Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 581–590

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 581–590

पृष्ठ 581

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण तस्मादाहू: -- यावती वेदिः तावती पृथिवीति- एतया हीमां सर्वा समविन्दन्त । एवं ह वा

इमां सर्वा ' सपत्नानां संवृक्त । निर्भजत्यस्यै सपत्नान् - प एवमेतद्वेदे ॥ ७ ॥

सोऽयं विष्णुग्लानः, छन्दोभिरभितः परिगृहीतः अग्निः पुरस्तात् नापक्रमणमास ।

सतत एवौषधीनां मूलान्युपमुम्लोच ॥ ८ ॥

ते ह देवा ऊचुः क नु विष्णुरभूत्, क नु यज्ञोऽभूदिति । ते होचुः - छन्दोभिरभितः परिगृहीतः अग्निः पुरस्तात्, नापक्रमणमस्ति, अत्रैवान्विच्छतेति । तं खनन्त इवान्वीषुः । तंत्रगुऽन्वविन्दन । तस्मात् त्र्यंगुला वेदिः स्यात् । तदु हापि पाश्चि: त्र्यंगुलामेव सौम्यस्याध्वरस्य वेदिं चक्रे ॥६ ॥

तदु तथा न कुर्यात् । श्रोषधीनां वै स मूलान्युपाम्लोचत् तस्मात् श्रोषधीनामेव मूलान्युच्छेत ब्रयात् । बन्न्वेवात्र विष्णुमन्वविन्दन् - तस्माद्वदिर्नाम ॥ १० ॥

तमनुविवोत्तरेण परिग्रहेण पर्यगृह्णन् - " सुच्मा चासि शिवा चासि " ( १ अ ० २७ नं ० ) इति । दक्षिणत इमामेतत् पृथिवीं संविद्य सुमां शिवामकुर्वत । " स्योना चासि सुषदा चासि - [ १ २४ मं ० ] इति । पश्चादिमामेवैतत् पृथिवीं संविद्य

स्योनां मुषदामकुर्वत । “ ऊर्जाश्वती चासि पयस्वती च - ( १ ० २७ मं ० ) इति ।

उत्तरत इमामेवैतत् पृथिवीं संविद्य रसवतीमुपजीवनीयामकुर्वत ॥११ ॥

सबै त्रिः पूर्व परिग्रहं परिगृह्णाति, त्रिरुत्तरम् । तत् षट्कृत्वः, षड् वा ऋतवः सम्वत्सरस्य । सम्वत्सशे यज्ञः प्रजापतिः, स यात्रानेव यज्ञो यात्रत्यस्य मात्रा तावन्तमे-वैतत् परिगृह्णाति || १२ || षड्भिर्व्याहृतिभिः पूर्वं परिग्रहं परिगृह्णाति, षड़भिरुत्तरम् । तद् द्वादशकृत्वः । द्वादश वै मासाः सम्वत्सरस्य, सम्वत्सरो यज्ञः प्रजापतिः । स यावानेव यज्ञो यावत्यस्य मात्रा तावन्तमेवैतत् परिगृह्णाति ॥१३ ॥

व्याममात्री पश्चात् स्यादित्याहुः । एतावान् चै पुरुषः, पुरुषसम्मिता हि । त्र्यर-निः प्राची । त्रिवृद्धि यज्ञः । नात्र मात्रास्ति, यावतीमेव स्वयं मनसा मन्येत तावतीं कुत् ॥ १४ ॥

८४५

पृष्ठ 582

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड पचमत्राह्मण

अभितोऽग्निमंसान्नति । योषा वै वेदिः, वृषाशिः । परिगृह्य वै योपा वृषाणं शेते ।

मिथुनमेवैतत्प्रजननं क्रियते । तस्मादभितोऽग्निमंसा उन्नयति ॥ १५ ॥

सा वै पश्चाद्वरीयसी स्यात् मध्ये संहारिता, पुनः पुरस्तादुवीं । एवमिव हि योषां प्रशंसन्ति -- पृथुश्रोणिः, विमृष्टान्तरांसा, मध्ये संग्राह्येति । जुष्टामेवैनामेतद्द वेभ्यः करोति ॥ ६ ॥ सा वै प्राक्प्रवणा स्यात् - प्राची हि देवानां दिक् । अथो उदकप्रवणा - उदीचि हि मनुष्याणां दिक् | दक्षिणतः पुरीषं प्रत्युदुहति- एषा वै दिक् पितृणाम् । सा यद्दक्षिणा-प्रत्रणा स्यात- क्षिप्र ेह यजमानोऽमु लोकमियात् । तथो ह यज॑मानो ज्योग जीवति । तस्माद्दक्षिणतः पुरीषं प्रत्युदुहति । पुरीषवतीं कुर्वीत पशवो वै पुरीपं पशुमती मेनैनामे-तत् कुरुते || १७ || प्रतिमा | देवाह संग्रामं सम्भिधास्यन्तस्ते होचुः - हन्त यदस्यै पृथिव्या अनामृतं देवयजनं तच्चन्द्रमसि निदधाम है । स यदि न इतोऽसुरा जयेयुः, तत एवा-र्चन्तः श्राम्यन्तः पुनरभिभवेमेति । स यदस्यै पृथिव्या अनामृतं देवयजनमासीत्तच्चन्द्र-मसि न्यदधत । तदेतच्चन्द्रमसि कृष्णम् । तस्मादादुः - चन्द्रमस्यस्यै पृथिव्यै देवयज--नमिति । अपि वा अस्यैतस्मिन् देवयजन इष्ट भवति । तस्माद्वै प्रतिमार्ष्टि || १८ || स प्रतिमार्ष्टि -- " पुरा क्रूरस्य विसृपां विरपूशिन् " - ( १ अ ० २५ मं ० ) इति । संग्रामा नै क्रूरम् । संग्रामे हि क्रूरं क्रियते -- हतः पुरुषः, हतोऽश्वः शेते । पुरा ह्य तत्संग्रा--मान्न्यदधत । तस्मादाह --- पुरा क्रूरस्य विसृपो विरप शिन्निति । " उदादाय पृथिवीं जीवदानुम् " - ( १ ० २८ मं ० ) इति । उदादाय हि यदस्यै पथिवीं जीवदानु-मिति । यामैरय'श्चन्द्रमसि स्वधामिः - ( १ ० - २ = मं- ) इति । यां चन्द्रमसि ब्रह्मणादधुरित्येवैतदाह - " तामु धीरासोऽनुदिश्य " - [ १ ० २८ मं ० ] इति । एतेनो ह तामनुद्दिश्य जयन्ते । अपि ह वा अस्यैतस्मिन् देवयजन इष्टं भवति - य एवमेतद्वेद ॥ १६ ॥

अथाह “ प्रोक्षणीरासादय - - ( १ ० २८ मं ० ) इति । वज्रो वै स्पयः, त्राह्मणश्च, इमं पुरा यज्ञमभ्यजूगुपताम् । वत्रो वा आपः । तद् यत्रमेवैतद्भिगुप्त्यै-श्रासादयति । स वा उपर्यु पर्येव प्रोक्षणीषु धार्यमाणास्वथ स्पयमुद्यच्छति । अथ यन्निहित एव स्फ्ये प्रोक्षणीरासादयेद् - वज्री ह समृच्छेयाताम् । तथो ह वज्रौ न समृच्छेते । तस्मा-दुपर्युपर्येव प्रोक्षणीषु धार्यमाणास्वथ स्पयमुद्यच्छति ॥ २० ॥

III

पृष्ठ 583

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द्वितीयश्रध्याय शतपथब्राह्म गा पञ्चमब्राह्मण अथैतां वाचं वदति - प्रोक्षणीरासादय, इध्म बर्हिरुप्रसादय, स्रुचः सम्मृढ, पत्नीं सन्नह्याज्येनोदेहि; इति । संष एवैषः । स यदि कामयेत यादेतत् । यद्य कामयेत-पिनाद्रिये । स्वयमुवेतद् वेद - इदमतः कर्म कर्त्तव्यमिति ॥ २१ ॥

अथोदञ्चं स्फ्यं प्रहरति - श्रमुष्मै स्वा वच प्रहरामीति यद्यभिचरेद् । वज्रो त्रै स्पयः, तृणुते हैवेनंन ॥ २२ ॥

अथ पाणी अवननिक्तं । यद्धयस्यै क्रूरमभूत् तद्वयस्था एतदहार्षीत् । तस्मात् पाणी अवनेनिक्ते ॥ २३ ॥

स ये हाग्र ईजिरे, ते ह स्मावमशं यजन्ते, ते पापीयांस श्रासुः । अथ ये नजिरे ते श्रेयांस आसुः । ततोऽश्रद्धा मनुष्यान् विवेद - ये यजन्ते पापीयांसस्ते मत्रन्ति; य उ न यजन्ते श्रेयांसस्ते भवन्तीति । तत इतो देवान् हविनं जगाम - इतः प्रदानाद्धि देवा उपजी-वन्ति ॥ २४ ॥

ते ह देवा ऊचुर्वृहस्पतिमाङ्गिरसम्-- श्रद्धा वै मनुष्यानविदत्, तेभ्यो विधेहि वज्ञ-मिति । स हेत्योवाच बृहस्पतिराङ्गिरसः -- कथा न यजध्व इति । ते होचुः - किंकाम्या यजे-महि, ये यजन्ते पापीयांसस्ते भवन्ति, य उ न यजन्ते -- श्रेयांसस्ते भवन्तीति ॥ २५ ॥

स होवाच बृहस्पतिराङ्गिरसः - यद्वै शुश्रुम देवानां परिपूतं तदेष यज्ञो भवति । यच्छ्रुतानि हवींषि, क्लृप्ता वेदिस्तेनावमर्शमचारिष्ट । तस्मात्पापीसाऽभूत । तेनानवमर्श यजध्वम्, तथा श्रेयांसो भविष्यथेति । श्रा कियत इति । वहिषस्तरणादिति । बर्हिषा हवै खन्वेषा शाम्यति । स यदि पुरा बर्हिषस्तरणात् किञ्चिदापद्यत बर्हिरेव तत् स्तृण-नापस्येत् । अथ यदा बर्हिस्तृणन्ति - अपि पदाभितिष्ठन्ति । स यो हैवं विद्वाननवमर्श

यजते, श्रेयान् हैव भवति । तस्मादनमर्शमेव यजेत ॥ २६ ॥

इति प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्याये पञ्चम ं ब्राह्मणम् द्वितीयप्रपाठके च तृतीयं ब्राह्मणम् दितीयोऽध्यायश्च समाप्तः ८४७

पृष्ठ 584

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द्वितीयग्रध्याय प्रथमकाण्ड पचमत्राह्मगा ( अनुवाद ) - प्रजापति की सन्तान होने से ' प्राजापत्य ' नाम से प्रसिद्ध देवता, और असुर, दोनों । एक समय परस्पर ) स्पर्द्धा करने लगे | ( इन दोनों की हम बलवान् हैं. नहीं हम बलवान् हैं, इस प्रकार का स्पर्द्धा में ) देवता ( असुरों की अपेक्षा ) पराजित से होगए । ( अर्थान असुरों के आक्रमण को महने में असमर्थ होते हुए देवता एकत्रार सर्वथा निराश होते हुए उदा-सीन बनकर चुप हो गये । ( देवताओं की इस उदासीनता से अनुचित लाभ उठाते हुए ) असुरोंनें यह समझ लिया कि ( देवता तो कुछ बोलते नहीं हैं । अब अपने साथ प्रतिस्पर्द्धा करने वाला और कौन है । ऐसी अवस्था में । यह सम्पूर्ण ' भुवन ' सम्पूर्ण भूमण्डल अपना हीं है । ( इस प्रकार सम्पूर्ण भूमण्डल को अपनी हीं सम्पत्ति समझ कर ) श्रासुर - मण्डलने परस्पर समवेत होकर, सुसंगठित बनकर यह निश्चय किया कि ( चलो अब दूसरे का तो डर है नहीं ) अपन ( सुविधानुसार ) हो इस पृथिवी का विभाग करलें गे ( अपनी अपनी सुविधा के अनु-सार इस पृथिवी का विभाग कर इस स्वस्त्र दायभाग से ) अपन ( आनन्दपूर्वक ) जीवन व्यतीत करें ( इसप्रकार सम्पूर्ण पृथिवी - मण्डल को अपनी हीं प्रातिस्विक ( निजी ) सम्पत्ति समझते हुए ) इन बल प्रधान असुरोंनं ( बैलों को बाँधने की, श्रतएव ) ' औक्षण ' नाम से प्रसिद्ध चर्म्ममयी रज्जु ( चमड़े की डोरो ) से पश्चिम की ओर से पृथिवी का विभाग करना प्रारम्भ करते हुए पूर्व की ओर आना आरम्भ कर दिया । ( अर्थात् देवताओं की यत्किञ्चित् भी अपेक्षा न रखते हुए मापसाधनभूता चम्मरज्जु से अपनी सुविधानुसार इहोंने पृथिवी को पश्चिम से नापना आरम्भ कर, नापते हुए पूर्व की ओर बढ़ने लगे । ( इधर देवता पूर्व में रहते थे ) गुप्त-चरों के द्वारा इन देवता ने सुना कि, ( अपनी उदासीनता से अनुचित लाभ उठाते हुए दुष्ट-बुद्धि ) असुर सम्पर्ण पृथिवी का विभाग करते हुए ( सत्र को अपनी सम्पत्ति मानते हुए ) पत्र की और चले आ रहे हैं । ( अब तो देवता चिन्तित हुए, तत्काल परस्पर मन्त्रणा कर ) देवताओं ने निश्चय किया कि, ( अत्र चुप बैठने से काम नहीं चल सकता । चलो पन वहाँ चलें, जहाँ कि असुर ( अपने आप को ही इस पृथिवी के अन्यतम - असपत्न - भोक्ता समझते हुए ) इस पृथिवी का विभाग कर रहे हैं । अरे भला सोचो तो सही कि, यदि सम्पूर्ण पृथिवी - मण्डल अमुरांने हीं परस्पर बाँट लिया ), अपन यदि इसका विभाग न कर सके ( अर्थात अपने को भूप्रदेश न मिला तो ) बतलाओ अपन क्या रह जायेंगे? । अर्थात जब सम्पूर्ण पृथिवी - मण्डल असुरों के अधिकार में चला जायगा, तो अपन कहाँ रहेंगे । फिर तो अपने को इन की प्रजा बन कर असुरों की दया पर ही जीवित रहना पड़ेगा । ( इसप्रकार मन्त्ररणा कर देवताओं ने ' यज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध ' विष्णु ' को आगे किया, और वहाँ आपहुँचे ( जहाँ कि असुर मनमानी कर रहे थे ॥ ( वहाँ पहुँच कर अभिनिवेश में आते हुए ) देवता कहने लगे कि, हमारे लिए भी इस पृथिवी में विभाग रक्खो । ( यह कवल तुह्मारी ही प्रातिस्त्रिक सम्पत्ति नहीं हैं, तुह्मी प्रजापति की सन्तान नहीं हो । हम भी ' प्राजापत्य ' हैं । ( ऐसी अवस्था में यह आवश्यक है कि, ) इसमें हमारे लिए भी दाय-विभाग र है ।

पृष्ठ 585

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द्वितीय गाय शतपथब्राह्मण पञ्चनत्राह्मण देवताओं के इस आकस्मिक आगमन से असुर हृदय ही हृदय में दग्ध होपड़े ( जलउठे ) । उह्नोंने सोचा कि, अब क्या करना चाहिए, बुरे समय में इनका आगमन हुआ । ये तो ठीक समय पर आ धमके । यदि विभाग करने के अनन्तर आते तब तो कोई चिन्ता न थी । परन्तु जब इस अवसर पर ये आ ही पहुँचे है. तो इहें मना भी नहीं किया जासकता । कुछ न कुछ तो देना हीं पड़ेगा अत्र इह्न । यह सोचते हुए तत्काल इन दुष्टोंने मन्त्रणा को कि, देवताओं के अत्रगामी विष्णु हैं । ये वामन हैं, सब से छोटे हैं । विष्णुरूप यज्ञ इन देवताओं का आराध्य है । अतएव इहें तो यज्ञात्मक विष्णु हीं सबसे अधिक प्रिय हैं । अतः यदि यज्ञमात्रवितानयोग्य थोड़ा सा भूप्रदेश इन को मिल जायगा, तो ये सन्तुष्ट होजायेंगे, यह निश्चय कर ) अपने नाक - भौ सिकोड़ते हुए, मुखाकृति त्रिकृत करते हुए, ईर्ष्याभाव प्रकट करते हुए असुर कहने लगे कि, तुझा रे ( गामी ) ये विणु जितना प्रदेश अपने शयन के लिए पर्याप्त समझते हैं ( अर्थात् तुह्मारा यज्ञ जितनी दूर में व्याप्त हो सकता है । ) उतना प्रदेश हम तुझे देने के लिए सन्नद्ध हैं । विष्णु वामन थे । ( उधर असुरों को ' वामन ' का वह त्रैलोक्य - व्यापक स्वरूप विदित न था । उन्होंने तो समझ रक्खा था कि, यज्ञविष्णु वामन है । छोटा सा स्वरूप इन का है । बहुत होगा तो क्रोश ( कोस ), दो कोश में वामनयज्ञ का वितान होजायेगा । उधर देवताओं का काम बन गया । ' हम तो विष्णुलम्मित भूप्रदेश तुझं देसकते हैं, अधिक नहीं ' ( असुरों के इस कथन से ) देवगण ने अपना कोई अनादर न समझा । उह्नोंनें ( पूर्ण प्रसन्नता प्रकट करते हुए परस्पर कहा कि ) अरे! अपने को जो इहोंने यज्ञसम्मित भूप्रदेश दे दिया, वह तो बहुत कुछ दे दिया ( यह भाव प्रकट किया ) | ( असुर वचनबद्ध होगए थे यज्ञ -सम्मित भूप्रदेश के लिए । अब अब वे कुछ नहीं बोल सकते थे । फिर क्या था. तत्काल ) देवताओंनें विष्णु को पर्व की ओर मस्तक कर के शयन करा दिया । ' हम आपको गायत्रऋन्द से वेष्टित करते हैं, यह कहते हुए दक्षिण भाग से विष्णु को घेर लिया । ' हम आपको त्रैष्टुभ छन्द से सीमित करते हैं ' यह कहते हुए पश्चिम भाग से घेर लिया । ' हम आपको जागत छन्द से सीमित करते हैं ', यह कहते हुए उत्तर की ओर से विष्णु को सीमित कर दिया । इसप्रकार ( विष्णुको पर्व में प्रतिष्ठित कर दक्षिण - पश्चिम - उत्तर, तीनों ओर से गायत्र्यादि तीनों छन्दों से ) चारों ओर से घेरकर, पर्व दिशा में अहवनीयाग्नि प्रतिष्ठित कर ( इस अग्निसाधन से यज्ञानुष्ठान करते हुए ) इस यज्ञ के द्वारा देवताओंने ( देवयजनयोग्य ) सम्पर्ण पृथिवी अपने अधिकार में करली । यज्ञात्मक विष्णु की कृपा से, किंवा विष्णुरूप यज्ञ की कृषा से देवताओंने [ उक्त प्रकार से ] सम्प ुर्ण भूप्रदेश को प्राप्त कर लिया । अत व ' यज्ञेन - प्रविन्दन्त ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ( तभी से देवयजनयोग्या ) यह सम्प ुर्ण पृथिवी ' वेदि ' नाम से प्रसिद्ध होगई । तभी से यह किंबदन्ती चल पड़ी कि - ' जितनी बड़ी वेदि है, उतनी हीं बड़ी पृथिथी है ' । इसी वेदि ( भाव ) से ( वेदि के व्याज से ) देवताओंने सम्पूर्ण पृथिवी मण्डल अपने अधिकार में कर लिया ( सम्पूर्ण शत्रु इससे निकल गए । यज्ञबल से निकाल दिए गए ) सो जो यज्ञकर्त्ता यज-मान इस रहस्य को जानता है ( इस रहस्य को जानता हुआ उक्त प्रकार से ' बेदिपरिग्रह ' करता ८४६

पृष्ठ 586

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण है, वह अपने भोग्यरूप सम्पूर्ण भूप्रदेश को सपत्नों ( शत्रुओं ) के अधिकार में से ( अपना भाग ) निकाल लेता है । स्त्रयं मपत्न इस याज्ञिक के लिए उसका ( भुक्तभोग्य भाग ) छोड़ देते हैं । बात यह हुई कि देवताओनिं– यहाँ हमारा गाहपत्य बनेगा, यहाँ दत्तिणाग्निकुण्ड रहेगा यहाँ श्राहवनीय रहेगा, यहाँ वेदि बनेगी ' इसप्रकार यज्ञव्याज से सम्पूर्ण भूप्रदेश ( दृश्य भूप्रदेश ) अपने अधिकार में कर लिया । इसप्रकार विभाग करके तत्काल वे अपनी ( श्राराध्या, एवं स्वरूप-संरक्षिका ) यज्ञप्रक्रिया में संलग्न होगए । १-२-३-४-५-६-७ ( यज्ञरूप विष्णु का तीनों छन्दों से देवताओंने परिग्रह किया था । विष्णुदेवता इन छन्दों से घिर कर त्रस्त, होगए, घबरा गए । दक्षिण - उत्तर - पश्चिम, का मार्ग तो क्रमशः गायत्र - त्रैष्टुभ-जागत - छन्दोंनें श्रवरुद्ध कर लिया । पूर्व का मार्ग अग्निने अवरुद्ध कर लिया । इसप्रकार चारों ओर छन्दों से परिगृहीत, अग्नि पूर्व की ओर कोई अपक्रमणमार्ग ( भागने का मार्ग ) नहीं । इस अवस्था में विष्णु ( चारों ओर से घिरकर ) म्लान होगए । ( परिणाम यह हुआ कि, ओर किसी मार्ग सेतो भागने का मार्ग मिला नहीं ) विष्णु वहीं ओषधियों के मूलों में प्रविष्ट होकर अन्त-न होगए | ( देवताओंने देखा, तो विष्णु कहीं प्रत्यक्ष में नहीं ) । उह्नोंन परस्पर एक दूसरे से प्रश्नारम्भ किया कि, अरे! त्रिष्णु का क्या हुआ?, यज्ञ कहाँ चला गया? | ( इधर उधर देखा, पता न लगा । अन्त में उन्होंने यह निश्चय किया कि, भाई ) तीनों ओर से छन्दों से घिरा हुआ, एवं पूर्व में अग्नि, ऐसी अवस्था में इस स्थान से निकल जाने का तो कोई मार्ग है नहीं । ( श्रव-श्य ही त्रिष्णु यहीं, इस वेडिसीमा के भीतर भीतर ही कहीं छुप गए होंगे ) यहीं ढूँढो । ( देर क्या थी, तत्काल देवताओंनिं कुदाली हाथ में ली ओर ) भूगर्भ को खोदते हुए बिष्णु को ढूँढने लगे । अन्ततोगत्त्वा भूपृष्ठ से तीन अङ्गल की गहराई में उन्होंने विष्णु को प्राप्त कर लिया । भगवान याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वेदिसाधनभूत यज्ञात्मक विष्णु को देवताओं नें भूपृष्ठ से तीन अङ्ग ल की गहराई में प्राप्त किया था । अतः यज्ञकर्त्ता यजमान की वेदि त्र्यङ्ग ुला ही होनी चाहिए । अर्थात् जिस स्थान पर वेदि बनाना है, पहिले उसकी तीन तीन अङ्गुल मिट्टी खोदकर बाहिर निकाल देनी चाहिए । क्योंकि विष्णुरूप यज्ञ भूपृष्ठ से तीन अङ्गल की गहराई में ह्रीं | वहीं बेदिनिर्माण होना चाहिए, इसी दृष्टिकोण को सम्मुख रखते हुए- ' पाश्र्व ' नाम रहता से प्रसिद्ध याज्ञिकने अपने सोमयाग की वेदि व्यङ्गला ( व्यङ्ग लम्बाता- तीन अङ्ग ुल- गहरी ) ही बनाई थी हमारे याज्ञवल्क्य वैज्ञानिक थे । वे विज्ञानदृष्टि से पदार्थों का अन्वेषण करते थे । उधर याज्ञवल्क्य के समय से पहिले के तितिरसम्प्रदाय ( कृष्णवजुर्वेद - सम्प्रदाय ) के अनुयायी पानि आदि याज्ञिक केवल रूढि के ही परमभक्त थे । उनका कहना था कि, देवताओंने तीन ८५.

पृष्ठ 587

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द्वितीय श्रध्याय Eng वाह्मगा पञ्चमत्राह्मण अङ्गल गहराई में विष्णु को प्राप्त किया था । अतः हमको व्यङ्ग ुलखाना ही वेदि बनानी चाहिए । इघर याज्ञवल्क्य कहते हैं कि, देवताओं के तीन अङ्गल का तात्पर्य ठीक तीन अ ल की नाप नहीं है, अपितु व्यङ्गल शब्द श्रोषधिमूल का हा उपलक्षण है । भूपृष्ठ पर जो श्रोषधियाँ प्ररोहित रहतीं हैं, उनके मूलभाग में ( जों में जड़ों से संलग्न ) विष्णुप्राण रहता है । होसकता है - जड़े तीन श्रृङ्ग ुल की गहराई में हों, हो सकता है - तीन अङ्गल से भी अधिक गहराई में हों । अतः श्रपधिमूल जहाँतक है, ( वे फिर चाहे तीन अङ्गल गहरे हों, कम हों, अथवा अधिक गहरे हों ) बहाँतक भूप्रदेश को गहरा खोदना चाहिए । ' व्यङ्ग ुल ' विधि नहीं है । अपितु सामा-न्य आदेशमात्र है | इसी भाव को लक्ष्य में रखकर अपने गुरुश्रेष्ठ याज्ञवल्क्य का मत प्रढ़-र्शित करते हुए उनके प्रियशिष्य - शतपथब्राह्मण को लिपिवद्ध करने वाले ' मधुश्रवा ' कहते हैं-ऐसा नहीं करना चा हए । अर्थात् ' तीन अङ्ग ुल की गहराई में हीं वेदि बने ' इस दुराग्रह में नहीं पड़ना चाहिए । कारण, पलायित त्रिष्णुतत्त्व ओषधियों के मूलों में प्रविष्ट हुआ था, न कि तीन अङ्गल की गहराई में । इसलिए अध्यु को चाहिए कि, वह आग्नीध्र ऋत्विक को ( वेदि-निर्माणकाल में ) ओषधियों के मूलों को उखाड़ने के लिए प्रेम करें । यहीं तो विष्णुप्राप्ति से यह स्थान ' वेदि ' नाम से प्रसिद्ध हुआ था । तात्पर्य यही है कि ' वेद ' सम्पत्ति प्राप्त करना है, अथवा यङ्ग लखाना का ही दुराग्रह है? | यदि वेदिसम्पत्ति अपेक्षित है, तब तो ओषधियों के मूल ही उखाड़ने चाहिएँ । क्योंकि जिस स्थान पर विष्णु है, वहीं – ' एनेन - इमां सर्वा समविन्दन्त - तस्माद् वेदिनाम ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार वेदिसम्पत्ति है । और जहाँ श्रपधिमूल हैं, वहीं वेदिस्वरूपसम्पादक विष्णु हैं ॥ १० ॥

प्रसङ्गगगम्चेदिखनन - सम्बन्ध में वैज्ञानिक निर्णय कर पुनः प्रकृत कथा का अनुसरण करती हुई श्रुति कहती है कि इसप्रकार ( खननके द्वारा अन्तर्हित विष्णु को पुन: ) प्राप्त कर देवताओंने दूसरे परिग्रह से ( पुनः ) विष्णु को घेर लिया । ( अर्थात् खनन से पहिले गायत्र्यादि छन्दों से इसे सुरक्षित किया था । परन्तु उस समय यह विष्णु भीतर प्रविष्ट होगया था । श्राज जब वह मिल गया, तो देवता पुनः प्रकारान्तर से उसे सुरक्षित करते हैं । ' हे भूमि! आप शोभना हैं, क्षोभरहिता, मतपत्र शान्त हैं ' यह भावना करते हुए देवताओंने दक्षिण भाग से त्रिष्णु के द्वारा इसी वेदियोग्या पृथिवी को प्राप्त कर इसे सुक्ष्मा ( शोभना ), एवं शिवा ( शान्ता ) बना दिया । अनन्तर- " हे भूमि! आप स्यांना ( सुखप्रदा ) हैं, सुखदा ( सुखपूर्वक बैठने का साधन ) हैं ' यह भावना करते हुए देवताओंने पश्चिम की ओर से विष्णु का वेष्टन कर लिया । देवताओंनें विष्णु के द्वारा इसी वेदियोग्या पृथिवी को प्राप्त कर इसे स्यांना, एवं सुपड़ा बना दिया । अनन्तर ' हे भूमि! श्राप ऊस्वती ( चलप्रद अन्नवती ) हैं, आप पयस्वती ( रसवती ) हैं ' यह भावना कर हुए देवताओंनें उत्तर की ओर से विष्णु को सीमित कर दिया । विष्णु के द्वारा देवताओंनें इम वेदियोग्या पृथित्री को प्राप्त कर इसे ऊजस्वती, एवं पयस्वती बना दिया । इस प्रकार यह देवताओं के द्वारा उपजीवनीया ( जीवनसाधनयोग्या ) बना दी गई । ८५१

पृष्ठ 588

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 588 का मूल पृष्ठ
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड " ब्रह्मन्! पूर्व परिग्रहं परिग्रहीष्यामि " ८५२ पश्चमत्राह्म ११-१२-१३ ॥ - कात्या ० २/२/१२ इसप्रकार वेदिखनन से पूर्व तीन परिग्रह, वेदिखननान्तर उपयुक्त तीन परिग्रह, इस-प्रकार देवताओं द्वाराके ' ६ वेदिपरिग्रह ' होजाते हैं । पट्परिग्रहों की समष्टि ही ऋतु की समि है । तुम ही सम्वत्सर है । सम्वत्सर ही विष्णुरूप यशप्रजापति है । इधर ६ परिग्रहों के साथ क्रमशः ६ ही मन्त्रव्याहृतियाँ हैं । सम्भूय १२ संख्या होजातीं हैं । सम्वत्सर के १२ मास हैं । सम्वत्सर विष्णुरूप यज्ञप्रजापति है । यह है प्राकृतिक यज्ञविष्णु की मात्रा - परिमाण - मिति-सीमा । यह यज्ञ जितना बड़ा है, जितनी इसकी मात्रा है, पूर्वोक्त देवक्रमानुसार पडूव्याहृति-पूर्वक ६ परिग्रह करता हुआ अब उसी यशविभूति का परिग्रह कर लेता है । जबतक पद्धतिक्रम अवगत नहीं कर लिया जाता, तबतक उपर्युक्त आख्यान का समन्वय नहीं हो सकता । श्रतः पहिले पद्धतिक्रम को आपके सम्मुख उपस्थित किया जारहा है । भूपृष्ठ जिस प्रदेश पर वेदि बनाई जाने वाली है, उस प्रदेश पर सर्वप्रथम अध्वर्यु पूर्वब्राह्मण के कथ-नानुसार सफ्यके प्रहार असुर निरसन - व्यापाररूप ' स्तम्बयजुर्हरण ' कर्म्म करता है । निर्विघ्न स्थान देवविभूति से युक्त रहता है, एवं जाँ देवविभूति का साम्राज्य रहना है, वहीं दिव्यकम्र्म्म सफल, एवं सुफल होता है । ' हमारा यह भूप्रदेश ( जिस में हम देवताओं का यजनरूप दिव्य यशकम्मं करने वाले हैं ) सर्वया निर्विघ्न बनता हुआ दिव्यविभूति से युक्त होजाय ' एकमात्र इस प्रयोजन के लिए जो कम्र्म किया जाता है, वही ' स्तम्बयजुहरण ' नाम से प्रसिद्ध है । पूर्व का ब्राह्मण एकमात्र इसी कर्म्म की साङ्गोपाङ्ग इतिकर्तव्यता का निरूपण करता है । स्तम्बयजुर्हरण-कर्म से यह भूप्रदेश सर्वथा निर्विघ्न सम्पन्न बन गया है । अत्र यज्ञारम्भ करने में, एवं इसकी पूर्ति में किसी प्रकार की आशङ्का नहीं है । यज्ञकी मूलप्रतिष्ठा वेदि है । अतः सर्वप्रथम अध् इस वेदि का ही निर्माण करता है । वेदि का स्वरूप कैसा होता है? इस प्रश्न का समाधान तो आगे जाकर स्त्रयं ब्राह्मण श्रुति ही करने वाली है । अभी केवल आख्यान से सम्बन्ध रखने वाली पद्धति की ओर ही आपका ध्यान आकर्षित किया जाता है । सर्वप्रथम वेदि - निर्माणार्थ पूर्वपरिग्रह की इच्छा रखने वाला अध्वर्यु नामक ऋत्विक् दक्षिण की ओर बैठे हुए ब्रह्मा से आज्ञा लेता हुआ कहता है-ब्रह्मन! मैं पूर्वपरिग्रह का परिग्रह करना चाहता हूँ, इसके लिए मुझे आज्ञा दीजिए उत्तर में श्राज्ञा देते हुए ब्रह्मा कहते हैं-“ ओम् - बृहस्पते! परिग्रहाण वेदिम् सुगावो देवाः सदनानि सन्तु । श्रयाँ बर्हिः प्रथताम् । साध्वन्तरहिंस्रा पृथिवी देवी देव्यस्तु | देवता वर्द्धयत्वम् । नाकस्य पृष्ट यजमानोऽस्तु सप्तर्षीणां सुकृती यत्र लोकश्तत्रेमं यज्ञ च धेहि "

पृष्ठ 589

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 589 का मूल पृष्ठ
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द्वितीय अध्याय उत्तरादिक उत्तरपरिग्रहः-( पश्चिमपूर्व ) वायुकोण # उत्तराश्रेणि शतपथब्राह्मण पूर्वादिक आहवनीयः बेटि: r पश्चिमपरिग्रहः — दक्षिणोत्तरः पश्चिमादिक ८५३ पञ्चम ब्राह्मण दक्षिणादिक - दक्षिणपरिग्रहः ( पूर्व ) नैऋतकोण दक्षिणाश्रोणि इस मन्त्र का उपांशु ( तूष्णी ) जप करके ' श्रो ३ म् - परिग्रहाण ' यह मन्त्रभाग ऊँचे स्वर से बोलता हुआ अत्र को परिग्रहार्थ आज्ञा देते हैं । इसप्रकार ब्रह्मा से अनुज्ञात श्रध्यर्यु -' पूर्व परिग्रहं परिग्रह्णाति दक्षिणतः पश्चात् उत्तरतश्व स्पयेन ' गायत्रेणे ' ति प्रतिमन्त्रम् ' ( का ० श्र ० सू ० २ श्र ० । ६ कं ० । १८ सू ० ) इत्यादि श्रौत सिद्धान्तानुसार वेदि के लिए निश्चित प्रदेश के दक्षिण, पश्चिम, उत्तरभाग में क्रमशः निम्न लिखित तीन मन्त्र बोलता हुआ दक्षिण हस्तस्थ ‘ स्फ्य ’ से परिग्रह करता है । तात्पर्य यही है कि, जिस स्थान पर वेदि बनाई जाने वाली है, उस स्थान को ' वेदि ' रूप से कल्पना में लाकर इस काल्पनिक वेदि के दक्षिणभाग में नैऋत-कोण से आरम्भ कर आहवनीय - पर्यन्त पश्चिमपूर्व एक रेखा खैंचनी चाहिए । इसी प्रकार दक्षिण-श्रोणि से आरम्भ कर उत्तर श्रोणिपर्यन्त दक्षिणोत्तर एक रेखा खैंचनी चाहिए । यह पश्चिम परिग्रह होगा । एवं उत्तरश्रेणि के वायव्यकोण से आरम्भ कर आहवनीय के उत्तरपार्श्व पर्यन्त पश्चिमपूर्व रेखा खैंचनी चाहिए । यही उत्तर परिग्रह होगा ।

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 590 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड इन तीनों परिग्रहों के लिए क्रमशः निम्न लिखित तीन मन्त्र बोले जाते हैं-१- ओम् – गायत्रेण त्वा छन्दसा परिगृह्णामि । ( दक्षिणपरिग्रहः ) २- ' ओम् - त्रेट भेनचा छन्दसा परिगृह्णामि । ( पश्चिमपरिग्रहः ) ३- “ श्रोम् - जागतेन वा छन्दसा परिगृह्णामि । ( उत्तरपरिग्रहः ] पञ्चमत्राह्मण ) यात् इति ( पूर्णभावित पूर्वपरिग्रहास्त्रयः ये तीनों परिग्रहस्थान शाखान्तर में ऋत, ऋतसदन, ऋतभी, इन नामों से व्यवहृत हुए हैं । इनके ये नाम क्यों हैं?, इस प्रश्न का समाधान आगे के वैज्ञानिक - प्रकरण में किया जाने वाला है ( देखिए आप ० औ ० २ ३ ७ ) । इस पूर्वपरिग्रह का तात्पर्य यह है कि, दक्षिण - पश्चिम-उत्तर, इन तीनों दिशाओं के आधार पर एक रेखा ऐसी बना लेनी चाहिए, जिससे वेदि की इयत्ता का बोध होजाय । वेदिस्थान - परिमाण के अनुमान के लिए तीनों ओर खैंची जाने वाली रेखा ही ' पूर्वपरिग्रह ' नाम से व्यबहुत होती है । इस पर्वपरिग्रहकर्म्म के अनन्तर अध्वर्यु काल्पनिक वेदि ( जहाँ वेदि बनने वाली है, वह स्थान भी ' तात्स्ध्यात्तच्छच्यम् ' इस न्याय से ' वेद ' नाम से व्यवहृत किया जासकता है ) ऊपर पश्चिम से आरम्भ कर प वैदिक पर्यन्त ( आहवनीयकुण्ड - पर्यन्त ) उत्तरसंस्थ तृष्णी ( बिना मन्त्र बोले, चुपचाप ) सफ्य से तीन सीधी रेखा करता है । रेखाकरणान्तर " वेद्यां त्रिरुल्लिख्याऽऽह ' हर * त्रिरिति ( का ० श्रौ -सू ० - २३२६ १६ ) के अनुसार आग्नीध को ' हर त्रिः ' यह प्रैष करता है | ( इन तीनों रेखाओं की धूलि उठा ले जाओ, प्रपका यही तात्पर्य है । श्राग्नी प्रपानुसार ( आज्ञानुसार ) “ हृन्वाऽग्नील्लेखाः संमृशति ' ( का ० श्र ० सू ० २/६/२० | ) के अनुसार उन वेदिस्थ लेखाओं से उखड़ी हुई ) धूल को तीन बार करके उठाता है । उठा कर इन्हें तो उत्कर में डाल देता है, एवं उन रेखाओं पर जल डालकर उन्हें सम बना देता है । स्वयं ब्राह्मण प्रन्थ में लेखा-हरण, एवं सम्मर्शनक्रम्मं का विधान नहीं है । ये दोनों हीं कर्म्म प्रधानरूप से पिण्डपितृयज्ञ में, एवं नयज्ञ में चिति देखे जाते हैं । " लिखति, परति यत् हा भवति " ( शत ० ब्रा ० • वरुणप्रधा सेष्टि में दो वेदियाँ बनाई जाती । वहाँ भी देविसम्बन्ध में ' प्रकृतिवृद्विकृतिः कर्त्तव्या ' इस नियम के अनुसार सम्पूर्ण कर्म ज्यों का त्यों करना पड़ता है । इधर मन्त्र में ' त्रिः ' शब्द उपात्त है । ऐसी अवस्था में द्विवेदियुक्ता दृष्टि में ' हर त्रित्रि ' यही कह करना चाहिए । ' त्रि ' शब्द के स्थान में ' हर घट् ' ऐसा ऊह नहीं करना चाहिए । ८५४