Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 531–540
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 531–540
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द्वितीय अध्याय शतपथवाह्मण चतुर्थब्राह्मण भूनि इस्थ अन्धकाररूप वृत्रप्राण के लिए विनाशक शस्त्र है । शस्त्र भी कैसा, महाकटोर, अव्यर्थ, विद्युद्-रूप । इसीलिए इन राश्मयों को वृत्रासुर की दृष्टि से ऋषिने ' वन ' कहा है । वज्र आता है, असुर नष्ट हो -जाते हैं । भूापण्ड के ग्राधे भाग में प्रकाश होजाता है, दूसरे शब्दों में-- ग्राधे भाग में मौर दिव्य सावित्राग्नि प्रतिष्ठित हो जाता है । उस आहवनीय में ओपधिसोम बहुत होता है, और य पार्थिव हविर्यज्ञ सम्पन्न हो -जाता है । ' या च का च बलकृतिरिन्द्रिकम्मैव तत् ' इस यास्क सिद्धान्त के अनुसार बल का अधिष्ठाता इन्द्र है । इस बल के अवान्तर अनेक भेद हैं । उनमें से प्रकृत में ' नोदनाबल ' की ओर ही श्राप का ध्यान आक-र्पित किया जाता है । ' प्रेरणावल ' का ही नाम ' नोदनाबल ' है । यह नोदनाबल प्रवर्त्तक - निवर्त्तक-स्तम्भक भेद से तीन भागों में विभक्त है । भूपिण्ड में सौर इन्द्र के तीनों प्रकार के नोदनाबलों का उपभोग होता है । इन्द्र की विक्षेपणशक्ति से ही भूपिण्ड सूर्य के विरुद्ध भाग में जाता है | इन्द्र यज्ञचल से पुष्ट होता है । यज्ञ से प्रप्तशक्ति इन्द्रवृषभ रश्मिरूप शृङ्ग से भूविएड के ठोकर मारता है, भूपिण्ड चल पड़ता है । भूपिण्ड के इसी परिभ्रमणविज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं—
यज्ञ इन्द्रमवर्द्ध यत् - यद्भूमिं व्यवर्त्तयत ।
चक्रण श्रपशं दिवि ॥
—ऋक्सं ० ८ | १४ | ५ यह इन्द्र के प्रवर्तक बल की ही महिमा है । साथ ही निवर्त्तकबल का भी प्रयोग होता है । इस निवर्त्त'कब्रल से भूपिण्ड सूर्य्य से विरुद्धदिक में जाता हुआ भी अपने नियतमार्ग को नहीं छोड़ता । प्रवर्त्तक-बल धक्का देकर भूपिण्ड में विरुद्धगति उत्पन्न करता है, तो निवर्त्त कवल उसे अपनी ओर आकर्षित करता है । इधर से स्तम्भकवल भूपिण्ड को क्रान्तिवृत्त से च्युत नहीं होने देता । इसप्रकार इन्द्र का यह नोदना--चल ( विक्षेपणशक्ति ) भूपिएड पर तीन स्वरूपों से अपना प्रभुत्त्व प्रतिष्ठित रखता है । यज्ञ के सम्बन्ध से यही इन्द्रबल स्तम्भक - कर्षक - प्रतिष्ठा - संहार - भेट से चार भागों में विभक्त है । वृत्रासुर पर प्रक्षिप्ता ऐन्द्री वज्रशक्ति चार भाग में विभक्त देखी जासकती है । बलि के लिए श्रागत पशुओं को यूप में बाँधा जाता है । उनका स्तम्भन किया जाता है । इसलिए हम कह सकते हैं कि, यूप इन्द्रशक्तिमय है । यूप में जो स्तम्भनशक्ति का विकास है, वह इसी इन्द्र का काम है । रुदय में कर्पूरणशक्ति है । भूमि-त्रिलेखनार्थं दोनों ओर धार वाला, तीक्ष्णाग्र ( आगे से नुकीला ) जो काष्ठ का सीधा खड्ग होता है, वही स्पय है | वेदिकरणार्थं इस एम्य से मिट्टी को शुद्ध किया जाता है । यह कर्षणव्यापार इसी इन्द्र का ब्यापार है । रथ में प्रतिष्ठित होकर महारथी क्षत्रिय शत्रु का दमन करते है । प्रतिष्ठाभाव गतिसमष्टि है । गति ही इन्द्र है | ' शर ' तो साक्षात् इन्द्र का स्वरूप है ही । अपनी विक्षेपणशक्ति से वस्तुस्वरूप को उच्छिन्न कर देना तो इन्द्र का प्रथम, एवं मुख्य ही काम है । एक ही इन्द्र ब्रह्म, क्षेत्र, वीर्य्य भेद से उपर्युक्त चार भागों में विभक्त होरहा है, इन्द्र का वज्र ( इन्द्र की शक्ति ) चार भागों में विभक्त है । विभक्त होरहा । इन्द्र क्या एक ही ' इन्द्रशक्ति ' चार भागों
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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थब्राह्मण में विभक्त अवश्य है, परन्तु इन चारों विभागों को समान नहीं माना जासकता । कर्षण स्तम्भन प्रतिष्ठा-संहार - चारों शक्तियों के बल में तारतम्य है । इसी विषमता को लक्ष्य में रखकर ' याबद्वा ' कहा है I इन चारों वीय्यों में से स्तम्भनलक्षण यूप, एवं कर्षणलक्षण स्क्र्य का उपयोग ब्राह्मण करते हैं । रथ एवं शर का उपयोग क्षत्रिय करते हैं । क्षत्रिय इन दो शस्त्रों से आधिभौतिक असुरों को, एवं ब्राह्मण यूप तथा फ्य से अधियाज्ञिक असुरों को नष्ट करते हैं । तथोक्त चारों शस्त्रों में यूप - स्क्य, ब्रह्मवीर्य्यप्रधान होने से शान्त हैं. रथ और शर क्षत्रवीर्य्यप्रधान होने से ' उप ' हैं । इन चारों में भी ' शर ' महाउम्र है । इसकी शक्तियाँ विशीर्ण रहतीं हैं । शर का अग्रभाग ऐसा तीक्ष्ण होता है कि, जहाँ यह प्रविष्ट होता है, छिन्न भिन्न कर देता है । अज्जुन के गाण्डीव से निकले हुए इह्रीं शरों से कुरुकुलवृद्ध पितामह भीष्म का शरीर विशीर्ण होगया था । अङ्ग अङ्ग को विशीर्ण करने वाला शर सचमुच विशीर्णशक्ति से युक्त है । इस विशीर्णभाव के कारण हीं तो इसे ' शर ' कहना श्रन्वर्थ होता है । शर की शरता का निरूपण करते हुए ऋषिने — ' तस्माच्चरो नाम - यदशीर्य्यत ' यह कहा हैं । यद्यपि इन चारों में से स्पय, और यूप को हमने ब्रह्मवीर्य्यप्रधान बतलाया है । परन्तु यह ब्रह्मभाव केवल कर्म्मसापेक्ष ही समझना चाहिए । अध्वर्यु ब्राह्मण है । वह यज्ञ में इनका प्रयोग करता है, इसीलिये इन दोनों शस्त्रों को ब्रह्मसम्बन्धी कहा जासकता है । वस्तुतस्तु शस्त्र शस्त्र है । मारण का साधन है । मारना छात्रधर्म्म है | अतः रथ - शरवत् हम यूप, और सक्य को भी क्षात्रतेजोयुक्त ही मानेंगे । इन्द्र स्वयं क्षत्र-देवता हैं । इन्द्रविन्हो वन है । यह वज्ररूपा असुरघातिनी इन्द्रशक्ति ही तो पूर्वकथनानुसार चार भागों में विभक्त होती है । यज्ञमय्यांदा को प्रधानता देते हुए ऋषिने – ' द्वाभ्यां ब्राह्मरणा यज्ञे चरन्ति, द्वाभ्यां राजन्यबन्धवः संत्र्यावे ' यह कह दिया है । वस्तुतः ये चारों ह्रीं क्षत्रिय के आयुध हैं । जब क्षत्रिय युद्धभूमि में अवतीर्ण होता है, तो उसे ध्वजा, रथ, खड्ग, शर - धनुष ( तीरकमान ). इन चार प्रधान साधनों को साथ रखना पड़ता है । ध्वना युद्ध का प्रधान चिह्न है । ध्वजा ही क्षत्रिय का प्रधान बल है । ध्वजा ही क्षत्रिय की विजयश्री का प्रधान सूचक है । यह ध्वजा वैदिक भाषा में ' यूप ' नाम से प्रसिद्ध है । जब ध्वजा गिर जाती है ( झंडा नीचे झुक जाता है ) तो क्षत्रिय पराभूत मान लिया जाता है । प्राचीनकाल में ( वर्त्तमानकाल में भी ) ध्वजाभेद से ही तत्तद्ाष्ट्रों के नरपतियों का भेद सूचित होता था | जिसे वर्त्तमान जगत् ' मोनोग्राम ' कहता है, वही हमारी ' ध्वजा ' है । अपने अपने राष्ट्र का राजा भिन्न भिन्न शक्तियों की आराधना करता हुआ उन उन शक्तिचिह्नों को ध्वजा में अङ्कित रखता है । भग-वान् कृष्ण की ध्वजा में ' गरुड़ ' का चिह्न था । कारण, उनका प्रसार गरुड़ के द्वारा ही होता है । इधर गरुड़ नाम है सुपर्ण का । सुपर्ण साक्षी ईश्वर है । अतः तदंशभूत कृष्ण ने अपनी ध्वना में गरुड़ को ही स्थान दिया । अतएव भगवान् कृष्ण ' गरुड़ध्वज ' नाम से प्रसिद्ध हुए । जिस समय भगवान् रामचन्द्र ने वनगमन किया था, उस समय मार्गगमन परिश्रमजनित खेद को शान्त करने के लिए वे प्रथम प्रथम जिस वृक्ष की छाया में अनुज लक्ष्मण, एवं पतिव्रता जगत्माता सीता ७६६
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द्वितीयमध्याय शतपथत्राह्मण चतुर्थनामा के साथ विश्राम के लिए लिए बैठे थे, वह ' कचनार ' का वृक्ष था । जब भगवान् वनवास समाप्त कर पुनः अयोध्या पधारे तो उन्होंने विश्रामवृत्त को अपने लक्ष्य में रखते हुए अपनी ध्वजा में इसी कचनार के वृक्ष को श्रङ्गित किया । इसी आधार पर महर्षि वाल्मीकि ने - ' काञ्चनारध्वजो राजा ' यह कहा है । सूर्यवंश के मूलप्रवर्तक स्वयम्भूमनु की ६२ वीं पीढ़ी में भगवान् रामचन्द्र का आविर्भाव हुआ था । यहाँ आकर सूर्यवंश धन्य होगया । भगवान् रामचन्द्र से आगे होने वाले राजाओंने इस ध्वजचिह्न का अनुगमन किया । वर्त्तमान भारत में भी जयपुरराजधानी ही एकमात्र ऐसी राजधानी थी, जहाँ ध्वजा में तो नहीं, किन्तु रुपए में उसी वृक्ष का चिह्न अङ्कित था । जयपुर का रुपय्या इसी वृक्ष के कारण ' झाडशाही ' नाम से प्रसिद्ध है । यह ' झाड ' सूर्य्यवंश का गौरवभृत स्मारक चिह्न ही है । इसीप्रकार उदयपुर की ध्वजा में ' चील ' का चिह्न है । आगमशास्त्र के अनुसार चील को शक्तितत्व की विकासभूमि माना गया है । इसीलिए शकुनशास्त्रवेत्ताओंने किसी कार्य्यवश घर से बाहर निकलने वाले व्यक्ति को यदि सर्वप्रथम चील के दर्शन हो जाते हैं, तो शुभलक्षण माना है । रावण की मे गर्भ का चिह्न था । गर्दभ पार्थिव कपाल में लिप्त श्रासुर - रस से उत्पन्न होता है । श्रतएव रावण ने इसे अपने ध्वज में स्थान दिया । वैदिक गूढतम रहस्यों से सर्वथा अपरिचित, केवल वेदों के नाम का पारायण करने वाले कुछ एक महाशय लोग बिना सोचे समझे अज्ञतावश भारतीय आख्यानोपाख्यानों पर व्यर्थ का वादविवाद किया करते हैं । रावण के मस्तकों के सम्बन्ध में भी उनकी ऐसी ही भ्रान्ति है । कलिकल्मपहारिणी जगदुद्वारिंगी परमपावना वाल्मीकि रामायण में रावण के १० मस्तक बतलाए हैं । ११ वीं मस्तक गये का बतलाया है । इसका कारण यही है कि, राक्षसेश्वर लङ्केश रावण का साम्राज्य १० प्रधान अमात्यों के श्राधार पर चलता था । इन दमों में रावण के मातुल ' शालकटङ्कट ' सर्वप्रधान बलशाली थे । इन दस प्रमुखों के बल पर रावण विश्वविजयी बन गया था भगवान् रुद्र की आराधना से इसने अपने इन प्रमुखों का बल बढ़ाया था । प्रमुख स्थान मुख्य है । मुख्यभाग शरीर में मस्तक है । अतएव ये १० सो श्रमात्य रावण के १० मस्तक कहलाते थे । आज भी प्रमुख को मण्डली का ' मस्तक ' ' शिरमोर ' माना जाता है । ध्वजा-चिह्न सत्र से ऊँचा है । यही सर्वोपरि रहने वाला रावण का ११ वाँ गर्दभ का मस्तक है । इसीप्रकार किसी का चिह्न नादिया है, किसी का अश्त्र है, तो किसी का सिंह है । किसी का स्वड्ग है । इन निदर्शनों से प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि, ध्वजा क्षत्रियवीरों का एक मुख्य चिह्न है । दूसरा ' रुक्य ' है । एकत: धारयुक्त वक्रित शस्त्र ' चन्द्रहास ' ( तलवार ) कहलाता है, दो ओर से दुधारा आगे से नोकदार सीधा शस्त्र ' रफ्य ' कहलाता है । यही खड्ग क्षत्रिय के कमरचन्द में सदा खचित रहता है यह क्षत्रिय का सहचारी शस्त्र है । जब भी क्षत्रिय बाहिर निकलेगा, तो खड्ग साथ लेगा । कारण, वह दत से त्राण करने वाला क्षत्रिय है । क्षत्रिय के सम्मुख कोई अनाचारी यदि निरपराध को क्षत कर देता है, अथवा क्षत करने को उद्यत होता है, तो क्षत्रिय तत्काल खड्ग से उस आततायी की भलीभांति चिकित्सा कर देता है । चिना प्रतिष्ठा के शस्त्र प्रहार नही होसकता । यह प्रतिष्ठाभूमि ही ' रथ ' नाम से प्रसिद्ध है । सम्मुख उपस्थित शत्रु का बध तो खड्ग से किया जा सकता है । परन्तु जो शत्रु अन्तर पर है, उसके शरीर ७६७
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द्वितीयश्रध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थमाह्मण को विशीर्ण कैसे किया जाय १, इसके लिए क्षत्रिय को धनुष, और शरपूरित निषङ्ग [ तरकस ] रखना पड़ता है । यही ' संव्याध ' [ प्रतिद्वन्द्वितात्मक युद्ध ] का चौथा साधन है । इन्द्र क्षत्रबल का प्रवत्त'के देवता है । वही क्षत्रिय का श्रात्मा बनता है । आत्मेन्द्र स्वयं क्षत्रिय है । विभूतिरूप विद्युदिन्द्र के चतुर्द्धा विभक्त उपर्युक्त चार साधन हैं । यदि क्षत्रिय उभयचल से युक्त है, तो संत्र्याध [ मुठभेड़ -रण ] में विजयश्री निश्चित है । यज्ञ में भी असुरों का प्रवेश होता है । यह वायव्य आसुर प्राण यज्ञविघातक होता हुआ यज्ञ का शत्रु है । यहाँ रथ, और शर की आवश्यकता नहीं है । कारण शत्रु यज्ञमण्डल में हीं है, दूर नहीं है । भूपिण्ड में व्याप्त मृण्मय सुरप्राण को ही तो नष्ट करना है । अतः लोहमय शस्त्र की भी आवश्यकता नहीं है । अतएव यह यज्ञिय ध्वजा ( यूप ), एवं यज्ञिय खड्ग ( स्पय ) काष्ठ के ही बनाये जाते हैं । भूपृष्ठ से प्राण रूप देवाग्नि निकल रहा है । श्रागन्तुक तृण दूषित मिट्टी आदि इस प्राणाग्नि के स्वरूप को श्रावृत करने वाले नृत्र — असुर हैं । इनको स्फ़्य से पृथक कर पहिले भूमिशोधन करना आवश्यक होजाता है । जब तृण पुरीष-करी आदि मलरूप असुर हटाकर भूपिण्ड का वास्तविक स्वरूप प्रकट कर लिया जाता है, तो उस स्थान का प्राणाग्नि विकसित होजाता है । भूपिण्ड का ऐसा स्वच्छ प्रदेश ही यज्ञिय - वेदनिर्माण के लिए उपयुक्त है । यह तो हु ' आधिदैविक चरित्र, अत्र संक्षेप से आध्यात्मिक एवं आधिभौतिक ( ऐतिहासिक ) चरित्र का भी समन्वय कर लीजिए । हमारा शरीर एक अध्यात्मसंस्था है । शरीर भूपिण्डस्थानीया यज्ञिया वेदि है । इस शरीरवेदि के तीन स्थान प्रधान हैं— मूलाधा ', हृदय, मस्तक । इन तीनों स्थानों में क्रमशः पार्थिव अपानाग्नि, आन्तरिक्ष्य व्यानाग्नि ( व्यानाग्नि से उपलक्षित जाठराग्नि वैश्वानराग्नि ), एवं सौर प्राणाग्नि प्रतिष्ठित है । मूलन्थि गार्हपत्यकुण्ड है, हृदयपार्श्वस्थान ( श्रद्ध चन्द्राकार ) दक्षिणाग्निकुण्ड है । एवं शिरः ( प्रधानत: मुख ) आहवनीयकुण्ड है । तीनों में क्रमशः अपान - वैश्वानर, एवं प्राणाग्नि प्रतिष्ठित है । अनरूप सोम की आहुति मुखस्थानीय ग्राहवनीय में होती है । आहवनीय में बहुत अन्न वैश्वानररूप श्रपणाग्नि में परिपक्व होकर रसरूप से तत्तच्छारीर - देवताओं में विभक्त होजाता है । इसप्रप्रार इस अग्नीषो मात्मक यज्ञ से अध्यात्मयज्ञ का सञ्चालन होरहा है । अन्न, पानी, वायु, ये सत्र हमारे अन्न बनते हैं । सब में तमोमय असुर भी हमारे अध्यात्मयज्ञ में प्रतिष्ठित होजाते हैं । अथवा प्रविष्ट होने की चेष्टा करते हैं । इन को नष्ट करने वाला प्रधान ऋत्त्विक वायुरूप अध्वर्यु है । वायु का सञ्चार इन्द्र का सच्चार है । कारण-‘ इन्द्रतुरीया गृहा गृह्यन्ते ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार वायु में एक चौथाई भाग इन्द्र का रहता है । दूषित अन से आत्मा मलीमस होजाता है । शरीर न्याधिग्रस्त होजाता है । इन्द्रमय विज्ञानात्मा बुद्धिरूप बज्रमहार-व्यापार से इस आवरक, अतएव ' वृत्र ' नाम से प्रसिद्ध असुर को नष्ट कर देता है । भौमत्रिलोकी - व्यवस्था के अनुसार इन्द्र और वृत्रासुर में युद्ध हुआ करता था । वृत्रासुर बार बार देवेन्द्र के यज्ञ में विघ्न उपस्थित किया करता था । श्रन्ततः इन्द्र ने अपने वज्ररूप बल को ध्वजा, रथ, खड्ग, शर, इन चार भागों में विभक्त कर उस को सर्वथा नष्ट कर दिया । इन्हीं आधिदैविक, आध्यात्मिक, आधिभौतिक भेदभिन्न त्रिविध आख्यानों के रहस्यार्थ को अपने गर्भ में रखती हुई - " इन्द्रो ह यत्र वृत्राय बजूं ं प्रजहार ” — “ ततो द्वाभ्यां ब्राह्मरणा चरन्ति " ये प्रथम, द्वितीय कण्डिकाएँ उद्धत हुई हैं । १,२ ॥ ७६८
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द्वितीयश्रध्याय शतपथब्राह्मगा चतुर्थब्राह्मण आज यह अच्वय्र्यु यजमान के इस वैधयज्ञ में स्वरूप स्वग को अपने हाथ में उठाता हुआ यजमान के द्विषन् और भ्रातृव्य नाम के दोनों प्रकार के राजुओं को नष्ट करता है । कृत्रिमशत्रु को विपत् कहा-जाना है, एवं सहजशत्रु के लिए वैदिक परिभाषा में ' भ्रातृव्य ' शब्द का प्रयोग होता है । भ्राता का पुत्र भ्रातृव्य ( भतीजा ) कहलाता है । यह सहज शत्रु होता है । कारण इस का यही है कि, शत्रुता का मुख्य कारण सांसारिक सम्पत्ति है । भतीजा यह समझा करता है कि यदि यह पितृव्य न होता, तो पितामद की सारी सम्पत्ति एकमात्र मेरे पिता को ही मिलती । ऐसी अवस्था में वंश की सम्पूर्ण सम्पत्ति का एकमात्र मैं ही भोक्ता बनता । इसी भावना से यह ' भ्रातृव्य ' ( तीजा ) अपने ' पितृव्य ' ( काका ) का जन्मसिद्ध शत्रु बन जाता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर अतिने सहजशत्रु का नाम सामान्यमाव से ' भ्रातृव्य ' रख
दिया है ॥। ३ ॥
यश के द्वारा श्राधिदैविक मण्डलस्थ देवताओं को अध्यात्म में प्रविष्ट किया जाता है । उपासना-सिद्धान्त के अनुसार ' देवो भूत्वा देवं भावयेत् ' इस निगम का अनुगमन करना आवश्यक होजाता है । यज्ञ का प्रत्येक कर्म देवप्रागा की भावना से ही समन्वित होना चाहिए । यह देवी भावना हीं ' श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव स: ' इस सिद्धान्त के अनुसार सचमुच यज्ञ, एवं यज्ञजनित श्रदृष्ट अतिशय को देवप्राण से युक्त कर देती है । इसी दिव्य प्राण की प्राप्ति के लिए ' देवस्य त्वा ० ' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ ही स्पय उठाता है | स्पय इन्द्र का बज्र है । इन्द्र देवता है । देवता का शस्त्र देवता उठा सकता है, साधारण मनुष्य नहीं । अर्थात् जिसके श्रात्मा में इन्द्रज्येष्ट देवताओं का चल रहता है, वही दिव्यास्त्रों के प्रयोग करने में समर्थ होता है । यथाजात मनुष्य मनुष्य है । उस में दिव्यशक्ति का अभाव है । ऐसी अवस्था में यदि जिना सोचे समझे वह इन ' दिव्यात्रों का प्रयोग कर बैठेगा, तो अपना नाश करा बैठेगा । श्रतः श्रध्वर्यु के लिए भी यह आवश्यक होजाता है कि, जन्मसिद्ध अपने मनुष्यभाव को हटाता हुआ दिव्यप्राण की भावना करता हुआ - आत्मा में दिव्यचल के सञ्चार का अनुभव करता हुआ ही स्पय का ग्रहण करे 1 इस स्पय से भूपिढगत आमुरभावात्मक दोषयुक्त मृदभाग को हटाया जाता है । अब कर्मण के द्वारा भूपिएड का अग्निप्राणमय वास्तविक प्रदेश निकल आता है, तभी वह प्रदेश यशोपयोगी बनता है । स्पय निदानेन इन्द्र का वन् है । हिंसक शस्त्र है । इसका यज्ञ में प्रयोग करना पड़ता है । इस से कहीं यह नहीं समझ बैठना चाहिए कि इस हिंसक शस्त्र का उपयोग केवल हिंसा ही है ॥ हिंसा तो स्वयं सुरधर्म है । उसके लिए स्पयरूप हिंस्रक शस्त्र का प्रयोग नहीं होता, अपितु अहिंसाभावोपेत, अतएव च ' अध्वर ' नाम से प्रसिद्ध यज्ञ पर जो आक्रमण करने वाले शत्रु है, दूसरे शब्दों में अहिंसाभावमय अध्वर के अहिंसात्मक शान्तभाव को स्वहिंसावृत्ति से जो दुष्ट इसे हिंसाभाव से युक्त करना चाहते हैं, इन दुष्टों का दलन कर अध्वर की अध्वरता ( हिंसाभाव ) को सुरक्षित रखना हीं, अध्वर का स्वरूप सम्पन्न करना ही इसका काम है । लोक में भी तो ऐसा ही देखा जाता है । शस्त्र ही शान्ति का साधन है । यदि शस्त्र का भय न हो, तो दुष्टलोग शान्ति भङ्ग करदें । सर्वत्र हिंसा, मारकाट का साम्राज्य होजाय । अतः हम शस्त्र को अहिंसा का हो साधक कहेंगे । प्रकृत में यह बतलाने का तात्पर्य यही है कि, यज्ञ देवतामय है । देवता अहिंस । भाव-७६६
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द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड प्रधान हैं । अतएव देवप्राणमय यश की ' अध्वर ' कहा जाता है । ऐसे अहिंसाभावप्रधान यश में हिंसा के साधनभूत रूय के प्रयोग से यह आपत्ति उठाई जा सकती है कि, जब रुपय शस्त्र है, हिंसा का साधन है, तो इस के प्रवेश से यज्ञ अवश्य ही हिंसा भावोपेत होता हुआ, अतएव श्रासुरभावप्रधान बनता हुआ देवीसम्पत् से विरहित होजायगा । इस कुशका का निवारण करने के लिए ही ' अध्वरकृतं देवेभ्यः ' यह कहना पड़ा है । प्रयोगकाल से पहिले शस्त्र की शाखा पर चढ़ा कर उसे मुती किया जाता है । इसी प्रक्रिया का नाम ' संशन ' है । इस स्पय नाम के शस्त्र से असुर जैसे प्रबल शत्रु का वध करना नितान्त अपेक्षित है । यह यज्ञिय स्पयरूप शस्त्र न तो लौह का है, न सचमुच इससे किसी का प्रीवा ' कृन्तन ' ही करना है । अपितु बो अदृष्ट शत्रु हैं, अथवा जो असुरप्राण हैं, अथवा भूपिण्डस्थ जो दूषित मिट्टी है, मात्र उसे ही हटाना है । मिट्टी उठाना तो सामान्य निमित्त है मस्तुतः मिट्टी में जो आयकाप्रधान असुरोंने आक्रमण कर लिया है, उन्हें नष्ट करना है । आसुरप्राण का विनाशक और वज्र है, यह प्रकरण के प्रारम्भ में हीं बतलाया जाचुका है ' इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः ' ' इन्द्र उत्तरत ' के अनुसार इन्द्रप्राणात्मक सूर्य ऊर्ध्वादि में रहता है । ऊ दिक् को ' उत्तर ' कहा जाता है । अवाचीदिक को दक्षिणा कहा जाता है । जिस स्थिति के लिए लोकभाषा में ' ॐ चा - नीचा ' ये शब्द प्रयुक्त है, उसी स्थिति के लिए वैदिक साहित्य में ' उत्तरा - दक्षिणा ' ये शब्द प्रयुक्त हुए हैं I सूर्य से निकलने वाली, चारों ओर सहस्रभाव से व्याप्त होने वाली इन्द्रप्राणात्मिका सौररश्मियाँ वज्ररूपा हैं । सूर्यकेन्द्र से बद्ध होकर चारों ओर सहस्ररश्मियाँ निकलतीं हैं । प्रत्येक रश्मि की बिन्दु बिन्दु से वायुक्षेत्रविन्यास से पुनः सहस्र महस्र रश्मियाँ निकलतीं हैं । वहाँ से पुनः रश्मियाँ निकलतीं हैं । इस वितानभाव का परिणाम यह होता है कि इन अनन्त साहस्रियों के प्रसार से सम्पूर्ण सौरमण्डल रश्मियों से इसप्रकार परिपूर्ण होजाता है कि, उसका कोई भी प्रदेश आपको ऐसा नहीं मिल सकता, जहाँ श्राप सूची के अवभाग को भी अविष्ट करसके । सर्पन प्रकाश परिपूर्ण होजाता है । इन अनन्तानन्त साइसी भावों से युक्त सौररश्मियाँ इन्द्र के अनन्त बाहु है । इनमें प्रतिष्ठित विद्युदिन्द्र ' हेति ' नामक वज्र है । इसी के प्रहार से तमोमय त्रप्रमुख अमु का नाश होता है । रश्मिगत इसी साहस्री - विज्ञान को लक्ष्य में रखकर – ' सहस्राणि सहस्रशो बाह्वोस्तव हेतयः ' ' सहस्रधा महिमानः सहस्रम् इत्यादि सिद्धान्त हमारे सम्मुख जाते हैं । वज्ररूप सौररश्मियाँ जो हमारी आती है, वे इन्द्र के दहिने हाथ हैं कारण वे हम से उत्तर हैं, एवं हम उनसे दक्षिण है पृथिवी सूर्य की अपेक्षा दक्षिणादिक में प्रतिष्टित मानी जाती है । सुतरां इस ओर इन्द्र के दक्षिण बाहु का ही मन सिद्ध होता है । चषि इन्द्र के और बहु भी असुरविनाश में समर्थ हैं परन्तु पृथिवी की अपेक्षा से तो वीयतम ] ( अतिशययुक्त ) बाहू दक्षिण ही माना जायगा । रश्मिरूप बाहु विद्युदुरूप वज्र से युक्त है इन्द्रविद्यतु और प्रतिरूप हुरूप रश्मि अभिन्न है अतः हम बहुरूप रश्मि को ही वज्र यह सकते हैं । इस वज्ररूपा रश्मि से चारों ओर रश्मियों का प्रतिफलन होता है । स्वयं रश्मियाँ भी सहस्र हैं । प्रत्येक रश्मि भी प्रतिभाव से सहस्र किरणों से युक्त है । यही सहस - किरणों रश्मिरूप पत्र की सृष्टियाँ ( शत्रु-८००
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द्वितीयश्रध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण भञ्जिका कोरें ) हैं । अतएव हम इस वज्र को, किंवा वज्ररूप दक्षिणबाहु को ' सहस्रभृष्टि ' कह सकते हैं । दाह्य सोम के सम्बन्ध से यह सहस्रभृष्टि वज्र तेजोमय बन रहा है । इधर से उधर से, नीचे से ऊपर से, सब ओर से * ज्योतिर्म्मयी रश्मियाँ निकल रहीं हैं । ज्योति से पूर्ण है । रश्मि क्या है?, सूर्य्यचिम्बात्मिका ऋङ मूर्त्तियों का वितान । सूर्य्यत्रिम्ब ही वितानाख्य सामवेद के सम्बन्ध से उत्तरोत्तर हसीयस भाव से केन्द्र से प्रधि पर्य्यन्त प्रतिष्ठित होकर रश्मिरूप में परिणित होरहा है । रश्मि ऋक् ( सूर्य्यविम्ब ) की समष्टि पात्र है । यह शतभाव से युक्त है । अतएव रश्मिरूपाऋ के लिए - ' ऋक् शतपढ़ी ' ( श ० ब्रा ० ११४ ) यह कहा जाता है । इह्नीं रश्मियों के पर्यावर्तन से अहोरात्र का स्वरूप निष्पन्न होता है । रश्मिगत सान्तपनाग्निमय विक्षोभक प्राण रुद्र है । प्रत्येक रश्मि रुद्रप्राणमयी है, जैसा कि ' ये चैनं रुद्रा दिक्षु अभिश्रिताः ' इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है । अहोरात्रस्वरूपसम्पादिकः । रुद्रप्राणमयी रश्मि शतभावोपेता है । अतएव इसके लिए - अहोरात्रे ' -शतरुद्रियम् ' ( तै ० ब्रा ० ३ | ११ | १० | ३ ) यह कहा जाता है । मन के संकल्प का नाम ' ऋतु ' है । यह ऋतु जाकर ' दक्ष ' नाम से व्यवहृत होता प्राण पर प्रतिष्ठित होकर वाग्द्वारा कार्य्यरूप में परिणत होता हुआ आगे है । रश्मि प्राणमयी है । इन्द्र का ऋतु यहीं प्रतिष्ठित है । यह क्रतुरूपा रश्मि शतभावोपेता है । अतएव इन्द्र के लिए - ' इन्द्र श्रासीन सीरपतिः शतक्रतुः ' ( तै ० ब्रा ० २४८७ ) यह कहा जाता है । इसी शत-रूप पूर्णभाव को लक्ष्य में रखकर रश्मिरूप इस वज्र के लिए - ' शततेजाः ' यह विशेषण दिया है । वायु में दिक्सोम रहता है । साथ ही ' इन्द्रतुरीया महा गृह्यन्ते ' इस ग्रहोपनिषत् - सिद्धान्त के अनुसार अन्तरिक्ष्य बायु में रश्मिरूप इन्द्र भी रहता है । वायुगत सोम के सम्बन्ध से सावित्राग्निमूर्ति यह वायुयुक्त रश्मिरूप वज्र प्रदीप्त होपड़ता है । महाप्रबल होजाता है । तिर्य्यक बहने वाला वायु सचमुच सोमशक्ति से इन्द्रशक्ति को आकर्षित करता हुआ, विद्युन्मूर्ति बनता हुआ तेजिष्ट बन जाता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर ऋषि ने इसके लिए ' वायुरसि तिग्मतेजाः ' कहा है । इसप्रकार दक्षिण - बहुरूप, वृत्रबध में पूर्ण समर्थ यह वज्र सहस्रभृष्टि है, शततेजा है, वायुरूप तिग्मतेजा है । आज अध्वर्यु इसी प्राकृतिक वज्रशक्ति का भावनामयी मन्त्रशक्ति के द्वारा अपने इस साधा-रण काष्ठनिम्मित रुपय में प्रवेश कराता है । वाम हाथ सोमप्रधान होने से बलशून्य है । एवं दक्षिण हस्त अग्निप्रधान होने से बलयुक्त है । आध्यात्मिक इन्द्र का बाहु दक्षिण हाथ ही है । मन्त्र के द्वारा पहिले उस प्राकृतिक पूर्वोक्त दक्षिण बाहु का चल अध्वर्यु अपने दक्षिण हाथ में डालता है । एवं दक्षिण हस्त के स्पर्श से वामहस्तस्थ स्पय में उस बलको इसमें डालता है । संस्मरणीय है कि, इस संशन प्रयोग से पहिले स्पय एक साधारण काष्ठ खण्ड था, परन्तु अब यह मन्त्रशक्तियुत महाप्रत्रल शस्त्र बन गया है । सावधान! यदि इस स्म्य का शरीर के किसी अवयव से स्पर्श होगया, अथवा भूप्रदेश से स्पर्श होगया, तो वह अवयव, एवं प्रदेश जल जायगा । जबतक असुरवध में वज्र की यह शक्ति उपयुक्त - उपभुक्त न होजाय, तत्रतक न तो स्पय का शरीर से स्पर्श ही करना चाहिए, एवं न भूप्रदेश पर ही इसे रखना ही चाहिए । ३,४, ५,६,७ * - " अधस्त्रिदासीदुपरिस्विदासीत् - रेतोधा आसन्, महिमान आसन् ” — ऋक्सं ८०१
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द्वितीय अध्याय स्तम्बव जुहरणोपाख्यान रहम्य— प्रथमकाण्ड चतुथब्राह्मण भूमि- विशोधनार्थ अध्वर्यु ' ने पूर्वकथनानुसार ' स्पय ' रूप वज्र को मन्त्रवल से महा उग्र कर लिया है । इस शस्त्र का प्रधान का है यह में असुरों को निकालना । जिसप्रकार प्राकृतिक नित्य ईश्वरीय श्रग्नीषोमात्मक भूपिण्ड सम्बन्धी हविर्यज्ञ में प्रविष्ट श्रापोमय असुरों को स्वयज्ञमण्डल से वज्र प्रहार के द्वारा और इन्द्र बाहिर निकाला करते हैं, एकमेव उसी नित्य यश की प्रतिकृति ( नकल ) पर वितत होने वाले मनुष्य-यजमान के इस वैध इविर्यशमण्डल में प्रविष्ट होने वाले अान्तरिक्ष्य प्राप्यप्राणात्मक अमुरी को यशमण्डल से बाहिर निकालने के लिए मन्त्रपूत, मन्त्रशक्ति से संशित ( तेज - पेने किए हुए ) रूपरूप वज्र को हाथ में लेकर आज सान्तपनाग्निरूप असुरनमूर्ति अध्वर्यु ' बड़ी सावधानी से खड़ा हुआ है । सब सामग्री सम्पन्न है । जहाँ से असुरों को निकालना है, वह भूप्रदेश अध्वर्यु के सम्मुख है । जिस शस्त्र की सहायता से निकालना है, वह तीक्ष्ण स्वय ( यज्र ) शस्त्र इसके हाथ में है 1 जिस मन्त्रशक्ति से निकालना है, वह मन्त्र इसके कष्ट में है । यशमण्डल से निकाल कर जिस स्थान में असुरों को खदेड़ना है, वह स्थान इसके लक्ष्य में है । इसप्रकार असुरनाशार्थं जो उपकरण होने चाहिएँ, वे सत्र प्रस्तुत हैं । इतना सब कुछ होने पर भी इस समय एक बात की बहुत बड़ी कमी इसके सम्मुख आरही है । देवासुरयश में तो इन्द्र के सम्मुख वृत्रासुर लड़ा था । शत्रु मामने था । इसलिए इन्द्र ने शस्त्र का प्रयोग कर उसे लोकान्तर में मार भगाया, जैसाकि श्रनुपद में हीं आख्यान के द्वारा स्पष्ट होने वाला है । परन्तु अध्वर्यु के सम्मुख तो कोई प्रत्यक्ष में असुर नहीं है, जिम पर यह प्रहार करे । वहाँ तो मारने वाला इन्द्र भी प्राणात्मक था, एवं पलायित होने वाला असुर भी आप्यप्राणरूप ही थ ॥ इस सजातीय - सम्बन्ध से प्रबल प्राण का निर्बल प्राण के साथ युद्ध होना अनुरूप था । परन्तु यहाँ भौतिक शरीर से युक्त है । मूर्त है । उधर आन्तरिक्ष्य में व्याप्त श्राप्यप्राणमय मुर अमूर्त है । मूर्त अध्वर्यु दृष्ट अमूर्त असुर पर प्रहार करे, तो कैसे करे? । ' मैं इस शत्रु को मार रहा हूँ " इसप्रकार की भावना वचतक नहीं रहती, तबतक मारना चरितार्थ ही नहीं होता । हमारा ससीम मन-मूर्त्तमन- विषयावारमन जबतक ससीम मूर्त्त विषय को नहीं पड़ होता तबतक वह कोई व्यापार नहीं कर सकता । केवल हवा में तलवार घुमाने से हमारे मन को यह सन्तोष कभी नहीं होसकता कि, हम शत्रु को मार रहे हैं | मन के श्रालम्बन के लिए उपासनाकाण्ड की भाँति वहाँ भी कोई मूर्त्त आधार चाहिए । तभी मनो-व्यापार मफल होमकता है । जानते है कि गुणात्मा निर्गुण ब्रह्मतत्त्व मूर्त्त नहीं है । साकार नहीं है । परन्तु नाथ ही वे यह भी जानते हैं कि मगुण, ससीम, मूर्त - मन कभी उस निर्गुण, असीम, अमृतस्य पर नहीं पहुँच सकता । अतएव उपासना सिद्धि के लिए-अचिन्त्यस्याप्रमेयर निर्गुणम्य गुणात्मनः । उपासकानां सिद्धयर्थं ब्रह्मणो रूपकल्पना ॥ इस सिद्धान्त के अनुसार ' प्रतिमा ' का आश्रय ग्रहण आवश्यक होजाता है । दृष्टि रहती है प्रतिमा पर, एवं इस मूर्त आधार के द्वारा मन पहुँच जाता है उस अमूर्च तत्त्व पर पुष्प - धूप दीप नैवेद्य आदि ८०२
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द्वितीय अध्याय शतपथमा लगा चतुर्यत्राहा सम्पूर्ण होते हैं प्रतिमा पर परन्तु होती है यह जगद्व्यापक मूर्त्त सच्चिदानन्द की आराधना । यही मूर्तिपूजन का मालिक रहस्य है । प्रकृत में इस निदर्शन से हमें यही बतलाना है कि, सगुण मन के ( मनोमय कम्र्मात्मा के ) ' मैं अवश्य यह कर्म्म कर रहा हूँ ' इस दृढ़ विश्वास के लिए, उस अमूर्त तत्त्व के साथ इसका सम्बन्ध कग्ने के लिए किमी मूर्त्त भौतिक द्रव्य को मध्यस्थ बनाना आवश्यक होजाता है । अक्षरज्ञान के लिए पाटी, और खड़िया को मध्यस्थ बनाना पड़ता है । आकाश के वृत्तों के परिज्ञान के लिए भौतिक वृत्तों को सामने रखना पड़ता है | जाने दीजिए अदृश्य भावों को । भौतिक पदार्थों के परिज्ञान के लिए भी भौतिक साधनों को मध्यस्थ चनाना पड़ता है । भौगोलिक चित्रों के ( एट्लस के आधार पर ( भूप्रदेश के किसी भी प्रदेश में कभी न जाने वाले भी ) आप अपने प्रासाद - कक्ष के भीतर बैठे बैठे ही सम्पूर्ण भूप्रदेशों का ऐसा वर्णन कर डालते हैं, ऐसी टीक नाप - तोल से बात करने लगते हैं, मानो आपका जन्म, एवं निवास वहीं हुआ हो । नत्र विदूरस्थ भौतिक पदार्थों के परिज्ञान में भी आपको कल्पित तत प्रतिकृति - ( नकल ) - रूप भौतिक पदार्थों को मध्यस्थ बनाना पड़ता है, तो जो तत्त्व प्राणुरूप होने से अमूर्त्त हैं, चम्मचतु से तिरोहित हैं, उन पर प्रयोग करने के लिए भौतिक द्रव्यों को मध्यस्थ बनाए बिना कैसे निर्वाह हो सकता है? । एक भौगोलिक यह भलीभांति जानता है कि, पुरोऽवस्थित यह भूगोलचित्र कल्पित है । उस वास्त-विक भूपिण्ड की नकल है । इसे कल्पितभाव समझता हुआ भी वह चित्रस्थ तत्तत् प्रदेशों पर ' यह बम्बई है, यह कलकत्ता है, यह निरक्षवृत्त से २६ अंश ५५ कला २७ त्रिकला, विकला के शतांश ( साँवाँ भाग ) में से ४५ वाँ भाग - इस स्थान पर उत्तर की और जयपुर है " श्रङ्ग लि - रखता हुआ प्रदेशों का निश्चयात्मक ज्ञान प्रकट किया करता है । दृष्टि मिध्या पर है, ध्यान सत्य पर है । इससे हमें यही बतलाना है कि, आज जो महानुभाव भारतीय मूर्तिपूजन के सम्बन्ध में यह आक्षेप किया करते हैं कि, “ प्रतिमा तो मिथ्या है, इस मिथ्या से उस अमूर्त्त ब्रह्म की उपासना कैसे बन सकती है ” यह कुतर्क उठाया करते हैं, उपयुक्त निदर्शन से विज्ञ पाठक यह मान लेंगे, कि उनके इन कुतर्कों का कोई मूल्य नहीं है | विज्ञानशास्त्र का तो यह निश्चित सिद्धान्त है कि, बिना मिथ्या उपाय के सत्यतत्त्व कभी प्राप्त हो ही नहीं सकता x | उपाय सब मिथ्या हैं, उपेय तत्त्व सत्य है । इसी मौलिक रहस्य को लक्ष्य में रखकर भगवान् भर्तृहरि कहते हैं—
उपायाः शिक्षमाणानां बालानामुपलालनाः ।
सत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते ॥
— वाक्यपदी मौलिक अमूर्त तत्त्व के परिज्ञान के लिए जिस भौतिक द्रव्य का आश्रय लिया जाता है, इस मध्यस्थ कल्पित पदार्थ के साथ उस अलौकिक अमूर्त्त तत्त्व के साथ जो एक अपूर्व सम्बन्ध होता है, उसे ही वैदिक परि-* इस विषय का विशद विवेचन ' गीताविज्ञानभाष्यभूमिका ' के ' भक्तियोगपरीक्षा ' नामक सातवें खण्ड में देखना चाहिए । X इस विषय का विषद विवेचन ' सत्यानृतविधेक ' नाम के स्वतन्त्र निबन्ध में देखना चाहिए । ८०३
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द्वितीयश्रध्याय प्रथमखण्ड चतुर्थत्राह्मण भाषानुसार ' निदान ' कहा जाता है । कल्पित - सम्बन्धों का परिचायक पदार्थ ही ' निदान ' शब्द से श्रवहृत होता है । आज नवशिक्षित वर्ग इस भारतीय - निदान को उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं । पोली की मिट्टी को गणपति मानना, सुपारी को गणपति मानना, मूर्ति को ईश्वर मानना, आदि आर्ष व्यबहार इन द्धदग्धों की दृष्टि में ब्राह्मणों की स्वार्थलीलामात्र है । परन्तु उह्न सम्भवतः यह विदित नहीं है कि, आज के इस भावुकतापूर्ण युग में भी सम्पूर्ण संग़र इस भारतीय ' निदानविद्या ' का ही उच्छिष्टभोगी प्रमाणित होरहा है । भारतीय धामिक व्यवहारों पर टीका टिप्पणी करने वाले इन महानुभावों से हम पूँछ हैं कि, आपके कालेजों में भूशास्त्रवेत्ता लोग कल्पित, मिथ्या, मिट्टी के अथवा कागज के अथवा तो धातु के गोले को हाथ में लेकर उसके तत्तत् प्रदेशों पर हाथ रखते हुए " यह देखो उत्तरध्रुव है, यह दक्षिणध्र ुव है, यह इजिप्ट है, यह नार्दन है, यह भूमध्यसागर है, यह मेडिट्रं नियेन्सी ( महीसागर ) है, यह रेडमी ( रक्तसमुद्र ) है, यह यलोसी ( पीतसमुद्र, है, यह बालकराझील है, यह ट्रिपुली है, यह समरकन्द है ” आदि रूप से आप को भूप्रदेशों का परिचय कराते हैं । हम कहते है – प्रोफेसर महोदय का तथोक्त कथन आपके ही कथनानुसार सर्वात्मना मिथ्या है । उनके हाथ में तो एक मिट्टी का गोला है । सम्पूर्ण भूमण्डल को हाथ में लेकर उसके प्रदेशों को बतलाना तो दूर रहा, प्रो ० महोदय एक समय मेंएक स्थान पर बैठे हुए भूपिण्ड को देख भी नहीं सकते । तो छोड़िए आज से इन कालेजों में पढ़ना । कर दीजिए उन गोलों को नष्टभ्रष्ट, जला दीजिए ढ़ोंग की इन पुस्तकों को । कोसिट ऐसे ग्रन्थनिर्माताओं को, जिन्होंने ग्रापको मिथ्याभ्रम में डाला । और आगे बढ़िए | विज्ञानगर्व से गर्विष्ठ जिन पाश्चात्य - जातियों के आप भक़ हैं, वे महानुभाव अपने प्रेमीजन की मृत्यु पर अपने हाथ पर एक काली पट्टी बाँधते हैं । इस पट्टी से वे अपना शोक सूचित करते हैं । हम पूँछते हैं - यह कैसा ढोंग? । काली पट्टी एक भौतिक मूर्त पदार्थ है । शोक मन की एक अशान्ति है, अन्तवदना है । इसका कोई रूप नहीं है । उस अमूर्त से इस मूर्त्त का क्या सम्बन्ध?, शाक का काली पट्टी से क्या सम्बन्ध? । ओर आगे चलिए - सिग्नल की लाल रोशनी देखकर ट्रेन मार्ग में हीं खड़ी होजाती है, ही रोशनी देखकर चल पड़ती है । लाल रोशनी से यह माना जाता है कि, मार्ग बन्द है, कोई विघ्न है, गाड़ी वहीं रोको । हरी रोशनी से यह माना जाता है कि, मार्ग निर्विघ्न है, लाइन क्लीयर है, निर्विघ्नता है, गाड़ी को आने दो । इसप्रकार रक्तप्रकाश भय का सूचक है, हरित प्रकाश शान्ति का द्योतक है । हम पूँछते हैं - रक्त- हरित का अशान्ति, शान्ति से क्या सम्बन्ध? | नष्ट कर दीजिए आज ही इन कल्पित सिग्नलों को । गाड के हाथ से लाल हरी झड़ियाँ छीन कर आज ही जला डालिए । कारण, ये मिथ्या ढ़ोंग दिखाकर संसार को धोखे में डाल रहे हैं । जैसा पीली मिट्टी को गणपति मानना, मूर्त्ति को ईश्वर मानना, हरे शाक को ' शुभसूचक मानना मिथ्या, वैसे ही मिट्टी के गोले को भूपिण्ड मानना, काली पट्टी को शोकसूचक, रक्त को अशान्तिसूचक हरित को शान्तिसूचक मनना भी मिथ्या है | यदि आप इन का कोई उपयोग सम-झते हैं, आपकी दृष्टि में सर्वथा मिथ्या - कल्पित होते हुए भी ये साधन उपादेय हैं, तो फिर ऋषियोंने ह्रीं क्या अपराध किया है? । हम तो यह भी बिना संकोच कहने के लिए सन्नद्ध हैं कि आपकी कल्पना तो फिर भी निरी कल्पना ही है । परन्तु भारतीय ऋषियों की कल्पना में तो अधिकांश में तथ्यांश ही विद्यमान रहता है । 50 %