Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 591–600
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 591–600
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द्वितीय श्रध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण २।६।१२ । ) इत्यादि रूप से पितृयज्ञ में, " लिखित्वा SS- हर त्रिरिति, हरत्याग्नीध्रः " ( शत ० ब्रा ० ७ | २२ | १ | ) इत्यादि रूप से अग्निचयन में ही लेखाहरण, एवं तत् संमर्शनकम्मं देखे जाते हैं । इसी पक्षान्तर का दिग्दर्शन कराते हुए सूत्रकार कहते हैं— " पितृयज्ञाग्नि चित्ययोर्वा - तत्र दर्शनात् " - का ० श्र ० सू ० २/६/२१ । इति । इस सूत्र का भाष्य करते हुए कर्काचार्य कहते हैं कि, यद्यपि लेखाहरण, और संमार्जन-कर्म्म प्रकृत ब्राह्मणश्रुति में नहीं बतलाए गए । तथापि पितृयज्ञ, और चयन, त्रिकृतियज्ञ हैं । इधर दर्शपूर्णमास प्रकृतियज्ञ है । एवं ' प्रकृतिवद् विकृतिः कर्त्तव्या ' यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है । ऐसी स्थिति में यदि विकृतिरूप पितृयज्ञ एवं चयन में लेखाहरण, और सम्मार्जन का विधान प्राप्त होता है, तो अवश्य ही इस प्रकृतियज्ञ में भी इन दोनों कम्मों का ‘ ऊह ' करना चाहिए | यही कारण है कि भारतवर्ष में दर्शपूर्णमास यज्ञ की जितनी भी पद्धतियाँ उपलब्ध होती हैं, सब में पितृयज्ञ - चयन यज्ञवन लेखाहरण- सम्मार्जन का भी पद्धतिकर्म में सन्निवेश उपलब्ध होता है । लेखाहरण - सम्मार्जन के अनन्तर - " अत्र वेदिकरणं यथोक्तम् " ( का ० श्रौ ० सू ० २६ | २२ ): के अनुसार ' आग्नीध ' नाम का ऋत्विक ' अभि ' हाथ में लेकर प्रदक्षिणक्रम से ( जिस क्रम से परिग्रह किया था, उसी क्रम से ) परिग्रह के भीतर का सम्पूर्ण प्रदेश ओषधियों के मूल-पर्यन्त खोद डालता है । यह कार्य अध्वर्यु के प्रैप से आग्नीध करता है । इसी प्रभाव को लक्ष्य में रखकर श्रु निने " औषधीनां मूलान्यच्छेत्त ( उच्छेत्त ) ब्रूयात् " यह कहा है । श्रनन्तर उत्तरपरिग्रह ( खननोत्तरभावी - परिग्रह ) की इच्छा से-" ब्रह्मन्! उत्तरपरिग्रहं परिग्रहीष्यामि " इसप्रकार ब्रह्मा से आज्ञा माँगता है । ब्रह्मा-' आम् ब्रहस्पते ० ' इत्यादि पूर्वोक्त मन्त्र उपांशु बोलते हुए - ' ओ ३ म् " रिगृहागा ' यह ऊँचे स्वर से बोलते हैं । प्रेषानन्तर अनुज्ञात अध्वर्यु दहिने हाथ में सफ्य लेकर ( जिस क्रम से, जिन स्थानों में तीन पूर्वपरिग्रह किए थे उसी क्रम से उन्हीं परिग्रह स्थानों में ' उत्तर परिग्रहं परिगृ-हति ‘ सुक्ष्मा ' ‘ स्योनो ' ' र्जस्वनी ति प्रतिमन्त्र पूर्ववत् ' ( का ० श्रौ ० सू ० २६२३। ) के अनुसार निम्नलिखित तीन मन्त्र बोलता हुआ क्रमश: - दक्षिण एवं पश्चिमोत्तर पात्रों में तीन रेखाएँ बनाता है । १ - ' ओम् - सुच्मा चासि; शिवा चासि । ( दक्षिणपरिग्रहः प्रथमः ) २-- '- ' ओम् स्योना चासि, शिवा चासि ' ( पश्चिमपरिग्रहो द्वितीयः ) ३ -- ' ओम् - उर्जस्वती चासि, पयश्वती च ' ( उत्तरपरिग्रहस्तृतीयः ) उत्तर परिग्रहानन्तर - ' पुरा क्र रस्ये ' ' त्यनुमार्ष्टि ' ( का ० श्र ० सू ० २ | ६ | २४ | ) के अनुसार-८३.५
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पचमत्राह्मगा " ओम् - पुरा करस्य विसृपो विरप्शिन्नुदादाय पृथिवीं जीवदानुम् * । ', यामैरयंश्चन्द्रमसि स्वधाभिस्तामु धीरासो अनुद्दिश्य यजन्ते " । यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु दक्षिण- हस्तस्थ ' समय ' से खनन एवं परिग्रह से उखड़ी हुई मिट्टी को बाहिर फैंक कर विषम भूप्रदेश को दक्षिण की ओर से आरम्भ कर पूर्व पर्यन्त सम बनाता है । विषम धरातल को सम बनाना हीं ' प्रतिमार्ज्जुन ' कर्म है । तदनन्तर— ' अध्यधिवेदिप्रोतशीधांरयति ' ( का ० श्र ० सू ० २२६ २५ ) के अनुसार आग्नीध नाम का ऋत्त्विक ' प्रोक्षणी ' पात्री को ( जिस पात्री में ' प्रोक्षणी ' नाम का पानी भरा रहता है, वही पात्री प्रोक्षणीपात्रो ' नाम से व्यवहृत होती है ) लेकर वेदि के ऊपर समीप में रख देता है । जिस समय श्राग्नीध प्रोक्षणी हाथ में उठाता है, उसी समय सम्यरूप वज्र को ऊँचा उठाते हुए अध्वर्यु आग्नीध को निम्नलिलित आज्ञा देता है-" अन्योऽथ म्फ्यमुद्यम्याह-- ओ ३ म् - ( १ ) - प्रोक्षणीरासादय! ( २ ) - इध्मं बर्हिरुपसा-दय! ( ३ ) सचः सम्मृद्धि! ( ४ ) - पत्नीं संन! ( ५ ) -- आज्येनोदेहिं! इति यदीच्छेत् " ( का ० श्र ० सू ० २२६ २६ ) । उपर्युक्त जिन कार्यों के लिए आग्नीध के प्रति अध्वर्यु प्रैष करता है, वे सब काम आग्नीध को पहिले से ही विदित हैं । अतः प्रकृत प्रप में कामचार समझना चाहिए । इसी अभि-प्राय से सूत्रकारने सर्वान्त में " यदि इच्छेत् " यह कहा है । यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि – ' प्राक्स्तरणाद्वेदिं नावमृशेत् ' श्रुतानि व हविष्याप्रत्र-ग्णात् ( का ० श्र ० २।६.३० / ३१ ) के अनुसार जबतक इस वेहि पर कुशाम्तरण न कर दिया जाय, तबतक भूलकर भी इस वेदि का स्पर्श नहीं करना चाहिए । साथ ही प्रधानयाग के ' अवदान ' से पहिले पक्क हविद्रव्य ( पुरोडाश ) का भी स्पर्श नहीं करना चाहिए । यदि कुशास्तरण से पहिले वेदिस्थान पर अन्य तृणादि गिर जायँ, तब भी उनको पहिले न उटावे । अपितु — “ आपन्नं स्तृ-गान् निरस्येत् " ( का श्र ० सू ० २/६/३३ ) के अनुसार आस्तरणल में हीं उनको बाहिर फेंके । आस्तरण से पहिले किसी प्रकार का स्पर्श न करे, यही तात्पर्य है । श्राग्नीध के प्रति उपयुक्त मैं करने के अनन्तर अध्वर्यु - " द्विषतां वध " इति स्वयमुदन प्रहरति ” ( का ० श्र ० सू ० २।६।३४ ) के अनुसार - " ओम् द्विषतो वधः " यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु स्पय के अग्रभाग को उत्तर की ओर करता हुआ उत्कर पर प्रहार करता हुआ उसे वहीं फैंक देता है । अनन्तर-" अवनिज्य पाणी, अपरंण प्रणीता स्वयं निदधाति " ( का ० श्र ० २।६।३५ के अनुसार दोनों हाथ धो डालता है | प्रणीतापात्र से पश्चिमभाग में पूर्व अथवा उत्तर की ओर स्फ्य ( प्रक्षिप्त स्क्य को लाकर ) रख देता है । * - ' जीरदामुम ' इतिपाठान्तरम् । ८५६
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द्वितीयअध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राहाण प्रकृत ब्राह्मण में पूर्वपरिग्रह से आरम्भ कर स्पय आधान पर्य्यन्त होने वाले कर्म की ही इतिकर्तव्यता बतलाई गई है । इस के अनन्तर ' सुकुसम्मार्जन ' कर्म्म होता है । इस की इतिकर्त्तव्यता — ' स वै स्रु त्रः सम्मार्ष्टि ' इत्यादि रूप से आगे के तृतीयध्णाय के प्रथम ब्राह्मण बतलाई जायगी । अतः इस पद्धतिक्रम को ब्राह्मण क्रमानुसार यहीं समाप्त कर प्रकृत ब्राह्मण के विषय की ओर आप का ध्यान आकर्षित किया जाता है । [ ' गायत्रेण त्वा ० ' इत्यादि ६ व्याहृतियाँ बोलता हुआ अध्वर्यु क्यों पूर्व - उत्तर - भेद से ६ परिग्रह करता है?, क्यों त्र्यङ्गला, अथवा ओषधि मूल - पर्यन्त वेदिखनन किया जाता है?, इत्यादि प्रश्नों का समाधान देवताओं का सम्वत्सरयज्ञ है । देवताओंने ऐसा ही किया था, एवं ह्रीं की विधा के अनुसार ' मनुष्ययज्ञविधा ' का वितान हुआ है । अतः - ' यद्वै देवा अकुर्वस्तत्-करवाणि ' इस सिद्धान्त के अनुसार हमें भी वैसा ही करना पड़ता है । ब्राह्मण के आरम्भ १६ कण्डिका पर्यन्त दैवयज्ञस्वरूप - प्रतिपादन - पूर्वक इस यज्ञ में होने वाले - १ - तीन पूर्वपरि-ग्रह, अनन्तर २ - वेदिखनन एवं अनन्तर ३ - तीन उत्तरपरिग्रह, इन तीन कम्मों की ही इति-कर्त्तव्यता का प्रतिपादन किया गया है । अव वेदि के स्वरूप ( आकारसन्निवेश ) के सम्बन्ध में विचार करते हैं ] | कितने हीं ( प्राचीन ) याज्ञिकों का कहना है कि, वर्तुल गार्हपत्यकुण्ड, एवं चतुष्कोण आहवनीयकुण्ड, दोनों के मध्य में प्रतिष्ठित वैदि की लम्बाई यजमान की लम्बाईतुल्या है | ऐसी ( मध्य से यजमानमात्री ) यह वेदि पश्चिमभाग की ओर से ( श्रोणिभाग की ओर से ) चौड़ाई में व्याममात्री ( ४ अरत्नि -दो हाथ चौड़ी ) होनी चाहिए, एवं पूर्व की ओर से ( अंस-भाग की ओर से ) वेदि व्यरत्न ( डेढ़ हाथ चौड़ी ) होनी चाहिए । क्योंकि वेदिरूप शरीर के अनुरूप पश्चिम - पूर्व की यही मात्रा होती है । साथ ही यह यज्ञ ' त्रिवृत् ' है । प्राची को त्र्यरत्नि करने से त्रिवृद्यज्ञसम्पत्ति भी गृहीत होजाती है । " [ तित्तिरि सम्प्रदायवालों के ] इस मत की उपेक्षा करते हुए परमवैज्ञानिक याज्ञवल्क्य कहते हैं कि, यहाँ मात्रा का ( परिमाण - लम्बाई-चौड़ाई का ) कोई विचार नहीं है । यजमान अपने अन्तरात्मा से वेदि का जैसा, जो, जितना आकार ठीक, समझ, उसी परिमाण से वेदि की लम्बाई चौड़ाई करदी जाय । पद्धतिक्रम से भी यही बात सिद्ध होती है । पूर्व परिग्रह, एवं उत्तर - परिग्रह में परिमाण अरत्नि रत्ति मापकों से परिमित होता, तो अवश्य हो परिग्रहों के सम्बन्ध में भी श्रुति परिणाम - विषय को आगे रखती हुई ही परिग्रहकर्म का विधान करती । ऐसी अवस्था में वेदि की लम्बाई चौड़ाई के सम्बन्ध मैं प्राचीन याज्ञिकों का नियत व्यवस्था का कोई विशेष महत्त्व नहीं है ॥ १४ ॥
वेदि के अंस ( स्कंधभाग ) पूर्वस्थ आहवनीयाग्नि के उत्तर दक्षिण पार्श्व की ओर उन्नत करता है । अर्थात् वेदि के दोनों स चतुष्कोण आहवनाय के दोनों प्रान्तभागों से मिले रहने चाहिएँ | स्वतः दोनों अंस उन्नत होजायँगे । वेदि ( योगा ) स्त्री हैं, ( आहवनीय ) अग्नि है । योषा वृषा का परिग्रह करके ही ( मिथुनभावार्थ ) शयन करती है । वेदिरूपा वृषा पुरुष ८५७
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण योगा के अंसों को वृषारूप अग्नि के अनुगत करता हुआ अध्वर्यु दोनों को मिथुन भावयुक्त करता हुआ प्रजननक्रिया ही करता है ॥ १५ ॥
वेद पश्चिम की ओर से ( श्रोणिभाग की ओर से ) फैली हुई होनी चाहिए, एवं मध्य में संकुचित हानी चाहिए । फिर पूर्व की ओर से [ उर: स्थानीय असके नीचे के प्रदेश की ओर से ] उभरी हुई होनी चाहिए । योपा ( स्त्री ) को उह्नीं भावों से उत्तम बतलाया जाता है । श्रोणिभाग विपुल, श्रीरिण की अपेक्षा कम अवकाश वाले [ कंघे ], उभरा हुआ वक्षस्थल, मध्य में हस्त से गृहात हाने योग्ज, ऐसो स्त्री ही लोक में सुन्दर स्त्रो कहलाती है । इसा से पुरुष प्रसन्न होता है । यहाँ [ उसी जुटुभाव की प्राप्ति के लिए ] वेदि को एत-दाकाराकारित करता हुआ अव वेदिरूपा योपा को आहवनीयाग्निरूप वृपात्मक देवताओं के लिए प्रिय - भोग्य बनाता है ॥ १६ ॥
यह वेदि प्राण [ पूर्व की ओर ढालू ] होना चाहिए । क्योंकि पूर्वादिक देवताओं की दिक् है । [ यदि पूर्व की ओर प्रवणा बनाने की सुविधा न हो तो ) उदक्प्रणा [ उत्तर की ओर ढालू ] होनी चाहिए । उत्तरादिक मनुष्यों को दिकू है । प्राकप्रवणा हो, अथवा उत्प्रवणा, उभयथा अध्वर्युवेद के दक्षिणभाग में हीं मिट्टी डाल कर दक्षिणभाग को उत्तर - पूर्व की अपेक्षा उन्नत बनाता है । दक्षिणादि पितरों को दिक् है । यदि किसी प्रकार दणिश्रावणा ( दक्षिण की ओर ढालू ) हो गई तो, विश्वास करो, वर्षावधि में यज्ञकर्त्ता यजमान का महान् अनिष्ट होजायगा । ( यदि दक्षिण में पुरीप डालकर उस भाग को उन्नत कर दिया जाता है, तो वेदि का दक्षिण - प्रवणता-रूप दोष मिट जाता है ) ऐसी अवस्था में पुरीप डालकर वेदि को उन्नत बनाया जाता है । काम यजमान के लिए अध्वर्यु पुरीपवती वेदि बनाता है । पशु ही पुरीष है । पुरीषवती बनाना पशुमती ही बनाना है ॥ १७ ॥
वेद बनकर सम्पन्न होगई । अब प्रतिमानकर्म्म आरम्भ होता है— पूर्वप्रदर्शित पद्धतिक्रमानुसार अध्वर्यु वेदिमार्जन करता है । ( प्रतिमार्जनक क्यों किया जाता है?, इस जिज्ञासा को वैज्ञानिक उपपत्ति के द्वारा शान्त करती हुई श्रुति कहती है- ) पुराने में ( किसी ममय ) देवतागण ( असुरों के साथ ) युद्ध करने का दृढ़ निश्चय करने युग हुए ( परस्पर ) विचार करने लगे कि, इस प्रथित्री का जो अमृतमय देवोपयुक्त भाग है । ( असुरों के आक्रमण से बचाने के लिए ) उसे चन्द्रमा में रख दें । ( यदि दुर्भाग्य से ) असुरगण इस भूप्रदेश से अपने को पराजित कर देंगे, तो ( अपन चन्द्रमा में निहित उस अनामृत देवयजन भूप्रदेश पर ) यज्ञवितान करते हुए पुनः ( इस यज्ञ के बल से ) उन्हें परास्त करने में समर्थ हो-सकेंगे । ( यह निश्चय कर ) इस पृथित्री का जो अनामृत - देवयजन भाग था, उसे देवताओंने ( धरोहर रूप से ) चन्द्रमा में रख दिया । देवताओं पृथिवी का जो देवयजनभाग चन्द्रमा में रक्खा था ) वह यही चन्द्रमा में ( प्रत्यक्षरूप से दिखाई देने वाला ) कृष्णभाग है । तभी तो वैज्ञानिकों की मण्डली में किंवदन्ती चल पड़ी कि - " चन्द्रमा में जो काला काला भाग प्रतीत होता ८५८
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द्वितीय श्रध्याय शत थपब्राह्म पञ्चमत्राह्मण है, वह इस पृथिवी का ही देवयजन भाग है " । जो अब चन्द्रमा में निहित पृथिवी के इस देवयजनभाग जानता हुआ पुरा करस्य ० ' इत्यादि मन्त्र बालता हुआ प्रतिमार्जन करता है, अध्वयुक के यजमान का वह यज्ञ देवयजनसम्पत्ति से युक्त होजाता है । चन्द्रमा में निहित उस देवयजनभाव की प्राप्ति के लिए ही प्रतिमाज्जन करता है ॥ १८ ॥
प्रतिमाज्र्ज्जन क्यों किया जाता है?, इसकी उपपत्ति बतलाड़ी गई । अत्र कर्म्म की इति-कर्त्तव्यता ( पद्धति ) बतलाते हैं । वह अध्वर्यु ' - ' पुरा क्रूरस्य विसृपो विरप्शिन् इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ प्रतिमाज्र्ज्जन करता है । संग्राम ही क्रूर ( क्रूरकर्म से युक्त ) है । ' यह पुरुष मारा गया, यह घोड़ा मारा गया, सदा के लिए वह रणभूमिमें सोगया ' इत्यादि रूप से संग्राम में ह्रीं महाक्रूर ( हिसाभात्रमय ) कर्म किए जाते है । ( देवताओं ने इस क्रूरकर्म्मा संग्राम से पहिले ( पृथिवी के देवयजनभाग को चन्द्रमा में ) रक्खा था, इसी अभिप्राय से पुरा क्रस्य विसृपः ' यह कहा है । ' उदादाय पृथिवीं जीवदानुम् इस मन्त्रभाग का यही तात्पय्य है कि ) इस पृथिवी का जो जीवनप्रद ( अनामृत - देवयजन ) भाग था, उसे लेकर ( देवताओंनें ) चन्द्रमा में रक्खा था । इसी अभिप्राय से ' उदादाय पृथिवीं जीवदानुम् ' यह कहा है । ' यामैचन्द्रमसि स्वधाभिः ' ( इस मन्त्रभाग का यही तात्पर्य है कि ) स्वधारूप जिस पार्थिवभाग को ( अनामृत देवयजनभाग को ) देवताओं मन्त्रवल से चन्द्रमा में रक्खा था, उसी को लक्ष्य में रखकर ' यामै -रयं ' इत्यादि कहा है । ' तामु धीगसां अनुद्दिश्य यजन्ते ( स्वधा के द्वारा जो भाग चन्द्रमा में रक्खा गया था ) उसी को लक्ष्य बना कर ( उसी को प्राप्त करने के लिए ) यज्ञ करते हैं । सच-मुच यजमान के इस देवयजनरूप भूभाग में वह अनामृतभाग गृहीत होजाता है, जोकि उपर्युक्त विज्ञान जानता हुआ प्रतिमाज्जन करता है ॥ १६ ॥
प्रतिमार्ज्जनकर्म्म के अनन्तर अव श्री के प्रति ' प्रोक्षणी रक्खी '! यह प्रैप करता है । पय साक्षात् वज्र है । उधर ब्राह्मण ( अध्ययु ) भी साक्षात वज्र है । इह्रीं दोनों वज्रोंनें अबतक यज्ञ की रक्षा की है । इधर पानी भी वज्र है । इस ( प्रोक्षणीपानी को रखता हुआ आध ) को ही रक्षा के लिए यहाँ प्रतिष्ठित करता है । अर्थात अबतक प्रधानरूप से रक्षा के साधन स्म्य, ओर अध्ययुरूप वज्र थे । अत्र आगे जो असुरों का आक्रमण होगा, उसे रोकना हम प्रोक्षणीरूप वज्र का कार्य होगा । आग्नीध के ऊपर ऊपर ( हाथों में हीं ) प्रोक्षणी को लिए हुए काल में हीं अव एक्य ऊँचा उठाता है । जब ( ऊँचा करने के पश्चात अध्वर्यु के द्वारा ) परख दिया जाता है, तब आग्नीध प्रोक्षणी रखता है । यदि दोनों को एक साथ रक्खा जायगा, तो दोनों वज्र टकरा जायँगे । विस्फोटन होजायगा । ऐसा करने से ( पृथक - पृथक रूप से रखने से ) दोनों में किसी प्रकार का घर्षण नहीं होता । इसलिए आग्नीध्र के ऊपर ऊपर ही प्रोक्षणी धारण किए हुए अवस्य उठा कर ॥ २० ॥
" प्रोक्षणीरासादय, इयां बर्हिरूपसादय सचः सम्मृद्धि, पत्नी संन्नाह्याज्येनोदेहि " यह वाक् बोलता है । यह अध्व कर्त के सम्प्रेष ( आज्ञा ) ही है । अत्र आवश्यकता समझे, तो
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण इस सम्प्रैप का प्रयोग करै । वह चाहे, तो इस वाक्मयोग की उपेक्षा भी कर सकता है । कारण ( जिसी के प्रति यह सम्प्रेप होता है ) वह स्वयं यह भलीप्रकार जानता है कि, इसके अनन्तर मुझे क्या कर्म्म करना है ॥ २१ ॥
सम्प्रपानन्तर ( अभिचार कामना यदि हो, तो ) “ प्रमुध्यै त्वा वा प्रहरामि " यह बोलता हुआ अध्वर्यु उत्तर की ओर मुख करके सम्य को फैंक देता है । रुपय साक्षात् वज्र है । इस वज्र से यह शत्रु का अङ्ग त्रिदार्ण कर देता है ॥ २३ ॥
सस्य के प्र रणानन्तर अभ्व अपने दोनों हाथ धो डालता है । बेदि के खननादि से जो क्रूर: कर्म हुआ है, उस क्रूरता को रुपय के साथ साथ वेदि से बाहिर फैंक दिया है । क्रूरता निकल गई है । शान्ति श्रागई है । उसी शान्तिभाव की समृद्धि के लिए दोनों हाथ धोता है || २३ || पद्धतिक्रम में बतलाया गया है कि, आ - बर्हिस्तरण वैदि का स्पर्श नहीं करना चाहिए । यदि स्पर्श कर लिया जायगा, तो क्या होजायगा?, इसी प्रश्न का ऐतिहासिक -आख्यान के द्वारा उत्तर देती हुई श्रु ' कहती है-पुराने समय में याज्ञिकगण जब भी यज्ञ करते थे, बर्हिस्तरण से पूर्व वेदि का स्पर्श कर, प्रधानावा से पहिले हवि का स्पर्श करके यज्ञ करते थे । अर्थात् उहें स्पर्शदोश का कुछ भी भय न था । परिणाम यह होता था कि, अभ्युदयसाधनभूत यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले वे याज्ञिक उत्तरोत्तर अवनति को प्राप्त होते जाते थे । उधर जो यज्ञ नहीं करते थे, उनकी दशा इन यज्ञ करने वालों से कहीं उन्नत थी । परिणाम इसका यह हुआ कि तत्कालीन मानवसमाज में श्रद्धाभाव उदित होगया । उन्होंने सोचा कि, जो यज्ञ करते हैं वे हीनदशा को प्राप्त होते हैं, एवं जो यज्ञ नहीं करते हैं, वे आनन्द में रहते हैं । ( इस अश्रद्धाभाव से आक्रान्त होकर मनुष्योंनें यज्ञ करना बन्द कर दिया ) । परिणाम इसका यह हुआ कि इस भूलोक की ओर से लोक निवासी देवताओं के समीप विद्रव्य नहीं पहुँचा । उधर देवता यहीं से देने से जीवित रहते हैं || २४ || अपना जीवनसाधन अवरुद्ध देखकर देवताओंने अङ्गिरा के पुत्र अतएव श्रांगिरस नाम से प्रसिद्ध बृहस्पति को बुलाकर कहा कि, भूलोकनिवासी मनुष्यों में श्रद्धा प्रविष्ट होगई है । जाइए! और जाकर उहें यज्ञ की महत्ता समझाइए! । मन्त्ररणानुसार आङ्गिरस बृहस्पति मृत्युलोक में आए । आकर उन्होंनें उन अश्रद्धालु मनुष्यों से प्रश्न किया कि, तुम यज्ञ क्यों नहीं करते? | तत्काल मनुष्योंने उत्तर दिया कि हम किस प्रयोजन के लिए यज्ञ करें?, जबकि हम यह देखते हैं कि, जो यज्ञ करते हैं, वे दुःख पाते रहते हैं, और जो यज्ञ नहीं करते, वे बड़े आनन्द से रहते हैं । ( ऐसी अवस्था में यज्ञ करके दुःख कौन मौल ले ) ॥ २५ ॥
( मनुष्यों के इस अश्रद्धाभाव को हटाते हुए ) आङ्गिरस बृहस्पति कहने लगे कि, भाई! हमने यह सुन रखा है कि, यह यज्ञ देवता से परिगृहीत होता है । अर्थात् यज्ञविद्या देवप्राण-८६०
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमना ग मयी है । तुमने परिपक्क हवि, और निष्पन्ना बेदि से स्पर्श करते हुए यज्ञवितान किया । इसी दोष से तुम्हारा यह अनिष्ट हुआ । इसलिए हम तुम को भविष्य के लिए सावधान कर देते हैं कि, बिना स्पर्श किए ही तुम को यज्ञ करना चाहिए । ऐसा करने से अवश्य तुम्हारा अभ्युदय होगा । कबतक स्पर्श न करें?, मनुष्यों के यह प्रश्न करने पर बृहस्पतिने उत्तर दिया कि, बाई-स्तरण जबतक न होजाय, तबतक बर्हि से वेदि शान्त होजाती है । यदि बहिस्तरण से पहिले वेदि पर तृण आदि और कुछ आ भी जाय, तब भी तुम स्तरण से पहिले उसे निकालने की चेष्टा मत करो । जिस समय बर्हिस्तरण करने लगो, उसी समय आगन्तुक तृणादि को निकालो । जब चहस्तरण होजाय, तो स्पर्श की क्या कथा । उस समय तुम उस पर उछल कूद भी सकतेहो । इस प्रकार प्राणयज्ञ के इस तथाकथित स्वरूप को जानता हुआ जो विद्वान स्पर्श न करता हुआ यजन करता है, वह अवश्य ही अभ्युदय का भागी होता है । इसलिए आर्हिपस्तरणान स्पर्श न करते हुए ही यजन करना चाहिए ॥ २६ ॥
इति प्रथमकाण्डे द्वितीयाध्याये पञ्चमं ब्राह्मणम् द्वितीयप्रपाठकं च तृतीयं ब्राह्मणम् समाप्तश्चायं द्वितीयोऽध्यायः देवासुरदाय विभागाख्यानरहस्य ( भाग्य ) - वेदिपरिग्रहकरणात्मक - पद्धति - प्रकरण उपरत हुआ । अत्र क्रमप्राप्त तद्विज्ञान के सम्बन्ध में हीं किञ्चिदिव निवेदनीय शेष रह जाता है, जिस से पूर्व ' वैदिक इतिहास ' मर्थ्यादा के अनुबन्ध से दो शब्द निवेदन कर देना इसलिए अनिवार्य्यरूपेण श्रावश्यक होजाता है कि, अपौरुषेय - पौरुषेय-निवन्धन संघर्ष की भांति यह ऐतिहासिक संघर्ष भी विगत अनेक शताब्दियों से एतद्द ेशीय विद्वानों के लिए महती प्रतिद्वन्द्विता का ही क्षेत्र प्रमाणित होरहा है । हमारा अनुमान है कि, न्यूनतम त्रिसहस्र वर्षो से वेदशास्त्र की ज्ञान - विज्ञानात्मिका रहस्य - पूर्णा परिभाषाएँ उत्तरोत्तर अभिभूत हीं होतीं आरहीं हैं । पारिभाषिकी इस अभिभूति का ही यह दुष्परिणाम है कि, अपौरुषेय, पौरुषेय, तथा ऐतिहासिक तथ्य के सर्वथा निर्भ्रान्त बने रहने पर भी विद्वान् इस दृष्टिबिन्दु के माध्यम से अपनी सुप्रसिद्ध - ' शास्त्रार्थ ' प्रणाली के अनुगामी बने रहते हुए इस दिशा में एकान्तः निरर्थक प्रचण्ड आक्रोश का ही अनुगमन करते रहते हैं । सृष्टि का मूलभूत नित्य - वेदतत्त्व जहाँ ' अपौरुषेय ' ही हैं, वहाँ - तथाविध वेदतत्त्व का स्वरूप – प्रतिपादक वाक्यकृतिरूप शब्दात्मक वेदशास्त्र ऋषिकृत बनता हुआ पौरुषेय ही है, जिस इस तथ्य का हमने पूर्व के-८६१
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण कृष्ण मृगचम्म स्तर के मझ में अंशतः स्पष्टीकरण कर दिया है । नदी स्थिति ' इतिहास ' की है रहस्यपूर्ण विज्ञान का शुद्ध विज्ञान की भाषा में, स्तुति की भाषा में एवं इतिहास की भाषा में, नीनां हृीं प्रकार से पौरुषेय बेदशास्त्र में स्वरूप - विश्लेषण हुआ है । अतएव मूलवेदशास्त्र विज्ञान - स्तुति-इतिहास, इन त्रिकाण्डों में विभक्त होरहा है, जो कि काण्डत्रयी- ' ज्ञातत्र्या ' कहलाई है । तत्त्वमीमांसन का ही इस ज्ञानव्याकाण्डत्री से प्रधान सम्बन्ध है, जिसके मूल में ह्रीं कर्त्तव्या - काण्डत्रयी के मूलसूत्र पिनद्ध - सुगुप्त - सुरक्षित है । तत्त्वमीमांसात्मक विज्ञानप्रदान ( दर्शनप्रधान नहीं ) मूल वेदशास्त्र ही वह ज्ञातत्र्य वेदश स्त्र है, जिसके आधार पर दी तुलवेदशास्त्रात्मक कर्त्तव्यवेदशास्त्र प्रतिष्ठित है, जिसके भी मूलवतीन ह्रीं तूलकाण्ड हैं, एवं जो कि तीनो तूलकाण्ड क्रमशः - कम्म - उपासना - ज्ञान, इन नामो से प्रसिद्ध हैं । अनुष्ठेय कर्मकाण्ड का प्रतिपादक ब्राह्मणबेड दी- ' त्रिधिवेद ' नाम से, उपासनाकाण्ड का प्रतिपादक ब्राह्मणवेद ही ' आरण्यकत्रेद ' नाम से, एवं ज्ञानकाण्ड का प्रतिपादक ब्राह्मणवेद ही ' उपनिषद्वेद ' नाम से प्रसिद्ध है । इन तीनों आचारनिष्ठाओं, कर्त्तव्यकम्मनिष्ठाओं का प्रतिपादक, विधि - आरण्यक -उपनिषन - भेद से विधा विभक्त ' ब्राह्मण ' नामक विकासात्मक मूल वेदशमस्त्र ही ' कर्त्तव्यवेद है, जो विज्ञान-स्तुति - इतिहासात्मक तथोक्त - ' ज्ञातत्र्य वेद ' के आधार पर ही प्रतिष्ठित है । और यों मन्त्र ( मूलवेद-शास्त्र - ज्ञात ० बवेदशास्त्र संहितावेद ), तथा ब्राह्मण ( तूलवेदशास्त्र - कर्त्तव्यवेदशास्त्र ब्राह्मणवेद ) भेद से द्विधा विभक्त मन्त्रब्राह्मणात्मक मूललात्मक ज्ञानव्य - कर्त्तव्यात्मक वेदशास्त्र के विज्ञान'-स्तुति - इतिहास, कर्म्म ४ - उपासना " - ज्ञान -, ये ६ सुप्रसिद्ध विषय सर्वात्मना निर्णीत, अतएव सुनिश्चित है । अतएव ' बेद पौरुपेय हैं, अथवा अबीरुपे, किंवा वेदों में इतिहास है, अथवा नहीं?, इत्यादि नितान्त भाषकता पूर्ण याविलापनों का तो इस निर्णीत निश्चित वेदशास्त्र में प्रवेश भी निगिद्ध ही माना जायगा । ' सर्व वेदाश्रमिद्धयति ' वेदशास्त्र के प्रति यहाँ के मानवधर्म्म - व्यवस्थापकों का ( राजर्षि मनु का ) प्रचण्ड यह वैसा उद्घोष है, जिसके सम्मुख जापातरमणीय किसी भी तथाविध वाग्वग्लापन के लिए कुछ भी तो तथ्य शेष नहीं रह जाता । श्राज हमें सुप्रसिद्ध - ' देवासुरदाय विभागा-रुवान ' के माध्यम से एक ऐतिहासिक तथ्य काही दिग्दर्शन कराना है । अतएव ' इतिहास ' शब्द के माध्यम से ही सर्वप्रथम दो शब्द अवश्य ही निवेदनीय बन जाते हैं । तदेव श्रूयताम् । श्रुत्वा चाप्य-भातम्!! सर्वप्रथम आपका ध्यान इस तथ्य की ओर ही विशेषरूप से आकर्षित किया जाता है कि, वैदिक इति-हाम लिखने की शैली ऐसी अद्भुत है कि उसे देखकर रहस्यानभिज्ञ साधारण मनुष्य भ्रम में पड़ जाता है । कुछ शब्द तो इन इतिहासों में ऐसे खाते हैं, जिनसे स्पष्ट यह प्रतीत होता है कि, अवश्य ही इस इतिहास का ' मनुष्यचरित्र ' से सम्बन्ध है । कुछ शब्द ऐमे याते हैं, जिनसे यह प्रतीत होता है कि, अवश्य ही यह इति-हास आधिदैवक ( प्राकृतिक नित्य ) तत्त्वों का ही इतिहास की भाषा में निरूपण कर रहा है । साथ ही कितने ही शब्द श्राध्यात्मक - चरित्र की भी प्रधानता बतलाते हैं । यही कारण है कि, आजकल के कितने हीं वेदप्रेमी बेद के प्रत्येक आख्यान की केवल आध्यात्मिकभाग की ओर ही समन्वित करने की चेष्टा करते रहते हैं । उनका कहना है कि, प्रत्येक इतिहास अलङ्कारभाषा में केवल आध्यात्मिक चरित्र का ही निरूपण कर रहा है । ८६२
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पश्चमब्राह्मण इधर कितने ही विद्वान् केवल आधिदैविक चरित्र को ही प्रधानता देते हैं रही मनुष्यचरित्र की बात । सो इसके सम्बन्ध में पश्चिमी विद्वानों को, एव तदनुयायी परिगणित पूर्वीय विद्वानों को छोड़कर सभी भारतीय विद्वानों का यह निश्चय है कि, वैदिक आख्यानों में मनुष्यचरित्र का यत्किञ्चित् भी सम्बन्ध नहीं है । इसप्रकार इन आख्यानो के सम्बन्ध में कल्पनारसिक वेदमार्गानुगामी विद्वान् भिन्न भिन्न दृष्टिकोण से आख्यानोपाख्यानों का समन्वय करने में संलग्न हैं । ' इदमित्थमेव ' इस निश्रयात्मक सिद्धान्त पर प्राय: आज किसी की दृष्टि नहीं है । इह्रीं विप्रतिपत्तियों से सर्वथा ऋजु भी वेदार्थ आज हमारे लिए असमाधेया प्रश्नावली ही बन रहा है । इन विप्रतिपतियों को दूर करने के लिए हमने पूर्व के ' प्रोत्तराब्राह्मण ' में आख्यानों को आठ भागों में विभक्त कर इनके सम्बन्ध में वेद का एक निश्चित सिद्धान्त वेदप्रेमियों के सम्मुख रख दिया है । वहाँ बतलाया गया है कि इन बाट बारूपानी में एक विधा ऐसी भी है, जिसमें आधिदैविक, आध्यात्मिक, आधिभौतिक इन तीनों प्रकार के चरित्रों का समावेश रहता है । हमारे प्रकृत आख्यान का इसी विधा से सम्बन्ध है । यह केवल कल्पना नहीं है । अपितु श्रुति ने स्थान स्थान पर ' इति नु अध्यात्मम् ' - ' अथाधिदैत्रतम् ' इत्यादि रूप से स्वयं कतिपय वैदिक चाख्यानों के साथ उपयुक्त तीनों चरित्रों का सम्बन्ध बतलाया है । उदाहरणार्थ - चयनयज्ञ के इष्टकाचितिप्रकरण को ही लीलिए । सम्वत्सरयज्ञात्मक ' चयनयज्ञ ' में मृग्मयीं इष्टकाओं ( ईटी ) की चिति ( चिना ) होती है उनकी संख्या नियत होती है । इस सम्बन्ध में इतनी ही ईट क्यों ली जाती है?, इससे अधिक, अथवा कम लेने में क्या हानि है? इस प्रश्न का समाधान करने के लिए ' सम्बत्सरो वै प्रजापतिरेकशतविधः ' इत्यादि रूप से उपपत्ति प्रकरण आरम्भ होता है । इस प्रकरण में पहिले प्राकृतिक प्राधिदैविकचरित्र का निरूपण किया गया है । प्राकृतिक नित्य आधिदैनिक सम्वत्सरमूर्ति चयन यश में अहोरात्ररूपा जितनी इष्टकाएँ होती हैं, उनका निरूपण करते हुए सर्वान्त में इस श्राधिदैविक विज्ञान का उपभंहार करते हुए ' सहैव एत श्रद्धानमामाप्नोति एष वा एकशतं विधते य एनं सन्त्रत्सरं बिभर्त्ति । तस्मादेनं सम्बत्सरभृतमेव चिन्त्रीत - " इत्यधिदैवतम् " यह कहा है । श्रुतिने--इसी सम्वत्सरयज्ञ के आधार पर हमारे वैध चयनयज्ञ ( मनुष्यकृत चयनयज्ञ ) का वितान होता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में शवकर आगे आकर अविने- ' अयाधियज्ञम ' कहते हुए – ' अधियज्ञ ' का स्वरूप बतलाया है । सर्वान्त में ' पञ्चेमाचतुर्विधा अङ्ग लयो, द्वे कल्कुपी ० ' इत्यादि रूप से आध्यात्मिक चयन का स्वरूप बतलाते हुए ' अथाध्यात्मम ' यह कहा है ( देखिए शत ० ब्र ० १० को २ अ ० ६ ० ) । ऐसी अवस्था में वैदिक आख्यानों के सम्बन्ध में अपनी कल्पना को प्रधानता देते हुए किसी एक ही दृष्टिकोण को प्रधान मान बैठना सर्वथा अविचारितरमणीय ही है सम्पूग परिभाषाओं का पूर्ण अनुसन्धान रखते हुए, पूर्वापर की सति का पूर्णरूप मे समन्वय करते हुए, इतिहामोक्क शब्दों की मार्मिकता लक्ष्य में रखते हुए, प्रत्येक आख्यान का अत्यन्त सावधानी से ही समन्वय करना चाहिए । जिस आख्यान में उक्त तीनों चरित्रों का समावेश रहता है, भाषाविज्ञान की दृष्टि " उस प्राशन की भाषाशैली अत्यन्त ही दुरूह बन जाती है । इसमें श्रुति का कोई दोष नहीं है । अति को एक ही आख्यान से अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैवत, तीनों चरित्रों का निरूपण करना पड़ता है । अतः उसे वाध्य होकर कुछ शब्द आध्यात्मिक रहस्य के उपोडलक बोलने पड़ते हैं, कुछ शब्द अधिदैवत सम्बन्धी प्रयुक्त करने पड़ते हैं, एवं कुछ शब्द श्रधिभूतभाव के द्योतक श्रुति ८६३
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द्वितीयध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमत्राह्मण भाषा से रखने पड़ते हैं । श्राख्यानशैली के इस गुहानिहित रहस्य को न जानने वाले सामान्य प्रधानता जन इस देते विरुद्ध हुए सम्पूर्ण भ्रम में पड़ जाते हैं । इस भ्रम के निराकरण के लिए वे किसी एक भाव को याख्यान का उसी रूप से समन्वय करने की चेष्टा करने लग पड़ते हैं । की चारही यही कारण है कि आज पुराण के आस्पानों पर अशनी के द्वारा व्यर्थ वेद की विज्ञानप्रधान टीकाटिप्पणी शास्त्र है, है । पुराण के चरित्र इनकी दृष्टि में निरी कल्पनामात्र है । वात यह है कि,, अप्रधानता में तारतम्य उधर पुराण इतिहासप्रधान शास्त्र है । हैं दोनों में दोनों विषय | केवल प्रधानता का निरूपण करता है । है । पुराण मनुष्यचरित्र को प्रधान मानता हुआ गौणरूप से विज्ञान विकसित रहता है । दूसरे शब्दों में-पुराण के प्रत्येक रूपान में विज्ञानस्य अन्तर्नित रहता है, मनुष्यचरित्र विज्ञान का निरूपण करता है । पुराण मनुष्य चरित्र के व्याज से ( बहाने से ) मनुष्यचरित्ररूप से ही ऋषि अमुक उदाहरण के लिए अगस्त्य का ही आख्यान लीजिए । पुराण कहता है-- ' अगस्त्य सूख गया । प्रार्थना आश्रम में रहते थे । उह्नोंने समुद्र का शोषण कर लिया । सम्पूर्ण समुद्र समुद्र का पानी चार ( खारा ) करने पर उन्होंने ' उदरस्थ पानी को पुनः निकाल दिया । तभी से होगया । " बहुत स्वा ] है अगस्या पानी का शोषक है के दक्षिणभाग में दक्षिणा व के समीप में भी अप् - - शोषक श अगस्त्यप्राण प्रचुरमात्रा में विद्यमान है । इस प्राण अगस्त्य नाम का नक्षत्र है । इस नक्षत्र व्यक्त हुआ है । जिस समय वर्षा के के सम्बन्ध से ही यह भौतिक नक्षत्रपट ' अगस्त्य ' नाम से में परिणत होकर आकाश में अन्त में ) अगस्त्य का उदय होता है, समुद्र की अतुल जलराशि शोषण वाष्परूप है । अनन्तर वर्षाकाल में अगस्त्य बायुधरातल में व्याप्त हो जाती है । यही अगस्त्य के द्वारा समुद्र का में परिणत होजाता है । यह है अगस्त्य के द्वारा परित्यक्त वह पानी पार्थिव क्षार भाग से संयुक्त होकर चारभाव स्वरूप की सर्वप्रथम जिम ' मानवमहर्षि ' ने के द्वारा समुद्र का शोषण अशोक अमान के उपयुक्त ' अगस्त्य ' नाम से ही प्रसिद्ध हुए । इसी पहिचाना तत्कालीन परिभाषा के अनुसार वह एवं उसके बंशन व्याज से अगस्त्यप्राणविज्ञान ' ही हमारे रहस्यको लक्ष्य बनाता हुआ ' पुराण ' मानत्रप्रस्थपिके सम्मुख रखता है । मध्यस्थ बनाकर ही विज्ञानतत्त्वों निदर्शनमात्र है । * पुराण के प्रायः सभी ग्राख्यान मनुष्यचरित्र को पुराणों का मन समझने वाले का निरूपणा करते हैं । बहना न होगा कि आर्यसम्यता के सर्वस्वभूत ' पुराण को देखना महा-वेदरहस्यानमित व्यक्तिविशेषों के द्वारा ही ' पुराण केवल कपोल कल्पना है'- जो कुछ मर्म्म बचा था, उसका पाप है ' – इसप्रकार के आक्षेप करने का अक्षम्य अपराध हुआ है । इधर ये केवल भाषाटीक के आधार पर आज सर्वनाश विद्याशून्य अज्ञ - कथावाचकों की कृपा से होगया है । में ज्योतिष्चक्र खगोल ( ), श्रीमद्भागवतादि पुराणों की कथा कहने का दुःस्साहस कर बैठते हैं ।, श्रीमद्भागवत उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि, भुवनकोप ( भूगोल ) का जैसा अद्भुत निरूपा हुआ है चाहिए । G इन सब विषयों का विपद विवेचन " पुराणरहस्य " नाम के प्राथ में देखना ८६४