Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 661–670

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 661–670

पृष्ठ 661

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 661 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण विम्ब ) पोमय परमेष्ठी - मण्डल में प्रतिष्ठित है । सत्य सूर्य के चारों ओर व्याप्त रहने वाले इसी समुद्र को लक्ष्य में रख कर मन्त्रश्रुति कहती है -अग्ने दिवा अर्णमच्छा जिगास्यच्छा देवां ऊचिषे धिष्ण्या ये । या रोचने परस्तात्सूर्यस्य याचा वस्तादुपतिष्ठन्त श्रापः ॥ - ऋक्सं ० ३।२२।३ । ' नारदप्राण ' से उत्पन्न होने के कारण हीं पानी को ' नार ' कहा जाता है । यही सूर्य का ' अयन ' ( प्रतिष्ठा भूमि ) है । अतएव सूर्य को ' सत्यनारायण ' कहना सर्वथा अनुरूप होता है । कहना यही है कि, यज्ञविष्णुओं में प्रथम विष्णु, दूसरे शब्दों में प्रथम यज्ञ सूय्यं ही है । इसी सूर्यविष्णु को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है — " स यः स विष्णुर्यज्ञः सः । स यः स यज्ञः - असौ स आदित्यः " ( शत १४ | १ | ११६ | " चित्रं देवानामुद्गात् " इत्यादि मन्त्रानुसार सूर्य देववन है । सूर्य्य की प्रत्येक रश्मि देव-प्राणमयी है | रश्मिगत सम्पुर्ण प्राणदेवता सत्यसूर्य के केन्द्र से आबद्ध हैं । अतएव इन के लिए " सत्य-संहिता नै देवाः ” यह कहा जाता है । दिग्विभाग के अनुसार प्राची - ( पूर्वा ) - दिक् देवताओं की है । दूसरे शब्दों में सौरविष्णु पूर्वाधिक के अधिष्ठाता हैं । श्रारम्भ में ये सूर्य्यमूर्ति विष्णु यद्यपि प्राचीदिक में ह्रीं प्रतिष्ठित थे । परन्तु आगे जाकर छन्दों के आवरण से ये यज्ञविष्णु चारों दिशाओं में व्याप्त होते हुए भूपिण्ड पर प्रतिष्ठि होजाते हैं । यज्ञरूप सूर्यविष्णु प्राचीदिक में प्रतिष्ठित है, इसी नित्यसिद्धा स्थिति को लक्ष्य में रख कर ' ते प्राञ्च विष्णुं निपाद्य ' यह कहा गया है । यज्ञ में स्वयं गति नहीं है । दूसरे शब्दों में- यज्ञमूर्ति सुय्र्यविम्ब स्वस्थान में सर्ववा विचाली है । रश्मियों में रहने वाले प्राणमूर्ति, अतएव गतिधर्म्मा देवताओंों के व्यापार से ही सौरयज्ञ का चारों दिशाओं में वितान होता है । दूसरे शब्दों में- सौर अग्नि प्राणदेवताओं के स्वरूप में परिणत होकर ही सम्वत्सर – स्वरूप का अधिष्ठाता बनता हुआ सर्वत्र व्याप्त होता है । स्वयं अग्निमूर्ति विष्णु में गति नहीं है, गति है देवताओं में | इसी रहस् य को लक्ष्य में रख कर - देवताओं नें विष्णु को प्राची दिक में व्याप्त ( पसार ) कर उसे छन्दों से वेष्टित कर लिया " यह कहा गया है । अग्नि में बहुत सोम अग्निरूप में परिणत होजाता है । फलतः सोम की स्वतन्त्र सत्ता का उच्छेद होजाता है । अतएव हम इस अग्नीषोमात्मक विष्णु को आगे जाकर ' अग्नि ' नाम से ही व्यवहृत करेंगे । इस अग्नि की ( विष्णु की ) प्राची, प्रतीची, दक्षिणा, उदकू भेट से चार अवस्थाएँ होजाती हैं । इसी आधार पर — “ चतुर्द्धा त्रिहितो ह वा अग्रे अग्निरास ” यह कहा गया है | इस अनुगमवचन के अनेक अर्थ होते हैं, जैसा कि पूर्णप्रकरणों में विस्तार से बतलाया जाचुका है । ६२३

पृष्ठ 662

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 662 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पचमत्राह्मण उपर्युक्त निगम के अनुसार मौलिक अग्नि चार भागों में विभक्त है वे चारों अग्नि, किंवा एक ही अग्नि की चार अवस्थाएँ क्रमशः ब्रह्माग्नि, अङ्गिरोऽग्नि, अन्नादाग्नि, पाशुकाग्नि, इन नामों से प्रसिद्ध है । स्वायम्भुव वेदाग्नि ' ब्रद्माग्नि ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी के लिए — ' तस्य वा एतस्याग्नेर्भागेोपनिपत् ' ( शत ० १० ५ । १ । १ ) यह कहा जाता है, एवं यही अग्नि ' पुरुष ' ( यजुः पुरुष ) कहलाता है । ऋक्समुद्र को को ' महोक्थ ' कहा जाता है । सामसमुद्र को ' महावत ' काह जाता है । एवं यजुः । ' पुरुष ' कहा जाता है । यही ' गरज ' है । याज्ञिक परिभाषा में इसी को ' सार्वयाजुपान्नि ' कहा गया है । इसी वागग्नि ( स्वायम्भुद यजुरग्नि से ) सर्वप्रथम आपोमय परमेष्टी का जन्म होता है । इसी के लिए " सोऽपो-ऽसृजत, वाच एवं लोकान । बांगेव साऽसृज्यत । " ( शत ० ६ | १ | ११६. २ ) यह कहा गया है । इसी सर्व-मूलभूत प्रतिष्ठाग्निमयी वेदमयी वाकू के लिए – “ अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा त्वयम्भुवा ' यह वचन प्रसिद्ध है । दूसरा है सिरोऽग्नि । इसी को परमेष्ठी के समन्वय से ' सुत्रह्माग्नि ' एवं ' ऋताग्नि ' नाम से ब्यवहृत कियाजाता है । ऋतमूर्ति यही अङ्गिरोऽग्नि ने जाकर ( सूर्य्य में ) सत्याग्निरूप में परिणत होकर ' अन्नादाग्नि ' नाम से प्रसिद्ध होता है । अपोमय परमेष्ठी से सर्वत्र ऋतरूप से व्याप्त रहने वाला अथर्वदेदमूर्त्ति यह ऋताग्नि ही अङ्गिरोऽग्नि है । तीसरा अन्नादाग्नि है । सौर अग्नि ही ' अन्नादाग्नि ' है । बहुत पदार्थों को अपने उदर में हुत कर लेना इसी अग्नि का कार्य्य है । इसी अन्नादानभाव की प्रधानता से इसे ' अन्नादाग्नि ' कहा जाता है । इसी को ' यज्ञाग्नि ' - ' छन्दस्याग्नि ' - ' सत्याग्नि ' आदि विवध नामों से व्यवहृत किया गया है । यह अग्नि पारमेष्ठ्थ अङ्गिरोऽग्नि की ही मंकुचितावस्था है ।. पोमय परमेष्ठी में जो अग्नि ऋत ( परमाणु ) रूप से इतस्ततः चारों ओर व्याप्त रहता है, वहीं वायु की प्रेरणा से एक नियत केन्द्र में प्रतिष्ठित होता हुआ कालान्तर में सूर्य्यपिण्डरूप में परिणत होजाता है । पिण्डावस्थापन्न अङ्गिरोऽग्नि हीं ' अन्नाद ' नाम से व्यवहृत होता है । अङ्गिरोऽग्नि ऋतप्रधान होने से केन्द्र - शून्य है । अत: उस में शनाया ( बुभुक्षा ) का अभाव है । परन्तु अन्नादाग्नि सकेन्द्र है, सत्य है । अतः इस में इसी हृदयभाव के कारण अशनाया जाग्रत होपड़ती है | मोमान से ही अतिरोऽग्नि संकुचित होता हुआ पिण्डरूप में परिणत हुआ है । अपने इसी पिण्डम्बरूप की रक्षा के लिए इस में निरन्तर अन्नादान की इच्छा बनी हती है । इसी स्वाभाविक धर्म्म के कारण इसका नाम ' अन्नाग्नि ' होजाता है । क्योंकि यह अतिरोऽग्नि की ही दूसरी अवस्था है, अत: कहीं कहीं इसे भी अङ्गिरोऽग्नि कह दिया जाता है । यदि सूक्ष्मदृष्टि से विचार किया जाता है, तो अङ्गिरी— Sf ग्न अन्य अवस्था है, एवं अन्नावाग्निभिन्न अवस्था है । चौथा है- पाकाग्नि । प्रतिष्ठाशूल्य अग्नि हीं पाशुकाग्नि है । इसी को ' प्रवर्ग्याग्नि ' भी कहा जाता है | स्वप्रतिष्ठा से बञ्चित यह पाशुकाग्नि द्यावापृथिवी की प्रतिष्ठा पर ही प्रतिष्ठित रहता है । इस की पुरुष, अस्त्र, गाँ, अत्रि, अज, ये पाँच अवस्थाएँ होतीं हैं । इसे हम भौम ( भूपिण्ड -सम्बन्धी ) अग्नि भी कह सकते हैं । इसप्रकार एक ही स्वायम्भुव मौलिकाग्नि अवस्था भेद से चार भागों में विभक्त होजाता है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट है । २२४

पृष्ठ 663

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 663 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयव्यध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चतत्राह्मगा अग्नयः लोकाः ब्रह्माग्निः स्वायम्भुवः सुब्रह्माग्निः पारमेष्ठयः नामान्तराणि पुरुषाग्निः, वेदाग्निः वागग्निः सार्वयाजुषाग्निः, निरोऽग्निः, ऋताग्निः, ३-देवाग्निः सौरः अन्नादाग्निः, सत्याग्निः, छन्दस्याग्निः सावित्राग्निः, मताग्निः पार्थिक पाशुकाग्नि, प्रबर्याग्निः, द्यावा-' चतुद्धी विहितवाग्रे अग्निरास " उपर्युक्त चारों अग्नियों में से प्रकृत कथानक में तीसरे ' अन्नादाग्नि ' का ही निरूपण है! सौर अग्नि अन्नादाग्नि है, एवं यही यज्ञमूर्ति विष्णु है । यही स्वस्वरूप से प्राचीदिक् में प्रतिष्ठित होता हुआा प्राणदेवतानों के द्वारा चारों ओर व्याप्त होता है । व्याप्तिलक्षण से युक्त होने से ही इस यज्ञाग्नि का, किंवा सौर अग्नि का ' त्रिष्णु ' नाम चरितार्थ होता है । इस अन्नादाग्नि की भी चार अवस्थाएँ होजातीं हैं । ये चारों अग्नियाँ, किंवा एक ही अन्नादाग्नि की चार अवस्थाएँ क्रमशः याज्ञिक परिभाषा के अनुसार- आहवनीय, दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि, पाशुकाग्नि इन नामों से प्रसिद्ध है । सौर साविज्ञाग्नि निष्कैवल्य दिव्याग्नि है, यही सूर्य्यकेन्द्रस्थ प्रधान अग्नि है, यही मुख्य अन्नादाग्नि है । यह अग्नि अनुष्टुप छन्द से छन्दित रहता है । आगे के दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि, पाशुकाग्नि, इन तीनों की प्रतिष्ठा यही सावित्राग्नि है । अनुष्टुप्-छन्दा यही अग्नि अग्नित्रयी की आधारभूमि होने से, अग्नित्रयी का प्रभव होने से प्रजापति नाम से प्रसिद्ध है | इस अङ्गी प्राजापत्याग्नि के आधार पर उक्त अङ्गरूप तीनों अग्नि प्रतिष्ठित हैं । गार्हपत्याग्न केल पृथिवी में हीं व्याप्त है, दक्षिणाग्नि केवल अन्तरिक्ष में हीं प्रतिष्ठित है, पाशुकाग्नि केवल दूर्वादि पशुओं में हीं प्रतिष्ठित है । किन्तु आहवनीयरूप सावित्राग्नि त्रैलोक्य में व्याप्त है । प्राजापत्य अग्नि का ही छन्द है । प्रजापति इतर छन्दोऽवच्छिन्न स श्रग्नियों पर अभिव्याप्त हैं । अतएव प्राजापत्य अनुष्टुप छन्द को इतर छन्दों की योनि माना जाता है । अङ्गाग्नियों की अपेक्षा अङ्गी प्राजापत्याग्नि ज्येष्ठ, एवं श्रेष्ठ है । अतएव प्राजापत्य अनुष्टुप छन्द सत्र छन्दों में ज्येष्ट माना गया है । प्रजापति पर इतर देवताओं की सीमा समाप्त होजाती है । अतएव इतर देवताओं के छन्दों की अपेक्षा इस अनुष्टुपछन्द को ६२५

पृष्ठ 664

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 664 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड पचमत्राह्मण अन्तिम छन्द माना गया है । सम्पूर्ण देवताओं की अन्तिम प्रतिष्ठा अनुष्टुप् छन्द ही है । इतर सब छन्दों की योनि यही अनुष्टुप छन्द है । अनुष्टुप् के इसी स्वरूप को लक्ष्य में रखकर निम्नलिखित श्रौत वचन हमारे सम्मुख आते हैं— १ - " अनुष्टुप हि छन्दसां योनिः " ( तां ० ब्रा ० ११।५।१७ । ) । २– “ ज्येष्ठ ं वा अनुष्टुप तां ० ब्रा ० ८७३ ) । ३ – परमं वा एतच्छन्दो यदनुष्टुप " ( शत ० १३ । ३ । ३ । १ । ) । ४– “ अन्तो वा अनुष्टुप छन्दसाम् " ( तां ० ब्रा ० १६ । १२ । ८ । ) । ५ - " अनुष्टुप छन्दसाम् ( एतमादित्यमानशे ) ( ता ० ४।६।७ ) ।

६ – “ विश्वे देवा अनुष्टुप सममरनू " ( जै ० उ ० १।१८ । ७ । ) ।

७ – “ प्रजापतिर्वा अनुष्टुप " ( तां ० ४ । ५ । ७ ॥

८: - " श्रानुष्टुभो वै प्रजापतिः ( ता ० ४ । ५ । ७ ॥

६ – ' यस्य ते - ( प्रजापतेः ) - ऽह ( अनुष्टुप ) स्वं छन्दोऽस्मि " ( ऐ ० ब्रा ० ३।१३ । ) । तात्पर्य यही हुआ कि, प्राणदेवताओं के ' वितानयज्ञ ' से अर्करूप में परिणत होकर त्रैलोक्य में व्याप्त होने वाला, सत्र देवता एवं सत्र छन्दों की अन्तिम प्रतिष्ठारूप, अनुष्टुप छन्द से छन्दित सूर्यकेन्द्रम्थ प्राजापत्याग्नि ही ' आहवनीयाग्नि ' है । इस की प्रधान आवासभूमि प्राची दिक है । इसी प्राजापत्याग्नि को लक्ष्य में रख कर— “ अग्निं पुरस्तात् समाधान, तेनार्चन्तः श्राम्यन्तश्च रुः " यह कहा गया है । दूसरा है गाईपत्यानि । भूपिण्ड सूर्य का ही उपग्रह माना गया है । मौर अन्नादाग्नि ही प्रवर्ग्यरूप से भूपिड का स्वरूप- समर्पक बनता है । जो सौर अन्नादाग्नि सूर्य्यमण्डल से प्रवृक्त ' होकर ( पृथक् होकर ) भूपिण्ड का स्वरूप -- समर्थक बनता हुआ, भूकेन्द्र में प्रतिष्ठित होता हुआ भूपिण्ड की प्रातिश्विक वस्तु बन जाता है, वही भूगृह का अधिपति पार्थिवाग्नि ' गृहतति ' नाम से प्रसिद्ध होता है । ' गृहा नै गार्हपत्याः ' के अनुसार भूपिण्ड ग्रह है । ' यथाग्निगर्भा पृथिवी ' इस वचन के अनुसार इस घर में यह ' गृहपति ' प्रतिष्ठित रहता है । सम्पूर्ण भूपिण्ड गृहपतिमय है । यही अग्नि याज्ञिक साम्प्रदाय में ' गार्हपत्याग्नि ' नाम से प्रसिद्ध है । जिसप्रकार सौर आहवनीय सूर्य की प्रातिस्त्रिक वस्तु है, एवमेव गार्हपत्याग्नि पृथिवी का निर्मापक बनता हुआ आज विशुद्ध पृथिवी की प्रातिश्विक सम्पत्ति बना हुआ है । इस पार्थिव अग्नि का पूर्ण विकास पश्चिमा दिक में श्रद्ध रात्रि के समय होता है । इसी अभिप्राय से रात्रि को ' आग्नेयी ' माना जाता है । आहवनीयाग्नि ( सौराग्नि ) की सत्ता प्राची में थी, गार्हपत्याग्नि ( पार्थिवाग्नि ) की सत्ता पश्चिम में है । यह अग्नि त्रिष्टुप छन्द से छन्द्रित रहता है । इस अग्नि के सम्बन्ध में हम यह कह सकते हैं कि, सौर दिव्याग्नि ही प्रवर्ग्यरूप से पृथिवी की वस्तु बन कर त्रिष्टुप्छन्द्र से छन्दित होकर पश्चिमादिक में व्याप्त होरहा है । दूसरे शब्दों में-- वही अन्ना-दाग्नि अनुष्टुप छन्द की कृपा से पूर्व में व्याप्त हो, वही त्रिम्टुप छन्द की कृपा से ग्राज पश्चिम में व्याप्त हो-६२६

पृष्ठ 665

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 665 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमव्राह्मण रहा है । यही पार्थिव वाग्नि ' अङ्गिरा ' नाम से भी प्रसिद्ध है । पाटकों को स्मरण होगा कि, हमने पूर्व में आपो-मय ऋताग्नि को अतिरोऽग्नि कहा है । अतिरोऽग्नि आपोमय है । इधर - ' अद्भ्यः पृथिवी ' इस सिद्धान्त के अनुसार भू | पण्ड श्राषोमय है । इस अप् सम्बन्ध के कारण हीं पार्थिव अग्नि कहीं कहीं अङ्गिरोऽग्नि नाम से भी व्यवहृत देखा जाता है । जिसप्रकार सौर ग्रादित्याग्नि ( श्राहवनीयाग्नि ) निरन्तर पृथिवी की ओर आता रहता है, एवमेव पार्थिव अग्नि निरन्तर द्युलोक की और जाता रहता है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है ---इत एत उदारुहन् दिवस्पृष्ठान्बारुहन् प्रभूर्जयो यथा पथाद्यामङ्गिरसो ययुः ॥ 6 अथसं • १८ | १ | ६१ | | तीसरा है दक्षिणाग्नि । इसे ही बाज्ञिक - परिभाषा में ' श्रपणाग्नि ' भी कहा जाता है । कहा जा चुका है कि, सौर नि सूर्यमण्डल से निरन्तर भूषिएड की ओर याता रहता है, साथ ही पार्थिव अग्नि ऊपर की ओर जाता रहता है । इसी को आदित्य एवं अङ्गिरा की प्रतिस्पर्द्धा कहा जाता है । सौर भूषिएड की ओर आता अवश्य है । परन्तु पार्थिव अग्नि के प्रत्याघात से वह पुनः स्वमण्डल की ओर ही प्रतिफलित होजाता है । उधर सौर सावित्राग्नि का श्रागमन निरन्तर होता रहता है । अतः पार्थिवाग्नि के आघात से ऊपर की ओर जाता हुआ प्रतिकलित सौराग्नि द्यलोक ( स्वर्लोकरूप सूर्यलोक ) की ओर भी नहीं जासकता | सावित्राग्नि के प्रत्याघात से उसका द्य मार्ग भी अवरुद्ध होजाता है । फलतः पार्थिव गार्हपत्याग्नि, तथा दिव्य सावित्राग्नि के आयात से संदश- पतित यह प्रतिफलित सौर अग्नि तिक होता हुआ दक्षिणा दिक् में व्याप्त होजाता है । पूर्वमार्ग सावित्राग्नि से अवरुद्ध है | पश्चिम मार्ग गार्हपत्याग्नि से अवरुद्ध है । उत्तरमार्ग सोमप्रधान होने से अवरुद्ध है । शेष दक्षिणादिक रहती है । यहीं यह प्रतिफलित सौर अन्नादाग्नि प्रतिष्ठित होता है । यही दक्षिणा दिक् याम्या ( आग्नेयी ) दिक् कहलाती है । आयुर्वेदज्ञ दक्षिणस्था श्रोषधियों को ' आग्नेयीं ' हीं माना करते हैं । यही अग्नि ' ऋतु ' नाम से व्यवहृत होता है । वह दक्षिण से उत्तर की ओर जाता हुआ ओषधियों का ( अन्नादिका ) परिपाक करता है । इसी परिपाकक्रिया के कारण इस दक्षिणाग्नि को ' श्रपणाग्नि ' ( हविः परिपाक करने वाला अग्नि ) कहा गया है । दक्षिणस्थ यह अग्नि ' गायत्री ' छन्द से छन्दित रहता है । ज्योतिर्वित् ( ज्योतिषी ) दक्षिणस्थ जिस अन्तिम पूर्वापरवृत्त को ' मकरवृत्त ' कहा करते हैं, गायत्री के सम्बन्ध से छन्द: परिभाषा के अनुसार वही वृत्त वैदिक विज्ञान में ' गायत्री ' नाम से व्यवहृत होता है । गायत्री छन्दस्क यह दक्षिणाग्नि भी उसी सौर अन्नादाग्नि की अवस्था - विशेषमात्र है । तात्पर्य यही हुआ कि, सौर अग्नि प्रतिफलित रूप से गायत्रीछन्द से छन्दित होकर दक्षिणा दिकू में व्याप्त होजाता है । पाशुकानि । यह अग्नि भूपृष्ठ से संलग्न रहता है । पार्थिव दिव्य अग्नि के सम्मिश्रण से एक नवीन सांयोगिक अग्नि उत्पन्न होता है । यह अग्नि ' संकर ' अग्नि होने से पशु ( आत्मप्रतिष्ठा रहित ) माना जाता है । संकरप्रजा जैसे अपने विशुद्ध श्रात्मा से तिरोहित रहती है, एवमेव द्यावापृथिवी के संयोग से ६२७

पृष्ठ 666

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 666 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण उत्पन्न यह अग्नि स्वस्वरूप से तिरोहित रहता है । फलतः इस अग्नि का विशुद्ध अग्नियों के साथ योग नहीं होने पाता । पर्व में सावित्र, पश्चिम में गार्हपत्य, एवं दक्षिण में श्रपणाग्नि है । इस पशुरूप संकर अग्नि के लिए तीनों मार्ग अवरुद्ध हैं । उत्तरादिक शेष रहती है । यहाँ सोम का प्राधान्य है । सोम स्वयं अन्न होने से अग्नि का भोग्य बनता हुआ पशु । इसी सजातीय सम्बन्ध के कारण उक्त ' संकर अग्नि ' को उत्तरादिक् में हीं श्राश्रय मिलता है । यह पाशुकाग्नि ही दूर्वा- इध्म बर्हि श्राज्य हवि आदि पदार्थों का स्वरूप – सम्पादक है | यह अग्नि जगतीछन्द से छन्दित है । अतएव उत्तरस्थ ' कर्कवृत्त ' जगतीछन्द नाम से प्रसिद्ध है । अपिच- जागत पाशुक अग्नि के सम्बन्ध से ही - " पशवो जगती " ( शत ० ब्रा ० ३।४।१।१।३ ), " जागता वै पशवः " ( ऐ ० ११५ - २१-१८ ) इत्यादि रूप से पशुओं को जागत कहा जाता है । यद्यपि पाशुकाग्नि अन्नाद के संकर से उत्पन्न होने के कारण अन्नाद की ही अवस्था - विशेष है । परन्तु पशुभाव की प्रधानता से, साथ ही साक्षात् पशुरूप उत्तरस्थ सोम के सम्बन्ध से यह अन्ना कोटि से यों बहिर्भूत होता हुआ ' अन्न ' ही मान लिया जाता है । यह ' भोग्य ' होने से ' निरायतन ' है । अतएव जिसप्रकार सायतन इतर तीनों अग्नियों के लिए वैधयज्ञ ( मनुष्यकृत यज्ञ ) में कुण्ड का निर्माण होता है, इसप्रकार इस पाशुकाग्नि के लिए स्वतन्त्र कुण्ड निर्माण नहीं होता । अतएव च इस चौथे पाशुकाग्नि को अग्नि-मर्य्यादा से बहिर्भूत समझते हुए यज्ञाग्नि से त्रेताग्नि ( आहवनीय गार्हपत्य दक्षिणाग्नि ) का ही ग्रहण किया जाता है । बेदि के उत्तर भाग में प्रतिष्टित रहने वाले आाज्य - इध्म - बर्हि - हमि आदि इसी पाशुकाग्नि की प्रतिकृतियाँ है । तात्पर्य यह हुआ कि, पार्थिव, एवं दिव्य अग्नि की सङ्करावस्थारूप पाशुकाग्नि से उत्तरादिकू व्याप्त रहती है! इसप्रकार यज्ञविष्णुरूप सौर अग्नि अनुष्टुप आदि छन्दों से छन्दित होकर चारों दिशाओं में व्याप्त रहता है । इसी यज्ञविष्णु के प्रभाव से सौर देवता भूपिण्ड पर अपना अधिकार स्थापित कर लेते हैं । सौर अग्नि पृथिवी की पूर्वविन्दु में प्रतिष्ठित है, गाईपत्य पश्चिम में प्रतिष्ठित है, श्रप-गाग्नि दक्षिण में प्रतिष्ठित है, एवं पाशुकाग्नि उत्तर में प्रतिष्ठित है । भूपिण्ड वेदिरूप है । इसी प्राकृतिक यज्ञ के आधार पर वैध यज्ञ का वितान किया जाता है । भूषिएड की प्रतिकृति ( नकल ) वेढ़ि है । आहवनीय की प्रतिकृति वेदि के पूर्व भाग में प्रतिष्ठित चतुष्कोण आहवनीय कुण्ड है । पश्चिम में बत्तुल गार्हपत्य कुण्ड है । दक्षिण में अर्द्ध कटकाकृति श्रपणीय कुण्ड है । उत्तर में इम बर्हिरूप पाशुकाग्नि की प्रतिकृति है, जैसाकि निम्नलिखित परिलेखों से स्पष्ट होजाता है | ६२८

पृष्ठ 667

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 667 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयअध्याय वैधयज्ञवेदिपरिलेख : -वैधयज्ञप्रतिकृतिः शतपथब्राह्मण प्राचीदिक ग्राहवनीयाग्निः पञ्चमत्राह्मण यथा प्रकृतिः तथा वि २– आाज्यम् * उत्तरादिक् = * -४- हविः * : बंदि दक्षिणाग्निः प्रकृतिवद्विकृतिः कर्तव्या-इत्येष श्रादेशः । गार्हपत्याग्निः सा यज्ञम्पन ६२६ प्रतीचीदिकू— -दक्षिणादिक

पृष्ठ 668

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 668 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयअध्याय प्रथमकाण्ड अग्निहोत्रशाला १ पूर्व द्वारम् आहवनीया ग रामच अर्थ परिमाणं भाग्यमेवेति । सभ्यः २७ अंशुलात्मकः ) समताश्चतुरंशुम-त्मक मेला युतः आहवनीयः समचतुरस्यः समंता II मेवात पश्चिम द्वारम् अष्ट प्रक्रम एकादाप्रक्रमो द्वादापक्रमोमत्यावा .. " मक्रमस्त्येक प्रा पदात्मकः पूर्वद्वारम् पञ्चमत्राहारण मासमचरमपन आवसभ्यो २७ अंगुलात्मकः समता तुरंगुला-मनः गाई पत्या २७ अलात्मकः सता तुरं मकवानः - दक्षिणा अनेकाम लताहुन ६२० दक्षिण द्वा

पृष्ठ 669

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 669 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयमध्याय शतपथनाहाना दर्शपूर्ण मास बिहार पहः । २ सभ्य: २७ अंगुलात्मकः समंतात रंगु सुतः ॥ प्रदेशः ] पात्रासादन होत्रा सलम पञ्चमब्राह्मण उत्तरोऽसः [ जाइननीयः दक्षोऽसः । समचंद्रः चतुरात्मक यज्ञनिस्थान म् प्राक्प्रवणा उदकप्रवणाव बेदिः बात - युता. स्वान वर्जित अयं चाहवनीय: कर्काचार्य मूतेन वेदेहि कर्तव्याः । दिश्य तस् पश्चिमे बहिरे व कर्तव्याः भूवतीति अपरेणाहव नीय बेदिनीन कार थाना दिति ॥ जुहोति स्यामन. योरा सनम समो- देश । स्त्वेकपदात्यकः । द्राक्ष मोत्याचा प्रक्रम-अष्टमक्रम एकादश प्रक्रमो आवमभ्यः २७ अंगुल्लात्भकः समंताय तुरंशु-वात्मक मेरा युनः । गाईपत्यः अलात्मकः संता गुला-त्मक मेरवला युतः अध्ययन सनम. द्वारम प्रकरण के श्रारम्भ में बतला आए हैं कि देवताओंोंने विष्णुयज्ञ को अग्रणी बना कर छन्दों से वेष्टित कर उसे सम्पूर्ण भूषिएड पर व्याप्त कर दिया । जहाँतक छन्दोवेष्टित यरमूर्ति बिष्णु व्याप्त हुए, यह यशिय प्रदेश कहलाया । यही प्रदेश - " एनेन ( यज्ञमूर्त्तिर्विष्णुना ) इमां सर्वा समविन्दन्त " इस निर्वचन के अनुसार या शिकों के समय में ' वेदि ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । सम्पूर्ण भूषिएड पर देवताओंने अपना अधिकार स्थापित कर लिया । दूसरे शब्दों में सम्पूर्ण भूपिण्ड को यश के व्याज से देवताओंने अपने ६११

पृष्ठ 670

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 670 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमत्राह्मण निव्ययज्ञ की वेदि बना लिया तभी से वैज्ञानिक सम्पदाय में " यावती बेदिस्तावती पृथिवी " यह निगम प्रचलित होगया । जय सम्पूर्ण भूपिण्ड पर देवताओं का अधिकार होगया, तो अमुर कहाँ रहे हैं, यह प्रश्न उपस्थित होता है । प्रकृत ग्राख्यान का दायविभाग से सम्बन्ध है । जैसे देवता प्राजापत्य ( प्रजापति के पुत्र ) होने से श्रजापति की सम्बनिरूप भूपेण्ड प्राप्त करने के अधिकारी हैं, एवमेव अमुर भी प्राजापत्य होने से पैत्रिक सम्पत्तिरूष भूपिण्ड से पृथक नहीं किए जा सकते । इस विप्रतिपत्ति को दूर करने का उपाय है - दिति और अदिति का स्वरूप ज्ञान । एक ही भूषिण्ड के दिति और अदिति दो विभाग होजाते हैं । भूपिएड का वह श्रद्ध प्रदेश, ओ सूर्य के ज्योतिर्मय प्राथ से मुक्त रहता है, ' अदिति ' कहलाता है भूषिरह की दोनों परिथियों का स्पर्श करता हुआ • सौरप्रकाश आगे निकल जाता है । इससे सूपविमुख भूपिण्ड पर प्रकाश नहीं जाने पाता । इसी मोन भाग का नाम ' दिति पृथवी ' है दितिभाग असुरों को आश्रयभूमि है, एवं अदितिभाग देवताओं की आवासभूमि है । सृष्टि के आरम्भ में ( जबकि भूपिण्ड बना ही था, जबकि उस समय सौर - ज्योति का भूपिएड के साथ सम्बन्ध नहीं हुआ था, उस समय } यद्यपि सम्पूर्ण भूपिण्ड पर एकमात्र आध्यप्राणप्रवान तमोमय असुरों का ही प्रभुत्त्व था । परन्तु आगे जाकर उपर्युक्त यज्ञ के प्रभाव से सौर देवताओंने श्रदितिभाग से सन मुरी को निकाल कर न्यायप्रत आये अदिति भाग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया इसप्रकार पूर्वकथनानुसार चतुर्द्धा विभक्त अन्नादानिरूप यज्ञविष्णु के प्रभाव से अदितिरूप सम्पूर्ण भूषिएड पर देवताओं का अधिकार होगया । प्रकृत आख्यानांश का यही श्राधिदैविक प्राकृतिक रहस्य है, जैसाकि निम्नलिखित परिलेखों से स्पष्ट है । चतुर्द्धा विहितो हवा अग्रे - अग्निरास आहवनीयाग्निः सावित्राग्निः सौरः अनुष्टुप् प्राची २ गार्हपत्याग्निः पार्थिवाग्निः त्रिष्टुप् प्रतीची ३ अबलाग्निः गायत्राग्निः गायत्री दक्षिमा पाशुकाग्निः प्रवाग्निः जगती उत्तरा ६३२