Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 631–640

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 631–640

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द्वितीयाध्याय १- मंरुत्रिलोकी--प्रथमकाण्ड पचमत्राह्मण मेरुबिन्दु को हमने पूर्व में दृश्य उत्तरी गोलार्द्ध का केन्द्र माना है । पुरामायुग से सम्बन्ध पने वाले जिस ' नत्रत्रर्षात्मक पाद्मभुवनकोश का अतक निरूपण किया गया है, उस समय की स्थिति में, और आज की स्थिति में बड़ा अन्तर होगया है पाचभुवनकोश व्यवस्था – युग में जिस स्थान पर मेरुबिन्दु पी, आज वह वहाँ मे हटकर आगे निकल गई है । आज मेरुप्रदेश सर्वथा परिवर्तित होगया है । इस का एकमात्र कारण है अयपरिभ्रमना । पृथिवी का परिश्रमणमार्ग है । इस क्रान्तिवृत्तीय पृष्ठीकेन्द्र का ही नाम ' फदम्ब ' है । इसी को ' नाक ' ' विष्णुपद आदि नामो से व्यवहृत किया जाता है । क्रान्ति की प्रत्येक चिन्दु से उत्तरदिकस्थ कदम्ब ६० अंश पर प्रतिष्ठित है । इस कदम्ब के चारों ओर विद्युत्प्राणरूप २४ अंश के व्यासार्द्ध से वृत्त मनाकर परिक्रमा लगाया करता है वविद्युत् की यह परिक्रमा २५ हजार वर्ष में समाप्त होती है । इधर विवृतीय- पृष्टी केन्द्र को ध्रुव कहा जाता है । पृथिवी के विश्वदवृत्त की प्रत्येक बिन्दु से ६० अंश पर है पृथिवी का केन्द्रस्थ उत्तराग्निस्थान सुमेरु है । यह उत्तर से बद्ध रहता है, एवं दक्षिणाग्नि की अन्तिम सीमा ' कुमेरु ' है । यह दक्षिणध्रुव से बद्ध रहता है । ऐसी अवस्था में अब यदि स्थिर होता, तत्र तो भूपिएड का मेरु- प्रदेश भी स्थिर ही रहता । परन्तु ध्रुव उपयुक्त कथनानुसार कदम्ब के चारों ओर क्योंकि घूमता है, अतएव तत् मम्बद्ध भेरु का भी देशत्याग स्वीकार करना पड़ता है । किसी समय यह ' हंसनक्षत्र ' के अधः स्वस्तिक पर था किसी समय मेरु के स्वस्तिक पर ' अभिजित ' था । आज मेरु के मेरु से व्यस्वस्तिक पर हंसनक्षत्र था । स्वस्तिक पर ' विश्वकर्मा नक्षत्र है । किसी समय यह भी बदल जायगा । वर्त्तमान में ' ध्रुव ' नाम से प्रसिद्ध नक्षत्र वेद में - ' अभय ' नाम से व्यवहृत हुआ है । वस्तुतस्तु ध्रुव किसी नक्षत्र का नाम नहीं हैं । अपितु निराकार --- बिद्य तृप्राण को ही ध्रुव कहा जाता है । यह प्राण ही कदम्ब के चारों ओर स्थिरवृत्त पर परिक्रमा लगता है । यह प्राण जिम नक्षत्र के समीप रहता है, परिचयार्थ वही नक्षत्र ' धन ' नाम से व्यवहत दोजाता है । अब यह प्राणस्कम्भ हंसनक्षत्र पर था, उस समय ' हंस ' ही ध्रुव बहलाता था । वहाँ से आगे चलकर जब ध्रुवप्राय अमिजिन्नक्षत्र पर आया तो अभिजिन्नचत्र ' अय ' कहलाया । आज यह विश्वकर्मा नाम के नक्षत्र पर है । अतएव या यही अब बहलाता रहा है । इस अपसंस्था में गया हुआ आत्मा भय से विमुक्त जाता है, अप इसे ' अभय ' नाम से भी ब्यवहृत किया जाता है । यहाँ श्रात्मच्युति नहीं है, इसी अभिप्राय से इसे ' ध्रुव ' कहा जाता है । ध्रुव स्थिर है, यह भाव ध्रुव -- व्यवहार का कारण नहीं है । क्योंकि ध्रुव का कदम्ब के चारों ओर परिक्रमा लगाना सर्वसम्मत है आज जिस स्थान पर भुव है, यहाँ सात तारे है जो निवेशक्रम सप्तर्पि मण्डल का है, वही मन्निवेशक्रम इन सात तारों का है । कहीं कहीं ब्राह्मणग्रन्थों में इहें ' ऋक्षपत्नी ' नाम से भी व्यवहृत किया गया है । इह्रीं सातों का निरूपण करती हुई मन्त्रश्रुति कहती है--

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यश्रध्याय ' शतपथब्राह्मण • पञ्चमत्राह्मण ---विश्वकर्मा, चिमना, आद्विहाया, धाता, विधाता, परमोत, सन् तेषामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्त ऋषीन् पर ' एक ' - माहु: ॥ -- ऋग्वेदसं ० १० मं । २ सृ ० । २ मं ० । इह्रीं सातों का प्रकारान्तर से निरूपण करती हुई श्रुति कहती है-' अग्निः पुच्छस्य प्रथमं काण्डं, तत इन्द्रस्ततः प्रजापतिः । अभय ं चतुर्थम् ’ ’ विश्वकर्मा बिमना बिहाया धाता ७ सन्हक धाता ५ स ६५ ६ - परमः

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द्वितीय अध्याव प्रथमकाण्ड कदम्बवृम पञ्चमत्राह्मण ध्रुव-परिक्रमण-हाँ, तो तथोक्त निदर्शन से आप को विदित होगया होगा कि, ध्रुवपरिभ्रमण के कारण भेरु बदलता रहता है । इस से बतलाना प्रकृत में हमें यही है कि, जिस समय प्रजापतिने ' पद्मभुवनकोश ' की व्यवस्था की थी, उस समय तो मेरुविन्दु सचमुच ब्रह्मनिवासस्थान पर ही थी आज भी प्रदेश तो वही है, परन्तु मेरु बदल गया है । अभिजित् उस समय ध्रुव था । यह मेरु के स्वस्तिक पर था । सब से पहिले इसी मेरुमूला- त्रिलोकी का स्वरूप अवगत कीजिए । यह बतलाया जाचुका है कि, निरतवृत्त से मेरा ठीक ६.० अंश उत्तर है । हमारा निरक्षवृत्त ' लङ्का ' है । इसी को हमने प्रथममध्याह्नरेखा का उपक्रम माना है । आज के अनुपात से यद्यपि लङ्का निरक्षवृत्त से ५ अंश उत्तर मानी जाती है परन्तु भारतीय भूगोलसिद्धान्त के अनुसार यह सर्वथा निःसार है । क्योंकि आज लङ्का सीलोन को माना जारहा है । सीलोन अवश्य ही निरक्ष देश से प्राय: ५ अंश उत्तर है । उधर हमारी दृष्टि

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द्वितीयाध्याय शतपथवादार पश्चमब्राह्मण से ' सीलोन ' ' सिंहलद्वीप ' है । लङ्का इससे सर्वथा पृथक द्वीप है । यह श्रवश्य ही निरक्ष देश पर थी । आज लङ्का दक्षिणसमुद्र के गर्भ में विलीन है । इस स्थान से उत्तर की ओर एक सीधी रेखा मेरु पर्य्यत्त ले जाइए । इसी का नाम ' भूमध्यरेखा ', किंवा वर्त्तमान- परिभाषा के अनुसार ' प्रथममध्याह्नरेखा होगा | यह रेग्वा लङ्का, कोलम्बो, मद्रास, उज्जैन, सिद्धपुर, कुरुक्षेत्र, आदि देशों का स्पर्श करती हुई मेरुपर्य्यन्त व्याप्त हो रही है, जैसा कि निम्नलिखित बचन से स्पष्ट है—

यल्लङ्कोज्जयिनी पुरोपरि कुरुक्षेत्रादिदेशान् स्पृशत् ।

सूत्रं मेरुतं बुधैर्निगदितं सा मध्मरेखा भुवः ॥

इनमें उज्जैनरेखा से भारतीय ज्योतिष की व्यवस्था का श्रारम्भ माना जाता है । ग्रतएव जैसा पाश्चात्यों में मध्यरेलास्थान ' ग्रीनवीच ' नामसे प्रसिद्ध है, एवमेव पौरस्त्य उज्जैन को मध्यरेखास्थान मानते हैं । यह उज्जैन निरक्ष देश से प्रायः २३ अंश ६ कला उत्तर अक्षांशों पर स्थित है, एवं ग्रीनवीच --मध्यरेखा की अपेक्षा लगभग ७० अश ४३ कला पूर्वीय देशान्तर से यह उज्जैनरेखा आरम्भ होती है । वर्तमान स्थूलमान के अनुसार उज्जैनरेखा ८० ( अस्सी ) पूर्वी देशान्तर पर मानी जाती है । इसप्रकार ग्रीनवीच--मध्यरेखा, एवं भारतीय - मध्यरेखा में प्राय: ७६ अंश का अन्तर सिद्ध होजाता है । इसी अन्तर से हमें आगे जाकर भारतवर्ष की सीमा निकालनी है, अतः अप्रासङ्गिक होते हुए भी अत्र ग्रीनवीच रेखा का स्मरण कर लिया गया है । निरक्षदेश से आरम्भ कर मेरुपर्य्यन्त ६० अंश हुए । इन अंशों को ब्रह्माने २४, ४२, २४, इन तीन भागों में विभक्त कर मेरुमूला त्रिलोकी की व्यवस्था की । मेरु को केन्द्र मान कर २४ अंश के व्यासाद्ध ' से ४८ अंश के परिसर का एक वृत्त बनाइए । यह मेस्त्रिलोकी का स्वर्ग- प्रदेश होगा । निरक्षदेश से श्रारम्भ कर २४ अंश उत्तर पर एक रेखा पूर्वापर कैंच दीजिए, यही मेस्त्रिलोकी का पृथिवीलोक होगा, एवं २४ से आगे उत्तर की ओर ६६ वें अंश पर एक रेखा पूर्वापर बैच दीजिए । ४२ अंशात्मक यही देश अन्तरिक्ष होगा । इस व्यवस्था का मूलकारण वही आधिदैविक- त्रिलोकी है । विष्वत् से आरम्भ कर २४ पर्य्यन्त का आकाशप्रदेश ' पृथिवी ' कहलाता है । आगे के ४२ अंश ' अन्तरिक्ष ' नाम से प्रसिद्ध है । इसे ही आत्मगतिविज्ञान के अनुसार ' देवयानमार्ग ' कहा जाता है । एवं ध्रुव को केन्द्र मान कर २४ अंश के व्यासाद्ध ' से युक्त ध्रुवमण्डल ' स्वर्ग ' कहलाता है । ध्रुवमूला आकाशात्मिका यह त्रिलोकी लोक--विद्या के अनुसार ' आत्मगतित्रिलोकी ' * नाम से प्रसिद्ध है । प्रकृतिविज्ञान के परमाचार्य्य, इस के प्रथम प्रर्वतक भगवान् ब्रह्माने उसी प्राकृतिक ध्रुवमूला -- त्रिलोकी के स्वरूप को लक्ष्य में रख कर उपर्युक्त मेरु-त्रिलोकी का स्वरूप इस भूपिण्ड पर व्यवस्थित किया । * इस त्रिलोकीका विशद विवेचन ' श्राद्धविज्ञान ' के " श्रात्मगतिविज्ञानोपनिषत् " नामके चतुर्थखण्ड में देखना चाहिए |

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड ( १ ) मेरुमूला - देवत्रिलोकी— ६० मेरुः

लोकाः सः प्रतियन्ति पुरायुगे मेरुरित्थं मेहरासीत : स स प्रदेशः पृथिवीप्रदेश यः वादधो ब्रह्माभिजिद्धादधरः द्यौः २४ अन्तरिक्षम् ४२ पृथिवी २४ निरतदेशः मध्यरेखा ६८ पचमब्राह्मण ततोऽन्तरिक्षं परितो द्विचच्चारिंशच्चतुर्विंश पृथिवी ॥ वाच्चतुर्विशमितांश तुल्यव्यासार्द्ध वृत्तान्तरमिष्यते द्यौः ।

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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण २ - प्राङ मेरु - ( पामीर ) - मूला देवत्रिलोकी-दूसरी है प्राङ्मेरुमृला त्रिलोकी । इसे हम वर्त्तमानभाषा में ' एशियाई - त्रिलोकी ' भी कह सकते हैं | पुराण ने ब्रायः इसी त्रिलोकी को प्रधान मानते हुए तत्तद् भूप्रदेशों की व्यवस्था की है, जैसाकि त्र्यागे जाकर स्पष्ट होजायगा | इस त्रिलोकी का स्वरूप बतलावें, इससे पाहेले ' प्राङ्मेरु ' का परिचय करा देना आवश्यक होगा । वर्त्तमान में यह स्थान ' पामीर ' नाम से प्रसिद्ध है । ' पामीर ' शब्द ' प्राग्मेरु ' का ही अपभ्रंश प्रतीत होता है । वर्तमान भौगोलिक इसी ' पामीर ' को विश्वपर्वतों का निर्गमस्थान मानते हैं । यह संसार में सबसे विशद - उच्च पठार ( पथरीला ऊँचा मैदान ) है । आज के सिद्धान्त के अनुसार भी यह पामीर - भारतवर्ष, तिब्बत, चीन, रूस, तुर्किस्तान, अफगानिस्तान आदि महाभूप्रदेशों का केन्द्र है । पामीर से दक्षिण में भारतवर्ष है । पूर्व में तिव्वत है । उत्तरपर्व में चीन है । उत्तर में रूस है । पश्चिम में ' तातार ' नाम से प्रसिद्ध तुकिस्तान है । एवं दक्षिण पश्चिम में गानिस्तान है । इस संस्थाक्रम से प्रकृत में हमें केवल यही बतलाना है कि, आज के भौगोलिक भी ' एशियायीखण्ड ' में ' पामीर ' को सब प्रकार से प्रधानता दे रहे हैं । सर्वप्रधान पामीर नाम से प्रसिद्ध यह प्राङमेरु ही हमारे पौराणिक — त्रैलोक्य का मूलाधार है । पूर्व में यही स्थान मेरु था, अतएव यह ' प्राङमेरु ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । प्राङमेरु ' तुरुक -राज्य ' ( तुर्किस्तान - तातार - तारतर -- टारटरी आदि विविध नामों से प्रसिद्ध ) के उत्तर में प्रतिष्ठित होता हुआ आज ' पामीर ' नाम से प्रसिद्ध होरहा है । इसे हम मेरु के सम्बन्ध से ' उपमेरु ' भी कह सकते हैं । अथवा पक्षान्तर से पामीर को ही प्रधानरूपेण ' मेरु प्रदेश ' समझिए । कारण यही है कि, प्रधान मेरु ध्रुव का अधःप्रदेश है | वहाँ केवल मेरु बिन्दुमात्र से ही स्वस्वरूप प्रतिष्ठित रखता है । अर्थात् भूप्रदेश की दृष्टि से वह मेरुचिन्दु नहीं के समान हीं है । वहाँ सौरप्रकाश अत्यल्पमात्रा में नहीं के समान ही पहुँचता है । इधर पामीरदेश शतयोजन विस्तृत है । अतः ' मेरु ' शब्द से प्रायः पुराण ने इसी को प्रधानता दी है । वस्तुतस्तु - इलावृतवर्षावच्छिन्न मेरु, और तुरुष्करराज्य - समीपवर्त्ती प्राग्मेरु में कोई विशेष अन्तर नहीं है । इसे मेरु कह सकते हैं, उसे प्राग्मेरु कह सकते हैं । क्योंकि पुराणोंने इलावृतवर्ष का विस्तार २४ हजार योजन माना है । ऐसी अवस्था में उस प्रदेश की व्याप्ति पामीर पर्यन्त मान लेने में कोई क्षति नहीं होती | बद्यपि है — पामीर उपमेरु, परन्तु ' तद्ग्रहणन्याय ' से इसका ' मेरु ' शब्द से भी ग्रहण किया जः-सकता है । ' मेरु ' शब्द का अर्थ है - ' सर्वोच्च भाव ' । इधर पामीर हिमालय आदि के कारण सर्वोच्च न होता हुआ भी ' अत्युच्च ' अवश्य है । अत: इसे ' मेरु ' शब्द से व्यवहृत करने में कोई आपत्ति नहीं होती । यह पामीरप्रदेश समुद्रपृष्ठ से अनुमानत ८००० हाथ अवश्य ऊँचा है पृथिवी में सर्वाधिक उच्च यदि कोई देश है, तो पामीर | इसी उन्नतभाव को प्रधान मान कर इसे ' तारतर ' नाम से व्यवहृत किया गया है । यही अपभ्रंशरूप में परिणत होता हुआ ' तातार ' नाम से प्रसिद्ध होगया है । यही पाश्चात्यों के विशुद्ध उच्चारण की कृपा से ' टारटरी ' कहलाने लग गया है । यहाँतक तुरुष्कराज्य का प्रसार था, अतएव पामीर-वाचक तारतर शब्द इस तुरुष्क ( बुर्किस्तान ) राज्य के साथ भी समन्वित होगया है । तुर्किस्तानी मनुष्यों ८६६

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमत्राबागा को ' तातारी ' कहा जाता है । राजशासन के भेद से पर्ची तुर्किस्तान, पश्चिमी तुर्किस्तान, भेद से तुरू कदेश दो भागों में विभक्त देखा जाता है । इनमें पश्चिम तुरुक तो तुर्कस्तान के ही आधीन है । पूर्वी तुर्कि स्तान चीनराज्य में अन्तर्भूत है । ये ही दोनों विभाग क्रमशः भारत की उत्तर सीमा बनते हैं । पूर्वीय - भारत की सीमा पूर्वीय तुर्किस्तान है एवं पश्चिम भारत की उत्तर सीमा पश्चिमी तुर्किस्तान है, वैसाकि आगे के ' सीमाप्रकरण ' में स्पष्ट हो जायगा । सर्वोच्चतम मेरु का ( पामीर का ) पृष्ठ भाग ही सुमेरुरचांशककुरु ' नाम से प्रसिद्ध है । जैसाकि हम पूर्व में कह आए है, पुरा ने मेमशब्द से प्रायः ' प्रारमेरु ' का ही ग्रहण किया है । तात्कालिक इलावृत वर्ष के केन्द्रभूत मुरूष सुमेरु से यह प्राग्मेरु ( पामीर ) लगभग ५० अंश दक्षिण पूर्वापररूप से स्थित है । इस अनुपात से निरक्षदेश से पामीर अनुमानत: ६० अंश उत्तर की ओर स्थित मानना पड़ता है । इसी पामीर की उच्चतम चट्टान से चारों ओर चार नदियाँ प्रवाहित हुई हैं । पूर्व की ओर बहने वाली नदी -- ' सीता ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी को चीनी भाषा में ' ह्वाङह्य ' कहा जाता है । यह आगे जाकर ' द्वारा यासी- मेकाङ्ग ' नाम से व्यवहृत होती हुई तीन शाखाओं में परिणत होती हुई क्रमशः पतिसमुद्र, एवं चीनममुद्र में मिल जाती हैं । आदि की दो नदियाँ यलोसी ( पीतसमुद्र ) में मिलती है, शेष चीन-समुद्र में लीन होती है । पामीर के उत्तर भाग से ' भद्रा ' नदी निकलती है । सीता प चाहिनी थी, ए भद्रा उत्तरवाहिनी है । यही भद्रा पुराणों में- १- भद्रा - २- सोमा ३ भद्रसोमा, इन तीन नामों से प्रसिद्ध हुई है । यह उत्तर समुद्र में मिलती है । इसके भी सीतावत् तीन हीं स्रोत हैं । ये तीनों स्रोत वर्त्तमान में ' ओत्री ' ' लीता ' ' इतीसी ' नाम से प्रसिद्ध हैं । इनमें लीनीस्रोत ईशानदिक्स्थ सौवीरराष्ट्र की ओर जाना हुआ उत्तरसमुद्र में मिलता है पामीर के पश्चिम प्रदेश से ' यतु ' नाम की नदी निकलती है । यह पश्चि बाहिनी नदी है । यह नदी नेट में ' यतु ' नाम से प्रसिद्ध है पुराण में यही ' चतु ' रूप में परिणत हो गई है संधोधकों की कृपा से यही एप ' नाम से प्रसिद्ध है अवश्य ही एक्सम शब्द यन्तु का ही अपभ्रंश होगा । उनकोश के ज्ञाता पौराणिकोने अक्ष के सम्बन्ध से इसी यदु को ' जम्बु ' नाम से ब्यवहृत किया है, जसाकि पूर्व में बतलाया जा चुका है । यही यवनभाषा में ' जैहू ' ' अमू ' इत्यादि नामों से प्रसिद्ध है । यह नदी ' कारपीएम्सी ' ( ममुद्र ) में मिलती है । चौथी है भारत को कृतकृत एवं धन्य बनाने वाली, दक्षिण समुद्र में लीन होने वाली दक्षिणवाहिनी ' अलकनन्दा ' । उपयुक्त सीना, भद्रसोमा, चक्षु, अलकनन्दा, इन चारों नदियों की समष्टि ही पुराण में-' चतुर्गङ्गम ' नाम से व्यवहृत हुई है । ' गङ्गा ' शब्द बहने वाले पानी मात्र का वाचक है । ऐसी अवस्था में केवल ' भागीरथी ' ही क्यों ' गङ्गा ' नाम से प्रसिद्ध हुई है, इसके लिए छान्दोग्योपनिषद् - हिन्दी विज्ञान माध्य के द्वितीय प्रपाठक में निरूपित ' बृटिसामप्रकरण ' ही द्रष्टव्य है । गङ्गा- महानदी - शाखानदी -मुद्रा - कुल्या भेट से नदियाँ पाँच भागों में विभक्त हैं । अतिदीर्घा, मादाद्रूप से समुद्र में मिलने वाली नदी ' गङ्गा ' महलासी है । शा से अनुगत शतयोजन से अधिक विस्तार वाली नदी ' महानदी ' कहलाती है । सहायक नदियों उपनदी, शाखानी यादि नामों से प्रसिद्ध है । वर्षा में प्रवाहित होने वाली, एवं अन्यकाल में सत्र जाने वाली नदियाँ ' क्षुद्र ' हैं । कृषि आदि की सुविधा के लिए निर्मित कृत्रिम नदियाँ कुल्या ' ' नाम से व्यवहृत होती है । इस पुरा परमया के अनुसार सादाद्रूप से समुद्र में लीन होने वाली उपयुक्त चारों नदियों के लिए अवश्य ही ' चतुर्गङ्गम् ' कहा जासकता है । ६००

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द्वितीयाध्याय शतथपत्राहाण पञ्चमब्राह्मण इन चारों में दक्षिणवाहिनी ' अलकनन्दा ' ही आगे जाकर सात शाखाओं में परिणत होती हुई पुराण में ' सप्तगङ्गम् ' नाम से व्यवहृत हुई है । अथवा यो कह लीजिए कि, पामीर से दक्षिण की ओर प्रवा-हित होने वाली इस अलकनन्दा में हिमालय की अधित्यका भूमि में सात सहायक नदियाँ और संयुक्त होतीं हैं । ये सातों नदियाँ ' वसोर्धारा, सरस्वती, विष्णुपाताली, गरुडा ( गरुडगङ्गा ), नन्दा, कर्णा, मन्दाकिनी इन नामों से व्यवहृत हुई हैं । इन सातों में मन्दाकिनी ही अलकनन्दा के सौभाग्य का सर्वश्रेष्ठ बनाती है । पारमेष्ठ्य पवित्र सोमावतार का सम्बन्ध मन्दाकिनी से ही होता है । तयुक्ता अलक-नन्दा ही कलिकल्म पहारिणी जगदुद्धारिणी भगवती भागीरथी नाम की त्रिपथगा गङ्गा है । भगीरथ के प्रयास से हिमाचल दुर्ग से निकली हुई यह माता भागीरथी सर्वप्रथम हरिद्वार के ' ब्रह्मकुण्ड ' में भूतल से स्पर्श कर श्रद्धालुओं को धन्य बनाती हुई, कलकलनादरूप अपने अट्टाट्टहास से ' स्वर्गश्री ' का भी उपहास करती हुई आज भी उसी रूप से प्रवाहित हो रही है । विषय आवश्यकता से अधिक विस्तृत होता जा रहा है, अतः प्राग्मेरुस्वरूपप्रकरण को नहीं उपरत कर तन्मूला त्रिलोकी - व्यवस्था की ओर ही पाठकों ध्यान आकर्षित किया जाता है । निरक्षदेश से आरम्भ कर ३२ अक्षांश पन्त ( उत्तर की ओर ) का भूप्रदेश पृथिवीलोक सम-झिए । यही पृथिवीलोक भारताग्नि के अधिकार में रहता हुआ ' भारतवर्ष ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसी को मर्त्यलोक, मानुपलोक, भूलोक आदि विविध नामों से व्यवहृत किया गया | वर्त्तमान अनुपात से निर-क्षदेश से लगभग २२ अक्षांश पर ' शिवालक ' नाम से एक पर्वत प्रसिद्ध है । यहीं से ' रात्री ' नाम की प्रसिद्ध नदी निकली है । यही ' इशक्ती ' नाम से व्यवहृत हुई इसे ही है । इसे ही भारतवर्ष की उत्तर सीमा समझिए । यहाँ के सम्राट् भगवान् मनु के सम्बन्ध से ही भारतीय प्रजा ' मनुष्य ' नाम से प्रसिद्ध हुई । मनुष्यप्रजा को ठीक मार्ग पर चलाने के लिए, प्रकृतिसिद्धा नित्या वर्णसृष्टि के आधार पर ही वर्णाश्रमधर्ममूलक मानव-धर्मशास्त्र की रचना हुई । स्वर्गाधिपति स्वाराट् इन्द्र की ओर से भारतवर्ष के शवसोनवात् अग्नि थे | अतएव यह भारतवर्षं पुराणों में ' अग्निलोक ' नाम से प्रसिद्ध हुआ प्रागमेरु से दक्षिण शणावत से उत्तर का सम्पूर्ण भूभाग अन्तरिक्षलोक था । यहाँ विद्याधार, सिद्ध, गन्धर्व, अप्सर, किन्नर आदि तिर्य्यक् जातियाँ रहतीं थीं । सुप्रसिद्ध वैभ्राजत्रन, चैत्ररथवन, उमावन, स्कन्दवन, आदि इन देवयोंनियों की बिहार भूमियाँ थी । यहाँ के शवसोनवात् वायु थे । अतएव यह लोक पुराणों में ' वायुलोक ' नामसे प्रसिद्ध हुआ है | इससे आगे का सम्पूर्ण प्रदेश ' स्वर्ग ' स्थान था । यहाँ के अधिपति स्वयं इन्द्र थे । प्रकारान्तर से समझिए — दक्षिणसमुद्र से आरम्भ कर हिमालय पर्यन्त सम्पूर्ण प्रदेश अग्निलोक था, ही भारतवर्ष था । हिमालय - समीपस्थ ' अलतायीगिरि ' से आरम्भ कर उत्तरसमुद्रान्त सम्पूर्ण प्रदेश ऐन्द्रलोक था । हिमालय, एवं अलतायी पर्वत के मध्य का भाग वायुलोक था । अग्निलोक जैसे भारतवर्ष कहलाता था, एवं आज भी कहलाता है, एवमेव ऐन्द्रलोक पुराणसमय में ऐरावतवर्ष ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । भारतीय प्रजा जैसे ' मनुष्य ' नाम से प्रसिद्ध थी, तथैव वायव्यप्रजा ' मरुत् ' नाम से एवं ऐन्द्री प्रजा ' देव ' नाम से प्रसिद्ध थी I अक्षांशों के अनुपात से समन्वय कीजिए । ३३ - से आरम्भ कर ४३ उत्तरी अक्षाश पर हिमालय की उत्तर - सीमा है । यहाँ से ६० पर मेरु की उत्तर सीमा है । इस विभाग से भी त्रैलोक्य - व्यवस्था ठीक व्यव ६०१

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमत्राह्मण स्थित होजाती है । इन तीनों लोकों में से अन्तरिक्ष, और द्युलोक, इन को तो थोड़ी देर के लिए छोड़ दीजिए । क्योंकि असुरों की कृपा से त्रैलोक्य - व्यवस्था आज नष्ट होचुकी है । अतः शेशभूत केवल भारतवर्षरूप पृथिवीलोक को ही लक्ष्य बनाइए | आज हमारे स्वत्त्वाधिकार में प्रजापति के द्वारा दायविभाग में प्राप्त महा-भूप्रदेश का एक थोड़ामा ( आधा ) भाग ही शेष रहा है, और वह भी दुर्भाग्यवश खण्ड खण्ड रूपमें परिणत हो गया है, किंवा हाय हमने अपनी भावुकता से ही अपने शेवभूत स्वल्पतम इस स्वत्त्वाधिकार को भी विस्मृत कर लिया है । वह भी इन राज्यव्यवस्थामूलक स्वार्थमय वप्रमान भूगोल - सिद्धान्तों के कारण चारों ओर से क्षत विक्षत होकर आज अपनी सन्तति की हीनबीर्य्यता पर अश्रुपात ही कर रहा है । देखिए अपने भारतवर्ष का वास्तविक स्वरूप! एवं पश्चात्ताप कीजिए अपने कुकम्मों पर! भारतवर्ष का वास्तविक स्वरूप -और • सुलेमान - हिन्दूकुश - किरथरकर, इन तीन पर्वतों को ' हिन्दुस्तान ' की सीमा माना गया है । याज भारतवर्ष की पश्चिमी सीमा सिन्धुनद बतलाई जाती है । सिन्दुनट के सम्बन्ध से भी भारतवर्ष हिन्दु-स्थान कहलाता है । सिन्धुनद से उस पार ( पश्चिम की ओर ) के आदिनिवासी ' पारसी ' ' सकार ' का ' हकाररूप ' से उच्चारण किया करते हैं । उन्हीं के व्यवहार की प्रधानता से सिन्धुन दोपलक्षित, अतएव ' सिन्धुस्थान ' नाम से व्यवहार करने योग्य भारतवर्षं आज ' हिन्दुस्थान ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है, ऐसी मान्यता है कुछ एक महानुभावों की, जिस से यद्यपि हम सहमत नहीं है । तदपि अभ्युगमवाद से इस नाम - व्यवहार में हम कोई आपत्ति नहीं कर रहे । आपत्ति है भारतवर्ष, और हिन्दुस्थान शब्द को परस्पर पर्य्याय मानने में | भारतवर्ष हिन्दुस्थान होसकता है । किन्तु हिन्दुस्थान कदापि भारतवर्ष नहीं हो-सकता । दोनों में व्याप्यव्यापकभाव सम्बन्ध है । भारतवर्ष के आधे प्रदेश का नाम, आधे से भी न्यून प्रदेश का नाम हिन्दुस्थान है । सिन्धुनद हिन्दुस्थान की सीमा होसकती है, किन्तु तिन्धु को भारत की पश्चिम सीमा मानना हमारे ऐतिहासिक - भौगोलिक सिद्धान्तों को देखते हुए सर्वथा ही अशुद्ध है । कैसे अशुद्ध है? इस प्रश्न के लिए दो चार ऐतिहाहिक भौगोलिक कारण आप के सम्मुख रखे जारहे हैं । ' पूर्व में ' पद्मभुवनकोश ' का निरूपण करते हुए हमने प्रधानरूप से दृश्य - उत्तरी गोलाद्ध के भारतवर्ष, केतुमालव, भद्राश्ववर्ष, कुरुवर्ष, ये पद्मपत्ररूप चार वर्ष बतलाए हैं । प्रत्येक वर्ष ६०-६० अंश का है । इस विभाग के अनुसार भारतवर्ष भी ६० अंश का ही प्राप्त होता है । पूर्वापर ६० अंश -त्मक प्रदेश भारतवर्ष है । इससे पूर्व ६० अशात्मक प्रदेश भद्राश्ववर्ष है । इससे पूर्ण ६० अंशात्मक प्रदेश क्रुरुत्रर्प है । इससे पूर्व ६० अंशात्मक प्रदेश केतुमालवर्ष है । भारतवर्ष की पश्चिमी सीमा केतु-मालत्र से संयुक्त है, एवं पूर्वी सीमा भद्राश्ववर्ष से संलग्न है । इधर भारतवर्ष की मध्यरेखा उज्जैन मानी * जहाँ इन पर्वतों का सन्धिभाग है, वहीं सुप्रसिद्ध ' खेवर ' नाम की नदी प्रवाहित है । कादर्रा है । यहीं सुप्रसिद्ध कुभा ( काबुल )

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 640 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण गई है । यहाँ से ४५ अक्षांश पर्व एवं ४५ अक्षांश पश्चिम- यह ६० अंश का भारतवर्ष मानना पड़ता है । हमारा पद्मभुवनकोश जब भारतवर्ष को ६८ अंश का बतलाता है, तो फिर कोई कारण नहीं, हम दूसरों के कल्पित मान का आदर करें । हमें हमारा देश ६० अंश का चाहिए । चाहे फिर उसकी सीमा सिन्धु हो, अथवा और भी समीप हो । ६० अंश नाप कर हमारे लिए पृथक रख दीजिए । वही हमारा प्रातिस्तिक ( निजी ) भाग होगा । उसे दूसरे अपने अधिकार में करलें, यह हमारे लिए सब होगा । हमें दूसरों का लेना नहीं है, तो अपना भाग छोड़ना भी नहीं है । हाँ, तो इन अंशों को सम्मुख रखते हुए ' भारतवर्ष की सीमा का विचार कीजिए । उज्जैन से ४५ अंश ठीक पश्चिम रक्तसमुद्र ( रेड्सी । इस रक्तसमुद्र से उत्तर - पश्चिम समीप ही ' महीसागर ' ( मेडिट्रं नियेन्सी ) है । इस व्यवहार का कारण यही है कि, ' मही ' पृथिवी को कहते । इधर पूर्वप्रतिपादित भौमत्रिलोकी - व्यवस्था के अनुसार भारतवर्ष पृथिवीलोक, किंवा महीलोक माना जाता है | इस महीलोकरूप भारतवर्ष की पश्चिमी सीमा पर उपयुक्क समुद्र है । यह ' मही ' की पश्चिमी-सीमा का विभाजक है, अतएव इसे अवश्य ही ' महीसागर ' नामसे व्यवहृत करना उचित है । उपयुक्त रक्त-समुद्र १५०० मील लम्बा है । यह समुद्र दक्षिण अफ्रीका की पूर्वी सीमा है । आज के अनुपात से अनुमानतः अर्थस्तान --अफ्रीका, दोनों के मध्य में रक्तसमुद्र है । मेडिट्रेनियेन्सी, और रेड्सी, दोनों के मध्य में पहिले ' स्वेज ' नाम का लगभग १०० मील चौड़ा भूप्रदेश था । अफ्रीका और अरब, दोनों देशों का व्यापार - सम्बन्ध इसी मार्गसे होता था ॥ ज इस स्बेज पर ' नहर ' बना कर रेड्सी - मेडिटेनियेन्सी को मिला दिया गया है । यही सुप्रसिद्ध ' स्वेजकनाल ' नाम की वह नहर है, जो ग्राज वणिक्तन्त्रों की संघर्ष सीमा प्रमा-ति होरही है । ' महीसागर ' ग्रीनवीच से अनुमानतः ३१ पूर्वीय देशान्तर पर स्थित है । इसी महीसागर में ' नील-' नदी ' नाम की सुप्रसिद्ध नदी का सङ्गगम होता है । कुछ समय पूर्व ' इटली ' की कृपा से अपनी स्वतन्त्रता खोते हुए हतभाग्य ' अबीसीनिया ' के सुप्रसिद्ध ' इन्स ' नाम के पहाड़ से इस नीलनदी का निर्गम होता है । इम नदी की लम्बाई लगभग ३५०० मील है । नीलनदीसङ्गम स्थानीय महीसागर, किंवा रेड्सी ही भारत की पश्चिमसीमा है । अर्थात् जहाँ से आज स्थान का आरम्भ माना जाता है, वहीं से भारतवर्ष का आरम्भ समझिए । यह तो हुआ पश्चिमी सीमा का विचार, अत्र चलिए पूर्वी सीमा की ओर । उज्जैन से ४५ अंश पूर्व ' आप को चलना है । क्योंकि तभी ६० ग्रंश की पूर्ति होसकेगी । यहाँ से ( भारतीय प्रथममध्याह्नरेखा से ) ४५ अंश पूर्व पीतसमुद्र ( बलोसी ) है । इस को हम चीनसमुद्र भी कह सकते हैं । यहीं फारमूसाद्वीप से उपलक्षित ' प्रशान्तमहासागर ' है । यही भारतवर्ष की पूर्वी सीमा है । दक्षिण सीमा दक्षिणममुद्र है, एवं उत्तरसीमा तुरुष्कदेश है, जैसा कि पूर्व में बतलाया जाकुका है । चतुः-सीम इस भारतवर्ष में कितने देश आते हैं? कौन कौन हमारे देश के अमत्र हैं?, जब इन प्रश्नों का विचार किया जाता है, तो आत्मा कम्पित होजाता है । आज भारतवर्ष अपने आलम्य से कर्मशून्य बनता हुआ विभूतिमय अपने सम्पूर्ण देशों को अपने हाथ से ही खोचुका है । दृश्य - उत्तरीगोलार्द्ध ' के देश-विभागों से आपको अनुमान होगा कि, चतुर्द्धा विभक्त वर्षों में किन किन देशों का समावेश है । चलिए! एक बार सम्पूर्ण दृश्य -- गोलार्द्ध ' की परिक्रमा लगा वें । ६०३