Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 561–570

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 561–570

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण निकालो । यदि तुम किसी समय अशुभ बोलोगे, और दुर्भाग्य से उस समय यदि तुझारे आत्मा में कामगवी का भोग होरहा होगा, तो तुह्मारा कहना सत्य होजायगा । इसी आधार पर आज भी लोक में यह किंवदन्ती प्रचलित है कि. ' भाई थीड़ा सोच समझकर बोला करो ' । त्रिदित नहीं, किस समय तुमारे मुख से निकला हुआ सच ही होजाय ' । ' वह समय ' यही का मगत्री का भोगकाल है । जो विद्वान् गौतत्त्व को पहिचानता हुआ इस कामगवी को अन्तर्य्याम -सम्बन्ध से सदा के लिए अपने आत्मा में प्रतिष्ठित कर लेता है, त्रैलोक्य की सम्पत्ति उसके लिए यथाकाम सुलभ हो जाती है । एवं यह गौतत्त्व का ज्ञाता विद्वान् जिस व्यक्ति के लिए जैसी भावना करता है, जिसके लिए इसके मुख से जैसे इष्ट अनिष्ट शब्द निकल जाते हैं, विश्वास कीजिए, उस व्यक्ति के लिए वैसा ही होजाता है । यही कामबी पुराणपरिभाषानुसार ' कामधेनु ' नाम से प्रसिद्ध है । इसका फल पूर्णानन्द है । अतएत्र ' नन्दिनी ( आनन्दमयी ) वृत्ति ' को कामधेनु की पुत्री माना जाता है । जिस गौपशु में इस प्राणा-त्मिका कामधेनु की पूरा प्रधानता रहती है, वह पशु भी ' कामधेनु ' नाम से ही व्यवहृत होता है । जिसमें अल्पमात्रा में इसकी वृत्तियों का विकास होता है, वह ' नन्दिनी ' कहलाती है । दुःख है कि, श्राज कामधेनु, और नन्दिनी, दोनों प्रकार की गौजातियाँ देश के दुर्भाग्य से उच्छिन्न होगई हैं । जो शक्ति, जो कर्म्म, जो फल उस प्राणरूपा कामधेनु - नन्दिनी का है, वही कर्म्म, वही फल तत्कृतात्मा इन प्राणी पशुरूप कामधेनु -नन्दिनी जाति वाली गायों से होता था । इसी कामधेनु के बल पर महर्षि वसिष्ठने राजर्षि विश्वामित्र को ससैन्य — सपरिवार क्षणमात्र में श्रातिथ्यभाव से वर्य्यान्वित कर दिया था । इसी नन्दिनी गौ के अपराध से राजा दिलीप के वंशोच्छेद होने का उपक्रम होगया था । अन्त में गुरुवसिष्ठ के आदेश से जब नृपतिश्र ेष्ठ दिलीप ने २१ दिन पर्य्यन्त की सतत पारचर्य्या से नन्दिनी को पुनः प्रसन्न कर लिया, तब कहीं सूर्य्यवंश बचा था । हमने बतलाया है कि, कामगवी के अतिरिक्त ३३३ क्रम से गौत्तत्त्व तीन देवताओं में विभक्त है । श्रादित्यरूप सूर्य की जन्मभूमि श्रपामेय परमेष्ठी है । ' तासु बीजमवासृजत् ' इस सर्वमान्य सिद्धान्त के अनुसार अब्रूगर्भ में प्रविष्ट ' बीजाग्नि ' ही कालान्तर में सूर्य्यरूप से विकसित होता है । जहाँ गौतत्व उत्पन्न हुआ है, वहीं यह आदित्य विकसित हुआ है । परमेष्ठी प्रजापति से ही अग्निमूर्ति, अतएव ' पुरुष ' नाम से व्यवहार करने योग्य आदित्य उत्पन्न हुआ है, एवं उसी श्रापोमय परमेष्ठी से सोममय, अतएव ' स्त्रीतत्त्व ' नाम से व्यवहार करने योग्य गोतन्त्र उत्पन्न हुआ है । आदित्य एवं गां परमेा को कन्या, एवं पुत्र है । दोनों भाई बहिन हैं । इनके समन्वय से, मेलजोल से, परस्पर के स्नेह से अग्नितत्त्व विकसित होता है । तापलक्षण अग्नि सौम्या गौ, एवं प्रादाग्निरूप आदित्य के सहयोग का ही फल है । अग्नितत्त्व ही ' अग्निर्वा रुद्रः ' के अनुसार रुद्र है । अतएव हम इस गौमत्त्व को रुद्रमाता मान सकते हैं । स्तोम्यत्रिलोकी की अपेक्षा पार्थिव वस्वग्नि इस गौतत्त्व की विकासभूमि माना जाता है । अतएव पृथिवी को भी ' गौ ' कहा जाता है । पृथिवीसंस्था में जो गौतत्व है, उस की मूलप्रतिष्ठा बस्वग्नि ही है । इसी भाव को प्रधान मानते हुए हम गौतत्व को वसुदेवताओं की कन्या कह सकते हैं । त्रैलोक्य में व्याप्त त्रिविध भावापन्न यह गौतत्त्व निरन्तर सोमरस की वर्षा किया करता है । इसी सोम ( अमृत ) से ' श्रद्धा ' उत्पन्न होती है | श्रद्धासोम ही पर्जन्याग्नि में आहुत होकर वृष्टिरूप में परिणत होता है । वृष्टिरूप में परिणत सोम पार्थिवा-ग्नि में आहुत होकर ओषधि - वनस्पति का उत्पादक बनता है । यही श्रोषधिरस ( अन्नरस ) पुरुषाग्नि में आहुत ८२५

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थब्राह्मण माङ्गलिक ( मङ्गलग्रह के होकर रेतोरूप में परिणत होता है । यही रेत ( शुक्र ) स्त्री के गर्भाशय में प्रतिष्ठित होता है । इसप्रकार उस आग्नेयरस से युक्त ) शोणिताग्नि में आहुत होकर अन्ततः प्रजारूप में परिणत ही उपर्युक्त क्रमानुसार आगे त्रैलोक्य - व्यापिनी सर्वदेवमयी प्राणमूर्ति गौ से निकलने वाला जीवनीय सोमरस जाकर विश्वप्रजा की उत्पत्ति का कारण बनता है । होता है । रुद्राग्नि-वस्वग्निमयी पृथिवी कृष्णप्राणमयी है, इस की प्रधानता से लौह धातु का विकास का उपादान मय अन्तरिक्ष श्वेतमूर्ति है । इस में पानी रहता है । पानी हीं रुद्रप्राण के सम्बन्ध बतलाते से रजतधातु हुए, ब्राह्मणश्रुति ने बनता है । रुद्र ही द्रुत होकर ' रजत ' बनता है, श्रनएव रजतधातु की उत्पत्ति है, सुनहरी है, पीतभावयुक्त है । रुद्र के अश्रुओं से रजत का विकास माना है । श्रादित्यमय द्युलोक हिरण्मय तीनों भावों से युक्त रहता है । साथही इन कृष्ण - श्वेत - पीत भावयुक्त तीन लोकों में भुक्त गौतत्त्व भी इन्हीं रहती है कि वह रँगमें काली होती यह भी समझ लीजिए कि, जिस गौपशु में पार्थिवप्राणगौ की प्रधानता है । जिस में प्रदत्यप्राणगौ प्रधानरूप से है । जिस में अन्तरिक्ष्यों की प्रधानता रहती है, वह सफेद होती से प्रतिष्ठित रहते हैं, वह चित्रवित्रि-विकसित रहती है, वह पीली होती है । जिस में तीनों गौभाव समानमात्रा के लिए कृष्णा गौ, दर्शन के त्रा अनेकवर्णा होती है । इसी विज्ञान के आधार पर धर्माचार्योंनें दूग्ध पान है । हमारा गौपशु इसी नित्यप्राणगी लिए कपिला ( सौरवर्णा ) गौ, एवं दान में श्वेत गौ का विधान किया से उत्पन्न हुआ है * यद्यपि सभी पदार्थों में थोड़ा - बहुत गोप्राण विद्यमान है । परन्तु गौपशु तो प्राणगों इस की के प्रधान बतलाए विकासभूमि हैं, वे है । इसीलिए इसे ‘ गौ ' नाम से ही व्यवहृत किया जाता है । जो धर्म हमने, यह सोममय दुग्धा-सभी धर्म इन प्राणी गौपशुओं में समझिए । वह सोमरस की वृष्टि करती है का faaras मृत की नाभि है । हितकर - जीवनीय श्रमृततुल्य - बुद्धिवर्द्धक सामान्य - दिव्यविभूति गुण बतलाते हुए गौदुग्ध को एकमात्र गायका ही दूध है । इसीलिए सर्वश्री वाग्भट्ट ने दुग्ध के

सर्वोत्कृष्ट मानते हुए कहा है-स्वादु पाकर सं - स्निग्ध- मोजस्य - धातुवर्द्धनम् ।

वातापित्तहरं - ३ ष्यं - श्लेश्मलं - गुरुशीतलम् ॥

प्रायः पयः... 1 तत्र गव्यं तु जीवनीय रसायनम् ॥ अष्टाङ्गहृदय मू ० स्था ० द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्याय ५ ' नाम के ÷ इस विषय का विशद विवेचन ' छान्दोग्य हिन्दी विज्ञानभाष्य ' के ' पञ्चाग्निविद्यारहस्य प्रकरण में देखना चाहिए । पाँचों का ही * यह गौतत्त्व इड़ा, उर्क, गौ, विराट, भोग इन पाँच ' नाम भागों की में भी विभक्त है है । यद्यपि । इन इस का वहीं संक्षिप्त स्वरूप पूर्व में अभिव्यक्त किया जाचुका है । प्रकृत पुनरुक्ति गी ' की गी उपेक्षा करी गई है । निरूपण होगया था, परन्तु विषय स्पष्ट करने के लिए ८२६

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द्वितीयश्रध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण भारतीय अथशास्त्र के अनुसार तो समस्त राष्ट्र के ' अर्थ ' की मूलप्रतिष्ठा केवल ' गौवंश ' पर ही श्रव-लम्बित है । जिस राष्ट्र का गौवल उच्छिन्न होजाता है, उस राष्ट्र का सर्वनाश निश्चित है । कृषि ही जीवनयात्रा का मुख्य श्रालम्बन है | कृषि की मूलभित्ति गौवंश है । दधि घृत - अन्न सत्र कुछ इसी वंश पर अवलम्बित है । भारतीय ऋषियों की दृष्टि में तो यह पशु केवल ऐहलौलिकक सम्पत्ति का ही कारण नहीं है, अपितु इस की आराधना उनकी दृष्टि में अन्तरात्मा को पवित्र बना कर हमें स्वर्गादि सुख का भी अधिकारी बना देती है । भौतिक विज्ञान का अनन्य उपासक श्राज का जड़जगत् भले ही ऋषियों की इस वास्तविक दृष्टि का नूल्य न समझे, किन्तु जिह्नोंनें भूत में नित्य प्रविष्ट भूताधार प्राणतत्त्व की परीक्षा करली है, वे यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं कर सकते कि, सचमुच गौपशु में वही नित्य गौप्राण प्रतिष्ठित है । गौप्राण के द्वारा सचमुच सम्पूर्ण देवता इस गौपशुशरीर में विद्यमान हैं । सचमुच वही गौरस ( सोम ) इसके दुग्ध में है । इसकी सुश्रा से इसमें रहने वाला प्राण हमारे आत्मा में प्रविष्ट होगा, आत्मबल बढ़ेगा, पार्थिव गुरुता नष्ट होगी । क्योंकि यह प्राण सूर्य में विकसित हुआ है । पार्थिव श्राकर्षण जहाँ गुरुता का कारण है, वहाँ सौर गौप्राणाकर्षण निर्भरत्व का प्रवर्तक है । तत्प्राणप्रधान - प्राणी पशु के द्वारा अवश्य ही यह प्राण हमारे आत्मा में प्रविष्ट होकर उसे पार्थिवाकर्षण से विमुक्त कर देता है । प्राण, एवं प्राणीपशु अभिन्न हैं । इसी अभिन्नभाव को लक्ष्य में रखकर, प्राण, एवं प्राणीपशु पर समानदृष्टि रखती हुई मन्त्र ति कहती है-माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः । प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट ॥ —ऋक्सं ० ६।७.८ । आपको यह जान कर कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि, जब ऋषियों के सान्निध्य में समित्प्राणि-रूपेण कोई वेदाध्ययन करने जाता था, उस समय यदि ऋषिआगन्तुक में किसी प्रकार का दोष देखते थे, तो सर्वप्रथम वे उसे ' गौसेवा का ही आदेश देते थे । गौसेवा से जब उसका आत्मा गौप्राणप्रवेश से सर्वथा दोषमुक्त होजाता था, तभी वे उसे आत्मविद्योपदेश का अधिकारी समझते ये । इसी गौसेवा के प्रभाव से सत्यकाम जाबाल के अन्तरात्मा में अपने श्राप ' चतुष्पाद् ब्रह्म के ज्ञान ' का आविर्भाव होगया था । ( छां ० उप ० ) । मलिनता - निराकरण के लिए ही ' पचगव्य ' का सेवन धम्मचाय्यों ने आवश्यक बतलाया है । प्रत्येक आर्षमानव को यह आदेश है कि, वह नियमितरूप से गौ की परिचय करै । गोमय - गोमूत्र से अधिक संसार में और कौन पवित्र है? | गोदुग्ध से अधिक बुद्धि, एवं बलवर्द्धक पदार्थ और कहाँ उपलब्ध होसकता है? | जगन्माता गौ के पुच्छप्रारण से बढ़ कर कौन अधिक पावन है? । दूष, घृत, अन्न, अन्नपरिपाक की सामग्री ( कण्डे ), इसप्रकार जीवनोपयोगी समग्र पदार्थ इस माता के अतिरिक्त हमें और कौन दे सकता है? । प्रज्ञाशील के लिए गौ साधारण पशु नहीं, अपितु त्रैलोक्य की विभूति है । इहलोक - परलोक, उभयलोक की अभ्युदयकारिणी है । केवल भौतिक जड़वादियों की दृष्टि में यह ऐहलौकिक सुख का साधन है । परन्तु अभिनिविष्ट मलि-नान्त: करण सुबुद्धि वाले मूर्खमनुष्यों की दृष्टि में यह एक अन्य पशुओं की भाँति साधारण पशु है I । किस ८२७

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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थब्राह्मण की दृष्टि ठीक है?, इसका निर्णय तो प्राणविज्ञान के पारदर्शी विद्वान ही कर सकते हैं । प्राणपरीक्षक ही गौं के उपयुक्त प्राणमहत्त्व को जान सकते हैं । इसी भाव को लक्ष्य में रखकर ऋषि ने ' प्र नु बोचं चिकितुषे जनय ' यह कहा है । ' किमिदं वस्तुतत्त्वम्? ', इस रूप से पदार्थों की पूर्णपरीक्षा करने वाला ही ' चिकितुटू ' कहलाता है । ऋषि कहते हैं कि, " जो गौपशु तुझार सम्मुख खड़ा है, उसे साधारण पशु मत समझो । विश्वास करो! इसमें त्रैलोक्यव्यापक देवमय प्राणरूप गौतत्त्व प्रतिष्ठित है । यह रुद्रों की माता है, बसुओं की कन्या है, आदित्यों की बहिन है । अमृत की नाभि है " । आगे जाकर परोक्षभाषा का आश्रय लेते हुए ऋषि कहते हैं कि, हमने बुद्धिमान् मनीपी के लिए यह कह दिया है कि, वह भूलकर भी इस अदिति ( स्तम्यत्रिलोकीयुक्त त्रिविध देवतामयी ) अपराधशून्या सर्वथा उपकारिणी गौ पर प्रहार न करे । " हमने कहा था कि, गौतत्त्व की मूल विकास भूमि परमेष्ठी है । यही विष्णुधाम है । वहाँ यह गौतत्त्त्र उक्थरूप से प्रतिष्ठित रह कर अर्क ( रश्मि ) रूप से सम्पूर्ण सौर ब्रह्माण्ड में व्याप्त होता है । विष्णु-लोक में प्रतिष्टित उक्थरूप गौ ' गो ' है । सौररश्मिरूप में परिणत सहस्रधा विभक्त गौप्राण इस गोतत्त्व के ' शृङ्ग ' ( सींग ) हैं | सींग भी छोटे छोटे नहीं अपितु बहुत बड़े । लोकालोक पर्य्यन्त ( जहाँ सौरप्रकाश-मण्डल की सीमा समाप्त होती है, वह स्थान लोकालोक कहा जाता है ) व्याप्त है । जिनकी बृहत्ता का अनु-मान लगाना भी कठिन है । सूर्य्य में वह गौतत्त्व विकसित हुआ । रश्मिरूप से यह सर्वत्र व्याप्त हुआ । सूय्यं -रूप गौने ( वृषभ - बैल - ने ) अपने शृङ्गरूप ह्रीं रश्मियों के आकर्षण से भूपिण्ड को स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित कर रक्खा है । यदि इन रश्मियों का आकर्षणा न हो, तो सत्क्षण भूपिण्ड निराधार होता हुआ नष्ट भ्रष्ट होजाय । इसी प्रकृतिसिद्ध नित्य गौविज्ञान को लक्ष्य में रखकर आर्यसभ्यता का महान कोश पुराणशास्त्र " भूपिण्ड किसके आधार पर निशवलम्व आकाश में खड़ा है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहता है कि- ' भूपिण्ड को एक ग्रुपम ( गो ) ने अपने सींग पर उठा रक्खा है । इमीसे भूपिण्ड इतस्ततः गिरने नहीं पाता " 1 इस भूकम्प के सम्बन्ध में भारतीय प्रजाजनों में यह किंवदन्ती है कि, ' बैल ने सींग बदला है । इसलिए धरतीकम्प हो गया है । " कहना न होगा कि, हमारी यह सामान्य किंवदन्ती भी रसस्य से शून्य नहीं है | इस का आधार भी मौलिक कारण ही है । वारुण, वायव्य, अग्नेय, ऐन्द्र भेद से चार प्रकार का ' भूकम्प ' होता है । इन चारों का स्वरूप चतलाना प्रकरण से बाहिर जाना होगा | यहाँ केवल यही समझ लीजिए कि, हमारी पूर्वोक्ति किंवदन्ती का सम्बन्ध ' ऐन्द्र भूकम्प ' के साथ है । सौररश्मिभुक्त प्राण को ही ' इन्द्र ' कहा जाता है । यही इन्द्रविद्य त् रश्मि के द्वारा सूर्योपग्रहभूत - शनि - मंगल - बृम्पति - बुध -शुक्र आदि अग्नेय, सौम्य ग्रहों में प्रविष्ट रहता है । यदि शनि और मङ्गल समकक्षा पर आजाते हैं, तो तक्षण दोनों विद्यतों का प्रचण्ड घर्षण होजाता है । महा विस्फोटन होजाता है । ऐन्द्रभूकम्प का धक्का रश्मि के द्वारा भूपिण्ड पर लगता है । सम्पूर्ण भृप्रदेश विकम्पित हो पड़ता है । इतर भूकम्प प्रादेशिक हैं । कहीं कहीं होते हैं । परन्तु ऐन्द्रभूकम्प सार्वदेशिक है । कम्प - महामारी -अनावृष्टि - अतिवृष्टि- अग्निप्रकोप - वायु प्रकोप - सामाजिक कलह - राजनैतिक कलह - धर्म्मविप्लव-८२८

पृष्ठ 565

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण आदि किसी न किसी रूप से समस्त भूषिएड पर इस ऐन्द्रभूकम्प का प्रभाव होता है । स्मरण कीजिए, कुछ वर्ष पूर्व होनेवाले सप्तगोलयोगोपलक्षित ऐन्द्र भूकम्प का | क्या हुआ उसका परिणाम! स्मरणमात्र से भी आत्मा कम्पित होजाता है । यह हमारी इह्रीं गौरश्मियों की कृपा का फल है । आज सम्पूर्ण गौवंश त्रस्त है । इसके त्रास से व्यापक गाप्राण चुब्ध होरहा है । उसी क्षोभ से आए दिन भूकम्प, अकाल, जनपद-विध्वंसिनी आदि आदि का आक्रमण होरहा है । इस आपत्ति से यदि आप बचना चाहते हैं, तो मानिये ऋषियों के आदेश को । चलिये धर्म्ममार्ग से । कीजिये उपासना गौवंश की । अपने आप प्रकृति आपके अनुकूल हो जायगी । निवेदन किया गया है कि, पारमेष्ठ्य विष्णुधाम से गौतत्त्व रश्मिरूप में परिणत होकर ( सुर्ख के द्वारा ) त्रैलोक्य में व्याप्त होता है । इसी बृहच्छृ गोपेत गौतत्त्व का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं—

या ते धामान्युष्मसि गमध्यै बध गावो भूरि शृङ्गा प्रयासः ।

अत्राह तदुरुगास्त्र विष्णोः परमं पदमवभारि भूरि ॥

- ( यजुः सं ० ६३ ) – इसी गोष्टानरूष आपोमय विष्णुदेवताधीन पारमेष्ठयमण्डल को ' त्रजधाम ' - ' गोलोकधाम'-नित्यलीलाधाम आदि विविध नामों से व्यवहृत किया गया है । स्तौम्यत्रिलोकी में आक्रमण करने वाले सम्पूर्ण श्राप्य असुर अन्ततः इसी गोष्ठान में जाते हैं । श्रतएव “ देवैः पराभूता श्राप्यप्राणात्मका असुराः श्रव स्वस्थाने त्रजन्ति " इस काभिप्राय से इसे ' ब्रज ' कहा जाता है । अपिच न केवल असुर ही, अपितु प्रलयकाल में सम्पूर्ण त्रैलोक्य इसी मण्डल में प्रविष्ट होता है । यही चरम गमन स्थान है । इसलिए भी ' व्रजन्ति - अपीता भवन्ति, संचरकाले यत्र सर्वे लोका: ' इस मिश्राय से भी इसे ' व्रज ' कहा जाता है । ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र, ये तीन अन्तर्यामी- देवता कहलाते हैं । इनका हृदयरूप से प्रथम खण्ड के पूर्व सन्दर्भों में विस्तार से निरूपण किया जाचुका है । इन तीनों हृद्य - कलाओं पर क्रमशः दर - श्रव्यय-अक्षर का अनुग्रह रहता है । ब्रह्मा तररूप होते हुए उपादान बनते हैं । विष्णु अव्ययमूर्ति बनकर सृष्टि के श्रालम्बन बनते हैं, एवं प्राणमूर्ति गतिधर्म्मा इन्द्र अक्षरमय बनकर सृष्टिकर्त्ता बनते हैं । इन तीनों में अव्ययमूर्ति विष्णु का श्रावास स्थान वही पूर्वोक्त आपोमय परमेष्टीमण्डल है । श्रतएव इतर लोकों की अपेक्षा इस वैष्णवधाम को सर्वोत्कृष्ट माना जाता है । ' स वेदैतत् परमं ब्रह्मधाम ' ( मुण्डक ), ‘ तद्विष्णोः परमं पदम् ' इत्यादि रूप से स्वयं श्रुतिने भी इस धाम को ' परमधाम ' माना है । यह अव्यय-मूर्ति है । अव्यय ही मुक्तिकाल में सत्र की चरमगति बनता है । ' गतिर्भर्त्ता प्रभुः साक्षी ' ( गीता ) इत्यादि रूप से वही श्रव्यय सत्र की ' गति ' माना जाता है । ' परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ' इत्यादि रूप से यही ‘ अव्ययस्थान ' है | अतएव ' मुक्तिकाले देहस्था सर्वा देवताः सर्वाणि भूतानि, विज्ञानप्रज्ञाने, इत्यादयः सर्वेऽध्यात्मिका भावाः परेऽव्यये त्रजन्ति - लीना भवन्ति ' इस अभिप्राय से भी अव्ययमूर्ति विष्णुलोक को ( गोष्ठान नामक पारमेध्यलोक को ) उपासक लोग ' व्रजधाम ' कहा करते हैं । ८२६.

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थब्राह्मण इसी को उपासना की दृष्टि से पौराणिक लोग ' अपुनमार ' लोक कहा करते हैं । ' यत्र गत्त्वा न पुनप्रियन्ते न परावर्त्तिता भवन्ति मृत्युलोके इस अभिप्राय से ही इसे ' अपुनमार ' कहा जाता है । इसी अभिप्राय से इस अव्ययधाम के लिए भगवान् ने -'यद् गत्वा न निवर्त्तन्ते तद्धाम परमं मम ' यह कहा है । अवताररहस्येत्ताओं का यह विश्वास है कि, ' पूर्णावतार ' नाम से प्रसिद्ध भगवान् वासुदेवकृष्ण इसी विष्णु के अवतार हैं । वही अव्ययमूर्ति विष्णु कृष्ण रूप में श्रवतीर्ण हुए हैं । विष्णु का गौतत्त्व के साथ निष्ट सम्बन्ध है । तदात्मभूत भगवान् कृष्ण ने भी उसी गोचारणवृत्ति को अपना जीवनगत बनाया । विष्णु आपोमय मण्डल में प्रतिष्ठित है, अतएव तदात्मभूत कृष्ण ने भी मथुरा छोड़ कर समुद्र में ( द्वारिका में ) निवास किया | गोरसरूप सोम का विष्णु के साथ घनिष्ट सम्बन्ध है । अतएव तदात्मभूत कृष्ण ने गोरस ( दुग्ध घृत - मक्खन आदि ) की अपना प्रधान अन्न माना । वह विष्णुतत्व इसी गोप्रासमय सोमाहुति से प्रकाश के अधिष्ठाता बन कर तपोमय असुरों का विनाश किया करते हैं अतः यही असुरविनाशरूपकर्म इहें करना पड़ा । ये सभी विषय क्योंकि ' अवतार विज्ञान ' से सम्बन्ध रखते हैं । अतः इन के सम्बन्ध में प्रकृत में अधिक नहीं कहा जा सकता । यहाँ केवल यही बतलाना है कि, पारमेष्ठ्य गोष्ठान को अनेक दृष्टियों से ' ज ' कहा जाता है । यहाँ श्रुति ने मुरप्राणगमनको लक्ष्य में रखकर ही ' व्रजं गच्छ गोष्ठानम् ' इत्यादि रूप से इस स्थान को ' ज ' कहा है, किंवा आपोमय ' प्रजधाम ' कहा है, इस का समन्वय है स्तम्यत्रिलोकी रूपा महापृथिवी की चरमसीमा एकविंश पर्यन्त तो पृथिवी ही है । इस के ऊपर अवधान है । यहाँ वरुणदेवता का साम्राज्य है । वरुण के सम्बन्ध से इसे ' वारुणालोक ' भी कहा जाता है पानी के सम्बन्ध से यहां भूतज्योति ( प्रकाश ) का अभाव है । कारगारूपं रूपं मचवा बोभवीति ' - ' इन्द्रो रूपाणि करिकृदचरत् ' इत्यादि श्रौत - सिद्धान्तों के अनुसार सौर ' मधवा ' इन्द्र ही प्रकाश के अन्यतम अधिष्ठाता हैं । इधर बरुण, और इन्द्र का परस्पर अश्वमाहिष्य है । इन्द्र पूर्वदिशा के दिक्पाल हैं, तो १०० पश्चिमदिशा के दिक्पाल हैं । पानी पर वरुण का प्रभुत्त्व है, तो प्रकाश पर इन्द्र का प्रभुत्त्व है । पानी में अग्नि प्रविष्ट होजाता है । पानी उष्ण होजाता है । परन्तु पानी में प्रकाश का प्रवेश नहीं होमकता वहाँ पानी है वहाँ इन्द्र नहीं, जहाँ वरुण है, वहाँ इन्द्र नहीं । जहाँ इन्द्र नहीं, वहाँ घोर अन्धकार । जहाँ अन्धकार, यहाँ असुर । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर प्रकृत ब्राह्मण तिने ' प्रधान देव सवितः परमस्यां पृथिव्याम ' इस मन्त्र भाग की व्याख्या करते हुए ' अन्नमसि बचानेति यदाह परमस्यां पृथिव्यामिति यह कहा है । वरुणदेव पाश के अधिष्टाता हैं । इसी अभिप्राय से आगे जाकर ' शतेन पाशैः ' कहा है । II यह है इस आख्यान का मंक्षिप्त आधिदैविक रहस्य इसी आधिदैविक नित्य यशके आधार पर वैधयज्ञ ( मनुष्यकृतयज्ञ ) का स्वरूप- संस्थापन हुआ | जो फल उस निव्यज्ञ का है, वही फल तत्प्रतिकृतिभूत • भगवान् कृष्ण ने येशु ( बाँसुरी ) क्यों बनाई है, पीताम्बर धारण क्यों किया?, गोपियों के साथ रासविहार क्यों किया?, अर्जुन के साथ ही इन की घनिष्ठ मित्रता क्यों हुई?, अर्जुन को ही क्यों गीतोपनिषत् का उपदेश दिया गया १, राधा को क्यों प्रधान माना गया?, इत्यादि प्रश्नों के समाधान के लिए गीताविज्ञानमाध्यान्तर्गत आचारसस्य का ' मानुषोत्तमकृष्णरहस्य ' नामक प्रकरण देखना चाहिए -८३०

पृष्ठ 567

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द्वितीयाध्याय शतपथ ब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण इस मनुष्यकृत यज्ञ का है । यह उसी की प्रतिकृति है । यही कारण है कि, जैसा, जो कुछ उस आधिदैविकयज्ञ में होता है, ठीक वैसा, वही सब कुछ इस यज्ञ में भी करना पड़ता है । तभी तो - ' देवाननुविधा वै मनुष्याः ' यह कहना पड़ता है । यहाँ ऐसा क्यों होता है?, अमुक कर्म ऐसा क्यों किया जाता है?, इन सब प्रश्नों क समाधान वही प्राकृतिक नित्य आधिदैविक यज्ञविज्ञान है । उसका स्वरूप पहिचानिए, तब आपको विदित होगा कि, यज्ञ बालक्रीड़ा- मात्र नहीं है । केसर, कपूर, खोपरा, घृत आदि को अपनी कल्पना से कल्पित ताँबे को कुडियां में स्वाहा स्वाहा करके डाल देने का नाम यज्ञ नहीं है । केवल ' हवाफिल्टर ' करने का ही नाम यज़ नहीं है । अपितु यज्ञत्रिद्या वह विद्या है, जिसके सम्यक् पारज्ञान से, एवं सम्यक् अनुपालन से आप नवीन सृष्टि बना सकते हैं । नवोन सूर्य - चन्द्र खड़ा कर सकते हैं । अनाबुद्धि साधारण मनुष्योंनें इतर विद्याओं की भाँति आज इस यज्ञविद्या की भी अत्यन्त दुर्द्दशा कर रक्खी है । इस सम्बन्ध में यही निवेदन कर देना पर्याप्त होगा कि, दिव्यदृष्टि से समन्वित आधिदैविक विज्ञान की पूर्ण परीक्षा कर तदनुसार जिन याज्ञिक-पद्धतियों को ब्राम्ह्मण - श्रौतसूत्रादि ग्रन्थों के रूप में हमारे सम्मुख रक्खा है, वही यज्ञविद्या ' यज्ञविद्या ' है । आज समस्त भारत में ( दक्षिण के कुछ परिगणित याज्ञिकों को छोड़कर ) यज्ञविद्या केवल काल्पनिकों का काल्पनिक जगत् ही बन रहा है । पुएमसञ्चय के स्थान में पाप ही सवित होरहा है । पशुवपा-पुरोडाश - सोमरस - आदि आज आहुतिद्रव्य नहीं है । अपितु आज की यज्ञपद्धतियों में आहुतिद्रव्य है - खोपरा ( गोला ) केसर, कस्तूरी, चंदन हा विद्याशून्य भारत! आज तेरा कोई सा भी तो विद्याक्षेत्र स्वस्वरूप से प्रितिष्ठित नहीं है पूर्व प्रतिपादित उसी प्राधिदैविक यज्ञ के आधार पर दक्षिणानुगत इस यजमान का ऋत्विक् ( अ ) हविर्यज्ञ का वितान करना चाहता है । जो भूप्रदेश यज्ञके लिए नियत किया गया है, वह निदानेन ' वेदि ' है । वेदिपर ( भविष्य में वेदिरूप में परिणत होने वाले भूप्रदेश पर ) जो स्तम्बयजु ( कुशमुष्टि ) बिखरा हुआ है, यह निदानेन असुर है । उत्क्षिन्त मिट्टी के तृणादि के -पात्रीनिर्णेजनादि के - यज्ञमण्डल में होने वाले ओर ओर दूषित परित्यक्त पदार्थों के प्रक्षेपके लिए वेदिके उत्तरभाग में एक गहरा गर्त्त ' ( गड्ढा ) बनाया जाता है । इसे ' उत्तर ' कहा जाता है । यह निदानेन श्रन्धतमोरूप चौथा आपोमय - लोक है | अध्वर्यु का दक्षिणबाहु निदानेन ' इन्द्र ' है । वामहस्तस्थ स्पय निदानेन ' वज्र ' है । उच्चार्य्यमाणमन्त्र आधिदैविक ‘ इन्द्रबल ' है । इसप्रकार पूर्वप्रतिपादित निदान रहस्य के अनुसार अब सम्पूर्ण सामग्री प्रस्तुत है । प्रहार करने मात्र में विलम्ब हैं । तत्काल असुर नष्ट होजायँगे । फलस्वरूप सम्पूर्ण यज्ञिय - वातावरण सर्वथा

निर्विघ्न बन जायगा । ६, १०, ११, १२, १३, १४ ॥

इति - स्तम्बयजुर्हरणोपाख्यानरहस्यम् वेदिनिर्माण से पहिले ' स्तम्बयजुहरण ' क्यों किया जाता है? इस प्रश्न का सोपपत्तिक समाधान उपरत हुआ । अब पद्धति — अंश से सम्बन्ध रखने वाले कुछ विशेषभावों का निरूपण कर इस प्रकरण को समाप्त किया जाता । ' स्तम्बयजु ' ( कुशमुष्टि ) निदानविधा से साक्षात् अमुर है । इस पर प्रहार करना ८३१

पृष्ठ 568

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थब्राह्मण अमुर पर ही प्रहार करना है । साथ ही गा- अधान पूर्वक इस स्पयप्रहार का एक प्रयोजन और भी है । यह प्रयोजन है - हिंसाभाव की अति I मिस भूप्रदेश पर यजमान अध्वरक ( अहिंसामय श्रासुरभावशुन्य ( दिव्यकर्म्म ) करना चाहता है, उमी पर यदि ' स्वयं ' का प्रहार किया जायगा, तो भावनामय मन की प्रधानता से ' मैं देवताओं के यजन करने योग्य इस भूप्रदेश पर प्रहार कर रहा हूँ इस भावना से ' यो वमकुद्धः स एव स: ' इस सर्वसम्मत सिद्धान्त के अनुसार सचमुच पृथिवी के अभिमानी देवता ( जिस की अक्षुण्णता पर ही यज्ञकर्म की अक्षुण्णता निर्भर है ) हिंसाभाव से युक्त होजायगा । तृण पर प्रहार करने से इस हिंसाभाव का भी निराकरण होजाता है । ' संशित ' ( तिखीकृत ) ' स्क्य ' वच, से मैं तो असुररूप तृण पर प्रहार कर रहा हूँ, न कि पृथिवी के इस देवयजन भाग पर ' अध्वर्यु की इस भावना से तृणान्तर्धानपूर्वक प्रहार से पार्थिव असुर भी नष्ट होनाते हैं, एवं पार्थिव अभिमानी वशिय देवता भी अनुएरा बचा रहता है । असुरों का नाश तृणान्तर्धान का पहिला प्रयोजन था एवं पार्थिव देवयजनभाग को हिंसाभाव से बचाना दूसरा प्रयोजन है । इसी दूसरे प्रयोजन को लक्ष्य में रखकर ' अथ तृणमन्तर्द्धाय प्रहरति ' इत्यादि कहा गया है || १५ || जिस समय पृथिवि देवयजनि! घोषध्यास्ते मूलं मा हिसियम ' यह मन्त्रभाग बोलता हुआ अध्वर्यु तृणयुक्त भूप्रदेश पर स्वय से प्रहार करता है, उस समय इस प्रहार से बेदिनिर्माण के योग्य इस भूप्रदेश में वर्षा के कारण उत्पन्न हुई जो औषधियाँ ( घास आदि ) हैं, वे भी उखड़ जाती हैं । उखड़ क्या नातीं हैं, इनको उखाड़ना भी प्रधान उद्देश्य है । क्योंकि भूपृष्ठ पर तृणादि जो कुछ प्ररोहित हो रहे हैं, उन सत्र को हटाकर, एवं भूपृष्ठ पर इधर उधर से वायु के द्वारा श्राई हुई, अथवा मनुष्यों के गमनागमन से श्लथ हुई मिट्टी जबतक हटा नहीं दी जाती, तबतक पृथिवी का वह यज्ञिय घनाग्निरस यज्ञ के साथ सम्बद्ध नहीं हो सकता, जैसा कि पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया जाचुका है । किन्तु साक्षाद्रूप से इन श्रोषधियों की जड़ उखाड़ना हिंसाभाव का यज्ञ में ममावेश करना है । उधर प्राणरूप असुरों का भी नाश करना है । इसीलिए तो प्रदेश पर और विश्वा दिये जाते हैं । इस के ब्याज से हिंसाभाव को छुपाता हुआ अध्य भूप्रदेश में प्ररोहित तृगादि को इस प्रथम प्रहार से उखाड़ फेंकता है । जब ओषधियाँ स्पथ के प्रहार से उखड़ जाती है, तो चित्र का यह प्रदेश ' उत्तरमल ' पन जाता है । अर्थात् जो ओषधियों के मूल भाग ( बड़े ) अबतक भूगर्भ में दक्षिणभाग में ( नीचे की ओर ) थे, वे स्क्य के प्रहार से उखड़ कर उत्तर की और ( भगर्भ से निकलकर ऊपर की ओर ) आ जाते हैं । इस अवस्था में अपने स्वभागरूष ओषधियों के उत्तर-मूल होने से तत्सम्बन्ध मे यह पृथिवी भी ' उत्तरमूला ' बन जाती है! इसप्रकार उग्वाता पधया की उर में डालने के लिये हाथ में लेता हुआ अध्य इस प्रदेश को उत्तरमूला बनाता है । पृथिवी को उत्तरमूला बनाना इस भाव को सूचित करता है कि, अवश्य ही किसीने इस प्रदेश पर प्रहार कर इसके शरीर को तरित कर दिया है । ऐसा हिंसाभाव यह में श्रासुरभावप्रवेश का कारण बन जाता है । परन्तु ऐसा किए बिना काम चलता नहीं । इस विप्रतिपत्ति को भावना के द्वारा हटाने के अभिप्राय से मूल उखाड़ते हुए भी, मूल उग्वाड़ कर पृथिवी को उत्तरमूला ( जिस की ओषधियों का मूल उखड़ कर ऊपर की ओर होगया है, ऐसी पृथिवी ही ' उतरमूला ' शब्द से व्यवहृत की जाती है ) बनाता हुआ भी ' ' वया मूलं मा हिंसियम् ' यह बोलकर इस हिंसाभाव का शान्त करता हैं । अध्वर्यु की यह ८३२

पृष्ठ 569

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द्वितीय अध्याय शतपथत्राह्मण भावना एकप्रकार से ठीक भी है । क्योंकि ओषधियों का मूल वस्तुतः इन की जड़ों नहीं है । अपितु भगर्भ की जिस गहराई में, जिस स्थान में ओषधियों की जड़ रहतीं हैं, भपेण्ड का वह प्रदेश अग्निरसमय है । उमी गर्भस्थ अग्निरस का ओषधियों के मूलों के साथ सम्बन्ध होता है । उसी मूलभूत जीवनीय श्रग्निरस के परिषाक से प्रोधियों का स्वरूप निष्पन्न होता है । औषधियों का मूलभूत उपादान ग्रिम सर्वप्रथम ओषधियों के उम भाग से संयुक्त होता है, जो भाग इनका भूगर्भ में उस रस के समीप रहता है । मूलरम के प्राथमिक संयोग ही से भूगर्भस्थ ओषधियों का वह भाग ' मूल ' कहलाने लगता है । वस्तुतस्तु श्रोषधियों का मूल मूलगर्भस्थ अग्रिम ही है । हाँ, यह बात अवश्य है कि, सयप्रहार द्वारा जब ओषधियों की जड़ों उग्वाड़ दीं जाती हैं, तो उस समय जड़ों के समीप ब्यान्त मूलरूप अग्निरम भी क्षुब्ध होपड़ता है । तुब्ध होकर स्वस्थान से च्युत होता हुआ । वह ओषधि - विनिगम मार्ग से बाहिर उत्तर की ओर ( ऊपर की ओर ) भी निकलने लगता है । इसप्रकार श्रोषधिग्रहण से सचमुच अपने इस रसभाव के ( मार्ग मिलजाने से ) उत्तरगमन से भूप्रदेश ' उत्तरमूल ' बन जाता है । केवल इस मौलिक रस के क्षोभ की शान्ति के लिए ही अध्व ' को ' ओपध्यास्ते मूलं मा हिंसिपम् ' यह बोलना पड़ता है । ओषधि तृणादि आवरणोंने हीं उस मौलिक रस को अवरुद्ध कर रक्त्रा था । इनके उखाड़ने से उसे हमारे भूप्रदेश में ( जहाँ हम यज्ञवितान करने वाले हैं ) खाने का अवसर मिल-जाता है । प्रहार के द्वारा होने वाले बात से श्रग्निरसरूप औषधियों के इस मूल की रक्षा की ही प्रार्थना की जाती है । षधियों को तो समूल उखाड़ ही दिया जाता है । सर्वथा विनष्ट इनके मूनों की क्या रहा की जासकती है । रक्षा अभीष्ट है केवल इनके वास्तविक मूलभूत उस गर्भस्थ अग्निरस की । इसी अग्नि ऊष्मा से कृतात्मा ये तृणादि- ' ओषं ( ऊम्माभावं ) धत्ते ' इस व्युत्पात से ' श्रोषधि ' नाम से व्यवहृत होते हैं । कहना यही है कि, यहाँ औषधिमूलों से वह गर्भस्थ अग्निरस ही अभिप्र ेत है । इसी भावके स्पष्टीकरण के लिए यहाँ ऋषिने पृथिवी के लिए ' देवयजनि ' कहा है । देवता आग्नेय हैं । इनका यजन ( सङ्गतिकरण, परस्पर में सम्बन्ध ) अग्न के साथ ही होता है । वह विशुद्धाग्नि भूगर्भ में ही मिलता है । समृद्ध भूपृष्ठ पर तो आगन्तुक दूषित भावों का साम्राज्य रहता है । यहाँ सौर देवाग्नि का यजन नहीं होता । अपितु जहाँ विशुद्ध श्राग्नेय प्राण रहता है, वहीं सौरप्राणाग्नि ग्राकर बद्ध होता है । भूपिण्ड के जिस स्थान में प्राणाग्निमय सौरदेवता श्राकर सम्बद्ध होते हैं, भूपिण्ड का वही प्रदेश ' देवयजनभूमि ' कहा जाता है । उसका मूल वही अग्निरस है । तभी तो इस पृथिवी को ' उत्तरमूला ' कहना अन्वर्थं होता है । नहीं, तो उखड़ श्रोषधियाँ एवं उत्तरमूला बन जाय पृथिवी, यह कैसे सम्भव होसकता है | ओषधियाँ उखाड़ कर फेंक दीं जातीं हैं । भूगर्भस्थ अग्निरस के आगमन का मार्ग जिन श्रागन्तुक तृणादि ने, एवं तत्स्थान पर प्ररोहित श्रोषध्यादिने अवरुद्ध कर रक्ख । वा, प्रहार के द्वारा उन मत्रके उखड़ जाने से वह देवयजन – स्वरूपसम्पादक अग्नि बाहिर निकल कर हमारे उस भूपृष्ठ को भी देवयजन भावोपेत बना देता है, जिसमें कि हम देवताओ का यजन करने वाले हैं । यदि श्रधि का निरसन न किया जाय, तो पार्थिव अग्नि का हमारी वेदिके साथ सम्बन्ध न हो । ऐसा न हो, तो हमारा यज्ञ देवभाव से ही युक्त न हो । इसी सम्पूर्ण अग्निरहस्य को लक्ष्य में रखकर प्रथम प्रहार का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं--उत्तरमूलामित्र एनामेतत् करोति - प्राददानः । तामेतदा हौषधीनां ते मूलानि मा हिंसिषमिति ' । ८३३

पृष्ठ 570

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 570 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड चतुथब्राह्मण एक विशेष लोकतथ्य से इस स्थिति का सर्वात्मना स्पष्टीकरण होजाता है । ब्रीहि, यव, गोधूम ( चाँवल, जी गेहूँ. ) यदि ओषधियों में जहाँ चान्द्रसम्यमाण, तथा पार्थिव भौम अग्नि, ये दो चान्द्र पार्थिव उच्च प्रधान हैं, वहाँ वनस्पतियों में फलों में पार्थिव जाग्नेय प्राण तथा तद्गमभूत सौरप्राण ही प्रमुख बने रहते है सहज भाषानुसार ओषध्यन्न चान्द्र है, एवं वनस्पत्यन्न सौर है 1 वनस्पतियों का परिपाक पृथिवी के गर्मस्थ उस ' देवयजन ' भाग से ही होता है, जिसका प्रवर्ग्यात्मक उस सौरप्राण से सम्बन्ध है, जो सौरमण्डल से बिस्रस्त होकर भूगर्भ में समाविष्ट होता हुआ भू की वस्तु बन जाता है । अतएव वनस्पतिरूप वृक्षों के स्वरूप - निर्माण में वृक्षों की बालावस्था में पुनः पुनः इनके मूलों को कुरेदा जाता है t जो क्रिया हमारी प्रान्तीय भाषा में - गुरबाई ' ' नाम से प्रसिद्ध है । ऊपर के श्लथ मृद्भाग को उँचींद कर भीतर के प्राणाग्नि को उत्तरमूल बनाने के लिए ही वह क्रिया होती है । तभी वृक्ष पुष्पित पल्लवित होते हैं । निग्वननात्मिका इस ' गुरवाई ' से गर्भस्थ सीरणात्मक देवयजन भाग अभिव्यक्त होजाता है I और प्रमुख रूप से यही वनस्पतियों का परिपाक करता है । इसी देवाग्नि - सौराग्नि देवयजनाग्नि की प्रमुखता से भारतीय - उपवास - विधियों ( व्रत ) में इस का परिब्रहण हो गया है, जबकि श्रोषध्यन्न उपवास में माना गया है । अन्नाद्दार बहाँ पाय चान्द्र - भाषानुबन्ध से मलभाग का वर्द्धक है, मेद का वर्द्धक है, यहाँ फलाहार सौरभावानुबन्ध से निर्भर बनता हुआ बुद्धि के सत्त्वगुण का ही प्रेरविता माना गया है, जैसा कि आरम्भ के - ' व्रतोपायनकम्म ' मे विस्तार से बतलाया जा चुका है । वृक्षमूल के सन्निहित तृणादि को पृथक् कर वहाँ की मिट्टी को उलीच देने से ही भूगर्भस्थ देवयजनप्राण ऊर्ध्वं विनिर्गत होता हुआ - ' उत्तरमूल ' बनता है, और यही फलसमृद्धि का प्रमुख कारण है । वही ' उत्तरमूलसम्पत्ति ' यहाँ श्रुति के द्वारा स्पष्ट हुई है । प्रहार से मूलभूत अग्निरस मार्ग मिल जाने से उपरि - भाग- पर्यन्त आता मात्र है । सर्वथा वह अपनी प्रतिष्ठा छोड़दे, एकान्ततः निकल जाय, यह बात नहीं है । इसी भाव को लक्ष्य में रखकर ' उत्तरमूला - इव -वा ' इत्यादि रूप से ' इव ' पटका सन्निवेश किया गया है । अति के अक्षरों पर ज्यों अधिक विचार किया जाता है, त्यों त्यों उन में नवीन नवीन रहस्य उप-लब्ध होता जाता है । तभी तो यह रहस्यार्थमनी गमीरातिगभीरा वेदवाणी ' ईश्वरीयवाणी ' कहलाई है । केवल श्रुति के अक्षरों पर ही विश्राम कर लेने से कथमपि आप वास्तविक तत्त्वबोध की सीमा पर नहीं पहुँच सकते । केवल सुनने से ही ' श्रति ' की इतिकत्तव्यता समाप्त नहीं होजाती । वस्तुस्थिति तो कुछ ऐसी है कि, केवल ' वाङ्मय ' ही नहीं है अतिथिद्या ' ' आत्मविद्या ' है । उधर ' स वा एष आत्मा वाङ्मयः प्राणमयो मनोमयः ' के अनुसार आत्मा ' मनः प्रारण वाङ्मय ' हे मनःप्राणवाङमयी श्रीतविद्या के सम्यक् परिज्ञान के लिए आप अबतक अपने आत्मा के मनः प्राणवाक् इन तीनों पर्वो का उस के साथ सम्बन्ध नहीं कर देंगे, तबतक केवल अतिरूप वाग्ज्याचार से श्री तत्त्व सर्वात्मन कदापि गतार्थ नहीं बन सकेगा । सुनकर साधारण अक्षरर्थ समभ लेना ही वागुव्यापार है । सुनने के अनन्तर सुने हुए अक्षरों के आधार पर प्राणव्यापाररूप तपश्चर्या करना, सतत उस ओर प्रवृत्त रहना हीं प्राणश्यापार है, एवं सतत तपश्च से मनोयोग के द्वारा उम्र तक अनुशीलन करना हीं मनोव्यापार है । इन तीनों व्यापारों के सम्यक अनुष्ठान के अनन्तर ही आत्ममय त्रिकल श्रोत तत्व का सम्यक् दर्शन ( साक्षात्कार होसकता है । उपर्युक्त तीनों व्यापारों के लिए ही - क्रमशः वाग्व्यापार के लिए ' श्रुति ' शब्द, प्राणव्यापार के लिए ' मति ' ८२४