Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 551–560
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 551–560
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द्वितीयअध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मणप्र चन्द्रमा भूपिड का उपग्रह होने से सूर्य की अपेक्षा भूपिण्ड का अनुयायी रहता है । अतएव भूषिगडांश - शरीर चान्द्रांशरूप मन को सदा अपनी ओर आकर्षित रखता है । सून्यं हम पार्थिव प्राणियों की अपेक्षाबहुत दूर पड़ता है । चन्द्रमा, एवं चन्द्रमा से भी अधिक भूपिण्ड हमारे समीप पड़ता है । अतः बुद्धि की अपेक्षा शरीर और मन प्रचल रहता है । साथ ही आसुरी विभूति शरीर एवं मन के भेद से अधिक है, एवं दिव्यविभूतिरूपा बुद्धि एकाकिनी ही है । देवता कम है, असुर अधिक, एवं बलवान् हैं । अतएव शारीरिक आत्मा पर प्रायः शरीर और मन का ही प्रभुत्त्व रहता है । प्रज्ञानमन भूतमात्राओं के सम्बन्ध से प्रज्ञामात्रा-रूप में परिणत होता हुआ, इन्द्रियों का सञ्चालक बनता हुआ सांसारिक रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्दादि विपय का प्रभु बना रहता है । इसप्रकार श्रात्मा मन के वशवर्ती होकर सदा विषयों का ही अनुगामी बनता हुआ अपने दिव्यस्वरूप से श्रावृत होता रहता है । मनोमय श्रात्मा सदा शरीर की चिन्ता में हीं निमग्न रहता है । शरीरबल बढ़ाना, शरीर को प्रत्येक प्रकार से सुख पहुँचाना हीं इस का चरम लक्ष्य बन जाता है । परिणाम इसका यह होता है कि, दिव्यज्योति-• जो आत्मा बुद्धिरूप सौर देवताओं की आवासभूमि था, उसमें ये मनोमय - शरीरमय असुर प्रविष्ट हो पढ़ते हैं । इनके आने से आत्मा अपना प्रकाश अभिभूत कर बैठता है । बुद्धिरूप देवता असुरों का यह आक्रमण रोकने की चेष्टा किया करते हैं । मनुष्य जब भी किसी आत्मपतनोत्तेजक विषय की ओर झुकता है, तो बुद्धि रोकती है कि " तुम ऐसा मत करो । परन्तु पूर्वकथनानुसार असुरभावयुक्त मन की प्रधानता इस बुद्धिप्रेरणा को व्यर्थ कर देती है । इसप्रकार मनोमय असुरों के समतुलन में बुद्धिमय देवता पराभूत होजाते हैं । इस आक्रमण से बचने का, आध्यात्मिक असुरों को सर्वथा परास्त करने का एकमात्र उपाय है ' आत्मयाजी ' बनना । आसुर मन जिन विषयों को लेकर बलवान् बनता हुआ दिव्यविभूतियों को परास्त करने में समर्थ होता है, उन विषयों की ओर से कि हटाने से अपने आप आध्यात्मिक अमुरवल घट जायगा एवं बुद्धिचल चढ़ जायगा | देवता जयलाभ कर लेंगे, और असुर परास्त होजायेंगे । शारीरिक अग्नि को उत्तर में प्रतिष्ठित कीजिए । नाभि से ऊपर का स्थान उत्तर है, नीचे का दक्षिण है । इस दक्षिणभाग में अध्ययुरूप वायुमूर्ति व्यान को बलवान् बनाइए, मूलप्रतिष्ठा को दृढ़ कीजिए, उधर से उत्तरस्थ शिरोऽग्नि ( मस्तकस्थ पडङ्ग--वैश्वानर ) का बल बढ़ाइए, दोनों ओर के देवता जब सावधान होकर नियमित आहारविह ररूप आत्म-यश का जिस दिन यथावत् सञ्चालन करने लग जायेंगे, उस दिन अपने आप असुर परास्त होजायेंगे | मिथ्या आहारविहार से, विषयानुसंधान से शारीरिक - आग्नेय देवताओं का बल घट जाता है, असुरों का चल बढ़ जाता है । जो विद्वान् इस आध्यात्मिक यज्ञरहस्य को समझकर आयुर्वेदोक्त नियम से अपनी जीवनयात्रा का निर्वाह करता है, वह कभी भी असुरों को अपने अध्यात्मयज्ञ में प्रविष्ट नहीं होने देता । यह है इस आख्यान का आध्यात्मिक रहस्य अब सर्वप्रधान आधिदैविकरहस्य की ओर ही आपका ध्यान आकर्षित किया जाता है । इस आख्यान का सम्बन्ध ' सागराम्बरा ' नाम से प्रसिद्ध पृथिवी, अन्तरिक्ष, यो, आपः, इस चंद्रलोकात्मिका स्तोम्या पृथिवी के साथ समझना चाहिये । संसार का उपादानतत्व ' शुक ' नाम से व्यवद्धत होता है । इस शुक्र की वाक् आपः अग्निः ये तीन अवस्थाएँ हैं । ये तीनों हीं अमृत मर्त्य भेद से दो - दो ८१५
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द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड शुक्रों से से तो अमृतसृष्टि होती है, एवं मर्त्यं इन्हीं प्रकार के हैं । इन मे अमृतात्मक वाक् आपः में अग्नि पृथिवी संस्था के साथ मर्त्यशुक्र का ही सम्बन्ध समझना मर्त्यसृष्टि का विकास होता है । इन में प्रकृत ओर ' समुद्रमभितः पिन्वमानम् ' इस श्रौत सिद्धान्त के चाहिए । भूपिण्ड स्वयं अग्निमय है । इसके चारों है । इस के चारों ओर बाङमय वेदरूप प्राणस्तर है । उधर से अनुसार चारों ओर श्रापोमय पारमेष्ठ्य समुद्र काश ' कहा जाता है । इस वाकस्तर के ( वाङ मण्डल के ) आइये, सबसे ऊपर बाकस्तर है । इसी के ' पुराण ' कहा जाता है । इस श्रापोमयमण्डल के केन्द्र में भूपिण्ड भीतर आपोमय मण्डल है । इसे ही ' अत्रसमुद्र को तो छोड़ दीजिए । क्योंकि उसका प्रकृत श्राख्यान के साथ है । इन तीनों स्तरों में से सर्वान्त के वाकस्तर भूपिण्ड, आपोमय मण्डल इन दो तथ्यों को लक्ष्य कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है, एवं अवशिष्ट अभिमूर्ति बनाइए । ' अर्द्ध ह वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीद-पूर्वप्रकरणों में यह अनेकधा कहा जाचुका है कि – अमृत मर्त्य भेद से दो भागों में विभक्त है । ममृतम् ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार यह अग्निप्रजापति है । अमृताग्नि को ' देवता ' कहा जाता है, एवं मर्त्याग्नि को अमृताग्नि प्राणरूप है, एवं मत्यग्नि भूतात्मक की चितिमात्र हैं । अतएव पिण्डात्मक इस मर्त्य अग्नि को ' भूत ' कहा जाता है । स्वयं भूपिएड भूताग्नि में अग्नि, आप दोनों हैं । पानी, एवं अग्नि के संघात से ही ' चित्याग्नि ' कहा जाता है । इस चित्याग्नि को लक्ष्य में रखकर जहाँ इस भूपिण्ड के लिए ' अद्भ्यः भूपिण्ड का निर्माण हुआ है । पानी की उपादानता ( मत्यग्नि की ) उपादनता को लक्ष्य में रखकर इस के लिए पृथिवी ' यह कहा जाता है, कहाँ अग्नि की के केन्द्र से वह प्राणाग्नि वद्ध रहता है । यद्यपि ' अग्निर्भु स्थान: ' यह कहा जाता है । इस निष्पन्न मर्त्याग्निपिएड नहीं होजाता, तत्रतक इस प्राणाग्नि को प्रतिष्ठित होने का प्राणाग्नि नित्य है । परन्तु जत्रतक भूपिण्ड निष्पन्न होजाता है, तभी उसके हृदय में इस अमृताग्नि के अवसर ही नहीं मिलता । जब चित्य भूपिण्ड निधीयते ' इस व्युत्पत्ति को लक्ष्य में रखकर इस अमृताग्नि निधान का अवसर आता है । तव चिते जाता है । को ' चितेनिधेय ' नाम से व्यवहृत किया प्राणरूप गतिधर्म के कारण राममण्डल का यह प्राणाग्नि ÷ भू पण्ड के केन्द्र में प्रतिष्ठित होकर अपने ' है । यही मन्त्रसंहिता में प्राणाग्नि का नाम ' तेजोरस सम्पादन करता हुआ उत्तरोत्तर आगे चलता है । इसी अङ्गिरा वस्तुत: भूपिण्ड की वस्तु नहीं है । अपि ' अङ्गिरा ' नाम से व्यवहृत हुआ है । यह प्राणाग्निरूप भूपिण्ड में प्रतिष्ठित होजाता है । ' प्राणः प्रजानामुदय-सौर इन्द्रमय सावित्राग्नि मूर्य से प्रयुक्त होकर इस मम योनिरग्नेः समुद्रमभितः पिन्वमानम् । || वर्द्धमानो महाँ आ च पुष्करे दिवा मात्रया वरिम्णा पथस्व - यजुः स ० १७,२६ । हिंकार - प्रस्ताव - उद्गीथ - प्रतिहार -÷ वाकूपिण्ड रूप ऋक् पर श्रारूढ होकर महिमामण्डल यह सामात्मक का प्राण अधिष्ठाता कैसे बनता है?, इस विषय का निधन, इन पाँच मुख्य पर्वों में परिणत होकर विज्ञान माध्य के ' सामप्रपाठक ' नाम के द्वितीय प्रपाटक में विशद समाधान ' छान्दोग्य उपनिषद् - हिन्दी देखना चाहिये | ८१६
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द्वितीय अध्याय शितपथबाह्मण चतुथब्राह्मण त्येष सूर्य्य: ' इस सिद्धान्त के अनुसार यह सौर अग्नि- ' प्राण ' नाम से व्यवहृत होता है । यह तक प सौरमण्डल में प्रतिष्ठित रहता है, तत्रतक तो आकर्षण शक्ति - प्रधान रहता हुआ, पार्थिव पदार्थों का आदान करता हुआ यह ' आदित्य ' नाम से व्यवहृत होता है । एवं यही प्रवर्ग्य - सम्बन्ध से मण्ड में प्रतिष्ठित होकर ' श्रङ्गिरा ' नाम से व्यवहृत होने लगता है । पार्थिव भौतिक श्लथ परमाणुओं का विवरण ( संघटन ) करना ३ म अङ्गिराप्राण का ही मुख्य कार्य्य है । उस एक प्राण की विवरणशक्ति से सम्पूर्ण पार्थिव परमाणु परस्पर आवद्ध रहते हैं । पार्थिव परमाणु अङ्ग है, यह श्रङ्गी है । श्रङ्गी बन कर यह प्राण स्वतेजोभाव के कारण उत्तरोत्तर विशकलित होता हुआ ऊपर जाता है, ऊत्तरोत्तर विस्रस्त होता रहता है । अतएव ' अङ्गानि यस्य सोऽङ्गी, श्रङ्गी भूत्वा रसति - प्रतत्रति - वितस्तो भवति ' इस व्युत्पत्ति से इसे ' अङ्गिर ' कहा जाता है । यहाँ श्राकर भूलोक की वस्तु बन कर लोक की ओर जारहा है । उधर से सूर्य से निकलने वाला श्रादित्यप्राण निरन्तर चारों ओर जाता हुआ भपिएड की ओर भी आ रहा है । जाते हुए अङ्गिरा एवं आते हुये श्रादित्य का अन्तरिक्ष में तानूनन्त्र ( सम्बन्ध - मुठभेड़ ) होता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर ' श्रादित्याश्च हवा अङ्गिरसश्च अस्पर्द्धन्त - वयं पूर्वमेष्यामः - वर्य पर्वमेष्यामः ' यह कहा जाता है । कहना यही है कि, यह अङ्गिराग्नि आगन्तुक है 1 | प्रवर्ग्य - सम्बन्ध से जिस मार्ग से आकर यह भूकेन्द्र में प्रतिष्ठित हुआ । था, ठीक उसी मार्ग से पुन: अपने द्युलोक में चला जाता है 1 । अङ्गिरा के इसी प्रगति गति विज्ञान को लक्ष्य में रखकर
मन्त्रश्रुति कहती है-इत एत उदारुहन् दिवः पृष्ठान्यारुहन् ।
प्रभुर्जपो यशापथि द्यामङ्गिरमो ययुः ॥
- मामसंहिता पू ० ११२ यह प्राणाग्निरूप अङ्गिरा बाहिर निकल कर जहाँ जाके अपनी गति समाप्त करता है, वहाँतक का एक मण्डल बनता है । किसी समय ( श्रादित्यावस्थाकाल में सौरप्राण के श्रागमनकाल में ) अङ्गिरा सु की वस्तु रहा होगा | परन्तु श्राज इस भूपिएडके केन्द्र से निकलकर चारों ओर अपना एक स्वतन्त्र मण्डल बनाता हुआ तो यह पृथिवी की ही वस्तु माना जायगा । अतएव आपको यह भी मान लेना पड़ेगा कि, जहाँतक इस ङ्गि-प्राण की व्याप्ति है, वहाँतक का सम्पूर्ण भाग ' पृथिवीलोक ' ही है । सच पूँछिए, तो पृथिवीलोक का समर्पक यह अङ्गिराप्राण ही है । क्योंकि ' पृथिवी ' शब्द का निर्वचन करते हुए ऋषियों ने ' यद्प्रथयत - सा पृश्थित्री ' यह कहा है । यह प्रथन फैलाव है । भूपिण्ड का फैलाव नही होता, अपि तु पिडस्थ प्राणाग्नि क । ही फैलाव होता है । वही ' अप्रथयत् ' का अधिकारी है । अत: हम इसे ही पृथिवी, किंवा पृथिवीका स्वरूप सर्मपक कर सकते हैं! भूपिण्ड पिण्ड है, एवं पृथिवी मण्डल है । भूपिण्ड भूतप्रधान है, एवं पृथित्रीमण्डल प्राणप्रधान है जो प्राणाग्नि भूपिण्ड के केन्द्र से निकल कर भूपिण्ड के पृष्ठ पर्य्यन्त व्याप्त है, उसे तो भूपिण्ड में ही अन्तर्भुत मान लीजिए, एवं भूपृष्ठ से आगे चलिए । पृष्ट से परिधि पर्य्यन्त व्याप्त इस प्राणाग्नि की धन- तरल - विरल- ये तीन अवस्थाएं होजाती हैं । जहाँतक घन अग्नि रहता है, वह प्रदेश वाङ्मयस्तोम की अपेक्षा से त्रिवृत्स्तोम कहलाता है । इस में अग्नि की घनावस्था, किवा घनावस्थापन प्राणाग्नि प्रतिष्ठित रहता है । जहाँतक तरल अग्नि व्याप्त रहता है, वह प्रदेश पचदशस्तोम नाम से व्यहृत होता है । एवं जिस प्रदेश में विरल - अग्नि प्रतिष्ठित रहता है, वह एकविंशस्तोम कहलाता है । इसप्रकार उस पृथिवी-
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द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड चतुथब्राह्मण मण्डल में त्रिवृत, पश्चदश, एकविंश, वे तीन स्वतन्त्र प्रदेश मन जाते है F इसी आधार पर तो ' एकं सत् त्रेधात्मानं व्याकुरुत ' यह कहा जाता है । त्रिवृ प्रदेश में अग्नि स्वस्वरूप से विकसित है । अग्नि को ' भूस्थान ' कहा जाता है । अतएव इस त्रिवृस्तीमरूप घनाग्निलोक को ( उस ' महापृथिवी ' में अन्तर्भुक्त ) ' पृथिवीलोक ' कहा जाता है । ६ से १५ पर्य्यन्त के पञ्चदशस्तोम में अग्नि तरल बनकर वायुरूप में परिणत होजाता है | वायु के सम्बन्ध में यह प्रदेश ' अन्तरित ' नाम से व्यवहृत होता है । १५ से २१ - पर्य्यन्त का एकविंशस्तोमात्मक प्रदेश विरल अग्निरूष आदित्य की प्रतिष्ठाभूमि होने से ' लोक ' कहलाता है । तात्पर्य्य इसका यही है, कि पार्थिव अग्नि ज्यों ज्यों ऊपर बढ़ता है, त्यों त्यों वह सूक्ष्म होता जाता है । इसी का तो नाम वितान है । भूमि से २१ में अहर्गण पर सूर्य है उस स्थान पर पहुँच कर यह आनि-रस अनि सौर आदित्यधम्मों से संश्लिष्ट होकर स्वयं भी आदित्यरूप ही बन जाता है । जिस पर आप बैठे हैं, वह ' भू ' है । सूर्य्यपिण्ड ' स्त्र ' है । भूपिण्ड, एवं सूर्य्यपिण्ड का अन्तराल प्रदेश ' भुवः ' है । ' भू ' चित्यग्निमय है । अन्तरिक्ष मरुद्वायुमय है । एवं सूर्य्यपि साबित्राग्निरूप आदित्यमय है । इस त्रिलोकी को रुद्राग्नि के सम्बन्ध से ' रोदसी ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । प्रकृत में इस त्रिलोकी का कोई सम्बन्ध नहीं है । अपितु रोदसी त्रिलोकी का जो एक भूपिण्डात्मक भूलोक है, उसमें प्रतिष्ठित जो पार्थिव अङ्गिराप्राण है, उसी के वितान से रोदसी त्रिलोकी से अपनी सर्वथा स्वतन्त्र सत्ता रखने वाली जो स्तोम्यत्रिलोकी है, उसीका यहाँ सम्बन्ध है । स्तौम्यनिलोकी एक महापृथिवी है । इस महापृथिवी के गर्भ में त्रिवृत - पञ्चदश- एकविंश - भेद से तीन लोक है । जहाँ रोदसी त्रैलोक्य के लोक भूः भुवः स्वः इन नामों से व्यवहुत होते हैं, वहाँ इस स्तोम्यत्रिलोकी के तीनों लोक पृथिवी, अन्तरिक्ष, यो इन नामों से प्रसिद्ध है । इस सर्वथा निभाक्क लोक-व्यवस्था के रहम्य को न जानकर यज्ञ मनुष्य भू आदि का पृथिवी आदि के साथ परम्पर पर्य्याय सम्बन्ध समझा करते हैं । यदि द्यु और - स्त्रः एक ही वस्तु होती, तो — ' त्रि च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो, स्वः ' यह कैसे कहा जाता? | प्रकृत विषय यही है कि सौम्यलोकी एक महापृथिवी है इसका आभार भूपिण्ड है । भूपिण्ड का केन्द्रस्थ ग्रात्मा मनःप्राबाङमय है । यह आत्मवाक् जहाँतक जाता है, वह मण्डल ‘ वषट्कार ' कहलाता है । वाक् गीतत्त्व है । ये सहस्र हैं । --३०-३० गौ का एक एक अहर्गण होने से ३३ ग्रहण होजाते हैं । अवशिष्ट १० वाँ चतुस्त्रिश प्रजा-पति है । इनमें २ अहगंगों का योग तो पिण्डम् ना में होजाता है । शेष ३० अहर्गण भूपृष्ठ से मण्डल की परिधि पन्त व्याप्त हैं मुस्थितीन अर्गों में ६ के योग से त्रिवृत् ( E ), -६ के योग से पञ्चदश ( १५ ), पुनः ६ के योग मे एकविंश ( २१ ), पुनः ६ के योग से त्रिव ( २७ ), पुनः ६ के योग से त्रयस्त्रिंश ( ३३ ) स्तोम का स्वरूप निष्पन्न होता है । पृथिवी के २१ वें अहर्गण पर सूर्य्य है । अभी वाङमयी पृथिवी के ११ अहर्गण अवशिष्ट है । अनि के सम्बन्ध से जहाँ थिवी की सत्ता २१ पर्यंत ( पन्त ) मानी जाती है, वहाँ इस वषट्कार के सम्बन्ध से पृथिवी की सत्ता सूर्य्य से भी ऊपर पर्य्यन्त मानी जाती है । तभी तो पुराण का पृथिवी के पुष्कर द्वीप में सूर्य है ' यह कहना अत्यर्थ बन जाता है ।
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द्वितीय श्रध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण सूर्य्यं को ' अ माँ वा आदित्य एष रथः ' ( शत ० ६ | ४ | १ | १५ ) के अनुसार ' रथ ' कहा जाता है । पार्थिवसाम उपर्युक्त कथनानुसार इस ' सूर्य्यरथ ' का भी तरण कहा जाता है । श्रतएव इस पार्थिवसान को ' रथन्तर ' साम कहा जाता है । जहातक इस रथन्तर की सीमा है, वहाँतक हमारी ' सागरम्बर । ' पृथिवी है । २१ वें अहर्गण पय्यन्त प्राणाग्निस्तर है । एवं ३३ पय्र्यन्त आप स्तर है । तीसरा वेदमय वाक्स्तर गायत्र - टुभ जागत- भात्रापत्र ' छन्दोमा ' नाम के युग्मस्तोमों के सम्बन्ध से ४८ पय्र्य्यन्त जाता है । इसे ही विज्ञानभाषा में ' पारावतपृष्ठ ' कहा जाता है । इसे अप्राकृत समझकर छोड़ दिया गया है । इसप्रकार ' नागराम्बरा पृथिवी में क्रमश: त्रिवत् पञ्चदश- एकविंश त्रयस्त्रिंश - इन चार स्तोमभेदों से क्रमशः पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, आप:, ये चार लोक होजाते हैं । इन चारों में क्रमश: अग्नि, वायु, आदि-त्य, वरुण, ये चार देवता प्रतिष्ठित हैं । घनाग्नि घनता के तारतम्य से आठ भागों में विभक्त है, ये ही आठ वसु हैं ' तरलाग्नि ( वायु ) तरलता के तारतम्य से ११ भागों में विभक्त है, ये ही ११ रुद्र हैं । विर-लाग्नि विरलता के तारतम्य से १२ मार्गो में विभक्त है । ये ही १२ आदित्य हैं । इन तीनों विभिन्न प्राणां के संयोजक नासत्य- दुख नाम के दो प्राण सान्ध्य ( त्रिवृत् पञ्चदश की, एवं पञ्चदश- एकविंश की सन्धि में रहने वाले ) और है । इसप्रकार सम्भूय ३३ प्राण होजाते हैं । एक ही अग्नि अग्नि - वायु - श्रादित्य बना । ये ही तीनों अवस्थातारतम्य से ३३ होगए | इसलिए हम कह सकते हैं कि, सम्पूर्ण देवविवत्त एकमात्र अग्नि में ही अन्तर्भूत है । प्राणाग्नि को पकड़ लीजिए, ३३ सों देवता गृहीत होजायँगे । यही कारण है कि, वायु - इन्द्र - वरुण - नासत्य दुख आदि सभी देवताओं के लिए अग्नि में ही आहुति दे दी जाती है । अग्नि स्वविकलनधर्म से सत्र में तत्तटाहुतिभागों को विभक्त कर तत्तदेवताओं में पहुँचा देते हैं । इसी विज्ञान के आधार पर ' अग्निः सर्वा देवताः - ' अग्निमुखा वै देवाः ’ ' अग्निपुरोगाः सर्वे देवाः प्रीयन्ताम् ' इत्यादि कहा जाता है । भूपृष्ठ से संलग्न रह कर ( २१ ) एकविंश-स्तोम पर्य्यन्त व्याप्त, दूसरे शब्दों में त्रैलोक्य में व्याप्त ३३ भागों में विभक्त इस आग्नेय प्राण ही का नाम ( ' देव ' नामक ) देवता है । इस प्राणाग्नि में सोमाहुति हो रही है । इसी सोमाहुति का नाम यज्ञ है । त्रैलो-क्यरूपा महापृथिवी वेदि है । इस पर देवता यज्ञवितान कर रहे हैं । अग्नीषोमात्मक इसी प्राकृतिक नित्य यज्ञ से प्रजा की रक्षा होरही है, उत्पत्ति हो रही है । उपर्युक्त इह्रीं ३३ यज्ञिय देवताओं का निरूपण करती हुई
मन्त्रश्रुति कहती है-इति स्तुतामो मथा रिशादसो ये स्थ त्रयश्च त्रिंशश्च ।
मनोर्देवा यज्ञियासः ॥
—ऋक् ८ | ३० || उक्त ३३ सों देवताओं का विकासस्थान वही भूकेन्द्रस्थ उक्थरूप प्राणाग्निरूप, अथर्वसंहितादि में ' स्क-म्भ ' नाम से प्रसिद्ध, दैनंदिनगतिका प्रेरक बनता हुआ, तद्द्द्वारा अहोरात्र का सम्पादक बनता हुआ, भूपिण्ड की उत्तर दक्षिण की अन्तिम सीमा में प्रतिष्ठित होकर क्रमश: सुमेरु, कुमेरु, नाम से प्रसिद्ध होता हुआ, उत्तरदक्षिणध्रु वकीलक से नित्य बद्ध रहकर अपने स्थान में हीघूमता हुआ, २४ अंश के व्यासाद्ध से वृत्त बनाकर ४८ अंश के परिसर ( घेर ) में व्याप्त रहता हुआ, अश्वपशु का प्रवत्त ' के ' अक्ष ' नाम से प्रसिद्ध ' प्रजापति ' ही इन ३३ प्राणदेवताओं का प्रजनयिता है । इसी उक्थ से रूप ३३ देवता क्रमशः बितत ८११
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द्वितीयाध्याय होते हुए २१ प्रथमकाण्ड चतुर्थत्राह्मण गंगा पर्यन्त व्याप्त हो रहे हैं । अतः इन देवताओं को हम अवश्य ही ' प्राजापत्य ' ( प्रजा पति की सन्तान - प्रजापतिप्राण के संतनन रूप ) कह सकते हैं । २१ वें अहर्गण के ऊपर हमने आपोलोक बतलाया है । इसमें प्रधानरूप से संवरणधर्म्मा वरुण-देवता का साम्राज्य है । अग्निप्राण विकासशील है, तो यह वरुण मोचशील है । प्रन्थ बोलना प्राणाग्नि का जहाँ स्वरूपधर्म है, वहाँ ग्रन्थि लगा देना वरुण का स्वाभाविक कर्म है । इसी वरुणमण्डल में भृगु का विकास होता है । ' विभ्राणः सन् गच्छति ' के अनुसार जो तत्व अपने संकोचच से वस्तु को अपने उदर में बद्ध करता हुआ चलता है, वही ' भृद्गु ' कहलाता है । ' भृद्गु ' ही देवताओं की परोक्षभाषा में ' भृगु ' नाम से प्रसिद्ध है । अङ्गिरा जहाँ उत्तरोत्तर रसनधर्मा विस् ' शनशील ) था, वहाँ यह भृगु उत्तरी-तर संगठनधर्म्मा है । बाकस मण्डल में हीं इसका विकास रहता है । अतएव इसके लिए ' भृगु वारुणि: ' यह कहा जाता है । जिसप्रकार प्राणाग्निरूप अक्तिराग्नि की घन, तरल " विरल, वे तीन अवस्थाएं हैं, एवं वे ही तीनों अवस्थाएँ जैसे अग्नि वायु श्रादित्य, इन तीन नामों से प्रसिद्ध हैं, ठीक इसी प्रकार इस संकोचधर्म्मा भृगु की भी तथोक्त तीन अवस्थाएँ हैं । इह्रीं तीनों अवस्थाओं को क्रमशः श्रापः- वायुः- - सोम: -इन नामों से व्यवहृत किया जाता है । उक्त अवस्थाश्री के कारण तीनों तत्त्व सर्वथा पृथक पृथक नाम - रूप - कर्म्म वाले बन जाते हैं । आपो-भाग में असुर प्राण प्रतिष्ठित रहता है, वायु में गन्धमाण की सत्ता है, एवं सोम में पितरप्राण रहता है । दूसरे शब्दों में श्रप्यप्राण, वायव्यप्राण, सौम्यप्राण ही क्रमशः असुर, गन्धर्व, एवं पितर हैं । ये तीनों सहजन्मा हैं । अतएव तीनो प्राणों का एक दूसरे के साथ सम्बन्ध रहता है । यही कारण है कि, जहाँ आप्यप्राण को प्रधानरूप से ' असुर ' माना जाता है, वहाँ वायुगत आप्यप्राण के लिए - ' अन्तरिक्षं वा अनुरक्षश्वरति अमूलमुभयतः परिच्छिन्नम यह कहा जाता है अन्तरिक्ष्य वायु में आसुरप्राण रहता है, यह पहले ही कहा जाचुका है । सहजन्मा सोम भी ( पितर भी ) इससे अस्पृष्ट नहीं है । अतएव जबतक सोम पोमण्डल में रहता है, जबतक यह भी ' वृत्र असुर ' ही कहलाता है । इसप्रकार श्रापोरूप भृगु की तीन अवस्थाओं से असुर तीन भागों में विभक्त होजाता है । प्रत्येक आङ्गिरस देवता के साथ अांशिकरूप से त्रिधा विभक इस अन्य असुरप्राण का सम्बन्ध रहता है । देवता ३३ हैं । प्रत्येक में तीन तीन असुर हैं । इसप्रकार देवताओं की अपेक्षा ये त्रिगुणित ( तिगुने ६६ ) होजाते हैं । ये ' असुर जब भी त्रैलोक्य में आक्रमण करते हैं, सर्वत्र अन्धकार होजाता है । रात्रि में बारुणप्राण का पूर्ण विकास है । अतएव रात्रि को ' वारुणी ' कहा जाता है । रात्रि वरुण के सम्बन्ध से ही असुरों की अवासभूमि है । इसके आगमन से अइकालाधिष्ठाता ज्योतिम्य देवता सर्वथा पराभूत होजाते हैं । होता क्या है, इन्द्र दध्यङ अथर्वा की अस्थि का बज्र बना कर इन ६६ असुरों को नष्ट कर देते हैं । ' थ ' पारमेष्ट्य तत्व है । इसी को आपोमय मण्डल कहा जाता है । आप की अवस्था - विशेष को ही ' सोम ' बतलाया गया है । इस सोम की वृत्र, इन्दु पवमान, अप्तु आदि १० प्रधान जातियाँ हैं । इन वसों में जो एक ' वृश ' नाम का सोम है, उस की ध्रुव वर्त्र, वरुण, धर्म्म, ये चार अवस्थाएँ हैं । भूपिण्ड, पत्थर, एवं और ओर मनद्रव्यों में रहने वाला मनतासम्पादक वृत्रसोम ' ध्रुव ' है । इसीको ' अश्मासोम ' भी ८२०
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण कहा जाता है । पानी, घृत, तैल, आदि तरल पदार्थों में रहने वाला तरलता सम्पादक वृत्रसोम ' पत्र ' नाम से व्यवहृत होता है । वायु, स्प्रीट, ईथर, प्राण आदि विरल पदार्थों में रहने वाला विरलता – सम्पादक सोम ' धरुण ' नाम से व्यवहृत होता है, एवं रूपादि गुणों में रहने वाला गुणभाव - सम्पादक वृत्रसोम ' धर्म ' नाम से प्रसिद्ध है । वैटिक - परिभाषा में घन, तरल, विरल - भाव के लिए क्रमशः दधि, घृत, मधु, ये तीन शब्द प्रयुक्त हुए हैं । पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, में क्रमश घनाग्नि, तरलाग्नि, विरलाग्नि प्रतिष्ठित हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर इन तीनों के लिए - ' दधि हैवास्य लोकस्य रूपम, घृतमन्तरिक्षस्य, मध्य-मुष्य ' ( शत ० ७ कां ० कूर्मचितिब्राह्मण ) यह कहा जाता है । बतलाना यही है कि, ' दधि ' शब्द ' घनभाव ' का वाचक है । उधर पूर्वोक्त चतुर्विध वृत्रमोमो में घनता - सम्पादक श्मासोम है । अतएव हम इसे इस घनत्त्वभाव के कारण अश्वय ही ' दधि ' नाम से व्यवहृत कर सकते हैं । हमारे शरीर में अस्थि ( हड्डी ) का निर्माण इसी दधि नामक अश्मा सोम से होता है । पत्थर में जो आप घनता देखते हैं, वह इसी अश्मासोम की कृपा है । इसप्रकार इस घनता से इस घनसोम को हम दधि, अस्थि, अश्मा आदि सभी नामों से व्यव-हृत कर सकते हैं । यह दधिसोम भौतिक है । भूत की प्रतिष्ठा प्राण है । प्राण की विकासभूमि भत है । जो पारमेष्ठ्य अथर्वाप्राण स्वविकास के लिए इस अस्थिरूप दधिसोम ( श्मासोम ) की याञ्चा करता अपेक्षा रखता है, दूसरे शब्दों में जो प्राण इस श्रश्मासोम से युक्त रहता है, वही - ' दधिसोमञ्च ते अपे-क्षते ' इस व्युत्पत्ति से ' दध्यङ् ' नाम से प्रसिद्ध है । प्राण को ही ' प्राणा वा ऋपय: ' इस सामान्य परिभाषा के अनुसार ' ऋषि ' कहा जाता है । अतएव श्मासोमय इस ग्राथर्वणप्राण को ' दध्यङ - ऋषि ' कहा जाता है । पुराणपरिभाषा में यही ऋषि दधीचि ' नाम से प्रसिद्ध हुए हैं । साथ ही आपको यह भी स्मरण रखना चाहिए, कि, जो मनुष्यऋषि जिस प्राण - ऋषि का प्रथमद्रष्टा होता है, वह अपने जन्मनाम से प्रसिद्ध न होकर उस मौलिक ऋषिप्राण के नाम से ही प्रसिद्ध होता है । इसी पौराणिकी सामान्य - परिभाषा के आधार पर जिस ऋषिने सर्वप्रथम इस दधीचि प्राणर्षि का प्रत्यक्ष किया था वह, और उसके वंशधर भी ' दधीचि ' नाम से ही प्रसिद्ध हुए | दधीचि ऋषि के श्रात्मा में इसी दध्यङ प्राण की प्रधानता थी । गोत्रसृष्टिविज्ञान * के अनुसार दधीचि ऋषि ही सुप्रसिद्ध ' दाहिमा ( दाधीच ) ' नाम की ब्राह्मण जाति की मूलप्रतिष्ठा है । दधीचि ऋषिप्राणकृतात्मा ' दधीचि ' नाम के मनुष्य ऋषि इस जाति के मूलपुरुष थे । इसी वंशपरम्परा से यह प्राण ओर श्रोर ब्राह्मणजातियों की अपेक्षा इस जाति में प्रधानरूप से विकसित रहता है । दधीचितत्त्व श्रश्मासोम के सम्बन्ध से अभेद्य है । और तो और, सुरप्राण भी यहाँ के सर्वथा परास्त होजाता है, जैसा कि अनुपद में ही पाटक देखेंगे । इस प्राण में ' मृदुता ' का सर्वथा अभाव है । यह प्राण अत्यन्त ही वक्र है । इस पर किसी का श्राघात सम्भव नहीं है । जिस प्रकार वसिष्ठादि प्रारण मृदुभाव -सौहाद्द आदि ऋजुधम्मों का विकास करते हैं, ठीक इसके विपरीत यह प्राण जिसके भी आत्मा में प्रधानरूप से विकसित रहता है, वह नरश्रेष्ठ मृदुभाव - सौहार्द -ऋजुता आदि विभूतियों से तटस्थ ही बन जाया करता है । * ऋषिप्राण किस क्रम से गोत्रसृष्टि करते हैं?, सगोत्रों में विवाह सम्बन्ध क्यों नहीं होता?, इत्यादि प्रश्नों के समाधान के लिए ' ऋषिस्वरूपपरिचय ' नामक स्वतन्त्र निबन्ध ही देखना चाहिए ।
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द्वितीय अध्याय प्रथमकागड चतुर्थत्राह्मण प्रकृत में हमें केवल यही बतलाना था कि, परमेडी अथर्वा में प्रतिष्ठित ६६ असुरों रहने वाला को नष्ट दृध्यङ्सोम कर डालते साक्षात् वज्र है । इस अस्थिसोम की वज्र बनाकर ही इन्द्र उन तमोमय रात्रिगत है । इस अश्मासोम की हैं । वस्तुस्थिति यही है कि, यह अश्मामोन दाह्य है । उधर सौर मात्रित्राग्नि दाहक इन्द्र है । इसके सौर अग्नि में आहुत होती है । २५ वें अहर्गण पर ' सौम्यविद्यन ' प्रतिष्ठित है में । बहुत विद्युत् होना हीं सौम्य -आकर्षण से आकर्षित वह अश्मासोम सौराग्नि में श्राहुत होता है । सोम का अग्नि में ही ' त्वं ज्योतिषा विद्यत् का असुरों पर वज्र प्रहार करना है । क्योंकि सोमाहुति के श्रव्यवहितात्तरकाल रूपाधिष्ठाता इन्द्र की कृपा से तिमो वर्थ ' इस सिद्धान्त के अनुसार सर्वत्र प्रकाश होजाता है । इसप्रकार होजाता है । अहोरात्र के सम्बन्ध ६६ असुर नष्ट होजाते हैं । सर्वत्र प्रकाशमय ३३ देव - देवताओं का साम्राज्य से यह कौतुक प्रतिदिन हुआ करता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर मन्त्र ति कहती है-इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः । जघान नवतीर्नव ॥ -ऋक् सं ० १० ८४ सू ० १३ म ० अग्नि अङ्गिरा है । नभ्यप्रजापति सृष्टि की जिस प्रकार ३३ आग्नेय देवता भूपिण्ड केन्द्रस्थ प्रजापति से उत्पन्न हुए हैं, एवमेव से हुआ इन है, ६६ यह अमु प्रक-की मूलप्रतिष्ठा भी वही नभ्यप्रजापति है । भूपिण्ड का निर्माण तत्त्व और अग्नि रा के आरम्भ में हीं कहा जाचुका है । यह आप भृगु है, एवं तप इह्रीं दोनों से सम्बन्ध रखता है । कामना करते हैं । कामना के अनन्तर वे तदनुकून्न तप करते हैं । यह है । ' के अनुसार प्रजापति का तप ( प्राणव्यापार ) भृगु, श्रङ्गिरात्मक ' भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् एवं अग्नि का तेजोधर्म्म, पानी का वे इह्रीं पर व्यापार करते हैं । इस व्यापार से पानी का स्नेहधर्म्म, है । फलत: अनुष्णाशीत शीतभाव एवं अग्नि का उष्ण भाव ( रासायनिक संयोग से ) प्रतिमूर्च्छित होजाता । इनमें आग्नेयप्राण का भूपिण्ड का निर्माण होजाता है । भूपिण्ड में दोनों की सत्ता है असुर है । दोनों विकास जैसे देवता है, तथैव श्राप्य भार्गव प्राण का विकास पूर्वकथनानुसार प्राजापत्य हैं । के साथ साथ जैसे भूपिण्ड के केन्द्र से विनिर्गत ३३ विध ग्रङ्गिराप्राण व्याप्त होता है, एवमेव प्राण देवप्राण ऊर्ध्वगामी होता है । ही भूकेन्द्र से विनिर्गत विरोधी अमर भी त्रैलोक्य पर आक्रमण करते हैं । आग्नेय ) बल ऊपर जाते समय ' प्रसिद्धमूर्ध्वज्ज्वलनं हविर्भुजः ' यह सभी जानते हैं । अतः इनका ( देवताओं भी श्राप्यप्राण का कठिनता से ऊपर अधिक रहता है । पानी निम्नगा है । श्रतः केन्द्राघात से प्रक्षिप्त होता हुआ । परन्तु इस चढ़ने में चढ़ता है । चढ़ता अवश्य है, इसीलिए तो श्रु तिने दोनों की स्पर्द्धा बतलाई रहते है थे ' यह भी कहा है । आग्नेय प्राण ( देवता ) प्रबल है, इसलिए ' देवता असुरों को जीतते कहते हैं-भूसृष्टिकाल की इस श्रारम्भिक स्थिति का ही निरूपण करते हुए भगवाद् याज्ञवल्क्य देवाच ह वा असुराश्व उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे । ते ह स्म यद्द ेवासुरान् जयन्ति, ततो हस्मैवैनान् पुनरुपोत्तिष्ठन्ति ॥ ८ ॥
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण चतुथब्राह्मण जिस समय भूसृष्टि का आरम्भकाल था, जिस समय भूपिएड, एव महाथी का निर्माण हुआ था, उस समय की स्थिति को लक्ष्य में रखकर ही -- ' देवाच ह वा ' इत्यादि कहा गया है । सचमुच उस समय तो देवता असुरों को निकालते रहते थे । और वे पुनः पुनः आक्रमण किया करते थे । परन्तु आज यह बात नहीं है । श्राज देवताओंने उत्तर भाग में अग्नि को प्रतिष्ठित कर दिया है । अतः आज अमुर सर्वथा परास्त होगए हैं । आज ये असुर त्रैलोक्य से निकल कर अपने आपोमय चतुर्थ लोक में हीं चले गए हैं । तात्पर्य इसका यही है कि, प्रत्येक वत्तु लवृत्त में, किंवा पिण्ड में केन्द्र, प्रत्रि ( परिधि ), ये दो भाग रहते हैं I । केन्द्र तद्वृत्त की मूलप्रतिष्ठा मानी जाती है । इस केन्द्र चिन्दु को ही विज्ञानभाषा में ' उत्तर ' कहा जाता है । यह हम पूर्व में बतला चुके हैं कि, ऊँचा - नीचा, यह व्यवहार उत्तर - दक्षिण नाम से प्रसिद्ध है । प्रधि की प्रत्येक बिन्दु से सर्वोन्नत स्थान ' हृदय ' ही है । अतएव ' ऊर्ध्वमूलोऽवाक् शाखः ० ' इत्यादिरूप से इस ' हृदय ' को ही ‘ ऊर्ध्व ' कहा जाता है । हृदय से परिधि की प्रतिविन्दु नीची मानी जाती है | हृदयबिन्दु उत्तर है, एवं परिधिभाग दक्षिण है । यहाँ भी आप इन दोनों का सम्बन्ध देख रहे हैं । देवप्राण २१ वें अहर्गण पय्यन्त व्याप्त हैं । अतः इनकी अपेक्षा यहीं तक एक श्रग्नि की परिधि माननी पड़ेगी । भूकेन्द्र से किकलने वाला देवतामय प्राणाग्नि २१ पर्यन्त अपना एक मण्डल बनाता है । मण्डल का २१ वाँ स्थान परिधि का प्रवर्त्तक है । भूपिएड को केन्द्र में प्रतिष्ठित करते हुए २१ वें अहर्गण से उस पिण्ड के चारों ओर एक वृत्त बना दीजिए, यही वृत्तसीमा इस प्राणाग्निमण्डल की परिधि बनेगी । उक्त परिभाषानुसार यही परिधि ' दक्षिणा- दिक् ' है, एवं भूकेन्द्र उत्तरा दिकू है । इसमें वही ' अग्निप्रजापति ' प्रतिष्ठित है । आग्नेय प्राणदेवता सृष्टिविकासक्रम से जिस दिन इस उत्तरम्थ ( केन्द्रस्थ ) अग्निचल को अपनाते हुए स्वयं दक्षिणरूप परिधि पर्यन्त व्याप्त होगए, उसी दिन से असुर सर्वथा ' अन जय्य ' बन गए । बात यह हुई किं, केन्द्रस्थ प्राजापत्याग्नि के परिभ्रमण से भूषिएड घूमने लगा । इस स्वाक्षपरिभ्रमण से सूकर्षण के द्वारा भूमण्डल सूर्य के अनुगत होता हुआ सम्वत्सर के साथ युक्त होगया । सम्वत्सर-मण्डल में कभी असुर प्रविष्ट नहीं होते । इसप्रकार अग्नि की कृपा से सम्वत्सरभोग्या बनती हुई स्तौम्य -त्रिलोकीरूपा महापृथिवी आपोमय असुरों से सर्वथा ही पृथक होगई । देवव्याप्ति भूकेन्द्र से चारों ओर २१ बें अहर्गण पर्य्यन्त हो गई, इसके ऊपर ३३ पर्यन्त आपोमय असुरों की व्याप्ति होगई । असुर और देवताओं की आवासभूमि सर्वथा पृथक् होगई । यही चौथा आपोमय मण्डल ' व्रजधाम ' कहलाता है । इसे ही साम-वेद की परिभाषा के अनुसार ' गोसत्र ' कहा जाता है । पुराणपरिभाषानुसार यही ' गोलोक ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी के लिए प्रकृतत्राह्मण में ' गोष्ठान ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । आज भी गोस्थान ( जहाँ गाएँ रहतीं हैं ) ' गाय का ठान ' नाम से प्रसिद्ध है । गोस्थान ही गोष्टान है । इसी को वैष्णवधाम कहा जाता है । तात्पर्य यही है कि, ' पञ्चप्रकृतिविज्ञान ' के अनुसार स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिबी, विश्व के इन पाँचों पर्वों में क्रमशः प्राण - आपः - वाक् - अन्न अन्नाद, ये पाँच प्रकृतियाँ प्रतिष्ठित रहतीं हैं । इनके आधार पर क्रमशः ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - सोम - अग्नि ये पाँच देवता उक्त पाँचों पर्वों में प्रतिष्ठित रहते हैं । इस सृष्टिक्रमानुसार आपोमय परमेष्ठी में विष्णु का साम्रा-८२३
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द्वितीयध्याय प्रथमकाण्ड चतुथब्राह्मण ज्य है । इसी में इडा - ऊर्क - गौः ये तीन तत्त्व उत्पन्न होते हैं । विश्व के यच्चयावत् भूतों को उत्पन्न करने वाले अव्ययपुरुष के मनः - प्राण - वाक् से अनुग्रहीत, जीवनीय -- मोमरसमूर्ति पारमेष्ट्यतत्त्व को ही ' गौ ' कहा नाता है । इसकी जन्मभूमि यही विष्णुधाम है, एवं सञ्चरणभूमि ' सौरत्रिलोकी ' है । इस गौतस्व का सर्वप्रथम इस सूय्य ' में हीं रश्मिरूप से विकास होता है । अतएव ' आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः पितरं च प्रयन्त्स्वः ' इत्यादिरूप में सूर्य को भी ' गौ ' कहा जाता है । सूर्य में आकर यह पारमेष्ठ्य गौतत्त्व सहस्रधा-विभक्त होजाता है | इसी गीमाहसी के सम्बन्ध से सूय्य ' को ' सहस्रदीधिति ' - ' सहस्रांशु ' इत्यादि नामों से व्यवहृत किया जाता है | गाँ रहती है अपने ठान में, त्रिचरती है सर्वत्र । परमेडी इनका ठान ( स्थान ) है, सम्पूर्ण सौर ब्रह्माण्ड इनके पर्यटन का स्थान है । त्रैलोक्य में ऐसा कोई पदार्थ नहीं, जो बिना इस पारमेष्ठ्य गौतत्त्व को आधार बनाए अपनी स्थिति रख सके । गौतत्त्व के इसी धर्म को लक्ष्य में रखकर ' गौर्वा इदं सर्वं बिभर्त्ति ' ( श ० ब्रा ० ५ | १ | २ | १४ | ) यह कहा जाता है । न केवल भूत ही, अपितु देवता भी इस गौतत्त्व के आधार पर ही जीवित हैं । गौ को वैश्वदेवी कहा जाता है । ( देखिए गोपथ ब्रा ० उ ० ३।१६ ) । गौ देवताओं का मनोता है [ कौ ० ब्रा ० १०।६ । ] | पारमेष्ठ्य सोम की अजस्रधारा इसी से सूर्य्य में आती है [ श ० ७५।२।१६ ] | उसका आाग-मन सहस्रधाराओं से होता है । इसके उत्स [ थन ] से सोम की हजार धाराएँ निकलती हैं [ श ० ७५ | २ | ३४। ] | गौ के द्वारा आहुत सोम से देवता बलवान् बने, ज्योतिर्म्मय बने । इसी बल से पूर्वोक्त देवताओ असुरों का नाश किया । इसी अभिप्राय पे ताण्ड्य ति कहती है -' य तह वा असुरानेभ्यो लोकेभ्यो गोवय स्तद्गोर्गोत्रम् ' -- ता ० ब्रा ० १६ २/३ । परमेष्टी से चलकर इस प्राण का प्रथम विकास सूर्य्य में होता है । यहाँ आते ही यह सहस्रधा विभक्त होजाती है । महस्रधा विभक्त इस गौतत्त्व का हमारी पूर्वोक्ता स्तौम्यत्रिलोकीरूपा महापृथिवी के साथ सम्बन्ध होता है । स्तौभ्यत्रिलोकी में हमनें क्रमशः अग्निज्येष्ठ = वसु, वायुज्येष्ठ ११ रुद्र, एवं आदित्य ( इन्द्र ) ज्येष्ठ १२ रुद्रों की सत्ता बतलाई है । इन तीनों देवताओं में क्रमशः ३३३-३३३ - ३३३ - इस क्रम से गौतत्त्व प्रतिष्ठित होजाता है । १ गौ वच जाती है । इसी को ' कामगवी ' कहा जाता है । पार्थिव वसुदेवतामयी ३३३ गौ पार्थिवसम्पत्ति की अधिष्ठात्री है । अन्तरिक्ष्य रुद्रदेवतामयी ३३३ गौ आन्तरिक्ष्यफल की अधिष्ठात्री है, एवं दिव्य श्रादित्यमयी ३३ गौ केवल दिव्यफल की ही अधिष्ठात्री है । परन्तु यह कामगत्री त्रैलोक्य में अधिष्ठानरूप से व्याप्त होती हुई त्रैलोक्य की सम्पत्ति देने की शक्ति रखती है । ६६ गौ ऋतभावान हैं, एवं कामगवी सत्यभावोपेता है । प्रत्येक अहोरात्र में [ दिनरात में-२४ घन्टे में ] इन हजारों गौत्रों का प्रत्येक प्राणी के साथ - [ पार्थिवपरिभ्रमण के द्वारा ] भोग होता है । जिस समय प्राणी के आत्मा में ' कामगत्री ' नाम सत्य गौ का भोग होता है, उस समय इसके मुख से जो कुछ निकल जाता है | वह अवश्य ही मत्य होजाता है । कामगवी की इसी सत्यशक्ति को लक्ष्य में रखकर ऋषियों ने आदेश दिया है कि- ' शुभं ब्रयान - शुभं ब्रूयात् । तुम सदा शुभ बोलो, कभी मुख से बुरे शब्द न