Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 641–650

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 641–650

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द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण अस्थान से, किंवा रेड्सी से एशियाखण्ड का प्रारम्भ होता है । एवं ' अलास्का ' नाम के अमेरिका के उत्तरभाग पर एशियाखण्ड की समाप्ति होती है । यह एशिया ही हमारा भौमत्रैलोक्य है । इस के भारतवर्षात्मक ६० अंश के प्रदेश में निम्नलिखित देश अन्तर्भुक्त हैं । आज के एट्लस के अनुपात से विचार कीजिए * } एशिया का आरम्भदेश अर्थस्थान है । आगे मयसोपोटेमिया, जूड़िया, एशियामाइनर, ईरान, अफगानिस्तान हैं । इतने देश भारतवर्ष से पश्चिम में माने जाते हैं । बर्मा, चीन, श्याम, नाम, कम्बोडिया आदि प्रान्त पूर्व में माने जाते हैं । तिब्बत, तुर्किस्तान, रूस, मँगोलिया आदि भारत से उत्तर में माने जाते हैं । ये सब एशियायी देश ६० अंशात्मक भुखण्ड में अन्तर्भुक्त हैं । हमारे भुवनकोश के अनुपात से इन सत्र का भारतवर्ष में हीं अन्तर्भाव है । इस के अनन्तर प्रशान्त महासागर - किंवा पीत-समुद्र ( यसोली ) से जागे का ६० अंशात्मक प्रदेश भद्राश्ववर्ष है । इस में मंचूरिया, जापान, परूम, अलास्का नाम से प्रसिद्ध अमेरिका का अंशात्मक उत्तरीभाग आदि प्रदेश हैं । यहीं एशियाखण्ड की समाप्ति है । तीसरे ६० अंशात्मक खण्ड की ओर क्रमशः आगे बढ़िए । बूनाइटेडस्टेट अमेरिका ( संयुक्तराष्ट्र अमेरिका ) कनाड़ा, मध्य अमेरिका, मेक्सिको, दक्षिण अमेरिका का पश्चिमी अर्द्ध भाग का शिकभाग, आदि प्रदेश इस तीसरे भूखण्ड में हैं । यही खण्ड ' कुरुवर्ण ' नाम से प्रसिद्ध है । आगे के ६० अंशात्मक चौथे भूखण्ड में-- दक्षिणी अमेरिका का पश्चिमी अर्द्ध भाग का आशिकभाग, ग्रीन-लेन्ड, सम्पूर्ण योरोप, ' सहारा ' नामका सुप्रसिद्ध मरुस्थल, मिश्र, आदि देश हैं । मिश्र के समीप ही मंडिट्र नियेन्सी आगया है । यही हमारे भारतवर्ष की पश्चिम सीमा मानी गई है । मिश्रोपलक्षित मेडिट्टे-नीयेन्सी पर भारतवर्ष केतुमालव की पश्चिमी - पूर्वी सीमाओं का सम्मेलन होरहा है । यह तो हुई दृश्य उत्तरी गोलाद्ध की कथा । अत्र चलिए अदृश्य दक्षिणी गोलाद्ध की ओर । इसमें - दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलेन्ड, दक्षिणध्रुव प्रदेशस्थ अतिसुप्रसिद्ध एन्टार्टिका महाद्वीप आदि प्रदेश हैं । यह कहा जाचुका है कि, जहाँ केतुमालवर्षान्तर्गत सम्पूर्ण गोरोप का नेत्रफल ३८ लाख वर्गमील है, वहाँ ग्रहश्य दक्षिणी गोलार्द्ध के दक्षिणध्रुवसमीपस्थ ' एन्टार्टिक ' द्वीप का क्षेत्रफल ५० लाख वर्गमील है । यद्यपि विद्वा की अपेक्षा दक्षिण - उत्तर दोनों गोलाद्धों का मान ( नाप ) समान है । परन्तु भूप्रदेश की अपेक्षा से यदि विचार किया जाता है, तो उत्तरी गोलार्द्ध में भूभाग अधिक उपलब्ध होता है, एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में जलभाग अधिक उपलब्ध होता है । वर्तमान परिभाण के अनुसार दोनों का [ एक वटा तीन ] सम्बन्ध है । अर्थात् उत्तरी गोलाद्ध के भूभाग की अपेक्षा दक्षिणी गोलार्द्ध ' का भूभाग एक तृतीयांश [ एक तिहाई हिस्सा ] है । यही मानव्यवस्था एशिया, और शेष दृश्य उत्तरी गोलार्द्ध के सम्बन्ध में समझिए 1 दृश्यभाग में एशिया भूप्रदेश इतर भूप्रदेशों की अपेक्षा एक तिहाई है । यद्यपि विभागानुसार भारतवर्ष, और भद्राश्ववर्ष दो वर्ष [ ठीक १८० अंशात्मक दृश्य प्रदेश ] आज।ते हैं । * भावुकतापूर्ण देशविभाजन से एट्लस का यह क्रम भी आज परिवर्तित होगया है । II

पृष्ठ 642

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द्वितीयमध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण शेष दृश्यभाग में कुरुवर्ष, केतुमालवर्ष, ये दो ही वर्ष बचते हैं । फिर भी क्षेत्रफल की अपेक्षा से इनके बर्गमील त्रिगुणित हैं । इस व्यवस्था से बतलाना यही है कि, दृश्य गोलाद्ध का केवल एशिया-स्वण्ड दायविभागकाल में ब्रह्मा के द्वारा देवताओं को मिला था, एवं इतर सम्पूर्ण दृश्य ( सम्पूर्ण केतुमालवर्प एवं कुरुवर्ष ), अदृश्य - दक्षीणी गोलार्द्ध ' असुरों को दायरूप से मिला था । कहना न होगा कि, देवताओं की अपेक्षा असुरों को कहीं अधिक भूभाग मिला था । फिर भी दुष्टबुद्धि असुर उसी स्वेजप्रदेश से आकर आक्रमण किया करते थे । उपर्युक्त निदर्शन से प्रकृत में हमे केवल यही बतलाना है कि, ' भारतीय भुवनकोश ' के अनुसार भारतवर्ष ६.० अंश का है । यह सीमा अरब से आरम्भ होकर चीन समुद्र, किंवा प्रशान्त महासागर पर समाप्त होती है । अरब, मयसोपोटेमिया, जूडिया, एशियामाइनर, ईरान, अफगानिस्तान, तिव्वत, तुर्किस्तान, चीन मँगोलिया, श्याम, बर्मा नाम, कम्बोडिया, आदि सब मिलाकर एक भारतवर्ष है । पश्चिम लोहिताम्बोधि, ( रक्तसमुद्र ) से आरम्भ पूर्वी - पीत-समुद्र पर्यन्त का स पूर्ण प्रदेश एक भारतवर्ष है । तभी तो भगवान् मनु का निम्नलिखित कथन

चरितार्थ होता है-समुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्त पश्चिमात् ।

तयोरेवान्तरं गिरा विदुर्बुधाः ॥

- मनुः २ | २२ | तो फिर क्या कारण हुआ कि, आप प्रश्न करेंगे कि, जत्र भारतवर्ष की पश्चिमी सीमा रेड्सी था, आगे चल कर सिन्धुनद को आवर्त की सीमा मान लिया गया? । “ हिमवत च कुमार्य्याः सिन्धुवैतरिणी नदी । सूय्यंस्योंदयनं पुरः । यावद्वा कृष्णमृगो विचरति, तावद् ब्रह्मवर्चसम् ” उक्त सिद्धान्त के अनुसार सिन्धु को श्राय्र्यावत की सीमा माना गया है । इस का क्या कारण? | इसके उत्तर में हमें आपका ध्यान वारुणब्राह्मणों, एवं ऐन्द्रत्राह्मणों में होने वाली स्पर्द्धा की ओर ही आकर्षित करना पड़ेगा । ऋश्राश्वऋषि के दौहित्र सुप्रसिद्ध पारसी धर्म के प्रवर्तक जरथुस्त्र महाभाग के कारण भारतीय ब्राह्मणों में ' विधवा -- परिणय ' जैसे बारुण प्रश्न को लेकर दो वर्ग होगए । कुछ ब्राह्मणोंनें बाहूलीक ( वर्तमान में ' अलख ' नाम से प्रसिद्ध ) में रहनेवाले वरुण का पक्ष लिया, कुछ ने इन्द्र का श्राश्रय लिया । चारुण ---ब्राह्मणों का कहना था कि, विधवाविवाह में कोई हानि नहीं है । उधर ऐन्द्राह्मण कहते थे कि, “ विवाह में कन्यादान का विधान है । जत्र एकबार मातापिता के द्वारा स्वसत्त्वनिवृत्ति -- परसस्वस्थापनलक्षणा दान-पद्धति से कन्या का दान कर दिया गया, एवं दानोत्तर जब कन्या का कन्यात्त्व नष्ट होचुका, तो - ऐसी अवस्था में प्रथम पति के प्रयाणानन्तर कोन उसका दान करे? । साथ ही कन्याभाव के न रहने से कन्यादान-लक्षण विवाह कैसे सम्भव हो? | इसलिए ' विधवाविवाह ' शब्द ही ग्रङ्गगत है " । इस कलहने श्रागे जाकर बड़ा भीषणरूप धारण किया । इसे शान्त करने के लिए एशियामाइनर के समीपस्थ काश्पीयन्सी पर रहने--वाले कश्यप प्रजापतिने सिन्धुनद को सीमा मानते हुए भारतवर्ष के दो खण्ड कर दिए । ये ही दोनों खण्ड आगे जाकर पूर्वी भारतवर्ष, पश्चिमी भारतवर्ष, नाम से प्रसिद्ध हुए । पूर्वी भारतवर्ष इन्द्र के अधिकार ६०५

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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण में रहा, एवं पश्चिमी भारतवर्ष वरुण की सत्ता में रहा । ऐन्द्रब्राह्मण पूर्वीभारत में रहते हुए वेद-धर्म का अनुपालन करने लगे । एवं वारुणब्राह्मण पश्चिमी भारत में रहते हुए जरथुस्त्र के द्वारा प्रवर्त्तित जन्दाबस्ता ( छन्दोभ्यस्ता ) मूलक नवीन धर्म में दीक्षित हुए । पूर्वी भारत आर्यावर्त्त ' कहलाया, एवं पश्विनी भारत ' आययण ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । यही ' आर्यायण ' शब्द आज ' ईरान ' रूप में परिणत होगया है । अभी इस सम्बन्ध में बहुत कुछ वक्तव्य था । परन्तु विस्तारभय से अधिक न कह कर प्रकररूद्धति के लिए अन्त में केवल यही कह दिया जाता है कि, इस दूध का कारण ब्राह्मणों की प्रतिस्पर्द्धा मात्र थी । सिन्धु के इस ओर का स्थान ' हिन्दुस्थान ' कहलाया एवं सिन्धु के उस पार का स्थान ' बारस्थान ' कहलाया । जत्र पारस्थानरूप ायण में असुरों का आक्रमण हुआ, तो तत्र निवासी कितने हीं मारे गए । जो बचे, उहोनें पूर्वीभारत में ( हिन्दुस्थान में ) आकर शरण ली । वहीं शति आज भी ' पारसी ' नाम से प्रसिद्ध है । यह जाति हमारे भ्रातृभाव से सम्बद्ध है । इसप्रकार हिन्दुस्थान - पारस्थान में भेद होसकता है, परन्तु ' भारतवर्ष ' दोनों को मिला कर एक है । दूसरे शब्दों में आधा ( पूर्वी ) भारतवर्ष आर्यावर्त्त, किंवा हिन्दुस्थान है एवं आधा ( पश्चिमी ) भारतवर्ष ' आययण ', किंवा ' पारस्थान ' है । यद्यपि श्राज केवल ' ईरानमात्र ' को पारस्थान कहा जाता है परन्तु वस्तुतः सिन्धुनद से प्रारम्भ कर लोहितसमुद्र पन्त सम्पूर्ण स्थान ' पारस्थान ' है । रक्तसमुद्र से पूर्व, सिन्धुनद से पश्चिन, अराल एवं काश्पीयन्सी समुद्र से दक्षिण के जितने भी प्रदेश ई - वे सभी पुरातन पाश्चत्यभाषा में आरियस ( Oriens ) नाम से व्यवहुत हुए हैं । यह शब्द प्रत्यक्ष में ' वंश ' शब्द का ही अपभ्रंश प्रतीत होता है । इस से भी पश्चिम भारत को हम श्राय्यों की ही प्रातिस्त्रिक भूमि मान सकते है । वेद में एक पश्चिमवाहिनी नदी ' सर ' नाम से प्रसिद्ध है । ' मार्गियाना ' प्रान्त से नीचे की ओर, एवं हिन्दुकुश के दक्षिण भाग से निकल कर शरोर्विन के पश्चिम भाग से संलग्न होकर यह नदी वह रही है । इस नदी का दक्षिणप्रान्त परियान्त ' नाम से उपवहुत हुआ है । यह भी आवं निवास का ही योतक शब्द है । ' एरियाना ' प्रान्त से पूर्व एवं सुलेमानवत से पश्चिम का श्रान्त पाश्चात्यों के द्वारा ' इण्डिया ' नाम से व्यवहृत हुआ है यह व्यवहार भी इस भूभाग का आवासत्त्व ही प्रमाणित कर रहा है । इधर स्वयं ऋग्वेदने सरयु के इधर के प्रान्त को एवं उस ओर के पश्चिम- प्रान्त को, दोनों को ' आर्य ' शब्द से ही व्यवहृत किया है । देखिए! " उता सव आर्या सरपोरिन्द्रपारतः । अर्णा चित्ररथावधी; " ऋक संहिता - ४ | ३० | १८ त्र्यपिच ब्रह्मपुराण के ५.८ वें, एवं मत्स्यपुराण के ४४ वें अध्याय में भारतीय उद्बोपों का जो वर्णन हुआ लाया गया है, उसे देखते हुए तो यह स्पष्ट ही सिद्ध हो जाता है कि, भारतवर्ष निः-ही अपनी व्याप्ति रखता है । पुराया कहता है--है, इनका जो विस्तार सन्देह ६० अंश पर ६०६

पृष्ठ 644

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मगा

भारतस्यास्य वर्षस्य नव मेदानिमाशय! ।

इन्द्रद्वीपः, कशेरुमांस्ताम्रपर्णो गभस्तिमान् ॥ १ ॥

नागद्वीप - स्तथा सौम्य गान्धर्वस्त्वथ वारुणः ।

अन्तु नमस्तेषां द्वीपः सागरसङ्गमः ॥ २ ॥

पचमत्राह्मण इन द्वीपों का विस्तृत वर्णन करने का प्रकृत में अवसर नहीं हैं । यहाँ केवल उनके नाम, एवं अप्र-भ्रंशो का उल्लेख मात्र कर इस सीमाप्रकरण को उपरत किया जारहा है । जिस समय हम पुराणों में इन्द्रद्वीप, नागद्वीप, सौम्यद्वीप, गान्धर्बद्वीप, आदि भारतीय उपद्वीपों का वर्णन पढ़ते हैं, जिस समय हम इन उपद्वीपों के नामों पर विचार करते हैं, एवं जिस समय हम वर्त्तमान भौगोलिकों के रक्खे हुए इन उपद्वीपों के साथ अपने पौराणिक नामों की तुलना करते हैं, तो हमें आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है । आगे की तालिका से आप देखेंगे कि, वर्त्तमान भूगोल में बतालाए गए उपद्वीपों के नाम हमारे पौराणिक नामों के अप-भ्रंशरूप ही हैं आज भी यह भारतीयोपद्वीपसंघ ' इन्डियन आर्किपैलैगो ' नाम से प्रसिद्ध है । अभी हमारे ' सांस्कृतिक - कोश ' में ऐसे असंख्य प्रमाण हैं, जिन के आधार पर सर्वात्मना यह प्रमाणित किया जासकता है कि, आज का भारतवर्ष हिन्दुस्तान होसकता है, किन्तु परा भारतवर्ष तो पूर्व - पश्चिम समुद्रों को ही अपनी पूर्व - पश्चिम सीमा बना रहा है ।

पृष्ठ 645

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द्वितीयाध्याय उपद्वीपपरिलेख: — पर्याय संख्या नाम इन्द्रद्वीप इन्द्रव म्र नागद्वीप २ सौम्यद्वीप सोमत्रा ३ गान्धर्वद्वीप + वारुणद्वीप ५ + कशेरुमान् कसेरु ६ गभस्तिमान् + ७ ताम्रपर्ण ताम्रपर्णी 15 कुमारी कुमारिका m प्रथमकाण्ड भाषानाम इन्द्रमन निकोवार सुमात्रा किलीपायन द्वीप संघ बोर्निया सेलेबीस मलूका टापूरावेन भारतखण्ड ६०८ पञ्चमत्राह्मण इंगलिशनाम एन्डमन ( कालापानी ) नीकोवर यवद्वीप - बलिद्वीप लुम्बक, मुम्बाफ्लोरीन आदि से युक्त जावा द्वीपसंघ का भी इसी में समावेश है । ब्रुनाई - त्रणी + + सीलोन- सरन् +

पृष्ठ 646

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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण जिस समय देवविभूतिमय भारतवर्ष हमारा था, एशियाखण्ड में त्रैलोक्यव्यवस्था थी, उसी युग से हमारे प्रकृत कथानक का आरम्भ होता है । प्रसङ्गागत देवत्रैलोक्य के सम्बन्ध में हमें भारतीय भूगोल की रूपरेखा आपके सम्मुख प्रस्तुत करनी पड़ी । क्योंकि बिना भारतीय- भुवनकोश - परिचय के दायविभागमूलक प्रकृत आख्यान का समन्वय कथमपि सम्भव नहीं था । इस पाद्मभुवनकोशप्रकरण को उपरत करते हुए सर्वान्त में भारतीय विद्वानों से हम यही विनम्र ग्रानिवेदन कर देना चाहते हैं कि, जबतक आप पुराणसाहित्य का विज्ञानदृष्टि से अवलोकन न करेंगे, तत्रतक भारत की मौलिक संस्कृति की, मौलिक श्रादर्शों की रक्षा कथमपि सम्भव नहीं है । ऊँचे से सिंहासन पर बैठकर धर्मव्याज से अज्ञ - कथावाचकों के द्वारा जत्रतक पुराणकथाएँ होतीं रहेंगीं, तबतक भारत का सांस्कृतिक अभ्युदय असम्भव है । इसलिए भारतीय विद्वानों को शीघ्र से शीघ्र अपने पुराण साहित्य को स्वाध्याय- पथानुवर्त्मा ना हीं लेना चाहिए । संसार के सम्मुख जिस दिन आप पुराण का वास्तविक स्वरूप रख देंगे, उस दिन आर्यसमाजी तो क्या, सम्पूर्ण विश्व का मानवसमाज पुराणशास्त्र का अनन्य भक्त बन जायगा । यदि पने हमारे इस निबेदन की उपेक्षा की, यदि प्रचलित रूढ़ि के अनुसार ही पुराणों की कथा होती रही, तो इस ' कुकथा ' से भारतवर्ष की शेग्भूता संस्कृति का भी अभिभव ही होजायगा । सर्वान्त में यह निवेदन और कर देते हैं कि, हम इ ंग्लिशज्ञान से शून्य होते हुए वर्तमान भूगोल से अपरिचित हैं । ऐसी अवस्था में पूर्व के भूगोल - त्रकरण में यदि कहीं भूल होगई हो, तो हमारी ' अज्ञता ' समझ कर पाठक हमें क्षमा करेंगे । पाद्मभुवनकोश प्रकरण उपरत हुआ । अत्र प्रकृत आख्यान की ओर विज्ञ पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जारहा है । इति - पादमभुवनकोशी ब्राह्मः देवत्रिलोकी से सम्बन्ध रखने वाले पूर्वप्रदर्शित ' पाद्मभुवनकोश ' प्रकरण के सम्यक् अवलोकन से पाठकों को विदित हुआ होगा कि, किसी समय इस भूपिण्ड पर देवता ( मनुष्यदेवता ), और असुर, दोनों का साम्राज्य था । प्रजापति ने इन दोनों के लिए त्रैलोक्य - व्यवस्था नियत कर दी थी । स्वयं प्रजा-पति ' एशियामाइनर ' नाम से प्रसिद्ध स्थान के ' काश्पीएन्सी ' नाम के पर्वत पर निवास करते थे । असुर, और देवता, दोनों पर प्रजापति का पूर्ण अनुग्रह था । सुप्रसिद्ध ' स्वेजप्रदेश ' नामक ' स्थलमार्ग ' के द्वारा ( जहाँ पर कि आगे जाकर ' स्वेजकनाल ' नाम की ' नहर ' बना दी गई है ) अफ्रीका में निवास करने वाले अमुर समय समय पर प्रजापति के दर्शन के ब्याज से देवत्रिलोकी पर आक्रमण करते रहते थे । आरम्भ में देवता अपनी स्वभावसिद्धा सरलता के कारण दुष्टबुद्धि असुरों के आक्रमण की ओर से उदासीन रहे । देवताओं की इस उदासीनता से असुरोंने अनुचित लाभ उठाने के लिए देवत्रिलोकी पर भी अपना अधि-कार स्थापित कर लेना चाहा । फलतः उन्होंने चर्म्मरज्जु से पश्चिम की ओर से भूप्रदेश को स्वसुविधानुसार ( * ) भूक्षेत्र नापने की डोरी पुराकाल में चमड़े की होती थी । जिस चर्मरज्जु से बैलों को बाँधा जाता है, उसीसे जमीन भी नापी जाती थी । श्रतएव भूदेप्रशमानसाधनभूता यह रज्जु वैदिक समय में-' और चर्म्म ' ( बैलों को बाँधने की चमड़े की रस्सा ) नाम से प्रसिद्ध थी । ६०६

पृष्ठ 647

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण नापना आरम्भ कर दिया । जब देवताओं को ये समाचार विदित हुए कि, मुर यथेच्छ भूविभाग करते हुए क्रमश: पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ते हुए आ रहे हैं, तो इन्हें चिन्ता हुई । फलतः यत्राधिष्ठाता विष्णु को आगे कर देवता वहाँ उपस्थित हुए । एवं यज्ञ के व्याज से सम्पूर्ण एशिया में अपना अधिकार स्थापित कर इस अपने त्रैलोक्य से असुरों को चाहिर कर दिया । तभी से देवत्रैलोक्य ' यज्ञभूमि ' - ' देवयजनभूमि ' आदि नामों से प्रसिद्ध हुआ । आरम्भ में जो भुवनकोश ‘ पाद्मभुवनकोश ' नाम से प्रसिद्ध था, आगे जाकर वर्ग विभागानुसार जो भुवनकोश ' वर्षभुवनकोश ' नाम से प्रसिद्ध हुआ था, वही सर्वान्त में देवताओं के इस यज्ञ के सम्बन्ध से ' यज्ञभुत्रनकोश ' नामसे प्रसिद्ध हुआ । प्रकृत कथानक इसी ' यज्ञभुवनकोश ' का निरूपण कर रहा है । ध्यान रहे, असुरों का यह आक्रमण एक ही समय नहीं हुआ था, अपितु समय समय पर इसीप्रकार इनका आक्रमण होता रहता था! कभी देवता अपने बल से ही इहें निकाल देते थे, कभी इन्हें अन्य शक्तियों का आश्रय लेकर अपने त्रैलोक्य को इन याक्रमणों से बचाना पड़ता था । एकचार शुरू - निशुम्भ ने भी इसीप्रकार देवत्रैलोक्य पर अपना अधिकार कर लिया था । जब देवता असमर्थ हो गए, तो सञ्चित शक्तिमूर्ति जगदम्बा के आश्रय से देवता इहें नष्ट करने में समर्थ होसके । स्वयं रहस्यग्रन्थ ( सप्तशती ) ने इस महायुद्ध का विस्तार से निरूपण करते हुए कहा है--त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः । यूगं प्रयात ( १ ) पातालं यदि जीवितुमिच्छथ ॥ सर्वान्त में इसी महामाया के प्रभाव से सम्पूर्ण अमुरबल नष्ट हुआ, जो बचे, उन्होंने स्वत्रैलोक्यरूप पाताल का श्राश्रम लिया । इसी अभिप्राय से आगे जाकर सुरथराजा से ऋषि कहते हैं—

दैत्याश्च देव्या निहते शुम्भे देवरिपौ युधि ।

जगद्विध्वंस के तस्मिन् महोग्रे ऽतुलविक्रमे ॥

निशुम्भे च महावीर शेषाः पातालमाययौ ॥

इसीप्रकार एकबार बत्राङ्गद के वेश्यापुत्र तारक नाम के महाप्रबल असुर ने देवत्रैलोक्य पर अपना अधिकार कर लिया था । कविकुलगुरू कालिदास ने अपने सुप्रसिद्ध ' कुमारसम्भव ' नाम के महाकाव्य में इसी चरित्र का निरूपण किया है । अन्त में पातीनन्दन स्कन्द्र ने सेनानी बनकर इस असुरबल को नष्ट किया था । ( १ ) अदृश्य दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण अफ्रीका है - अमेरिका है । यही एशियावासियों के लिए ' अधो भुवनपातालम् ' इस अमर - परिभाषा के अनुसार ' पाताल ' है । यहीं पूर्वप्रतिपादित पाद्मभुवनकोश के नुसार- ' श्रसुरत्रौका ' था । ६१०

पृष्ठ 648

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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमत्राह्मण 1 इसीप्रकार ' त्रिपुरासुर ' का बुद्ध भी अत्यन्त प्रसिद्ध है । यद्यपि विषयासकि है 1 तथापि देवासुरसंप्रा मानुवन्ध से दो शब्दों में इसका भी दिग्दर्शन करा देना आत्यन्तिक रूपेणा अप्रासङ्गिक न माना जायगा । तः संक्षेप से देवासुर संग्राम से सम्बन्ध रखने वाले कुछ एक आख्यानों का निदर्शन पाठकों के सम्मुख उपस्थित कर दिया जाता है । इससे उन्हें ' वेदों में इतिहास है अथवा नहीं, " इस प्रश्न के सम्बन्ध में विचार करने के लिए पर्याप्त क्षेत्र मिलेगा । सबसे पहिले ' त्रिपुराख्यान ' की ओर ही उनका ध्यान आकर्षित किया जाता है । वैदिककाल में राजागण अपने निवास के लिए तीन तीन पुरों का निर्माण किया करते थे । स्वर्गस्थ देवताओं में, एवं पातालस्थ असुरों में इस पद्धति का विशेष समादर था । ये ' पुर ' ब्राह्मणग्रन्थों में ' उपसन ' नाम से व्य हृत हुए हैं । ब्राह्मणोक्त सुप्रसिद्ध ' उपसद्धोम ' प्रकरण में इन देव - उपदों का विस्तार से निरूपण किया गया है । हाँ, इस सम्बन्ध में यह अवश्य मानना पड़ेगा कि इस त्रिपुर निर्माण की पद्धति सर्वप्रथम असुरों की ओर से ही उपक्रान्त हुई थी । वे ही इस पद्धति के प्रथम आविष्कत्तां थे । जैसा कि पूर्व के भुवनकोश प्रकरण में बतलाया गया है, तत्कालीन असुरजातियों में ' मयासुर ' वंश शिल्प, कला आदि में उच्च शिखर पर पहुँच हुआ था । इसी मयजाति को अलङ्कृत करने वाले त्रिपुर नाम के मयासुर ने सर्वप्रथम त्रिपुर निर्माण किया था । इसी त्रिपुर से असुरगण देवताओं पर समय समय आक्रमणा किया करते थे । ' भूमध्यसागर ' नाम से प्रसिद्ध ' महीसागर ' ( मेडिट्रनीएन्सी ) के समीप ही एक प्रदेश ' मयसोपोटेमिया ' नाम से प्रसिद्ध है । यह शब्द ' मयसोपोत्तम ' शब्द का ही अपभ्रंश है । यहीं मयामुर जाति का निवास होगया था । स्वेजप्रदेश ( वर्त्तमान में स्वेजकनाल ) से आकर मयासुरजातिने इस प्रान्त को अपने अधिकार में कर लिया था । आगे जाकर क्रमश: पूर्वी भारत की ओर बढ़ते हुए इस जाति ने खाण्डवबन को भी अभि-कार में कर लिया था । पूर्वी भारत में जिस प्रदेश में विशेषरूप से मयजाति ने अपना अधिकार स्थापित कर लिया था, वहीं प्रान्त आज ' मेरक ' नाम से प्रसिद्ध है । यह ' मयराष्ट्र ' का अपभ्रंशमात्र ही है । मनजाति में सर्वप्रधान पद एक समय ' वाङ्गद ' नाम के अमुर को मिला था । यह मयजाति का ' वर्गपाल ' ( काफिले का सर्दार ) कहलाता था । इसी बजाजद ने अपने वंश की ' तार ' ( सर्वोच सर्वश्रेष्ठ वंश ' ) संज्ञा रक्खी । इसी तारवंश ने, किंग वचाङ्गदशने एक बार युद्ध में इन्द्र को परास्त कर स्वर्गसीमारूप ' तारस्य ' नाम के पर्वत पर अपना आवासस्थान बनाया था । यही तारस्य पर्वत श्राज ' टारसमाउन्ट ' नाम से प्रसिद्ध है । महीसागर से उत्तर की ओर यह तारस्यगिरि प्रतिष्ठित है । यहीं हमारा सुप्रसिद्ध ' शवतीर्थ ' है । पुराणों में इस तीर्थ का बड़ा माहात्म्य बतलाया गया है । उपयुक्त बाद परम बेश्यागामी था । एक वेश्या से वज्रा-ङ्गद के ‘ तारक ' नाम का महा प्रबल असुर उत्पन्न हुआ था, जिसके शौर्य का ' तस्मिन् विप्रकृताः काले तारकेण दिवौकसः ' इत्यादि रूप से पूर्व में उल्लेख किया जाचुका है । इसी तारकासुर के आगे जाकर विश्वविख्यात विद्युन्माली, तारकात, अम्बुजाक्ष, ये तीन महारपाकमी पुत्र उत्पन्न हुए । इहोंनें भी पितृमय्यांदा का अनुगमन करते हुए देवचल को यथेच्छ दिया । प्रकृत में इस अंशम्परा से हमें केवल यही कहना है कि, एकबार स्वर्ग ( इन्द्रराष्ट्र ) पर अधिकार करने की इच्छा से बज्राङ्गद ६११

पृष्ठ 649

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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण ने अपनी मयजाति को आज्ञा दी कि - ' तुम कोई ऐसे पुर बनाओ, जिनके बल से बड़ी सरलता से देवल को परास्त कर स्वर्गप्रदेश पर अधिकार स्थापित किया जासके ' । फलतः ' त्रिपुर ' नाम के मय ने ( जो कि शिल्पविद्या के साथ साथ ज्यं विपविद्या में भी महा पारङ्गत था ) वज्राङ्गद की उक्त कामना पूरी की । ' तूरपत ' की दक्षिण उपत्यका में त्रिपुर ने लोहमयी पुरी का निर्माण किया, एवं यह लौहपुरी पृथिवीलोकस्था कहलाई । तारपर्वत के शिखर पर सुत्र की पुरी बनाई गई । एवं भूमध्यसागर के पूर्वी तटपर ( जिस प्रदेश को हम अन्तरिक्ष कह सकते हैं ) रजतमयी ( चाँदी की ) पुरी बनाई गई । यह राजती पुरी द्यावाभूमि की सीमा का स्पर्श करने के कारण ' त्रिपुरी ' नाम से प्रसिद्ध हुई । यही स्थान आज भी ' एटलस् ' में ' ट्रिपुली ' नाम से प्रसिद्ध है । यह अवश्य ही ' त्रिपुरी ' शब्द का अपभ्रंश है । यह त्रिपुरी, किंवा ट्रिपली स्थान के अनुपात से ग्रीनवीच से १२ अंश ऊन ३६ अंश पर ( ३५-४८ ) स्थित है, एवं उज्जैन से पश्चिम ३६-५५ देशान्तर पर स्थित है । इन तीनों पुरियों में जो सत्र से अद्भुत चमकार था, वह यह था कि, प्रत्येक पुष्यनक्षत्र में तीनों पुरियाँ एक दूसरी से ऋद्ध होजातीं थीं । ऐसे ही समय में असुरगण इन में बैठ कर देवताओं पर बड़े वेग से आक्रमण किया करते थे । इन तीनों पुरियों के सञ्चालक क्रमशः तारक के विद्युन्माली, तारकाक्ष, अम्बु-जाक्ष नामक तीन पुत्र थे । विद्य न्माली आयसी ( लौहमयी ) पुरी का अध्यक्ष था, राजती का अध्यक्ष अम्बुजाक्ष था, एवं हैमवती का सञ्चालक तारकाक्ष था । जब इस त्रिपुर से देववल अत्यन्त त्रस्त होगया, तो आगे जाकर भगवान् त्र्यम्बक के द्वारा इस त्रिपुरी का नाश हुआ । इन तीनों पुरियों के खण्ड खण्ड कर व्यम्बक ने महीसागर में डालकर, त्रिपुरासुर का सवंश विनाश कर सर्वान्त में इसी महीसागर में युद्धयज्ञसमा तिलक्षण ' अवभृथस्नान ' किया था । त्र्यम्बकस्नान से ही यह प्रदेश पुराणों में ' शवतीर्थ ' ( महादेतीर्थ ) नाम से प्रसिद्ध हुआ । त्रिपुरध्वंस के कारण ही भगवान् शङ्कर - - ' त्रिपुरारि ' नाम से ही प्रसिद्ध हुए । जत्र देवताओंनें देखा कि, असुरगण पुरनिर्माण से अपने बल को हानि पहुँचा रहे हैं, तो तदनुसार उन्होंनें भी तीन पुरों का निर्माण कर इनके बल से आगे जाकर असुरबल का विनाश किया । यही ' देवत्रि-पुरी ' ब्राह्मणग्रन्थों में ' उपसत ' ( उपसीदन्ति यत्र देवाः ) नाम से प्रसिद्ध हुए । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर ब्राह्मणश्रुति कहती है-* " देवाश्च वाऽअसुराश्च - उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे । ततोऽसुरा एषु लोकेषु पुरश्चक्रिरे -अयस्मयीमेवास्मिल्लोके, रजतामन्तरिक्षे, हरिणीं दिवि 1 । तद्वै देवा श्रस्पृ– एवत । तऽएताभिरुपासीदन् । तस्मादुपसदो नाम । ते पुरः प्राभिन्दन् । इमाँल्लोकान्-प्राजयन् " । - शत ० ना ० ३ कां ०।४ अं ०१४ ब्रा ० / ३-४ - कं । * इस आख्यान का अध्यात्म, अधिदैवत, अधिभूत तीनों चरित्रों के साथ सम्बन्ध है । प्रकृत में आधिभौतिक ( ऐतिहासिक ) चरित्र की दृष्टि से ही यह श्रुति उपात्त हुई है । ६१२

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 650 का मूल पृष्ठ
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण इसीप्रकार ' बर | हासुर ' का युद्ध भी वेदों में बड़ा महत्त्व रखता है । आज भारतीय प्रजा को अन्न वस्त्र का जो कष्ट उत्पीड़ित कर रहा है, देवयुग में इस चिन्ता से भारतीय - प्रजा सर्वथा विमुक्त श्री । स्वर्गा-धिपति इन्द्र की ओर से पृथिवी लोक - स्थानीया भारतीय प्रजा के लिए अन्न वस्त्र का प्रबन्ध सुव्यवस्थित था । साथ ही प्रत्येक प्रजा का ( मानवधर्म्मशास्त्रानुसार ) कर्त्तव्य भी देवेन्द्र की ओर मे ही नियत था । चिकित्सा, दस्युपद्रवों से रक्षा, अन्न बस्त्र का प्रबन्ध आदि जीवनरक्षोपयोगी सम्पूर्ण साधनों की व्यवस्था राष्ट्रपति इन्द्र के द्वारा ही सुव्यवस्थित थी । इसप्रकार इन्द्र के द्वारा निर्दिष्ट कर्त्तव्यपथ पर श्रारूढ रहती हुई वर्णाश्र मधर्मानुगामिनी प्रजा ( देवयुग में ) सम्पूर्ण भूतचिन्ताओं से सर्वात्मना उन्मुक्त थी । भारतीय प्रजा के परिपालन के लिए भारतवर्ष में जो अन्न का कोश ( अन्न का गल्ला ) सुरक्षित रहता था, वह ' वाम ' नाम से प्रसिद्ध था । इसके विभाजकाध्यक्ष ( चटवारा करने वालों के सर्दार ) ' बाम-देव ' थे | एवं इस अन्न की रक्षा के लिए पितामह प्रजापति के औरस पुत्र ' ओङ्कार ' नियत थे । ' बसो-धारानगरी ' में यह ' ' अन्नकोश ' सदा प्रभूत मात्रा में विद्यमान रहता था । ओङ्कार की आज्ञा से वामदेव के द्वारा आवश्यकतानुसार भारतीय प्रजा में अन्न वितरण होता रहता था । एक समय ' एमूष ' नाम से प्रसिद्ध वराहासुर [ ने इस ' अन्नकोश ' पर आक्रमण किया । यह वराह- असुर श्रासुरत्रैलोक्य- प्रदेश में सात पर्वतों को अपनी पुरियों का रक्षक बना कर बड़े सुरक्षित अगम्य, अविज्ञेय स्थान में निवास करता था । वसोर्धारा से पश्चिमस्थ इस असुरप्रान्त के मध्य में सात पर्वत आते थे । सातों के आगे क्रमश: २१ पत्थर की पुरियाँ थीं । सबसे अन्त की पुरी में वराह असुर निवास करता था । वसोर्धारा पर श्राक्रमण कर सम्पूर्ण अन्न चुरा-कर वराह अपने सुरक्षित स्थान में जा छिपा । जब ये समाचार विष्णु और इन्द्र को मिले, तो इह्नोंनें पर-स्पर की मन्त्रणा से गुप्तरूप से इस गम्य स्थान का अन्वेषण कर इस असुरवल का विनाश किया । इसी सुप्रसिद्ध आख्यान का निरूपण करती हुई कृष्णश्रुति कहती है-" विष्णु यज्ञो देवेभ्य श्रात्मानमन्तरधात् । तमन्यदेवता नाविदन् । इन्द्रस्त्ववेत् । विष्णरिन्द्रमब्रवीत् को भवानिति? | इन्द्रोऽब्रवीत् - दुर्गाणामसुराणां हन्ताऽहम् । भवान् कः? | विष्णुरब्रवीत् श्रहं दुर्गादाहर्त्तास्मि 1 । त्वं तु दुर्गहन्ताऽसि । इत्यतो वराहमसुरं जहि । स हि वराहो वाममुप ( अन्नमुषः ) एकविंशत्या पुरा पारेऽश्ममयीनां वसति । तस्मिन्नसुराणां वसु वाममस्ति । तत इन्द्रस्ताः पुरमित्वा वराहस्य हृदयमविध्यत् । ततस्तत्र यदासीत्-तद्विष्णुराहरत् " -- तैः सं ० ६ राष्ट | | वराह असुर के प्रासाद में अन्यान्य भोजन सामग्रियों के साथ प्रतिदिन शत ( १०० ) महित्र ( भैंसे ) क्षीरौदन के साथ परिपक्व होते थे । जिस समय विष्णु गुप्तरूप से वराह के दुर्ग में पहुँचे थे, उस समय बराह असुर की माता सेवक वर्ग से भोजन की व्यवस्था करा रही थी । तत्काल विष्णु ने इन्द्र के सहयोग से परोक्षा-कमण ( छापा मार ) कर वराह के द्वारा लाए गए अन्नकोश के साथ साथ यह सम्पूर्ण भोजन - सामग्री भी अपने अधिकार में करली । इसी घटना का निरूपण करती हुई मन्त्रश्रुति कहती है--६१३