Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 611–620

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 611–620

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द्वितीययव्याय शतपथब्राह्मगा

पादगम्यं तु यत् किश्चित् वस्त्वस्ति पृथिवीमयम् ।

स भूलोकः समाख्यातो विस्तारोऽस्य पुरोदितः ॥ ३ ॥

भूमिसूर्यान्तरं यच्च भुवर्लोकस्तु सोऽपरः ।

सूर्य्य - वान्तर ' स्वर्गो नियुतानि चतुर्दश ॥ ४ ॥

3 त्रैलोक्यमेतदाख्यातं संक्षेपेण वावधि ।

वादूर्ध्वं महर्लोकः स कोटो योजनान्तरे ।

द्विको जनोर्लोकः सनन्दनमुखा इह ॥ ५ ॥

ततस्तपश्चतुः कोट्या मृर्ध्व ' वैराजदैवतम् ।

तत ऊर्ध्वं तु पट्कोटयां सत्यलोको विशिष्यते ॥६ ॥

ऐते सप्त महालोका उपरिष्टादधः पुनः ।

पातालानि च सप्तैव ब्रह्माण्डस्यैप विस्तरः ॥ ७ ॥

ras । न तिर्य्यगूर्ध्व मधस्तथा ।

कपित्थस्य यथा वीजं सर्वतोस्ति समावृतम् ॥ ८ ॥

५ - सप्तपातालानि-पचमत्राह्मण १ - अतल, २ - वितल, ३ - सुतल, ४- तलातल, ५-- महातल, ६ -- रसातल, ७- पाताल | ' पाताल लोकाः पृथिवी पुढानि इम पुराणसिद्धान्त के अनुसार भूपिण्ड के सात स्तर ही सात पाताल कहलाते हैं । इनमें आरम्भ के तीन पुट ( पोमय हैं, आगे के तीन पुट अग्निमय हैं, एवं केन्द्रपुट ब्राह्म । इसी से मेरुरूप स्कम्भ का विनिर्गम होता है । भूपिण्ड के पहिले तीन स्तरों में पानी रहता है, दूसरे तीन स्तरों में अग्नि रहता है । सर्वान्त में सर्वप्रतिष्ठारूप प्राणाग्नि रहता है । यहाँ भूगर्भस्थ प्रजापति है । सृष्टि का प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण यही प्रजापति है । यह प्रजापति हृ - द - य स्वरूप है । हृ आहरणधर्मा विष्णु है, द - विक्षेपणधर्मा इन्द्र है, य-नियमन धर्मा ब्रह्मा है । इनमें से रूप विष्णु के अभिप्राय से यह पाताल स्थान अनन्त शेपना । नाम से प्रसिद्ध है । वायु शेषनाग है । इसी पर विष्णुतत्त्व प्रतिष्ठित है । इसी आधार पर शेषनाग के फण् पर भूपिण्ड की सत्ता मानी जाती है । यह प्राणमय तत्त्व क्रान्तिमण्डलपृष्ठीय केन्द्रभूत कदम्ब से युक्त होता हुआ - सुमेरु - कुमेरु - भाव की प्रतिष्ठा बनता है, जैसाकि पूर्व - सन्दर्भों में विस्तार से बतलाया चुका है । ८५.

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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड ६ सप्तावरणानि ( नरकाः ) — १- ( १० ) रुधिरान्ध: ( १ ) १ – भैरवः २- ( १० ) वैतरणी २-- शौकरः ३- ( १२ ) कृमीशः ३ – रौधः ( ४ ) ४ - ( १३ ) कृमिभोजनम् ४ -- तानः ( २ ) ५ - - विशासनः ५- ( १४ ) असिपत्रवनम् ६- ( १५ ) कृष्णः ६- महाज्वल: ७- ( १६ ) लालाभक्षः ७-- तप्तकुम्भः ( ३ ) ८ – महालोभः ( ५ ) ८ - ( १७ ) दारुणः ६ - विमोहनम् ६- ( १८ ) पूयवहः ७ – मप्ताकाशाः ( स्वर्गाः ) — ८७६ पञ्चमत्राह्मण ६-१ - ( १६ ) वह्निज्वाल: २- ( २० ) अधःशिरः ( ६ ) ३ -- ( २१ ) सन्देश: ( सदंश:) ४-- ( २ ) कृष्णसूत्रः ५- ( २३ ) तमः ६-- ( २४ ) अवीचिः ( ७ ) ७ -- ( २५ ) श्वभोजनः प्रतिष्ट: ८- - ( २६ ) ६- ( २७ ) अवीचिः १ – रौरवः, २ – तानः, ३ – विमोहनः ४ – कृमीशः, ५ – लालाभक्षः, अधः शिराः, ७ – अवीचिः । सूर्य में सात नयाँ मानी जाती हैं । इस सात नाड़ियों के सम्बन्ध से शनिलोकरूप आवरण-लोक ( नरकलोक ) सात भागों में विभक्त होजाता है । आगे जाकर २७ नक्षत्रों के सम्बन्ध से २७ नरक होजाते हैं । इन २७ नरकों का विभाग निम्नलिखित है--२८ वें अभिजिन्नक्षत्र के सम्बन्ध से २८ नरक होजाते हैं । चन्द्रमा का परिभ्रमण - अधः, मध्य, ऊर्ध्व, भेद से तीन भागों में विभक्त है । इस कक्षात्रयी के मेट से २८ नरक त्रेधा ग्रावर्तित होकर ८४ संख्या में परिणत होजाते हैं । ये ही पुराणप्रसिद्ध ८४ नरक हैं । इन सबका विशद वैज्ञानिक विवेचन ' श्राद्ध-विज्ञान ' नाम के ग्रन्थ में देखना चाहिए । इन ८४ का २८ में अन्तभव है । २८ का सात में अन्तर्भाव है | अतएब भगवान् व्यासने - " अपि च सप्त " ( शा ० सूत्र ) के अनुसार प्रधानरूप से सात ही नरक माने हैं । इन पें आत्मानुगामिनी सांरज्योति का प्रभाव है । यहाँ तारतम्य से तम का ही साम्राज्य है । यहाँ आत्मप्रकाश इस तम मे श्रावृत होजाता है, अतएव पुराण ने इहें " आवरण " नाम से ही व्यवहृत किया है । वैदिक - विज्ञान के अनुसार ये आवरणलोक " असुर्खा नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृता ” इत्यादिरूप से ' अलोक ' नाम से प्रसिद्ध हैं । १ – अपोदकः, २ – ऋतधामा, ३ – अपराजितः, ४ – ब्रध्नस्वविष्टप, ५– अधिद्यौः ६ – प्रद्यौः, ७ रोचनाः । १- अग्नि, २- वायु, ३- इन्द्र, ४ - नाक, ५ वरुण, ६- मृत्यु, ७ - प्रजापति, इन मात देवताओं के भेद से देवस्वर्ग सात भागों में विभक्त होजाते हैं । इन सातों की भी वैज्ञानिक उपपत्ति श्राद्ध-

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द्वितीय वाय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण विज्ञान में हीं देखनी चाहिए । यहाँ श्रात्मा श्रावृत नहीं होता, अपि तु सौर प्रकाशमय इन लोकों में आत्मा विकसित रहता है | आत्मविकास के लिए यहाँ पूर्ण अवकाश है । अवकाश ही व्याकाश है – ' को ह्येवान्यान कः प्राययाद्यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ' इत्यादि श्रौष पद सिद्धान्त के अनुसार आकाशरूप स्वर्ग ही आनन्द का कारण है । अनावृत श्राकाश प्रदेश ( खुला स्थान - खुली हवा ) आनन्द का कारण है । इसी अना-वृतभाव को लक्ष्य में रखकर पुराणने सप्त स्वर्ग को ' सप्ताकाश ' नाम से व्यहृत किया है । दूसरा सप्तक पर्वतादि का है । प्रसङ्गागत इन के अवान्तर भेद नाममात्र के लिए पाठकों के सम्मुख उपस्थित कर दिए जाते हैं-१ - पर्वताः--वर्ष -१ – कुल गिरि, २ – शाखागिरि, ३ – पादगिरि, ४ स्तूपगिरि, ५ – पर्वत, ६ – विष्कम्भपर्वत, ७– - केसरपर्ववत, ८- मर्यादाशैल, भेद से पति आठ भागों में विभक्त हैं । इनमें से कुछ एक का स्वरूप आगे के मेरुत्रकरण में बतलाया वाला है । भारतवर्ष के ' कुलपर्वत'-१-७ ( सात ) -१ - महेन्द्र, २ – मलय, ३ – सह्य ४ - शुक्तिमान् ५ -- विन्ध्य, ६ - - पारियात्र, ७ -- ऋक्ष । भारतवर्ष में असंख्य ' शाखापर्यंत ' ---कोलाहल, वैभ्राज, मन्दुर, ददुर, वाताध्वग, दैवत, मैनाक, सुरस, तुंगप्रस्थ, नामगिरि, गोवद्धन, पाण्डुर, पुष्पगिरि, वैजयन्त, रैवत, अत्रुद, ऋष्यमूक, गोमन्थ, कृतशैल, कृताचल, श्रीपर्वत, चकोर, आदि आदि । २ – नद्यः-चतुर्ग गम्, सप्तगंगम्, नदी, महानदी, शाखानदी, क्षुद्रनदी, कुल्या, आदि भेद से नदियों के अवान्तर अनेक भेद हैं । स्वयं ऋग्वेद संहिता में इन नदियों का बड़े विस्तार से निरूपण हुआ है । भारतीयों की दृष्टि से भूपिण्ड की कोई भी नदी तिरोहित नहीं थी । आज तो हम समुद्र - उल्लङ्घन में भी अपने आपको प्राय-श्चित्त का ागी समझने लगते हैं । परन्तु कोई युग ऐसा था, जब हमारे भारतीय ऋषि विद्याओं के अनुसन्धान के लिए समस्त पृथिवी की परिक्रमा लगाने में भी कोई आपत्ति नहीं समझते थे । यदि वे भी हमारी ही भाँति कूप-महूक होते, तो कौन भूगोलविद्या का व्यापक ज्ञान हमारे सम्मुख रखता? । सम्पूर्ण भौमत्रिलोकी की नदियों को छोड़िए । भौमत्रिलोकी के पृथिवीलोक स्थानीय केवल भारतवर्ष को ही लीजिए । देखिए ऋषियों के भौगो-लिक महान् अन्वेषणका अद्भुत प्रदर्शन! ८७७

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द्वितीयाध्याय भारतवर्ष की नदियाँ -प्रथम काण्ड पञ्चमब्राह्मण , ६ – शतद्र, ७ - बिपाशा, ( १ ) १ - गंगा, २ -- सुरम्वती, ३ – सिन्धु, ४- - चन्द्रभागा, ५ - यमुना १३ -- पती, १४ - - विशाला, ८ – ऐरावती, ६– कुट्ट, १० – गोमती, ११ - - धूतपापा, १२, - १६ बाहुदा – कौशिकी ,, २० - आपगा, इत्यादि नदियाँ १५ – देविका, १६ -- तु, १७ निष्ठीवा, १८ - गण्डकी हैं । शेष शाखानदियाँ हैं । हिमवत्पाद मे निकली हैं । इनमें गंगा - सरस्वती - सिन्धु ग्रादि महानदियाँ ६ - सदानीरा, ७ – ( २ ) १ – देवम्मृति, २ - देवती, ३ – वातघ्नी, ४ – वेण्या, ५ – चन्दना, , १२ – द्रवन्ती, आदि नदियाँ चर्मण्वती, वृष, ६ - विदिशा, १० - वेत्रवती ( वेतवा ), ११ - शिश्रा पारियात्र पर्वतानुगामिनीं हैं । ७ – दशा-( ३ ) १ – शोणा, २ – महानदी, ३ – नर्मदा, ४ – सुरथा, ५ – क्रिया , १२, ६ – - अतिलघु मन्दाकिनी ,, १३ – शोख़ी, र्णा, ८ – चित्रकुटा, ६ – चित्रोत्पला १० - करमोटा, ११ – पिशाची, आदि नदियाँ ऋक्षपाद १४ — शैवला, १५ – समेहजा, १६ – शुक्तिमती, १७ – शकुनी, १८ – त्रिदिवा पर्वत से निकली है । , ७ –– म़िनी-( ४ ) १ – शिप्रा, २ -- पयोध्या, ३ – निर्विन्ध्या, ४- तापी, ५ -- - अन्तःशिला वेणा, ६ –, वैतरणी आदि नदियाँ विन्ध्या-वाली, ८-- कुमुद्दती, ६– तीया, १०-- महागौरी, ११ - दुर्गा, १२ -चल से निकली हैं । , ६ – पापनाशिनी, ( ५. ) १-- गोदावरी, २ -- भीमरथी, ३ – कृष्यबेला, ४ -- तुङ्गभद्रा, ५ –– सुप्रयोगा आदि नदियाँ सह्याद्रि से निकलीं हैं । नदियाँ मलयपर्वत से ( ६ ) १ -- कृतमाला, २ -- ताम्रपर्णी, ३ - पुष्पवती, ४ -- उत्पलावती, यादि निकलीं हैं । , ६- लाङ्गलिनी, ( ७ ) १ -- पितृकुल्या, १-- सोमकुल्या, ३ - - ऋषिकुल्या, ४ -- जुला, ५ - - त्रिदिवा हैं । ७ - वंशकरा, आदि नदियाँ महेद्रपर्वत से निकली ६-- पलाशिनी, ( ८ ): -- मुविकाला, २ – कुमारी, ३ – मनुगा, ४ - मन्दगामिनी, ५ - - क्षमा, यदि नदियाँ शुक्तिपर्वत से निकली हैं । , कि, भार-यह है कुछ एक भारतीय नदियों का नाम निदर्शन । आज आवश्यकता इस बात करें, की है और संसार को तीय विद्वान् अपने सुसंघटित प्रयासों से अपने इन विभूति चिह्नों का भूतप्रधान अन्वेषण - भौगोलिक ज्ञान अधूरा बतलावें कि, हमारे पूर्वजों के भौगोलिक ज्ञान के सम्मुख याजका केवल ध्यान देंगे? | अपनी विलास-है | अपना एक कल्पित सीमाभाव रखने वाले भारतीय विद्वान् क्या इस ओर भक्तगण हमारे इस आयोजन के लीलाओं में अतुल धनराशि व्यय करने वाले पुराण के जड़श्रद्धालु ?, सम्बन्ध में क्या कभी कुछ विचार करेंगे?, असम्भव । क्यों सांस्कृतिक - निधियों इसलिए कि - ' राजा कालस्य कारणम ' मूलक वर्त्तमान युग भारतीय मौलिक -त्रिसहस्रार्षिकी बुद्धि-के पुनरन्वेषण के प्रति न केवल तटस्थ, निरपेक्ष ही प्रमाणित होरहा है । अपितु ८७८

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द्वितीयअध्याव ३– सरांसि – 8- वनानि--५ – ग्राकराः ( खानें ). ६ - देशा - ७ - पुराणि -शतपथब्राह्मण पञ्च पत्राह्मण ८७६ मनः - शरीर - दासतामूला भारतराष्ट्र की सर्वदासता ने भारतीय हृदय को ज्ञानविज्ञानात्मक मौलिक स्वरूप से उस सीमा पर्य्यन्त पराङमुख कर स्वयं ही इस अपनी मूलनिधि के के अनन्तर स्वम्वरूपबोध सर्वथा ही श्रभिभूत हो जाया करता है । दिया है, जिस सीमा पर प्रतिष्ठित होजाने-समुद्र, सागर, उपसागर, सर, पल्लव, भेद से सरोवर पाँच भागों में विभक्त माने गए हैं । पूर्व - पश्चिम - उत्तर - दक्षिण, चारों समुद्र ' समुद्र ' नाम से यत्र यत्र दिशाओं में प्रतिष्ठित समुद्र ' सागर ' नाम से व्यवहृत व्यवहृत हुए हैं । सीमाभावयुक्त, यदि सागर हैं । जिसे वर्त्तमानभाषा में ' झील ' कहा जाता है, वही हुए हैं । अराल सागर, महीसागर प्राकृतिक बड़े बड़े तालाब ‘ सर ' नाम से व्यवहृत हुए हैं । मानसरोवर पुराण , अच्छोदसर में ' उपसागर , ' नाम से प्रसिद्ध हैं । जिसे ' खाड़ी ' कहा जाता है, वही पुराण में ' पल्लव ' शब्द से व्यवहृत हुई आदि ' सर ' प्रसिद्ध हैं । आप को पुराण की शरण में हीं आना चाहिए । है । इन के विस्तृत ज्ञान के लिए तो अरण्य, उपवन, आराम, पुष्पवाटिका, निष्कुट, भेद से बन पाँच भागों में विभक्त माने गए हैं । सैंकड़ों कोस लम्बे चौड़े, हिंसक पशु - पक्षियों से व्याप्त महावन नैमिषारण्य, दण्डकारण्य, श्रादि श्रम प्रसिद्ध हैं । नगरों के बाहिर ' अरण्य ' नाम से प्रसिद्ध हैं । हैं । नगर के भीतर नागरिकों के बिहार के लिए स्थान स्थान विशद उद्यान ' उपवन ' नाम से व्ववहृत हुए से व्यवहृत हुए हैं । जिसे श्राज " पार्क " कहा जाता है, वही पर ' आराम निभित छोटे छोटे उद्यान ' आराम ' नाम यत्र नागरिकाः ) । सभ्रान्त गृहस्थों के गृहोद्यान - ' पुष्पवाटिका ' कहलाता है । ( आगत्य रमन्ति ' निष्कुट ' है । ' है । साधारण गृहस्थों की फुलवाड़ी ये खानें प्राकृत, कृत्रिम भेद से दो भागों में विभक्त हैं धातु की खान प्राकृत है १, कहाँ कहाँ किस किस राजशासनकाल । किस भूप्रदेश में किम गई हैं?, इन सब का निरूपण इसी आकरप्रकरण में हैं । में नई नई खानें बनाई पुरी, पत्तन, महानगर, नगर, ग्राम, खरवट, उपनिवेश सात भागों में विभक्त हैं ।, देश - पुर, इन

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण देवता की प्रतिष्ठा हो, वह देश-जो देश, किंवा पुर दैवी विभूति से युक्र हो, जहाँ किसी प्रसिद्ध, सुदामापुरी, ब्रह्मपुरी, श्रादि प्रसिद्ध ' पुर ' - ' पुरी ' नाम से प्रसिद्ध है । काशीपुरी, जगन्नाथपुरी ', पत्तन द्वारिकापुरी ' कहलाता है । अनेक नगरों में जो सत्र हैं । जहाँ राजसत्ता हो, राजा की प्रधानता हो, वह विभाग प्रासादयुक्त देश नगर है । प्रमाणों में बढ़ा चढ़ा हो, वही ' महानगर ' कहलाता है । पापाणनिम्मित अल्पसंख्याजन - निवासप्रदेश ' खर-मृण्मय ( कच्चे ) प्रासादयुक्त देश ग्राम है । दुर्गरहित २०-२० साधारण ग्रहस्थियों की निवासभूमि ' उपनिवेश ' है । बट ' है । महा अरण्यों के मध्य मध्य में १०-१० भारतवर्षीय कुछ देशों के नाम बतला मरुभाषा में यही उपनिवेश ' ढाणी ' नाम से प्रसिद्ध है । परिचयार्थ दिए जाते हैं--कलिङ्ग, मशक, वृक, आदि देश प्रायः ( १ ) - मत्स्य, कुमुमाल्य, क्रतुल, काशिकोशल, ग्रान्ध्र, मध्यदेश माने जाते हैं । , सिन्धु, सौवीर, ( २ ) -- वाल्हीक, वाटधान सुतीर, कालतोयद, अपरान्त, शूद्र, केरल, गन्धार , दम्भमाल , यवन, कम्बोज, र, मद्र, शतद्र ह, कलिङ्ग, पारट, हारभूषिक ( हरिभूषिक ), माठर, कनक,, शुनशोक केकय, कुलिक, जाङ्गल, श्रीमध्य, सलौकिक, वीर, तुषार, पल्हव, आत्रेय, भारद्वाज, पुष्कल, शेरक, लम्पक, आदि देश उदीच्य ( उत्तरदेश ) हैं । चल चन्द्र, किरात, तोमर, हंसमार्ग, कश्मीर, करुण, शूलिक, कुहक, मागध मालवर्तिक, भद्रतुङ्ग, प्रतिजप, ( ३ ) -- अन्ध, वामकुङ्क, बल्लक, मखान्त, ग्रङ्ग, चह्न, मलद,, नन्द, ग्रादि देश प्राच्य ( पूर्वीय ) भार्याङ्ग, अपमद्दक, प्राग्ज्योतिष, मद्र, विदेह, ताम्रलिप्त, मल्ल, मागध देश हैं । , कलिङ्ग, ( ४ ) - पूर्णा, केरल, गोलांगूल, ऋषिक, मूषिक, कुमार, रामट पुलक,, शक अश्मक , महाराष्ट्र , भोजवद्वन , माहिषक, कॉलिक, ग्रामीर, विशिक, अख्य, सखा, बुलिन्द, मौलेय, विदर्भ, दण्डक, हैं । कुन्तल, दम्भक, नीलकालक, आदि दाक्षिणात्य जनपद जनपद हैं । ( ५ ) - शूपरिक, कालिधन, लोल, तालकर, आदि अपरान्त , तोबल, कोशल, त्रैपुर, ( ६ ) --मलज, कर्कश, मेलक, चोलक, उत्तमार्ग,, आदि दशार्ण विन्ध्यवासी , भोज, किष्किन्व जनपद हैं । वैदिश, तुम्बुर, चर, यवन, पवन, अभय, रुण्डिकेर, चर्चर , मालव, किरात, ( ७ ) --- नीहार, भार्ग, कुरु, तुङ्गण, खश, कर्णप्रावरण, अर्ल, दर्घ्य, कुञ्चक, चित्रभाग यदि पर्वताश्रयी जनपद हैं । पुराणशास्त्र की विषय आवश्यकता से अधिक विस्तृत होता जारहा है । अत: तीसरे सप्तक का दिग्दर्शन चाहते हैं, तो वेद के साथ म्वाध्यायनिष्ठा से समन्वित मानते हुए सर्वान्त में, " यदि श्राप भारतराष्ट्र दीजिए । का वेदभाषा अभ्युदय दुरुह है । उह्रीं वैदिक विषयों साथ पुराणों का अध्ययनाध्यापन भी शीघ्र से शीघ्र आरम्भ कर से हमारे सम्मुख कला है । जबतक आप को पुराणने बड़े विस्तार के साथ बड़ी ही प्राञ्जलभाषा में गद्य - पद्यरूप के द्वारा फैलाई हुई, देश के गौरव को पुराण को न अपनावेंगे, तत्रतक वर्त्तमान भौगोलिक, एवं वञ्चित ऐतिहासिकों करने वाली नाशकारिणी भ्रान्ति का कथमपि रसातल में पहुँचाने वाली, हमें अपने भागधेय से की ओर आप का ध्यान आकर्षित किंवा निराकरण नहीं कर सकेंगे " यही निवेदन करते हुए पानभुवनकोश जा रहा है । ८८०

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द्वितीयग्रध्याय शतपथब्राहाण पञ्चमनाहाण पाद्रुमभुवनकोश स्वरूप दिग्दर्शन-भूगोलविद्या को ही पौराणिक - परिभाषानुसार ' भुवनकोश ' कहा जाता है । जिस समय की स्थिति का आज हम निरूपण करने वाले हैं, उस समय सुप्रसिद्ध ध्रुव ' अभिजन ' नक्षत्र पर था । दूसरी शब्दों में आज से लगभग १२ || वर्ष पूर्व पौराणिक युग में अभिनिन्नक्षत्र ही ' ध्रुव ' नाम से प्रसिद्ध था | जिस सुमेरु को हम भूपद्म की कर्णिका बतलाने वाले हैं, वह सुमेरु उस समय टीक ध्रुव के नीचे था । श्राज सुमेरु, और ध्रुव में बहुत ग्रन्तर होगया है । तत्कालीन पौराणिक स्थिति के अनुसार उस समय चन्द्रकक्षा सूर्य्य-कक्षा से ऊपर अपनी सत्ता रखती थी । न केवल उस समय ही, अपितु यदि उसी सुमेरु -३ ष्ठ से कक्षाओं की व्यवस्था का विचार किया जाता है तो आज भी चन्द्रकक्षा सूर्य्यकक्षा से उपरि भागस्था ही मिलती है । अध्ययनशील पाठकों को यह विदित ही है कि, पुराण चन्द्रमा को सूर्य से ऊपर मानता है । इधर यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है कि, चन्द्रमा पृथिवी का उपग्रह होता हुआ पृथिवी के चारों ओर परिक्रमा लगता है, जैसा कि आगे के – “ पुरा क्र रस्य विमृषोः " इत्यादि मन्त्र - व्याख्यान में स्पष्ट होने वाला है । सुमेरु स्थान पर ध्रुव - नक्षत्र ( पुराण समय में ) सीधा मस्तक पर खम्वस्तिक पर ) आजाता है । भूपिण्ड का तिर्य्यग् भाव हट जाता है । जिसप्रकार एक नागदन्त ( खूँटी ) पर डोरी से बँधी हुई कन्दुक गेंट ) ठीक सीधी लटकी रहती है, मेरुस्थान पर भूपिण्ड की ठीक यही दशा रहती है । यहाँ तिर्य्यग् विष्वद्वृत्त सर्वथा सीधा पूर्वापर रहता है । ध्रुव एक स्थिर कीलक है । उससे निकलने वाली धौवविद्युत ही रश्मिसूत्र है । इसी सूत्र से भूपिण्ड ब्रद्ध है । लीलामय जगदीश्वर ने भूपरूप कन्दुक को ध्रुवकीलक में विद्युद्रूप सूत्र से बाँध कर सीधी लटका रक्खी है । इस स्थान से यदि आप चन्द्रकक्षा की स्थिति का समन्वय करेंगे, तो इसका शर ( विक्षेप ) २७० कला ( ४ अंश ३० कला ) का होगा । उधर सूर्य्यविक्षेप पाश्चात्यों के मतानुसार एक कलामात्र है । इसप्रकार चन्द्रमा सौरक्रान्तिवृत्त से ४ अंश ३० कला, क्रमशः दक्षिणा और उत्तर भाग में जाता है । इस ' शर ' की अपेक्षा से चन्द्रकक्षा अवश्य ही सूर्यकक्षा से बाहिर तक चली जाती है । इधर हमारे पुराण का ज्योतिश्चक्र-विभाग ( खगोलविभाग ) मेरु को प्रधान मान कर ही आगे चलता है । अपनी इसी मेरुसम्बन्धिनी - परि-भाषा को लक्ष्य में रखकर ( चन्द्रकक्षा को सूर्यकक्षा से बहिभुत समझते हुए ) पुराणने ( भाग-तादि ने ) चन्द्रमा को सूर्य से ऊपर बतला दिया है । प्रत्येक शास्त्र की भिन्न भिन्न परिभाषाएँ होतीं हैं । उन परिभाषाओं का मौलिक - रहस्य समझे बिना तनपरिभाषाधारेण प्रतिष्ठित तन् सिद्धान्तों पर आक्षेप करना अज्ञता है । ' सुमेरु ' पौराणिक भुवनकोश की आधारभूमि क्यों है? इसका उत्तर वही प्रकृतितत्त्व है, जैसाकि आख्यान के आधिदैविक रहस्य में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । प्रकृत ऐतिहासिक प्रकरण में केवल यही समझ लेना पर्य्याप्त होगा कि, जिसे वर्तमान भौगोलिक ' उत्तरध्र प्रदेश ' कहते हैं, वही पुराण का ‘ सुमेरुप्रदेश ' है । सुमेरु कुमेरु का क्रमशः उत्तर - दक्षिण ध्रुव के साथ सम्बन्ध है । वर्त्तुल भूपिण्ड की वह बिन्दु, जिसके खस्त्रस्तिक पर ( ठीक मस्तक पर ) उत्तरध्रुव - नक्षत्र है, वही प्रदेश मे है | भूपिण्ड की वह बिन्दु, जिसके अधः स्वस्तिक पर ( ठीक पैरों की ओर ) दक्षिण ध्रुव है, वही प्रदेश कुमेरु ८८१

पृष्ठ 618

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमनाहारण है । इस सुमेरु,, कुमेरु के सञ्चालक उत्तर, दक्षिण - ध्रुव हैं । भगवान् स्वयम्भू प्रजापतिने सुमेरु – कुमेरु - रूप भूपिण्ड की बिम्बद्खा को मूल मानकर दृश्य, अदृश्य, दो विभाग कर दिए हैं । यही विश्वद्वा उत्तर-गोलार्द्ध - दक्षिण गोलार्द्ध की विभाजिका रेखा है । विष्वद् से ऊपर की ओर का उत्तरगोलार्द्ध ' ( विष्वद् से उत्तर की ओर रहने वाले श्रस्मदादि की अपेक्षा से ) दृश्यभाग है, एवं दक्षिण गोलार्द्ध दृश्य - भूभाग है । वर्त्तमान भौगोलिक भी इसी व्यवस्था से भूप्रदेशों को मुख्यवस्थित करते है । ब्रह्मा ने किस क्रम से इनमें देशविभाग माना?, इसके पहिले वर्तमान भौगोलिकों की व्यवस्था का स्वरूप पाठकों के सम्मुख उपस्थित कर द्विया जाता है । इसका कारण यही है कि, पौराणिक भूगोल पुराण की पठन - पाठन प्रणाली के अभाव से प्रायः लोगों की दृष्टि से तिरोहित होरहा है ।आज भारतीय शिक्षित समाज उन पौराणिक देशविशेषों के नामों से भी परिचित है । ऐसी अवस्था में यदि हम केवल पौराणिक - भूगोल का ही स्वरूप बतला देते हैं, तो एक प्रकार से हमारा यह प्रयास व्यर्थ जाता है । अतएव प्रासङ्गिक समझते हुए भी प्रकरणसङ्गति के लिए अत्यन्त संक्षेप से नवीन [ वर्त्तन ] दृष्टिकोण का स्वरूप बतलाना आवश्यक मान लिया गया है । पाश्चात्यों की सम्पूर्ण व्यवस्था ' ग्रीनवीच ' को मध्यरेखा मान कर हुई है । जिसप्रकार हमारी भूम-ध्यरेखा का आलम्बन ‘ उज्जैन ' है, तथैव उन की प्रथम - मध्याह्नांग्या ग्रीनवीच से सम्बन्ध रखती हैं । हमारा मध्यवास्थान ग्रीनवीच से ८० देशान्तर पर माना जाता है । इसी अभिप्राय से यह रेखा भूगोल- शिक्षण में--' अस्मीपूर्वी देशान्तर ' नाम से प्रसिद्ध है । यही भारतवर्ष की प्रथम मध्याह्नरेखा है । सुप्रसिद्ध विश्वदत्त भी वर्तमान में ' भूमध्यरेखा ' नाम से व्यवहृत करने योग्य है । अपनी सुविधा के अनुसार ३६० ध्रुवप्रोतवृत्तों, किंवा मेरुप्रोतवृत्तों में से किसी भी एक रेखा को भूमध्यरेखा मान लेना केवल कल्पना है । इस काल्पनिकी भूमध्यरेत्वा के, एवं वास्तविक भूमध्यरेखा के पृथक्करण के लिए दोनों के क्रमशः प्रथममध्याह्नरेखा, एवं भूमध्यरेखा, ये नाम रख दिए हैं । हमारे यहाँ इन दोनों को क्रमशः भूमध्यरेखा ( प्रथममध्याह्नरेखा ), एवं विष्ववृत्त, इन नामों से व्यवहृत किया है । विष्वद्खा में दोनों की समानता है । प्रथममध्याह्नरेखा दोनों की पृथक् पृथक् है । दोनों में ८० देशान्तर का अन्तर है । पाश्चात्य भूगोल- विद्या के अनुसार दृश्य क्षितिजरूप दृश्य- उत्तरी गोलार्द्ध में, एवं अदृश्य - गोलार्द्ध में निम्नलिखित प्रदेश हैं ।

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 619 का मूल पृष्ठ
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द्वितीय अध्याय १ - - एशिया २ – समस्त योरोप ३ – उत्तर अमेरिका ४ - दक्षिण अमेरिका का उत्तरी भाग ५ - पश्चिमी द्वीप समूह ६- मिश्र शतपथब्राह्मण पञ्चमत्राहाण ७– - ' सहारा ' नाम का सुप्रसिद्ध मरुस्थल ८- - ट्रिपुली - आदि १ – आस्ट्रेलिया उत्तरी गोलार्द्ध ( दृश्य क्षितिज ) का भूभाग २ – न्यूजीलेन्ड ३ - - दक्षिण अमेरिका ४ -- दक्षिण अफ्रीका दक्षिणी गोलार्द्ध ' ( अदृश्य क्षितिज ) का भूभाग ५ - - एन्टार्टिका आदि क्षेत्रफल के अनुपात से दोनों गोलाद्धों में का अन्तर है । अर्थात् उत्तरी गोलार्द्ध में भूप्रदेश दक्षिणी-गोलार्द्ध ' की अपेक्षा तिगुना है । उत्तरी गोलाद्ध ' के एशियाभाग में अर्चनान, मसोपोटेमिया, जूड़िया, एशिया - माइनर, ईरान, अफगानिस्तान, अबीसीनिया, तिब्बत, तुर्किस्तान, रूस, मंगोलिया, चीन, जापान, भारतवर्ष, वर्मा, श्याम, अनाम, कम्बोडिया, मंचूरिया, जापान, पूर्वीरूस, आदि प्रान्तों का समावेश माना जाता है । एन्डमन, नीकोवर, यवद्वीप, लुम्बक -सुम्बाफ्लोरीन, आदि से युक्त जात्राद्वीप-संघ, नाई, सोलोन, आदि उपद्वीपों का भी एशियायी खण्ड में हीं अन्तर्भाव है । भारतीय- उषद्वीपमंघ म्लेच्छभाषा में ' इंडियनआर्किपैलैगो ' नाम से प्रसिद्ध है । पाश्चात्यों की इस भूगोलव्यवस्था के सम्बन्ध में एक बात का ध्यान रखना आवश्यक है । इन की भौगोलिक व्यवस्था का भूपिण्ड के साथ सम्बन्ध न होकर राजशासन के साथ ही सम्बन्ध है । जैसे जैसे राज्यसीमा बटती बड़ती रहती है, तदनुसार ही ये महानुभाव तत्तत् प्रान्तों को एक दूसरे प्रान्तों के ** यह मरुस्थल सत्र से बड़ा माना जाता है । = यह दक्षिणध्रुब के समीप का सत्र से बड़ा ऊसर भूभाग है । जहाँ समस्त योरोप का क्षेत्रफल ३८ लाख वर्गमील है, वहाँ केवल इस एन्टार्टिका का क्षेत्रफल ५० लाख वर्गमील है । यह भूभाग तुषारान्छन्न [ बर्फीला ] है, सर्वथा निर्ज्जन है । यहाँ केवल ' डंगन ' नाम की महाभयानक पशुजाति उपलब्ध होती है । कुछ एक पक्षी भी हैं । यहाँ के समुद्र में विशेषतः " ह्वेल " मछली उपलब्ध होती है । ८८३

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 620 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमत्राह्मण साथ मिलाया करते हैं, एवं पृथक किया करते हैं । ऐसी अवस्था में इन की भौगोलिक व्यवस्था को स्थिर नहीं कहा जामकता | इधर हमारी भौगोलिक व्यवस्था संत्र्या स्थिर है, एवं आकल्पान्त स्थिर रहेगी । हम अपनी मूर्खता से भले ही इन अपने प्रान्तों को अपने हाथ से खो बैठें । परन्तु जबतक हमारा साहित्य जीवित है, तबतक कोई भी शक्ति हमें अपने प्रजापतिदत्त दायभाग से पृथक् नहीं कर सकता । पूर्व के देश विभागों में पाठकों को यह विदित होगया होगा कि, ' भारतवर्ष ' आज की भूगोल व्यवस्था के अनुसार एक छोटामा भ वण्ड है । आश्चर्य तो यह है कि, नाममात्र का भारतवर्ष भी आज हमारा नहीं है 1 । " पामीर देश में हम लोग किमी समय रहते थे । वहाँ से ग्राकर क्रमश सभ्य बनते हुए हम लोगों नें भारतद्वीप में रहने वाली अनार्यजातियों को मार भगाया । इसप्रकार अपने बल से इन्हें पराजित कर हम यहाँ बस गए " | सत्र बात है - " वीरभोग्या वसुन्धरा " । यदि कोई बिजेता राष्ट्र आज हम को - " भारतवर्ष तुह्मारा जन्मस्थान नहीं है, तुम भी हमारी ही भाँति श्रागन्तुक हो । जैसा अधिकार इस पर तुह्मारा वैसा ही हमारा " यह कहे, तो हमारे प्रज्ञाकोश में क्या प्रत्युत्तर है? | वर्त्तमान इतिहास, भूगोल तो हमें यही सिखाता है कि ' तुम ( हम ) आगन्तुक हो । फिर किस आधार से हम भारत को अपनी जन्मभूमि कहैं । चाहते हैं आप इस विप्रतिपत्ति को दूर करने का उपाय?, तो आइए पौराणिक भुवन कोशविद्या की शरण में | वह आप को आप के देश का, आप के सच्चे इतिहास का स्वरूप बतलावेगा । इस के द्वारा उन मिध्याप्रचारकों को आप यह कहसकेंगे कि, " हमें भूगोल अवस्था एवं इतिहास के सम्बन्ध में धोखा दिया गया । समस्त एशिया प्रान्त पर एकच्छत्र शासन करने वाले हम को धोखा देकर कूपमण्डूक बनाया गया । हमारे इतिहास के स्वरूप को विकृत कर हमें अपने अतीत गौरव से च्युत करते हुए हमारे आत्मा को निर्बल बनाया गया । परन्तु दैवकृपा से आज हमने अपना दायभाग अपनी सांस्कृतिक - निधि के स्वरूपानुग्रह से उपलब्ध कर लिया है । तदावार पर ही आज हमनें अपना वास्तविक स्वरूप समझ लिया है । चिरकाल से विलुप्तप्राया यज्ञविद्या का परिचय हमें प्राप्त होचुका है । स्वरूपज्ञानपूर्विका यह यज्ञ-विद्या हमें " कत्तु मर्कत्तमन्याकन्तु म " समर्थ बना सकती है । अतएव अब कोई भी चक हमारी प्रतारणा नहीं कर सकता " । भुवनकोश के सम्बन्ध में देशविभाग दो प्रकार से व्यवस्थित किए जाते हैं । " राज्य शासन को प्रधान मानकर देशों को अपनी सुविधानुसार व्यवस्थित करना " एक प्रकार है । इसी को इम ' शासनकृत-विभाग ' कहते हैं । जो राजा सैन्यबल से जिन देशों को अपने अधिकार में कर लेता है, वह अपनी इच्छा-नुसार अपने राष्ट्र - नाम के अनुरूप नामों से उन की व्यवस्था कर देता है । कहना न होगा कि, यह भौगोलिक-व्यवस्था सर्बथा अनित्य है । यही कारण है कि कुछ समय पूर्व अम्र्म्मा को भारतवर्ष से पृथक कर दिया गया था, आज पुनः वर्मा भारतवर्ष के सन्निकट गया है । जो गान्धार देश भारतीयों का देश था, वही शासन--पद्धति के प्रभाव से आज ' अफगानिस्तान ' ' कन्धार ' आदि नामों से प्रसिद्ध होरहा है । ' हिङ्गलदेश ' पहिले ' सुगढ़िया ' नाम से व्यवहृत हुआ, आज वही ' बिलोचिस्तान ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । पारस्थान आज ' पर्शिया ' कहला रहा है । इसी राजशामन की कृश से आज हमारा पश्चिमभारतवर्ष अफगानिस्तान, रामान, ईरान, आदि नामों से प्रसिद्ध हो रहा है । आज पश्चिम भारतवर्ष अपने नाम को छोड़ बैठा है । ' भारतवर्ष ' शब्द केवल हिन्दुस्तान ' मात्र में हीं संकुचित होगया है । 558