Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 621–630

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 621–630

पृष्ठ 621

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 621 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय ग्रध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण दूसरी है भौगोलिक - गणितव्यवस्था | इस व्यवस्था में राजशासन व्यवस्था का कोई महत्त्व नहीं है । प्राकृतिक धम्मों की पूर्ण परीक्षा कर भारतीय ऋषियोंने श्राय्य - श्रनाय्यं देशों की गणितानुसार जी व्यवस्था की है, वही अटल है । और वही हमारे लिए मान्य है ।

कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः ।

सज्ञेयो यज्ञियो देशी म्लेच्छ देशस्त्वतः परः ॥

- मनुः २२ - ३ | उक्त मनुवचन के अनुसार धर्म्मदेश प्रकृति के अनुसार नियत हैं । कितने हीं नाम बदल दीजिए । लेखिनी आाप के हाथ में है | मनमाना इतिहास लिम्ब डालिए । हम तो अपने ' आममुद्रान्त वै पुर्वादास -मुद्रात्तु पश्चिमान ' इसी सिद्धान्त को स्थिर मानेंगे | कहना अप्रासङ्गिक होगा, परन्तु कहे बिना नहीं रहा जाता । दिगदेशकालानुबन्धिनी उपयोगिता के व्यामोहन से निरतिशयरूपेण व्यामुग्ध श्राज के कतिपय प्रगतिशीलों के इत्थभूत सामत्यक उद्गार सुने जा रहे हैं कि -- " जिस समय देश के सम्मुख अन्न, वस्त्र का प्रश्न उपस्थित हो, जिस युग में देश-वासियों को दोनों समय पेट भर भोजन भी नही मिल रहा हो, ऐसे भीषण युग में तुहारे ' विज्ञान चीत्कार ' को कौन सुनेगा? | वैदिक एवं पौराणिक - साहित्य से वर्त्तमान युग में देग का क्या भला होगा! | आज तो हमें सत्र से पहिले चाहिये अन्न - वस्त्र | जब यह प्रश्न समन्वित होजायगा, तभी तुझारी साहित्य-चर्चा का अवसर आएगा । अभी तो अपने पोथी- पत्रे बाँध कर ताक में रख दीजि ', और हमारे साथ कार्य--क्षेत्र में आजाइए । रुई धुनिए, ताना - बाना लगाकर वस्त्र बनाइए, खेती कीजिए " बात यथार्थ है | सचमुच देश में उदरचित्ताने महामारी से भी अधिक सर्वनाश का उपक्रम कर रक्खा है । परन्तु इस का कारण? | क्या भारतवर्ष में पर्याप्त कार्पास ( कपास ) उत्पन्न नहीं होता? | क्य । भारत से कृषक जाति उठ गई? | क्या जुलाहा — जाति का उच्छेद होगया? । नहीं, तो फिर क्यों देश बुभुक्षा से पीड़ित हो रहा है? | सब कुछ सावन होते हुए भी हम क्यों इन से बञ्चित हो रहे हैं? । अथवा तो वञ्चित किए जारहे हैं? । हमारी सामान्य बुद्धि के अनुसार तो इन सत्र प्रश्नों का एकमात्र उत्तर है-अशिक्षा, अपने वास्तविक स्वरूपज्ञान से वचित रहना । पशुपति बनने के लिए ज्ञानबल ही अपेक्षित है । बिना ज्ञान के पशुपति भी पशु बनकर ज्ञानयुक्त पशुपति का भोग्य बन जाता है । जबतक वैदिक -- पौराणिक ज्ञानराशि हमारे हाथ में रही, तबतक हम पशुपति रहे । विश्वसम्पत्ति हमारी भोग्य बनी रही । जिस दिन से यह ज्ञानराशि हमारे हाथ से निकल गई, उसी दिन से हम अपने उच्चामन से गिरते हुए विश्व के पशु ही बन गए । इ'वर ज्ञान भी मिला, तो उच्छिष्ट | क्या दूसरों के उच्छिन्न से हमारा ज्ञान कभी स्वस्वरूप से निर्मल रह सकता है? | फल इस उच्छिष्ट ज्ञान का यह हुआ कि हम अपने इस दूषित ज्ञान से अपने सह-चरों का भी स्वरूप विकृत करने लग पड़े । शिक्षित नामधारी उच्छिष्टभोगियोंनें अपने आप को पशुता के वाता बरगा में रखते हुए सभी को इस मार्ग में दीक्षित करना आरम्भ कर दिया । स्वशिक्षाशून्या इसी ' पशुवृत्ति ' के ८५

पृष्ठ 622

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 622 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण ! कारण आज सत्र कुछ होते हुए भी हमारे उपभोग के लिए कुछ भी न रहा । हमारा तो यह दृढ़ विश्वास है कि, जबतक भारतवर्ष अपने तीन वैदिक साहित्य का गौरव न समझ लेगा, जत्रतक यह अपने मूल संस्कृ-तिरूप वैदिक साहित्य को न अपना लेगा, तबतक प्रयत्नही से भी यह सुखी नहीं हो सकता | रात दिन चर्खा कातते रहिये, कपास धुनिए, खेती कीजिए - कभी आप इनके भोक्ता नहीं बन सकेंगे । भोक्ता बनने के लिए ग्रात्मबल चाहिए । ग्रात्मबल के लिए ज्ञानसामग्री चाहिए । वह भी मौलिक, स्वस्वरूप को, स्वसंस्कृति को, स्व आदर्श को सुरक्षित रखने वाला ज्ञानत्रज्ञ | वह मिलेगा आपको निगम आगम - शास्त्र में, वेद-पुराण में, आत्मबल की पराकाष्ठा पर पहुँचे हुए ऋषियों के वाक्यसंग्रहरूप शब्दब्रह्म में । यदि आपकी दृष्टि में इनका उपयोग नहीं, तो फिर हमें बाध्य होकर ' देश का सर्वनाश निश्चित है ' ये ही अक्षर अपने मुसे निकालने पड़ेंगे । इनकी उपेक्षा कर अतक ग्रापने क्या कर लिया?, एवं भविष्य में आप क्या उन्नति कर लेंगे?, इसका उत्तर तो आपको कालपुरुष ही देगा । और आपके कम्मों का फल भोगती हुई आपकी भविष्यत् प्रजा ही देगी । Ti प्रत्येक राष्ट्र ' लक साहित्य ही उस राष्ट्र का प्रारण है । जबतक राष्ट्र का साहित्य सुर-क्षित रहता है, तभीतक वह राष्ट्र स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रहता है । स्वसाहित्य का तिरस्कार कर राष्ट्रस्वरूपसंघातक परसाहित्य को अपनाते हुए उन्नति के शिखर पर पहुँचने की आशा करना केवल दुराशा-मात्र ही है । एक परतन्त्र घोड़े का गधा बन कर स्वतन्त्र होने की अपेक्षा हम उसकी परतन्त्रावस्था म समझते हैं । हम पहिले अपनी स्वरूपरक्षा चाहते हैं । हम चाहते हैं - हमारा ' भारतीयत्त्व ' क्षुण्ण बना रहे, फिर हम आगे बढ़ें । इसके लिए केवल रेजी ( बद्दर ) पहिनना हीं पर्याप्त नहीं है । तकली चलाने से ही हमारे कर्त्तव्य की सीमा समाप्त नहीं होजाती । हम अपने साहित्य की, तत्प्रणेता ऋषियों की निन्दा करते जायँ, अपने धार्मिक आदशों को छोड़ते जायें, और फिर उन्नति का डिन्डिम घोष करें, कभी हमारा अभ्युदय नहीं हो सकता | यदि आप गीता के परमभक्त हैं, तो मानिए भगवान्, के

निम्न लिखित आदेश को-यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्त्तते कामकारतः ।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ १ ॥

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।

ज्ञाच्या शास्त्रविधानोक्तं कर्मकत ' मिहार्हसि ॥ २ ॥

सभ्यता, संस्कृति, आदर्श ही राष्ट्र के जीवन हैं । इनका मूलस्रोत राष्ट्र का मौलिक साहित्य ही है । प्रत्येक राष्ट्र के लिए अपनी स्वरूप - रक्षा के लिए अपने मौलिक साहित्य की रक्षा करना नितान्त आवश्यक है । शिल्प - वाणिज्य - कला - विज्ञान - धर्म - नीति- आचार - व्यवहार- सब कुछ आपके साहित्य में प्रतिष्ठित है । बिना साहित्य के अभ्युदय के नाममात्र का भी अधिकार नहीं मिल सकता । इन सत्र परिस्थितियों पर मुकुलि-तनयन बन कर शान्तचित्त से विचार कीजिए, फिर हम से- ' देश को साहित्य की इस समय क्या आब-श्यकता है? ' यह प्रश्न कीजिए । यदि आपने यत्किञ्चित् विचार से काम लिया, तो स्वयं हीं आपको अपने इस भावुकतापूर्ण प्रश्न का उत्तर उपलब्ध होजायगा । ६

पृष्ठ 623

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 623 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण बहुत हुआ । चलिए आज हम आपको आपके भारतवर्ष में ले चलें । आपको यह बतलाएँ कि, आप का राजशासन कहाँतक व्याप्त था । आाप किन किन देशों पर अपना प्रभुत्व रखते थे? । एवं अपने मौलिक साहित्य की उपेक्षा कर किस प्रकार आपने अपना बैराज्यपद विस्मृत कर दिया? | आपकी सभ्यता के, वर्णाश्रमधर्म्म के, चातुराश्रमव्यवस्था के लोकविभाग के मूलप्रवर्त्तके भगवान् ब्रह्मप्रजापतिने सम्पूर्ण भूपिण्ड को विष्वद्वृत्त के आधार पर दृश्य - अदृश्य भेद से दो भागों में विभक्त किया | भूपिण्ड को उह्नोंनें ' कमल ' माना । कमल मान कर इसके प्रधान ४ पत्रों की कल्पना की । विष्वद्वृत्त ३६० अंश का है । प्रत्येक पत्र ६.०-६० अंश का हुआ । विश्वद्वृत्त के केन्द्रीभूत सुमेरु को कणिका ( कमलगट्टा ) माना गया । बही भूव्यवस्था पुराणों में पाद्मभुवनकोश ' नाम से प्रसिद्ध हुई । आपो वै पुष्करपर्णम ' इस औत-सिद्धान्त के अनुसार इस भूपिण्ड का निर्माण पद्म से ही हुआ है, जैसाकि पूर्व के स्तम्बयर्जु हरणोपा-ख्यान में निदानविद्या के प्रसङ्ग में विस्तार से बतला दिया गया है । इमी प्राकृ तक पद्मभाव को लक्ष्य में रखकर प्रजापतिने पद्मरूप से ही पृथिवी का विभाग किया । स्वयं प्रजापति मेरुस्थ हिरण्यष्टङ्ग पर्वत पर प्रतिष्ठित हुए इसी अवस्था को लक्ष्य में रखकर प्राच्य-संस्कृति की प्रतिमूर्ति स्वर्गीय श्रद्धेय श्रीबालगङ्गाधर तिलकने आयोग प्रतिष्ठा सुमेरु को माना है । ' आलोग सुमेरु स्थान से आगे बढ़कर आए इस सिद्धान्त से हम सहमत नहीं है । तथापि ' सुमेरु- आर्यों की प्रतिष्ठाभूमि थी ' यह सर्वमान्य सिद्धान्त है । महापुरुष तिलक के इस अंश पर हमें कोई विप्रतिपत्ति नहीं है । सचमुच पुराणयुग में संस्कृति के मूलप्रवर्त्तक भगवान प्रजापति सुमेरु पर ही प्रतिष्ठित थे । इस सुमेरु से उत्तर - दक्षिण - पूर्व - पश्चिम रूप से ६०-६.० अंश के हैं, टैंड किए गए । ये ही चारों ' भूषद्म के पत्र ' कहलाए | इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर ' सर्वस्व ( ' पुराणशास्त्र ' ) कहता है— * पद्मनाभ्युद्भवं चैकं समुत्पादितवाँस्ततः ॥ सहस्रवर्ण त्रिभ्जं भास्कराभं हिरण्मयम् ॥ १ ॥

पद्म े हिरण्मयं तस्मिन्नसृजद् भूरिवर्चसम् ॥ स्रष्टार ं सर्वलोकानां ब्रह्माणं सर्वतोमुखम् ॥ २ ॥

तच्च पद्म ' पुराभूतं पृथिवीरूपमुत्तमम् ॥ यत् पद्म ' सा रसादेवी पृथिवी परिकथ्यते ॥ ३ ॥

एवं नारायणस्यार्थे महीपुष्करसम्भवा ॥ प्रादुर्भावोऽभ्ययं तस्मान्नाम्ना ' पुष्कर ' - संज्ञितः ॥४ ॥

-पद्मपुराण सृ ० ० ४० अ ० - मत्स्यपुराण- १६६० * इन सम्पूर्ण पुराणवचनों का अध्यात्म - श्रधिदैवत अधिभूत तीनों विवर्ती के साथ सम्बन्ध सम— झना चाहिए । प्रकृत में आधिभौतिक दृष्टि को प्रधान मानते हुए ही ये श्लोक उद्धत हुए हैं । ८८७

पृष्ठ 624

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 624 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चनब्राह्मण तदेतत् पार्विनं पद्म चतुष्पत्रं मयोदितम् ॥ भद्राश्व भारताद्यानि पत्रायस्य चतुर्द्दिशम् ॥ १ ॥

- मार्कण्डेयपुराण भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा ॥ पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादा शैलबाह्यतः ॥ इसप्रकार ‘ मेरु ’ से चारों ओर विष्वदवच्छिन्न माने हैं । सुतरां पत्रात्मक प्रत्येक खण्ड का ६०-६० में रखकर ' भूगोलाध्याय ' कहता है-- ब्रह्मपुराण १६ अ ०, २५१० दृश्य - उत्तरी गोलार्द्ध में पुराणने समरूप से ४ पत्र शात्मक होना सिद्ध होजाता है । इसी रहस्य को लक्ष्य भृवृत्तपादे पूर्णस्यां x यमकोटीति विश्रुता ॥ भद्राश्ववर्षे नगरी स्वर्ण प्राकारतोरणा ॥ १ ॥

- याम्यायां भारते वर्षे लङ्का तन्महापुरी ॥ X पश्चिमे केतुमालाख्यं रोमकाख्या प्रकीर्तिता ॥ २ ॥

+ उदक् सिद्धपुरी नाम कुरुवर्षे प्रकीर्तिता ॥ भूत्पाद विवरास्ताश्चन्योऽन्यं प्रतिष्ठिता ॥ ३ ॥

तासामुपरिगो याति विषुवस्थ दिवाकरः ॥ न तासु विषुवच्छाया नाक्षस्योन्नतिरिष्यते ॥ ४ ॥

- सूर्य्यसिद्धान्ते - भूगोलाध्याये आगे जाकर उपर्युक्त चार वर्षों के ' आठ वर्ष ' होजाते हैं । दूसरे शब्दों में चतुईलकमल ‘ अ g-दलकमल ' में परिणत होजाता है । ब्राह्मभुवनकोश ( ब्रह्मपुराण में प्रतिपादित भुवनकोश ) के अनुसार भूपिण्ड को अष्टदल कमल ही माना गया है । इसी पुराण के अनुसार यह दृश्य भूपद्म ' जम्बूद्वीप ' नाम से प्रसिद्ध है, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट होजायगा । जम्बुद्वीपरूप दृश्य उत्तरी गोलाद्ध ' के केन्द्रभूत कर्णिका-रूप मेरु का ' मान ' बतलाता हुआ ब्रह्मपुराण कहता है कि, यह मेरुदण्ड विष्वद्धरातल से ÷ ८४००० X जापान - पूर्व में । लङ्का - दक्षिण में । + रोमदेश - पश्चिम में । x सिद्धपुर- उत्तर में । * वामनपुराणने इसी अष्टदल कमलात्मकं नववर्षात्मक भूपद्म का निरूपण किया है । -: ध्यान रहै - जिसप्रकार पुरा परिभाषा के अनुसार आयु सम्बन्ध में सहस्रादि शब्दों का साङ्केतिक अर्थ है, तथैव मानसाधक इन साहस्रियों का भी साङ्केतिक ही अर्थ है । बिना इस साङ्केतिक विद्यारहस्य को समझें इन पौराणिक मानों पर ऊहापोह करना निरर्थक है । विस्तारभय से इन सब विषयों का प्रकृत में निरू-पण नहीं किया जासकता । इसके लिए तो स्वतन्त्ररूप से लिखा हुआ ' पुराणरहस्य ' नामक ग्रन्थ ही द्रष्टव्य है ।

पृष्ठ 625

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 625 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पचमत्राहारा ( चौरासी हजार ) योजन तो ऊँचा है, जिसमें १६००० ( सोलह हजार ) योजन भूगर्भ में प्रविष्ट है. ३२००० ( बत्तीस हजार ) योजन ऊपर के शिरोभाग में चौड़ा है, एवं १६००० ( सोलह हजार ) योजन का इसक | व्यास ( डायमिटर - विष्कम्भ ) है । भारतवर्ष, किंपुरुपवर्ष, हरिवर्ष - ये तीन वर्ष तथाधिध मेरु से दक्षिण में हैं । रम्यकत्र, हिरण्मयव, कुरुवर्प, ये तीन वर्ष मेरु से उत्तर में हैं । भद्राश्ववर्ण मेरु से पूर्व में है । एवं केतुमाल वर्ष मेरु से पश्चिम में है । प्रत्येक वर्ष का मान ६००० ( नौहजार ) योजन है । इन आठ वर्षों के अतिरिक्त ६ वाँ ' इलावृत ' नाम का प्रधान वर्ष इन आठों वर्षों के मध्य में मेरु-प्रदेश के चारों ओर व्याप्त है । इसका मान भी ६००० योजन ही समझना चाहिए | प्रकारान्तर से यों समझिए कि - मेरु से पूर्ण भद्राश्ववर्ण, मेरु से आग्नेय कोण में किंपुरुपवर्ण ( पुराणान्तर में ' किन्नरवर्ष ' नाम से भी व्यवहृत हुआ है ), मेरु से दक्षिण में भारतवर्ध, मेरु से नैऋतकोण में हरिवर्ष, मेरु से पश्चिम में केतुमालवर्ण, मेरु के वायव्य कोण में रम्यकवर्ण, एवं ईशान कोण में हिरण्मयवर्ष है । अग्निकोण - दक्षिण- नैऋतकोण, तीनों का दक्षिणदिक शब्द से ग्रहण होता है, वायव्यकोण - उत्तर - ईशान कोण, तीनों का उत्तरादिक शब्द से ग्रहण होता है । दूसरे शब्दों में श्रग्निकोण - नैऋतकोण का दक्षिण दिशा में अन्तर्भाव है, एवं वायव्यकोण - ईशानकोण का उत्तरटिशा अन्तर्भाव है । आगे के चित्रपट से इन ६ वर्षों का स्वरूप सम्यगृरूप से स्पष्ट होजाता है । इन वर्षों के सम्बन्ध में एक प्रश्न उपस्थित होता है । पुराणशास्त्र का यह सिद्धान्त है कि " मेरु सत्र वर्षों से उत्तर में प्रतिष्ठित है ", जैसा कि निम्नलिखित वचन से स्पष्ट हो जाता है-" सर्वेषामेव वर्षाणां मेरुरत्तरतः स्थितः । ” --ब्रह्मपुराण । इधर पूर्वप्रकरण में हमने किसी वर्ष को मेरु से दक्षिण बतलाया है, किसी को पश्चिम, एवं किसी को पूर्व । ऐसी अवस्था में यदि मेरु उत्तर होसकता है, तो दक्षिणस्थ किन्नर - हरि - भारत, इन तीन वर्षों से ही उत्तर होसकता है । फिर सत्र के लिए सामान्यरूप से " सर्वेषामेव- उत्तरतः स्थितः यह कैसे कहा गया? | उत्तर वही ' परिभापातत्त्व ' है । स्तम्भयजुर्हरण में यह बतलाया जानुका है कि, ' उत्तर ' शब्द ' केन्द्र ' का वाचक है, एवं ' दक्षिण ' शब्द ' परिधि ' का वाचक है । ऊर्ध्व - उत्तर - ॐ चा- केन्द्र, ये सत्र शब्द अभिन्नार्थक हैं । अधः- दक्षिण - नीचा - परिधि - ये सत्र शब्द अभिन्नार्थक हैं । विष्वद्वृत्त - परिधि का केन्द्र मेरुस्थान है । यही सत्र वर्षों का केन्द्र है । केन्द्रभाव ही उत्तर है । मेरु के इस केन्द्ररूप उत्तरभाय को लक्ष्य में रखकर ही -' मेरुरत्तरतः स्थितः ' यह कहा गया है । मेरु के चारों ओर इमनें नवसहस्रयोजनात्मक ' इलावृतवर्ष ' की सत्ता त्रतलाई है । इस इलावृतवर्ष की चारों दिशाओं में चार ' सर ', एवं चार ' महावन ' हैं । मेरु से, किंवा इलाऋतवर्ष से पूर्व में ' चैत्ररथ ' नाम का महावन है, एवं ' अरुणोदय ' नाम का सर है । दक्षिण में ' गन्धमादनवन ' है, एवं ' मानससर ' है । यही गन्धमादनवन पुराणान्तर में ' नन्दनवन ' नाम से व्यवहृत हुआ है । पश्चिम में ' वैभ्राजवन ' है, एवं ' असितोद ' नाम का सर है । यही सितोद पुराणान्तर में ' शीतोद ' नाम से व्यवहृत हुआ है । उत्तर में

पृष्ठ 626

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 626 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयाध्याय ε जा चुका है । पञ्चमब्राह्मण प्रथमकाण्ड हिमवान् हेमकूटश्च निषधो, दक्षिणे त्रयः । -- पुराणे ८६० से व्यव -। कहीं कहीं सावित्रवन को भी ' नन्दनवन ' नाम ' सावित्रवन ' है, एवं ' महाभद्र ' नाम का सर है मेरुप्रदेश ही पुराणा से वेष्टित इलावृतवर्षा छिन्न हृत कर दिया गया है । इन चार महामरों, एवं महावनों आगे जाकर स्पष्ट हो जायगा । इस पार्थिवस्वर्ग की सीमा में ' पार्थिवस्वर्ग ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है, जैसा कि पर्वत मेरुस्वर्ग की दक्षिण-हेमकूट, ३ निषेध, ये तीन पर सीमासम्बादक ६ वर्षपर्वत हैं । १ हिमवान, २ - सीमा में प्रतिष्ठित हैं । इनका ये तीन पर्वत स्वर्ग की उत्तर सीमा में हैं । १ नील -२ श्वेत- ३ शृङ्गवान – की श्रेणियाँ इन कुलपर्वतों के साथ संलग्न हैं । वे विस्तार पूर्वापर ( पूर्वपश्चिम ) है । अनेक पात्रों से व्यवहृत हुई हैं । निपध, एवं नीलपर्वत से अवान्तर पर्वत - श्रेणियाँ पुराण में ' शाखाशैल ' नाम गन्धमादन नाम के दो कुलपर्वत मेरुमध्य स्थान में आरम्भ कर दक्षिणोत्तर फैले हुए १- माल्यवान २- ६ वर्षपर्वतों का दिग्दर्शन कराते हुए पुराणपुरुष है । ६ वाँ सर्वप्रधान हिरण्यशृङ्ग - पर्वत है । इह्रीं भगवान् व्यास कहते हैं--नीलः, श्वेतः, शृङ्गवांश्च मेरोरुचरतस्त्रयः ॥ १ ॥

पूर्वापरायता एते षडपि श्रायशोऽचलाः ॥ शाखाशलैरसंख्यातैर्विप्रकीर्णैरुपाचिताः ॥ २ ॥

आनीलनिपधायामौ माल्यवद् - गन्धमादनौ ॥ तो दक्षिणोचरायामौ मेरुर्मध्यगतस्तयोः ॥ ३ ॥

पार्थिवस्वर्गसीमानों नौ वर्षपर्वताः ॥ पर्वतश्रेणरूपास्ते पादपर्व तमंकुलाः ॥ ४ ॥

हिमवान् दक्षिणे सीमा, शृङ्गवानुचरे स्थितः ॥ । । माल्यवान् पूर्णसीमाऽस्ति पश्चिमे गन्धमादनः ॥ ५ एषां वर्धा भूभागो वर्ष तत् ' पद्मपत्रवत् ' ॥ ॥ ६ ॥

पद्मान्तः कर्णिका मेरुमण्डलं ' ब्रह्मसद्म तत् ' लोकपद्मस्थितो ब्रह्मा चातः सम्य " ससर्ज ह ॥ * वेद - धर्म - प्रजा - लोक - भेदाः सर्गाश्चतुर्विधाः ॥ ७ ॥

किया माध्य के पूर्वप्रकाशित - प्रथमन्वण्ड में * इन चारों सृष्टियों का विशद निरूपण शतरथविज्ञान

पृष्ठ 627

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 627 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अष्टदलकमत्नात्मकः पाद्मभुवनकोशपरिलेख: -I कोण ईशान ------उत्तरप्रदेशः 15" hekle रम्यकवर्षः II w .च पूत्र भद्राश्ववर्षः मेरुः 2 केतुमालवर्षः किंपुरुषवर्षः [ पु ० [ सं ० से ८० के मध्य में भारतवर्षः हरिवर्ष : अग्निकोण A : दक्षिणप्रदेश -म पद्म ं नाभ्युद्भवं चैकं समुत्पादितवांस्ततः ॥ सहस्रवर्णं विरजं भास्कराभं हिरण्मयम् ॥१ ॥

पद्म े हिरण्मये तस्मिनसृजद् भूरिवर्चसम् || स्रष्टारं सर्वलोकानां ब्रह्माणं सर्वतोमुखम् ॥२ ॥

तच पद्म पुरा भूतं पृथिवीरूपमुत्तमम् ॥ यत् पद्म ं सा रसादेवी पृथिवी परिकथ्यते ॥३ ॥

एवं नारायणस्यार्थे महीपुष्करसम्भवा ॥ प्रादुर्भावाऽप्ययं तस्मान्नाम्ना पुष्करसंज्ञितः ॥४ ॥

तदेतत् पार्थिवं पद्म ं चतुष्पत्रं मयोदितम् ॥ भद्रा भारताद्यानि पत्राण्यस्य चतुर्दिशम् ॥५ ॥

भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा ॥ पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः ॥६ ॥

पृष्ठ 628

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 628 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय श्रध्याय शतपथब्राहाण पञ्चनब्राह्मण ' मेरुस्वर्ग ' की सीमा के सम्पादक चार “ विष्कम्भ " पर्वत और ध्यान में रखिए । ये चारों पर्वत मन्दर, गन्धमादन, विपुल, सुपार्श्व, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । जिस समय एशियाखण्ड में ' स्वर्गव्यवस्था ' थी, उस समय मेरु को वेष्टित करने वाले उपर्युक्त चारों पर्वतों पर क्रमशः कदम्ब, जम्बु, पिप्पल, बट, नाम के चार ' केतुवृक्ष ' ( ध्वजा - स्थानीय वृक्ष ) थे । मेरु के पूर्व पाश्वस्थ मन्दराचल पर्वत पर कदम्बवृक्ष था, दक्षिणपार्श्वस्थ गन्धमादनपर्वत पर जम्बु ( जामून ) वृक्ष था | पश्चिमपार्श्वस्थ विपुलपर्वत पर पिम्पलवृक्ष था, एवं उत्तरपार्श्वस्थ सुपार्श्वपर्वत पर बटवृक्ष थानं प्रत्येक वृक्ष की ऊँचाई १११ हाथ थी । ये ही स्वर्ग की ध्वजाएँ थीं । दूर से ही ये स्वर्गमहिमा प्रकट कर देते थे । स्वयं युधिष्ठिरने इह्रीं केतुवृक्षों से स्वर्गप्रदेश का परिचय प्राप्त किया था । इन चारों में दक्षिणभाग में गन्धमादन पर्वत पर प्रतिष्ठित जम्बुवृक्ष ही ' जम्बुद्वीप ' नाम का कारण है । इधर मेरु से दक्षिण में भारतवर्ष है । अतएव और किसी वर्ष के साथ विशेषरूप से जम्बु का सम्बन्ध न नान कर — " जम्बुद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते, कुमारिकाक्षेत्र " इत्यादि रूप से ' भारतवर्ष ' के साथ ही ' जम्बु ' नाम का उल्लेख किया जाता है । इस जम्बुवृक्ष के सम्बन्ध से ही इस पर्वत से निकलने वाली नदी ' जम्बुनद ' कहलाती है । यहाँ से निकल कर यह नदी मेरु से पश्चिम केतुमालवर्ष ( योरोप खण्ड ) की ओर जाती है, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । इस नदी की मिट्टी में ' सुवर्ण - करिणकाएँ ' उपलब्ध होतीं हैं | जम्बु के सम्बन्ध से ही यह सुवर्ण-- जाम्बुनद ' नाम से व्यवहृत हुआ है । इह्रीं सुवर्ण-कणिक।ओं के सम्बन्ध से साधारण जनता में ' सुमेरु को सोने का बतलाया जाता है । ' अचला - मेरुबिन्दु ' के सुवर्णभाव का वैज्ञानिक कारण तो कुछ और ही है । इस का दिग्दर्शन पूर्वप्रतिपादित भुवनकोशप्रकरण में किया जाचुका है । इसी जाम्बुनद मुवर्ण की, एवं जम्बूनदी की प्रशंसा करता हुआ पुराण कहता है -----न स्वेदो नच दौर्गन्ध्यं न जरा नेन्द्रियः क्षयः ॥ तत्पान स्वस्थमनसा जनानां तत्र जायते ॥ जम्बूनदाख्यं भवति सुबर्णं सिद्धभूषणम् ॥ १ ॥

हिमालय के उपवनों में रहने वाली सिद्ध किन्नर - गन्धर्व - श्रप्सरा यादि तिर्य्यग् जातियाँ इसी जाम्बुनदसुवर्ण के आभूषण पहिना करतीं थीं । सीमासम्पादक पर्वतों के अतिरिक्त मेरुसे चारों ओर २०-' केसरपर्वत ' और थे, जैसा कि आगे की तालिका से स्पष्ट होजाता है । ‘ केसर - पर्वतों ' के अतिरिक्त मेरू से चारों ओर बड़ी दूर पर्यन्त व्याप्त चाट ' मर्यादापर्यत ' और हैं । जठर, एवं देवकूट, नाम के दो मर्यादापर्वत नील, एवं निषेध, नाम के पर्वतों से प्रारम्भ कर दक्षिणोत्तर फैलते हुए बड़ी दूर पर्य्यन्त चले गए हैं । ये दोनों पर्वत मेरु से पूर्व में अवस्थित हैं । गन्धमादन, एवं कैलास, नाम के दो पर्वत मेरु से दक्षिण में हैं । इनकी लम्बाई ८० योजन ( लगभग--२५००० क्रोश ) है | इन का प्रसार पूर्वपश्चिम है । निषध, एवं पारियात्र, नाम के दो मर्यादापत पश्चिम में हैं । नील, निषेध, से फैल कर ये दक्षिणोत्तररूप से व्याप्त हैं । त्रिशृङ्ग, जारुधि, नाम के पर्वत उत्तर में प्रतिष्ठित होते हुए पूर्वपश्चिम की ओर व्याप्त होते हुए पूर्वसमुद्र ( प्रशान्तमहासागर ), एवं पश्चिम-- समुद्र ( मेडिट्र नियेन्सी ) पर्य्यन्त फैले हुए हैं । ८६ १

पृष्ठ 629

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 629 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय अध्याय २०-- केसरपर्वताः-अर् काल ३. उत्तर हस ३-नाग -४ शङ्खकुट -१ अभ २-प्रथमकाण्ड १ - शान्तवान् २ - चक्रकुम्भ ३- कुररी ४- माल्यवान ५ - वैकङ्क || ३ – पतङ्ग १-त्रिकूट २-शिशिर ४– रुचक ५. विलध दक्षिण पश्चिम जारुधि - ५ गन्धमादन --- ४ कापिल - ३ बैदूर्य २-सिखिवास - १ ८६२

पृष्ठ 630

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 630 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय श्रध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण जिस युग का चरित्र हम पाठकों के सम्मुख रख रहे हैं, उस युग में प्रधानरूप से नीतितन्त्र, एवं गौणरूप से राजतन्त्र, प्रचलित था । गणतन्त्रानुगत प्रजातन्त्र नीतितन्त्रानुगत राजतन्त्र से मर्यादित था प्रकृतिवत् तद्युगों में । नीतितन्त्र के सञ्चालक दिकपाल लोकपाल थे । एवं राजतन्त्र के सञ्चालक स्वयम्भु मनु थे । जो दिक्पाल थे, वे ही लोकपाल भी थे । उदाहरण के लिये बरुण और चन्द्रमा को ही लीजिये । ये दोनों देवता क्रमशः पश्चिम, उत्तर दिशा के अधिपति होते हुए दिक्पाल थे । एवं भूपिण्ड पर पानी का जितना विभाग था, उस सत्रका प्रबन्ध पश्चिमस्थ - वाहलीक - राजधानी में निवास करने वाले वरुण के उत्तरदायित्त्व से अनु-प्राणित था । वरुण पोविभाग की व्यवस्था करते थे । इसीप्रकार औषधियों के व्यवस्थापक, तत्सम्बन्धी अभि-योगों के निर्णायक चन्द्रमा थे । इसप्रकार अब विभाग के वरुण लोकपाल थे, चन्द्रमा औषधिविभाग के लोक-पाल थे । इन आठों दिक्पाल - लोकपालों के स्वतन्त्र राष्ट्र थे । प्रत्येक की स्वतन्त्र विचारसभा ( कौन्सिल ) थी । इन सब में स्वर्गाधिपति इन्द्र प्रधान माने जाते थे । वरुणादि जहाँ ' सम्राट ' कहलाते थे, वहाँ इन्द्र ' स्वाराट् पद से विभूषित थे । इन्द्र की सभा में नियमित तिथियों में शेष सातों दिक्पालों को उपस्थित होकर विचार - विनिमय करना पड़ता था । इसी प्रमुखता के कारण ' सुधम्र्म्मा ' नाम की ' इन्द्रसभा ' तस्समय में ' देवसभा ' नाम से प्रसिद्ध हो रही थी । ' सौवी ' इन्द्र का राष्ट्र था । जहाँ आज ' न्यूसाइबीरिया ' प्रान्त है, जो प्रान्त आज असभ्य G मनुष्यों की श्रावासभूमि बना हुआ है, वही स्थान किसी समय ' देबेन्द्र ' की राजधानी था । संसार की सर्वोच्च सभ्यता का वही केन्द्र था । असुरों के आक्रमण से यह स्थान बचा हुआ था, अतएव तत्समय में वह प्रदेश ‘ अपराजितादिक् ' नाम से प्रसिद्ध था । स्वयं ब्रह्मप्रजापति की सभा ' कान्तिमती ' नाम से प्रसिद्ध थी । ब्रह्मराष्ट्र ' प्राग्ज्योतिप ' नाम से व्यवहृत होता था । भद्रगिरि, एवं चन्द्ररिगि, के मध्य में निवास करनेवाले विष्णु, एवं चतुद्दश सहस्रयोजन - परिमिता सुमेरुमध्यस्था ' ब्रह्मपुरी ' में निवास करनेवाले ब्रह्मा का आसन स्वराट् इन्द्र से भी ऊँचा था । इनकी, इन में भी विशेषतः ब्रह्मा की आज्ञा सत्र को मान्य थी । ब्रह्मा और विष्णु ' विराट ' नाम से प्रसिद्ध थे । चन्द्रादि कुछ लोकपाल राजा थे । बरुणादि कुछ लोकपाल सम्राट् थे । इन्द्र स्वाराट् थे । ब्रह्मा - विष्णु विराट् थे । इन दोनों में त्रिष्णु प्रायः इन्द्र के पक्ष में ह्रीं अपनी सम्मति दिया करते थे । क्योंकि ये यज्ञ के अधिष्ठात बनते हुए प्रकृति से ही ' असुरद्वेषी ' थे । विष्णु की गुप्तमन्त्रणा से ही इन्द्रने अन्नहर्त्ता वराह नाम के सुप्रसिद्ध असुर को नष्ट किया था । उधर सर्वलोकपितामह ब्रह्मा, देवता, और असुर दोनों पर समान दृष्टि रखते थे । जत्र देवता असुरों से आक्रान्त होकर प्रजापति की शरण में जाते, तो प्रजापति दोनों को नीतिमार्ग से शान्त कर देते थे । ब्रह्मा को दोनों के हितों का पूर्ण ध्यान था । फिर भी असुर असु " थे । आगे जाकर ब्रह्मा की उदासीनता से अनुचित लाभ उठाते हुए इन दुष्ट- बुद्धि असुरों नें देवत्रल सर्वथा परास्त कर दिया, जैसा कि प्रकरण के आरम्भ में हीं कहा जाचुका है । असुर संख्या में भी अधिक थे । एवं स्वभाव से भी दुष्ट । अतएव प्रजापतिने पृथिवी का ' दागभाग ' ( बटवारा ) करते हुए देवताओं की अपेक्षा अत्यधिक भूभाग इन्हें दिया । पाद्मभुवनकोश के व्याज से उसी सुरत्रिलोकी, एवं दैवत्रिलोकी का स्वरूप पाठकों के सम्मुख उपस्थित किया जारहा है । ८६ ३