Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 541–550

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 541–550

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द्वितीयअध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण ऋषिगण निदान उसी वस्तु को बनाते हैं, जिसमें निदान के द्वारा विदित होने वाली वस्तु के धर्म्म आंशिकरूप से ममाविष्ट रहते हैं । उदाहरण के लिए ' पद्म ' को ही लीजिए । श्रागमाचायों ने ' पद्म ' को ' भूपिण्ड ' का निदान माना है | भगवान् विष्णु की प्रतिमा के हाथ में आप कमल का पुष्प देखते हैं । ऋषि इस कमल से आपको यही बतलाना चाहते है कि, ' सम्पूर्ण भूपिण्ड पर यज्ञमूर्ति विष्णु का प्रभुत्त्व है । ' कमल को भूपिण्ड समझो ' इस पद्म- निदान से यही बतलाना है । अब पद्म और भूपिण्ड के स्वरूप - निर्मागा की अनुरूपता देखिए । ' अद्द्भ्यः पृथिवी ' इस श्रीत - सिद्धान्त के अनुसार भूपिण्ड का निर्माण पानी से ही हुआ है । पानी में वायु का प्रवेश होता है । पानी, वायु, दोनों तेंज: - संयोग से मूर्च्छित होकर फेन ( भाग ) रूप में परिणत होजाते हैं । इसी प्रकार वायु तथा तेज के आक्रमण से उत्तरोत्तर घनता बढ़ती जाती है । इस क्रम से वही पानी क्रमशः ' आप:, फेन, मृत् । क्षार ), बिकता, शर्करा, अश्मा, श्रयः, हिरण्य, इन आठ अवस्थाओं में परिणत होता हुआ । भूपिण्डस्वरूप में परिणत होजाता है । इसीप्रकार कमल की उत्पत्ति देखिए । कमल पानी में हीं पानी से ही उत्पन्न होता है, यह सब जानते हैं । पानी के पत्ते का ही नाम ' पुष्करपर्ण ' है । ' आपो वै पुष्करपर्णम् ( श ० ६ का ० ) यह सिद्धान्त प्रसिद्ध है । आपको यह जानकर और भी आश्चर्य्य होगा कि, पहिले पानी इसी पुष्कर ( कमल ) रूप में परिणत होता है । अनन्तर इह्रीं पुष्करों के संघात से पूर्वक्रमानुसार भूरूप पुर बन जाता है । इस पुरनिर्माण हेतु से ही ' पुरकरत्त्वात् ' इसे ' पुष्कर ' कहा जाता है । भूपिण्ड क्या है?, पुष्कर है । इसी आधार पर भुवनकोश - [ भूगोल ] - वेत्ताओंने भूपिण्ड को ' पद्म ' मानकर भुवनकोशविद्या का निरूपण किया है । अतएव पार्थिवकेन्द्रस्थ अक्षस्थानीय प्राणाग्निमूर्ति ब्रह्मा ' पद्मभू ' नाम से प्रसिद्ध हैं । आपोमय ही पद्म है । यही श्रापोमय भूपिण्ड का उपादान है | इसी सामानाधिकरण्य को प्रधान मान कर ऋषि ने पद्म को भूपिण्ड का निदान माना है । महामाया के हाथ में सुरापात्र [ मदिरा का प्याला ] है । यह मोहनिद्रा का निदान है । ' योगमाया हरे तत् तया संमोह्यते जगत् ' इस रहस्य - शास्त्र के सिद्धान्तानुसार उस महामाया की शक्ति से सम्पूर्ण विश्व मोहमदिरा में निमग्न है । मदिरा पीने से मनुष्य की जो स्थिति होजाती है, वही स्थिति इस मोह से होजाती है । मोह एक प्रकार की मदिरा है । पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिर । मुन्मुत्तभूतं जगत् ' यह इसी आधार पर कहा जाता है । मदिरा और मोहनिद्रा के इसी साजात्य को लक्ष्य में रखकर ऋषियोंने मदिरापात्र को मोह का निदान माना है । भगवती के हाथ में मदिरा का पात्र हैं, इससे ऋषि आपको यही सिखलाना चाहते हैं कि, विश्वास कीजिए! इस महामाया के अधिकार में मोहशक्ति प्रतिष्ठित है । भूपिण्ड में रहने वाला मूलप्रतिष्ठा रूप रुद्रप्राण गणपति नाम से प्रसिद्ध है । प्राणाग्निरूप रुद्र की ११ अवस्थाएँ हैं | ‘ मरुतो रुद्रपुत्रासः ' इस श्रोत - सिद्धान्त के अनुसार इस रुद्राग्नेय प्राण के रासायनिक स योग से सात प्रकार का यौगिक मरुद्वायु उत्पन्न होता है । यह मरुद् - वायु सात भागों में विभक्त होकर अदिति के गर्भ में प्रतिष्ठित रहता है । प्रदितिभाग पृथिवी का वह भाग है, जो सूय्यनुगत रहता है, जैसा कि पूर्व के अनेक स्थान पर विस्तार से बतलाया जाचुका है । भूपृष्ठ से आरम्भ कर एकविंशस्थ २१ सूर्य-पिण्ड पर्य्यन्त व्याप्त रहने वाला त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्न पृथिवीलोक, पञ्चदशस्तोमावच्छिन्न अन्तरिक्षलोक, ८०५

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द्वितीयव्याय प्रथम कागड एवं एकविंशस्तोमा छिन्न युलोकात्मक सम्पूर्ण भाग अदिति है । इसी अदितिमएटल में पूर्वोक्त मत्तविध मस्तू वायु प्रतिष्ठित रहता है । वायु में इन्द्र रहता है । व्याकरण ( विविध आकार ही व्याकरण है ) -धम्मोपेता इन्द्रशक्ति के प्रवेश से अदितिगर्भ में प्रष्टि इन सप्तवा विभक्त मतों के प्रत्येक के सात सात खण्ड होजाते हैं । इसप्रकार सात सातकों के एकोनपञ्चाशत् [ ४६ ] मरुत् होजाते हैं । इनमें आरम्भ का मस्त् सर्वथा पन है एवं सर्वान्त का मस्त् सबथा विरल है । मध्य के मतों की पनता विरलता मे तारतम्य है । धृतिधर्म्म यही प्रथम मरुत् इन ४६ मरुद्गणों की मूलप्रतिष्ठा होता हुआ ' गणपति ' नाम से प्रसिद्ध है । सर्वान्त का मरुत् [ ४६ वा मरुत् ] ' महावीर ' नाम से व्यवहृत होता है । भुपण्ड में प्रथम मरुदुरूप गणपत प्रतिष्ठित है । सूप्यंसंस्था में अन्त में महावीर प्रतिष्ठित है भूपिएड और सूक्ष्य के मध्य में अना न्तर सम्पूर्ण मस्त् घनतातारतम्य से प्रतिष्ठित हैं । आप पृथिवी में जो एक प्रतिष्ठातस्त्र देखते हैं, धृति देखते हैं, जिस धृतिध से भूषिण्ड ' घरा ' ' धरित्री ' ' धरिणी ' आदि नामों से प्रसिद्ध है, वही भपिएडगत धृति - प्राण- मूलप्रतिष्ठामा गणपति है । स्तीम्यत्रैलोक्य के सम्पूर्ण पदार्थ इसी मूलप्राण पर प्रतिष्ठित है 1 इस मूलपाण के विचलित हो जाने पर सम्पूर्ण त्रैलोक्य, विशेषतः पार्थिवप्रज्ञा विचलित हो जाती है, सर्वत्र अशान्ति का साम्राज्य होजाता है । एवं इस प्राण के स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रहने से सर्वत्र शान्ति का साम्राज्य रहता है । उदाहरण के लिए, अध्यात्मसंस्था को ही लीजिए हमारे शरीर में क्रमश: शिरोगुहा, उरोगुरा उदरगुहा, बस्तिगुदा, ये चार गुहाएँ हैं । चारों में क्रमश: आप्यप्राण आदित्यप्राण वायव्यप्राण-अपानप्राण, ये चार प्राण प्रतिष्ठित हैं बस्तिगुहा मूला वारस्थान है । इसी को ' मूलप्रन्थि ' भी कहा जाता है । इस मूलग्रन्थि में प्रतिष्ठारूप वही प्रथम पार्थिव गणपतिप्राण प्रतिष्ठित रहता है । इसी को दार्शनिक परिभाषा में ' अपान ' कहा जाता है प्राण बिना भूत के नहीं रह सकता । यह गणपतिप्राण प्रधान रूप से वस्तिगुहान्तर्गत मलभाग में ही प्रतिष्ठित रहता है । जिस मल [ विष्ठा ] को आप स्याज्य वस्तु समझते हैं, विश्वास रखिए! वही मल उस प्रतिष्ठाप्राण की आधारभूमि बनता हुआ जीवन का आधार है । जीवनसत्ता के लिए मूलप्रन्थि अत्यन्त आवश्यक है । यदि मल एकान्ततः निकल जाता है, लोकभाषा के अनुसार यदि ' मल टूट जाता है, तो तत्क्षण मनुष्य का निधन हो जाता है । कारण, मल के निःशेष होजाने से तदाधार से प्रतिष्ठित शरीरसंस्था का प्रतिष्ठारूप वही मौलिक गणपतिप्राण शरीर से उत्क्रान्त होजाता है । उसके उत्कान्त होने पर जीवनयात्रा कठिन है, कठिन क्या है, असम्भव है । गणपतिप्राण की इसी स्थिति को लक्ष्य में रखकर आगमशास्त्र ने मूलाधार में ही गणपतिदेवता की सत्ता मानी है । जबतक यह प्राण शान्त है, तभीतक शरीरसंस्था शान्त है, निर्विघ्न है । इस प्राण के विचलित होजाने पर शरीरसंस्था विघ्नमयी वन जाती है गयापतिप्राण के इसी स्वरूपधम्मं को लक्ष्य में रख-कर इसे विघ्नकर्ता भी कहा जाता है, एवं विघ्नहर्त्ता भी माना जाता है । उपयुक्त ४६ मरुतों की सत्ता हमने अदिति के गर्भ में बतलाई है । साथ ही यह भी कहा है कि, वायुगत इन्द्रशक्ति से ही सप्तधा विभक्त मरुत् ४६ भागों में विभक्त होजाता है । इससे यह भी सिद्ध होजाता कि, ८०६

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द्वितीय श्रध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थवाहाया मरुद्गणों के साथ सौर मघवा इन्द्र का घनिष्ठ सम्बन्ध है । मरुत्प्राण सदा इन्द्रप्राण से अनुग्रहीत रहता है । इन्द्र क्षत्र है, राजा है । मरुद्गण इस की सेना है । सेनारूप इसी मरुत्प्राण को आगे कर प्रकाशित इन्द्रप्राण तमोमय वृत्रप्रधान वारुण प्राप्य असुरों पर आक्रमण करता है । वारुण श्राप्यप्राण के प्रवेश से पदार्थ सड़ने लगता है, दूषित होने लगता है । यह सड़ान असुरों के आक्रमण का ही फल है । परन्तु जब भी मरुद्वायु का ग्रागमन होता है, तो तद्गत इन्द्र के, एवं वायुप्राणात्मक मरुत्सेना के आक्रमण से सम्पूर्ण असुर नष्ट होजाते हैं । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, सड़ी वस्तु को खुली हवा में धूर में रख दीजिए । थोड़े समय में ही दूषित परमाणु नष्ट होजायेंगे । वस्तु शुद्ध बन जायगी । हाँ, जहाँ इस महद्वायु का प्रवेश नहीं होता, वहाँ अवश्य ही प्राप्य बरुण स्वपाश से बद्ध कर उस वस्तु के स्वरूप को दुष्ट चना डालता है । बन्द हवा असुरों का घर है, एवं खुली हवा देवताओं की आवासभूमि है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ब्राह्मणश्रुति कहती है-" य वातो नाभित्राति -- तत् सर्व ' वरुणदैवत्यम् " । मरुद्गण सदा इन्द्र के आगे आगे चलते हैं । दूसरे शब्दों में - ये मरुद्गण ( किंवा मारुतीसेना ) इन्द्र के अङ्गरक्षक हैं । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर मन्त्रश्रुति कहती है-इन्द्र आसां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः । देवसेनानामभिभज्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्त्वग्रम् ॥ — यजुः सं ० १७।४० मरुद्गणों का मूलाधार प्रथम पार्थिवमरुत् गणपति है । क्योंकि शेष ४८ मरुतों की प्रतिष्ठा, उक्थ ( मूलप्रभव यही है । अतएव इसे ' गणानां पति ' इस रूप से ' गणपति ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । यह प्राण जबतक प्रतिष्ठित है, बैठा है, तभीतक शान्ति है । इसके उखड़ने पर सर्वनाश है । इसी को इन्द्रप्राण की अभिन्नता से ' मघत्रा ' भी कहा जाता है । संसार का कोई भी कार्य हो, सत्र का प्रथमारम्भक यही प्राण । मूलप्रारण से व्यापार का आरम्भ होता है । मूलप्राण यही है । इस-लिए श्रार्ष- ऋषि आपको आदेश करते हैं कि, यदि आप अपने कार्य्यं को निर्विघ्न सम्पन्न करना चाहते हैं. तो सर्वप्रथम आप गणपति का ही स्मरण कीजिए । उपासना के द्वारा नित्य - आधिदैविक - गणपति - प्राण के बल आत्मसात् कर आध्यात्मिक गणपतिप्राण को प्रबल बनाते रहिए । उसे आत्मा में प्रतिष्ठित कीजिए । यदि आपका मूलाधारप्राण प्रतिष्ठित है, बलवान् है, तो निःसन्देह कार्य्यं की पूर्ति निश्चित है । अन्यथा -' छिन्न े मूले नैत्र शाखा न वृत्तः ' यह आप जानते ही हैं । कार्य्यारम्भ में उपासना के द्वार! यदि इस प्राण को अपने अनुकूल नहीं बना लिया जाता, तो वह आपके लिए अप्रतिष्ठा का कारण बनता हुआ आप के उस कर्म्म की प्रतिष्ठा ही उच्छिन्न कर देता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर महर्षि कहते हैं— नि षु सीद गणपते! गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम् । न त्वत् क्रियते किञ्चनारे महामर्क मघवञ्चित्रमर्च । --ऋक्सं ० १०।११२६ ८०७

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द्वितीयाध्याय प्रथम काण्ड चतुथब्राह्मण भूपिण्ड के पृष्ट मे आरम्भ कर सौरसंस्था - पर्यन्त ये ४६ मरुत् व्याप्त हैं यह पूर्व में बतलाया जा-चुका है । इनमें प्रथम मरु: गणपति है, एवं उसकी प्रतिष्ठा भूपिण्ड है । क्योंकि यही भूपिण्ड से संल-ग्न रहता है । इतर ४८ प्राणों की प्रतिष्ठा बनता हुआ यह ' मघत्रा ' नाम का गणपतिप्राण सौरत्रैलोक्य की ( स्तम्यत्रैलोक्य की ), एवं तद्गत प्रजा के कम्मों की प्रतिष्ठा है । किन्तु यह भूपिण्ड इस सर्व-प्रतिष्ठा की भी प्रतिष्ठा है । भूषिएड घन - आग्नेय प्राण से युक्त है । ' अग्निर्भूस्थान: ' इस नैगमिक सिद्धान्त के अनुसार सम्पूर्ण भूषिएड अग्निमय है । यह प्राण महाधन है । यही घनाग्नि आगे जाकर तरल - त्रिरल रूप में परिणत होता हु क्रमश: वायु - श्रादित्य नाम से व्यवहृत होता है । पार्थिव -परमाणुओं के अतिशय संगठन से यह पार्थिवरसरूप तेजोमय अग्नि अपनी घनावस्था को छोड़ कर बाहिर निकल कर तरल - विरलावस्थापन्न होता हुआ वायु एवं आदित्य नाम से प्रसिद्ध होजाता है । इसप्रकार एक ही पार्थिव रसरूप अग्नि घन तरल - विरल - इन अवस्थाओं से क्रमशः अग्निः वायु- श्रादित्य, इन तीन स्वरूपों में परिणत होजाता है, जैसाकि अनुपद में ही आख्यान - रहस्य में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । तेजोरसरूप पार्थिव अग्निरस की इह्रीं तीन अवस्थाओं को लक्ष्य में रखकर वाजिश्रुति कहती है--" आपो वा अर्कः । तद्यदपां शर आसीत् तत् समहन्यत । सा पृथिव्यभवत् । तस्यां ( पृथिव्यां श्रश्राम्यत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्चताग्निः । स त्रेधात्मानं व्याकुरुत - आहित्यं तृतीयम् । वायुं तृतीयम् । स एष प्राण: ( प्राणाग्निः )

त्रेधा विहितः " ( शत ० १० कां ०।४ प्र ० । ६ त्रा ० २ - ३ - कं ० ) इति ॥

पार्थिवमंस्था का रस यही घन अग्नि है । इसी घनाग्नि पर उपर्युक्त प्राणमूर्ति गणपतिप्राण आरूढ हैं । शारीरिक मल पार्थिव घनाग्नि है । उसी में तो हमने गणपतिप्राण की सत्ता बतलाई है । यही अवस्था आधिदैविक मण्डल की समझिए । ' यदेवेह तद्मुत्र ' यह सर्वपरीक्षित, अतएव निर्भ्रान्त सिद्धान्त है । मृण्मय भूपिण्ड गणपतिप्रारण का वाहन है । मृएमय रसाग्निरूप इसी घन पार्थिवप्राण से ( जो कि गण— पतिप्राणा का वाहन है ' मूषक ' का अन्तरात्मा बनता है । इतर प्राणियों की अपेक्षा इस मू में यह पार्थिव घनप्राण अत्यधिक मात्रा में रहता है । इसी घनप्राण के प्रभाव से मूषक जैसा अल्पकाय एक छोटा सा प्राणी अपने दाँतों से वज्रसमान कठोर वस्तु को भी छिन्न भिन्न कर डालता है । भूपिण्ड के ऊपर की मिट्टी वायु से श्लथ रहती है, ढीली रहती है । श्रागन्तुक तृण - मल - श्रादि से भूपिण्ड के ऊपर का दृश्य स्तर उस घनाग्निरस से वञ्चित रहता है । इसी प्राण के प्रभाव से ऊपर की मिट्टी टोस नहीं होती आप उस ऊपर के स्तर को हटाकर भूपिण्ड से जितने गहरे जायेंगे, अधिकाधिक घनाग्निप्राण उपलब्ध होगा । साथ ही वहाँ की मिट्टी भी घन मिलेगी । बालूरेत के समान उस मिट्टी के परमाणु आपको ढीले न मिलेंगे, श्रपितु परस्पर संश्लिष्ट मिलेंगे । यही कारण है कि, घनप्रारण से कृतात्मा मूषक भूस्तर पर न रहकर भूपिण्ड के भीतर गहराई में बिल बनाकर उसी में रहता है । क्योंकि इसे अपना श्रात्मानुकूल जीवनीय रस वहीं, गहराई में हीं उहलब्ध होता है । मूषक भूगर्भ में जिस स्थान ८०८

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण पर अपनी आवासभूमि बनाता है, विश्वास कीजिये! वहाँ की मिट्टी सचमुच उस घनाग्निरस से युक्त है । यही कारण है कि, अग्निहोत्र में जहाँ अग्नि - सम्बन्धी अन्यान्य सामग्रियों का सम्भरण ( संग्रह ) - ग्रहण किया जाता है, वहाँ उसी घनाग्निरस की प्राप्ति के लिए मूषक के बिल की मिट्टी भी ली जाती है, जैसा-कि सम्भारब्राह्मण कहता है-“ अथ - आखुकरीषं सम्भरति । खबो ( मूषकाः ) ह वा अस्यै पृथिव्यै रसं ( अग्निरसं ) त्रिदुः । तस्माचेऽघोऽध इमां पृथिवीं चरन्तः पीविष्ठाः । अस्यै हि रसं विदुस्ते पृथ विस्तत उत्तिरन्ति । तदस्या एवैनमेतत् पृथिव्य रसेन सम-र्द्धयति । तस्मादाखुकरीषं ( मूषकबिलमृत्तिका ) सम्भरति " शत ० २ कां ० १ | १ | ७ | इति । पूर्वप्रतिपादित भूपिण्डम्थ गणपतिप्राण जब स्वप्रतिष्ठा से च्युत होजाता है, तो आपको यह जानकर आश्चर्य्य होगा कि, उसका प्रथमाघात इसी मूपकजाति ( चूहों ) पर होता है । गणपतिप्राण के उखड़ जाने से पार्थिवप्रजा का मूलप्राण विचालित होजाता है । महामारी, जनपद विध्वंसिनी आदि व्याधियों का प्रवाह प्रक्रान्त होजाता है । मूषकप्राण श्रस्मदादि की अपेक्षा गणपतिप्राण के प्रति सन्निकट है । अतः इस व्याधि का प्रथमाक्रमण इसी का होता है । महामारो के आरम्भ में पहिले चूहे ही मरने लगते हैं । यदि किसी राष्ट्र में, नगर में, ग्राम में, अथवा घर में मूषक अपने आप मरने लग जाते हैं, तो मान लीजिए, उस राष्ट्र - नगर -ग्राम - चर का शान्ति - विधाता गणपतिप्राण उच्छिन्न होगया है । शीघ्र ही यहाँ कोई महासंकट आने वाला है । तत्काल वैदिकरहस्यवेत्ता ब्राह्मणों को बुलाकर वहाँ शान्त्यर्थ ' गणपतियाग ' कराना चाहिए । गणपति की प्रतिष्ठा अग्निरस है । वह अग्नि पर प्रतिष्ठित है । उधर अन्य दिशाओं की अपेक्षा दक्षिण दिशा में अग्नि का अधिक प्राबल्य है । यही कारण है कि, ओर ओर दिशाओं की भांति दक्षिण देशों में दत्तात्रेय आदि की भाँति गणपति देवता की उपासना विशेष समारम्भ से मनाई जाती है । ' पूना ' का गणपति - उ - सत्र तो सर्वथा ही द्रष्टव्य है । प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि, इसी प्रतिष्ठाप्राण को लक्ष्य में रखकर निदानविद्या के आचायोंनें मूषक को गणपतिदेवता का वाहन माना है । ' मूषक ' से तद्गत घनप्राण हीं अपेक्षित है । घनप्राण वास्तव में पूर्वकथनानुसार गणपति का वाहन है । यह गण-पतिप्राण प्रतिष्ठाप्राण को पकड़ने से गृहीत होजाता है । रहस्यवेत्ता महर्षियोंनें विज्ञानदृष्टि से यह पहिचाना कि, भूपिण्ड के गर्भ में रहने वाली ठोस ( पीली ) मिट्टी में जो घनाग्नि प्राण है, उसी पर गणपतिप्राण प्रतिष्टित रहता है । इसी रहस्य को देखते हुए उन्होंने गणपति की आराधना में इसी मिट्टी को प्रधानता देदी । पीली मिट्टी में वह प्रतिष्ठाप्राण विशेषरूप से विद्यमान है । आप व्यापक गणपतिप्राण की मन्त्र के द्वारा भावना कीजिए, ' मनो वै देवा मनुष्यस्याजानान्ति ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार गणपतिप्राण श्रवश्यमेव मन्त्रशक्ति के प्रभाव से अपनी इस प्रतिष्टा भूमिरूप मिट्टी की डली में प्रतिष्ठित होजायगा । इसी भाव के लिए विद्वान् ब्राह्मण प्रकृति के इन सम्पूर्ण रहस्यों को 5०६

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द्वितीय व्याय प्रथमका एड चतुर्थब्राह्मगा जानता हुआ एक मिट्टी की डली सामने पट्टे पर रखता है, और बोलता है - ' गणपतिमावाहयामि ' ( मैं इस गणपतित्राहरूप मिट्टी में गणपति को स्वात्मशक्ति समन्त्रिता ( श्रद्धासमन्धिता ) मन्त्रशक्ति से युक्त कर प्रतिष्ठित करता हूँ ) । हाँ, एक बात और ध्यान में रखिए । आवाहन से पहले ' अथ ध्यानम् ' इस शास्त्रीय मय्यांदा के अनुसार सर्वप्रथम उपासक गणपति का ' वक्रतुण्ड महाकायं सूर्य्यकोटिसमप्रभम् ' इत्यादिरूप से गणपति का ध्यान करता है । अनन्तर - ' गणानां त्वा गणपति हवा-महे ' इत्यादि रूप से ' आवाहन ' करता है । जब आवाहन - प्रक्रिया से सचमुच गणपतिप्राण जाता है, तो श्रासनम्, पायम्, अर्ध्यम, आदि उपचारधम्मों का क्रमशः अनुपालन कर आगत प्राणदेवता को प्रसन्न किया जाता है । ध्यान का तात्पर्य यही है कि, गणपतिप्राण नीरूप है । उसका कोई भौतिक आकार नहीं है । बिना कारग्रहण के मन देवता की ओर अनुगत नहीं होसकता । अतः प्राणगत भिन्न भिन्न उन नीरूप शक्तियों के स्वरूप को मन में संस्काररूप से प्रतिष्टित करने के लिए ऋषियोंनें तत्तच्छक्तियुत तत्तद्भौतिक पदार्थों को तत्तच्छक्तियों का निदान मान कर कल्पित प्रतिमाएँ चना डालीं हैं, जैसा कि प्रकरण के आरम्भ में ही बतला दिया गया है । जिस देवता को बुलाना है, पहिले उसका स्वरूप उपासक की दृष्टि में आना चाहिए । बिना स्वरूप- ज्ञान के किस का आहावन हो । इसी विप्रतिपत्ति को हटाने के लिए आवाहन से पहिले ध्यान करना आवश्यक होजाता है । अभी गणपति के सम्बन्ध में बहुत कुछ वक्तव्य था । परन्तु प्रकरण प्रकृत - निरूपणीया विषय मर्यादा से बाहिर जारहा है । अतः इस गणपति - प्रकरण को यहीं उपसंहृत करते हुए हम कहना चाहते हैं कि, ' मिट्टी की डली ' को वाहन का निदान मानना, मूषक को वाहन मानना भी कुछ रहस्य रखता है । हमारा निदान भी ( कल्पित भी ) सत्यांश से युक्त रहता है । निदर्शनमात्र है - हमारा उपासनाकाण्ड केवल निदानविद्या के आधार पर ही अवलम्बित है । किसी देवता के ४ हाथ, किसी के किसी देवी के ६४, किसी के हाथ में खड्ग किसी के हाथ मेंधनुष, किसी के हाथ में कर्त्री, किसी मूर्ति का स्वरूप शान्त, किसी का महा उग्र, ये सत्र रहस्य आप तत्रतक नहीं ममझ सकते, जबतक कि निदानशास्त्र का आप साङ्गोपाङ्ग अध्ययन न करलें । बड़े दुःख के साथ कहना पड़ता है कि, साहित्य के बीरशत्रु नरराक्षसों के प्रकाण्ड - ताण्डवों से जैसे भारतीय धनुर्विद्या, विमानविद्या, रहस्यशास्त्र, गाथाशास्त्र, आदि शास्त्र अग्निदेव में हुत होगए, वैसे ही उपासना का सर्बस्व-भृत निदानशास्त्र भी ग्राम हम से पराः परावत होगया है । तदपि ब्राह्मणग्रन्थों में कहीं कहीं निदान का उल्लेख मिलता है । उसी के आधार पर हमने आपके सम्मुख निदान का कुछ स्वरूप रक्खा है । आज इस निदान रहस्य को न जानने के कारण ही हमारे नवशिक्षित भारतीय युवक, ( और अतो सभी ) उपासना-काण्ड पर आक्षेप करने में हीं अपने आपको मत्यज्ञानवेत्ता मानने का अभिमान कर रहे हैं । वस्तुतस्तु केवल नवशिक्षितों के मत्थे ही यह दोष मँढना अन्याय होगा । प्रधान दोषी हैं ब्राह्मण, ब्राह्मणों में भी साक्षर त्राह्मण, साक्षरों में भी विद्वान, विद्वानों में भी उपदेशक, इनमें भी धर्मा-चार्य 1 जिन भूदेवोंके हाथों में धर्म की बागडोर थी, कालमहिमा से जो समय समय पर जनता में फैली हुई अधर्मभावनाओं को उखाड़ कर धर्मश्रद्धा को पुनः स्थापित करने के जन्मसिद्ध अधिकारी थे, आज वैदिक-८१०

पृष्ठ 547

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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थबाह्मण साहित्य के अनुशीलन के प्रभाव से वे स्वयं इन रहस्यों से कोसों दूर हट गए हैं । आज ऐसे ही उपदेशक हमें कथा सुनाते हैं । ऐसे ही धर्माचायोंनें धर्म की बागडोर अपने हाथ में ले रक्खी है । अपनी विलास-लीलाओं में निमग्न, सनातनधर्म्म को कलङ्कित करने वाले, धर्म के ब्याज से राष्ट्रोन्नति के घातक, अध-अन्याय - अत्याचार प्रान्तीयता श्रादि संकुचित वृत्तियों का प्रचार करने वाले राष्ट्र के ये अन्यतमशत्रु ' शास्त्र ’ के नामच्छल से भावुक जनता को, उस अबोध भोली जनता को ( प्रबलबंग से स्वयं गिरते हुए - ) लक्ष्यच्युत बना रहे हैं । किसलिए गरीब जनता की अतुल सम्पत्ति आज देवालयों में समर्पित होती है? । क्यों लाखों रुपय्यों का दान इन मठाधीशों के चरणों में अर्पित कर दिया जाता है? । धर्मरक्षा के लिए । धर्मसम्बन्धी सन्देहों को दूर करने के लिए । भगवान् को साक्षी बनाकर क्या सनातनी - जनता यह कहने के लिए सन्नद्ध है कि, सचमुच हमारे दान का क्या सदुपयोग होरहा है? | क्या सचमुच हमें सत्यमाग बतलाया जारहा है? | सह संस्मरणीय, एवं सर्वात्मना अविस्मरणीय है कि, आज तो कुछ पढ़े लिखे ही धर्म्म की निन्दा करते हैं | परन्तु कुछ दिन हतभाग्य सनातनी - जगत् इसी नाशकारिणी रूढ़ि का अनुवर्मा और बना रहा, तो धर्म्मके नामसे भी लोगों को घृणा होने लगेगी, और सभी के लिए धर्म सर्वथा निरपेक्ष ही बन जायगा । इधर कुछ काल से ' समाज ' नामकी एक संस्था सत्यप्रचार के लिए खड़ी हुई है । उसका ऐसा उद्घोष है कि, वेद ही एकमात्र सत्यज्ञान की निधि है । पुराण- ज्योतिष आदि सब मिथ्या हैं, कपोलकल्पित हैं । कहना न होगा कि, वेद की ओट में आजाति का आधर्म का जैसा विनाश इस अभिनिविष्टा जाति से हुआ है, वैसा सम्भवतः और किसी से नहीं हुआ ॥ सनातनधम्म समझते नहीं, परन्तु मानते हैं । यहाँ तो समझने के साथ साथ मानना भी नष्ट होगया । अपने सभामञ्चों पर श्राज निदान विद्यामूलक उपासना काँड को अवैदिक - अशास्त्रीय बतलाने का अक्षम्य अपराध करने का साहस किया जारहा है । “ देखो सनातनियों के गणेशजी तो इतने मोटे और उनका वाहन छोटासा चूहा - देखो इन पोपोंकी पोपलीला - पोली मिट्टी को गणेशजी मानकर यह धूर्त्त पैसा ठग रहे हैं " इसप्रकार के कुतर्कों से अहर्निश धर्म्म को, उस वैज्ञानिक धर्म्म को कोसा करते हैं । श्रद्धालु सनातनधर्मी क्षुब्ध हैं । धर्मं के स्तम्भभूत धर्माचार्य्यं विलासलीला में पत्त हैं । विद्वान् नामको कलङ्कत करने वाले ब्राह्मण प्रमत्त - मद-गर्वित - सरस्वती के अन्यतमशत्रु धनिकों की श्राराधना में, एवं विलासनिमग्न सामन्ततन्त्रों की अभ्यर्थना में ( राजभक्ति में ) निमग्न हैं | अटक से कटक, और कन्याकुमारी पर्यंत आज धर्मवृषभ पर सर्वत्र इसप्रकार खड्ग प्रहार ही होरहा है । न आज सत्यज्ञान के प्रचार के लिए क्षेत्र, न सत्यवक्ता को कहीं श्राश्रय, न वैज्ञानिक साहित्यप्रकाशन के लिए आज सम्पन्नों, तथा सत्ताधीशों के कोश में द्रव्य । इत्थंभूत सांस्कृतिक – धार्मिक - अधःपतन जैसे प्रकान्त घोरघोरतम भयावह युग में ऋषिवंशज नैष्ठिक ब्राह्मर्णो का एकमात्र यही कर्त्तव्य शेष रह जाता है कि, राष्ट्रीया मूलसंस्कृति, एवं तन्मूलक धर्म के सम्बन्ध वे कालपुरुष की आराधना करते हुए सत्यज्ञानाराधन के सम्मुख सभी प्रकार की विघ्नबाधाएँ सहते हुए अपने स्वाध्यायव्रत पर ही अनन्या नेष्ठा से आरूढ होजाएँ । सम्भव हीं नहीं, अपितु निश्चित है कि, तद्विधा निष्ठा में इन स्वाध्याय निष्ठों को आपत्ति - परम्पराओं का ही प्रातिथ्य स्वीकार करना पड़ेगा । किन्तु यही इनका महान् पुरस्कार माना जायगा, जिस के आधार पर ही राष्ट्र में पुन: वह सांस्कृतिक जागरण सम्भव बन ८११

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 548 का मूल पृष्ठ
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थब्राह्मण सकेगा, जो कि विगत तीन सहस्र वर्षों से साम्प्रदायिक - वाद - परम्परा - निग्रह से अभिभूत ही होता आरहा है । तथोक्त निदर्शनों से विज्ञ पाठकों को यह भलीभाँति विदित होगया होगा कि, अन्तरिक्ष्य श्रायप्राणमूर्ति असुर, एवं मृद्गत प्राणरूप असुर, दोनों हीं अमूर्त हैं । ऐसे नीरूप असुरप्राण के वधके लिए किसी मूर्त पदार्थ को मध्यस्थ बनाना यावश्यक है । चिना भौतिक निदान के यहाँ की वधप्रक्रिया यथावत् समन्वित नहीं हो-सकती | हमारा यह ‘ स्तम्बयजु ' ( कुशमुष्टि ) इसी प्राणमूर्ति असुर का निदान है । इस पर स्पय का प्रहार करना असुर पर ही प्रहार करना है । दृष्टि इस पर है, एवं भावना असुरवध की और है । यही तो निदान है । भूपिण्ड के जिस प्रदेश पर अध्वयु " वेदि बनाने वाला है, वहाँ वह उत्तराय ' कुशमुष्टि ' बिछा देता है | यह कुशमुष्टि उस वैदिरूप भूप्रदेश को श्रावृत कर लेती है । कुशमुष्टि ने भूप्रदेश को क्या प्रावृत कर रक्खा है, असुरोंनें हीं इसे आवृत कर रक्खा है । कुशमुष्टि को वैदिकभाषा में ' स्तम्ब ' कहा जाना है । इस स्तम्बरूप नैदानिक असुर पर स्पयरूप वज्र से मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु प्रहार कर, प्रहार से छिन्न - भिन्न स्तम्ब को, एवं उखड़ी हुई मिट्टी को उत्कर में प्रक्षिप्त कर देता है । जिस मन्त्र से इस ' स्तम्ब ' का ' हरण ' होता है, वह यजुर्म्मन्त्र इस कर्म का देवता बनता हुआ ' स्तम्बयजु ' नाम से व्यवहृत होता है । तम्ब इस यजुसे अभिन्न है, अतः इस स्तम्ब ( कुशमुष्टि ) को भी ' स्तम्बयजु: ' इस नामसे व्यवहृत किया जाने लगा है । इस स्तम्बयजु हरण किया जाता है, अतएव इस कर्म को यज्ञरहस्यवेत्ता ' स्तम्बयजुर्हरण ' नाम से व्यवहृत करते हैं । यह स्तम्बय जुर्हरण निदानेन ' असुरनिरसन ' व्यापार ही है । अर्थात् स्तम्बयजु का इस स्थान से हरण करना असुरों को ही इस वेदिस्थान से बाहिर निकालना है । स्तम्बयजु के इसी निदानभाव को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-" तदेतनिदानेन यत् स्तम्बयजुः ” यह स्तम्बयजुर्हरण किया क्यों जाता है? इसका उत्तर है – ' देवाननु विधा वै मनुष्याः - ' यद्व देवा यज्ञेऽकुर्वस्तत् करवाणि । भौमित्रिलोकी के स्वर्ग प्रदेश में रहने वाले मनुष्यदेवताओंनें अपनी दिव्यदृष्टि से उस प्राकृतिक नित्ययज्ञरहस्य को देख कर तदनुसार उहोंनें यज्ञ का वितान किया । इन भौम-देवताओं से यह यज्ञविद्या भारतवर्ष के महर्षियों ने प्राप्त की । भौमदेवताओं के यज्ञ में असुर निरन्तर आक-मण किया करते थे, जैसाकि आगे के ' देवासुरदाय विभागो पाख्यान रहस्यब्राह्मण ' में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । जिसे ग्राज ' एशिया ' कहा जाता है, वही किसी समय ' भौमत्रैलोक्य ' नाम से प्रसिद्ध थी । असुरप्राणकृतात्मा असुरमानव, एवं देवप्राणकृतात्मा देवमानव इन दोनों में ( प्रकृतिवत् ) परस्पर सदा स्पर्द्धा चलती रहती थी । देवता बुद्धिमान थे, परन्तु निर्बल थे । उधर असुर बलवान थे, किन्तु बुद्धिशून्य थे । एशियामाइनर में रहने वाले स्वयम्भू प्रजापति इन दोनों का ही निग्रह, अनुग्रह किया करते थे । यद्यपि प्रजापतिने असुरों को ज्येष्ठपुत्र समझ कर संख्या, एवं बल में भी देवताओं की अपेक्षा विशेष समर्थ जानकर, भविष्य के कलह को शान्त करने के लिए इहें दायविभाग में अधिक भूप्रदेश दिया था । अफ्रीका, अमेरिका, युरोप, ये असुरों को मिले थे, एवं सुप्रसिद्ध एशिया खण्ड देवताओं को मिला था । कहना न होगा कि, एशियाखण्ड के वर्गमील अफ्रीकादि उपर्युक्त तीनों खण्डों के भूप्रदेशों के वर्गमीलों के समतुलन में कुछ भी नहीं है । यह सब कुछ तो ठीक ठीक हुआ । पिता स्वयम्भू ने पहिले ८१२

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द्वितीयअध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राहाण से ही इन ज्येष्ठ भ्राताओं का अधिक सम्मान कर दिया था । परन्तु स्वयम्भू प्रजापति का यह सम्पूर्ण प्रयास आगे जाकर सर्वथा व्यर्थ ही निद्ध हुआ । क्योंकि असुर बड़े भाई थे उनकी तृष्णा भी बड़ी थी । उधर देवता बुद्धिमान तो थे, परन्तु भौतिकवल का उनमें प्रभाव था । यही कारण था कि, ये ज्येष्ठभ्राता अपनी प्रभूत सम्पत्ति पर सन्तोष न कर कनिष्ठ भ्राताओं को जो कुछ नाममात्र को मिला था, उसे भी अपहृत कर लेना चाहते थे । दुष्टबुद्धि सुर सदा इन पर आक्रमण किया करते थे । उचित, अनुचित, प्रत्येक उपाय से निरन्तर ही वे इई सन्त्रस्त करते रहते थे । इनके आगमन का मार्ग अफ्रीका के दर्रे थे । एशिमाइनर में रहने वाले स्वयम्भू के दर्शन - व्याज से ये एशियाखण्ड में आते रहते थे, एवं तुष्णरूपेण ( गुप - चुप ) आक्रमण कर दिया करते थे । इस आक्रमण के फलस्वरूप प्रयान्तर युद्धों के अतिरिक्त देवता और असुरों में परस्पर १२ महासङ ग्राम हुए थे । ऋग्वेदसंहिता में इन १२ महासङ ग्रामों का बड़ा रोचक वर्णन हुआ है । कहना यही है कि, असुर निरन्तर आक्रमण करते रहते थे एवं देवता अपने बुद्धिबल को यज्ञचल के रूप में परिणत कर इस यश्चल मे हाॅ नष्ट करते रहते थे । एशियाखण्ड को देवताओंनें अपनी ' यज्ञभूमि ' मान रक्खी थी, जैसाकि आगे के ब्राह्मण में स्पष्ट होने वाला है । ' यज्ञभूमि ' नाम से विख्यात इस भौमत्रिलोकी पर एवं इसमें रहने वाले देवताओं पर दुष्टबुद्धि असुर आक्रमण करते रहते थे । देवता अत्यन्त संत्रस्त थे । बड़े प्रयास से वे इन दुष्टों को परास्त कर अपने यज्ञमण्डल से निकालते, कुछ दिनों के अनन्तर ही पुनः ये दुष्ट श्रमण कर बैठते । इस आए दिन की आपत्ति को शान्त करने के लिए, सदा के लिए इहें अनपजय्य बनाने के लिए देवताओं नें एक बड़ा उत्तम प्रकार निकाला । उत्तर दिशा में भूप्रदेश ( मैदान ) बहुत था । अतः अक्रमणकर्ता असुर आक्रमण करके ( छापा मार के ) लूट - मोट कर वहाँ छुप जाते थे, एवं अवसर पाते ही पुनः निकल आते थे । अग्नि ने इन धूर्तों की यह धूर्तता देवी और देवताओं से कहा कि, कोई चिन्ता नहीं, यदि इनको भगकर छिपने का अवसर उत्तर में हीं मिलता है, तो मैं उस मार्ग को रोक लेता हूँ । जिन समय असुर उस ओर से आक्रमण करते हुये अपने यज्ञमण्डल में श्रानायँगे, उस समय दक्षिण का मार्ग तुम रोकना, उत्तर का मार्ग मैं रोकूँगा । इसप्रकार दोनों ओर के मार्ग रुक जाने से ये बचकर भाग नहीं सकेंगे । यों अपन सम्मिलितरूप से आक्रमण कर उड़ सदा के लिए चीणशक्ति कर देंगे । पुनः कभी इनका इस ओर आँख उठाने का साहस न होसकेगा । ऐसा ही हुआ । अग्नि की उपर्युक्ता मन्त्रणा से दोनों ओर से घिरे हुए असुर भागने में असमर्थ होते हुए देवताओं के सम्मिलित आक्रमण से सर्वथा इतनी हो गए हो, अररु नाम का एक असुर देवताओं की आँख बचाकर युलोक की ओर भागना चाहता था । परन्तु अग्नि वहाँ खड़े जो हुए थे । इन की दृष्टि इस भागते हुए अरु पर पड़ी । और उहोनें कहा कि सावधान! यदि उधर गया, तो प्राणों से हाथ धो बैठेगा व लोक हमारा प्रान्त है । वर्हां तुझे जाने का क्या अधिकार है । यदि तू भग कर जाना चाहता है, तो हम दया कर तुझे छोड़ते हैं, चला अपने गोस्थानरूप आलोक की । असुरों के रक्षक श्राप्याणकृतात्मा वरुणदेवता थे । अत पूर्वोक्त आसुर त्रैलोक्य ' वारुण-लोक ' नामसे प्रसिद्ध थे यही मावली [ अबू विभाग ] लोकपाल वरुण के सम्बन्ध से ब्रज, गोष्ठान ( गोस्थान ), आदि नामों से प्रसिद्ध था । अन्ततः अग्निदेव से परास्त होकर अररु को अपने इसी लोक

पृष्ठ 550

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 550 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थत्राझण में भाग कर प्राण बचाने पड़े । इसप्रकार देवताओंने तीनों लोकों से एवं तीनों लोकों के कुछ कुछ प्रदेशों को लेकर निर्मित ब्रध्नस्यत्रिष्टुप् नाम के चतुर्थ लोक से सदा के लिए इन असुरों को निकाल दिया । इसप्रकार भीमदेवताओं स्वयमण्डल से असुरों को निकाला था । इनकी प्रतिकृति पर दी अपने वैयज्ञ का वितान करने वाले भारतवर्षीय ब्राह्मण आज इस स्तभ्वयजुर्हरणा से उसी घटना का स्मरण कर सद्भावना से अदृष्ट · दृष्ट असुरों को नष्ट करते हैं । आनी नाम का ऋत्विक् पूर्वोक्त निदानभाव के अनुसार साक्षात् ' अग्नि ' है । यह आग्नी जो वैदि के उत्तरभाग में जाता है, यह मानो असुरों को रोकने के लिए अग्नि ही उत्तर में जाता है । इधर इतर देवताओं का ' यजन ' करने वाला दक्षिण भाग की ओर प्रतिष्ठित निदान इतर देवताओं का समुच्चय है । वह इधर से मार्ग रोकता है । इसप्रकार निदान के माध्यम से स्तम्बयर्जु'हरण के द्वारा सम्पूर्ण असुर इस यजमान के यज्ञमण्डल से सदा के लिए नष्ट कर दिए जाते हैं । उस समय उन भौमदेवताओंनें उन असुरों को नष्ट किया था, आज यह अध्वर्यु इस प्रत्यक्षकर्म से यजमान के सम्पत्ति के बाधक की शत्रु हैं, 7 उन्हें इस प्रतिकृतिक से नष्ट करता है यजमान का यह निर्विघ्न परिसमाप्त होजाता है । वैदिक आख्यान आठ भागों में विभक्त हैं, जैसाकि पूर्व के प्रोक्षण कर्म में विस्तार से बतलाया जा चुका है । उन आटों में सातवीं उपाख्यान आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक, इन तीनों रहस्यों से सम्बन्ध रखता है | हमारा प्रकृत ग्राख्यान ऐसा ही आख्यान है । इसका तीनों संस्थाओं से सम्बन्ध है । इन तीनों में सुचीकटा इन्याय से इस आख्यान का आधिभौतिक चरित्र आपके सम्मुख रखा गया । अब उसी न्याय से आध्यात्मिक चरित्र की ओर आपका ध्यान आकर्षित किया जारहा है । हमारी अध्यात्मसंस्था में देवता, असुर, दोनों का साम्राज्य है । देवता सूर्य से उत्पन्न होते हैं, एवं असुरों का जन्म पृथिवी ( दिति पृथिवी एवं चन्द्रमा ( कृष्णपक्ष का कृष्णचन्द्रमा ) से होता है । इसीलिए चन्द्रमा को ' एप एव वृत्रो यच्चन्द्रमाः ' ( श ० १ का ० ६/४/१८ ) इत्यादिरूप से ' वृत्रासुर ' कहा जाता है । सौर इन्द्रमय सावित्राग्नि से विज्ञानात्मा ( बुद्धि ) का निर्माण होता है । चान्द्र वृत्रासुर से प्रज्ञा-नात्मा ( मन ) का निर्माण होता है एवं भूपिण्डस्थ आसुरप्राणमय पञ्चीकृत हृदभाग से हमारा पाञ्चभौतिक शरीर बनता है । इसप्रकार शारीरिक जीवात्मा - शरीर, मन, बुद्धि, इन तीन देवासुरविभूतियों से नित्ययुक्त रहता है । शरीर एवं मन असुरों की आवासभूमि है, तो बुद्धि देवताओं का निवास स्थल है । * उस समय तो सचमुच एशियाखण्ड में केवल देवताओं का ही असल राज्य था । परन्तु श्रा तो हमारी भावुकता से भारत भी हमें अपने कोड़ में स्थान नहीं दे रहा । ८१४