Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 601–610
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 601–610
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमत्राह्मण भूगोल - खगोल - विद्या का ऐसा विस्पष्ट निरूपण और किसी पुराण में नहीं हुआ । हाँ, इसीसे मिलता जुलता प्रकरण विष्णुपुराण में भी ध्रुवचरित्र के सम्बन्ध में उपलब्ध होता है । कथा के व्याज से व्यासगद्दी को कलङ्कित करने वाले आज के ये कथावाचक क्या इन रहस्यों से प्रांशिक रूप से भी परिचित है १ । क्या वे पाश्चात्य विद्वानों के खगोलीय भूगोलीय साहित्य के सम्मुख भारतीय दृष्टि से इन विद्याओं के स्वरूप - विश्लेषण की क्षमता रखते हैं? । क्या वे पुराणोक्त श्राख्यानों के रहस्यार्थ का प्रतिपादन करने की योग्यता रखते हैं? । नहीं, तो फिर पुराणस्पर्श का भी उहें कोई अधिकार नहीं | विज्ञानमूलक सनातन धर्म पर आज जो जनता की श्रद्धा होती जारही है, इसमें अधिकांश में इह्रीं महानुभावों को प्रमुख कारण माना जायगा । ' भगवान् ने रासविहार किया, मक्खन लूट कर खाया ' इत्यादि वाग्विजृम्भृणों का ही नाम क्या पुराणशास्त्र है? । स्मरण रखिए । पुराण भी एक शाम्त्र है । शास्त्र भी साधारण नहीं, उच्चकोटि का, पारिभाषिक शास्त्र है । जो विद्वान् वैदिक - साहित्य पर अपना पूर्ण अधिकार नहीं रखता, उसे पुराण के अर्थ करने का कोई अधिकार नहीं है । धर्मस्तम्भ को अचल रखने के लिए ' पुराणकथा ' से बढ़कर हमारी दृष्टि में कोई दूसरा उत्तम साधन नहीं है । क्योंकि वैदिक - साहित्य विज्ञान- प्रधान होने से साधारण जनता के लिए दुर्बोध्य है । इधर पुराण ने उहीं वैदिक - तत्त्वों को आख्यानरूप से बड़ी ही प्रसादभाषा में हमारे सम्मुख रखा है । आबालवृद्धवनिता सब पौराणिक कथाओं से आकर्षितमना होकर तद्वारा धर्म्म का रहस्य सरलता से समझ सकते हैं । स्त्री - शूद्र - द्विजबन्धुओं ( विद्याशून्य नाममात्र के यथाजात ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्यों ) की ज्ञानेन्द्रियाँ गहनतम वैदिक तत्त्वों को ग्रहण करने में असमर्थ हैं । इसी विप्रतिपत्ति को दूर करने के लिए परमकारुणिक भगवान् व्यास ने आख्यान - उपाख्यान - गाथा - कल्पशुद्धि, डामर, जामल, तन्त्र, संहिता, ज्यौतिष्चक्र, भुवनकोष, मन्वन्तर, वंश, वंशानुचरित आदि १८ विषयों का सङ्कलन कर चारों वेदसंहिताओं के साथ पाँचवीं पुराणसंहिता का सम्पादन किया है, जैसाकि निम्नलिखित वच्चन से स्पष्ट होजाता है—
आख्यानैश्चाप्युपाख्यानैर्गाथाभिः कल्पशुद्धिभिः ।
पुराण संहितां चक्रे भगवान् बादरायणः ॥
आज स्थान स्थान पर कथाएँ होतीं हैं । भागवत के सहस्त्रों पारायण होते हैं । ' कथा ' के नाम पर निर्धन भारत का धन जलप्रवाहात् प्रवाहित होरहा है । अज्ञ कथावाचकों पर भोली जनता सम्पत्ति की वृष्टि कर रही है, परन्तु सत्र व्यर्थं । इतना सब कुछ होने पर भी क्यों धर्म से प्रजा की श्रद्धा उत्तरोत्तर पराडमुखा होती जा रही है? | क्यों पुराणशास्त्र, एवं तत्प्रणेता वैशम्यायन - सूत आदि महाभागों पर नवशिक्षितों के द्वारा, एवं वेदाभिमानियों के द्वारा आज गाली प्रहार होरहा है? । दे सकेंगे श्राप इन प्रश्नों का उत्तर? | यह सत्र इह्नीं तत्त्वानभिज्ञ कथावाचकों की कृपा का फल है । यह हुआ प्रासङ्गिक पुराणमत - पर्यालोचन । अत्र चलिए वैदिक आख्यानों की ओर वैदिक आख्यान वैज्ञानिक - चरित्रों को प्रधानता देता हुया ' मनुष्यचरित्र ' का भी आनुषङ्गिकरूपेण दिग— दर्शन कराते रहते हैं । प्रत्येक वदिक - आख्यान में श्राधिदैविक विज्ञान की प्रधानता प्रतीत होती है । परन्तु कुछ शब्द ऐसे प्रयुक्त कर दिए जाते हैं, जिनसे आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक चरित्र भी गतार्थ होजाते हैं । ८६५
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द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमत्राह्मण उदाहरणार्थ - त्रकृत आख्यान को ही लीजिए- ' औदणैश्चर्मभिः ' - ' के त्रयं ततः स्याम, यदस्यै न भजेमहि ' ' तं त्र्यंगुलेऽन्वविन्दन ' इत्यादि वाक्य आधिभौतिक चरित्र की ओर ही हमारा ध्यान आकर्षित कर रहे हैं । चमड़े की रस्सी का विज्ञानभाव के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । इसका उपयोग मानवमम्प्रदाय में हीं होता है । साथ ही ' यदि अपने को भाग न मिलेगा तो फिर अपन कहाँ रहेंगे ' यह भाव भी मनुष्यचरित्र काही द्योतक माना जायगा ' देवताओं ने खोदते खोदते तीन अंगुल की गहराई में विष्णु को पा लिया ' यह वाक्य भी आधिभौतिक चरित्र का ही समर्थक है । इसी प्रकार - " वामनो ह विष्णुरास ' ' यज्ञ सम्मितमदुः " इत्यादि शब्द आध्यात्मिक चरित्र के उपोलक हैं । ' मध्ये वामनमासीनं सर्वे देवा उपासने ', ' आत्मा वै यज्ञः ' इत्यादि श्रीत वचन ' विष्णु ' को हृदय में हीं प्रतिष्ठित मानते हैं आत्मा को यश मानते हैं । इसप्रकार गीयरूप से आधि-भौतिक एवं आध्यात्मिक चरित्र अवश्य ही गतार्थ माना जासकता है । तीसरा है आधिदैविक चरित्र । वह तो इस प्रकरण का मुख्य दी निरूपणीय विषय है । इन तीनों में से सर्वप्रथम आधिभौतिक रहस्य की ओर ही विज्ञ पाटकों का ध्यान आकर्षित किया जारहा है । आरुपानानुगत आदिभौतिक- रहस्य ( एतिहासिक रहस्य ) --जिस ' दायविभाग ' का स्वरूप ' ऐतिहासिक ' दृष्टि से आज हम आपके सम्मुल्य रखना चाहते हैं, उसका प्रधान सम्बन्ध भौमत्रिलोकी से है । जिसप्रकार प्रकृति में नित्या त्रैलोक्य - व्यवस्था है, उन नित्य लोकों में जिसप्रकार अग्नि वायु आदि नित्य पारा देवता प्रतिष्ठित हैं, तोकों में प्रतिष्ठित ततत् प्राण-देवता जिसप्रकार आधिदैविकयज्ञ का सञ्चालन कर रहे हैं. 1 ठीक इसी प्रकृति की रचना की प्रतिकृति ( नकल ) पर इस भूपिण्ड पर भी त्रैलोक्य - व्यवस्था थी । इनमें क्रमशः अग्नि वायु - इन्द्र नामके ' मनुष्य देवताओं ' का विषय था । ये ' मनुष्यदेवता ' प्रकृति के अनुसार अग्नि मे सोमवल्ली के सोमरूप रस की आहुति देकर ज्योतिष्टोमादि यज्ञ किया करते थे । जबतक इन भौमदेवताओं के हाथमं यज्ञविद्या रही, सब ---तक यज्ञबल से वे भौम- श्रासुरत्रिलोकी में रहने वाले असुरों के ग्रक्रमा को को व्यथ प्रमाणित करते रहे । परन्तु चन्द्रमा की कृपा से कहिए, अथवा तो दिव्यविभूतिके दुर्भाग्य से कहिए, जिस दिन दुष्टबुद्धि असुरों के द्वारा यशसाधक सोमवृक्ष ( सोमवल्ली ) नष्ट कर दिया गया, साथ ही विज्ञान परीक्षाओं का साधन भूत ' सूर्य सदन ' नामक ' विज्ञानभवन ' नष्ट कर दिया गया, उसी दिन से मनुष्यदेवताओं की सत्ता भूपिण्ड से उठ गई । महाभारतकाल पर्य्यन्त भौमत्रिलोकी - व्यवस्था यथाकञ्चित रूपेण रही । स्वर्गाधिपति इन्द्र महाभारतकाल में अन्तिम इन्द्र थे । इनके साथ अर्जुन का घनिष्ट मैत्रीसम्बन्ध था । इन्द्र के अभिन्न मित्र तक्षक सुप्रसिद्ध ग्वाण्डववन में रहते थे । जिस समय भगवान् कृष्ण के अनुसन्धान में अर्जुनने खाण्डवन जलाया था, उस समय इन्द्रने हीं तक्षक की रक्षा की थी । इसी इन्द्रने प्रातःस्मरणीय दानी कर्ण का जन्मजात कवच दान में लेकर अपने मित्र अर्जुन की सहायता की थी । युधिर सदेह जिस स्वर्ग में गए थे, वह यही भौमस्वर्ग था । उक्त कुछ एक निदर्शनों से प्रकृत में हमें केवल यही बतलाना है कि, महाभारतकाल -पर्यन्त देवव्यवस्था रही । इसके अनन्तर इसका एकप्रकार से सर्वथा उच्छेद ही होगया । जिसप्रकार ८६६
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मणप्र मनुष्यदेवताओं में इन्द्रादि देवता प्रमुख माने जाते थे, तथैव अपनी श्रासुर - त्रिलोकी में रहने वाले तत्कालीन असुरों में मय, वृत्र, नमुचि, बल, तार, तूर, विद्य न्माली, किलात, आकुली आदि अमुरजातियाँ प्रमुख मानीं जातीं थीं । इन असुरों की प्रधान जातियाँ ३६ थीं । इनमें एकमात्र ' मयजाति ' को छोड़कर शेष सत्र जातियाँ महा उद्दण्ड थीं । देवताओं का अपमान करना, उन के यज्ञों को नष्ट भ्रष्ट करने के लिए सदा उद्यत रहना, प्रजापति के द्वारा जो भूप्रदेश देवताओं को मिला था, उसे भी अपहृत कर लेने के प्रयास में तल्लीनरहना, ये सत्र इन दुष्टों की स्वाभाविक वृत्तियाँ थीं । हाँ, मयजाति अवश्य ही उस समय सभ्य मानी जाती थी । शिल्प, एवं ज्योतिष में तो उस समय सम्पूर्ण पृथिवीमण्डल में इस जाति को समता करनेवाली कोई दूसरी जाति न थी । आप को यह सुनकर भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि, वर्त्तमान में ज्योतिषविद्या का जो कुछ प्रसार भारतवर्ष में देखा सुना जाता है, वह इसी जाति की कृपा का फल है । ज्यौतिषशास्त्र के सुप्रसिद्ध विद्वान् वराह-मिहिर ने मयासुर से ही ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन किया था । आगे जाकर यह जाति ज्यौतिष में ऐसी उन्नति पर पहुँच गई थी कि, सुनकर आश्चर्य से चकित होजाना पड़ता है । आसुरत्रिलोकी के इजिप्तप्रान्त में रहने वाली मयजाति ने एक समय विविध प्रकार की ओषधियों का सङ्ग्रह कर उसे एक गहरे अन्धकूप में डाल दिया । यह वैज्ञानिकजाति जानती थी कि, श्रोषधियों का निर्माण चन्द्रमा के सोमरस से ही होता है । चान्द्रसोम हीं वष्टिरूप में परिणत होकर औषधियों का उपादान बनता है । इसी आधार पर इसने निश्चय किया कि, ओषधियों में वही चान्द्रसोम विद्यमान है । उपायविशेष से यदि उस का सङ्कलन कर दिया जाय, तो अवश्य ही एक नवीन चन्द्रमा उत्पन्न हो सकता है । तदनुसार उक्त प्रकार से कूप में ओषधियों की प्रक्षिप्त कर वैज्ञानिक प्रयोगों के द्वारा सोम का सङ्कलन आरम्भ किया । थोड़े समय में हीं कूप चन्द्रमा बड़े बेग से ऊपर की ओर उत्क्रान्त होकर वायुधरातल में इतस्ततः परिभ्रमण करने लगा । यह भी किंवदन्ती है कि, उस चन्द्रमा का प्रकाश १२ योजन पर्य्यन्त व्याप्त होगया था । अन्त में प्रतिष्ठा की न्यूनता से वह चन्द्रमा क्षीण होगया । आप को यह सुन कर और भी आश्चर्य होगा कि, मयजाति के इस आविष्कार के थोड़े समय के अनन्तर ही सम्पूर्ण इजिप्त प्रान्त अग्निविस्फोटन से सदा के लिए भूगर्भ में ह्रीं प्रविष्ट होगया | ऐसा क्यों हुआ?, इस का उत्तर ईश्वरसत्ता को सर्वोपरि मानने वाले भारतीयों की दृष्टि में तो यही है कि, जत्रतक उनका विज्ञान ईश्वरीय - सृष्टि के अनुकूल रहा, तबतक उन का कोई अनिष्ट न हुआ । परन्तु जब उह्नोंनें ईश्वरीय – सृष्टि के साथ स्पर्द्धा करना आरम्भ कर दिया, नवीन सूर्य्य, चन्द्रमा बनाने का उपक्रम कर दिया, तो प्रकृति ने उह्न इस असत् - साहस के लिए उचित दण्ड देना आवश्यक समझा । ऐसी अवस्था में विज्ञान का निनाद करने वालों को यह ध्यान रखना चाहिए कि, जबतक उन का विज्ञान प्रकृति के अनुकूल है, तभीतक वह विज्ञान लोकाभ्युदय का कारण बना रह सकता है । जिस दिन मदमत्त वैज्ञानिक ईश्वरीय - सृष्टि की प्रतिस्पर्द्धा में खड़े होजायँगे, उस दिन ईश्वर ऐसा न करै, वही विज्ञान लोकनाश काही कारण बन जायगा, जिसका कि उपक्रम अभी से होने लगा है । ८६७
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द्वितीययव्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमत्राह्मण बतलाना यही था कि, वर्त्तमान ज्यौतिष आसुरशास्त्र है । बव - वालय तैतिल - चिड़ि - वणिज-श्रादि शब्द संस्कृत - साहित में उपलब्ध नहीं होते । ये मत्र यूनानभाषा के ( आसुरभाषा के ) शब्द है । इसीप्रकार ‘ अ - ब - क - ह - ड - म - ट - प - र - त ' आदि बीस वर्णों की वर्णमात्रिका भी यहाँ की नहीं है । आज जिसे होडाचक्र ( वस्तु: ' अबकडचक्र ' ) पर भारतीय ध्योतिषी गर्व करते हैं, वह मयजाति की ही बपौती है । ओर तो ओर, स्वयं जन्मकुण्डलियों में भी आज वही आसुरभाव उपलब्ध होता है । लग्नस्थान से जब १२ भाव का विचार किया जाता है, तो विपरीतगति का ही आश्रय लिया जाता है । मीधे भाग से स्थानो का विचार न कर उल्टे पार्श्व से दशाओं का विचार होता है । यह श्रासुरपद्धति ही है | इसी आसुग्भाव से वर्त्तमान भारतीय ज्योतिष ' भूमेः पिण्डः शशाङ्कशकविरत्रिकुजेर्ज्यार्किनक्ष-त्रकक्षा ' इत्यादि रूप से सूर्य को चल, और पृथिवी 1 स्थिर मानते हुए ग्रह कक्षा का संस्थान भूपिण्ड-चन्द्रमा - बुध - शुक्र - सूग्य - बृहस्पति - शनि - नक्षत्रकक्षा इस रूपसे मानता है । सुप्रसिद्ध बारगणना का सम्बन्ध भी आसुरभाव से ही है । वैदिककाल के सम्पूर्ण व्यवहार नक्षत्र, तिथि, मास, सम्वत्सर, अयन - इह्रीं के आधार पर चलते हैं । समस्त वैदिक वाङमय का पर्य्यालोड़न कर जाइए, कहीं भी आप को शनि - रवि - आदि - वारों का उल्लेख नहीं मिलेगा । आज समस्त भूमण्डल पर सभी जातियों की व्यवहारभूमि शनि — रवि आटि ७ वार ही बने हुए हैं । इससे भी मयजाति को ज्यौतिषविद्या के महत्त्व का ही परिचय मिलता है । और लीजिए, - वेदाङ्गज्यौतिष में गणित का विशेष महत्त्व नहीं है । वहाँ सम्पूर्ण व्यवहार प्रधानरूप से सिद्धान्तों के आधार पर ही चलते हैं । यद्यपि चयनादि यज्ञों में ' इष्टकाचितिसन्धान ' के सम्बन्ध में कहीं कहीं गणित उपलब्ध होता है । परन्तु यह क्वाचित्क ही है । आज तो त्रिना गणित के ज्यौतिषी एक पाट भी आगे नहीं बढ़ा सकते । इसीप्रकार ग्रहसंस्था का क्रम भी वेदाङ्गज्यौतिष के अनुसार सूर्य - बुध- पृथिवी - चन्द्रमा- शुक्र - मंगल - देवसेना - बृहस्पति - शनि - नक्षत्रकक्षा - यही है । यद्यपि - वैदिक सिद्धान्त के अनुसार जो गति भूपिण्ड की है, वही सूर्य की भी है । सूर्य्य भी ग्वाक्ष-परिभ्रमण करता हुआ ' परमेष्ठी ' नामक महान् ग्रहके चारों ओर परिक्रमा लगाता है | परन्तु जिमप्रकार नाकपृष्ठ ( वर्त्तमान ज्योतिषपरिभाषा के अनुसार ' कदम्बवृत्त ' ) के चारों ओर २४ अंशके न्यासाद्ध से वृत्त बनाकर व २५ हजारवर्ष में एक परिक्रमा लगाता हुआ भी अल्पायु -मनुष्यों की दृष्टि में स्थिर प्रतीत होता हुआ ' ध्रुव ' ( अचल ) नाम का अधिकारी बन जाता है । एवमेव वैदिक परिभाषा के अनुसार २६ वें अहर्गण पर प्रतिष्ठित पारमंय विष्णु के चारों ओर अनन्तकाल में अपनी एक परिक्रमा लगाने वाला सूर्य भी स्थिर प्रतीत होरहा है । सूर्य की इसी दृश्यमण्डललक्षणा स्थिरता को लक्ष्य में रख-कर ही निम्नलिखित श्रोत वचन हमारे सामने आते हैं-" सूर्यो बृहती मध्युटस्तपति " । ‘ बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः ” । " नैवोदेता नास्तमेता मध्ये एकल एव स्थाता " ।
नैवास्तननमर्कस्य नोदयः सर्वदा सतः ।
उदयास्तमनञ्चैव दर्शनादर्शनं रवेः ॥
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमत्राह्मण इधर पृथिवी के परिभ्रमण में तो संदेह है ही नहीं हैं, जैसा कि -१ – सोमः पूपा च चेतुर्विश्वासां सुक्षितीनाम् । देवा रथ्योर्हिता ॥
२ - कतरा पूर्वा कतरा परायो कथा जाते कायः को विवेद ।
विश्वं त्मना विभ्रतो यद्ध नाम विवर्त्तते ग्रनी चक्रियेव ॥
३ – यज्ञ इन्द्रमवर्द्ध वत् -- यद् भूमिं व्यवत्तयत् ।
चक्राण पशं दिवि ॥
इत्यादि उक्त मन्त्रवर्णनों से स्पष्ट है । इधर वर्त्तमान ज्यौतिष पूर्व कथननुसार ' भचक्र ' को ' विचाली ' मानता है, एवं भूषिएड को स्थिर मानता है । यह भाव भी आसुरभाव का ही द्योतक है । भचक्र को चल मानिए, अथवा तो भूपिएड की चल मानिए, उभयथा गणित में अन्तर नहीं आता । गणित का उभ— यथा ठीक ठीक समन्वय होजाता है । परन्तु विज्ञानदृष्टि पृथिवी को कभी स्थिर नहीं देख सकती । मयजाति वैज्ञानिक अवश्य थी, परन्तु अमुर श्री । असुर सूर्य के विरोधी थे, यह बात पूर्व के आख्यानों में अनेक चार बतलाई जाचुकी हैं । इवर ' ग्रहस्यः पृथिवी ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार भूपिण्ड प्राप्य सुर प्राणमय है । वैज्ञानिक होते हुए भी मयजाति में यह आमुरभाव अभिव्यक्त था । उसने देखा कि, गणित, एवं फलित में तो कोई अन्तर आता नहीं । फिर क्यों देवप्रतिष्ठाभूत सूर्य की स्थिर, एवं अमुरप्राण प्रतिष्ठा-रूप भूपिण्ड को चल माना जाय । इसी अभिनिवेश में पड़कर उह्नोंनें भूपिण्ड को स्थिर माना, सूर्य्य को चल माना । वस्तुतः वैदिक - विज्ञान के अनुसार परमार्थदृष्टि से तो उपयुक्त कथनानुसार सूर्य - पृथिवी दोनों हीं चल हैं, एवं रोदसी त्रैलोक्य की अपेक्षा से सूर्य्य सर्वथा स्थिर है, एवं पृथिवी सूर्य्य को केन्द्र मान कर चारों ओर क्रान्तिवृत्त पर परिक्रमा लगाती है । बहुत हुआ, इस अप्राकृतिक विषय के निरूपण में हम पाठकों का अधिक समय नहीं लेना चाहते । इ से प्रकृत में हमें केवल यही बतलाना था कि, अन्यान्य असुरजातियों की अपेक्षा मयजाति विद्वान् थी । शिल्पकला की तो यह जाति भाग्यविधात्री ही थी । इह्रीं दिव्य विभूतियों के प्रभाव से इस जाति का भारतवर्ष के साथ घनिष्ट सम्बन्ध रहा । वराहमिहिर नाम के ब्राह्मण को भी इसने विद्या सिखलाने में श्रापत्ति न की । इस जाति का असुरों के साथ संसग भी कम ही रहता था । यही कारण था कि, कुछ लोग यूनान छोड़कर भारतवर्ष में ( खाण्डववन में ) आकर वस गए थे । जिस समय अर्जुनने खाण्डववन जलाया था, उस समय भगवान् कृष्ण के देश से यह मयवंश अग्निकाण्ड से बचा लिया गया था | इसी उपकार के बदले इस कृतज्ञ जातिने पाण्डवों के लिए ऐसा अद्भुत सभाभवन बनाया था, जिसे देखकर एक बार तो भौमस्वर्ग में रहने वाले देवता नारट आदि ऋषि भी चकित होगए थे यह भी पाठकों को सुविदित है ही कि, यही सभाभवन आगे जाकर महाभारतसङ्गाम का जन्मदाता बनता हुआ कुरुवंश के नाश का ही निमित्त प्रमाणित हुआ । ८६६
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमत्राह्मण तथोक्त कुछ एक प्रासङ्गिक निदर्शनों से पाठकों को यह मान लेना पड़ेगा कि किसी समय इसी पृथिवी पर मनुष्यविध देवता, एवं मनुष्यविध असुरों की सत्ता थी । असुरजाति का विकृतरूप तो आज भी विद्यमान है, परन्तु भीमदेवता सर्वथा कराल कालं के गाल में समा गए हैं । ये देवता कहाँ रहते थे?, देवत्रलोकी कॉनमी थी, आमुरत्रिलोकी कहाँ थी?, ये विभाग किसने किए थे?, इस त्रैलो-क्यविभाग की आवश्यकता क्या थी?, असुर किस लिए देवताओं पर आक्रमण किया करते थे?, अन्ततः देवजाति कैसे उति होगई?, तत्कालीन भौगोलिक व्यवस्था वैसी थी?, इन सब प्रश्नों का उत्तर पूर्व के पात्रप्रतपन - प्रकरण में अविधदेवतानिरूपण - प्रकरण में १०० पृष्ठों में बड़े विस्तार के साथ दिया जाचुका है । प्रकृत कथा के समन्वय के लिए वह प्रकरण अत्रापि एकवार अवश्य ही द्रष्टव्य है । वहाँ यह विस्तार से बतलाया जाचुका है कि, प्रजापतिने देवता और असुर, दोनों में शान्ति रखने के लिए इस भूपिण्ड के उत्तरी गोलार्द्ध, एवं दक्षिणी गोलार्द्ध मेद से दो विभाग कर इह क्रमशः देवता, और असुरों के अधिकार में दे दिया था । देवता सदा से ही शान्तिप्रिय थे, उधर असुर जन्म से ही दुष्टप्रकृति के थे । यद्यपि वर्गमील के अनुसार असुरों को देवताओं की अपेक्षा कहीं अधिक मात्रा में भूप्रदेश मिला था । ये देवताओं पर आक्रमण करने से नहीं चूकते थे, जैसाकि पूर्व के स्तम्बयजुर्हरणोपाख्यानरहस्य में विस्तार के साथ बतलाया जाचुका है । विषयसङ्गति के लिए यहाँ भी प्रकारान्तर से भौगोलिक व्यवस्था का संक्षिप्त स्वरूप पाठकों के सम्मुख उपस्थित कर दिया जाता है । वै समुद्रात्त, पूर्वादासमुदात्त पश्चिमात् । तयोरेवान्तरं गियराव विदुर्बुधाः || - मनुः २।२२ । उक्त मानवसिद्धान्त के अनुसार पर्वसमुद्र से आरम्भ कर पश्चिमसमुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण प्रदेश श्रविर्त्त नाम से प्रसिद्ध था । आर्य, और दस्यु, दो शब्द उस समय प्रधानरूप से प्रचलित थे । उक्त सीमा में दस्युओं का प्रवेश नहीं होमकता था, अतएव यह प्रान्त ' आर्यावर्त्त ' कहलाता था । पश्चिमसमुद्र पुराणों में ' महीमागर ' नाम से व्यवहृत हुआ है । यही पाश्चात्य भाषा में - ' मेडिट्र नियेन्सी ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी के समीप रक्तसमुद्र ( बेडसी ) है । एव पश्चिमसमुद्र ( चीनसमुद्र ) पीतसमुद्र ( यलोसी ) नाम से व्यवहृत हुआ है | निरक्षवृत्त से ४५ अंश पूर्व पूर्वसमुद्र है, एवं ४५ अंश पश्चिम पश्चिमसमुद्र है । किसी समय निरक्षवृत्त लङ्काम्थान पर आता था । आज भी निरक्षवृत्त तो वहीं है । हाँ, लङ्का अवश्य ही समुद्रगर्भ में विलीन होगई है । इधर जो महानुभाव ' मिलद्वीप ' ( सीलोन ) को ' लङ्का ' मान रहें हैं, यह उन की भ्रान्ति ही समझनी चाहिए | क्योंकि द्वीपगणना के अनुसार पुराणशास्त्रने लङ्काद्वीप, सिंहलद्वीप, दोनों को सर्वथा पृथक् माना है । साथ ही जिस देशान्तर पर लङ्का की सत्ता मानी गई है, उस देशान्तर पर सोलोन नहीं है । ऐसी अवस्था में देशान्तर - मानानुसार कीलोन सिंहलद्वीप होसकता है, न कि लङ्का | पुगणयुग में सम्पूर्ण भूमण्डल की व्यवस्था यहीं से की जाती थी । यही स्थान भारतवर्ष का उपक्रम स्थान था । यही भारतवर्ष की दक्षिण- मीमाथी । लङ्काममीपस्थ दक्षिणसमुद्र भारतवर्ष की दक्षिण सीमा 550
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द्वितीयमध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मणा थी, पूर्वसमुद्र पूर्व सीमा थी, एवं पश्चिम सद्रमु पश्चिम सीमा थी । आज जिसे ( सिन्धुनद को ) भारतवर्ष की सीमा माना जाता है, वस्तुतः भारत की पश्चिम सीमा सिन्धुनट नहीं, अपितु पश्चिम समुद्र है । आज भी यहाँ पर हमारा “ शर्त्र ” तीर्थ है । चीन तिब्बत आदि सभी भारतवर्ष के अन्तर्गत हैं । भारत अग्नि की सता जहाँतक हो, बही देश भारतवर्ष है । आज जिसे ' भारतवर्ष ' माना जाता है, वह तो आधा भारतवर्ष है । इस सम्बन्ध में स्वयं वेद के ब्राह्मणभागने बड़ा विशद निरूपया किया है । इधर ' वेद पौरुषेय है, अथवा अपौरुषेय? ' इस शास्त्रार्थ कलह में हीं अपनी जीवनलीला समाप्त करने वाले भारतीय विद्वानों को आज अपने देश की सीमा का भी स्वरूपबोध नहीं है । पाश्चात्य विद्वान् अपने स्वार्थी को प्रधानता देते हुए यथेन्छ सीमा - विभाग कर लाभ उठा रहे हैं । इधर भारतीय विद्वान् इस सम्बन्ध में सर्वथा सुप्त हैं । यदि दुर्भाग्य से ऐसे विचारों को लेकर इनके सामने मादृश कोई व्यक्ति उपस्थित होता है, तो - पहिले तो ये महानुभाव ऐसे विचारों को सुनने का अवसर ही नहीं देते । यथाकथञ्चित् दक्षिणादि के प्रलोभन से यदि ये एकत्र समबेत हो भी जाते हैं, तो ' वेदों में किन विषयों का निरूपण हुआ है?, वेद किन मौलिक तत्त्वों का रहस्य बतलाना है?, इत्यादि वेदार्थ - सम्बन्धी तात्त्विक विचारों का स्पर्श भी न करते हुए केबल वाक्कलहुरूप पोरुषेय पौरुषेय - वाद में हीं पड़ जाते हैं । मान लीजिए, बेद सर्वथा अपौरुषेय हैं । क्या यह मात्र जान लेने से वेद का वेदत्त्व चरितार्थ होगया? । नहीं, तो फिर छोड़िए इस पतनमूलक दुराग्रह को! अन्वेषण कीजिए वेदार्थ क!!! बतलाइए जनता को सच्चा मार्ग!!! अपनी प्राचीन संस्कृति, सीमाविभाग आदि का वास्तविक ज्ञान प्राप्त करते हुए कह दीजिए राजनैतिकस्वार्थलि'मु उन प्रतीच्यों को कि आपने हमें जैसा कूपमण्डूक समझ रक्खा है, हम वैसे कूपमण्डूक नहीं हैं | हमारा पर छोटासा नहीं, अपितु बहुत विस्तृत है । नैतिकता के व्याज से हमारी अज्ञता से अनुचित लाभ उठाते हुए आपने जिन चीन - जापानादि देशों को हमारी सीमा से पृथक् मान लिया है, यह कल्पना हमारे भुवनकोश के अनुसार नितान्त अशुद्ध है । ये देश हमारे देश हैं । हम उनके हैं, बे हमारे हैं । सबकी मूलसंस्कृति का स्रोत एक है । उनके सुख में हम सुखी, एवं उनके दुःख में हम दुःखी हैं । आज हमें अपने वास्तविक इतिहास का बोध नहीं । हम नहीं जानते - हम कौन थे, कहाँतक हमारा साम्राज्य था, क्या क्या साहित्य हमारे हाथ, किन किन था परराष्ट्रों पर हमारा श्रभुत्त्व था । वैदिक इतिहास, एवं भूगोल सम्बन्धी परिज्ञान से बञ्चित रहने के कारण हमारी सङ्गठनमूला राष्ट्रीय भावनाएँ सर्वथा उच्छिन्न होरहीं हैं । हो क्या रहीं हैं, हो-चुकीं हैं । विश्वास कीजिए आपका भारतवर्ष वर्त्तमान भारतवर्ष नहीं हैं । वह बहुत विस्तृत भूप्रदेश है । सुप्रसिद्ध भौमत्रिलोकी का पृथिवीलोक - स्थानीय भारतवर्ष ६० अंश पर्यन्त अपनी व्याप्ति रखना है, जैसाकि पूर्व में बतलाया जाचुका है । * में * प्रथम प्रकाशनानुगत इस प्रकरण को आज अनुमानतः २० वर्ष होचुके हैं, जिसका यह पुनः प्रकाशन सन् ५८ में होरहा है । इसी अवधि में अपनी भावुकतावश भारतराष्ट्र ने अपना ' अर्द्ध ' स्वरूप भी सर्वात्मना क्षत - विक्षत कर लिया है, जिससे बड़ी ऐतिहासिक भूल विगत तीन - सहस्र वर्षों में घटित विघटित पतनबुगों में भी घटित नहीं हो पाई थी, इत्यहो महतीयं विडम्बना राष्ट्रीय स्वतन्त्रप्रज्ञायाः, नितान्त - भावुकतापूर्ण-कल्पित - त्याग - तपस्या - बलिदान - विजृम्भण - समन्त्रितायाः, इत्यालप्यालमेव । ८७१
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द्वितीयअध्याय ३ प्रथमसप्तकः १- सप्तद्वीपः २ -- सप्तसमुद्राः सप्तकाः त्रयः भूगोलविद्यायां भारतीय ३- सप्तवायवः ४ -- सतलोकाः ५- सप्तपाताल नि ६ - सप्तावरणानि -सत्ताकाशाः प्रथमकाण्ड द्वितीय सप्तकः १- पर्वतः २- नद्यः २ - सरांसि ४- नानि ५ — आकराः ६ – देशाः ७- पुराणि ८७२ पञ्चमब्राह्मण तृतीयसतिकः १ देशविभागाः २- उपद्वीपविभागाः ३ - - समुद्रविभागाः ४ -- श्राखातविभागाः ५-- डमरूमध्यानि ६ राजशासनानि ७- पोतावतरणतीर्थानि ( बन्दरगाह ) यद्यपि इन विषयों का निरूपण पूर्व में यत्र तत्र होचुका है, परन्तु वहाँ बिस्पष्टरूप से एकत्र समन्त्रय नहीं हो सका है । यहाँ केवल देवव्यवस्था को प्रधान मान कर संक्षेप से वर्षा भुवनकोशों का दिग्दर्शन करा दिया गया है । अत्र आगे के प्रकरणो में यह विषय पुनः पुनः यावर्तित न करना पड़े, इसलिए प्रकारान्तर से देवासुरदाय विभाग से सम्बंध रखने वाले पाद्मभुवनकोश का स्वरूप पाठकों के सम्मुख उपस्थित कर दिया जाता है । आगे स्थान - स्थान पर देवासुर संग्राम का निरूपण याने वाला है । उन सबकी आधारभूमि यही पाद्मभुवनकोश है । दृष्टि- अनुग्रह - निक्षेप कीजिए पाद्मभुवनकोश के स्वरूप पर! कृतज्ञ बनिए पुराणशास्त्र के!! अनुभव कीजिए पुराणशास्त्र की आवश्यक उपादेयता का!!! पुराण में जिन बारह अपूर्व विपयों का निरूपणा किया गया है, उनमें से एक विषय ' भुवनकोश ' ( भूगोल ) भी है । जिस दिन ग्राप साङ्गोपाङ्ग भुवनकोश का स्वरूप अवगत करलेंगे, उस दिन भूपिण्ड का जल, स्थल कोई भी प्रदेश आपकी शानसीमा से बहिर्भूत न रहेगा । आज पाश्चात्यों की ओर से कहा जाता है कि, भारतीय विद्वान् ग्रात्म - परमात्म चर्चा के अतिरिक्त अन्य किसी विषय के ज्ञाता नहीं है । वश्य ही वर्तमान विद्वानों के सम्बन्ध में पाश्चात्यों का उक्त कथन सर्वथा ठीक है । निधि भारतीयों के शास्त्रकोश में सबकुछ है । परन्तु हम इसके शाता नहीं है । यदि पाश्चात्यों का यह अभिप्राय हो कि, इन विषयों को आजतक भारतीयों नें जाना ही नहीं, तो उनकी यह नितान्त भ्रान्ति है । हमारा तो यह भी कहना है कि, जो नियत भूगोलविद्या हमारे शास्त्रों में उपलब्ध होती है, उसका शतांश भी वर्त्तमान भूगोल में उपलब्ध नहीं होरा प्रकरण दूसरा है अतः प्रकृत में भूगोलविद्या का निरूपण नहीं किया जासकता । भूगोलसम्बन्धी विषयों का नामनिर्देश कर देवासुरदारविभागसम्बन्धी केवल ब्राह्म- ( ब्रह्मपुराणोक ) पाद्ममुचन कोश का ही संक्षिप्त निरूपण कर इस आधिभौतिक दायविभागाख्यान प्रकरण को उपरत कर दिया जायगा । तीन सप्तकों का निरूपण जिस प्रकरण में हो, वही ' भुवनकोशविया ' है । सम्पूर्ण भुवनकोश में केवल निम्न लिखित तीन सप्तकों का ही निरुपण हुआ है ।
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द्वितीय अध्याय १ - सप्तद्वीपा: ( १ ) शतपथत्राह्मण पञ्चमब्राह्मण १ - जम्बु:, २ - प्लक्षः, ३- शाल्मलिः, ४-- कुशः, ५-- कौश्चः ६ शाकः, ७- पुष्करः - इत्येते सप्तद्वीपाः । ' सप्तद्वीपा वसुमती ' इति हि भगवान् पतञ्जलिराह । ( १ ) पौराणिक सृष्टिविज्ञान के अनुसार भूपिण्ड को अपने गर्भ में रखती हुई महापृथिवी ( जिसका स्तोम्यत्रिलोकी रूप से स्तम्चयजुर्हरणप्रकरण में निरूपण किया जाचुका है ) उपर्युक्त मात द्वीप, सात समुद्रों से युक्त है । इनके चारों ओर क्रमश: सर्वप्रथम काञ्चनीभूमि, लोकालोक, तम, अण्डकटाह बे चार प्रदेश व्याप्त हैं | इस महापृथिवी के अनुरोध से ही क्षुद्रपृथिवीरूप भूपिण्ड में भी द्वीप समुद्रादि व्यवस्था की जाती है, जैसाकि ' पुराणरहस्य ' ग्रन्थ में स्पष्ट कर दिया गया है । महापृथिवीस्थित सप्तसमुद्र न जानने के कारण ही लार्डमेकाले दिपाश्चात्य विद्वानों ने भारतीय पौराणिक भूगोल को मिथ्या बतलाने का अक्षम्य अपराध कर लिया है | हमारी महापृथिवी की सत्ता में २१ ( एकविंश ) स्थ सू भी अन्तर्भुक्त है । यही कारण है कि, सप्तद्वीपों का निरूपण करते हुए पुराण रहस्यवेत्ताओंने सौरब्रह्माण्ड को ' पद्म ' की सीमा मानी है । सौरब्रह्मा पार्थिवपुष्करद्वीप में प्रतिष्ठित माने जाते हैं । कारण, महापृथिवी का पुष्करद्वीप २१ वें अहर्गण पर ही प्रतिष्ठित है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर महापृथिवी के उपयुक्त सातों द्वीपों का निरूपण करते हुए
पुराणाचार्य कहते हैं-इत्थं ब्रह्माण्डमध्यस्थो यो ब्रह्मा समपद्यत ।
सूर्यः स एतद्ब्रह्माण्डं ज्योतिषां मण्डलं महत् ॥ १ ॥
पृथिवीपरिभ्रमस्यान्तं यो मार्गस्तेन मण्डलम् ।
द्विधा स्यादधरा भूमिरुत्तरा द्यौः समे समे ॥२ ॥
सूर्याड गोलयोर्मध्ये कोट्यः स्युः पञ्चविंशतिः ।
विष्कम्भाद्धमिदं तस्य विष्कम्भों द्विगुणो भवेत् ॥ ३ ॥
साडकटान सद्वीपाम्भोधि - पर्वताः ।
पञ्चाशत्कोटिविस्तारा सेयं पृथिवी निरूपिता ॥ ४ ॥
तत्र सूर्य समारभ्य सप्तद्वीपाः सहार्णवाः ।
अनुदिशं पृथ्व्याः सूर्य्यमावृण्वते क्रमात् ॥ ५ ॥
याच न् द्वीपः प्रमाणेन तत् समुद्रोऽपि तत् समः ।
पूर्वतो द्विगु द्वीपसमुद्रा उत्तरोत्तरम् ॥ ६ ॥
लक्षयोजनविस्तारो जम्बुद्वीपोऽथ तत्समः । लवणोदसमुद्रः स्याद् द्विलक्ष: प्लक्ष इप्यते || ७ | I प्लक्षप्रमित एवेक्षु रसोदः स्यादिति क्रमः । ८७३
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द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड स्वादक समुद्रान्तः प्रमाणस्योपपद्यते ॥ ८ ॥
एवं द्वीपः समुद्रस्तु सप्तसप्तभिरावृताः ।
द्वीपश्चास्य समुद्रश्च समानौ द्विगुणौ परी ॥६ ॥
स्वादुदकस्य परिता द्विगुणा काञ्चनी - क्षितिः ।
लोकालोकचलो, तदूर्ध्व परिततमः ॥ १० ॥
तमश्चाण्डकटाहेन समन्तात् परिवेष्टितम् ।
विस्तार एप कथितः पथिव्या मुनिसत्तमैः ॥ ११ ॥।
न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् ।
तस्मिनिवसति ब्रह्मा पूज्यमानः सुरासुर: ॥ १२ ॥
२- मुप्तसमुद्राः-- पुराणेषु पचमत्राह्मण १ - लवणोदः ( क्षारसमुद्रः ), २ - इक्षुरोदः, ३ सुरोद:, ४ - घृतोद:, ५ - दधिमण्डोदः, ६ - क्षीराद:, ७- स्वादुदक् । ३- सप्तवायवः-आवह -- प्रवह -- संवह -- परिवह-- इत्यादिरूपेण ज्योतिषशास्त्रे सुप्रसिद्धाः । ४- सप्तलोकाः १- भूः, २ - भुव:, ३- स्व:, ४-- महः, ५-- जन:, ( जनत् ), ६- तपः, ७- सत्यम् । इन सातों लोकों का वैज्ञानिक स्वरूप ' गीताविज्ञानमाध्य ' के ' मानुषोत्तमकृष्णरहस्य ' प्रकरण में देखना चाहिए । यहाँ प्रकरण संगति के लिए कुछ एक श्लोकमात्र ही उद्धृत कर दिए जाते हैं—
रविचन्द्रमसोर्यावन्मयूखैरवभाष्यते ।
ससमुद्रसरिच्छेला तावती पृथिवी स्मृता ॥ १ ॥
यावत्प्रमाणा पृथिवी विस्तारपरिमण्डला ।
नमस्तावत्प्रमाणं हि विस्तारपरिमण्डलम् ॥ २ ॥
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