Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 651–660

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 651–660

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड “ स्येदु मातुः सवनेषु सद्यो महः पितु पपिवाञ्चार्थन्ना ॥ मुषा यद् विष्णुः पचतं सहीयान् विध्यद्वराहं तिरो अद्रिमस्ता ॥ १ ॥

- ऋ ० १६२ | ७ |

विश्वेत्ता विष्णुराभरत् - उरुक्रमस्त्वेषितः ।

शतं महिषान् क्षीरपाकमोदनं वराहमिन्द्र एमुपम् ॥ २ ॥

- ऋक सं ० ८७७ | १८ || पञ्चमब्राह्मण इसीप्रकार एकबार ' परिणजाति ' की गायों को ' बल ' नाम के असुर ने चुरा लीं थीं । इस सम्बन्ध में भी देवता और असुरों में घोर संग्राम हुआ है । अन्त में इन्द्र के हाथ से बलासुर मारा गया है । तभी से इन्द्र ' चलाराति ' नाम से प्रसिद्ध हुए हैं । इस विजय के उपलक्ष में परियों की ओर मे विपाशा ( श्राजकल ' व्यास ' नाम से प्रसिद्ध ) नदी के निर्गम गिरिप्रदेश में विजयाभिन्दन - महोत्सव सम्पन्न हुआ था । यहाँ अभिगर - प्रतिगर # के द्वारा इन्द्र का बड़ा सम्मान हुआ था । ( देखिए ऋक्सं ० १० भण्डल | १०८०। ) । इसप्रकार समय समय पर देवता, और अमुरों में युद्ध हुआ करते थे । यों तो देवासुरसंग्राम अनन्त हैं । परन्तु ऋग्वेदकाल में १२ महासंग्राम मुख्य माने गए हैं । कृष्णसमुद्र ( ब्लेक्सी ) से पश्चिम ग्रामनिया प्रान्त में, असीरिया प्रान्त में, स्वर्ग में, भूमि में श्रादि तत्तत् स्थानों में १२ महायुद्ध हुए हैं । वे १२ महायुद्ध निम्न लिखित नामों से प्रसिद्ध हैं--द्वादशमहासंग्रामाः--१ - आड़ीबक २ - कोलाहल ५- त्रैपुर ६ - ध्वजयुद्ध ३- हालाहल ४ - जलधिमन्थन ६ - मान्धक ७ -- तारक ८. वात्र १०.. ० -- वलिबन्ध ११ -- हैरण्याच १२- नारसिंह भारतवर्ष के, किंवा देवविभूति के सौभाग्यसूर्य को अस्त करने वाला जो अन्तिम युद्ध हुआ, उसके अनन्तर देवत्रल प्रायः क्रमशः अवनति को ही प्राप्त होता गया । वह युद्ध तिहास ' ताराहरणोपाख्यान ' नाम से प्रसिद्ध है । कहना न होगा कि, आज भी उसी प्रकार रूपान्तर से देववल पर सुबल का आक्रमण होरहा है । उस समय की, एवं आज के समय की परिस्थिति में अनन्तर इतना हीं है कि, उस समय देवत्रल सावधान था, विज्ञान - यज्ञ तप आदि बलों से युक्त था । जबकि आज का भारत वैदिक साहित्य की उपेक्षा करता हुआ अपने उक्त बलों से वञ्चित रहता हुआ पदे पदे पराभूत, एव अपमानित ही होरहा है । * # -- प्रतिष्ठित पुरुष के लिए जो अभिनन्दनपत्र पढ़ा जाता है, उसे वैदिक - परिभाषा में ' अभिगर ' कहा जाता है, एवं उस सत्कृत पुरुष की ओर से पढ़ा जाने वाला उत्तरपत्र ' प्रतिगर ' कहलाता है । १८

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण ' भारतवर्ष विस्मृतप्राय वैदिक साहित्य को अपना कर तद्द्वारा पुनः असुरबल पर विजय प्राप्त करै ' यही मङ्गल कामना करते हुए प्रकृत आख्यान से सम्बन्ध रखने वाले ' आधिभौतिक चरित्र ' को उपरत किया जा रहा है । देवासुर दायविभागसम्बन्धी आधिभौतिकचरित्र उपरत देवासुरदायविभागाख्यानानुगत आध्यात्मिक - समन्वय – ' यथा अण्डे तथा पिण्डे ' इस सिद्धान्त के अनुसार आधिदैविक ब्रह्माण्ड की जो स्थिति है, ठीक वही स्थिति आध्यात्मिक - पिण्ड की समझनी चाहिए । जिसप्रकार अधिदैवत में देवासुर - त्रैलोक्य - व्यवस्था हैं, इसीप्रकार अध्यात्म में भी त्रैलोक्य - व्यवस्था व्यवस्थित है । पूर्वं भाष्य में अनेक बार इस आध्यात्मिक-त्रिलोकी का निरूपण किया जाचुका है, जैसाकि विषयसूची से विदित होगा । अतः इस सम्बन्ध में विशेष कुछ न कह कर प्रकरण - सङ्गति के लिए केवल यही कह देना पर्याप्त होगा कि, हमारे शरीर में हृदय से नीचे का सम्पूर्ण प्रदेश आसुरत्रैलोक्य है, एव हृदय से ऊपर का मस्तक - पर्य्यन्त सम्पूर्ण प्रदेश देवत्रैलोक्य है | यह विभागव्यवस्था हममें १६ वर्ष के अनन्तर ही अभिव्यक्त होती है । १६ वर्ष पन्त सम्पूर्ण अध्या त्मजगत् में केवल असुरों का ही साम्राज्य रहता है । औपनिषद - विज्ञान के परिज्ञाता विद्वान् यह भलीभाँति जानते हैं कि - " इति तु पञ्चम्यामाहुतात्रापः पुरुषवचसो भवन्ति " ( छान्दोग्य उपनिषत् - की पञ्चाग्निविद्या ) इस छन्दोग - सिद्धान्त के अनुसार पुरुष का प्रधान उपादान ' तत्त्व ' ( पानी ) ही है । प्रत्यक्ष में भी हम पानी की ही प्रधानता देखते हैं । बिता के शुक्र, एवं माता के शोणित के समन्वय से ( मिथुनभावरूप याज्ञिक समन्वय से ) ही प्रजोत्पत्ति होती है । शुक्र शोणित, दोनों हीं तरल पदार्थ हैं, अरूप हैं । भार्गव सौम्य पानी को शुक्र कहते एवं यह पुरुष में प्रतिष्ठित है । आङ्गिरस आग्नेय पानी को शोणित कहते हैं, एवं यह स्त्री के गर्भाशय में प्रतिष्ठित है । दूसरे शब्दों में-शुक्र भृगुतत्त्व है, शोणित अङ्गिरातत्त्व है । ' आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् ' इस अथर्व-सिद्धान्त के अनुसार शुक्र - शोणितरूप आध्यात्मिक भृग्वङ्गिरा, दोनों हीं पानी हैं । साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि, पूर्व के आधिभौतिक चरित्र के अनुसार ' आव्यश्रारण ' का ही नाम सुर है । ऐसी अव म्था में यह सिद्ध होजाता है कि, आप्यप्राणमय, अतएव श्रसुरभावप्रधान शुक्र शोणित के समन्वय से उत्पन्न होने वाली प्रजा में आरम्भ में असुरों का ही साम्राज्य रहता है । कम से कम पार्थिवप्रजा में तो अवश्य ही कुछ समय के लिए अध्यात्मसंस्था पर असुरों का ही अधिकार रहता है । कारण स्पष्ट है । ' अद्भ्यः पृथिवी ' इस सिद्धान्त के अनुसार भूपिण्ड का निर्माण पानी से ही हुआ है । यह आपो-पृथिवीप सम्बन्ध से आसुर - प्राणमयी है । यही पार्थिवरस पार्थैिव प्रजा का जीवनीय रस है । देवता की विकासभूमि सूर्य्य है । सम्पूर्ण देवता बुद्धिरूप से अध्यात्मसंस्था में प्रविष्ट होते हैं । बुद्धि की प्रतिष्ठा भूमि ६१५

पृष्ठ 653

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द्वितीयश्रव्याय प्रथमकाण्ड श्रमब्राह्मण ' मन ' है । यह मन पुरुष के १६ वर्ष पर्यन्त अपरिपक्व रहता है । १६ वें वर्ष में पार्थिवसंस्था ( शरीर ) के साथ साथ जब मन पूर्णरूप से परिपक्व हो जाता है, तभी सौरी - बुद्धि को पूर्णरूप से अध्यात्मसस्था में व्यक्त होने का अवसर मिलता है । इससे पहिले प्रत्येक मनुष्य ' बालक ' ही कहलाता है । इस अवस्था में केवल ' मन ' की ही प्रधानता है । जन्मकाल से प्रारम्भ कर १६ वें वर्ष पर्यन्त मन की चञ्चल - वृत्तियों की ही प्रधानता रहती है । इस अवस्था में इस व्यक्ति पर इतर मनुष्य का निग्रह अनुग्रह यथेच्छ होसकता है । क्योंकि मन स्वयं ऋत है । उसमें सत्यलक्षण आत्मनिर्भरता का प्रभाव है । किसी की भी यत्किञ्चित् सी भर्त्सना से भी बालक तत्काल रोपड़ता है । अपने कर्त्तव्य का इस अवस्था में बोध ही नहीं होता । इसलिए इस अवस्था का मुचारू रूप से सञ्चालन करने के लिए किसी अभिभावक की अपेक्षा होती है । दुर्भाग्य से यदि यह अवस्था बालक विना नियन्त्रण के निकाल देता है, तो वह धागे जाकर सर्वथा लक्ष्यच्युत ही होजाता है । इसलिए माता - पिता का यह आवश्यक कर्त्तव्य है कि, जबतक बालक १६ वर्ष का न होजाय नत्रतक-" लालनाद्बहवो दोषास्ताड़ना बहवो गुणाः । अतः शिष्यं च पुत्रं च तादयेनतु लालयेत् " । 1: उक्त सिद्धान्त को लक्ष्य में रखते हुए बालक के ऊपर मधुर शासन करे । अनुचित स्नेह के वशीभूत होकर जो माता - पिता बालक की उपयुक्त अवस्था में उपेक्षा कर देते हैं, आगे जाकर वह बालक प्राप्तवयस्क होता हुआ सर्वथा उन्हें बल एवं श्रमर्थ्यादित बनता हुआ माता - पिता के निरतिशय पश्चात्ताप का ही कारण बन जाता है, जिसका कि प्रत्यक्ष निदर्शन आज भारतवर्ष का प्रत्येक रहस्य बन रहा है । बतलाना इस परिस्थिति से हमें यही था कि, १६ वर्ष से पहिले चालक में बुद्धि - व्यापार नहीं के समान ही है, मन की प्रधानता रहती है । जिसप्रकार बिना सौर प्रकाश के चन्द्रमा स्वकृष्णरूप में परिणत रहता हुआ ब्राह्मणग्रन्थों में ' वृत्रा-सुर ' नाम से प्रसिद्ध है, एवमेव विना बुद्धि के संयोग के मनोरूप चन्द्रमा प्रकाशशून्य रहता हुआ असुरभाव-प्रधान ही रहता है । सोलह वर्ष पर्यन्त समझ ( बुद्धि ) शाती नहीं, समझ नहीं, तो सुतरां नासमझी ( अशान ) का प्रभुत्व सिद्ध होजाता है । अज्ञान से बढ़ कर और प्रबल अमुर कौन होगा? 1 इसी आधार पर हम कह सकते हैं कि, आत्मप्रजापति के दायभागरूप इस शरीर पर १६ वर्ष पर्यन्त असुरों का ही प्रभुत्व रहता है । आगे जाकर क्या होता है? यह भी सुन लीजिए । हृदय में शनाया के अधिष्ठाता प्रादेशमित विष्णुदेवता प्रतिष्ठित हैं । हृदय से नीचे पार्थिव प्राण की ( अपान की ) प्रधानता है, हृदय से ऊपर सौरप्राण की ( प्राण की ) प्रधानता है । हृदयस्थ वामन विष्णु स्य शनाया ( भूख ) से अनाकर्षण कर तदूरस से दोनों का पालन करते रहते हैं । विष्णुदेवता के इसी पालनधर्म को लक्ष्य में रखकर उपनिषन्द्र ति कहती है-६५६

पृष्ठ 654

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण

ऊर्ध्वं प्राणमुन्नति, अपानं प्रत्यगस्वति ।

मध्ये वामनमासीनं सर्वे देवा उपासते ॥

— - कठोपनिषदि पञ्चमत्राह्मण ' अन्नमयं हि सोम्य! मनः ' इस सिद्धान्त के अनुसार मन का उपादान अन्नरस ( सोम ) है । इसी से क्रमश: मन की पुष्टि होती है । अन्न का आगमन श्रशनायासूत्र ( बुभुक्षा ) पर निर्भर है । यदि भूख न लगे, तो अन्नागमन असम्भव होजाय । शनायासूत्र के सञ्चालक हृदयस्थ विष्णुदेवता हीं हैं । इह्रीं की कृपा से शारीराग्नि में अन्नाहुति होता है । श्रन्नाहुतिरूप यज्ञ के सम्बन्ध से ही ' यज्ञो वै विष्णुः - विष्णुर्वै यज्ञः " इत्यादि रूपसे विष्णु को ' यज्ञ ' कहा जाता है । इस वैष्णव यज्ञ का परिणाम यह होता कि, अन्नरस के क्रमिक श्रागमन से मन क्रम क्रमशः सबल होता जाता है । आगे जाकर १६ वें वर्ष में अन्नरसागमन से जब मन अपना पूर्ण स्वरूप प्राप्त कर लेता है, तो तत्काल सौर बुद्धिभाव का उदय होजाता है । अज्ञानमूर्ति असुरों का एकछत्र शासन उट जाता है | शरीर में देवताओं का भी प्रभुत्त्व हो जाता है । इसी अवस्था में उत्तमाङ्ग - श्रधमाङ्ग विभागों का विकास होता है । १६ वर्ष से नीचे मनुष्य को मानव - सभ्यता की उत्तमता, अधमता का अनुभव नहीं होता । १६ वर्ष के अनन्तर ही उसे " अयं साधुः, श्रयमसाधुः " यह विवेक होता है । इसप्रकार विष्णु-देवता यज्ञ के व्याज से अध्यात्मसंस्था के दो विभाग कर देते हैं । इन विभागों की सीमा पूर्व कथनानुसार हृदय ही है । और आध्यात्मिक देवासुर- दायविभागानुबन्धी तथ्य की यही संक्षिप्त स्वरूपदिशा है । ६१७

पृष्ठ 655

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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड देवत्रिकी - द्यौ: शिर: -कण्ठ: -अन्तरिक्षम हृदयम् - पृथिवी सुरत्रिलोकी मूलस्थानम् - द्यौ: नाभिः --- अन्तरिक्षम - प्रथिवी हृदयम—-३ शिरः २ कण्ठ: -- उत्तमाङ्गम् - देवप्रधानम्, -हृदयम् -पश्चमब्राह्मण नाभिः व्यधमाङ्गम् श्रासुरप्रधानम् मूलम् ६१८

पृष्ठ 656

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द्वितीयध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण देवासुरदार्थविगाख्यानानुगत - आधिदैविकचरित्र का समन्वय --सूचीकटाहन्याय से आख्यान के आधिभौतिक ( ऐतिहासिक ), एवं आध्यात्मिक चरित्रों का दिग्दर्शन करा दिया गया । श्रच क्रमप्राप्त आधिदैविक रहस्य की ओर ही विज्ञ पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है | सृष्टि के आरम्भ - काल में देवता, और अमुर, दोनों का इस भूपिएड पर समानाधिकार न था । आरम्भ में सम्पूर्ण पृथिवी - मण्डल पर असुरों का ही साम्राज्य था । जबतक भूपिएड एकमात्र अमुरों के अधिकार में ही रहा, तबतक वह सर्वथा यशिय रहा । आगे जाकर देवताओंने विष्णु की सहायता से इसे यज्ञिय प्रदेश बना । विष्णु के द्वारा भूपिएड का जो प्रदेश ' यज्ञिय ' बन गया, वही स्थान जागे जाकर ' वेद ' नाम से प्रसद्ध हुआ । साथ ही वेदिरूप इस यज्ञप्रधान भूप्रदेश से असुरों का आधिपत्य सदा के लिए हट गया । देवताओं निर्विघ्न इस प्रदेश पर ' यज्ञवितान ' किया । तद्द्वारा पार्थिव प्राणदेवताओंने अमृतमयी स्वर्गप्रतिष्ठा प्राप्त की | सृष्टि के आरम्भ में उक्त चरित्र हुआ था, एवं जत्रतक पार्थिव - सम्वत्सर स्वस्वरूप के प्रतिष्ठि रहेगा, तबतक इसी प्रकार ' देवयज्ञ ' वितत होता रहेगा । इस ग्राभिदै वेक- चरित्र में भूपिण्ड - गायत्री - त्रिष्टुप - जगती छन्द - विष्णु - देवता, इतने ज्ञातव्य विषय हैं । इन पदार्थों के स्वरूप - समन्वय से उक्त चरित्र का वैज्ञानिक भाव सर्वात्मना गतार्थ होजाता है । इन सत्र पदार्थों की मूलप्रतिष्ठा भूपिएड है । अतः सर्वप्रथम उसी के स्वरूप का दिग्दर्शन कराया जाता है । ' अद्भ्यः पृथिव. ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार पानी से भूपिण्ड का स्वरूप - निर्माण हुआ है । पानी हीं वायु के सम्बन्ध से क्रमशः आपः - केन- मृत - सिकता- शर्करा - अश्मा अय- हिरण्य इन आठ अबस्थाओं में परिणत होकर भूविण्ड का स्वरूप- समर्पक बन गया है । जिसप्रकार देवप्रारण अग्निप्रधान है, उसी प्रकार असुर प्रारण अब प्रधान है । प्राण को ही असुर माना जाता है । कारण स्पष्ट है । ' असु राति-ददाति ' के अनुसार चलाधायक प्राण ही असुर है । बल का प्रवर्त्त के प्राण ही अर है । वह प्राण ' आषोमयः प्राणः ' के अनुसार आध्यप्राण ही है । जबतक भूपिण्ड में पूर्ण घनता नहीं जाती, तबतक इस में अग्नि उक्थरूप से प्रतिष्ठित नहीं होता । अग्नि सत्य तत्त्व है । महृदय - सशरीरी भाव ही सत्यभाव है | सर्वात्मना पिण्ड ( शरीर ) निर्माण होने के अनन्तर ही भूपिण्ड में हृदयभाव उत्पन्न होता है । हृदयोत्पत्ति के अनन्तर ही वहाँ ' सत्याग्नि ' को प्रतिष्ठित होने का अवसर मिलता है । पिण्डनिर्माणकाल में पृथिवी सर्वथा काल्वा-लीकृता ( कर्तुम से व्याप्त ) काढा - कीच से युक्त ही रहती है । एवं इस अवस्था में सर्वात्मना पानी की ही प्रधानता रहती है । ग्रग्नितत्त्व प्रायः सर्वथा प्रतिष्ठित रहता है । पानी की प्रधानता से काल्वालीकृता ८ वी पर श्राप्यप्राणमूर्ति अमुर्गे का ही ( उस अवस्था में ) श्राधिपत्य रहता है । भूषिएड की इस प्राप्य -प्राण - प्रधाना अवस्था को लक्ष्य में रख कर ही “ श्रस्माकमेवेदं खलु भुवनम् ' यह कहा गया है । " गुणदोषमयं सर्व सृजति कौतुकी " इस सिद्धान्त के अनुसार विश्वरचना में गुण - दोष, दोनों भावों का योग रहता है । यही नहीं, अपितु विश्वरचना के सम्यक् निरीक्षण से यह स्पष्ट प्रतीत होजाता है कि, विश्व में गुणभाव गौण है, एवं दोषों की ही प्रधानता है । कारण यही है कि, सृष्टि तमोमूला है । ' तम ' स्वयं एक ' महादोष ' है । ऐसी अवस्था में तमःप्रधान विश्व को दोष - प्रधान मानना युक्तियुक्त ही प्रतीत होता है । विश्वव्यापिनी गुण - दोष - विभूति ही शास्त्र में क्रमशः दैवीसम्पत्ति, श्रसुरीसम्पत्ति, ६१६

पृष्ठ 657

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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण नामों से व्यवहृत हुई है । सम्पूर्ण विश्व गुरण दोप की प्रतिस्पर्द्धामात्र है । कहीं गुणभाव का विजय है, परन्तु क्वाचित्क । कहीं दोषभाव का साम्राज्य है, किन्तु श्रायः सर्वत्र । गुणदोष की प्रतिस्पर्द्धा क्या है, देवासुर संग्राम ही है । जिस विश्व में उक्त देवामुरमसंग्राम होरहा है, वह विश्व स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य - चन्द्रमा -- पृथिवी-इन पाँच भागों में विभक्त है । पाँचों पत्रों में देवता ( गुगविभूति ), एवं असुर ( दोषत्रिभूति ), दोनों प्रतिष्ठित रहते हैं । सत्र से पहिले इन पाँचों विश्वपत्रों की गुणविभूति को ही लीजिए । स्वयम्भू की गुण--त्रिभूति ऋषि है, परमेष्ठी की गुणविभूति पितर है, सूर्य की गुणविभूति है, चन्द्रमा की विभूतिगन्धर्व है, एवं पृथिवी की गुणविभूति मनुष्य है । वे पाँचों हीं प्राणरूप है । जिस प्राणी में जिस प्राण की प्रधानता रहती है, दूसरे शब्दों में जिस प्राणी में जो प्राण विकसित रहता है, वह प्राणी भूलांक में उसी नाम से व्यवहृत होता है । निष्कर्ष यही हुआ कि, स्वयम्भू के प्राणदेवता ऋषि हैं, परमेष्ठी के प्राणदेवता पितर हैं, सूर्य के प्राणदेवता देव हैं, चन्द्रमा के प्राणदेवता गन्धर्व हैं, एवं पृथिवी के प्राणदेवता मनुष्य ( वैश्वानरप्राण ) हैं । यह तो हुआ पाँचों वर्षों की दिव्यविभूति का दिग्दर्शन । अत्र चलिए आसुरी -विभूति की ओर । स्वयम्भू की आसुरी त्रिभूति ' बल ' है । स्वायम्भुव असुरप्राग ' बल ' नाम से प्रसिद्ध है । ज्ञानमूर्त्ति इन्द्र इस चलग्रन्थि के विघातक हैं, अतएव इन्द्र को ' बलाराति ' ( बल का शत्रु ) कहा जाता है । पारमेष्ठ्य असुर-प्राण ' अनिरुक्त तम ' नाम से प्रसिद्ध है, सौर असुरप्राण ' नमुचि ' कहलाता है, चान्द्र असुर प्राण ' वृत्र ' नाम से प्रसिद्ध है, एवं पार्थिव अमुरप्राण ' सैंहिकेय ' नाम से व्यवहृत हुआ है । ज्योति प्रकाश है, तम ग्रन्धकार है । देवता और असुर, दोनों का सामान्य लक्षण ज्योति, एवं तम पर ही निर्भर है । ज्योतिर्भाग देवता है, एवं तमो भाग अमुर है । यह ज्योतिस्तत्त्व ज्ञानज्योति, ज्योति, स्वज्योति, परज्योति, रूपज्योति, भेट से पांच भागों में विभक्त है । ज्ञानज्योति का स्वाय-भुत्र ऋपिप्राण से, अज्योति का पारमेष्ठ्य पितरप्राण से, स्वज्योति का सौर देवप्राण से, परज्योति का चान्द्र गन्धर्व [ सौम्य ] प्राण से, एवं रूपज्योति का पार्थिव मनुष्यप्राण से सम्बन्ध है । अव्यक्त स्वयम्भू ज्ञानज्योतिर्मय है, अतएव वहाँ असुरों की प्रधानता नहीं रहती । परमेष्ठी वायुरूप होने से यद्यपि ज्योति है, परन्तु सौर दर्शपूर्णमास के कारण परमेष्ठी में परज्योति का भी उदय हो जाता है | परमेष्ठी स्वस्वरूप से अनिरुक्त तमोरूप है । इसके चारों और सूर्य परिक्रमा करता है । सूर्य की परिक्रमा से परमेष्टी का जो भाग प्रकाशित होजाता है, वही भाग अध्यात्म भाषा में ' सत्त्व महान ' कहलाता है | अप्रकाशित भाग तमोमहान, एवं सान्ध्यभाग रजोमहान कहलाता है । स्वयम्भू अव्यक्त है, परमेष्ठी महान है । सूर्य्य- परिक्रमाकृत तमः, प्रकाश के तारतम्य से ही परमेष्ठी महान में सत्त्वरजस्तमो भेद से वैगुण्य का उदय होजाता है । जो भाग सत्त्वप्रधान है, उसमें ' पितर ' जागा का साम्राज्य है । जो भाग अप्रकाशित है, उसमें अनिरुक्त तमोरूप असुरप्रारण की प्रधानता है । एवं सन्धिगत प्राण ' गन्धर्व ' नाम से प्रसिद्ध है | निम्नलिखित रेखाचित्र से त्रिगुणात्मक, आकृति - प्रकृति - श्रहङ्क तिरूप तम- रजः सत्त्वानु– बन्धी महान् का स्वरूप सर्वात्मना व्यक्त होरहा है । ६२०

पृष्ठ 658

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महानात्मविवर्त्तत्रयी- स्वरूप परिलेख: -चिदात्मा दितिः -परमेडी ( श्रद्ध ) मण्डलम् ' पृ ० सं ० ६२० से ६२१ के मध्य में ] श्राकृति- महानू ( तमः ) प्रकृति- महान ( रजः ) हङकृति - महान् ( सत्वम् ) श्रदितिः - श्रद्ध मण्डलम् ( पृथिवी ) शान्तात्मास्वयम्भूः मण्डलम् ) श्रद्ध - ( परमेष्टी अदितिः * विज्ञानात्मासस्यः महानात्मा परमेत्री प्रज्ञानात्मा चन्द्रमाः भूतात्मा पृथिवी मण्डलम् द्ध --दितिः ) पृथिवी (

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द्वितीयाध्याय शतपथब्राहाण पञ्चमब्राह्मण तीसरा है सूर्य्यं । सूर्य स्वज्योतिर्मय है । अतएव सौरमण्डल में तमोमय असुरों का प्रवेश सर्वथा निषिद्ध है । यहाँ सदा ज्योतिर्म्मय ( ज्ञानज्यो त गर्भित भूतज्योतिर्मय ) देवताओ का ही साम्राज्य रहता है । हाँ वृष्टि के उपक्रमकाल मे मेघगत नमुचि प्राण अवश्य ही थोड़ी देर के लिए अन्तरिक्ष में अपना प्रभुत्त्व स्थापित कर लेता है । परन्तु थोड़े ही समय में सौर इन्द्र रश्मिरूप वज्र से मेघगत अमुचिका शिरच्छेद कर देते हैं । जो नमुचि पानी का अवरोध कर प्रजा का उत्पीड़न कर रहा था, वह नष्ट हो जाता है, वृष्टि होने लगती है । असुरविनाश से प्रजा में पूर्ण शान्ति होजाती है । चौथा चन्द्रमा है । जो स्थिति परमेष्ठी की है, वही इसकी है । सूर्यप्रकाश से प्रकाशित चन्द्रभाग देवमय है, इसका पृष्ठभाग वृत्रासुरमव है, एवं सान्ध्यभाग गन्वर्थ धान है । पाँचवाँ है भूपिण्ड । यह केवल रूपज्योतिर्म्मय है । अतएव आरम्भ में इसमें असुरों का ही साम्राज्य मानना पड़ता है । भूषिण्ड भूतप्रधान है । यहाँ आवरण की पराकाष्ठा है, प्रकाश सर्वथा पराभूत हो रहा है । " जिस समय भूपिण्ड बनकर सम्पन्न हुआ होगा, उस समय - [ जबकि सौर प्रकाश का भी भूपिएड के साथ सम्बन्ध नहीं हुआ था ] इस पर प्राण - प्रधान तमो-मय असुरों का ही माम्राज्य रहा होगा " यह मान लेना युक्तिसङ्गत ही प्रतीत होत । है । भूपिण्ड की उसी प्रारम्भिक स्थिति को लक्ष्य में रखकर ब्राह्मणश्रति ने कहा है- " अथाहासुरा मेनिरे-- अस्माकमेवेदं खलुभुचनमिति । ” पूर्वं दिग्दर्शन से यह भलीभांति सिद्ध हो जाता है कि, रूपज्योतिर्मय भूपिण्ड स्वस्वरूप से सर्वथा कृष्ण है । जत्रतक सौर सम्वत्सरयज्ञ का इसके साथ सम्बन्ध नहीं होता, तत्रतक सम्पूर्ण भुवन असुरों के ही ( तम के ही ) अधिकार में रहता है । स्रष्टा - पोडशी प्रजापतिः विश्वपर्वाणि देवभावाः असुरभावाः ज्योतींषि: तमोभावाः १ स्वयम्भूः ऋषयः बलाख्याः ज्ञानज्योतिः बलावरणम् २ परमेष्ठी पितरः अनिरुक्त ' तमः ज्योतिः निरुक्त ं तमः ३ सूर्यः देवाः नमुचिः स्वज्योतिः X ४ चन्द्रमाः गन्धर्वाः वृत्रः परज्योतिः कृष्णपक्षान्धकारः ५ पृथिवी मनुष्याः सैंहिकेयः रूपज्योतिः रात्रेस्तमः " गुणदेोपमयं सर्वे स्रष्टा सृजति कौतुकी "

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमत्राह्मण आगे जाकर ' वामन विष्णु ' की सहायता से देवता पृथिवी पर आते हैं, एवं यज्ञोपयुक्त प्रदेश पर अपना अधिकार स्थापित कर लेते हैं । प्रकृत कथानक से ऐसा प्रतीत होता है कि, यदि विष्णुदेवता अन्य देवताओं के अग्रणी न बनते, तो देवता अपना दायभाग लेने में सर्वथा असमर्थ ही रहते । देवताओं नें कहा क्या?, ' नूपिएड के जितने प्रदेश में विष्णु देवता व्याप्त हो जॉय, वह भूप्रदेश हमारा, शेव तुम्हारा ' । असुरोंनें इस देवकामना को स्वीकार कर लिया । फलतः देवताओंने पूर्व की ओर विष्णु को प्रतिष्ठित कर चारों ओर से इसे छन्दों से वेष्टित कर दिया । छन्दोऽवच्छिन्न विष्णु जितने प्रदेश में व्याप्त हुए, देवताओंने उस प्रदेश को अपने अधिकार में कर लिया । " यज्ञो वै विष्णुः " ) तां ० ब्रा ० ६/६ । १० ) - " विष्णु यज्ञ: " ( ऐ ० १।१५ ) इत्यादी श्रुतियाँ यज्ञ, और विष्णु को अभिन्नार्थक ही मान रहीं हैं । उधर - " अग्निर्वै यज्ञमुखम ' ( तै ० ब्रा ० १६।८ ) - एप हि यज्ञस्य सुक्रतुर्यदग्निः " ( शत ० १२४ | १ | ५ ) - " अग्निचै योनिर्यज्ञस्य " ( शत ० ११–५ | २ | ११-१४ । -" अग्निरु वै यज्ञः ” ( शत ०५ / २ / ३ / ६ ) इत्यादि श्रुतियाँ अग्नि को ही यज्ञ की मूलप्रतिष्ठा बतला रहीं हैं । " आहुतिर्हि यज्ञः " ( शत २०१०४ १ ) से आहुति प्रक्रिया को ही ' यज्ञ ' माना जारहा है । इन सत्र श्रौत बचनों के समन्वय से हम यज्ञ के " अग्नौ सोमाहुतिर्यज्ञः " इस लक्षण पर विश्राम करते हैं । अग्नि अन्नाद है, सोम अन्न है । अन्नाद अग्नि में अन्न सोम की आहुति होने से अन्न, और अन्नाद का रासायनिक मिश्रण होता है । दोनों हीं पूर्व - रूप छोड़ते हुए किसी तीसरे अपूर्व - स्वरूप में परिगात हो जाते हैं । श्रन्नादान्न के मिश्रण से उत्पन्न यह अपूर्व पदार्थ ही ' यज्ञ ' कहलाता है । अन्नादान्न की सम्मिश्रण प्रक्रिया ही यज्ञपदार्थ है । अतएव ' तानस्यात्ताच्छच्द्यम् ' इस न्याय से यह आहुति - प्रक्रिया भी ' यज्ञ ' कहलाने लगती है । अतएव आहुतिकाल में ' ' क्या हो रहा है '? इस प्रश्न के उत्तर में ' यज्ञ होरहा है ' यह व्यवहार देखा जाता है | दाहक पदार्थ अग्नि है, एवं दाह्य पदार्थ सोम है । ' सूयते इति सोमः | यह तत्त्व ग्राहुत होने से ही सोम नाम से प्रसिद्ध है । यद्यपि सोमवल्ली से निकलने वाला रसविशेष भी सोम है, किन्तु व्यापक लक्षण के अनुसार अन्नादाग्नि में आहुत होने वाले पदार्थ मात्र ' सोम ' शब्द से व्यवहृत किए जासकते हैं । इध्म - घृत - तिल - मो. रस आदि सभी सोम हैं । अग्नि और सोम का समन्वितरूप ही यज्ञ है । तव जहाँ यज्ञविष्णु को अग्नि कहा जाता है, वहाँ - " यत्तदन्नमेव स विष्णुर्देवता " ( शत १२२११२११ - " सोमो वैष्णवो राजा ” ( शत ० १३ ४ | ३ | दा ) - " यो वै विष्णुः सोमः सः " ( शत ० ३३/४/२ ) इत्यादिरूप से यज्ञात्मक विष्णु को ' सोम ' शब्द से भी व्यवहृत किया गया है । अग्नि - सोममय यज्ञमूर्ति विष्णु की प्रथम विकास --भूमि सूर्य्य ही है । सूर्य दाहक सावित्राग्निमय है । रोडसी - ब्रह्माण्ड में सर्वप्रथम इसी सौर अग्निमय, अतएव ' हिरण्यगर्भ ' नाम से प्रसिद्ध ' धामनिधि ' का ही प्रादुर्भाव होता है, जैसा कि ' हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे ' इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है ' सूर्यो हवा अग्निहोत्रम् " ( शत ० २ | २ | ५ | १ | ) यह वचन भी सूर्य्यं को ही पहिला अग्निहोत्र तला रहा है । यह सौरयज्ञ मनुष्योतिर्मय है । यहाँ ( सौर मण्डल में, किंवा यज्ञरूप विष्णुमण्डल में ) कभी तम का प्रवेश नहीं होता, अतएव पुराण भाषा में इस सौर विष्णु को ' श्वेतद्वीपनिवासी सत्यनारायण भगवान ' कहा जाता है | सौर अग्नि ' सत्य ' है - ( देखिए शत ० ४ १ २ २२ ) । यह सत्याग्निपिएड ( सूर्य ६२२