Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 71–80
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 71–80
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड सम्पुटित मानव अपने स्वरूपानुगत - आत्मचैतन्य से उत्तरोत्तर विजड़ित होता हुआ स्वयमपि एक जड़- भूतपिण्ड रूप में परिणत होजाने के लिए ही मानो कटिबद्ध बनता जारहा है । अध्यात्मबादी का सबसे बड़ा व्यामोहन है - " स्वशरीर के किसी केन्द्रात्मक शून्य प्रदेश - विशेष में ही उपकल्पित इन्द्रयातीत - अलौकिक - काल्पनिक - मनोराज्य में ही ईश्वरीय - आधिदैविक-जगत् के तत्त्वों -- पदार्थों को अपनी कल्पना से ही आध्यात्मिक - प्राण का रूप दे दे कर सबकुछ अपने इस काल्पनिक - अध्यात्मप्राण में ही परिसमान मानते रहना " । ऐसे अध्यात्मवादी ही अपने शून्यजगत् में हीं सूर्य्य - चन्द्रमा - अग्नि - पत्रन - गङ्गा - यमुना - आदि की कल्पना में श्रात्मविभोर नहीं, अपितु मनोविभोर बने रहते हैं- " मन लड्डू तो फीके क्यों " को अक्षरशः चरितार्थं करते हुए । इह्रीं की भाषा है- ' मन चङ्गा, तो खटोटी में गङ्गा ' । इन की दृष्टि में न तो आधिभौतिक-प्रत्यक्षदृष्ट - प्रभ्युदयसाधक - विश्वसौन्दर्य का ही कोई महत्व, एवं न इस भौतिक जगत् के प्रवर्त्तक नित्यविद्ध— श्राधिदैविक ईश्वरीय - जगत् का ही कोई महत्त्व । श्रपितु सबकुछ ये अपने काल्पनिक - यात्म में हीं, कल्पना के ही द्वारा काल्पनिक - भावों को ही ढूँढ दूँढ कर अपनी कल्पना में ही तुष्ट होते रहते हैं । इत्थंभूत - काल्पनिक -- श्रद्वैतवादात्मक - अध्यात्मवादने ही विशेषरूपेण मानव का सर्वप्रथम अधिदैवत से विच्छेद कराया है, तत्सहैव अधिभूत - निबन्धना आचारनिष्ठा से भी । काल्पनिकी अध्यात्मभावना के रसिक मानव उस महतो महीयान् - ईश्वरीय अधिदैवत - विश्व का अपने अणोरणीयान् - अध्यात्म में निमजन मानते हुए- ' न त्वहं तेषु ते मयि ' इस तथ्य को सर्वथा ही तो भूल जाते हैं । वह ( आधिदैविक ) अंशी बनता हुआ जहाँ ब्यापक है, निरवच्छिन्न है, वहाँ यह ( अध्यात्म, और अभिभूत ) ' अंशो नानात्त्वात् ' * ( व्याससूत्र ) के अनुसार तदंश बनता हुआ व्याप्य है, सावच्छिन्न है । उस व्यापक - अधिदैवित - ईश्वरीय-जगत् के यत् किञ्चिदंशरूप एकांश में हीं जो व्याप्यधर्म्मा अध्यात्म - और अधिभूत- प्रतिष्ठित हैं, भला उह्नीं के गर्भ में वह व्यापक कैसे सर्वात्मना प्रविष्ट होजायगा? । " वे मुझ में हैं किन्तु मैं उन में नहीं हूँ " का यही तो स्वारस्य है । सचमुच इस से बड़ी आत्मवञ्चना इत्थंभूत अध्यात्मविमूढ इस मानव की और क्या होगी कि, वह आधिदैवकी - पारमेष्ठ्य - गाङ्गेयावातरभूता- पुण्य- सलिला - माता भगवती भागीरथी की सर्वत्र्याप्ता-सलिलधारा में व्याप्यभावान्वित - अपने स्वल्पतम - भौतिक शरीर को निमजित कर देने जैसे महत - पुण्यकर्म से बञ्चित रहता हुआ उस व्यापक तत्त्व को अपने शरीररूप काल्पनिक अध्यात्म में मान बैठने की महती भ्रान्ति करने लग पड़ता है । और यों इस प्रत्यक्ष देवानुग्रह से यह आत्मविमूढ उसीप्रकार वञ्चित ही तो बना रह् जाता है, जैसे कि विशुद्ध भूतबादी- ऑक्सिजन - हाइड्रोजन की मान्यतामात्र से अनुप्राणित- कीटाणुत्रों की चर्व्वरणा से ही चव्वितान्त: करण बना रहता हुआ गङ्गा के उस आधिदैविक अभिमानी - दिव्य स्वरूप के अनुग्रह से विहीन ही रह जाता है, जो अनुग्रह एक श्रद्धालु मादृश - ग्रामीण भी श्रद्धामात्र के अनुग्रह से अनायासेनैव प्राप्त कर अपना जीवन धन्य कृतकृत्य प्रमाणित कर लिया करता है । 1 निवेदन - निष्कर्ष यही है कि केवल अध्यात्मवाद के व्यामोहनने, तथा केवल भूतासक्तिने ही भारतीय - मानव को दैवत - श्रात्मिक - भौतिक- समन्वयात्मक, - ' तत्तु समन्वयात ' –सिद्धान्तमूलकः - ज्ञान-विज्ञानात्मक - पारिभाषिक उम तथ्य से वञ्चित ही कर दिया है, जिसके दुष्परिणाम स्वरूप ही वेदार्थ के सम्बन्ध में तथाकथितरूपेण नाना वैसे प्रवाद उपक्रान्त होपड़े हैं, जिन से वेदपुरुष का गौरव उत्तरोत्तर अभिभूत ही ७१
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किञ्चिदिवखावेदन बनता जा रहा है, जिस इस सर्वनाशकारिणी अभिभूति के निरोध का एकमात्र उपाय है- " अधिदैवत को इस अध्यात्म, और अभिभूत के साथ समन्त्रित कर देना " । तात्पर्य तदुपाय का यही है कि, वैदिक- अमुक - आख्यानोपाख्यानों का ज्ञानविज्ञानात्मक - सर्वाङ्गीण-समन्वय न तो केवल अधिदेवत से ही सम्बन्ध रखता न केवल अध्यात्म से ही, एवं न केवल अधिभूत मे ही । उदाहरण के लिए प्रस्तुत कर्म से अनुप्राणित- ' स्तम्बय जुई र कर्म्म ' - निबन्धन उस ' देवासुरदाय विभागा-व्यान ' को ही लीजिए, जिसके द्वारा देवता " और असुरों का प्रजापति के द्वारा दायविभाग ( बँटवारा ) बतलाया गया है । श्राख्यानानुगत देवता और असुर कौन हैं, किस वस्तु का किसने दायविभाग किया है, इसका नैदानिकरूपस्तम्बयवुः ( कुशमुष्टि ) कैसे " एवं किस आधार पर मान लिया गया है, इस सब प्रश्नों का समाधान केवल दैवत - अध्या - म - भूत की दृष्टि से कदापि सम्भव नहीं है । अपितु तीनों ही प्रक्रमों के साथ इस ऐति-हासिक आख्यान का समन्वय होरहा है । इन्द्र - अग्नि वायु आदि देवदेवता, तथा वृत्र नमुचि किल्लात आकुली आदि असुर प्रकृति में भी है । अर्थात् अधिदैवतजगत् में भी हैं, अध्यात्म में ( मानवीय संस्था में ) भी हैं, एवं अधिभूतात्मक मानवेतिहास में भी मानवरूप देवता और असुरों की जातियाँ पूर्वयुगों में विद्यमान थीं । प्रकृतिवत् यहाँ भी त्रैलोक्य - व्यवस्था थी, एवं देवव्यवस्था थी । महाभारत युगपर्य्यन्त वह देवव्यवस्था प्रक्रान्त रही । अर्जुन के साथ मानव मौम - इन्द्र का ही सख्य था । युधिष्ठिर सदेह जिस स्वर्ग की ओर श्रभिमुख हुए थे, वह भीमस्वर्ग ही था इन्हीं सब तथ्यों के स्वरूप समन्वय के आधार पर प्रस्तुत ' देवा-सुर- दायविभागास्यान ' प्रतिष्ठित हुआ है, जिसके क्रमसिद्ध - अधिदेवत - अध्यात्म - अधिभूत - नामक तीनों संस्थानों के दायविभागों का रहस्यात्मक स्वरूप विश्लेषण दी प्रकृत- प्रकरण का निष्कर्षार्थ है, जिसके द्वारा इतिहास - निबन्धना उन अनेक काल्पनिक - भ्रान्तियों का सर्वात्मना निराकरण होजाता है, जिस निराकरण के बिना भारतीय परिभाषिकी परम्परा से प्रसंस्पृष्ट पश्चिमी विद्वान् केवल कल्पना के बल पर वैदिक-इतिहास के सम्बन्ध में वैसी धारणाएँ पक कर बैठे हैं, जिनके अनुकरण को ही ' स्वधर्म्म ' मान बैठने वाले तत्पचानुम हमारे भावुक भारतीय - बन्धु भी अपने सर्वस्वभूत वेदशास्त्र के आख्यानो ख्यानों के प्रति उपहास व्यक्त करते हुए अपने आप को प्रायश्चित्त का ही भागी बनाते जा रहे हैं । चारगात्रचतुर, लोकनिष्ट, राजनितिकुशल - प्रतीच्य जगत् की कामार्थमयी महती - बुभुक्षा ने हीं उनका ' भारत ' जैसे सर्वसमृद्ध देश की ओर ध्यान आकर्षित कराया । श्रागमन पर तन्नैष्ठिकोनें अपने अन्तर्जगत् में हीं यह निश्चय कर लिया कि, " जननक भारतराष्ट्र के प्रज्ञाकोश में सांस्कृतिक - चल मात्रा शेष रहेग, नक्तत्र प्रयत्न सहस्रों से मी भारत पर एकछत्र प्रभुत्व स्थापित नहीं किया जा सकेगा । निःसन्देह उम युग का भारत तत्पूर्व की अनेक शताब्दियों से बाह्य श्राक्रमण - परम्पराओं के कारण अधिकांश में शक्तिहीन ही प्रमाणित होचुका था । उधर साम्प्रदायिक मतवाद - फलों से इस ज्ञानविशनात्मक नैष्ठिक सांस्कृतिकज्ञ भी अधिकांश में ही ही होचुका था । तभी तो प्रतीच्य अतिथिवर्ग ने यहाँ एकाधिपत्य के स्वप्नों का दर्शन आरम्भ कर दिया । यह सब कुछ होने पर भी प्रतीच्य अतिथियों के श्रागमन से पहले पहले तक भारतीय प्रजाग पे अपनी संस्कृति, सभ्यता, धर्म्म, उपासना, ज्ञान, आदि आदि विस्मृतप्राया भी विमल - विभूतियों के प्रति पूर्ण श्रद्धा अवश्य प्रतिष्ठित थी, जिस श्रद्धा की विद्यमानता भी आगत अति-
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड थियों के मूलोत्पाटन में उसी समय पर्याप्त बन सकती थी युग के द्वारा ज्ञान-यदि उसी में किसी महापुरुष विज्ञानात्मिका - परिभाषात्रों के स्वरूप - विश्लेषण के द्वारा तत् - श्रद्धा को श्रभिव्यक्त कर दिया जाता, तो । किन्तु दुर्भाग्यवश स्थिति उस समय ठीक विपरीत दिशा का ही अनुगमन करती गई तत्कालीन वर्गभेदों अनुप्राणिता पारस्परिकी उस ग्रहमहमिका के द्वारा, जिसके द्वारा सभी वर्ग उन तथाकथित सुसभ्य? उदार? अतिथियों? के सहयोग से अपना अधिक से अधिक स्वार्थसाधन करने का ही इच्छुक बन चले थे | तथाविध उपयुक्त वातावरण में हीं उस प्रतीच्य - शिक्षा का सूत्रपात हुआ, जिस के पाठ्यग्रन्थों के द्वारा भारतीय पुरातन शास्त्रों की मान्यताओं की, सभ्यता की, तथा आदर्शों की वैसी आलोचना ही की गई, जिसका निष्कर्ष पूर्व की पक्तियों में व्यक्त किया जाचुका है । उन सब अनर्गल - आलोचनाओं में से प्रकृत में हम एक आलोचना की ओर ही पाटकों का ध्यान आकर्षित करेंगे एक विशेष तथ्य के स्पष्टीकरण के लिए, और उस श्रालोचना का सम्बन्ध माना जायगा – ' भारतदेश के मौलिक स्वरूप के सम्बन्ध में ' । प्रतीच्य शिक्षा के प्रशंतः भी सम्पर्क में आजाने वाले भारतराष्ट्र के बड़े से भी बड़े राष्ट्रभक्त-देशभक्त - अद्यतन - भारतीय मानव से जब भी यह प्रश्न किया जायगा कि, " क्या भारतवर्ष आयों का श्रादिदेश है? ", तो तत्काल क्षणमात्र विलम्ब किए वह यही उत्तर देगा कि - " नहीं-- भारत तो अनायौँ कादिदेश है । वे ही यहाँ के आदिवासी, किंवा मूलनिवासी हैं । आर्य्य तो मध्यएशिया से शनैः-शनैः बढ़ते बढ़ते इस देश में आपहुँचे, और अनायों को युद्ध में परास्त कर वे यहाँ के अधि--पति बन बैठे * " । दूसरों की कौन कहे ', सुप्रसिद्ध देशभक्त, और भारतीय -- धर्म्म के अनन्यसेवी स्वर्गीय * - प्रतीच्य -- विद्वानों की अभिनिवेशमूला इत्थंभूता धारणा उनके द्वारा निर्द्धारित भारतीय - पाठ्य-ग्रन्थों में इस रूप से श्रभिव्यक्त हुई है कि- " आय का मूलनिवास, किंवा आदिनिवास मध्य एशिया ही था । मध्यएशिया से ही आय्र्यलोग भारत में आए थे । अतएव उह्न समुद्र का भी स्वरूप-चाध नहीं था उस युग में । क्योंकि मध्यएशिया में कोई समुद्र नहीं है । हाँ, नदियाँ बहुत सी हैं । एवं नदियों के लिए श्राय्यों के उस पुरातन ऋग्वेदग्रन्थ में ' सिन्धु ' शब्द प्रयुक्त हुआ है, जो वैदिक वाङमय अधिक से अधिक २५०० - ३००० सहस्र वर्षों से अधिक ( पुराना नहीं माना जा सकता " इत्यादि । X- सर्वथैव प्रौढ़िवादात्मिका उक्ता धारणा के विपरीत भारतराष्ट्र की स्वतन्त्रता के महान् द्रष्टा स्वर्गीय श्री बालगङ्गाधर तिलक महाभाग ने अपने सुप्रसिद्ध ' ओरियन ', तथा ' आर्कटिक होम इन् द वेदाज ' नामक लोकप्रसिद्ध निबन्धों के माध्यम से एक अन्य ही तथ्य उपस्थित किया, जिस तथ्य का श्रीतिलक के मतानुसार उत्तरध्रुवानुगत श्रमुक - भूप्रदेश से ही सम्बन्ध था, जिसे ' पामीर ' कहा जासकता है । श्रीतिलक की धारणा के अनुसार आय का आदिदेश वही उत्तर प्रदेश था, न कि प्रतीच्य - विद्वानों की मान्यता से अनुप्राणित - मध्य- एशियाप्रान्त । ' उत्तरप्रदेशात्मक पामीर से ही आर्य भारत में आए ' - सर्वश्री तिलक महाभाग के इस मान्य तथ्य का हम ' मान्यता ' के अनुबन्ध से ही समादार करेंगे । क्योंकि श्रास्था - पूर्णा-निष्ठा की दृष्टि से तो श्रीतिलक की मान्यता भी प्रतीच्या भावना से सर्वथैव विमुक्त नहीं मानी जासकती, जबकि तिलक भी प्रायों का बाहिर से भारत में आगमन तो मान ही बैठे । वस्तुस्थिति वास्तव में कुछ ओर ही है, जिसके समन्वय से संस्पृष्ट रह जाने के कारण ही इसप्रकार की मान्यताएँ मानवीय मन को अभिभूत कर लिया करतीं हैं, जैसाकि पाठक तद्भाष्य - सन्दर्भ में देखेंगे । ७३
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किञ्चिदिव - वेदन श्रद्ध ेय श्री बालगङ्गाधर तिलक जैसे महापुरुष ने भी वेदनिर्माण - कालगणना - प्रसङ्गतः - एक श्रन्या मान्यता के अनुबन्ध से उक्त तथ्य को ही प्रश्रय देडाला, जबकि उक्थ ' तथ्य ' भी ' तथ्य ' न होकर उन प्रतीच्य चाणा-दचतुरों की कुटिला नीति की प्रतिच्छाया मात्र पर ही विश्रान्त है । " यदि हम भार्य्य अपनी सभ्यता के बलपर यहाँ के मूलनिवासी अनार्यों का दमन कर यहाँ के शासक बन सकते हैं, बन गए हैं, तो उन प्रतीच्य सुसभ्य अतिथियों को भी सहज-रूपेणैव यह अधिकार प्राप्त है कि, वे हमें सुसभ्य बनाने के लिए, हमारी वैज्ञानिकता हटाने के लिए हम पर एकाधिपत्य स्थापित करलें । क्योंकि हमारा इस देश पर कोई पैत्रिक -स्वत्वाधिकार नहीं है " । उक्त - काल्पनिक जो तथ्य, दूसरे शब्दों में अनार्य्यार्य्यं विद्रोहात्मक - जो संस्कार तच्छिक्षा - पथानुवर्त्मा भावुक भारतीयों की कोमलप्रज्ञा में दृढसंस्कार - के रूप में उनके द्वारा शिक्षणकाल में हीं खचित कर दिए गए थे, उन कुसंस्कारों से आजतक भी तो हमारा परित्राण नहीं हो सका है । और हमारे वे सभी मान्य शिक्षित भारतीय उसी काल्पनिक मान्यता को मानो अपनी शिक्षा - धुरीणता के रूप में हीं अभिव्यक्त करते रहते हैं, जबकि वस्तु-स्थिति स्वयं वेद - पुराण - शास्त्र के इतिवृत्तात्मक भुवनकोशानुगत ( भूगोलानुगत ) निर्भ्रान्त सिद्धान्तों के अनुसार प्रतीच्या तथाविद्या मान्यता के सर्वथैव विपरीत है । किन्तु अपनी काल्पनिकी अपौरुषेयता की भ्रान्ति में न तो प्राच्य - भारतीय - विद्वानोंनें वेदशास्त्र के भुवनकोशानुगत इतिवृत्त का स्वाध्याय किया, एवं नैव पुराण-शास्त्रोपवर्णित - ऐतिहासिक - सीमाप्रसङ्गों से सम्बन्ध रखने वाले आख्यानोपाख्यानों का ही विद्वानों के द्वारा सफल समाधान होसका । श्रतएव भारतीया कोमलप्रज्ञा सहजरूपेणैव प्रतीच्य - काल्पनिक सिद्धान्तों पर ही उत्तरोत्तर श्रास्था करती ही गई, और साथ ही स्वराष्ट्रीय - वेदपुराणशास्त्रों के प्रति उपेक्षा । तभी तो भारतवर्षं की प्राच्यसंस्कृति - शिक्षा के महान् केन्द्ररूपेण सुप्रसिद्ध वाराणसीक्षेत्र ( काशी ) के पावन वक्षस्थल पर स्थापित होने वाले प्रतीच्यशिक्षण केन्द्र ( कॉलेज ) में जब किसी प्रान्यभक्त की ओर से पौराणिक - भूगोल - के भी शिक्षा के पाठयक्रम में समावेश का श्राग्रहात्मक - प्रस्ताव उपस्थत हुआ, तो प्रतीच्य - शिक्षा केन्द्र के प्रतीन्यशिक्षा भक्त श्रमुक को इसप्रकार के अनर्गल उद्गार अभिव्यक्त कर देने का साहस, किंवा दुस्साहस हो - ड़ा था कि, ' जो भारतीय पुराणशास्त्र पृथिवी को काच के समान चपटा मानता है, जिस पुराण का द्वीपोपद्वीपों का परिमाण कोटि - कोटि - लक्ष लक्ष - क्रोश - मित सुना जाता है, जो पुराण पृथिवी पर दुग्ध- मधु - आदि के सात सात समुद्र मानता है, ऐसे विशुद्ध काल्पनिक - मनःप्ररोचनात्मक - पुराण के भूगोल से भारतीय नवीन प्रज्ञा में क्या उत्कर्ष होगा? ", तो प्रस्तावक - पुरागापक्षपाती महोदय तृष्णीं ही बने रह गए थे । यदि उह अ ंशत: भी ' पृथिवी ' शब्द के पारिभाषिक अर्थ के साथ आत्मसाक्षात्कार होता, तो तत्काल ही वे पुराण के भौगौलिक तथ्यों के प्रति अनर्गल रूपेण गलशोषण करने वाले अमुक प्रतीच्य महानुभाव को यह बतला सकते थे कि, श्रीमन्! श्राप स्वयं अभी भ्रान्ति में हैं । आपका पुराण की परिभाषाओं के साथ यत् किञ्चित् * - श्रादर्शोदरसन्निभा भगवती ७४
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शतपथब्राह्मण २ लण्ड भी तो सम्पर्क नहीं है । भूमि, और पृथिवी, दोनों शब्द विभिन्न ही अर्थों के वाचक हैं | जिस मृण्मय-धातुमय - श्रोषधे - बनस्पतिमय पिण्ड पर आप विराजमान हैं, वह पृथिवी नहीं, अपितु भूमि है, जिसे केन्द्र बना कर ही उस भौमप्राण का बड़ी दूर तक प्रथन - फैलाव होता है, जिस प्राणमण्डल का ही ' यदप्रथयन् ' रूपेण ' पृथिवी ' नाम रक्खा जाता है, जिसका श्रद्धएडकटाह सचमुच ही आदर्शवत् सम ही है, और जिस पार्थिवप्राण के महिमा - मण्डल की व्याप्ति सूर्य्य से भी कुछ ऊपर पर्य्यन्त मानी गई है वैदिक - विज्ञान के अनुसार । इसी पार्थिवक्षेत्र में सप्तद्वीप - सप्तत्रायुम्तर - सूक्ष्मरसात्मक सप्तसमुद्र - आदि अनेक तत्त्वात्मक सप्तक - प्रतिष्ठित हैं, जिनका पौराणिक - अतिशय - रहस्यपूर्ण - ' पाद्मभुवनकोश ' में विस्तार से स्वरूपोपबृंहण हुआ है, जिसके स्वरूप- संस्पर्श से भी आज का भारतीय मानव अपरिचित ही बना हुआ है । प्रक्रान्त " देवासुरदायविभाख्यान-प्रमङ्गतः ” -तत्कम्मं में हमने संक्षेप से इस पाद्मभुवनकोश का भी दिग्दर्शन- प्रयाम किया है । देवासुरदायविभाग - प्रसङ्ग से ही तत्प्रकरण में ' भारतवर्ष ' के उस मौलिक- प्रकृतिसिद्ध भौगोलिक-स्वरूप - का समन्वय - प्रवास हुआ है, जिसका - ' अस्मिन् ह वै लोके - उभये देव - मनुष्या आसुः ' ( शाङ्खायन-ब्राह्मण १।१ ) यह श्रुतिवचन सर्वात्मना समर्थक बना हुआ है । भारतराष्ट्र आरम्भ से ही इसी ' आर्य जाति ' की प्रातिश्विक- जन्मभूमि रहा है, जिसका विस्तार पाद्यभुवनकोशानुबन्ध से ६० अंशात्मक ही माना गया है । एवं जिस भारतीय भुवनकोश के आधार पर निरक्षवृत्तानुगत लङ्काद्वीप इसकी दक्षिणसीमा है, जो लङ्काद्वीप आज समुद्रगर्भ में विलीन होचुका है, और भारतीय उपद्वीप- गणना के प्रसङ्ग में लङ्काद्वीप से सवथैत्र पृथग्-रूपेण निर्हिष्ट - सुप्रसिद्ध सिंहलद्वीन ( सीलोन ) को ही आज भ्रान्तिवश लङ्काद्वीप माना, और मनवाया जारहा है । जहाँ से सुप्रसिद्ध ' रावी ' नदी का विनिर्गम है, तदनुगत सुप्रसिद्ध - ' शिवालक ' ही भारत की उत्तर-सीमा है । ' महीसागर ' नाम से प्रसिद्ध पश्चिमसमुद्र ( जहाँ भारतीयों के सुप्रसिद्ध शर्वतीर्थ का उपवर्णन उपलब्ध होता है ), भारत की पश्चिम सीमा है, और पूर्वानुगत - चीन देशानुवन्धी पीतसमुद्र ही भारत की पूर्व सीमा मानी गई है । यही ६० अंशात्मक प्रकृतिसिद्ध भारतवर्ष है, जिसके श्राधार पर ही कुरुवर्ष, केतुमालवर्ष, किंपुरुपवर्ष, हरिवर्ष, इलावृतवर्ष, भद्राश्ववर्ष, श्रादि भेदेन नववर्षात्मिक - ' वर्षभुव-नकोश ' की व्यवस्था हुई है । देवस्वर्ग भारत से भिन्न है, जिसका उत्तरप्राङ मेरु से सम्बन्ध है, जिस प्राङ मेरु का अपभ्रंशात्मकरूप ही - - ' पामीर ' है । जिस देवयुगात्मक वैदिक युग में इसी भूपिण्ड पर भौमदेवानुबन्धिनी त्रैलोक्य - व्यवस्था व्यवस्थित थी, उस युग में प्राङमेरुस्थ भौमस्वर्गीय - इन्द्र - अग्नि- आदि मानुषदेवता स्वशासित - भारत में अवसर - विशेषों पर श्राया करते थे, तो भारतीय मान्धाता - हरिचन्द्र- दशरथ - दिलीप - रघु श्रादि यादि प्रमुख मानव भी देवस्वर्ग में गमन किया करते थे | यों देवत्रिलोकी के देव - मानव - तिय्र्यक् नामभेदभिन्न ' मानव ' परस्पर गमनागमन से समन्वित थे, जिस इस पारिभाषिक - तथ्य का यथावत् समन्वय न करने के कारण ही प्रार्थों का त्र प्राङमेरु ( पामीर ) से अपूर्व आगमन मान लिया गया है, जबकि ' अस्मिन ह वै लोके उभये देव - मनुष्याः ' से विस्पष्टरूपेण दोनों ही मानववर्गों का त्रापि समानरूपेणैव आवास निवास अभिव्यक्त है । भौमस्वर्ग -निवासी मानवदेवताओं में सुप्रसिद्ध ' भारत ' नामक ब्राह्मणवर्णात्मक श्रग्निदेव इस मानवलोकात्मक पृथिवी - लोक के ' शत्रसोनपात् ' देवदेवता थे । श्रतएव कर्मभूमिरूपा यह मानवभूमि ' भारतवर्ष ' नाम से प्रसिद्ध हुई, जिसकी महती सीमा का अनेक पारिभाषिक दृष्टिकोण के माध्यम से तत्--७५
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किञ्चिदिव - आवेदन प्रकरण में समन्वय - प्रयास हुआ है । ' भारत ' श्रग्नि ही इस राष्ट्र की ' भारत ' अभिया, मूलकारा है जिस इस मूलकारण का ही आगे चलकर यशः ख्यान - मात्र से दोष्यन्ति भारत के साथ भी सम्बन्ध मान लिया है पुराण - शास्त्रने । श्रागे जाकर अमुक अर्वाचीन मतवादने सर्वश्री ऋषभदेव को भी इस ' उपाधि ' से समन्वित करने का प्रयास किया है, जिस प्रयास का युगवर्म्मानुगति से समादर करते हुए भी तत्त्वदृष्ट्या तो ' भारत ' नामका प्रमुखरूपेण ' भारताग्नि ' पर ही विश्राम मानना पड़ेगा, जिस इस तथ्य के स्पष्टीकरण के साथ साथ प्रकृत आख्यान में भारत की प्रकृतिसिद्धा ' ६६ ' अंशात्मका वास्तविक - उस ' अखण्डता ' का ही स्वरूप - समन्वय हुआ है, जो तत्त्वमूला प्रकृतिसिद्धा अखण्डता विगत अमुक शताब्दियों से प्रक्रान्ता भ्रान्त-भारतीयों की निरतिशया भावुकता के कारण आततायीवर्ग के द्वारा - उम - सीमापर्य्यन्त खण्ड - लएड - रूप में ही परिणत कर दी गई है, जिस खण्ड - खण्डात्मिका- देश सीमा के द्वारा आज भारत अपने प्राकृतिक गौरव को सर्वथैव विस्मृत कर बैठा है । इसी प्रसङ्ग में पुराणानुगत, अत्यन्त - पारिभाषिक- उस ' पाद्मभुवनकोश ' के स्वरूप –समन्वय की भी ष्ट हुई है, जिसके साथ मेम्मूला देवत्रिलोको, तथा असुर त्रिलोकी, इन दोनों का सम्बन्ध माना गया है । सर्वोच्चभाव का स्वरूप - संग्राहक - ' मेरु ' ही वह मेरुदण्ड है, जिस के आधार पर ही भगवान् श्रादि मानव - प्रजापति ने भूषिएड को निदानविधि से ' पद्म ' मानकर इस के पत्रात्मक ६ विभाग किए थे, एवं इस भूपद्म के कारण ही यह भुवनको ( भूगोल ) पाद्यभुवनकोश ' नाम से प्रसिद्ध हुआ था, जिसकी रहस्या-त्मिका द्वीपादि - परिमाण - गणना के पारिमात्रिक तथ्यों से विदूर होजाने के कारण ही इन पौराणिक-तथ्यों पर उसी प्रकार बुद्धिवादियों के निरर्थक ऊहापोह प्रक्रान्त होपड़े हैं, जैसे कि वैदिक - श्राख्यानोपाख्यानों के रहस्यार्थ का समन्वय करने में असमर्थ बन जाने के कारण भारतीय विद्वत्प्रज्ञा अपने सर्वस्वभुत भी वेदशास्त्र के ज्ञानविज्ञानात्मक - पारम्परिक - अध्ययानाध्यापन को जलाञ्जलि समर्पित करती हुई क्वाचिक्तरूपेण केवल ' पारावणपाठ ' को ही सर्वेसर्वा मान बैठी है अमुक शताब्दियों स, जबकि तत्त्वार्थसमन्वय से शून्य पारायण-पाठ को तो स्वयं शास्त्र ने हीं आत्यन्तिकरूपेण निरर्थक ही माना है * मौरम तत्त्व - ज्ञानवञ्चित केवल चन्दन-भारवाही रासभवत् ही: । तदित्थं — वैदिक - श्राख्यानांपाख्यानों की सहज शैली से अनुप्राणित प्रस्तुत ' देवासुरदाय विभागाव्यान ' का भी तत्प्रकरण में आधिदैविक - प्रकृतिसिद्ध - नित्यदायविभाग, श्राध्यात्मिक - प्रकृतिसिद्ध - मानवीय - दायविभाग, एवं देक्युग में विघटित मानवदेव तथा मानव असुरों की प्रतिस्पर्द्धा से समन्वित आधिभौतिक दायविभाग, रूपेण तीनों ह्रीं स्थानों से समन्वित आख्यान का पारिभाषिक समन्वय करता हुआ ही तत्प्रकरण- विशेष उपरत हुआ है, एवं – प्रस्तुत संस्मरणात्मक - पारिभाषिक - दिग्दर्शन का यही सक्षिप्ततम स्वरूप - दिग्दर्शन है ।
* स्थापुरः भारहारः किलाभूत् - अधीत्य - वेद न विजानाति योऽर्थम् ।
योऽज्ञः स इत् सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा ॥
- यथा खरो चन्दनभारवाही, भारस्य वेत्ता, न तु सौरभस्य ७६
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ख प्रतिमानकर्मानुगत - चन्द्रचिह्न -स्वरूप संस्मरण— वेदिपरिग्रहात्मक - वेदिसम्पादनकर्म्माङ्गभूत सूप्रसिद्ध ' प्रतिमाज्जैनकर्म्म ' नामक क्रत्वर्थ - कम् के वैज्ञानिक -स्वरूप – समन्वय- प्रसङ्गतः सुप्रसिद्ध उस ' चन्द्रचिह्न ' की अत्यन्त ही रहस्यपूर्णा निरुक्ति हुई है, जो चिह्नविशेष लोक - समाज - व्यहार में - " चन्द्रकनङ्क " नाम से प्रसिद्ध है, एवं जिस के प्रसङ्ग से ही पुराणशास्त्र का सुप्रसिद्ध " ताराहरणोपाख्यान " नामक एक स्वतन्त्र ' आख्यान ' ही उपनिषद्ध होगया है । ' स्पय ' नामक काष्ठनिर्मित - यज्ञायुध - विशेष में वेदि - निर्माणार्थ - उत्पादित मृद्भाग के बहिःपक्षेष से सम्बन्ध रखने वाला कर्म ही ' प्रतिमार्ज्जुनकर्म्म ' कहलाया है, और तदुत्पत्तिप्रसङ्ग में ही वेदभगवान् ने चन्द्रस्थ कृष्णभाव के वैज्ञानिक स्वरूप का विश्लेषण किया है, जिसके आधार पर भावुक -भारताय - कविगण विचित्र प्रकार की कल्पनाएँ करते रहते हैं * । पुराणशास्त्र की आख्यानानुगता कल्पना तो प्रसिद्ध ही है कि, ' देवगुरु की धर्मपत्नी ' तारा ' के अपहरण से ही सोमरक्षक गन्धर्व - चन्द्रमा को कलङ्क का अनुगामी बनता पड़ा था ", जिस इस पौराणिक— रहस्य का तो तत्रैव स्वतन्त्र - निबन्धन में विस्तार से विश्लेषण किया गया है । अत्र तु देवयजन-प्रसङ्ग से ही इस ' कलङ्क ' के तात्त्विक स्वरूप का विवेचन हुआ है, जिस इस देवयजनात्मक - पारिभाषिक तत्त्व की श्राधारभूमि है - ' पुरा क्रूरस्य विसृपः ' इत्यादि पारिभाषिक वह यजुर्मन्त्र, जिसका अथरार्थ हुआ है यही है कि-" हे विष्णो! त्रिवि योद्धाओं को इधर - उधर की भागदौड़ के कारण ' विसृप ' नाम से प्रसिद्ध क्र रकम, अतएव ' क्रूर ' अभिधा से लोक में ख्यातिप्राप्त भयानक देवासुर संग्राम से पहिले देवदेवताओं ने पृथिवी के यज्ञानुबन्धी जीवनीय- रसात्मक जिस ' देववजन ' भाग को धरोहर के रूप में चन्द्रमा में प्रतिष्ठित कर दिया था, उसी जीवदानु भाग को लक्ष्य बनाकर धीर याज्ञिक यज्ञकर्म्म का अनुगमन कर रहे हैं " । देवासुर संग्राम से पूर्व ही पार्थिव देवदेवताओंने यज्ञकर्म के संसाधक जिस देवयजनात्मक - तत्त्व को चन्द्रमा में धरोहर के रूप में सुरक्षित कर दिया है, उसी का उक्त मन्त्राक्षरार्थ के द्वारा पारिभाषिक – स्वरूप-विश्लेषणहुआ हैं । प्रामङ्गिक - ग्रहोपग्रहविज्ञान के तात्त्विक समन्वय के द्वारा उक्त यजुर्म्मन्त्र के रहस्यार्थ का पारिभाषिक - स्पष्टीकरण ही तद्विज्ञान का निष्कषार्थ है, जो कि मन्त्रानुगन रहस्यपूर्ण विज्ञान का अत्यन्त ही चमत्कारपूर्ण उदाहरण ही माना जायगा वैदिक विज्ञान के क्षेत्र में । प्रतिमार्ज्जनकम्मानुबन्धी वैज्ञानिक - इस तथ्य के माध्यम से वैदिक - इतिवृत्तों से अनुप्राणिता उस महती भ्रान्ति का स्थाली पुलाकन्यायेन निश्चय ही
* अङ्क केऽपि शशङ्किरे जलनिधेः, पङ्क परे मेनिरे ।
सारङ्गः कतिचिच्च सञ्जगदिरे, भृच्छायमैच्छन् परे ॥
इन्दौ यद्दलिते - द्रनीलशकलः श्यामं दरीदृश्यते ।
तत् - सान्द्र निशि पीतमन्धतस कुक्षिस्थमाचक्ष्महे ॥
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किञ्चिदिव श्राबेदन निराकरण सम्भव है, जिस भ्रान्ति के कारण ' पुरा क्रूरस्थ ० ' इत्यादि विशुद्ध विज्ञानेतिवृत्तात्मक मन्त्रों के तत्त्वार्थ- समन्वय प्रसङ्ग में मानवप्रज्ञा संशयशीला बन जाया करती है, इसी निवेदन के साथ उदाहरणात्मक यह द्वितीय संस्मरण उपरत होरहा है । ( ग ) - व्यवहारजगत्, और शास्त्रीय जगत् में अनुप्राणिता का संस्मरण, और आज के लोकव्यापक " नमस्ते ' के आवेदन--पारिभाषिकी - प्रणामविधि सम्बन्ध में किञ्चिदिव वज्ञविद्या प्रकृतिसिद्धा वह प्राणविद्या है, जिसका मानवीय कल्पना, सामयिकी मान्यता श्रादि से संस्पर्श भी नहीं माना जासकता । मानवकृत वैध यज्ञों के बड़े छोटे यच्चयावत् यज्ञिय कम्मों का स्वरूप प्रकृति-सिद्ध - ईश्वरीय आधिदैविक - नित्ययज्ञ के नियमित - पारिभाषिक- ईश्वरीय नियमोपनियमों पर प्रतिष्ठित - व्यवस्थित हुए हैं । ' देवानुविधा वै मनुष्याः ' - ' यद्वै देवा अस्तत्करवाणि - ' प्रकृति-वद्विकृतिः कर्त्तव्या ' इत्यादि श्रौत आदेश इसी तथ्य का समर्थन कर रहे हैं । जैसाकि अन्यान्य - धामिक क्षेत्रों में आज मानवप्रज्ञा दिग्देशकालानुगना युगवम्मं - निबन्धना अपनी भावुकता से यथेच्छ परिवर्तन कर रही, और बलपूर्वक करा रही है, एवमेव विज्ञानभित्ति पर प्रतिष्ठित ' यज्ञकर्म ' जैसे वैज्ञानिक - कम्मं के सम्बन्ध में भी, तन्निबन्धन यज्ञानुगत वैदिक शब्दों के व्यवहार के सम्बन्ध में भी अर्वाचीन वेदभक्तविशेषों के द्वारा श्रापातरमणीया वैसी अनर्गला कल्पनाएँ उपकान्त होपड़ीं हैं, जिनका प्रकृतिसिद्ध - यज्ञानुगत पारम्परिक-श्रोत - पद्धतियों से अंशत: भी तो सम्पर्क नहीं है । श्रतिपद्धति के विरुद्ध केवल कल्पना से प्रसूत इत्यंभूत - काल्प-निक – यज्ञकर्मों के जो भीषण परिणाम हुए हैं, श्रु तिने- ' अनवर्श ' के माध्यम से उसी का स्वरूप - विश्लेषण किया है, जोकि आज के नवीन उन वेदभक्तों के उद्बोधन के लिए पर्याप्त मान लिया जायगा, जो अपने कल्पना के साम्राज्य में हीं यज्ञ जैसे प्राणप्रधान - दिव्यकर्म को ' हवाफिल्टर ' के युगानुगत महान् लौकिक व्यामोहन से समन्वित करते हुए उसमें अपनी कल्पना से ही केशर - कर्पूर- चन्दनादि यथेच्छ सुगन्धि-द्रव्यों का समावेश कर रहे हैं, जिनका पारम्परिकी किसी भी श्रौतस्मार्त - पद्धति में संस्मरण भी नहीं हुआ है । महद्दुर्भाग्य तो आज यह माना जायगा कि, जो सनातन धर्मावलम्बी - जगत् तक यज्ञकर्म के सम्बन्ध में अमुक सीमापर्य्यन्त अमुक- श्रौती- स्मार्ती - परम्परा का ही सर्वात्मना नहीं, तो भी अँशशः - अनुगम-न करता आ रहा था, उसके अमुक नेता महानुभावों के भी मानस - सरोसरवर में ' यज्ञ ' के नाम से आज विचित्र - विचित्र - वैसे यज्ञकम्मों की बाढ़ सी आ रही है, जिनका प्रकृतिसिद्ध - श्राधिदैविक - यज्ञ के साथ यत्-किञ्चित् भी तो सम्बन्ध नहीं माना जासकता । ' विश्वशान्ति ' के व्याज से श्राज भारत में सर्वत्र धार्मिक-नेताओं के द्वारा । ' जपयज्ञ ' - ' नामसंकीर्त नयज्ञ ' -- ' चण्डीयज्ञ ' आदि आदि रूपेण यत्तप्रवाह प्रक्रान्त है, बिस इस प्रवाह का अन्तिम उदकं क्या होगा? इसका उत्तर भी श्रुति के तथोक्त - प्रासङ्गिक - अनवमर्शात्मक– उस कर्म्मविशेष से अवश्य ही उपलब्ध हो जाना चाहिए उन प्रवाहवादियों को, जो यज्ञव्याज से आज इन भारतीय - विभूतियों ( यज्ञादि कम्मों ) के प्रति शेषभूता मी श्रद्धा को सदा सदा के लिए स्मृतिगर्भ में विलीन
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड करने के लिए ही मानो आतुर बने हुए हैं । कषानक आज से अनेक सहस्रों वर्ष पूर्व का होता हुआ भी वर्त्तमानयुगानुबन्धिनी श्रमुक - मनोवृत्ति से सर्वात्मना समतुलित है । तदेव श्रयताम्! श्रुत्वा चाप्यव-षाताम्!! ७ " पुरा देवयुगे भारतीय द्विजाति- मानवों की श्रतिसिद्ध यज्ञकम्मों के प्रति सर्वथा श्रद्धा होगई । फलतः इह्नोने यज्ञकर्म्म का परित्याग कर दिया । इस घटना का समाचार जव देवेन्द्र के समीप पहुँचा, तो उन्होंनें देवगुरु आङ्गिरस - बृहस्पति को स्वर्ग से पृथिवीलोक ( प्राचीसरस्वती के सन्निकट विद्यमान भौम-देवस्वर्ग - प्रदेश से - पृथिवी नामक - भारतवर्ष ) में भेजा तत्कारण- परिज्ञान के लिए । बृहस्पति यहाँ आए, और प्रश्न किया कि - ' कथा न यजध्वम् ' ( हे मनुष्यो! तुम वज्ञानुष्ठान क्यों नहीं करते? ) | ( मानवोंनें उस समय जो उत्तर दिया था, वह श्राज के धर्म्मभीरु मानव के सम्बन्ध में भी अक्षरश: चरितार्थ होरहा है ) । मानब कहने लगे कि, बृहस्पते! हम देख सुन रहे हैं कि, जो यज्ञ कर रहे हैं, वे दिन दिन दुःखी होते रहे हैं, और जो यजन नहीं करते, वे लोकसमृद्धि से समन्वित होते जा रहे ' य उ यजन्ते, त उ पापी-यांसो भवन्ति, य उ न यजन्ते ते यांस: ' -- किकाम्या यजेमहि ', भिर भला हम क्यों, किस कामना के लिए यज्ञ करैं! आज भी तो धर्म के सम्बन्ध में अमुक भावुक - वर्ग की यही धारणा सुनी जारही है कि — ' धर्मिष्ठ व्यक्ति आज के युग में दुःखी हैं, एवं धर्मनिरपेक्ष मानव, और धर्म्मद्वेषी मानव लोकसमृद्धि से समन्वित देखे सुने जा रहे हैं ' । कहना न होगा कि - देवयुगानुगता तत्पूर्वधारणा की ही भाँति ग्राज धर्म्म - क्षेत्र के सम्बन्ध में भी भावुकवर्ग इसी हेत्वाभास के द्वारा श्रश्रद्धालु बनता जारहा है । बृहस्पति समझ गएकि, अवश्य ही मनुष्योनें यज्ञकर्म्म में किसी मानवीया कल्पना का समावेश कर दिया है, एवं उसी से इष्टसाधक भी यज्ञ अनिष्टजनक बनाया है । यही निर्णय कर बृहस्पति ने आदेश दिया कि, -' हे मनुष्यो! तुम एक बार हमारे सम्मुख यज्ञ का अनुगमन करो । मनुष्योंनें वैसा ही किया, कर्म्म - आस्तरण से पूर्व ही जब वे वेदि का स्पर्श करने लगे, तो तत्काल बृहस्पति ने उनका नियन्त्रण करते हुए यही उद्बोधन प्रदान दिया कि, इस पद्धति - विरुद्ध स्पर्शदोष से ही इष्टजनक भी यज्ञने तुह्मारा अनिष्ट कर डाला । अतएव तुझें भविष्य में वेदिका स्पर्श किए बिना ही यजन करना चाहिए | ' आकियत इति? ' अर्थात् कबतक वेटिका स्पर्शन न करैं १, प्रश्न करने पर उत्तर मिला कि - ' आर्हिपस्तरणात् ', अर्थात् जबतक वेदिपर कुशाएँ न बिछा दी जायँ । दर्भ में जैसा क्या अतिशय है- जिसके ग्रास्तरण के अनन्तर वेदिस्पश से अनिष्ट नहीं होता?, इत्यादि प्रश्नों की वैज्ञानिकी -मीमांसा करने वाले इस - ' अनवमर्श ' कर्म से निवेदनीय यही है कि, यज्ञकम्मों में अपनी मानु { -कल्पनाओं के यत् किञ्चित् भी समावेश से तन्मूलभूत आधिदैविक यज्ञ की अविच्छिन्ना छन्दोबद्धा प्राणधारा का सम्बन्ध नहीं हो पाता । उस अवस्था में यज्ञकर्म्म यातयाम ( व्यर्थ ) बन जाता है, और कभी कभी तो प्राणधारा का यदि विपरीत भी सम्बन्ध होजाता है, तो वही यज्ञ इष्ट के स्थान में उसी प्रकार अनिष्ट का ही कारण बन जाता है, जैसे कि इन्द्रनाशार्थं कृत यज्ञ से ' इन्द्रशत्रुर्वर्द्ध स्व ' से अनुगत- ' स्वरदोष ' के कारणवृत्रासुर ने अपना ही सर्वनाश करा लिया था * ।
* दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह ।
स वाग्वज्द्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः खरतोऽपराशत् ॥
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कितिदिन आवेदन उक्त ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर ही तो हमें यह निवेदन करना पड़ा कि, आधिदैविक प्राणजगत् अनुप्राणिता यज्ञत्रिया और तदनुबन्धी- पारिभाषिक याज्ञिक - शब्द लोकधरातल से, लोक - समाजानुगत सामान्य-लौकिक- व्यावहारिक क्षेत्र से सर्वथा संस्कृष्ट ही हैं, जिनकी इतिकर्तव्यता में, एवं जिन शब्दों के उच्चारण में मानवीया लोककल्पनाओं का प्रवेश सर्वथा ही निषिद्ध माना गया है । अर्वाचीन वेदमक्तों की यज्ञकर्म्मान-बन्धिनी केशर - कर्पूर- चन्दननादि प्रवेश की कल्पना की ऐशी दशा में क्या स्वरूप- स्थिति है?, एवं सनातन-धर्म्माबलम्बी - परम्पराभक्त उन महानुभावों के तथोक्त श्राडम्बरपूर्ण कल्पना प्रधान गज के नामयज्ञ-भूदानयज्ञ- श्रमुकतमुक यश- श्रादि श्रादि यज्ञविजम्मृगों के कारण श्रदृष्ट में कितने श्रोर कैसे भीषण परिणाम घटित विघटित होते होंगे उनकी काल्पनिकी विश्वशान्ति के समतुलन में १, इन अवैध प्रश्नों का उत्तर तो उड्हीं से प्राप्त करना चाहिए । ठीक यही स्थिति - ' शब्दव्यवहार ' के सम्बन्ध में घटित हो रही है । प्राणप्रधान वैदिक - शब्दों को लोकधरातल पर ला खड़ा करना भी वैसा ही अपराध है, जैसाकि प्राणप्रधान - यज्ञकर्मों में लौकिकी मान्यतानों वा समावेश अपराध माना गया है । अधिक विस्तार में न जाकर आज हम अर्वाचीन उन वेदभक्तों का ध्यान श्रभिवादन - पद्धति से अनुगत उनके सर्वप्रिय उस ' नमस्ते ' नामक वैदिक - शब्द के पारिभाषिक - तथ्य की ओर ही आकर्षित कर देना चाहते हैं उदाहरणरूपेण, जिसका वे खाते - पीते - उठते - सोते - जागते- अपन समस्त वैय्यक्तिक – पारिवारिक - सामाजिक व्यवहारों में उद्घोषपूर्वक – ' नमस्ते महाशय! नमस्ते देवीजी? ” आटि रूपेण यशोगान ही करते रहते हैं । मानते हैं- ' नमस्ते ' वैदिक शब्द है, और इसीलिए लौकिक जगत् के अभिवादनीय- शब्दों की अपेक्षा-श्रभिवादन के लिए सर्वश्रेष्ठ शब्द भो । किन्तु ततः किम्! ' स्वाह ' स्वधा ' ' पोपट ' - श्रादि सभी वैदिक शब्दों का फलितार्थ है- अनरूप आहुतिद्रव्य से प्राणदेवताओं को तृप्त करना क्या प्राणात्मक देवजगत् में सभी प्रायादेवी के लिए स्वाहादि शब्द काम में ले लिए जायेंगे! कदापि नहीं । ऐसा करना तो वह महान् ' जामि ' दोष माना गया है, जिससे कर्म्म का स्वरूप ही विकृत होजाता है । फलतः ' स्वाहा ' शब्द श्रग्नि-प्रमुख देवताश्रों के लिए ही नियत है । ' स्वधा ' शब्द का पितृदेवताओ से ही सम्बन्ध है, तो केवल इन्द्र के लिए ही ' इन्द्राय वौ ३ पट् ' रूपेण ' वीत्रट् ' शब्द नियत है । और यों स्वयं प्राणजगत् में भी प्राणात्मक-वैदिक - शब्द जब प्राणवगभेद से विभिन्न स्थानों में विभाजित हैं, तो उन प्राणव्यवहार प्रधान वैदिक शब्द ] का लोकधरातल में तो उपयोग श्रभिमत ही कैसे होसकता हैं वेदशास्त्र को, जो भूत - प्रधान - लोकव्यवहार से श्रपना क्षेत्र सर्वथैव एक विशेष अतिशय से समन्वित रखता है । इसी आधार पर इम अर्वाचीन वेदभक्तों के ' नमस्ते ' नामक प्राणप्रधान वैदिक शब्द के उस श्राज के लौकिक - व्यवहार को इष्ट के स्थान में सर्वथा निष्ट का ही जनक मानेगे, बो ' नमस्ते ' शब्द एक साङक्रामिक रोग की भाँति श्राज भारत के प्रायः सभी क्षेत्रों में व्याप्त होता जारहा है अपनी लोकानुगता - परम्परा से श्रनुप्राणित- ' जय माता जी की - ' जय गोविन्दजी की ' - जय रघुनाथजी की - ' जयराम जी की -'जय श्रीकृष्ण की ' ' जय विश्वनाथ ' ' जय गङ्गे ' श्रादि इष्ट जनक परम - माङ्गलिक - सनातन शब्द व्यवहारों की प्रात्यन्तिक उपेक्षा ही करता हुआ, जिससे अधिक पर प्रत्ययनेयता श्राज के भावुक मादृश - भारतीय- मानव की और क्या होगी?! अपने बचपन में श्रमुक दो वेदभक्कों में हीं प्रचलित प्रचण्ड शास्त्रार्थों की चर्चा में हम जब ' नमस्ते ' शब्दमूलक कलह सुनते थे, तो वें स्वतः ही यह कुतूहल होता था कि, जो ' नमस्ते ' शब्द ' नमस्ते रुद्र ८.