Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 511–520

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 511–520

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राहाण चतुर्थत्राह्मण से वाहिर निकाल देता है । ( देवताओं की भाँति अध्वर्यु अन्तरिक्षादि लोकों में जाने में अस-मर्थ है | फिर इसने पृथिवी के अतिरिक्त अन्तरिक्ष, द्यौ, एवं चौथे पोलोक से कैसे असुरों को दूर किया?, इस प्रश्न का समाधान करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ) इस पृथिवी से ही अध्यरों को निकाल देता है । इसी के अवलम्ब से अब सब लोकों से ( निदान के द्वारा ) असुरों को निकाल देता है । इसी लोक में सब लोक प्रतिष्ठित हैं । यदि अध्वर्यु - ' अन्त - रिक्षं हरामि, दिवं हरामि, यह बोलेगा, तो ( इसका बोलना असत्य होगा, क्योंकि साक्षात्रूप से न यह अन्तरिक्ष में जासकता, न द्युलोक में जासकता, फिर चीथे लोक की तो कथा ही दूर है । ऐसी अवस्था में - ' अन्तरिक्षं हरामि ' इत्यादि कहता हुआ यह ) किसका हरण करेगा? | इसलिए ( स्परूप से अन्तरिक्षं हरामि ' इत्यादि न कहता हुआ ) इस पृथिवी से ही सब असुरों को निकाल देता है । ( परिणाम यह होता है कि, ऐसा करने से इसे असत्यभाषण भी नहीं करना पड़ता, एवं इसी पृथिवी में सत्र लोक प्रतिष्ठित हैं, इसलिए केवल पृथिवीमात्र से ही चारों लोकों से असुर निकल जाए हैं ) ॥ १४ ॥

इसके अनन्तर कुश - तृण को मध्य में रख कर ( स्क्र्य से भूमि पर ) प्रहार करता है । ( मन्त्रशक्ति से ) तितीक्ष्ण इस ( रुपयरूप ) वज्र से हम पृथिवी का नाश न करदें, इसीलिए तृण मध्य में रखकर प्रहार करना है ॥ १५ ॥

ब्राह्मण बतला दिया, अत्र पद्धति बतलाते हैं-वह श्रध्वर्यु –‘पृथिवि देत्रियजन्योषध्यास्ते मूलं मा हिंमिषम् ' यह मन्त्र बोलता हुआ प्रहार करता है । ( रुपय का ग्रहण करते समय ) अध्य - स्तम्बयजुरूप कुशमुषि को वेदि पर उत्तरमूल ( उत्तरदिशा को और कुश की जड़ ) रखता है । इस पृथिवी का उत्तरमूला बनाता है । उह्रीं उत्तरमूल ओषधियों को लक्ष्य में रखकर - ' यह स्पय वज्र तेरे [ पृथिवी के J । मूलों को नष्ट न करें ' यह कहता है । इसके अनन्तर - ' ब्रजं गच्छ गोष्टानम् ' यह मन्त्र बोलता हुआ प्रहार करने के साथ साथ ही - अरों को इधर उधर बचकर भाग निकलने में असमर्थ बनाता है । यही ' अपक्रम ' भाव है, जो कि ' जस्थान ' के मध्य में इन्हें भेजना है । इस पृथिवी के जिस भाग में निखनन करते ( खोदते ) हुए क्रूरकर्म करते है । ( इस कर्म से वे खननकर्त्ता - पृथिवी के उस भाग की ) हिंसा ही करते हैं । पानी ( क्रूरकर्म्म की ) शान्ति है । सो यह अध्वर्यु ( वर्षतु ते द्यौः - इत्यादि त्रालता हुश्रा ) पानी की शान्ति से ( सफ्य के द्वारा खोदे हुए पार्थित्र भाग को ) शान्त ही करता है | पानी से ( उस विदीर्ण भाग को पुनः ) जोड़ता है । इसी अभिप्राय से ' वर्षतु ते द्यौः ' यह कहा है । ' वधान देवसवितः ' इत्यादि से सविता देवता की ओर ही लक्ष्य

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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थब्राह्मण है । ' परस्यां पृथिव्याम् ' यह जो कहा है ( इसका तात्पर्य यही है कि ) - पृथिवी का यह अन्तिम भाग, जहाँ घोर अन्धकार है- उसी में असुर को भेजते हैं । ' शतेन पाशैः ' इस अंश का यही अर्थ है कि, वहाँ जाकर वह मदा के लिए सैंकड़ों पाशों से बद्ध होजाय । इसप्रकार यह मन्त्रांश मुक्ति ( बन्धनभाव ) का ही द्योतक है । यदि अभिचार न करना हो, तब तो - नाम - प्रहण न करते हुए केवल‘योऽस्मान् द्वेष्टि यश्च वयं द्विष्मस्तमता मा मौक ' यही बोले । यदि अभि-चार -प्रयोग करना हो तो, ' अमुकाऽस्मान् द्व ेष्टि, अमुकञ्च वयं द्विष्मः । तमतो मा मौक ' यह मन्त्र बोले || १६ || ( प्रथम प्रहार के अनन्तर अध्वर्यु ' अपारुरं ' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ स्क्य से दूसरा प्रहार करता है । ' अरु ' नाम का असुर देवताओं का विरोधी था, राक्षस था । देवताओंनें इसे इस ( यज्ञिय ) पृथिवी से मार भगाया था । तथैत्र यह अध्वर्यु भी इसे ( मन्त्रशक्ति के द्वारा ) मार भगाता है । शेषभाग का अर्थ १६ वीं कण्डिका से गतार्थ है ॥ १७ ॥

इसके अनन्तर ' श्राग्नीध ' नाम का ऋत्विक् कुशभाग को ऊपर के हाथ आच्छन्न करता ( ढँकता ) हुआ – ' अर दिव ' मा पप्त ' यह बोलता हुआ उत्कर में प्रक्षिप्त कर देता है । जिस स्थान में देवताओंनें राक्षसबुद्धि अररु असुर को मार भगाया था, वहाँ से भाग कर द्युलोक की ओर झुका । वहाँ जाते हुए इस असुर को - ' अररो सावधान! द्युलोक में न घुसना ' यह कहते हुए उसे रोका था । फलतः वह द्युलोक में नहीं जासका था । उसी प्रकार यह अध् तो इसे इस पृथिवीलोक से निकालता है, एवं आमीध द्युलोक से निकलता है । इसलिए ' श्रररां ० ' इत्यादिरूप से द्वितीय प्रहारकर्म्म करते हैं ॥ १८ ॥

अनन्नर- - ' द्रमस्ते द्यां मा स्कन् ' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु तीसरा प्रहार करता है । जिम इस गुरम को लेकर मम्पूर्ण पार्थिवप्रजा जीवित है, वह रस ही पृथिवी का द्रप्स है । ' है पृथिवि! आपका यह रसरूप द्रप्स द्युलोक में न स्खलित होजाय ' यही कहा है । शेष मन्त्रार्थ पूर्व से गतार्थ है ॥ १६ ॥

इसप्रकार वह अब तीन यजुमंन्त्रों से ' स्तम्बयजु हरण ' करता है । यह ( प्रसिद्ध पृथिवी, अन्तरिक्ष द्यौं, ) तीन लोक हैं । इह्रीं से वह उसे निकालता है । ये जो तीनों लोक हैं, वे हमारी आँखों के सम्मुख हैं । इसी प्रकार पूर्वोक्त तीनों यजुर्मन्त्र भी प्रत्यक्ष हैं । अतएव तीनों श्रद्धा मन्त्रों से स्नय हरगा किया जाता है ॥ २८ ॥

II

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द्वितीय अध्याय सूत्रानुगत - पद्धति - संगह: -प्रादेश: - तालः - गोकर्णः -चतुर्थबाह्मण शतथपत्राह्मण एवं - का ० सू ० २ अ ०१६ कं ० । १ सूत्र ७७७ चौथा प्रहार चुपचाप किया जाता है । इन तीनों लोकों से अतिरिक्त चौथा लोक ( अप्रत्यक्ष-का विषय होने के कारण ) है, अथवा नहीं है, इस भाव से युक्त है । चौथे प्रहार से इसी लोक से शत्रुओं को निकालता है । ' अस्ति न वा ' भाव से युक्त चौथा लोक ' अनद्धा ' है । इधर तुष्णीं-भाभी अनद्रा है । इसलिए चौथा प्रहार तूष्णीम् हीं किया जाता है || २१ || प्रथमकाण्डानुगत द्वितीयाध्याय का चोथा ब्राह्मण, द्वितीय- प्रपाठक का दूसरा ब्राह्मण उपरत जिस द्रव्य की देवताओं के लिए आहुति दी जायगी, वह ' पुरोडाश ' नाम का द्रव्य सम्पन्न होचुका है । अब प्रकृत प्रकरण वेदिनिर्माण का क्रम चलाता है । " अपरेसानीयं वेदि खनति यङ गुलखातां, व्याममात्रीं पश्चात्, त्र्यरत्नि प्राची-मपरिमिता वा, प्राक्प्रवणा मुदवाया, मध्य सङ्गृहीता, मग्निमभितों ऽसौ " उक्त श्रौत सूत्र - सिद्धान्त के अनुसार ग्राहवनीयकुण्ड के पश्चिम भाग में ( एवं गार्हपत्यकुण्ड के पूर्व भाग में ) वेदिखनन करना चाहिए । उस भूप्रदेश को किस परिमाण से खोदा जाय ( जहाँ पर कि, वेटि बनने वाली है?, ) इसका उत्तर देते हुए सूत्रकार कहते हैं कि, तीन न ल की गहराई से वेदनिर्माणोपयुक्त भूमि को चोदना चाहिए । इससे प्रथम ग्राहवनीय का निर्माण कर लेना चाहिए, जैसाकि आगे जाकर स्पष्ट हो जायगा । इस वेदिनिर्माण - ब्राह्मण में तत्तत् भिन्न भिन्न परिमाणों के लिए अरत्नि, रत्नि, व्याम, वितस्ति, आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं । वर्तमान व्यवहारजगत् में इनका व्यवहार प्रायः अवरुद्ध हो गया है, अतः कर्मे-तिकता की समन्वयदृष्टि से इन शब्दों के अर्थों का भी स्पष्टीकरण कर लेना चाहिए । ' अङ्ग ुष्ठ ' ( अंगूठे ) के साथ क्रमशः तज्जेनी, मध्यमा अनामिका, इन तीनों ग्रङ्ग लियों के सम्ब-न्थ से प्रादेश, ताल, गोकर्ण नाम के तीन परिमाणों का स्वरूप निष्पन्न होता है । ' प्रादेशो देशमात्रे स्या-तर्जन्यङ्गुष्ठसंमिते ' ( मंदिनी ) के अनुसार अंगूठे के साथ तर्जनी को चौड़ा दीजिए | इतना प्रदेश १० अङ्ग ुल ( अपनी अंगुल ) परिमाणयुक्त होगा । यही ' प्रादेश ' है । प्राणविज्ञान के सम्बन्ध में प्रायः इसी

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थमाह्मण ' इत्यादि के अनुसार प्राण दशा-परिमाग़ ( नाप ) को प्रधान मा. ा जाता है । कारण ' प्रादेशमिता वै प्राणाः ङगुलस्थान में हीं अपनी व्याप्त रखता है । करतलेऽङ गु-इसीप्रकार अंगूठे के साथ मध्य की ग्रङ्ग लि को चौड़ा दीजिए द्र मान्तरे । यही ' परिमाण ( मेदिनी ' ) तालः के अनुसार ' ताल ' मध्यमाभ्यां च संमिते ' । गीतकाले क्रियामाने करस्फाले ' ( अङ्ग ुष्ठाङ्ग लिस्फाला-नाम से प्रसिद्ध है | ‘ ताल ' शब्द वृक्षविशेष का भी वाचक है में । तिताल चुटकी ' करस्फाल चोताल - झपताल - श्रादि जो ताल-त्मक - ' करस्फाल ' ) भी इसी ताल से बजती है । संगीतक्रिया सीमित होता हुआ रस का अभिव्यञ्जक सम्बन्ध है, जिस ताल के सम्बन्ध से तत्तद् गान का स्वरूप यथावत् । बनता है, वह भी इस ताल से ही मम्बन्ध रखता है का आकार ' गाय ' के इसी अंगूठे को यदि अनामिका के साथ चौड़ाया जाता है हैं,, तो जैसाकि उस परिमाण - " श्रङ्ग ुष्ठानामिकोन्माने ” ' कानों ' जैसा होजाता है । इभी को " गोकर्ण ” परिमाण कहते तते ” के अनुसार ( विश्व:) इत्यादि से प्रसिद्ध है । इसप्रकार - " प्रादेश , इन - ताल तीनों - गोकर्णास्तर्जन्यादियुते अङ्गलियों को वितत करने से ( फैलाने अंगूठे के साथ क्रमशः तर्जनी, मध्यमा, अनामिका होता है । इन तीनों परिमाणों में ब्राह्मण— से ) क्रमश: प्रादेश, ताल, गोकर्ण, का स्वरूप निष्पन्न हुआ है । इससे १० अंगुल परिमाण अभि-ग्रन्थों में प्रधानरूप से ' प्रादेश ' परिमाण का ही ग्रहण प्रेत है * । वितस्तिः- के अनुसार यदि कनिष्ठिका " अङ्गुष्ठे सकनिष्ठ स्याद्वितस्तिर्द्वादशाङ्गुलः है, तो ” इस ' वितस्ति अमर ' सिद्धान्त का स्वरूप निष्पन्न होता है । यही ( चिट्टी ) अङ्ग ुलि को अंगूठे के साथ चौड़ा दिया जाता नामों से प्रसिद्ध है । यह १२ अङ्ग ुल का परि-' वितस्ति ' परिमाण लोकभाषा में ' बिलाँत ' ' बिलाद ' आदि है । भूः भुवः स्वः, महत्, जनत, तपः, माण है । पुरुषशरीर का परिमाण ' प्रादेश ' से किया जाता शरीररूप विश्व का परिमाण ' वितस्ति ' से किया सत्यम्, इन सातों लोकों की समष्टिरूप ईश्वर के जाता है । है । विविध भेदभिन्न प्राणों में से जैमाकि हम पूर्व में बतला चुके हैं, – प्राण ' प्रादेशमित होता ने गायत्री ' के अनुसार गायत्रप्राण ‘ गायत्र ' नाम का प्राण हीं पुरुषसृष्टि का प्रधान कारणा है | ' अक्षरा प्राण है । इसप्रकार गायत्री के आठ अक्षरों के आठ भागों में विभक्त है । प्रत्येक अक्षर एक एक स्वतन्त्र हैं । यद्यपि साधारण मान के अनुसार प्रादेश १० आट प्राप्त होजाते हैं । आठ प्राणों के आठ प्रादेश होते तो —'स भूमिं सर्वतः स्मृत्याऽत्यतिष्ठद्दशा-अङ्गल का ही होता है । तथापि यदि सूक्ष्म मान किया जाता है साढ़े दस अङ्गल ठहरता है । इस अनुपात से गुलम ' के अनुसार दम ग्रङ्गल से कुछ अधिक, अर्थात् १० || अङ्गुल ) का ही एक ' प्रादेश ' * -दश - अङ्ग ुल से कुछ अधिक । अनुमानतः ) से सार्द्धदेशाङ्ग स्पष्ट है ुल । ( माना गया है, जैसाकि – ' अत्यतिष्ठद्दशाङ्गलम् ' ( यजुः I II

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द्वितीययाय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण पूर्वोक्त गायत्री के आट प्रादेशों के ( प्रत्येक के १० || के अनुपात से ) पुरुषमान ८४ अङ्गुल का होजाता है । प्राकृतिक मान के अनुसार प्रत्येक पुरुष - वह युवा हो अथवा चालक हो ) अपने अङ्ग ुलि - परिमाण से ८४ अङ्ग ुलि का होता है । इसीप्रकार ईश्वर - ' सप्तवितस्तिकाय ' है । सात वितरित के भी ( प्रत्येक के १२ अल के अनुपात से ८४ ) अङ्गल होजाते हैं । अपने आयतन से पुरुष भी ८ श्रङ्गल का है, एव ईश्वर भी ८४ अङ्गुल का ही है । इसी आधार पर – ' पुरुषो वै प्रजापतेर्नेदिष्ठम् ' यह निगम प्रति-ष्ठित है । * चपेटः प्रतलः - प्रहस्तः--अपने हाथ की श्रृङ्गुलियों को सर्वथा ऋजुभाव में परिणत कर दीजिए । साथ ही अङ्गलियों को परस्पर न भिड़ा कर स्वभावतः जिस अन्तर पर अलियाँ विस्कारित ( चौड़ी ) रहती हैं, उन्हें उतने ही अन्तर से रहने दीजिए । ऐसी अवस्था में यह हाथ - चपेट, प्रतल, प्रहस्त, इन सीन नामों से व्यहृत होता है । धर्मशास्त्र में इस परिमाण को विशेष प्रधानता दी जाती है । सिंहतलः - प्रतलः– दोनो हाथों की अङ्गलियों को सीधी कर दीजिए । साथ ही दीजिए । ग्रर्थात् प्रकृति से रहने वाला अङ्गलियों के मध्य में जो एक मान - ' सिंहतल, एवं ' प्रतल ' इन दोनों नामों से प्रसिद्ध है । प्रसृतिः-अङ्गलियों को परस्पर संलग्न कर व्यवधान है, उसे हटा दीजिए । ऐसा दोनों हाथों को मितलानुसार संलग्न करते हुए दोनों हाथों के दोनों अन्तिम पात्रों को दोनों हाथों के मध्य की ओर झुका दीजिए, इसी मान की ' प्रसृति ' कहते हैं । इसी प्रसृति को लोकभाषा में ' धोबा'-( इला ) श्रदिशब्दों से व्यवहृत किया जाता है । अज्जलिः-प्रसृति- दशा ही समष्टिरू से, एवं व्यष्टिरूप से पुरभाव में आकर ' अञ्जलि ' नाम से व्यवहृत होने लगती है । अंगुलियों के आगे के भाग को और संकुचित करते हुए अपनी ओर श्रवनत कर लीजिए । यही लिन आयगी । यही ग्रञ्जलि लोकभाषा में- ' चुल्लू ' ' चिल्ल ' ' लू ' श्रादि नामों से प्रसिद्ध है । हस्तः-यह मान निरतिशयरूप से ( बहुत ही ) उपयोग में आता है । श्रङ्ग लि से युक्त, श्रंस भाग में अवस्थित भाग ' पाणि ' कहलाता है । हाथ के जोड़ से ( गट्टे से ) प्रारम्भ कर कफोणी ( कोहनी ) पर्यम्त # ' चपेट ' ही लोकव्यवहार में सम्भवत: - चाँटा ' ( पड़ ) रूप में परिणत होगया होगा ।

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द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड चतुथब्राह्मण का भाग ' बाहु ’ कद्दलता है । यही प्रकोष्ठ है । कफोणी से आरम्भ कर जनू पय्र्यन्त का भाग ' दोः ' कह– लाता है । इसप्रकार स्कन्ध ( कंधा ) से संलग्न भाग से प्रारम्भ कर अङ्गलि पर्य्यन्त भाग में - पाणि, बाहु, दोः ये तीन भाग हैं । तीनों को जोड़ने वालीं तीनों सन्धियाँ क्रमशः – मणिबन्ध ( गट्टा ), कफोरणी ( कोणी - कूणी ), जनू, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । इनमें दो भाग तो छोड़ दीजिए । शेष पाणि - और बाहूको लीजिए । पाणि भाग की पांचों अङ्गलियों को सीधी कर दीजिए । यही मान ( कफोणी से आरम्भ कर ग्रङ्ग -लिया पर्य्यन्त का का भाग ) ' हस्त ' नाम से प्रसिद्ध है । रत्नि: -' मुष्टयातु बद्धया स रत्निः स्यात् ' इस अमर - सिद्धान्त के अनुसार वही हस्तप्रमाण मुष्टिका -बन्धन ( मुट्ठी बाँधने ) से ' रत्नि ' नाम से व्यवहृत होने लगता है । इसी अभिप्राय से ' सम्पीडिताङ्गुलि -( हलायुध ) यह कहा जाता है । यह परिमाण दो प्रादेशमित ( २१ अङ्ग लमित ) है । भरलिः-' अरत्निस्तु निष्कनिष्ठेन मुष्टिना ' ( श्रमरः ) निर्वा प्रकोष्ठताङ गुलिक रेऽपिच ' ( मेदिनी ) ‘ तारत्निः कफौणो हस्ते सप्रकोष्ठे चाङ्गुलौ ' ( रुद्रः ) ७ इत्यादि के अनुसार बद्धमुष्टि में से कनिष्टिका श्रङ्ग लि को सीधी कर दीजिए । यही मान ' अरत्नि ' ( २४ श्रङ्ग लिमि ) होगा । व्यामः-' व्यामो बाह्वोः सकरयोस्ततयो स्तिरोगन्तरम् ' ( अमर ) के अनुसार दोनों हाथों का जो तिर्य्यगन्तर मान है, वही ' व्याम ' कहलाया है । यह नवतीर्नव ( ६६ ) अङ्गल का मान है! पुरुषः-' ऊर्ध्व विस्तृत - दो: पाणिनृमाने पौरुषं त्रिषु ' ( अमर: ) के अनुसार दोनों हाथों को ( अङ्गलियों के साथ ) सर्वथा सीधे खड़े होकर ऊपर की ओर कर दीजिए । यही मान ' पुरुष ' नाम से व्यवहृत होता है । यह १२० अल का मान है । इसके अतिरिक्त वेदिनिर्माण के सम्बन्ध में, एवं श्रन्यान्य भी वैज्ञानिक भावों के समन्वय - सम्बन्ध में ब्रह्महस्त, बिष्णुहस्त, शिवहस्त, ब्रह्मतीर्थ, धनुर्दण्ड, नाली, किष्कु, गव्यूति, आदि मानों का भी उपयोग होता है । ७८०

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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण उन सच का स्पष्टीकरण निम्नलिखित तालिकाओं से होनाता है । ८- परमाणवः - त्रसरेणुः १ ८ - त्रसरेणवः - रथरेणुः १ ८- रथरेणवः - बालाग्रम् १ ८- बालाग्राणि- लिक्षा १ ८- लिक्षा: - यूका ८- यूकाः -- यवः १ > ८ - यत्राः - अङ्ग ुलम् १ ६- यवाः -—-- अधमं मानाङ्ग लम- १ ७ -- यवाः-- मध्यमं " - यवाः --- -उत्तमम् " २१ - अङ्ग लानि -- रत्निहस्तः २२ ॥ अङ्ग लानि - श्र रत्निहस्तः २४ - अङ्ग लानि --महाहस्तः २४ - अधमाङ गुलानि - १ ब्रह्महस्तः २४ - मध्यमाङ गुलानि - १ विष्णुहस्तः २४ - उनमाङ गुलानि – १ शिवहस्तः ४ - महाहस्तः -१ व्यामः ( ६६ अङ्गल नि ) ५- महाहस्तः- १ पुरुषः ( १२० अङ्गलानि ) १० ॥ - श्रङ्गलानि - १ प्रादेश: ( १० ॥ अङ्ग लानि ) २– प्रादेशौ १ रत्निः ( २१ अङ्गुलानि ) २ – रत्नी- १ निष्कु: ( ४२ अङ्ग, लानि ) ७८१ चतुर्थब्राह्मण

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द्वितीय श्रध्याय प्रथमकाण्ड अङ्ग ुल ६- अङ्ग ुलानि - प्रपदम् -- ( ६ लानि ) २- पदे – वितस्तिः – ( १२ अङ्ग लानि ) २ – वितस्ति - हस्तः– ( २४ अङ्ग ुलानि ) २- हस्तौ — १ ब्रह्मतीर्थम् ( ४८ श्रङ्गलानि ) २ - ब्रह्मतीर्थे १ धनुदण्डः ( ६६ अङ्ग लाग्नि ) ३ - धनुदण्डौ - १ नाली ( १६२ अङ्गुलानि ) ३० - धनूंषि - नन्चः २०००- धनुषि - १ कोश: ( २००० धनुषि ) २ - कोशी - १ गव्यूति: ( ४००० धनूंषि ) २ - गव्यूती --- १ योजनम् ( ८००० धनूंषि ) हम कह रहे थे कि, वेदिके पूर्वभाग में चतुरस्र ( चौकोर ) आहवनीय - कुण्ड का निर्माण किया जाता है । इम ग्राहवनीयकुण्ड का बेरा चतुरस्र भाग को मिलाकर अरत्निमात्र ( २४ अङ्ग ल ) है । इस कुएड की ऊँचाई एक वितस्ति ( १२ अङ्गुल ) है । चारों ओर के घेरे की चौड़ाई चार अङ्गल है । सर्व-प्रथम ऐसे ( अरत्निमात्र - चतुरस - श्राहवनीयखर, द्वादशान्न लोच चतुरङ्ग ल- विस्तीर्ण मेखल ) आहवनीय -कुण्ड का वेदि से पूर्वदिशा में निर्माण करने के अनन्तर वेदिनिर्माण किया जाता है । जिस स्थान पर वेटिं बनाई जायगी, पहिले उस स्थान की तीन तीन अङ्गल गहरी मिट्टी खोदी जाती है । इसके अनन्तर सूत्र से परिमाण ( नाप ) कर - तीन अरत्निमान से ( ७२ अङ्गल की नाप से ) वेदि के पूर्व - पश्चिम भाग की सीमा बनाई जाती है । अर्थात् वेदि की लम्बाई ७२ अङ्ग ुल की होती है । वेदि के पश्चिमभाग में दक्षिणोत्तर ४ अरत्नि ( ६६ अङ्गल ) मान से रेखा अङ्कित की ( ची ) जाती है । एवं वेदि के पूर्वभाग में दक्षिणोत्तर ३ अरत्नि ( ७२ श्रङ्गल ) मान से रखा खैची जाती है । वढि चोकोर होती है | परन्तु ७२ - ६६ इस दक्षिणोत्तर के विषम मान से विपमचतुरस्र ( टेढी - चौकोर ) होजाती है । यह तो हुआ शास्त्रीय नियत प्रमाण । इसके अतिरिक्त यजमान इसी अनुपात से पूर्वभाग में कम चौड़ी, पश्चिमभाग में अधिक चौड़ी, इस विषमचतुरस्र भाव को प्रधान रखता हुआ अपनी इच्छानुसार वेदि का आयतन बडा भी करसकता है । इसी आधार पर - " अपरेणाहवनीयं वेदिं खनति त्र्यङ्ग ुलखातां, व्याममात्री पश्चात् त्र्यरनिं प्राचीं, अपरिमितां वा " यह कहा जाता है । यह वेदिभूमि प्रथम तो पूर्व की ओर झुकती हुई रहनी चाहिए, अथवा उत्तर की ओर प्रवणा होनी चाहिए । दक्षिण प्रवण । वेदि यजमान का नाश कर देती है । ' अखातौ संग्रहौ मतौ ' इस परिशिष्ट वचन के अनुसार वेदि के मध्य स्थान में वेदि को ' आखात - संग्रहवती ' करना चाहिए । ७८२

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मगा ग्राहवनीयकुण्ड के समीपस्थ वेदि की पूर्वसीमा में ग्राग्नेयकोण, ईशान कोण में अंस [ कन्धे ] कल्पना करनी चाहिए । अर्थात् वेदि के दक्षिणोत्तर भाग की सीमा को अस समझने चाहिएँ । दोनों संग्रह स्थान - यजति, जुहोति नाम से प्रसिद्ध हैं । तात्पर्य यही है कि, वेदि के पश्चिम भाग की ओर दक्षिणोत्तर भाग में क्रमशः नैऋतकांण, और वायव्यकोण में १० - १० अङ्गल भूमि छोड़ कर २१ अङ्गल के अर्द्ध वृत्त से यजति, जुहोति स्थान और बनाए जाते हैं । ये ही दोनों स्थान ' ' आखात ' नाम में प्रसिद्ध हैं । इह्रीं दोनों दिशाओं की दशाङ्गलमिता भूमि ' श्रोणी ' नाम से प्रसिद्ध है । 9 ' मूलो छेदनादीपवीनाम ' क ।० श्रीत -२ अ - क –६ सू ० २ ] के अनुसार जिस भूप्रदेश परः उपयुक्त वेदि का निर्माण किया जाता है, उस स्थान पर लगी हुई औषधियों को तत्रतक काटते रहना चाहिए, जबतक कि उनकी जड़ न उखड़ जाय । अर्थात् उस प्रदेश से औषधियों को सर्वथा निर्मूल कर उस ' भृभाग को विशुद्ध बना देना चाहिए । ध्यान रहे यह सूत्रकार का पक्षान्तर है । कारण - पूर्व में वेदिभूमि को तीन अङ्गुल ग्बोढने का ही आदेश दिया गया है । और समूलोत्पाटन पक्ष में अधिक मी गहराई होसकती है । दोनों पक्ष सम्भव नहीं । इसलिए यद्यपि सूत्रकार ने पक्षान्तर का स्पष्ट शब्दों में उल्लेख नहीं किया है, तथापि ' आमूलोच्छेदनान ' यह विरुद्धधर्म्मा वचन ही पक्षान्तर का भी साधक बन जाता है ' ओषधीनां मूलान्युच्छेत्त यात् ' [ का ० श्रौत ० २,६, ३, ] के अनुसार यदि व्य लाखात पक्ष नहीं है, एवं आमूल औषधियों का उत्पाटन विवक्षित है, तो अध्वर्यु को प्राग्नीध के प्रति श्रोष-धियों के मूलों को उत्पाटन की आज्ञा दे देनी चाहिए । तात्पर्य यही है कि, ओषधियों का उत्पाटनकर्म्म आग्नीध नामक ऋत्विक का ही कर्म है । “ आहार्य्यपुरीषां पशुकामस्य " [ का ० श्र ० २,६०४, ] के अनुसार यदि यजमान इस यज़ से पशुमम्पत्ति प्राप्त करना चाहता है, तो इस वेदि को ' आहापुरीपा ' बनाना चाहिए । पुरीष ही पशु है । वेद के स्थान से जो मिट्टी निकाली जाती है, वह तो वेदिपुरोष है । इसे तो निकाल कर अन्य स्थान में डाल दिया जाता है । एवं अन्य स्थान की खोदी हुई मिट्टी लाकर यहाँ डाली जाती है, यही तात्पर्य है । ' वेदिं परिसमा वितृतीयेऽग्नीदुत्तरत उत्करं करोति ' [ का ० श्री ० २,६, ५ ] के अनुसार पूर्वोक्त क्रमानुसार वेदिनिर्माण कर उसे कुशों से ग्रास्तीर्ण कर आहवनीय के उत्तरभाग में वितृतीय भाग में तीन अङ्ग ल चौड़ा, एवं छह अङ्ग ुल लम्बा, तथा एक अङ्कल गहरा - एक गड्ढा [ आग्नीध नाम का ऋत्विक् ] बनाता है । उच्छिष्ट, तृण, पांसु, आदि का उत्किरण इसी में होता है । अतएव यह स्थान ' उत्कर ' नाम से प्रसिद्ध है । सूत्रगत ' त्रितृतीय ' का क्या अर्थ है, इस प्रश्न के समाधान के लिए निम्न लिखित वेदि --निर्माण - प्रकार पर ही ध्यान देना आवश्यक होगा । वेदि के पश्चिमभाग में वत्तुल गार्हपत्यकुण्ड रहता है, एवं तत्पूर्व में चतुरस्र आहवनीयकुण्ड रहता है । इन दोनों कुण्डों का एक एक केन्द्र है । वही केन्द्र ' मध्यमस्थान'- ' मध्यमबिन्दु ' - ' गर्भ ' - ' हृदय ', आदि नाम से प्रसिद्ध है | गार्हपत्यकुण्ड के गर्भ से आरम्भ कर, श्राहवनीयकुण्ड़ के गर्भपर्यन्त दोनों कुरठी ७८२

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 520 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड के मध्य में विकल्प -- पक्षों की अपेक्षा क्रमशः ८ ११, १२, पदों का विधान है । एक पद [ पाँचढ़ा अङ्गल का होता है । इसप्रकार क्रमशः तीनों पक्षों में ६६ अङ्गल, १३२ अङ्ग ुल, १४४ अङ्गुल -- यह मान होजाता है । इन तीनों में से १२ पदों के [ १४४ अतुल के ] मान को [ अपरिमिताम् ] पक्ष में प्रधा-नता दी है । उसी को लक्ष्य में रखते हुए यहाँ विचार करना है । गार्हपत्यकुण्ड के निर्माण के लिए एक स्थान पर केन्द्र की कल्पना की जाती है । इस कल्पित केन्द्रस्थान में [ जोकि कल्पित केन्द्र आगे जाकर गार्हपत्यकुएट का वास्तव में केन्द्र बनने वाला है ] शङ्क [ काकील ] गाड़ दीजिए | इस शत्रू से १२॥ [ साडे तेरह ] अजून ज्यु के व्यासाद ' से गोल-वृत्त बनाइए । केन्द्र में चारों ओर की वृत्तसीमा १३ ॥ श्रङ्गल रहनी चाहिए, यही तात्पर्य्य है । ऐसी अवस्था में व्यासार्द्ध ' ६ || [ पोने सात ] अङ्गल का होगा । यही ' गार्हपत्यकुण्ड का मान है । इसी मेगाईपत्याग्नि प्रतिष्ठित रहता है । श्राहवनीयकुण्ड में भी इसीप्रकार केन्द्र कल्पना कर शङ्क, गाड़ दीजिए । इस शङ्क से ठीक हस्तमात्र [ २४ ] अङ्गल ] रन्जु से चौकोर वृत्त बना डालिए | लम्बाई मी २४ अङ्ग ल की होगी, चौड़ाई भी २४ अनल की ही होगी यह व्यामाई १२ अल का होगा । पूरा व्यास २४ अल का होगा । इसी हस्तपरिमित किंवा अरनिपरिमित आहवनीयकुण्ड में आहवनीय अग्नि प्रतिष्ठित रहता है । पूर्वोक्त १२ पदों के मान की व्यवस्था के अनुसार दोनों कुण्डों के केन्द्र से यह मान है । १२ अङ्गल का एक पद है । इसप्रकार कुल १४४ अल प्रदेश दोजाता है । इधर २४ अङ्गुल का एक हाथ [ अरत्नि ] होता है । इस अनुपात से गार्हपत्य, और श्राहवनीय -- कुण्ड के केन्द्रों से सम्बद्ध दोनों का मध्यप्रदेश ६ हाथ का होजाता है । इस मान के अनुसार एक ६ हाथ लम्बी [ अर्थात् १४४ अङ्गल लम्बी ] रज्जु लीजिए । इस में इसी के ६ ठे भाग जितना [ २४ ] अङ्गल लम्बा ] एक रस्सी का टुकड़ा और जोड़ दीजिए । इस प्रकार यह रम्मी कुल ७ [ यात ] हाथ लम्बी, [ अर्थात् १६८ अङ्गल लम्बी ] हो जायगी । इसी रज्जु से आपको आगे का मान - साधन करना है । इस सात हाथ लम्बी रज्जु के दोनों अन्तिम प्रान्ती का [ छोरों का ] पाश [ फौसा ] बना लीजिए । रज्जु के ठीक केन्द्र में पहिले एक चिह्न [ निशान ] कर दीजिए । इसप्रकार मध्य में चिह्न कर शेष बचे हुए रज्जु के दोनों पार्श्वभागों में तृतीयांश - तृतीयांश भाग में एक एक चिह्न और बना दीजिए । चिह्न बना कर पूर्वोक्त दोनों पाशां में से एक पाश तो गाईपत्यकेन्द्र में गड़े हुए शङ्क के साथ बाँध दीजिए, और एक पाश आहवनीयकेन्द्र में गड़े हुए, शङ्क के साथ बाँध दीजिए । 2 अब आगे चलिए — पूरी ख् के केन्द्र में एक चिह्न है । उसके पूर्व पश्चिमभाग में क्रमश: तृती--यांश पर प्रायः २८-२८ अङ्कल के अन्तर पर दो दो चिह्न और हैं । पूरी रज्जु का परिमाण हमनें सात हाथ [ १६८ ] अङ्गल ] बतलाया है, और इसमें मध्य - तृतीयभाग रूप से विह्नों का उल्लेख किया है । इस अनुपात मे ८८ वाँ श्रृङ्गुल मध्यस्थान पड़ता है । इससे ऊपर भी प्राय: ८४ अङ्गल रहते हैं, नीचे भी ८४ अङ्गल रहते हैं । इनसे तीन तीन भाग करने से २८-२८ की तो दो बिन्दु गाईपत्य की ओर होती है, एवं ये ही दी किंतु आहवनीय की ओर होती है । तीसरी बिन्दु का स्थान दोनों ओर के प्रान्तभाग र देते हैं । II