है । अश्विनी हीं ( प्राकृतिक नित्य यज्ञ के ) अध्वर्यु हैं । ऐसी अवस्था में- ' अश्विनोर्वाहु-भ्याम् ' यह कहना हुआ अध्वर्यु अश्विनीकुमारों के हाथ से ही समय उठाता है, अपने बाहू से नह । पूषा ( देवताओं में ) भागधुक् है । उन्हीं के हाथ से अध्वर्यु एक्य उठाता है-अपने हाथों से नहीं । यह स्पय वजू है । मनुष्य इसको कभी नहीं उठा सकता । अतएव यह अध्वर्यु -- ( देवस्य त्वा सबितः ) इत्यादि रूप से देवताओं के द्वारा ही उठाता है || ४ || ' अध्वर ' यज्ञ को ही कहते हैं । ( ऐसी अवस्था में ' श्राददेऽध्वरकृतं ० ' - इत्यादि से ) भावार्थ यही है कि, देवताओं के द्वारा अध्वरक के सम्पादन करने वाले ऐसे समय का ग्रहण करते हैं । उस सम्य को वाम हाथ में लेकर दाहिने हाथ से उसका स्पर्श करते हुए मन्त्र का उपांशु उच्चारण करता है । सो जोकि यह जप क्रिया होती है, उससे अध्यय् इस ' स्यशस्त्र ' को ती ही करता है || ५ || जप करने का ब्राह्मण ( विज्ञान - उपपत्ति ) बतला दिया गया, अब पद्धति बतलाते हैं । वह अध्वर्यु स्पर्श करते हुए “ इन्द्रस्य बाहुरसि दक्षिण: ससस्रभृष्टिः शततेजा वायुर्सि तिग्मतेजा द्विषतोवध " । यह मन्त्र बोलता है । ( वीर्ययुक्त पदार्थों में ) वही वीर्य्यत्रत्तम है, जोकि इन्द्र का बाहु है । इसी अभिप्राय से ' इन्द्रस्य बाहुरसि ० ' इत्यादि कहा है । वह ( प्रक्षिप्त ) वज्र सहस्रकोण से युक्त था, अपरिमित दीप्तियुक्त था, जिस ( ऐसे गुणवाले ) इस वज्र को वृत्रबध के लिचे इन्द्रने फेंका था । ( जैसा वह था ) उस को उसी भाव से युक्त करते हैं ॥ ६ ॥
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द्वितीयअध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण अन्तरिक्ष में जो यह प्रवाहित है, यही ' तेजिष्ठ तेज ' है । यही तीनों लोकों में तिर्य्यक् रूपसे सर्वत्र व्याप्त होरहा है । इस कथन से अध्वर्यु वस्त्र को तीक्ष्ण हीं करता है । यदि किसी पर ' अभिचार ' ( मारण ) प्रयोग न करना हो, तब तो ' द्विषतो वध ' यही बोलना चाहिए । यदि अभिचार करना हो, तो ' अमुकस्य वधः ' इत्यादि रूप से नामोल्लेख पूर्वक-मन्त्र बोलना चाहिए । ( मन्त्रशक्ति से श्रतितीक्ष्ण होने वाले ) इस संशित समय से न तो अपने शरीर के किसी भाग का स्पर्श ही करना चाहिए, एवं न इसे पृथिवी पर ही रखना चाहिए । इस संशित सस्यशस्त्र से हम अपने आपको, एवं पृथिवी को नष्ट न करलें, स्पर्श न करने का यही प्रयोजन है ॥ ७ ॥
इस पूर्वोक्त विषय का संग्रह करते हुए सूत्रकार कहते हैं-“ देवस्यत्वेति ” स्फ्यमादाय सत्यं सव्यं कृत्वा दक्षिणेनालभ्य जपति ' इन्द्रस्य बाहुरिति ( २६६ | ) एक समय ( प्रजापति की सन्तान, अतएव ) प्राजापत्य देवता और असुर दोनों ( पर-स्पर ) स्पर्धा करने लगे | जब ( जब ) देवता असुरों को जीतते, तत्र ( तब ) ही असुर पुनः ( पुनः ) उठ खड़े होते ॥ ८ ॥
( देवताओं को इससे बड़ी चिन्ता हुई ) वे सोचने लगे कि, अपन असुरों पर विजय तो प्राप्त करते हैं, परन्तु ( आश्चर्य है कि ) ये पुनः प्रतिद्वन्द्विता में खड़े होते हैं । ऐसा कौनसा उपाय है, जिससे अपन इस असुरों को ऐसा जीतें, जिससे ये पुनः सम्मुख खड़े नहीं ॥६ ॥
( देवताओं में अग्नि भीद्यमान थे । तथाविधा विपमा समस्या के निरा-करण का उपाय बतलाते हुए ) सुप्रसिद्ध अग्निदेवता बोले कि ये असुर उत्तर दिशा की ओर भाग कर हमसे पृथकू ( श्रतएव परोक्ष, अतएव च सुरक्षित ) होजाते हैं ( अर्थात् - यदि इनको उत्तर की ओर खदेड़ दिया जायगा, तो सदा के लिये इनसे पीछा छूट जायगा । इसी भाव का स्पष्टीकरण करती हुई आगे जाकर श्रुति कहती है कि, ) सचमुच श्रग्नि का कहना सत्य हुआ । उत्तर दिशा की ओर भाग कर ही असुर लोग इन देवताओं से सदा के लिये मुक्त होजा हैं ॥ १० ॥
( एक उपाय बतला करें ) वे अग्निदेवता बोले कि, ( देखो ) मैं तो उत्तरभाग से ( इन असुरों को ) आवृत करता हूँ ( घेरता हूँ ) ( रास्ता रोकता हूँ ) और श्राप सत्र इस ( पृथिवी-लक्षणा वेदि ) स्थान से इन सब को ( इन के आक्रमण को ) अवरुद्ध करदो । इस प्रकार ७७३
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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थत्राह्मण इन सबको चारों ओर से घेरकर अपन इनको तीनों लोकों से ही गतिहीन बना देगे । अर्थात सब ओर के द्वार ( नाके ) अवरुद्ध कर ( रोक कर ) इनको सदा के लिये परास्त कर देंगे । ( यही नहीं ), अपितु इन तीनों लोकों से अतिकान्त जो चौथा ( आपो ) लोक है, ( इस से भी ) बाहिर निकाल फैकेंगे । ऐसा करने पर पुनः ये कभी अपना साम्मुख्य न कर सकेंगे ॥११ ॥
( स की इस मन्त्ररणा का सभी देवताओंनें अनुमोदन किया, और तदनुसार ही ) अग्निने उत्तरमार्ग को घेर लिया । इधर देवताओंने इस वैदिस्थान से उनको घेरते हुए तीनों लोकों से असुरों को घेर लिया, एवं तीनों लोकों से अतिक्रान्त चौथे लोक से भी इनको बाहिर निकाल दिया । इसका फल यह हुआ कि पुनः कभी असुरोंनें विजय की इच्छा न की । यहाँ कर वे सदा के लिये सर्वथा परास्त होगए । इस देवासुर - आख्यान का इस वैधयज्ञ के साथ ' उपनय ' करते हुए याज्ञवल्का कहने हैं कि, यहाँ जो ' लम्ब ( कुशमुष्टि ) ' का प्रहण किया जाता है, वह निदान के द्वारा ' असुर-निरसन ' - व्यापार हो है | अर्था जैसे देवताओंनें असुरों के सब मार्गों को रोक कर जिस शस्त्र से असुरों को सदा के लिए परास्त कर दिया था, तथैव शस्त्रस्थानीय स्तम्त्रयजु से यह यज-मान अपने दिव्ययज्ञ से सदा के लिए असुरों को बाहिर निकाल देता है ॥ १२ ॥
सो जोकि ( इस यज्ञ में - ममुष्ययज्ञ में ) आग्नीध नाम का ऋत्विक वेदि के उत्तरभाग में घूमकर है, वह निदान से अग्नि ही है । अर्थात् आग्नीध का उत्तर की ओर जाना अग्नि का ही उत्तरभाग से असुरों का निरोध करना है । एवं अन्य देवताओं का प्रतिनिधि अध्वर्यु इस वेदिस्थान से असुरों का मार्ग रोकता है । इसप्रकार चारों ओर से घेर कर इन लोकों से, एवं तीनों लोकों से अतिक्रान्त चौथे लोक से इनको घेर लेता है । इसके अनन्तर असुरों को पुनः आक्रमण करने का अवसर ही नहीं मिलता । यही कारण है कि, आज भी ( यज्ञ करते समय ) असुरों को पुनः आक्रमण करने का अवसर ही नहीं मिलता । यही कारण है कि आज भी ( यज्ञ करते समय ) असुर पुनः आक्रमण का विचार नहीं करते । जिस ( पूर्वोक्त उपाय से ) देवताओंनें इनका विनाश किया था, उसी ( स्तम्बयर्जु हरणरूप ) उपाय से आज भी ब्राह्मण स्वयज्ञ में इह्न अवरुद्ध कर देते हैं ॥ १३ ॥
( न केवल असुरों का ही निरसन होता है, अपितु ) जो भी ( इस यज्ञकर्त्ता ) यजमान के लिए प्रतिभाव उत्पन्न करता है, अर्थात् आगत- सम्पत्ति का प्रतिरोध करता है, एवं जो इसके साथ अकारण द्वेष करता है, उन्हें भी तीनों लोकों से, एवं तीनों से अतिक्रान्त चौथे लोक 936