Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 521–530
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 521–530
पृष्ठ 521
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयाय श्राहवनीया--टि गाईपत्यः शतपथब्राह्मण : - तृतीयभाग तृतीयभाग २८. - तृती प्रभाग २८ लान श्रङ्ग --१६८ --सम्भूय - मध्यविन्दु २८ - तृतीय भाग २८ -तृतीयभाग - तृतीयभाग ७८५ मध्यबिन्दु के पश्चिमभागस्थ चिह्न को लक्ष्य बनाइए । गार्हपत्यकेन्द्र में बद्ध रज्जु को निकाल कर उस चिह्न के ठीक सामने जाकर रज्जु को रख दीजिए । वहाँ एक चिह्न कर दीजिए । उस स्थान से || अङ्गल के प्रदेश पर उत्तर की ओर छोड़ कर एक शङ्क, गाड़ दीजिए ॥ शङ्क स्थान को केन्द्र मानते हुए एक यवपरिमाण से अधिक १६ अङ्ग लियुत रज्जु से वृत्त बना डालिए इस वृत्त का व्यासार्द्ध प्रायः || अल का होगा । इस वृक्ष में केन्द्र से स्पर्श करती हुई एक मीबी रेखा ] पूर्वापर बना दीजिए । ऐसा करने से वृत्त के दो विभाग हो जायेंगे । इन दोनों में से उत्तरभाग को नास्तिरूप में परिणत कर दीजिए । शेष बचा हुआ अर्द्धचन्द्राकार यही दक्षिणा [ दक्षिण की ओर का बाधा भाग ] दक्षिणाग्निकुण्ड बन जाता है । इसी में ' श्रपरपाग्नि ' प्रतिष्ठित रहता है वेदि का यही दक्षिणप्रदेश ' त्रितृतीय ' प्रदेश कहलाता है ।
पृष्ठ 522
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थब्राह्मण यह तो हुई मध्यविन्दु के पश्चिमभागस्थ चिन्दु की कथा । अत्र चलिए पूर्वबिन्दु की ओर | रज्जु को उठाइए, पूर्वचिन्दु के सम्मुख उत्तर की ओर चिह्न कर दीजिए । इसी वितृतीय प्रदेश में ' उत्कर ' बनाया जाता है । इसी अभिप्राय से — ' त्रितृतीये उत्करं करोति ' यह कहा गया है । इसके अनन्तर आहवनीयकुण्ड के मध्य में प्रतिष्ठित शङ्क मे पश्चिम की ओर तीन अरत्नि ( ७२ अङ्गल ) स्थान छोड़कर एक शङ्क, गाड़ दीजिए | उसी ग्राहवनीय - मध्यशङ्क से दक्षिण, और उत्तर क्रमश: १ || ( डेढ़ ) अरत्नि ( ३६ अङ्गल ) के प्रदेश पर एक एक शङ्क, और गाड़ दीजिए । इसी मान से वेदि विषमचतुरस बन जाती है । उत्करकरणानन्तर- " देवस्य त्वेति सम्वमादाय सतृणम् ” [ का ० श्र ० २ | ६ | ५ ] के अनुसार-" देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् आददेऽध्वरकृतं R देवेभ्यः ” [ ११२४ | सविता देवता के प्रसत्र में ( अनुज्ञा में ), अश्विनीकुमारों के बाहू से एवं पूषादेवता के हाथों से देवताओं के लिए यत्रकर्म सम्पन्न करने के कारण ' अध्वरकृत ' नाम से प्रसिद्ध सतृण ' सत्य ' को उठाता हूँ, अनन्तर यह मन्त्र बोलता हुआ व दक्षिण हाथ से सब को उठाता है । " सतृणं सव्वे कृत्वा दक्षिणानालम्ब जपति ' इन्द्रस्य बाहु रिति " [ का ० श्र ० २।६।५ ) के अनुसार ---" इन्द्रस्य बाहुरसि दक्षिणः सहस्रभृष्टिः शततेजा वायुरसि तिम्मतेजा द्विषतो क्धः ” [ १।२४ ] हे स्क्र्य! ग्राप इन्द्र के दहिने हाथ हैं । सहस्रों शत्रुओं को नाश करने वाली आपको कोरें हैं, अतएव ' सहस्रभृष्टि ' नाम से प्रसिद्ध हैं । आप ( अपनी दिव्य आभा से ) चारों ओर से प्रदीप्त होरहे हैं | आप वायु ( वायु के समान तत्क्षण शत्रु के शरीर में प्रविष्ट होने वाले ) हैं । आपका तेज अत्यन्त सूक्ष्म है । अर्थात् आप बैनी धार वाले हैं । ऐसे आप शबुओं के नाशक हैं । अव तृणयुक्त दक्षिण हस्तस्थ पय को नाम हाथ में रखकर दक्षिण हाथ से स्पर्श करता हुआ उपयुक्त मन्त्र बोलता है । यहाँ प्रसङ्गप्राप्त इतना और समझ लेन } चाहिए कि, पितृकम्मे में मन्त्रोपात्त ' अध्वरकृतं देवेभ्यः ' के स्थान में ' देव-पितृभ्यः ' यह कह कर लेना चाहिए । ग्रतः तत्सम्बन्धी स्यादान- मन्त्रजपादि उस कर्म्म में नहीं होते । साथ ही स्तम्चयजुर्हरण का भी पिण्डपितृयज्ञ में अभाव है । आगे जाकर इस स्फ़्य से भूमि पर प्रहार होने वाला है । इम प्रहरणकम्र्म से आरम्भ कर पुरीपनिवपन कर्म्म पर्यन्त सम्पूर्ण कर्म्म ' स्तम्बयजुर्हरण ' नाम से प्रसिद्ध है । ऐसी अवस्था में-“ नोपस्पृशेत् शाथिन्यात्मानौ तेन स्तम्बयजुहरिष्यन् " [ का ० श्र ० २/६/७ ] के अनुसार — ७८६
पृष्ठ 523
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थत्राण आगे जाकर स्तम्त्रयजुर्हरण करता हुआ अध्वर्यु स्तम्बयजुर्हरण- पर्य्यन्त उस वज्ररूप स्पय से भूल कर भी अपने शरीर से, एवं पृथिवी से स्पर्श न करे । अत्र क्रमप्राप्त स्तम्बयजुरण - प्रकार बतलाते हैं— " वेद्यां तृणं निदधात्युदक ' पृथिव्यै वम्र्मासी ' ति " [ का ० श्र ० २२६८ ) के अनुसार--' पृथियै वम्र्मासि ' ( आप पृथिवी के लिए वम्मं हैं ) यह निगद * मन्त्र बोलता हुआ वेदि प उरा छाता है । अभी वेदि बनी नहीं है । अपितु — ' तात्रयात्ताच्छन्द्यम् ' इस न्याय के अनुसार वेदि के लिए नियत स्थान भी प्रकृत में ' वेद ' शब्द से व्यवहृत कर दिया गया है । दमंस्तरणानन्तर- ' पृथिवि देवयजनि ' इति तृणेऽन्तर्हिते प्रहरति ' ' पृथिवि देवयजनि--[ का ० श्र ० २ ६/६ ] के अनुसार-- श्रोषध्यास्ते मूलं मां हिंसिपम् ' [ १।२५ ) ( देवताओं के यजन करने योग्य ( जहाँ देवता यज्ञ करते हैं ), अतएव ' देवयजनी ' नाम से प्रसिद्ध है पृथिवी! हम ( इस प्रहार से ) श्रावके तृणरूप ओषधियों के मूल को नष्ट नहीं करते हैं ), यह मन्त्र बोलता हुआ, तृण से श्राच्छादित वेदिरूप भूप्रदेश पर वज्ररूप स्पय से प्रशर करता है । यह प्रहार तृण पर ही होता है । यही प्रथम प्रहार है | इसके अनन्तर - ' व्रजं गच्छति पुरीषमादत्ते ' ( का ० श्री ० २।६।१० ) के अनुसार ' ब्रजं गच्छ गोष्ठानम् ' ( ११२५ ) ( हे असुर! तुम गोस्थानरूप व्रज में चले जाओ ) यह मन्त्र बोलता हुआ स्पयरूप बज्रप्रहार से जो मिट्टी उखड़ी है, उसे उठा लेता है । इसके अनन्तर— र - ' वर्षतु ते ' इनि वेदि प्रेक्षते ' ( का ० श्र ० २२६/११ ) के अनुसार ' वर्षतु ते द्यौः ' ( ११२५ ) ( तुझारे लिए द्युलोक वर्षा कौ ) यह मन्त्र बोलता हुआ वेदि को देखता है । इसके अनन्तर — ' वधाने ' त्युत्करं करोति ' ( का ० श्रौ. २।६।१२ ) के अनुसार-' वधान देव सवितः परमस्यां पृथिव्यां शतेन पाशैर्यो ऽस्मान् द्वेष्टि यंच वयं द्विष्म-स्तमता मा मौक् ' [ १।२५ ] हे सविता देवता! इस पृथिवी का जो अन्तिम बोर अन्धकार स्थान है, उसमें ( इस प्रक्षिप्त अमुर को प्रेरित करते हुए इसे ) सैंकड़ों पाशों से बाँध दो । जो हम से द्वेष करता है, अथवा जिससे हम द्वेष करते हैं ( इस बन्धनस्थान से उस शत्रु को कभी मत छोड़ो, यह मन्त्र बोलता हुआ सय मे उत्खात मिट्टी को उत्तर में फैंक देता है । भूमि पर चार चार रुपय से प्रहार किया जाता है । इनमें तीन प्रहार तो समन्त्रक होते हैं, एवं एक प्रहार ( चौथा प्रहार ) तूष्णीं ही होता है । इनमें से प्रथम प्रहार का स्वरूप बतलाया है । ' पृथिवी देव-* मन्त्रसंहिता में जो मन्त्र नहीं है किन्तु सूत्रकार ने पद्धति में उसे मन्त्र मान रक्खा है, वही ' निगढ़ ' कहलाताहैं III
पृष्ठ 524
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड चतुथब्राह्मण यजनि ० ' इत्यादि मन्त्र के चार विभाग किए जाते हैं । प्रथम भाग से ' प्रहार ' होता है, दूसरे से ' पुरीपादान ' होता है, तीसरे से ‘ वेदिप्र क्षण ' होता है, एवं चौथे मन्त्रभाग से उत्तर में ' पुरीपोत्लर्ग ' होता है । इस पक्ष का विकल्प बतलाते हुए सूत्रकार कहते हैं -' प्रहरणशेषो वाऽविशेषात् ' [ का ० श्र ० २।६।१३ ] सूत्रकार का तात्पर्य्य यही है कि ' पृथिवि देवयजनि ' इत्यादि मन्त्र से अतिरिक्त जो मन्त्र के तीन भाग हैं, वे इसी मन्त्र के शेष हैं । अर्थात् ' व्रजं गच्छ गोष्ठानम् ' इत्यादि मन्त्र ' पृथिवि देवयजनि ० ' इत्यादि प्रहरण - मन्त्र का ही है । कारण, स्वयं संहिता में एवं शतपथब्राह्मण में विशेष ( सामान्य ) रूप से प्रहरण के सम्बन्ध में हीं पूरा मन्त्र प्रयुक्त हुआ है । ' पृथिवि देवयजनि ० ' से आरम्भ कर ' तमतो मा मौक ' यहाँ तक का सम्पूर्ण मन्त्र केवल प्रहारकर्म्म में हीं विनियुक्त है । ऐसी अवस्था में - पुरीपग्रहए, वेदिप्रेक्षण, पुरीप का उत्कर में उत्सर्ग, ये तीनों कर्म्म तूष्णीं ही करने चाहिएँ । यद्यपि इस वाजसनेय शाखा की यजुर्वेद संहिता में, एवं तत्शास्त्रा के प्रस्तुत शतपथब्राह्मण में पूर्वकथनानुसार पूरा मन्त्र केगल प्रहरणकर्म में हीं विनियुक्त हुआ है । तथापि तैत्तिरियादि शाखान्तर में ( तै ० ब्रा ० ३।२६ ) विशेष ही विधान किया गया है । वहाँ सम्पूर्ण मन्त्र को प्रहरणकर्म में विनियुक्त न मान कर मन्त्र के चार विभाग कर समन्त्रक ही चारों कम्मों का विधान है । साथ ही ' सामान्यविधिर-स्पृष्टः संहियते विशेषत: ' ( तन्त्रवा ० ३।४१४७ ) के अनुसार विशेष विधि प्रधान बन जाती है । अतः मन्त्र के चार विभाग कर चारों कर्म समन्त्रक ही करना न्यायप्राप्त है । प्रथम प्रहरणानन्तर ' अपार ' मिति द्वितीयं प्रहरणादि ' ( का ० श्र ० २२६ | १४ ) के अनुसार ' पारु ' पृथिव्यै देवयजनाद् वध्यासम् ' ( ११२६ ) ( पृथिवी के इस वेदिरूप देवयजनस्थान से अररु नाम असुर को मृत्युसम बनाता हूँ ) यह मन्त्र बोलता हुआ द्वितीय प्रहार करता है । अनन्तर मन्त्रशेष के पूर्वानुसार तीन विभाग कर क्रमशः पुरीषादान, वेदिप्रक्षण, पुरीष का उत्कर में उत्सर्ग, ये तीनों कर्म्म करता है । इसप्रकार यथापूर्व द्वितीय प्रहरणादि कम्मों के अनन्तर – ' अभिन्यस्यत्यग्नीदुत्कर-' मररोदिव ' मिति ' ( का ० श्री ० २/६/१५ ) के अनुसार ' अररो दिवं मा पप्त ' ( हे अररो असुर! ह्यलोक की ओर मत जा ) यह मन्त्र बोलता हुआ आग्नीध्र नामका ऋत्त्विक दोनों हाथों से उत्कर का ( तद्गत प्रक्षिप्त पुरी का भी ) स्पर्श करता है । द्वितीय प्रहरणानन्तर —— द्रप्सस्ते ' इति तृतीयम् ' ( का ० श्र ० २/६/१६ ) के अनुसार ' द्रप्सस्ते मा स्कन्दन ' [ हे वेदिदेवते! आपका जो उपजीव्य रस है, वह च्युत न हो ] यह मन्त्र बोलता हुआ प्रहार करता है । मन्त्र के - ' वर्षतु ते द्यौ ' इत्यादि तीनों भागों से क्रमशः पुरीपादान, वेदि-क्षण, पुरीषोत्सर्ग - तौनों कम्म करता है । तृतीय प्रहरण के अनन्तर - तूष्णी चतुर्थ सतृणम् ' । का ० श्री ० २।६।१७ ] के अनुसार चौथा प्रहार, पुरीषादान, वेदिप्रक्षण, पुरीषोत्सर्ग चारों कर्म्म तूष्णी ही करता है । पूर्व के तीनों प्रहारों में स्पय के साथ युक्त तृण को पूरी के साथ उत्कर में नहीं डाला जाता । परन्तु इस चौथे प्रहार के अनन्तर पुरीष के साथ साथ ही तृण भी उत्कर में डाल दिया जाता है । इस ८
पृष्ठ 525
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयाध्याय धर्म हैं । पड़ रहा है । चतुर्थब्राह्मण शतपथब्राह्मण इति - सूत्रानुगत पद्धतिसंग्रहः हविर्ब्राह्मण उपरत हुअा, अब वेदिब्राह्मण प्रारम्भ होता है । वेदिनिर्माण का मूलाधार प्राकृतिक नित्य यज्ञ है । प्रकृति में [ आधिदैविक- सौरमण्डल में ] निरन्तर अग्नीषोमात्मक यज्ञ होरहा है । इस श्रग्नीषोमात्मक यज्ञ की हवि - ज्योतिष्टोम भेद से दो अवस्थाएँ हैं । हवियज्ञ का प्रतिष्ठारूप भूपिण्ड मे सम्बन्ध है, एवं ज्योतिष्टोम का यदिति नाम से प्रसिद्ध महिमारूपा, ३३ अहर्गणात्मिका स्तोम्या पृथिवी से स ब्रन्ध है | भूपिण्ड पर रहने वाली ओषधि - वनस्पतियाँ हविरूप हैं । भूपिण्ड के केन्द्र से निकलने वाले सौरभागावच्छिन्न श्रावनीप में यह सोम [ हविः सोम - ग्रन्न सोम ] निरन्तर आहुत होता रहता है । पार्थिव अग्नि के हविःसोमात्मक समन्वयरूप हविर्यज्ञ से ही भूपिण्ड पर रहने वाली स्थावर जङ्गम प्रजा का निर्माण होता है । इसी प्राकृतिक भूपिण्ड -- सम्बन्धी नित्य हविर्यज्ञ की प्रतिकृति से हमारे इस वेध हविर्यज्ञ का ऋत्विजों के द्वारा वितान किया जाता है । इस हविर्यज्ञ से यज्ञकर्त्ता यजमान का आत्मा भूपिण्ड की चर - अचर - विभूतियों का भोक्ता बन जाता है । ' यावती वेदिस्तावती पृथिवी'- ' इयं वै वेटिं: ' इत्यादि श्रौत सिद्धान्तों के अनुसार प्राकृतिक नित्य हविर्यज्ञ की वेदि सम्पूर्ण भूपिण्ड है । इस भूषिएड का सम्पूर्ण ही भाग वेदि नहीं है । कारण - ' देवाश्व हवा असुराश्च उभये प्राजापत्या: पस्पृधिरे ' के अनुसार प्रजापति से उत्पन्न देवता और असुर निरन्तर पर-स्पर स्पर्द्धा करते रहते हैं । भूपिण्ड में देवता का भी भाग है एवं असुर का भी भाग हैं । भूपिण्ड के केन्द्र में रहने वाला भूपिण्ड का प्रभव - प्रतिष्ठारूप प्राणात्मक अग्नितत्त्व प्रजापति है । इस पिण्डस्य, दूसरे शब्दों में गर्भस्थ आग्नेय प्रजापति को ' अक्ष ' कहा जाता है । तात्पर्य यही है कि, भूपिएडकेन्द्र में यह प्राजा-पत्याग्नि २४ अंश के व्यासा से [ ४८ अश के परिसर से ] अपनी एक संस्था बनाता है । इसी स्थिर प्रजापतिरूप ' अग्नि- कीलक ' के आधार पर भूषिगड चारों ओर घूमता हुआ अहोरात्र का कारण बनता है । प्रकार इस चौथे प्रहरणकर्म में तूणीं प्रहार करना, और पुरीष का सतृण उत्सर्ग करना, ये दो विशेष--प्रकृत ब्राह्मण में केवल इन चारों प्रहारों की ही इतिहास - पूर्वक ' इतिकर्त्तव्यता [ पद्धति ] बतलाई गई है । कातीय - श्रौतसूत्र - सिद्धान्त के अनुसार पद्धति का दिग्दर्शन करा दिया गया । अत्र तद्विज्ञान की कोर ही विज्ञानप्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया जारहा है । [ भाग्य ] - वैदिक साहित्य के निगूढतम रहस्यों का आंशिक रूप से भी परिचय प्राप्त करने वाले विद्वान् महानुभाव यह मान लेने में कोई आपत्ति नहीं करेंगे कि, ब्राह्मणग्रन्थोक्त तत्तत् प्रकरणविशेषों के यथा--वत् समन्वय के लिए तत्तत् सामान्य विज्ञान - सिद्धान्तों का आश्रय लेना परम आवश्यक है । स्वयं मूलग्रन्थने भी विषय - समन्वय के लिए शैली - भेद से स्थान स्थान पर उन मौलिक तत्त्वों पर प्रकाग़ डाला है । प्रकृत विज्ञानभाष्य में भी विषय - समन्वय के लिए हमें उसी पुनरुक्तिमूला शैली का अनुसरण करना
पृष्ठ 526
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयश्रध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थब्राह्मण यह प्रजापति ' धुर'- स्थानीय है, अतएव इसे ' यक्ष ' कहा जाता है । इस स्वाक्षपरिभ्रमण से इने वाली दैनंदिनगति के प्रभाव से ही भूषिगड देवता, असुर - भेद से दो भागों में परिणत होता है 1 ' चित्रं देवानामुद्गात् के अनुसार सौरमण्डल देवमय है । यह देवतामय तीरप्राणभूषिगड से संधिष्ट होता है । भूपिण्ड का जो भाग सूर्य की ओर रहता है, वह इस सीरप्राण के सम्बन्ध से ' देवतामय ' बन जाता है I एवं भूपिण्ड का यह भाग, जो सौरप्राण से संष्टि न होने से तमोमय रहता है, असुरमय है । असुरभाग में अवस्थित पार्थिव अग्नि को ' सहरपा ' कहा जाता है । यह सहरचा पार्थिव अग्नि असुरों का दूत माना जाता है | सौरभागावच्छिन्न ग्रहः प्रकाशयुत भूभागस्थ अग्नि ' अग्नि ' कहलाता है । इसी दिव्यदूत के लिए-' अग्नि दूतं वृणीमहे होतारं रत्नधातमम् ' यह कहा जाता है । भूपिएड स्वस्वरूप से सर्वथा कृष्ण है । काला है । इसमें स्वस्वरूप से भूतज्योति का प्रभाव है । भूपिण्ड को आहत करने वाला यह तमोमय प्राण ही ' सर्व ' वृत्त्वा शिष्ये ' इस व्युत्पत्ति से ' वृत्र ' नाम का असुर है । जबतक सौर- ज्योतिर्म्मय प्राण का भूपिण्ड के साथ सम्बन्ध नहीं होता, तबतक भूपिएड पर एकमात्र तमोमय वृत्रप्रधान असुरों का हीं साम्राज्य रहता है । असुरभाव यश का विरोधी है कारण स्पष्ट है अग्नि में सोमाहुति का होना ही यश है । सोम है । दाहक है । दाहक अग्नि में आहुत होकर दाय सोम जल पड़ता है । प्रकाश हो-पड़ता है । प्रकाश -- प्रवर्त्तक अग्नियोमीय यज्ञ के साथ तमोमूलक असुरों का विरोध करना स्वाभाविक हो-जाता है । देव - देवताओं की विकासभूमि सूर्य्य है, एवं असुरों का साम्राज्य पानी में रहता हैं । सूर्य्यं में रहने वाला चिन्छुकिमय रूपाधिष्ठाता अमृत प्राण इन्द्र है । पारमेष्ठ्य वारुणमण्डल में रहने वाला श्रावरक तमोमय, प्रकाश का विरोधी प्राण ही ' वृत्रासुर ' है । सौर इन्द्रप्राण बुद्धिवर्द्धक है, एवं पारमेष्टय बारुण-प्राण, दूसरे शब्दों में- आप्यप्रारण बलबर्द्धक है । ' बल ' की कुर्वद्रूपावस्था ( जाग्रदावस्था ) का नाम ही ' प्राण ' है । इस शरीरबल रूप प्राण का प्रदाता यही आया है । अतएव ' अ ' [ प्रारण बलं ] राति [ ददाति ] ' इस व्युत्पत्ति स इसे ' असुर ' कहा जाता है । बात यथार्थ है । बिना पानी के शरीर में बल का चार कथमपि नहीं होसकता । इसलिए बलवान् की ' पानीदार ' कहा जाता है । जिस मनुष्य के शरीर का अल नष्ट होजाता है, उसके लिए ' इसका तो पानी मर गया, पानी उतर गया ' यह कहा जाता है । यदि आप अपने शरीर में शिथिलता का अनुभव करते हैं, तो पानी से स्नान कर डालिए । उसी समय स्फूर्ति आजायगी, शरीर निर्भर [ दलका ] होजायगा, शारीराग्नि बाबत होपड़ेगा । मुखालस्य [ चेहरी की सुस्ती ] है, तो उँडे पानी से मुख का मान कर लीजिए, आलस्य पलायित होजायगा । अतत्त्व की इसी प्राणप्रदा-शक्ति को लक्ष्य में रखकर ' आपोमयः प्रारण: ' [ छा ० उ ० ] यह कहा जाता है । यह ब्रायप्राण परमेष्ठीमण्डल में प्रतिष्ठित रहता है । सौर दिव्यमान की अपेक्षा यह त्रिगुशित है । अतएव इसे ' ज्यायान् ' कहा जाता है । इधर सौर देव - देवता संख्या में ३३ ही हैं । बुद्धितत्त्व का विकास करना इसी सौरतस्व का काम है । इसीलिए सौर सविताप्राणमय दिव्यतेज के लिए ' धियो यो नः प्रचोदयात् ' यह कहा जाता है । चुतिभाव ( प्रकाशभाव ) के कारण ही इस सौर ज्योतिर्मय तत्व को ' देवता ' कहा जाता है । हमारे आध्यात्मिक जगत् में देवता और असुर दोनों का श्रागमन होता है । आसुरभाव से हमारी शरीरसंस्था की रक्षा होती है, एवं दिव्यमाव से विज्ञानतत्त्व सुरक्षित रहता है । विज्ञान और बल, दोनों की समष्टि ' अहम् ' है । ७६०
पृष्ठ 527
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थत्राह्मण यदि दुर्भाग्य से हम शरीरबल के अनुयायी बन जाते हैं, एवं त्रिज्ञानबल का तिरस्कार करने लगते हैं, तो हमारा ज्योतिमय श्रात्मा मलिन होजाता है । इसलिए त्रिवर्ग के लिए, विशेषतः ब्राह्मण के लिए तो यह आवश्यक कर्तव्य होजाता है कि, यह शरीरचल की अपेक्षा विज्ञान का ही उपासक बने । अहोरात्र शरीर की सौन्दर्य वृद्धि में ही निमग्न रहना, अहर्निश शरीर का ही ध्यान रखना, नित्यप्रति नवीन नवीन वेशभूषा में संलग्न रहना ये सत्र सुरधर्म है । जिस समय इन्द्र, और बिरोचन प्रजापति के समीप श्रात्मस्वरूप की जिज्ञासा लेकर समित्पाणी होकर जाते हैं, उस समय देवेन्द्र तो आत्मा का वास्तविक स्वरूप समझ लेते हैं । किन्तु शरीरसंस्था की आराधना करने वाले यह विरोचन असुर मर्त्यशरीर को ही श्रात्मा मान कर इसी की सेवा शुश्रूषा में निमग्न रहते हुए श्रमृतभाव से सर्वात्मना पराः परावत ( अत्यन्त विदूर ) होजाते हैं । ( देखिए छान्दोग्य उपनिषत् ) । आज भारतवर्ष तथात्रिध भावों का ही अनुगमन करता जारहा है । ' खाना पीना मौज उड़ाना ' इसी सिद्धान्त को सर्वेसर्वा मानने वाले बलप्रधान पाश्चात्यदेशों के सांक्रामिक रोग से ग्रस्त, पाश्चा-त्यशिक्षा से दीक्षित हमारे भारतीय नवयुवकों का श्राज इसी प्रणाली से सर्वनाश होरहा है । श्राज वं सचमुच ' मौज ' उड़ा रहे हैं । मौज ' आनन्द ' है । भारतीय श्रादश श्रानन्द को उडाता नहीं, अपितु संग्रह करता है | ये महानुभाव अपने सञ्चित श्रानन्द को आज उड़ रहे हैं । हमारा शरीर अणुमात्र भी कष्ट न पावे. अन्ध, बधिर, कुञ्ज, बामन, पण्ढ, मूक, श्रादि भावों से युक्त सर्वथा असमर्थ मनुष्य जैसे खाने - पीने सोने- चलने यदि अपनी शरीर - क्रियाओं के लिए परमुखापेक्षी बना रहता है, वही दशा आज इस देश की है । इसप्रकार केवल कल्पित तत्त्व की श्राराधना करने वाला आज का भारतीय समाज द्रुतवेग से विनाश के गर्त में जारहा है । आज इनको अपने आदर्श पर सुरक्षित रखने वाला कोई प्रतीत नहीं होरहा दिव्यवल को ही प्रधानता देने वाले उन प्राप्त महर्षियों के शास्त्रीय वचनों पर आज इनको अणु-मात्र भी विश्वास नहीं है । यदि सौभाग्य से कहिए, अथवा दुर्भाग्य से कोई व्यक्ति इहें सावधान करने आता है, तो बलसत्ता के गर्व से मदान्ध बने हुए, प्रदर्शनमात्र के लिए धर्मरक्षक भक्तराज - समाज सेत्रक बने हुए कुछ एक रँगराजित शृगाल- प्रच्छचावरण में ( परदे की ओट में उस व्यक्ति को दान्त करने में हीं अपने आपको कृतकृत्य समझते हैं । इसका कारण है केवल बल की अरावना । बल, और विज्ञान की पारस्परिक शक्तियों की तुलना करते हुए एक स्थान पर उपनिषत् ने कहा है कि ' बलं नात्र विज्ञानाभूयः ' । संसा-रिंक दृष्टि से बल विज्ञान से अप्रगामी बन जाता है । यदि बल और विज्ञान ( सत्ताबल, और बुद्धिबल ) दोनों प्रतिस्पर्द्धा में खड़े होते हैं, तो बल का विजय होजाता है, एवं विज्ञान परास्त होजाता है । सच-मुच आरम्भ में ऐसा ही होता है । सत्यनिष्ठा पर प्रतिष्ठित विज्ञानतत्त्व देवप्राणमय है । उधर अनृतभाव पर आरुढ सत्ताबल ( धनबल, शरीरबल आदि भौतिक बल ) आसुर प्राण-मय है देवता संख्या में भी न्यून ( ३३ ) हैं, एवं आवरणमूला ( तमामूला ) सृष्टि में ज्योतिम्र्म्मय ये विज्ञान-प्रधान देवता प्रकृति से भी अभिभूत रहते हैं । उधर असुर संख्या में भी अधिक ( ६६ ) हैं, एवं सृष्टि में भी ७६ १
पृष्ठ 528
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थब्राह्मण इहीं की प्रधानता रहती है । अतएव देवासुररूप ' विज्ञान, एवं बल की प्रतिद्वन्द्विता में संसारिक दृष्टि से कुछ काल के लिए सत्यविज्ञान ही अभिभूत होजाता है । अमुबुद्धि मानवसमाज इस दिव्यतस्य को परास्त हुआ समझ कर गर्व से मदमत्त बन जाता है । परन्तु आगे क्या होता है? । सुनिए । आगे जाकर परिमाण में वह असुरसमाज ऐसा नष्ट होता है कि, उसे पुनः भविष्य में घोर अन्धकार के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं स्थान नहीं मिलता, जैसाकि आगे के मन्त्रभाग से स्पष्ट होने वाला है । दिव्यकार्थ्यानुयायी व्यक्ति का सर्वप्रथम विज्ञानशून्य धन के उपासकों के द्वारा तिरस्कार होता है कारण श्रागमशास्त्र के सिद्धान्त के अनुसार लक्ष्मी का बाहन ‘ उल्लू ' माना जाता है । यह पक्षी रात्रि का राजा है । अन्धकार का अधिपति है । अहः-काल सार है, रात्रि वारुकी है, आपोमयी है । रात्रि का अधिष्ठाता यही आपोमय रोदसी समुद्र ' अ ' नाम से प्रसिद्ध है | आप्यप्राणमय होने से यह समुद्र असुरों की आवासभूमि है । विष्णुपत्नी लक्ष्मी का विनिर्गम इसी असुरभूमि से हुआ है । उल्लू वाहन असुरभूमि जन्मस्थान, फिर क्या कमी रही । जहाँ श्रीविहीना ( शारदाविहीना ) केवल लक्ष्मी का काम रहता है, वहीं अत्याचार - अन्याय छल - पो - अभिमान आदि के अतिरिक्त और क्या होसकता है? भारतीय महर्षि इस अविवेक को समझते थे । उहें विदित था कि, लक्ष्मी का ताण्डव नृत्य मनुष्य को पशु बना डालता है । इस श्रापत्ति से बचने के लिए इन कारुणिक ऋत्रियोनें प्रत्येक सद्गृहस्थ के साथ सरस्वती के उपासक एक एक कुलपुरोहित का सम्बन्ध रखना श्रावश्यक बतलाया है । जत्र जब भी ये मदान्ध धनिक लक्ष्मी के प्रभाव से अनाचार करने के लिए उद्यत होते हैं, तत्र तत्र यही निम्वार्थी पुरोहित विद्याबल से इनका नियन्त्रण करता है । कहना न होगा कि, दुर्भाग्य से आज यह प्रणाली सर्वथा दूषित होगई है । संसार में यदि आज कोई मूखजाति है, तो यह कुल ' पुरोहितजाति ' ही मँग, चरस, गाँजा पीना, लक्ष्मी के लाडलों की दया पर जीवन विताना, घनिकों की हाँ में हाँ मिलाना, हाथ जोड़े इन महान्यों की स्तुति करते रहना ही इन पुरोहितों का एकमात्र प्रधान कर्तव्य रह गया है । जहाँ कह इन लक्ष्मीवरी पर सत्य की फटकार पड़ती है, वहीं ये चापलूस प्रशिक्षित पुरोहित महानुभाव काँप उठते हैं । इ डर होता है कि, कहीं हमारी आजीविका न छिन जाय । इस भय से बचने के लिए ये नरपि— शाच अपनी गुक्षसी लीला का तांडव नृत्य आरम्भ कर देते हैं । नाममात्र को ये अपने इस जय-भ्य कार्य में सफल भी होते हैं । परन्तु यह सत्य आक्रमण आगे जाकर इनको सर्वथा ही अभिभूत कर देता है इसलिए विज्ञानतत्त्व के उपासकों से हम यह निवेदन कर देना आवश्यक समझते हैं कि इस विश्व-प्राइस में देवी, एवं आसुरी, दोनों ही विभूतियों नृत्य कर रहीं हैं । देवीविभूति में आरम्भ में कष्ट है. किन्तु परिणाम में आनन्द है । आसुरी विभूति के अनुगमन से प्रारम्भ में सुम्बाभास है, किन्तु परिणाम में मवनाश है । यद्यपि यह सिद्ध विषय है कि " देवीसम्पत् के उपासक को पर पद पर अवमानित होना पड़ता है, म्यार्थियों के कुवक का लक्ष्य बनना पड़ता है परन्तु कभी इन आपत्तियों से डर कर अपने सत्यसङ्कल्प से आपको मुल्य नहीं होना चाहिए वीरतापूर्वक विग्न बाचाचों का सामना करते हुए अपने सांस्कृतिक-लक्ष्य में अनन्यनिष्ठा से ग्रारूढ रहना चाहिए । यदि आपका सङ्कल्प सत्य है, यदि आप अन्तरात्मा से दिव्य-विभूति का इस विश्व में विकास चाहते हैं, तो किसी आपत्ति से न दरिए आपके सत्यसङ्कल्प के सम्मुख बड़े
पृष्ठ 529
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीय श्रध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण से बड़ा सत्ताचल भी छिन्न भिन्न होजायगा । जो स्वार्थलोलुप श्रज्ञजन आपकी शक्ति का विरोध करते हैं, वे एक दिन आपके चरणों में मस्तक झुका देंगे । इसप्रकार यदि आपने दृढ़तापूर्वक काल पुरुष की प्रतीक्षा करते हुए अपने सत्यसङ्कल्प का अनुगमन किया, तो निःसन्देह आप उस अमरत्व के आनन्दघन के अधिकारी चन जायँगे, जिसके नामस्मरण का भी उन सुद्धियों को अधिकार नहीं है । देवासुरसंप्रम नवीन नहीं है । सृष्टि के प्रारम्भ से आज पर्यन्त का इतिहास देख जाइए । सर्वत्र प्रापको देवासुर संग्राम के अद्भुत दृश्य उपलब्ध होंगे । साथ ही आप यह भी देखेंगे कि, आरम्भ में असुर जीतते हुए दिखाई देते हैं, परन्तु परि-खाम में असुर नष्ट ही होगए हैं । प्रकृत ब्राह्मणश्रुति आज एक ऐसे ही प्राकृतिक नित्य देवासुरसग्राम का स्वरूप आपके सम्मुख रख रही है । पूर्व - प्रतिपादित देवासुरस्वरूप - परिचय से विज्ञ पाठकों को यह भलीभाँति विदित होगया होगा कि, देवता सौरज्योतमय इन्द्रप्राण हैं । एवं बारुण श्राप्य तमोमय प्राण असुर है । स्वयं सूर्यमण्डल में कभी देवासुर संग्राम नहीं होता । सौरमण्डल याज्ञिक परिभाषा के अनुसार ' नत्राहयज्ञ ' कहलाता है । स्तौम्या पृथिवी के १७ वें अहर्गण से प्रारम्भ कर सूर्यविम्ब के उपरिभागस्थ ' अवित्र कामह: ' - ' अपुनमार ' - ' अशोकम हिम ' ‘ कामप्रलोक ’ - ‘ महात्रत ’ - ‘ सौम्यत्रिद्युत ' - ' अर्जुन ' आदि विविध नामों से प्रसिद्ध २५ वें अहर्गण पर्य्यन्त होने वाला अग्नीषोमात्मक यज्ञ ही नवाहयज्ञ कहलाया है । इस यज्ञ में I I ये नौ अहर्गण हैं । अतएव इमे ' नवाय ' कहना न्यायप्राप्त होता है । इस नवाहयज्ञ के केन्द्र में २१ वें अहर्गण पर सूर्य्यचित्र अपनी सहस्र किरणों से तप रहा है । इस नवाहयज्ञमण्डल में कभी अन्धकार का प्रवेश नहीं होता । अतएव इस स्थान को पुराणपरिभाषानुसार ' श्वेतद्वीप ' कहा जाता है । सूर्य सत्यतत्त्व है । साथ ही सौर - नवाहयज्ञ के चारों ओर अर्णवसमुद्र का वेष्टन रहता है । अतएव इस श्वेतद्वीपनिवासी नत्राइयज्ञरूप विष्णु को ' सत्यनारायण ' कहा जाता है । यहाँ केवल सत्य का ही साम्राज्य है । मिथ्याभावो-पेत असुरों का प्रवेश यहाँ निषिद्ध है । इसप्रकार इस नवाहयज्ञ की सीमा में रहने वाले सौर इन्द्र के साथ, दूसरे शब्दों में मौर देवताओं के साथ कभी असुरसङग्राम सम्भव ही नहीं है । इन्द्र के इसी विजयभाव को लक्ष्य में रखकर मन्त्रश्रुति कहती है-न त्वं युयुत्से कतमञ्चन | हतेऽमित्रो मघवन् कश्चनास्ति । मायेत्सा ते यानि युद्धान्याहुनद्य शत्रु ं न नु पुरा युयुत्से ॥ - शत ० ११ | १ | ६ | १२ | ' हे इन्द्र आप किसी से युद्ध नहीं करते । आप से कोई युद्ध नहीं कर सकता । हे मघवन्! संसार में आपका काई शत्रु नहीं है । आख्यानवेत्ता जो आपके साथ असुरों का संग्राम बतलाते हैं, वह कल्पनामात्र है, न पहिले आपका कोई शत्रुथा, न आज है । इसका तात्पर्य्य यही है कि, सौर इन्द्र ' मघचा ' कहलाता है | इस दिव्य इन्द्र के साथ सचमुच असुरों का कोई सम्बन्ध नहीं होता । सम्बन्ध होता है केथल पार्थिव वासव इन्द्र एवं अन्तरिक्ष्य चन्द्रविम्ब - प्रतिविम्बित मरुत्त्वान् इन्द्र के साथ । प्रकृत यज्ञ. हविर्यज्ञ है । हविर्यज्ञ का सम्बन्ध भूपिण्ड से है । यहाँ का इन्द्र वासव है । ऐसी अवस्था में यह मान लेना पड़ता है कि, प्रकृत देवासुर - आख्यान का भूपिण्ड सम्बन्धी देवासुरसङ्ग्राम के साथ ही सम्बन्ध III
पृष्ठ 530
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थब्राह्मगा इस श्राख्यान में प्रधान रूप से इन्द्र, वृत्र, स्वय, ग्रूप, रथ, शर, इन पदार्थों का स्वरूप समझ लेना ही पर्याप्त होगा । भूपिण्ड क्रान्तिवृत्त के चारों ओर घूमता रहता है, यह प्रकरण के श्रारम्भ में हीं बतलाया जाचुका है । अपने अक्ष पर घूमता हुआ, दैनंदिन गति - समर्पक अहोरात्र स्वरूप- सम्पादक स्वाक्षपरिभ्रमण से इस भूपिण्ड का आधा भाग सूर्य के सम्मुख सौरप्रकाश - ( मण्डल ) से युक्त रहता है, एवं आधा भाग सूर्यविरुद्ध-दिक में तमोमय श्रासुरमण्डल में प्रतिष्ठित रहता है । भूपिण्ड का आधा भाग सौरमण्डल में भुक्त होता हुआ श्रहः काल का स्वरूप- समर्पक बनता है | स्वाक्षपरिभ्रमण के कारण कभी देवस्थान को असुर अपने अधिकार में कर लेते हैं, तो कभी श्रसुरस्थान पर देवता आक्रमण कर लेते हैं । इसप्रकार यह देवासुर सङ ग्राम निरन्तर होता रहता है । “ तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः, श्राकाशाद्वायुः, वायोरग्निः, अग्नेरापः, श्रदृद्भ्यः पृथिवी " इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार भूपिण्ड का उपादान पानी है । इधर आयप्राण को हमने असुर बत-लाया है । अमुरप्रधान यह भूपिण्ड किसी समय केवल वृत्र असुर के ही अधिकार में था । तात्पर्य यही है कि, जबतक भूपिण्ड के साथ सौर इन्द्र का सम्बन्ध नहीं होता, तत्रतक भूपिण्ड तमोरूप वृत्रासुर के ही अधिकार में रहता है | साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिए कि, जबतक सौरप्राण का भूपिण्ड के साथ सम्बन्ध नहीं होता. तत्रतक यजक भी सम्पन्न नहीं हो सकता । कारण इसका यही है कि, मानुषात्मा में वैधयज्ञ के द्वारा दिव्य सौरप्राण को प्रतिष्ठित करना, दूसरे शब्दों में नवीन दैवात्मा उत्पन्न कर इसका मानुषात्मा के साथ ग्रन्थिबन्धन करना हीं यज्ञ का चरम कल है । श्राहुति श्राहवनीय में हीं दी जाती है । आहवनीय अग्नि सौर है । अतः बिना इसके सम्बन्ध के यज का स्वरूप कथमपि सम्पन्न नहीं हो सकता । जबतक सम्पूर्ण भूपिण्ड पर तमोमय वृत्रासुर का अधिकार है, तबतक मौर श्राहवतीय प्रतिष्ठित नहीं हो सकता । बिना यज्ञ के पार्थिव-संस्थानुगत ग्रहोरात्रानुवन्धी सम्वत्सर का स्वरूप निष्पन्न नहीं होसकता । विना सम्वत्सर के प्रजासृष्टि नहीं होमकती । प्रजोत्पत्ति का प्रधान कारण अग्नीषोमात्मक यज्ञ ही है, जैसा कि यज्ञेश्वर भगवान्
कहते हैं-सह यज्ञाः प्रजाः सृष्ट्रा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रमविभ्यध्वमेष वोऽस्त्रिष्टकामधुक् ॥
- गी ० ३,१० इस यज़मिद्धि के लिए सत्यकाम मनः प्राणवाङमय प्रजापति की कामना से सौर इन्द्र का भूपिण्ड पर आगमन होता हैं | बिना इच्छा के कोई कर्म नहीं होता, यह एक माना हुआ सिद्धान्त है । सौरप्राण भूपिण्ड घराता है । इस कर्म के प्रेरक मादि नहीं हैं । ऐसी अवस्था में मानना पड़ता है कि, किसी अलौकिक शक्ति की प्रेरणा से ही यह कर्म हुआ है । वहीं ग्रलौकिक शक्ति ' प्रजापति ' नाम से प्रसिद्ध है । प्रजापति कीरा से, उस अन्तर्यामी अक्षरब्रह्म की कामना से इन्द्र अपने वज्र का वृत्रासुर पर प्रहार करते हैं । स्वयं इन्द्र भूपिण्ड पर रहने वाले वृत्र के साथ सम्बद्ध नहीं होते 1 । श्रपितु इन्द्र अपने वज्र का प्रयोग करते हैं । इन्द्रप्रासात्मक सूर्य के केन्द्र से निकल कर चारों ओर बृहत्साम का स्वरूप सम्पादन करती हुई सौर-रश्मियाँ हीं ' वज्र ' है । दिव्यभाव के लिए जो सौर रश्मियाँ उपादेव हैं, उपकारक हैं, ग्राह्य हैं, वे ही रश्मियाँ ७६८