Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 61–70

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 61–70

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शतपथब्राहाण २ खण्ड प्राकृत - प्राणी स्वतः ही स्व - स्व - प्राकृतिक क्षेत्रों में शिक्षापटु बन जाते हैं । प्रकृति के अतिरिक्त मानव में ' और भी कुछ ' अभिव्यक्त है, जो मानवेतरों में अभिव्यक्त नहीं है । वह ' ओर कुछ ' ही ' पुरुष ' कहलाया है | इसी ' पुरुष ' का नाम है ' अव्ययात्मरूप - प्रकृत्यतीत- श्रतएव दिग्देशकालातीत -- वह शाश्वत -सनातन - धर्म *, जिसने मानव को इतर प्राणिसर्ग से पृथक कर रहा है, और इसी आधार पर मानव को इतर प्राणियों के समतुलन में ' विशेष ' माना गया है X । विशेषभावापन्न- शाश्वतधर्म्मरूप - दिग्देशकालातीत - आत्मपुरुष, और सामान्य - भावापन्ना - परिवर्तन-शीला - दिग्देशकालानुगता ' शरीर प्रकृति ' इन दोनों के समन्वितरूप का ही नाम मानव है । और ऐसा मानव अपने दिग्देशकालातीत - आत्मपुरुषरूप - शाश्वतधर्म्म से ही दिग्देशकालात्मिका प्रकृति को नियन्त्रित रखता है । इस नियन्त्रण से नियन्त्रिता विश्वप्रकृति कदापि उच्छृङ्खला नहीं बन पाती । यदि मानव अपने पुरुषार्थरूप श्रात्मपुरुषात्मक - शाश्वतधर्म के प्रति निरपेक्ष बनता हुआ केवल प्रकृतिवादी, किंवा दूसरे शब्दों में दिग्देशकालानुगत- केवल - वर्त्त मानवादी - प्राकृत - मानव ही बना रहा जाता है, तो उस अवस्था, किंया श्रात्यन्तिक - पतन - रूपा दुरवस्था में धर्म के परिचायक - लक्षण ही शाश्वतधर्म का स्थान अपहृत कर बैठते हैं, जैसे कि धर्म का परिचायक प्रतीकरूप बाह्य - ' अहिंसा ' भाव भी आज भ्रान्तिवश धर्म्म ही नहीं, अपितु ‘ परमधर्म्म ' बन बैठा है । और दुर्भाग्य तो यह है कि, बड़े बड़े सांस्कृतिक - विद्वान् भी इसी ' परमधर्म्म ' के यशोगान में श्रात्मलीन बनते हुए ' गतानुगतिकन्याय को ही अक्षरशः चरितार्थ करते जारहे हैं । आज का सम्पूर्ण भारतराष्ट्र इसी प्रतीकधर्म्म के प्रवाह में सर्वात्मनैव स्वरूप - विम्मृत होता जारहा है, किंवा होगया है, जिससे बड़ा सांस्कृतिक पतन इसका और क्या होगा? । प्रतीकात्मक - धर्म्म के स्वरूप - व्याख्याता धर्म्मशास्त्र ने ( स्मृतिशास्त्र ने + ) प्रतीकधर्म को लक्षणात्मक धर्म ही माना है, जैसा कि आगे के वचनों से स्पष्ट है—

* ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाममृतस्याब्ययस्य च ।

“ शाश्वतस्य च धर्म्मस्य ' ' - सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥

—गीतायाम्

X - आहार - निद्रा - भय - मैथुनाभि - सामान्यमेतत् - पशुभिर्नराणाम् ।

धर्मो हि तेषामधिको विशेषः, धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥

—नीतिसूक्ति + श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयः, धर्म्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः । ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये, ताम्यां धर्मो हि निर्बभौः । ६१ - मनुः २ | १० |

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किञ्चिदिव वेदन

धृतिः - क्षमा - दमो - स्तेयं - शौच - मिन्द्रियनिग्रहः ।

धी विद्या - सत्य - मक्रोधो दशकं धर्म्मलक्षणम् ॥

- मनुः ६।६२ ।

श्रहिसा - सत्यमस्तेयं - शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।

एतं सामासिकं धर्म्म चातुर्वण्र्येऽब्रवीन्मनुः ॥

- मनुः १०१६ | धृति- क्षमा -- दम -- अस्तेय -- शौच-- इन्द्रियनिग्रह -- धी- विद्या - सत्य - अकोष, इस दशक को राजर्षि ने ब का लक्षण, अर्थात् ' प्रतीक ' माना है, जिसका तात्पर्य्यं यही निकलता है कि, जो मानवश्रेष्ठ श्रव्ययपुरुषनिबन्धन शाश्वतधम्मं पर निष्ठापूर्वक आरूढ रहता है, ऐसे धर्म्मशील मानवश्रेष्ठ के धम्मरूप श्रात्मपुरुष के अनुग्रह से अनुगत प्रकृतिरूप बुद्धि- मन- इन्द्रिय- शरीर आदि वर्ग घृति - दमा - श्रादि लक्षणों से स्वत: ही समन्वित रहते हैं । बड़े से बड़े सांसारिक कष्ट को सह जाना ही धृतिगुण है । शक्ति की विद्यमानता में भी अपराधी को दण्ड न देना हीं क्षमागुरण है । प्राणात्मक - वीर्य्यं की अभिव्यक्ति में भी मनस्तन्त्र का संयम कर लेना इमोगुण है । परद्रव्य के प्रति सदैव तटस्थता रखना ' अस्तेयगुण ' है । स्नान - शुद्धि - श्रादि का अनुगमन ही ' शौच गुण ' है । ऐन्द्रियक विषयों के पुरोऽवस्थित रहने पर भी उनके प्रति तटस्थ बने रहना ' इन्द्रयनिग्रहगुण ' है । तात्कालिक संवित् भाव ही ' धीगुण ' है । सच्छास्त्रानुशीलन - जनित - संस्कार ही ' विद्यागुण ' है । चक्षुःपूत विषयों का स्पष्टीकरण ही ' सत्यगुण ' है । एवं क्रोधनिमित्तोपस्थिति पर भी क्रोध न करना ' अक्रोध गुण ' है । श्रागे चल कर राजर्विने सामासिकधम्मरूपेण ' अहिंसा ' का भी धर्म-लक्षणों में समावेश कर लिया है । एवमेव - दया- करुणा आदि आदि श्रन्यान्य भी कतिपय वेसे मानवीय-सद्गुण हैं, जिनका धर्मलक्षण - गणना में संग्रह कर लिया जासकता है । ' दशकं धर्म्मलक्षणम् ' वाक्य ही स्पष्टरूपेण यह प्रमाणित कर रहा है कि वृति - क्षमा - दम - दया-करुणा - श्रहिंसा - शौच - आदि स्वयं धर्म नहीं हैं, अपितु ये तो धर्म के लक्षण हैं, अर्थात् धर्म्म के प्रतीकमात्र हैं, जिन के पूरक इह्रीं के विरुद्ध भाव बने रहते हैं । और देशकाल - पात्र - द्रव्य - श्रद्धा - श्रादि परिस्थिति - जनित - साधन - परिग्रहों के तारतम्य से अनुप्राणिता अपेक्षा के अनुबन्ध से धर्मलक्षण तो परिणत होजाते हैं - श्रधर्मरूप में, एवं धर्म्मलक्षणों के प्रतिद्वन्द्वी भाव परिणत होजाते हैं धर्म्मरूप में, जिन का सोदा-हरण शास्त्रों में विस्तार से उपबृंहण हुआ है । अमुक परिस्थिति में में जो अहिंसा धर्म्म ( धर्मलक्षण ) है, वही अमुक परिस्थिति में सर्वथा अधम्मं बन जाती है । दया का धर्म्मत्व परिस्थिति विशेष में सर्वथैव धर्म्मरूप में परिणत होजाता है । अतएव परम वैज्ञानिक- भगवान् पाज्ञवल्क्य को प्रतीकात्मक - लक्षणात्मक परिवत्तन-शील - प्राकृतधम्मं का यही स्वरूप लक्षण करना पड़ा कि -देशे काल उपायेन द्रव्यं श्रद्धा - समम्वितम् । प्राप्ते प्रदीयते यत् तत्सकलं धर्म्मलक्षणम् ॥ - याज्ञवल्क्यस्मृति १६ । दूसरी दृष्टि से इन तथाकथित प्रतीक धम्मों का समन्वय की कीजिए । “ दया धर्म का अङ्ग श्रवश्य बन सकतो है, किन्तु दया स्वयं कभी अमीरूपेण धर्म्म का स्थान नहीं ग्रहण कर सकती ” ६२

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड एवमेव ' अहिंसा ' को धर्म का अङ्ग माना जासकता है, किन्तु कदापि ' अहिंसा ' को ' अङ्गी ' - रूप ' परमधर्म्म ' नहीं माना जासकता । दूसरे शब्दों में धर्म्म अवश्य ही सत्य- दया - अहिंसा - नामों से अभिनीत होसकता है, क्रिन्तु कदापि सत्य- दया- अहिंसा आदि को ही ' धर्म्म ' नहीं कह । जासकता | क्योंकि विशेष परिस्थितियों में भिथ्याभाषण - दण्डप्रहार - हिंसा आदि भी धर्म के प्रतीक बनते देखे गए हैं । सत्य, और अनृत का, दया और दण्ड का, अहिंसा - और हिंसा का स्वरूपविपर्य्यय ही धर्माधर्म्म का निर्णा-यक बना करता है । अतएव लक्षणात्मक - धर्म्म को शास्त्र ने ' सापेक्षधम्मं ' ही माना है, जिस में देश - काल-पात्र - द्रव्यादि के तारतम्य से परिवर्तन होता रहता है । धर्मलक्षणात्मक इत्थंभूत - प्राकृत धर्म का नियन्ता है-धर्म्मरूप - अप्राकृत वह शाश्वतधम्मं, जिस की सनातनता अक्षुण्णा मानी गई है, और जो दुर्भाग्यवश प्रकृ-तिव्यामोहननिबन्धन अनात्मवादात्मक प्रकृतिवादरूप -बुद्धिवाद से आज मानवीय प्रज्ञातन्त्र से सर्वथैव ' निरपेक्ष ' बन गया है । अतएव प्राकृतधर्म्मने, किंवा धर्म्म के लक्षणोंनें ही आज भ्रान्तिवश ' धर्म ' का स्वर्णसिंहासन अपहृत कर लिया है । एव आत्मधर्म्मरूप अव्ययपुरुषधर्म से पराङमुख, प्रकृतिधर्म्मवादी - ऐसे ही मानवता - प्रमी-इत्थंभूत - लाक्षणिक - तात्कालिक - धर्मं को ही ' नैतिकता ' - ' मानवता ' - ' मानवधर्म्म ' आदि विविध उपाधियों से सम-लङ्कृत करते हुए इतस्तत: दंद्रम्यप्राण हैं । इत्थंभूत काल्पनिक धर्म में, अर्थात् मतबाद में आसक्त - व्यासक्त बने रहने वालों की भावुकता - पूर्णा दृष्टि में ही ' अहिंसा ' का काल्पनिक घोष प्रधान बना हुआ है, जिस हिंसा का शास्त्रीया पारिभाषिकी उस ' अहिंसा ' से यत् किञ्चित् भी तो सम्पर्क नहीं है, जिस शास्त्रीया - ' अहिंसा ' की पूरिका- ' हिंसा ' ही मानी गई है । कथमिति चेत् १, प्रश्न के वैज्ञानिक समाधान के लिए ही तो प्रक्रान्त - कर्मा -नुगत हिंसा - अहिंसाका वैज्ञानिक स्पष्टीकरण प्रयास हुआ है, और यही प्रक्रान्त कर्म के अन्तिम विज्ञानोदाहरण का सक्षिप्त - स्वरूप -- दिग्दर्शन है । १२– ( ३ )

* - या वेदविहिता हिंसा नियतास्मिश्चराचरे ।

' अहिंसा ' - मेव तां विद्याद्वेदाद्धम्र्मो हि निर्वभौ ॥

—मनुः ५ | ४४ ६३

पृष्ठ 64

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श्रीः ( १३ ) - वेदिकाकरणानुगत -स्तम्बयजुर्हरणकर्म्म प्रसङ्गतः ' निदान ' - शब्द - निबन्धना -- परिभाषा ४ क्रमप्राप्त तथानामान्वित तेरहवें कर्म्मप्रकरण में अनेक पारिभाषिक तथ्यों के अतिरिक्त ' निदान ' शब्दानुचन्धी - जिस तथ्य का स्वरूप - विश्लेषण हुआ है, उसका भी ब्राह्मणोक्त, तथा पुराणोक्त पारिभाषिक-श्राख्यानोपख्यानों के तत्त्वार्थ समन्वय में अन्यतम ही स्थान माना जायगा । यही नहीं, निदानानुगत-विज्ञान के सम्बन्ध में यह कह देना भी अतिशयोक्ति नहीं मानी जायगी कि, निदानविद्यानुगत - प्रतीकात्मक-सङ्केतों के समन्वय के बिना न तो वेदशास्त्र की श्राख्यानभाषा का ही समन्वय सम्भव, एवं न आगम, तथा पुराण - शास्त्र के रहस्य का ही समन्वय सम्भव । उसी महत्त्वपूर्णा निदानविद्या के सम्बन्ध में त्रस्ता-वनायां उदाहरणरूपेण किञ्चिदिव निवेदन कर दिया जाता है । " श्रुतत् तत् समझ लेना " ही निदानशब्द का निष्कर्षाथ है, जिसे संस्कृतभाषा में ' आरोप ' कहा गया है । जो अमुक वस्तु नहीं है, किन्तु उसमे अमुक वस्तु का आरोप कर दिया जाता है, इस आरोप-विधि का नाम ही निदानविधि है, एवं लोकव्यवहार में प्रायः सर्वथैव लौकिक - निदान भावों के द्वारा व्यबहार की व्यवस्था देखी सुनी जारही है । उदाहरण के लिए सहोदर भ्राता में दक्षिणभुजा का आरोप लोकप्रसिद्ध है । दक्षिणहस्तानुगत - कर्मकौशलरूप सादृश्य ही इस निदानारोप का आधार है । शोक का नैदानिक श्रारोप कृष्णावस्त्र में इसलिए कर लिया जाता है कि, शोक संविग्न मानव का मन ज्ञानज्योति से अभिभूत ही हो-जाता है, जिस अभिभूति का स्वरूप अनिरुक्त कृष्ण - भाव से अनुगत माना गया है * । कीर्त्ति का नैदानिकरूप श्वेतच्छत्र माना गया है । शान्ति - समृद्धि का निदान हरित दूर्वा माना गया है । क्रान्तिरूपा अशान्ति का निदान - ' रक्तवस्त्र ' माना गया है । स्टेशनों की हरि झन्डी का शान्ति सूचकत्त्व, एवं लालझण्डी का त्रि-सूचकत्व प्रसिद्ध ही है । निगम ( वेद ), आगम, तथा पुराणशास्त्र - त्रयी के यच्चयावत् " श्रसदाख्यान " ( कल्पित कथानक ) उसी निदानभाव के आधार पर प्रतिष्ठित हैं, जिसका साङ्केतिक रहस्यात्मक पारिभाषिक समन्वय न कर सकने के कारण ही श्राज भारतीय संस्कृति का गौरवपूर्ण श्राख्यानप्रकरण सर्वसाधारण की कौन कहे, बड़े बड़े • विश्वातीत अज्ञात तत्त्व अनुपाख्यतम है, रात्रिगत, एवं श्रख मीचने से प्रतीयमान - अन्धकार-अनिरुक्तम है, एवं कृष्णवर्ण ( काला रँग ) निरुक्तम है । इसप्रकार तमोमान तीन विवर्त्त भावों में परिणत माना गया है । ६४

पृष्ठ 65

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड विद्वानों के लिए भी मतिविभ्रम का ही कारण बना हुआ है । एवमेव भारतीय वह समस्त - उपासनाकाण्ड भी इसी निदानविद्या के अभिभव से आज भावुक मानवों की दृष्टि में आपातरमणीया भ्रान्त - श्रालोचना का ही क्षेत्र बना हुआ है, जिसके परिणाम स्वरूप ही कर्म्म - उपासना - ज्ञान- त्रयी - से अनुगता मध्यस्था उपासना श्रान सर्वथैव अपने पारिभाषिक तत्त्व से स्मृतिगर्भ में विलीन होगई है । यों एकप्रकार से सम्पूर्ण शास्त्र निदानविद्यात्मिका सङ्क े तविद्या की विस्मृति से आज के युग के लिए, विशेषतः प्रतीच्य - भतविज्ञान- सम्पर्क - जनिता भारतीया नवशिक्षिता प्रज्ञा के लिए ' उपहास ' की ही क्रीड़ास्थली बना रह गया है । जैसा कि, पूर्व के बारहवें संस्मरण - प्रसङ्ग में निवेदन किया गया है, प्राण, और प्राणी, दोनों शब्द भारतीय - विज्ञानकाण्ड में अभिन्नार्थ के ही संग्राहक बने हुए हैं - ( देखिए - पृष्ठ सं ० ५८ से ६० पर्य्यन्त ), जिस अभिन्नार्थकता का निष्कर्ष यही निकलता है कि वस्तुस्वरूप की स्थिति - परिस्थिति के अनुपात -- तारतम्य से कहीं अमुक शब्द ' प्राण ' का संग्राहक बन जाता है, तो वही शब्द ' प्राणी ' का ग्रनुग्राहक बन जाता है । इस विपर्य्यय का आधारभूत तथ्य ही ' आरोप ' लक्षण वह निदानभाव है, जिसका एक लौकिक उदाहरण ' दक्षिणभुजा ' से अनुगत ' सहोदरभ्राता ' भी बना हुआ है । जिस श्रारोपात्मक– सम्बन्ध - विशेष से लोक-व्यवहार में दो सहोदर भ्राता परस्पर एक दूसरे की दक्षिणभुजा कहलाते हैं, वह सम्बन्ध - विशेष ही-' निदानभाव ' है । पञ्चाङ्ग लि से युक्त - पाणि - भाव से समन्वित दक्षिणहस्तानुगत अध्यवसायात्मक - कर्म्म कौशल-रूप महान् श्रम ही मानव के लोकजीवन की सफलता का प्रमुख आधारस्तम्भ माना गया है । सहोदर भ्राता परस्पर एक दूसरे के उसी प्रकार कर्म्मसहयोगी बने रहते हैं, जैसेकि उनकी दक्षिणभुजा, एवं दक्षिणहस्त । इसी सादृश्य से सहोदर भ्राताओं में श्राहार्थ्यारोपविधा से दक्षिणभुजा, किंवा दक्षिणहस्त का आरोप होगया है, और यही ' निदान ' का एक लौकिक उदाहरण बना हुआ है । " कहीं प्राणी से तदभिन्न, तदाधारभूत प्राण का ग्रहण होजाता है इसी निदान के माध्यम से, जिसके उदाहरण भगवान् गणपति के वाहन मूषकराज बने हुए हैं । मूषक ' पार्थित्र - ध्रुव - प्रतिष्ठा - प्राण का नाम है, जिसकी पारिभाषिक संज्ञा ब्राह्मणग्रन्थोंनें ' रस ' मानी है । पार्थिव घनतम - रसात्मक - प्रतिष्ठाप्राण ही वह ‘ मूषकप्राण ' है, जो भूपिण्ड से अनुगत एकोनपञ्चाशत् ( ४६ ) मरुद्गणों के मूलप्रवर्त्तक, अतएत्र-‘ गणपति ' नाम से प्रसिद्ध पार्थिव - प्राण की भी प्रतिष्ठा बना हुआ है । इसप्रकार समस्ता पार्थिवी विभूति ही प्रतिष्ठा रूप - पार्थिव - गणपतिप्राण की भी प्रतिष्ठा क्योंकि भूकेन्द्राभिमुख - अन्तर्गर्भित - घनतम - रसात्मक-मूषकप्राण ही बना हुआ है । अतएव इस रसात्मक - मूषकप्राण को अवश्य ही पार्थिव - गणपतिप्राण का ' वाहन ' मान लिया जासकता है । सुप्रसिद्ध मूषक नामक प्राणी ( चूहे ) में क्योंकि पार्थिव - रसात्मक -मूषकप्राण विशेषरूप से, प्रधानरूप से अभिव्यक्त रहता है, अतएव यह प्राणी भी तत्प्राण के नाम से ( मूषक नाम से ) ही प्रसिद्ध होगया है, जैसे कि कूर्म्मप्राणप्रधान श्रमुक प्राणी ( कछुवा भी ' कूर्म्म ' नाम से लोक में प्रसिद्ध है, जिससे अनुप्राणिता याज्ञिकी चिति का पूर्व में संस्मरण किया ही जा चुका है ( देखिए पृ ॰ स ॰ ५६ ) | दृष्टि मूषकप्रारणी पर है, एवं मनोयोग तत्प्रतिष्ठात्मक - मूषकप्रारण पर है । यही श्रपासनिक-निदानभाव है, जिसे सर्वथा तत्त्वानुगत ही माना जायगा । ÷ उपासना - निबन्धन - निदानमाव का खण्डद्वयात्मक - ' भक्तियोगपरीक्षा ' नामक बृहन्निबन्ध में ही सविस्तर प्रतिपादन देखना चाहिए । ६५

पृष्ठ 66

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किश्चिदिव वेदन प्राण, और प्राणी से अनुगता श्रारोपमूला तत्त्वात्मिका तथाभूता निवानविधा के आधार ही यज्ञकम्म में प्राकृतिक - प्राणों से कृतरूप भूत - भौतिक - प्राणवान् पार्थिव - सम्भारों पदार्थों परिग्रहों का सम्भार करते हुए ' आखुकरीष ' ( चूहे के बिल की मिट्टी ) का संग्रह भी अनिवार्य्यं माना गया है, जिसका सुविशद वैज्ञानिक - समन्वय तत्प्रकरण में हीं द्रष्टव्य है । श्रुति * के अनुसार भूषक ही पार्थिवरस के परिज्ञाता हैं I तो क्या मानव पार्थिवरस का परिज्ञाता नहीं है ९, इस प्रश्न का समाधान रसात्मक वह मूषक - प्राण ही है, जिसका सजातीयाकर्षण - सिद्धान्तानुसार मूषकप्राण के साथ ही प्रधान सम्बन्ध अभिव्यक्त होरहा है । वह रसात्मक मूत्रकप्राण तत्प्राणकृतात्मा मूत्रकप्राणी के द्वारा संकलित मृद्भाग में हीं क्योंकि उपलब्ध होता है । अतएव ऋषि ने यज्ञकर्म में उसका संग्रह अनिवार्य्य माना है । पार्थिव गणपतिप्राण के विचलन से ही पार्थिवप्रजा विकम्पित होती है । यों विघ्नहर्ता गणपतिदेव विघ्नकर्त्ता भी बन जाया करते हैं । इनके इस विकम्पनात्मक विचलन धर्म का सर्वप्रथम तद्वाहन रूप पार्थिव-रसात्मक– मूषकप्राण पर ही प्रभाव होता है । अतएव सर्वप्रथम तत्प्राणकृतात्मा मूषक ( चूहे ) ही मरने लगते हैं, और यही ' महामारी ' ' जनपद विध्वंसिनी ' ( प्लेग आदि खाङ का मिकी व्याधियों ) की उपक्रमभूमि मानी गई है । इसप्रकार मुत्रकप्राणी अनेक दृष्टिकोणों से गणपति के वाहनरूप मूषकनारा का नैदानिक -माध्यम बना हुआ है, जिस इस अत्यन्त रहस्यपूर्ण - सृष्टिविज्ञाननिबन्धन - - प्राणात्मक तथ्य के समन्वय न करने के कारण ही हमारी बालप्रज्ञा भारतीय - उपासनाकाण्ड के महत्त्वपूर्ण श्रङ्गों का श्राज उपहास करने लग पड़ती है, और कहने लग पड़ती है कि, ' गणेशजी इतने मोटे और उनका वाहन छोटासा चूहा ' - इति नु ब्रह्मण्यम्! श्रब्रह्मण्यमेव!! यह सर्वथा अविस्मरणीय है कि, ' निदान ' के माध्यम से अनुप्राणित आख्यानोपाख्यानों का केवल एक ही विभाग है, जबकि तदतिरिक्त सात प्रकार के आख्यानोपाख्यान सर्वात्मना तत् के तद्भाव से ही समन्वित हुए हैं । श्राठ प्रकार के श्राख्यानों में से आठवाँ ' असदाख्यान ' नामक एक विभाग ही श्रारोपात्मक--निदानभाव से समन्वित है, जिसके श्रमुक महान् लक्ष्य की सिद्धि के लिए ही ऋषिप्रज्ञा की ओर से नक्षत्रमण्डल - पर्वतश्रेणियाँ - नदनदी - रूपेण त्रिधा वर्गीकरण हुआ है । अर्थात् कुछ एक आख्यान तो निदानविधि से नक्षत्रों के आधार पर उपकल्पित हैं, कुछ एक पत्र के माध्यम से, एवं कुछ एक नद - नदियों के माध्यम से समन्वित हुए हैं, जिन इन सभी नैदानिक - रहस्यों का यत्र तत्र प्रसङ्गदृष्ट्या समन्वय - प्रयास-हुआ है । ' असदाख्यान ' का लौकिक अर्थ - निष्कर्ष है - ' मिथ्या कथाएँ ', अर्थात् ' गढ़ी हुई कहानियाँ ', जिन इन कथा - गाथा - रूपा ' कहानियों ' के माध्यम से ही ऋषिप्रज्ञा ने सर्वथैव श्रञ्जमा अनेक तात्विक रहस्यों से भारतीय प्रजा को सुपरिचित करा दिया है । आज की सभ्या - भाषा ( इ ंगलिश ) में मम्भवतः जिसे -* आखुकरीषं सम्मरति । श्रखवो ह वा अस्यै पृथिव्यै रमं विदुः । तम्माचेऽधोऽधं इमां पृथिवीं चरन्तः पीविष्ठाः । अस्यै हि रसं विदुः । तत् - अस्याऽएवैनमेतत् रसेन समर्द्धयति । तस्मादाखुकरीषं सम्भरति । - शतपथब्रा ० २।१।१ / ७ ६६

पृष्ठ 67

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ' माइथालॉजी ' कहा जाता है, वही तात्पर्य ' सदाख्यान ' का है । यदि ' माइथा ' को अनुकरण - सादृश्य से-' मिथ्या ' मान लिया जाता है, तो ज्ञानार्थक ' लॉजी ' के सम्बन्ध से ' माइथालॉजी ' का निष्कर्षार्थं मी ' मिथ्याज्ञान ' - ' झूठी कहानियाँ ' हीं प्रमाणित होजाना है, जिसका बालोपलालनात्मक - शिक्षणक्रम की दृष्टि से अत्यन्त ही उपयोग माना गया है, जिस इत्थंभूता उपयोगिता का क्षेत्र केवल एक प्रकार का ही आख्यान-विभाग है, जबकि एतदरिक्त सात - विभाग तो सर्वथा तदुभावापन्न - वास्तविकी - ही प्राख्यान माने गए हैं । अतएव जो महानुभाव वैदिक पौराणिक समस्त आख्यानोपाख्यानों को एकहेलया ' माइथालॉजी ' मान बैठते हैं, उनकी तथाभूता मान्यता प्रौढ़िवादमात्र के अतिरिक्त और कुछ भी तो महत्त्व नहीं रखती, इत्यलमति-पल्लवितेन-- प्रासङ्गिक- नैदानिक - भावानुबन्धेन । मूर्त्त के साथ मूर्त्त के द्वारा श्रमूर्त्त का सम्बन्ध स्थापन ही औपासनिक - निदानभाव का निष्कर्षार्थ है । गणपति का अमुक विचित्र आकार क्यों?, गणपति ऐसे विशाल, और उनका वाहन मूषक नामक एक स्वल्पकाय - प्राणी कैसे?, भगवान् विष्णु के हाथ में शङ्ख - चक्र - गदा - पद्म - क्यों?, महाकाली के हाथ में सुरापात्र कर्त्री खड्ग - आदि क्यों?, इत्यादि श्रगणित - कुतूहलपूर्ण- इस क्यों? और कैसे?, की परम्परा को उपशान्त करने वाली निदानविद्या के तात्त्विक स्वरूप का ही उदाहरण - विधि से उपबृंहण हुआ है, और यहां निदानानुगत - प्रासङ्गिक तथ्य का संक्षिप्ततम - - स्वरूप - दिग्दर्शन है, जिस इस निदान भावानुबन्धी - शिक्षण-कौशलात्मक तथ्य का ही भगवान् भर्तृहरि के द्वारा निम्न लिखित शब्दों में संस्मरण हुआ है -उपायाः शिक्षमाणानां बालानामुपलालनाः । सत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते ॥ ( १३ ) –४ * --* - श्रचिन्त्यस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः उपासकानां सिद्धयर्थं ब्रह्मणो रूपकल्पना ॥ ६७

पृष्ठ 68

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श्रीः ( १४ ) - वेदपरिगृह कर्म्म – प्रमङ्गतः -याख्यानोपाख्यानादि - निबन्धना विविधा - वैज्ञानिकी पारभाषाएँ ( क ) - देवासुरदाय विभागानुबन्धी- श्राख्यान का संस्मरण -- रूपेण त्रिधा विभक्ता वेदसं [ हृतानुगता अत्यन्त रहस्यपूर्णा विज्ञानभाषा, स्तुतिभाषा, एवं इतिहास भाषा त्रिविध ज्ञातव्य - विषयों में पारिभाषिकी भाषाओं से श्रनुप्राणित विज्ञान- स्तुति - इतिहास - नामक सुप्रसिद्ध की सभी श्रेणियो के पुरातन-से सवान्त के इतिहासभावानुगत ' ऐतिहासिक ' तथ्य के सम्बन्ध में भारतवर्ष सर्वथैव गजनिमीलिका - - पथानु-नूतन – वेदभक्त ( सनातनधर्म्मावलम्बी विद्वान् एवं श्राय्र्यसमाजी महाशय हेतु है ) - वेदों का अरुषेयत्त्व- निबन्धन बर्मा ही देखे सुने जारहे हैं, जिस इस गजनिमीलिका का एकमात्र ऐतिहासिक तथ्यों का समन्वय दृश्वरकृर्तृत्व | " ईश्वरकृत पौरुषेय वेदशास्त्र के सम्बन्ध में मानवचरित्रात्मक ' इत्यादि कतिपय स्थलों के कैंस ‘ सम्भव ' है ", इस तर्काभास को अग्रणी बनाकर, ' बबरप्राबाहारकामयत धर्मावलम्बी विद्वान् भी अपनी ' बचरप्रावाइणि ' शब्दों को वायु के अनुकरण से अनुगत मानते हुए सनातन ज्ञातव्य विषयों में से उस अन्त काल्पनिकी अपौरुषेयता का भ्रान्ति में मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के महत्त्वपूर्ण ही बनते आ रहे हैं विगत तीन सहस्र वर्षों के – ' इतिहास ' नामक ज्ञातव्य विषय की ओर से एकान्ततः उदासीन के आधार पर सुप्रतिष्ठिता-से, जिम उदामीनता के दुष्परिणाम स्वरूप ही भारतवर्ष की मनातन संस्कृति का चिरन्तन वह इतिवृत्त संबंधा ही दिग्देशकालनुबन्धिनी -- सर्वभूद्ध न्या- भारतीय सभ्यता की मौलिकता के साथ साथ ही भातराष्ट्र स्मृतिगर्भ में विलीन होगया है, जिस के विस्मरण से सभ्यतानुबन्धी बन गया है । गौरव सास्कृातक -- गौरव के यथार्थ- समन्वय से सर्वथैव पराङमुख इतिवृत्त - सम्बन्धी अवश्य ही वर्तमान युग के मनीषी प्रतीच्य विद्वानोंनें वेदशास्त्र में उपवर्णित में अपनी अमुक ऐतिहासिकी अन्वेषण की ओर दृकपात करते हुए वेद - युगानुगता ' सभ्यता ' के सम्बन्ध की दृष्टि से पश्चिमी - जगत् धारणाएँ अभिव्यक्त कीं हैं । त्रिसहस्र वर्षावधि से सुप्ता भारतीय प्रज्ञा के उद्बोधन विद्वानों के इत्थभूत प्रयास से एक का तथाभूत प्रयत्न अभिनन्दनीय भी माना जासकता है । किन्तु प्रतीच्य मिला है, वहाँ साथ साथ ही वैसी-श्री जहाँ भारतीय अर्वाचीन विद्वत् प्रज्ञा को श्रंशत: उद्बोधन के कारण मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र भ्रान्तिपरम्पराएँ भी इसी उद्बोधन के साथ मिल गई हैं, जिन ६८

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 69 का मूल पृष्ठ
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ज्ञानविज्ञानात्मक सृष्टेविज्ञान - निबन्धन वह महत्त्वपूर्ण गौरव सर्वथैव अभिभूत होगया है जिम श्रभिभूति के कारण ही आज की नवशिक्षिता भारतीय प्रज्ञा के लिए वेदशास्त्र उस पुरातन सभ्यता का सूचक एक वैमा ' ग्रामीणभाषामय शास्त्र ' ही बना रह गया है, जिस युग के सभ्य मानव को इन नवीन - भारतीय- वेदज्ञ -बन्धुत्रों के दीक्षागुरु, किंवा सर्वस्वगुरु पश्चिमी - विद्वानों के द्वारा ठोक - पींद कर यही मिला दिया गया है कि--" उस युग में क्यों क लिखने पढने के साधन नहीं थे, अतएव केवल सुन - सुना कर ही मानव अपने वाक्यों को कण्ठस्थ कर लिया करते थे । अग्निताप से जब उन्हें शान्ति मिलो, तो वे अग्नि की स्तुति करने लग पड़े । इसी प्रकार -ज्यों ज्यों उह्नों प्रकृति के अग्नि वायु - प्रकाश - जल आदि को उपयोगिता का आभास होने लगा, त्यों त्यों हीं वे अपनी उस युग की भाषा में उन उन उपयोगी - पदार्थों का स्तुत्यात्मक - चाटुकारिता पूर्ण वर्णन - करने लग पड़े, और वह वर्णनसंग्रह ही उनका वेढ़ कहलाया, जो सचमुच उस युग की सभ्यता का ही परिचायक ग्रन्थ है " श्राज के सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र - भारत में प्रकाशित होने वाली अमुक पत्र - पत्रिकाओं में भी वदशास्त्र के सम्बन्ध में पश्चिमी विद्वानों की ओर से दायादरूपेण मिलने वालीं तथाविधा भ्रान्त धारणाओंों को ही उपहास के रूप में निकलते जब हम सुनते हैं, तो क्षणमात्र के लिए के लिए हमें स्तब्ध अवाक् ही बने रह जाना पड़ता है * । किन्तु इस में न तो पत्र - पत्रिकाओं को ही दोष दिया जासकता, नैव तदनुगामिनी श्राज की उन नवीन - प्रज्ञाओं को ही कुछ कहा सुना जामकता, जिह्नों अपने समस्त जीवन में भारतीय - मूलसंस्कृति के ज्ञानविज्ञानात्मक-परिचयसूत्र कभी किसी की ओर से भी उपलब्ध हुए ही नहीं । ठीक इसके विपरीत जिन्हें अपने शिक्षणकाल में प्रतीच्य - विद्वानों की तथाकथिता धारणाएँ हीं दायादरूपेण ( विरासत में ) उपलब्ध हुई, जिन का नग्नचित्रण पूर्व में किया ही जाबुका है । इधर प्राच्यविचारानुगाभी - भारतीय विद्वान् अपनी पीरुषेयता की भ्रान्ति से ऐतिहासिक तथ्यों से शून्य रहते हुए जहाँ इस दिशा में तटस्थ बने रहे विगत तीन सहस्र - वर्षों से, वहाँ पारिभाषिक शब्दों की परम्परा से संस्पृष्ट रह जाने के कारण इन भारतीय विद्वानों की ओर से वेदशास्त्रानुबन्धी-ज्ञानविज्ञानात्मक - उन - सृष्टिरहस्यों के सम्बन्ध में भी किञ्चिदिव प्रकाश नहीं डाला गया तदवधि में, जिन वैदिक - वैज्ञानिक तथ्यों के सम्मुख सभी युगों की प्रज्ञात्रों को हठात् प्रणतभावेन श्रवनतशिरस्क बन जाना पड़ता है । यों एकमात्र भारतीय - विद्वानों की साम्प्रदायिक - मनोवृत्ति से श्रनुगता मतवादाभिनिवेशवृत्ति के कारण आविर्भूत होपड़ने वाले वेदापौरुषेयत्त्व की भ्रान्ति से ही वेदशास्त्र के विज्ञान - स्तुति- इतिहास - नामक तीनों ज्ञातत्र्य - स्तम्भ, एवं कर्म्म - उपासना - ज्ञान - नामक तीनों कर्त्त व्यस्तम्भ, दोनों ही विभूति - स्तम्भ अपने ज्ञानविज्ञानात्मक - पारिभाषिक - तथ्यों से सर्वथैव उस सीमा - पर्यन्त - पराः परावत ही ( अत्यन्त ही विदूर ) बन गए, * - स्वतन्त्र भारत की राजधानी देहली से प्रकाशित होने वाली, सुधारक- जगत् के लिए महान् आकर्षण का विषय ' सरिता ' में वेदशास्त्र के सम्बन्ध में ऐसी ही धार-या प्रकाशित होतीं रहतीं हैं । ६६

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 70 का मूल पृष्ठ
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किञ्चिदिनवेदन जिम विदूरत्व से ही ग्राम प्रतीच्य - जगत् भी अपनी फल्पना के आधार पर वैदिक इतिवृत्तों के साथ यथेच्छ कीड़ा कौतुक करता हुआ नहीं पा रहा, तो तच्चरणरचः पथ के अन्धानुवर्मा, प्रत्यक्ष प्रभावमूला स्वस्वरूप विमोहिनी सर्वनाशकारिणी भावुकता के अग्रणी आज के नवशिक्षित भारतीय वेदमक्क भी प्रतीच्या विचारधारा का ही अहर्निश यशोगान करते हुए- ' कुतस्तत्र प्रतीकारो रक्षको यत्र भत्तकः ' को हो अक्षरशः चरितार्थ करते हुए इतस्ततः इन्द्रम्यमाना है - सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र रूपेणैवेति महद्दु: खास्पदम् । इधर कुछ समय से श्रमुक परिगणित वैटभक्त श्रवश्य ही वेदशास्त्र की तथाकथिता - प्रवञ्चना से दुःखी हुए हैं, जिस दुःख की नस के लिए ही कुछने तो शब्दानुकरण के माध्यम से वर्तमान - प्रतीय - मौतिक विज्ञान तथा आविष्कारों के साथ वैटिक सिद्धान्तों का अस्तव्यस्त समन्वय करना आरम्भ कर दिया है- वेदशास्त्र के गौरव स्थापन के व्यामोहन से तो एक दूसरा वर्ग वैसा भी है, जो वैदिक - तथ्यों की विशुद्धा ' अध्यात्मपरक ' व्याख्या में ही तल्लीन रहता हुआ किसी वैसे श्रज्ञात - अध्यात्म - प्राण की कल्पना में ही विभोर बना हुआ है, जिसका लोक - समाज - निबन्धना भूतभीतिकी बाह्यजगदनुवन्धिनी - अभ्युदय - प्रवृत्ति से कुछ भी तो सम्बन्ध नहीं माना जासकता इसप्रकार एक वर्ग वेदशास्त्र को विशुद्ध भौतिक - विज्ञानशास्त्र प्रमाणित करने के लिए आतुर है शब्दानुकरण माध्यम से जोड़ - तोड़ बैठाता हुआ, तो दूसरा वर्ग ' प्राण ' व्यामोहन- निबन्धन - काल्पनिक अध्यात्मजगत् में विचरण करता हुआ वेदशास्त्र के सम्पूर्ण विज्ञान - स्तुति- इतिहास कर्म्म उपास्ति ज्ञान-वैभवों को एकमात्र लोकातीत अध्यात्म पर ही परिभ्रान्त कर देने के लिए आकुल व्याकुल जनता हुआ श्राननिष्ठा - सम्भत उस समस्त श्राचारसौन्दयं को एकान्ततः निष्प्राण ही प्रमाणित कर देना चाहता है, जिस आचारसौन्दर्य की भारतवर्ष आज तीन सवों से उत्तरोत्तर विस्मृत ही करता रहा है । कहना न होगा कि वर्तमान - भूत विज्ञान के साथ वेदशास्त्र का समतुलनात्मक व्यामोहन प्रयास जैसे वेदशास्त्र के पारिभाषिक- ज्ञान विज्ञानात्मक - प्रातिश्विक - समन्वय साम्राज्य के गौरव को अभिभूत दी कर रहा है, तथैव ' अध्यात्मप्राण ' - विमोहनानुगत केवल श्राध्यात्मिक - समन्वय भी वेदशास्त्र के वास्तविक-समन्वय से पृष्ठ ही प्रमाणित होरहा है और यों दोनों उन तथाकथित वेदकों के तथाभूत दोनों ही वेदार्थ समन्वयात्मक प्रकार वेदशास्त्र के निः यसानुगत -- अम्युदय - साधक महान् उद्देश्य से सर्वचैव विपरीत पथ का ही अनुसरण करते हुए वेद के महतो महीयान् वास्तविक गौरव के विरोधी ही प्रमाणित दोरहे हैं । तथाविधा भ्रान्ति परम्पराओं का एकमात्र प्रमुख कारण है - श्राधिदैविक - ईश्वरीय विश्व की चात्य-न्तिक - विस्मृति, जिस श्रभिदैनिक - ईश्वरीय नियत के आधार पर ही शानविज्ञानात्मिका सृष्टिविद्या का प्रमुख सम्बन्ध माना गया है । एक वर्ग अधिभूत में प्रासक्क होता हुआ आधिदैनिक से विमुख होरहा है, तो दूसरा वर्ग अध्यात्म में आसक्त होता हुआ अधिदैवत से परामुख बना हुआ है, जबकि वस्तुस्थिति की पूर्णता अधि-दैवत- अध्यात्म- अधिभूत, इन तीनों के समन्वय पर ही अवलम्बित है । भूतवादी का सबसे बड़ा व्यामोहन है- " प्रत्यक्षदृष्ट भून - भौतिक - पार्थिव पदार्थों को ही मानव के लिए सर्वस्व मान बैठना " इस की दृष्टि में अधिदेवत ( ईश्वरीय प्राकृतिक - जगत् ), एवं बीवात्मा-मुत्रन्धी - श्रध्यात्मजगत्, सबकुछ भौतिक हो भौतिक हैं । अर्थात् सब कुछ इन भूत - भौतिक- पिण्डों में ही है । इन से अतिरिक्त न कोई अधिदेवत है, एवं न कोई अध्यात्म इसी भूतदृष्टि के आधार पर भूतो-नतिक भूतविज्ञान उत्तरोतर पुष्पित पावित होता बारहा है, जिस की प्रवृद्धतमा जड़ता के प्रावरणपुों सम्पुट से ७०