Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 571–580

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 571–580

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण चतुर्थत्राह्मण शब्द, एवं मनोव्यापार के लिए ' निदिध्यासन ' शब्द प्रयुक्त हुए हैं । इसी श्रौत तत्वसमन्त्रयोपयोगी तथ्य का दिग्दर्शन कराते हुए ऋषि ने कहा है-“ आत्मारे वाग्रं द्रष्टव्यः ( कथम् १ ) श्रोतत्र्यो, मन्तव्यों, निदिध्यासितव्यः ” श्राज तथोक्त आदेश में केवल ' श्रोतव्यः ' अंश पर ही भारतीय विद्वान् विश्राम कर लेते हैं । सुन लिया पुण्य हो गया, श्रुति की इतिकत्तव्यता समाप्त होगइ । यही कारण है कि, सम्पूर्ण विश्वसम्पत्ति के अभ्युदय के साधनभूत बादक - साहित्य का अधिष्ठाता बनता हुआ भी आज भारतीय विद्वत्समाज अभ्युदय से बञ्चित होता हुआ, अवनतिगर्त की ओर ही अग्रेसर होता जा रहा है । इसका एकमात्र कारण है - श्रर्थाश की अज्ञता । केवल शब्दभक्ति | इसी तथ्य का स्पष्ठभाषा में दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति

कहती है-स्थाणुरयं भारहा: किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति येोऽर्थम् ।

योऽथज्ञ इत् सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा ॥

हम बतला आए हैं कि, तृग्गादि की मुष्टि निदानभाव से साक्षात् असुर है । तृण का गौपशु के साथ घनिष्ट सम्बन्त्र है | अतएव जो मनुष्य मूर्ख होता है, बुद्धिशून्य होता है, पशुतुल्य होता है, उसके लिए लोक में- ' तुमने तो ' घास ' खाया है, कभी काम थोड़े ही किया है, पूरे बैल ही रहे ' यह कहा जाता है 1 वेद का यह सर्वमान्य सिद्धान्त है कि, यज्ञ में जो निरर्थक वस्तु होती है, उससे शत्रु का बल बढ़ता है, और यदि न्यूनता रह जाती है, तो यज्ञसमृद्धि उच्छिन्न होजाती है । ऐसी अवस्था में यज्ञ को सुसम्पन्न बनाने के लिए यह आवश्यक होजाता है कि, न तो यज्ञ में न्यूनता हो, न अतिरिक्तता ( व्यर्थ की वस्तु ) हो । ये तृणादि प्रकृत में सर्वथा व्यथ हैं । इनका यज्ञ में कोई उपयोग नहीं है । यह व्यर्थ की भावना भी यज्ञ के लिए अनिष्टकर है । इसी श्रनिष्टभाव को दूर करने के लिए ऋषि ने - ' ब्रजं गच्छ गोष्ठानम ' यह कहा है | मानते हैं, यहाँ तृण का उपयोग नहीं है । परन्तु गोपशु का तो यह अन्न है । जिस तृण को मनुष्य व्यर्थ समझता है, गोपशु उसी से अपना जीवन - निर्वाह कर लेता है । तृण को गोष्टान ( गाय के ठान ) में डाल देना, इससे बढ़कर तृण का और क्या उपयोग हो सकता है? । ' हे तृरण! तुम गोस्थान चले जाओ ' यह कहना तृण की व्यर्थता का ही निरसन करना है । अपिच तृणासुर है | उधर ब्रजधामरूप ' गोष्ठान ' नाम का श्रानोमय परमेष्ठीमण्डल असुरों की श्रावासभूमि है । अतः तृणरूप असुर को यहाँ से निकाल कर वहीं स्वस्थान में भेजना अनुरूप भी है । पानी एक ऐसा स्थान है, जहाँ यदि शत्रु को बैंक दिया जाता है, तो वह सर्वथा ही परास्त होजाता है । पुनः उसे चाक-मण करने का अवसर ही नहीं मिलता । इसलिए तो लोक में भी शत्रु के लिए ' राम करे वह डूब मरे ' यह यह कहा जाता है | श्राज अध्वर्यु ' निदानेन तृणरूप असुरों को उसी पानी में डुबोकर उसे सर्वथा हतवीर्य बना रहा है । इसी अभिप्राय से- ' अभिनिधास्यन वैतदनपक्रमि कुरुते । तद्धि - अनपक्रमि यद् व्रजे अन्तः ( सलिलसीमा ) । तस्मादाह त्रजं गच्छ गोष्ठानमिति, यह कहा गया है । इसप्रकार प्रथम प्रहार से शत्रुरूप तृण को समूल उखाड़ कर पराः परावत गहन अन्धकार में प्रक्षित कर अध्वर्यु ' ' वर्षतु ते द्यौः ' यह कहता हुआ वेदिस्थानयोग्य इस भूप्रदेश पर ' प्रोक्षण ' करता है । तात्पर्यं ८३५

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द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थ इसका यही है कि, द्युलोक के अधिष्ठता आदित्य ( इन्द्र ) देवता हैं । यही पुरोत्रात, मेघ, विद्य ुत्, स्तन-यित्नुरूप में परिणत होकर दृष्टि का कारण बनता है । इन्द्र ही ' नमुचि ' का शिरच्छेदन कर पर्जन्य के द्वारा दृष्टि का स्वरूपसमर्पक बनता है छान्दोग्य के अनुसार आदित्याग्नि में बहुत सोम दीं क्रमशः श्रद्धा, पर्जन्य बनकर ' वृष्टि ' रूप में परिणत होता है । वृष्टि क्या है?, द्यलोक में प्रतिष्ठित साक्षात् इन्द्रदेवता है । इन्द्र सार्वदैवत्य है । अतएव इसके लिए - ' इन्द्रः सर्वा देवता: ' यह कहा जाता है । वृष्टि क्या है?, इन्द्र है इन्द्र क्या है? सम्पूर्ण देवता है । हम कह आए हैं कि, जब भूपिण्डस्थ अग्निरस स्वस्वरूप से युलोक के इन्द्रज्येष्ठ सीरदेवताओं का वजन ( सम्बन्ध ) होता है । विकसित होजाता है, तभी इसके साथ आज तृणादि दूषित भावों के छूटने से हमारा भूप्रदेश वेदियोग्य बनता हुआ सचमुच ' देवयजन - सम्पत्ति ' से युक्त होगया है । आज सचमुच दिव्य-देवताओं का हमारे इस पृथिवी भाग के साथ सम्बन्ध होगया है । उसी दिव्य सम्बन्ध की ' वृष्टिरूप ' से भावन । करता हुआ अध्य ' पानी या प्रोक्षण करता हुआ कहता है कि हे पृथिवी! आज आप दूषित भात्रों के परिमार्जन से अपने प्रातिस्थिक अग्निरसरूप से विकसित होती हुई देवयजन की अधिकारिणी बन गई हैं । इसलिए आज आपके लिए लोक वर्षा करै । अर्थात् वर्षा के रूप में परिणत होने वाले गुलोकस्थ प्राणदेवता आपके साथ सम्बन्ध करें " यह है ' प्रोक्षण ' का एक प्रयोजन । अपिच स्पय के बहार से भूप्रदेश तत विद्वत होजाता है । यह एक प्रकार का हिंसामाव है । एक प्रकार का हिंसाभाव क्या है, सचमुच ही तो हिंसाभाव है । वास्तव में इस प्रहार से पार्थिव प्राणाग्नि क्षुध होजाता है । यह क्षोभ यजमान के आत्मा की अशान्ति का कारगा बन सकना है । इसे दूर का करने उपाय है ' प्रोक्षण ' पानी शान्ति का अधिष्ठाता है " विशेषतः प्राणाग्निज्ञोम के लिए तो पानी के अतिरिक्त भूतद्रव्यों में दूसरा शान्तिप्रद द्रव्य है ही नहीं । क्योंकि ' आपोमयः प्राण: ' इस छान्दोग्य - सिद्धान्त के अनुसार पानी हीं प्राणाग्नि का स्वरूप- समर्पक माना गया है । प्रत्यक्ष में भी यह त देखी जाती है । जलचिकित्सा से बढ़ कर अग्निताप की शान्ति का दूसरा उपाय नहीं है । गर्मी लगती है, तो स्नान कर लीजिए । तत्काल अग्निक्षोभ शान्त होजायगा । प्राणाग्नि गरमी से क्षुब्ध व्याकुल होरहा हो, तो एक ग्लास ठण्ढे पानी का पी लिखिए तत्काल प्राणचोम शान्त होजायगा पार्थिव अग्निप्राण के इसी क्षोभ को शान्त कर यहसम्पत् को छोभ रहित बनाने के लिए प्रोक्षण किया जाता है । पानी न केवल शान्ति का ही कारण है I अपितु इससे विरिष्ट - सन्धान भी होजाता है । विखरा हुआ गोधूम्र चूर्ण ( गेहूँ का चून ) पानी के सम्बन्ध से परस्पर मिल जाता है । क्षत विक्षत शरीर पानी से संहित होजाता है । आज सपथ के प्रहार से पार्थिव अग्नि जैसे तुन्ध होगया है, तथैव इस प्राणाग्नि का शरीररूप भूप्रदेश भी क्षत - विक्षत होगया है । पानी दोनों दोष हटा देता है । पानी से भूप्रदेश सम बन जाता है एवं होम भी उपशान्त दोजाता है । इसीलिए प्रहारानन्तर प्रोक्षण करना परम आवश्यक है । इसी प्रोक्षणनिशान को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं— यत्र वाऽअस्यै खनन्तः क्रूरीकुर्वन्ति, अपघ्नन्ति ( तत् ) शान्तिरापः । वदद्भिः शान्त्या शमयति । तद्भिः सन्दधाति । तस्मादाह - ' वर्षतु ते द्यौः ' इति । ८३६

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मया चतुर्थब्राह्मण प्रोक्षणान्तर स्पय से उत्पाटित मिट्टी तृरण, ओषधि आदि को उत्तरभागस्थ उत्कर में डाल दिया जाता है । ये सब दृपितभाग निदानेन असुर हैं । उधर उत्कर निदानेन ' गोष्ठान ' नाम का श्रापोमय घोरतम से श्रावृत चौथा लोक है । प्रकृति में सौरप्रेरणात्मक सविता देवता ही इन्द्रप्राण के साथ तानूनन्त्र करके ( साथ मिलकर ) स्वरश्मिरूप वज्र से तमोमय असुरों को जर्जरितकाय बनाकर इहें उस तमोमय वारुणलोक की ओर फैंक देता है । वहाँ ( श्रापोमय मण्डल में वरुण का साम्राज्य है । वरुणदेवता अगत स्नेहधम्म से पाश के ( बन्धन ) प्रवर्तक हैं । वह स्थान स्तौम्यत्रिलोकीरूपा महापृथिवी की अन्तिम सीमा है, जैसा कि पूर्व के आधिदैविक विज्ञान रहस्य में विस्तार से बतलाया जाचुका है । वह सचमुच ऐसा असुर्य्य लोक है, जहाँ जाकर असुरकर्म्मा आत्मघाती सदा के लिए बन्धन से आबद्ध होजाते हैं । श्रात्महत्या करने वाले का आत्मा ' लोकालोक ' नाम से प्रसिद्ध इसी अन्धतम में जाता है । ऐसे श्रात्मा का कभी उद्धार नहीं होता । तय धर्माचार्यों ने ' आत्महत्या ' को सब से बड़ा पाप माना है । मनुष्य पर भले ही कितने हीं सङ्कट आवें, उस सङ्कट से भले ही उसके प्राण चले जायँ परन्तु भूलकर भी वह आत्मघात न करै । यदि उसने मूर्खतावश सङ्कट से संत्रस्त होकर ऐसा कर लिया, तो पुनः उसका कभी उद्धार न होगा । पुनः होगा क्या?, तो सुनिए वेद क्या कहता है—

सुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृता ।

तांस्ते प्रत्यभिगच्छन्ति ये के चात्महनेा जनाः ॥

- ईशोपनिषत वहाँ जाने पर पुनः परित्राण सम्भव नहीं है । दिव्यभावना से भावितान्तःकरण अध्वर्यु श्रसुरों को उसी पृथिवी के पारस्थान में, घोर अन्धाकार में, कभी छुटकारा न होने वाले ' लोकालोक ' नाम के श्रापो-मय समुद्र में ढकेलता है । इसी भावना विज्ञानको लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं-" वधान देवसहितः परमस्यां पृथिव्यामिति देवमेवैतत् सहितारमाह । श्रन्धे तमसि बधानेति यदाह - परमस्यां पृथिव्यामिति । शतेन पाशैरिति- अमुचे ( मोचनाय ) तदाह । योऽस्मान् द्वेष्टि यंच वयं द्विष्मस्तमतो मामौ - यदि नाभिच्चरेत् " यदि यजमान का कोई प्रबल शत्रु है, एवं यजमान उसे नष्ट करना चाहता है, तो इस अभिचार-कामना की पूर्ति के लिए ‘ यं ' ' तं ' के स्थान में उस शत्रु का नाम बोल देना चाहिए । निःसन्देह एक वर्ष के भीतर भीतर यजमान के शत्रु का सर्वनाश होजायेगा ॥ १६ ॥

प्रकृति में देवता पृथिवी अन्तरिक्ष - यौ - श्रापः इन चारों लोकों से अमुर को मार मार कर निकालते हैं । चार लोकों के लिए उन प्राण देवताओं का प्रहार चार भागों में विभक्त होजाता है । इस सम्बन्ध में श्राप एक प्रश्न उठा सकते हैं । वह यह है कि अभी अनुपद में हीं पूर्व के प्रकरण में ( १६ वीं कण्डिका में ) यह बतलाया गया है कि, असुरों को यहाँ से निकाल कर चौथे आपोलोक में ढकेल दिया जाता है । उस अन्तम से ' तमतो मा मौक ' इत्यादि के अनुसार वे कभी नहीं निकल सकते । परन्तु अब ठीक इस पूर्व सिद्धान्त के विरुद्ध यह कहा जाता है कि, तीनों लोकों की भाँति चौथे लोक से भी असुरों को निकाला जाता है । यह श्रुति - विरोध कैसा? । ८३७

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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थब्राह्मण वास्तव में साधारण - दृष्टि से श्रुति के अक्षरमात्र पर विश्राम करने से विरोध प्रतीत होता है । परन्तु जत्र विज्ञानदृष्टि से विचार किया जाता है, तो विरोध उपरत होजाता है । आपोलोक में असुर प्रतिष्ठित रहते हैं, यह भी ठीक है, एवं आपोलोक से असुर निकाले जाते है, यह भी ठीक है । स्वयं आपो-लोक ही दिब्य, आसुर भेद से दो भागों में विभक्त है । अपोलोक में हमने भृगु की सत्ता बतलाई है । साथ ही यह भी कहा है कि, यह भृगु घन तरल - विरल - इन तीन अवस्थाओं के कारण आपः वायु- सोम, इन तीन पृथक् पृथक् स्वरूपों में परिणत होजाता है । घन द्रव्य श्रापः है, तरल द्रव्य वायु है, एवं विरल-द्रव्य सोम है । इन तीनों में मध्यस्थ वायु का दोनों के साथ आप:, और सोम के साथ ) भोग होता है । प् से अनुग्रहीत वायु ' वारुण ' है, एवं मोमानुगृहीत अम्भोमय वायु ' शिव ' है । इसी को पौराणिक परिभाषानुसार ' साम्ब सदाशिव ' कहा जाता है । ग्रन्थि ( गठिया ), गृधसी, उदरशूल, शिरःशूल आदि शूल - सम्बन्धी जितने भी रोग हैं, ' न वातेन विना शुलम् इस ' प्रायशास्त्र ' सिद्धान्त के अनुसार वाणवायु से ही होते हैं । ये वरुण मृगु के अनुभाग में प्रतिष्ठित हैं । अतएव वर्षाऋतु में जब इस वारुणवायु का सञ्चार होता है, तो ' वातव्याधि ' विशेषरूप से अपना प्रभाव स्थापित कर लेती है । उधर ' शिवा ' सोमगुणक बनता हुआ जीवन की रक्षा करता है * । भार्गव - सम्बन्ध से यह शिववायु भी वर्षाऋतु में अपनी प्रधानता रखता है । इसी का पुरोत्रात ( पुरवाई हवा ) रूप से विकास होता है । जहाँ वारुणवायु अत्यन्त - अहितकर है, ठीक इसके विपरीत यह पुरोवातरूप शिववायु सर्वथा हितकर है । वर्षाकाल मे ( मेद्द बरसते समय 1 जो हवा चलती है, वही ' वारुण ' है । इस से बचना चाहिए, विशेषतः वातव्याधि वाले को I वर्षा के आरम्भकाल से पहिले जो पूर्व की ओर का वायु चलता है, वही ' पुरोत्रात ' कहलाता है । सोन के सम्बन्ध से इसे ' ऐन्द्रवायु ' भी कहा जाता है । इस का सेवन करना चाहिये - विशेषतः वातव्याधि वाले की । जहाँ वारुणवायु शरीर जकड़ देता है, वहाँ पुरोवातरूप ऐन्द्रवायु स्व - गतिभाव से शरीरग्रन्थियाँ खोल देता है । वारुणवायु सटा पश्चिम से आता है, एवं ऐन्द्रवायु सदा पूर्व से आता है । वर्षा लाना ऐन्द्र-वायु का काम है, एवं वर्षा उड़ा देना बारुणवायु का काम है । जब भी पूर्व का वायु चले, विश्वास कीजिए, उस समय अवश्य ही वृष्टि होगी । बच भी पश्चिम का वायु चले, विश्वास कीजिए, दृष्टि उड़ जायगी । कारण इसका यही है कि बाणवायु आप्य होने से शीतप्रकृतिक है । इस शीतभाव से मेचस्थ पानी का संघटन और भी अधिक हद दोनाता है अतय इसके आगमन से वर्षा नहीं होती । ऐन्द्रवायु सीम्प होने से आग्नेय - प्रचान है । क्योंकि अग्नि सोम की परस्पर मैत्री है । इसके आगमन से मेवस्थ ' नमुचिप्राण ' शिथिल होनाता है । पानी दूत होकर भूपृष्ठ पर गिर पड़ता है । प्रकृत में इस वृष्टिविद्या के सम्बन्ध में विशेष कहना प्राकृत होगा । यहाँ केवल यही बतलाना है कि, आपोमय परमेष्ठी में - वायु सोम- भेद से तीनों तथ्यों का विकास होता है । * अश्लेषा नक्षत्र - भोगकालात्मक वर्षाजल आसुर - वारुण बनता हुआ जहाँ रोग - प्रवर्तक है, वहाँ मघा नक्षत्र - भोगकालात्मक वर्षाजल देव ऐन्द्र बनता हुआ स्वास्थ्य वर्त्तक माना गया है । इस विषय का विशद निवेचन पञ्चप्रथानानुगतावृष्टिविद्या ' में विस्तार से किया जाने वाला है । ८३८

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द्वितीय अध्याय शतथपब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण उक्त तीनों तत्त्रों के आषः, त्राणवायु, ऐन्द्रवायु, सोम, ये चार भेद हो जाते हैं । वर्षाऋतु में जहाँ वरुण के साथ ' वारुणत्रायु ' का प्रभुत्त्व रहता है, एवमेव वृष्टि के अधिष्ठाता सोम के माहचर्य में ' ऐन्द्रवायु ' नाम से प्रसिद्ध ' साम्ब सदाशिववायु ' की भी मत्ता रहती है । श्रावण इस वायु का उद्याभकाल है । अतएव श्रावणमास साम्बसदाशिव की आराधना का समय माना जाता है । यह ' शित्रवायु ' सोम से अविनाकृत है, सोम सौम्यभाव का अधिष्ठाता है । अतएव ' सदाशिव ' को ' भोलानाथ ' कहा जाता है । इसप्रकार वायु से विभक्तानोमय मण्डल के वारुणमण्डल, सोममण्डल भेद से दो विभाग होजाते हैं । दूसरे शब्दों में-एक ही पोमण्डल सोम और आपः के भेद से दो भागों में विभक्त होरहा है । आप भी सोम की अवस्था-विशेष का ही नाम है, एवं सोम भी आप की अवस्थाविशेष का ही नाम है । अतएव इन दोनों को हम ' सोम-लोक ' भी कह सकते हैं, एवं ' आपोलोक ' भी । परन्तु जब देवासुरों की स्थानव्यवस्था का विचार किया जायगा, तो दोनों को विभक्त मानकर ही तथ्य का समन्वय करना पड़ेगा । ऐन्द्रवायुमय आपोलोक इन्द्रके सम्बन्ध से देवताओं की आवासभूमि कहलाएगी, एवं बारुणमय श्रापोलोक वरुणके सम्बन्ध से असुरों की आवासभूमि मानी जायगी । यही कारण है कि, एकविंशस्तोम के ऊपर जहाँ वैज्ञानिकों त्रयस्त्रिशस्तोम पर्य्यन्त ( ३३ पर्य्यन्त ) आपोलोक की व्याप्ति बतलाई है, वहाँ उन्होंने हीं २७-३३ कम से उस प्रापोमय मण्डल के दो विभाग कर दिए हैं । त्रिवस्तोम ( २७ ) पर्य्यन्त ' भास्वरमोम ' की सत्ता मानी जाती है, एवं त्रयस्त्रिंशस्तोमपर्य्यन्त ' दिकमोम ' ( ' वारुण ' नाम से प्रसिद्ध ' वृत्रमोम ' ) की सत्ता मान गई है । ये ही हमारे पूर्वोक्त ऐन्द्रलोक, एवं वारुणलोक हैं । २७ पर्य्यन्त देवताओं का ही साम्राज्य है । अतएव विज्ञान - समयानुसार २५ वें ग्रहण पर ' सौम्यविद्य द्रिन्द्र की सत्ता मानी जाती है । बही अहर्गण ' अवित्रा-कामहः ' - ' महाव्रतम् ' - ' अशोकमहम ' - ' कामप्र ' यादि नामों से व्यवहृत हुआ है । वस्तुस्थिति यही है कि, स्तौम्यत्रिलोकीरूपा महापृथिवी की अन्तिम सीमा पर ( २१ वें अहर्गण पर ) भगवान् सूर्य्य अपनी सहस्र किरणों से तब रहें हैं । सूर्य आपोमन परमेष्ठीमण्डल के गर्भ में प्रतिष्ठित है, जैसा कि ' अपां गम्भन्त्सीद ' इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है । सूर्य अपनी रश्मियों से धक्का देकर पारमेष्ठ्य पानी को चारों ओर फेंक रहे हैं । उस पानी में हीं उपयुक्त ऐन्द्रवायु से अनुग्रहीत दाघ सोम विद्यमान है । जहाँ-तक सोम की सत्ता है, वहाँतक ( २७ तक ) रश्म्यवच्छिन्न सौर सावित्राग्नि चला जाता है । सोमसम्बन्ध मे रश्मियों को बल मिलता रहता है । इसप्रकार आपोमय परमेष्ठी का सोमावच्छिन्न प्रदेश सौरप्राण से आक्रान्त होकर सौरदेवताओं के अधिकार में आजाता है । जहाँ केवल पानी का ही साम्राज्य है, वहाँ सौरदेवता नहीं नासकते । पारमेष्ठ्य श्रापः का जो प्रदेश सौररश्मियों से प्रकाशित होजाता है, वह प्रकाशित - तेजोमय सोममूर्ति पानी हीं ' वेन ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । इसी ज्योतिर्म्मय ' वेन ' पानी से सुप्रसिद्ध ' दर्भ ' ( कुश- डाभ ) उत्पन्न हुई हैं । इस विषय का विशद विवेचन पूर्व के ' हर्मोत्पत्तिविज्ञान ' नाम के प्रकरगा में किया जाचुका है । इसी ज्योतिर्भाव के कारण इस देवप्राणमय अप्सोम को ' भास्वरसोम ' कहा जाता है । इसी को ऋग्वे दस्थ सोमप्रकरण में ' इन्दु ' नाम से व्यवहृत किया गया है । वस्तु की अन्तिम सीमा में पानी का स्तर रहता है । अन्तिम सीमा हीं उस वस्तु की ' दिक ' ( दिशा ) है । इसी समाप्तिभाव को लक्ष्य में रखकर अर्वाचीन संस्कृत - साहित्य में प्रकरण — समाप्ति के अन्त में ' इति दिक् ' यह निद्दे श रहता है । इस ' दिक ' के सम्बन्ध से द्दी बृत्रसोममय वह बिशुद्ध श्रासुरलोक – ' दिक्सोम ' नाम से व्यवहृत हुआ है । हर्गणक्रमानुसार पृथिवी के ८३६

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द्वितीयाध्याय त्रयस्त्रिंश ३३ त्रिगाव २७ एकविंश २१ पञ्चदश १५ त्रिवृत् चतुर्थब्राह्मण प्रथमकाण्ड - दिक्सोमलोकः - श्रासुरलोकः आप ४ - भास्वर सोमलोकः - देवलोकः - श्रादित्यलोक -योः ३ - वायुलोक: -अन्तरिक्षम् २ अग्निलोक: -" - पृथिवी १ -प्रतिष्ठा भूमिः J ८४० २६ वीं अहर्गण पर ' गोसत्र ' नाम का ' वैष्णवयज्ञ ' होता है । यहीं विष्णु देवता की प्रतिष्ठा है । यहाँ ज्योति-रूप इन्द्र का अभाव है । केवल तमोमय रात्रिविधाता सुरप्राण का ही साम्राज्य है । अतएव २६ वें अहर्गणस्थ आपोमय मण्डलस्थ पारमेष्टय विष्णु को सदा ' योगनिद्रा ' से समन्वित माना जाता है । यह स्थान २७ से ऊपर है । यही गोसवयज्ञात्मक गोष्ठान है । प्रकृत में इसे ही असुरों की आवासभूमि बतलाया गया है । २१ से ऊपर ३३ पर्यन्त का सम्पूर्ण स्थान अप्साधारण्येन ' आपोलोक ' नाम से प्रसिद्ध है । इस सामान्य-व्यवहार की अपेक्षा लोकगणना के सम्बन्ध में - ' पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौरापः ' यह व्यवहार प्रचलित है । इस श्रापोलोक में ३३-२७ क्रम से असुरलोक, देवलोक, दोनों प्रतिष्ठित हैं । श्रतएव जहाँ श्रुति को ( यज्ञिय कम्पों में ) त्रिरणव स्तोमावच्छिन्न भास्वरसोमात्मक श्रापोमय देवलोक अभिप्रेत होता है, वहाँ वह श्रापोलोक के साथ ‘ देवलोक ' का विशेषण लगाती हुई— ' अस्ति वै चतुर्थो देवलोक आपः ' यह बोल दिया करती है । दिक्मम्बन्ध से - ' पृथिव्त्रन्ता क्षं द्यौर्दिशः ' यह व्यवहार भी देखा जाता है । इसप्रकार पर्वोक्त प्रकरगा से पाठकों को यह मान लेना पड़ेगा कि, चतुर्थ लोक से प्रसिद्ध केवल पारमेष्ट्य अपोलोक के ही श्रापः, सोम, ( दिक् सोम, भास्व सोम ) भेद से दो भेद होजाते हैं । श्रापोलोक श्रसुरलोक है, एवं सोमलोक देवलोक है । पार्थिव गायत्री के द्वारा इसी सोम का अपहरण होता है । वह सोम कैसे गायत्री के द्वारा पृथिवी में आता है?, इस का उत्तर -- एतद्ध सौपर्णमाख्यानमा-ख्यानविद श्राचक्षते ' इत्यादि रूप से तृतीयकाण्ड में द्रष्टव्य है । प्रकृतियज्ञ में देवता त्रिवृत्, पञ्चदश, एकविश, एवं त्रिरणत्रस्तोमात्मक- पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, श्रप: ( देवलोकरूप अपः ), इन चारों लोकों में से वज्रप्रहार के द्वारा असुरों को निकाल कर स्तोमगणना

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द्वितीयमाय शतपथब्राह्मण चतुर्थब्राह्मण की अपेक्षा से त्रयस्त्रिंशरूप पाँचवें लोक में, एवं लोकगणना की अपेक्षा सं ( अपसामान्य की अपेक्षा से ) चतुर्थ, गोष्ठानरूप, वैष्णवधामात्मक अपोलोक में मार भगाते हैं । इसी लोकविज्ञान की अपेक्षा से— " देवताओं नें चारों लोकों से अपुरों को वज्रप्रहार के द्वारा निकाल दिया, एव चांये गोष्ठानरूप आपोलोक में उहें डाल दिया, जिस से वे उस अपने लोक से कभी बाहिर न जासकें ' श्रुति के उपर्युक्त दोनों विरुद्ध व्यवहार यथावत् समन्वित होजाते हैं । प्रथम प्रहार से अध्वर्यु ने त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्न पृथिवीलोक में रहने वाले सत्र असुरों को मार भगाया । अब क्रमप्राप्त द्वितीय प्रहार से पञ्चदशस्तोमा वच्छिन्न अन्तरिक्ष में रहने वाले असुरों के नाश की इतिकर्त्तव्यता बतलाते हुए ऋषि कहते हैं— ' अथ द्वितीयं प्रहरति । ' आपोय परमेष्ठ में रहने वाले वारुण असुरोंनें सृष्टि के आरम्भ में यज्ञिय - वेदिरूपा स्तम्यत्रिलोकी में रहने वाले प्राणदेवताओं पर आक्रमण किया था ' यह पूर्व के आधिदैविक - आख्यान-रहस्य में विस्तार से बतलाया जाचुका है । पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ श्रपः, इन चारों लोकों में व्याप्त आसुर वारुणप्राण भी चार ही भागों में विभक्त है । वे चारों अवस्थाएँ क्रमशः तृण - अरुरु - द्रप्स - श्रपः इन नामों से व्यवहृत होतीं हैं | पार्थिव ओषधियों का मूलभाग ( अन्नशून्य दण्डमाग - जिसे कूटकर पशुओं को दिया जाता है, एवं ऐसे तृणविशेष, जो मनुष्य के उपयोग में न आकर केवल पशुओं के ही उपयोग में आते २ ) सुरप्राणाक्रान्त हैं । इसी सामानाधिकरण्य को लक्ष्य में रखकर ऋषिने पार्थिव तृणादि को पार्थिव -संस्था में भुक्त वारुण- असुरों का निदान माना । अन्तरिक्ष में वायु की प्रधानता है । ऐन्द्रवायु जहाँ दिव्य है, वहाँ वृष्टिविरोधी वारुणवायु आसुर है । तृणावच्छिन्न पार्थिव असुरों की ( सुग्प्राण की ) गति तो एक ओर ही रहती है । किन्तु वायुगत अान्तरिक्ष्य असुर गतिप्रधान होते हुए चारों ओर फैल जाते हैं । चारों दिशाओं में इनका सञ्चार है । अतएव श्रान्तरिक्ष्य असुरजाति को ॠग्वेदने ' चतुष्पाद ' कहा है, जैसाकि अनु-पद में ही स्पष्ट होने वाला है । पश्चिमादिक इनकी जन्मभूमि है । चारों दिशाएँ सञ्चारभूमि है । वृष्टि का विरोध करना इस असुरजाति का मुख्य काम है । यही जाति ' अरुरु ' नाम से प्रसिद्ध है । ऐन्द्रवायुग मरुत्त्वानिन्द्र के वज्र से यह उत्क्रान्त होजाता है, तब कहीं वृष्टि होती है । रुरु के इसी स्वरूप - विज्ञान को लक्ष्य में रखकर मन्त्रश्रुति कहती है-दस्मो हि ष्मा वृषणं पिन्वसि त्वचं कश्चिद्यावीरररुं शूर मर्त्य ' परिवृणक्षि मर्त्यम् । इन्द्रोत तुभ्यं तदिवे तद्रुद्राय स्वयशसे मित्राय वाचं वरुणाय सप्रथः सुमृडीकाय सप्रथः ॥ - ऋक्सं ] ० १११२६ | ३ | तीसरा द्युलोक में रहने वाला असुर ' द्रप्स ' रूप है । वृष्टिबिन्दु ही द्रप्स है । ' वृष्टि नैं द्यौः ' इस तैत्तिरीय - सिद्धान्त के अनुसार वृष्टि ही द्यौ है । पारमेष्ट्य असुर ' द्यु ' में ग्राकर सर्वप्रथम त्रृष्टिरूप में हीं परिणत होता है । वृष्टिबिन्दु को ' ट्रप्स ' कहा जाता है । प्रकाश में देवता की प्रधानता है, एवं पानी में असुर की प्रधानता है । प्रकाश, और ताप कैसा, और कितना हीं प्रबल क्यों न हो, मनुष्य इसका आक्रमण सह जाता है । घोर तप ( धूप ) में तो मनुष्य नासकता है । किन्तु दृष्टि का साधारण आक्रमण भी वह नहीं सद् सकता । पानी की साधारण चिन्दुओं को तो फिर भी मनुष्य यथाकथंचित् सह जाता है । परन्तु यदि वेग से

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड चतुर्थत्राह्मण बड़ी वही बिन्दुओं के रूप में दृष्टि होने लगे तो वे बिन्दु होजाती है | क्योंकि इनमें ' असुरप्राण ' प्रतिष्टित है । ' सीकर ' [ बिखरे हुए जलकरण ] जहाँ विकासरूप इन्द्र के सम्बन्ध से शरीर को बड़े सुहावने लगते हैं, यहाँ स्थूल आसुरागप्रधान बन कर शरीर के लिए होम का कारण बन जाती हैं । इन बड़ी बिन्दुओं के लिए ही ' ट्रप्स ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । हृदयबिन्दु पृषद् बेन्दु स्तोकबिन्दु इप्सबिन्दु भेद से बिन्दुभाव चार भागों में विभक्त है । सर्वाकार – अधिष्ठात्री, किन्तु स्वयं निराकार बिन्दु ही ' हृदयबिन्दु ' नाम से प्रसिद्ध है । यह स्वानुभवैकगम्या है । यद्यपि शिक्षाकाल में अध्यापक वर्ग लेखिनी से पत्र पर स्पर्श कराके हृदयकिदु का आकार बतलाया करते हैं । परन्तु वस्तुतः यह आकार - ' उपायाः शिक्षमाणानां बालानामुपलालना: ' ही है । क्योंकि भले ही आप सूक्ष्म से सूक्ष्म बिन्दु बनाइए, उसमें भी हृदयभाव उत्पन्न होजायगा | उसका भी कोई न कोई केन्द्र अवश्य रहेगा । ऐसी अवस्था में यह मान लेना पड़ता है कि, हृदयबिन्दु का कोई आकार नहीं है । दूसरी है ' पृषविन्दु ' फव्वारे की छोटी छोटी चिन्दुएँ, ललाट के प्रस्वेद [ पसीने ]. दूर्वा आदि पर रहने वाली रात्रि की ओस की बिन्दुएँ, ये ' प ' है जिस मेह के लिए ' करमर- भरमर - नानी नानी बुँदनियाँ, यह कहा जाता है, वही सीकर [ अम्बुकण - जलकरण पानी की कणिकाएँ ] ' पृथत् ' हैं साधारणरूप से जो पानी बरसता है, उसमें जो बिन्दु हैं, वे ' लोक ' नाम से व्यवहृत होतीं हैं । ' दो बूँद दवा की लेना ' - ' दो बूँद अमुक की लेना ' यह व्यवहार कि कमान के लिए लोक में सामान्यरूप से प्रचलित है, उसी को ' स्तोक ' कहा जाता है । साधारण व्यवहार में बिन्दु से इस स्तोकचिन्दु का ही ग्रहण किया जाता है । चौथी है - ' ट्रप्स ' । कभी कभी व्याकाश से गिरने वाली बिन्दुओं का आकार बहुत बड़ा होता है । इनका प्रहार आप कभी नहीं सह सकते इसी को लोकभाषा में ' टपफा ' कहा जाता है । विदुभाव की यह अन्तिम सीमा है । इससे बडी जितनी चिन्दुएँ होगीं, सत्रका इस ' ट्रप्स ' में हीं अन्तर्भाव कर लिया जायगा । और तो और, स्वयं सूर्य की भी ' द्रप्सरचस्कन्द ' इत्यादि रूप से ' वास ' ही कहा जाता है । पुराण कहता है तुमारा यह 21 पोमय परमेष्ठी समुद्र का एक बुदबुद ( बुलबुला मात्र है, तो इधर भगवान् कहते है परमेष्ठी प्रजापति का द्रप्स ' ही प्रवर्ग्यरूप से उसी प्रकार अन्तरिक्ष में श्रागया है, जैसे कि - वारुरण - मेघ से ' उपका ' भूमि पर आपड़ता है । वही सूर्य्य बनकर त्रैलोक्य में साम्राज्य कर रहा है । निवेदनीय यही है कि, ' द्रप्स ' मचसे बड़ी चिन्दु का नाम है । वृष्टि जिस द्युलोक से आरम्भ होती है, उस मूलस्थान मे चलते हुए तो पानी प्यरूप में ही परिणत रहता है । नीचे आते आते वायु के आपात से बिन्दुएँ छोटी हो जाती है । द्युलोकम्थ वर्षा का द्रास प्राप्तम्बिक स्वरूप है । यह वारणभावापन्न असुर की दी प्रतिकृति है । बीधा असर नहीं पारमेष्ठ है । तीन को हम देते हैं । चीये की हम अपने चम्मच से नहीं देखते । ' म सत्य निहितं यतुः इस श्री सिद्धान्त के अनुसार हमारे सदभाव का आलम्भन है । अतः इस चौंथ का न नाम बोला जाता, न प्रहारकाल में मन्त्रप्रयोग ही होता । शेष तीनों प्रहार सम-यक होते है, यह आरम्भ के पद्धति प्रकरण से गतार्थ ही है इसप्रकार चार प्रहारों के द्वारा भूप्रदेश को देवयजनसम्पत्ति से युक्त कर लिया जाता है । यज्ञ साधारण कम्र्म नहीं है । अपितु आधिभौतिक अनुरूप दिव्यमावापन पदार्थों के द्वारा मन्त्रशक्ति के द्वारा किसोर प्रातदेवताओं को आध्यास्मिन जगत् में अन्तर्याम - सम्बन्ध से प्रतिष्ठित कर श्रागन्तुक दिव्यप्राण के प्रतिशयस्वरूप सर्वथा नवीन दिव्यात्मा ( देवा-८४२

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राहाण चतुर्थब्राह्मण त्मा ) को उत्पन्न कर इसके साथ होने वाली हृद्ग्रन्थि के श्राकर्षण से मानुषात्मा ( रूम्र्मात्मा - जीवात्मा ) को सप्तदशस्तोमरूप नाचिकेत स्वर्ग में प्रतिष्ठित कराने वाला एक अपूर्व, किन्तु दुर्गमपथ है । यत्किञ्चित् सी असावधानी से महान् - अनिष्ट होजाने की सम्भावना है । अतः बहुत सोच समझकर ही अपनी मानुषभावोपेता कुतर्कमूला भावनाओं का सर्वथा तिरस्कार कर ऋषियने जैसी आज्ञा दी है, जो पद्धतियाँ ब्राह्मरण - श्रौत - गृह्यसूत्रादि - रूप से हमारे सम्मुख रखीं हैं, टीक उह्रीं का अनुसरण करते हुए हमें यज्ञियवितान करना चाहिए, इसी में हमारा, न केवल हमारा ही, अपितु हमारे वंशजों क । ( भी ) अभ्युदय है । इसी भाव को व्यक्त करते हुए कृष्णश्रुति के प्रवर्तक मह तित्तिरिने प्रश्न किया है कि, " इस प्रहारकर्म्म का एकमात्र प्रयोजन यही तो है कि, जिस भूप्रदेश पर वेदि बनने वाली है, उस भूप्रदेश के कक्कर, दूषित मिट्टी- दूषित तृणादि हटाकर उसे साफ सुथरी नाली जाय । इस यनकिचित से काम के लिए एक विशेष प्रकार का काष्ठमय स्पय बनाना, फ़िर उसका क्रमशः चार बार प्रहार करना, इन सब श्राडम्बरों की क्या आवश्यकता है? । भूमि को ही तो स्वच्छ करना है । यह काम तो अध्वर्यु अल्प समय में अपने हाथ से भी कर सकता है " । बात सुनने में बड़ी अच्छी लगती है । आजकल के नवयुवक तो महर्षि तित्तिर के इन पूर्वपक्षी विचारों का हृदय से अभिनन्दन ही करने लगेंगे । आगे जाकर इस कुतर्क से होने वाली भयङ्कर हानि का दिग्दर्शन करातेहुए तित्तिरि कहते है कि - " सावधान! कहीं ऐसी मूर्खता न कर बैठना । यह तुझारा अशनपान-( खानपान सम्बन्धी लौकिक व्यवहार नहीं है, जिसे जैसा मन में आया कर लिया । यदि पद्धति की उपेक्षा कर अपनी सुविधा को आगे रखते हुए तुमने स्पय के स्थान में हाथों से ही उपयुक्त कर्म्म कर लिया, तो तुझारे नखों में विकृति उत्पन्न होजायगी । इस पर यदि कुतर्की यह प्रापत्ति उठावे कि, नहीं, ' हम बड़ी सावधानी से देखकर काम करेंगे, जिससे नख पर आघात न होने पावे ' । इस भौतिक कुतर्क का समूल विनाश करते हुए तित्तिरि कहते हैं कि, यहाँ तुह्मारी सावधानी, असावधानी का कोई मूल्य नहीं है । यह तो प्राणव्यापार है । प्राण चर्म्मचतु से परे की वस्तु हैं । इसका प्रभाव तुझा रे वंशजों पर भी होगा । तुझारे से यागे उत्पन्न होने वाले तुझारे सब वंशजों के नख विकृत होजायेंगे । सत्र ' कुनखी ' उत्पन्न होंगे । इसलिए पद्धति के सम्बन्ध में तुझें सदा " लक्ष-कचक्षुष्का वयम् - शब्दप्रमारणका वयं - यदस्माकं शब्द श्राह तदस्माकं प्रमाणम् ” इस आदेश के अनुसार ही चलना चाहिये । ( देखिए तै ० ब्रा ० ३ कां ०।२ प्र ε अतु ० । १० कं ) । उपयुक्त सम्पूर्ण ब्राह्मण के द्वारा केयल यही बतलाया गया है कि, अध्वर्यु नाम का ऋत्विक भूप्रदेश को स्वच्छ - निष्कण्टक. - निस्तृण - ( साफ - सुथरा ) बना कर उसे वेदियोग्य ( पद्धति के अनुसार ) बनाले, तदनुसार यथोक्ता पद्धति से अध्वर्यु ने भूविशोधन कर लिया है । अत्र आगे के ब्राह्मण से ' वेदिखनन-प्रकार ' ही उपक्रान्त होता है | ॥१७, १८,१६,२०,२१ ॥ प्रथमकाण्डानुगत द्वितीयाध्याय का चौथा ब्राह्मण, एवं द्वितीय - प्रपाठक का दूसरा ब्राह्मण उपरत -- * --८४३

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श्री: थ - प्रथम काण्डे द्वितीयाध्याये पञ्चमं ब्राह्मणम् द्वितीयप्रपाठके च तृतीयं ब्राह्मणम् १२- वेदिपरिग्रहः ( मूल ) - देवाश्च वा असुराश्च - उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे । ' ततो देवा अनुव्यमि-वासुः । अथ हासुरा मेनिरे - अस्माकमेवेदं खलु भुवनमिति ॥ १ ॥

हो: - हन्तेमां पृथिवीं विभजामहै, तां विभज्योपजीवामेति । तामौच्णैश्वर्म्मभिः पश्चात् प्राञ्चो विभजमाना अभीयुः ॥ २ ॥

तद्व ै देवाः शुश्रुवुः --विभजन्ते ह वा इमामसुराः पृथिवीम, प्रेत तदेष्यामो यत्रे मा-मसुरा विभजन्ते, के ततः स्याम - यदस्य न भजेमहीति । ते यज्ञमेव विष्णु पुर-स्कृत्येयुः ॥ ३ ॥

ते होचुः -- श्रनु नोऽस्यां पृथिव्यामाभजत, अस्त्वेव नोऽप्यस्यां भाग इति । ते हासुरा अभूयन्त इवोचुः - यावदेत्रैष विष्णुरभिशेते, तावद्वो दद्म इति ॥ ४ ॥

वामनोह त्रिष्णुरास । तद ेवा न जिहीडिरे - महद्वे नोऽदुर्ये नो यज्ञसम्मितम-दुरिति ॥ ५ ॥

ते प्राञ्च विष्णु ं निपाद्य छन्दोभिरभितः पर्यगृह्णन्- गायत्रेण त्वा छन्दसा परि-गृह्णामि ( १ ० २७ मं ० ) इति । दक्षिणतः त्रैष्टुभेन त्वा छन्दसा परिगृह्णामि ( १ ० २४ मं ० ) इति । पश्चात् । जागतेन त्वा छन्दसा परिगृह्णामि [ १ अ ०

२७ मं ० ] इति । उत्तरतः ॥ ६ ॥

तं छन्दोभिरभितः परिगृह्य, अग्निं पुरस्तात् समाधाय तेनाचन्तः श्राम्यन्तश्चरुः । मां सर्वां पृथिवीं समविन्दन्त । तद् यदेनेनेमां सर्वा समविन्दन्त, तस्माद्वे दिर्नाम । ८४४