Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 671–680
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 671–680
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दितिः ६३३ उत्त पाशुकाग्निः दितिः bl अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण प्राची सावित्राग्निः : अदिति
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण प्रकृत प्रकरण में ' अनुष्टुप्छन्द ' का उल्लेख नहीं है । प्राचीदिक के सम्बन्ध में केवल ' ते ह पान ' विष्णु निपाय यही कहा गया है । इस का कारण यही है कि सौर विष्णु प्राज्यापत्याग्निरूप है । यही अनुष्टुप छन्द है । इतर तीनों विवर्त ' इस श्राजापत्याग्नि के ही विकास हैं । एवमेव इतर तीनों छन्द अनुष्टुप् छन्द के ही विकास हैं । वह प्र तेष्ठारूप से सर्वत्र व्याप्त है । अतएव ऋषिने स्वतन्त्ररूप से अनु-टुकुन्द का उल्लेख नहीं किया 1 यमूर्ति विष्णु पाणरूप है । प्राया के सम्बन्ध में " प्रादेशमितो वै प्राणः " यह निगम प्रसिद्ध है । प्रदेशमात्र परिणाम को ही ' वामन ' कहा जाता है । इसी आधार पर -" थामनो ह वा अविराम " यह कहा गया है । भूतकाल का प्रयोग है । अवश्य ही विष्णुजाण आरम्भ में प्रादेशशमत ही रहा होगा | परन्तु यही आगे जाकर यज्ञ - ( सम्बत्सररूप यज्ञ ) रूप में परिणत होकर छम्दों से वेष्टित होता हुआ उक्त चार अवस्थाओं में परिणत हो सम्पूर्ण भूपिण्ड पर व्याप्त होजाता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर ' अये आस ' यह कहा गया है । ' अग्निः सर्वा देवताः ' - अग्नि– पुरोगाः सर्वे देवाः प्रीयन्ताम् ' इत्यादि के अनुसार त्रैलोक्य में इसी विष्णुरूप याज्ञिक अग्नि के आधार नर देवता श्राणोदानरूप अर्कव्यापार, एवं भूतनिर्माणसाधन श्रम ( वाग्ध्यापार ) ' करने में समर्थ बनते है । इसी आधार पर " तेनार्थन्तः भ्राम्यन्तश्वेरु ' यह कहा गया है । जो विद्वान् ( वैज्ञानिक ) उक्त :( प्राकृतिक वैज्ञानिक रहस्य की पूर्ण परीक्षा कर याज्ञिक पद्धति से उस असुर विजेता याज्ञिक विष्णुप्राण को आत्मसात् कर लेता है, उस का आत्मा विष्णुमय बनता हुआ प्रबल होजाता है । एवं इस याज्ञिक जल के प्रभाव से वह यशकर्ता यजमान वास्तव में अपनी भोग्य सम्पत्ति पर आक्रमण करने वाले शत्रुओं का पूर्ण पराजय कर उस सम्पत्ति का एकाकी भोका बन जाता है । इसी फल को लक्ष्य में रख कर " निर्भजत्यस्वी ( अस्याः पृथिव्याः सकाशान ) सपत्नान् य- एवमेतद्वेद " यह कहा गया है । पूर्व की ओर से अग्नि से अवरुद्ध होकर, पश्चिम - दक्षिण - उत्तर में क्रमशः त्रिष्टुप - गायत्री -जगती छन्दों से पिर पर विष्णु देवता ' ज्ञान ' होगए स्थान होकर श्रोषधिमूलों में प्रविष्ट होगए । आगे जाकर यज्ञविद्या के प्रथम श्राविष्कर्ता भीमदेवता श्रीने 1 भीमस्वर्ग मे रहने वादे मनुष्यदेवताओंने ) यशसाधन के लिए विष्णुभाश का अन्वेषण किया । अन्वेषण करते करते परीक्षा से उई विष्णुप्राण ( याज्ञिक विशुद्ध पार्थिव आग्नेय जोलो में हीं उपलब्ध होगया । तभी से उन्होंने वैज्ञ में यह विधान कर दिया कि, ' जिस किसी को यज्ञार्थ वेदि बनाना हो, उसे तीन अङ्गल भूभाग कोड देना चाहिए । ऐसा करने से विष्णुजाण वैदि में संयुक्त हो जायगा । आरम्भ में देवताओ तीन अकूल भूमिका स्वनन किया था । देवताओ का अभिप्राय यह नहीं था कि तीन अङ्गल ही भूमि खनन किया जाय । अपितु उनका प्रधान लक्ष्य ' विष्णुप्राण ' दी था । उस समय ओषधि मूल तीन अङ्गल गहरे ही मिले होगे देवताओं का प्रधान लक्ष्य से औषधियों का मूल ही था क्योंकि यहीं विष्णुप्राण व्याप्त रहता है । देवताओं की इस वैज्ञानिकदृष्टि का वास्तविक तात्पर्य्यं न समझते हुए तैत्तिरीय-सम्प्रदाय के अनुयायी पानी आदि बाज्ञिकांने तीन 13 ल पर ही जो बल देते हुए पद्धति में ' त्र्यङ्ग ला वेदिः स्थान ' यही विधान माना । इस पर विप्रतिपत्ति उठाते हुए भगवान याज्ञवलक्य कहते हैं कि, तीन ही अङ्गल दिखनन किया जाय, इस की कोई आवश्यकता नहीं है । प्रधान लक्ष्य श्रोषधिमूलों पर होना चाहिए । मान लो, कहीं तीन अङ्गल से भी गहरे ओषधिमूल हैं । ऐसी परिस्थिति में ' व्यङ्गला एव वेदिः " स्थान इस पक्ष के अनुयायी प्रोपधिमूल नहीं उखाड़ेंगे, तो बेटि कैसे निष्पन्न होगी? | अतः यशसमय II
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द्वितीयअध्याय शतथपत्राहागा पचमत्राह्मण में अव को पधिल उखाड़ ने की ही आज्ञा देनी चाहिए । क्योंकि देवताओंने ओषधिमूलों में है । विष्णु को प्राप्त किया था | अब प्रश्न बच जाता है विष्णु के म्लान होने का । विष्णु कैसे म्लान होगए?, इसी प्रश्न का समाधान कर यह आधिदैविकचरित्र उपरत किया जाता है । पञ्चाक्षरत्रियाचित विद्वान् जानते हैं कि, विष्णु अनर आगतिधर्म्मा है, इन्द्राक्षर गतिधर्मा है । स्थिति ब्रह्मा है, स्थितिगर्भिता आगति ( विष्णु ) सोम है, एवं स्थितिगर्भिता गति ( इन्द्र ) अग्नि है । ' विकास ' अग्नि का धर्म है, इसी को ' तेज ' कहा जाता है । ' संकोच ' सोम का धर्म है, वही ' स्नेह ' नाम से प्रसिद्ध है । अग्नितत्त्व इन्द्रप्रधान है । विकास से हृद्ग्रन्थि का उच्छेद होता है, एवं संचोक से हृद्ग्रन्थिमूलक सृष्टिभाव संकोचधर्म्मा सोम पर ही निर्भर है । जबतक विकास अग्नि में सोम की आहुति होती रहती है, तभीतक यज्ञमूर्ति विष्णु मोम के सहयोग से सृष्टि रक्षा करने में समर्थ रहते हैं । सोमाहुति के अवरुद्ध हौजाने से यज़विष्णु उत्क्रान्त होजाते हैं, केवल इन्द्रसहचारी अग्नि की ही सता रह जाती है । हृद्ग्रन्थि उच्छिन्न होजाती है, सृष्टि मुक्तिरूप में परिगात होजाती है । संकोचभाव ही म्लानभाव है । सृष्टि ' में आत्मविकास म्लान होजाता है । इस का धान कारण यज्ञमूर्ति विष्णु ही है । भौतिक सृष्टि वैष्णवी है । यह सत्र सृष्टि आत्मा के लिए म्लान है । वैष्णीव सृष्टि के इसी म्लानभाव को लक्ष्य में रखकर विष्णु को आख्यान में ‘ म्लान ' कहा गया है । भौतिक सृष्टि की अपेक्षा से म्लानभाव का अर्थ है – हृद्यन्थि की प्रवृत्ति, एवं आत्मविकाम का तिरोभाव । सूर्य्यकेन्द्र में हमनें far की सत्ता बतलाई है । " सूर्यो बृहती मध्यूढस्तपति " - " नैवोदेता नास्तस्ता मध्ये एकल एवं स्थाता " - वृद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः ' इत्यादि श्रौत प्रमाणों के अनुसार सूर्य्य-चिम्ब ठीक हमारे स्वस्तिक पर बृहती छन्द के ( विष्वद्वृत्त के ) केन्द्र में प्रतिष्ठित है । मूलयज्ञरूप विष्णु इसी सूर्यकेन्द्र में प्रतिष्ठित है । यहीं से आगे चलकर प्राणदेवताओं के द्वारा गायत्र्यादि छन्दोंसे वेष्टित होकर विष्णु-देवता पूर्वादि दिशाओं में प्रतिष्ठित होते हैं । केन्द्र में प्रतिष्ठित रहने वाला मूलविष्णु, एवं चारों दिशाओं में व्याप्त रहने वाला तूलविष्णु, दोनों हीं हमारे लिए ( प्राप्त करने में ) अशक्य हैं । वह हमारे अधिकार से बाहिर है । इसी अप्राप्तिभाव के कारण हम हमारी दृष्टि से विष्णु को अवश्य ही ' प्लान ' ( तिरोहित - प्राप्तु-मशक्य ) कह सकते हैं | हमें मिल सकता है एकमात्र पार्थिव विष्णु । विष्णु का वह त्रैलोक्य व्यापक स्वरूप तो हमारे लिए ' असान्तवत् ' ही है । होता क्या है— तीनों दिशाओं में तो विष्णुप्राण छन्दों से घिर जाता है । इसका स्वस्थान प्राचीटिक ( प्राचीटिकस्थ सूर्य्य, किंवा सूर्यकेन्द्र ) है । वहाँ भी यह श्रागत छन्दीवेष्टित विष्णुप्राण पुनः जाकर प्रतिष्ठित नहीं होसकता । कारण, वहाँ से विशुद्ध सावित्राग्नि चैलोक्य पर आक्रमण करता हुआ नीचे की ओर आरहा है । इन चारों मार्गों के अवरुद्ध होजाने से अन्ततोगत्वा इस याज्ञिक प्राण को पधियों के मूल में हीं प्रति-ति होना पड़ता है । सभी ओषधियाँ निरन्तर ( अहोरात्र ), विशेषतः रात्रि में यज्ञात्मक ( विष्णुरूप ) सौर रम का पान किया करतीं हैं । इसी सामगर्भित अग्निरस का पान करने से औषधियाँ पुष्ट होतीं हैं, इसी रस से इनका परिपाक होता है । ओषधियों का शरीर ( भौतिक दृश्य भाग ) चान्द्ररस का पान करता है । श्रतएव शरीरापेक्षया ओषधियाँ ' सौम्या ' कहलाती हैं । अतएव च चन्द्रमा ( सोम ) को ओषधियों का पति ६३५
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द्वितीय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण कहा जाता है । परन्तु आत्मा श्रपधियों का पोषक सौर अग्नि ही है । यह सौरी उष्मा ( ताप - अग्नि ) ओषधियों के गर्म में प्रतिष्ठित रहती है, " ओषं ( उप दाहे दाहस्तापः नापः अग्निस्तं ) इस निर्वचन से इहें ' ओषधि ' कहा जाता है । म्लान ( माज्ञानरूप से प्राप्तुमशक्य ) सौर यज्ञिय विष्णु औषधियों में ही प्रतिष्ठित रहता है । ऐसी अवस्था में हम कह सकते है कि, पार्थिव मनुष्यों को यदि कहीं वैष्ण मिल सकता है, तो वे ओषधियों के मूल ही है । पार्थिव यज्ञाग्नि का वैधयज्ञ में समावेश करने के लिए, दूसरे शब्दों में विशुद्ध पार्थिव दाग्नि के परिग्रह के लिए औषधिमूल से संष्ट वा ही श्राश्रम लेना श्रावश्यक है । ओषधिनिर्माण - प्रक्रिया में विष्णुदेवता के दर्शन कीजिए । पूर्व में यज्ञ का लक्षण करते हुए ' अग्नी सोमाहुतिर्यः ' यह कहा गया है । अग्नीषोमात्मक यज्ञ को ही विष्णु कहा गया है । श्रोषधि - वनस्पतियों में निरन्तर यह अग्नीषोमात्मक यश होता रहता है । यही दैनंदिनवश ब्राह्मणाग्रन्थों में ' अहरहयज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध है । योषधिनिर्माणार्थ जिस बीज का भूगर्भ में उपन होता है ( बीज बोया जाता है ), उस बीज में ऊपर की ओर दी शास्तरण रहते हैं । इन दोनों पार्श्वदलों से बीज मुरक्षित रहता है भूपृष्ट के चारों ओर ' यमत्रायु ' व्या'त रहता है । यह याम्य रूक्ष रुद्रवायु ' जीवनीयरस ' का शोषण कर लेता है । बीज में भी जीवनीय रस रहता है । वहीं आगे जाकर पुष्पित एवं पल्लवित होता है इस जीवनीयरस की ( जो कि वास्तविक ' बीज ' है ) यमवायु के श्रापात से बचाने के लिए अन्तर्यामी ने उसके दोनों ओर दो मन ( ढक्कन ) लगा दिए है | वे ही पार्श्वस्थ दल यमवायु के आघात से गर्भस्थ रसमृत्ति ' वृत्त ' रूप चीज की रक्षा करते हैं । जबतक इस बीज को भुगर्भ में प्रविष्ट नहीं करा दिया जाता, तबतक वह अङ्कुरित नहीं हो-सकता । यदि धरातलपृष्ठ पर चीज रखकर उस पर आप जलसेक करेंगे, तो रक्षक दोनों पार्श्वदल विकसित होजायेंगे | यमवायु मध्यस्थ रस की दग्ध कर देगा इस विप्रतिपत्ति को दूर करने के लिए बीज को भुगर्भ में ही कोडा जाता है । वहाँ जलसेक होता है । जल की आर्द्रता से " एवं भूगर्भ की ऊष्मा से दोनों पार्श्वटल कपाट खुल जाते हैं । आगे क्या होता है— सुनिए! गर्भ में एक ' वृन्त ' रहता है । उस वृन्त में ' इ-यशक्ति ' काम करने लगती है । शक्तित्रयी की सम्मिलित अवस्था वा नाम दी हृदयशक्ति है । ब्रह्मशक्ति ' यम ' है, विष्णुशक्ति ' ह ' है इन्द्रशक्ति ' द ' है । विष्णु रस का आहरण करते हुए ' ह ' हैं, इन्द्र रसनिक्षेष करते हुए ' द ' हैं, एव दोनों का समन्वय ( नियमन ) कराने वाले ब्रह्मा ' यम ' हैं, तीनों की मम ही ' हयम् ' है । ' बीजगुहा ' में यह ' हृदयशक्ति ' ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र- इस रूप से प्रतिष्ठत रहती है । वृन्त के अग्रभाग में शिवरूपा इन्द्रशक्ति है, भूगर्भ में दूर पर्य्यन्त व्याप्त रहने वाली बीजशिरात्रों के मूल में ब्रह्मशक्ति रहती हैं । एवं जिस बिन्दु से शिराएँ भूगर्भ में जातीं हैं, एवं जिस बिन्दु से वृन्त ऊपर की ओर जाता है, दोनों की विभाजिका उस मध्यम बिन्दु में विष्णुशक्ति प्रतिष्ठित रहती है । मध्यस्थ विष्णु ऊपर से सौर- चान्द्र - रस का ग्रहण करते हैं, नीचे से पार्थिवरस का आकर्षण करते हैं । मध्य में प्रतिष्ठित विष्णु इस ओर से पार्थिव देवताओं को लेते हैं, उस ओर से सौर देवताओं को लेते हैं । दोनों देवता मध्यस्थ विष्णु की अशनागा-शक्ति से आकर्षित होते हुए ओपनिग में सहायक बनते हैं F रस प्रारूप है, अोर अपान-रूप है, प्राणनापान के अधिष्ठाता मध्यस्थ वामन विष्णु हैं । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर उप-मिषच्छ्रति कहती है-६३६
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द्वितीयअध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण
ऊर्जा प्राणमुन्नयति, अपानं प्रत्यगम्यति ।
मध्ये वामनमासीनं सर्वे देवा उपासते ॥
ब्रह्मा ' अपान ' के अधिष्ठाता हैं, इन्द्र ' प्राण ' के अधिष्ठाता हैं, एवं विष्णु यानमूर्ति हैं । यदि मध्य में व्यानमूत्ति बिष्णु न हों, तो न पार्थिव रस का आगमन हो, एवं न प्राणात्मक सौर रस का आगमन हो । जीवन के हेतु प्राणापानरूप सौर- पार्थिव रस नहीं हैं, श्रपितु मध्यस्थ व्यान ही ( दोनों क । आकषक बनता हुआ ) ' जीवन ' का हेतु है । अतएव पुराणने एकमात्र विष्णुदेवता को ही सृष्टि का पालक माना है । इसी सिद्धान्त का विश्लेषण करते हुए ऋषि कहते हैं— न प्राणेन नापानेन मत्यों जीवति कश्चन । इतरेण B जीवन्ति यस्मिन्न तावुपाश्रितौ ॥ श्रोषधि - बनस्पतिगत उपर्युक्ता इसी शक्तित्रयी का निरूपण करते हुए पुराणपुरुष कहते हैं—
मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे ।
अतः शिवरूपाय अश्वत्थाय नमो नमः ॥
अश्वत्थ को धि - वनस्पतिमात्र का उपलक्षण समझना चाहिए । बीज वपन किया, पानी डाला । उस स्थान का पानी, और मिट्टी, दोनों बुल मिल गए । वृन्तनाड़ी में प्रतिष्ठित सौररश्मि ने " नाड्यो चायुसंयोगादारोहणम " ( वै ० दर्शन ५ | २/५ 1 ) के अनुसार पानी उपर की ओर वेंचा । पानी के साथ साथ ही तदभिन्ना मिट्टी भी खिंचने लगी । कुछ दूर जाकर पार्थिवाकर्षण से मिट्टी तो टहर गई, पानी बाष्परूप में परिणत होकर सौरमण्डल में चला गया । पानी के साथ उपर की ओर जाकर ठहरने वाली मिट्टी ही ' अङ्क ुर ' कहलाया । अत्र यदि ग्राप औषधि की ओर वृद्धि चाहते हैं, तो पानी और डालिए, पुनः पानी के साथ मिट्टी उपर चढेगी | इस क्रम से प्रोवधि का स्वरूप निष्पन्न हो जायगा । किन्तु यह ध्यान रखिए कि, बीज में प्रति-ठित योनिरूप महद्ब्रह्म का जितना आयतन पहिले से स्थिर है, औषधि की वृद्धि उसी आकार में होगी | आप चाहें कि, एक हजारे का वृक्ष सिन- धारा से बटवन लम्बा होजाय, अथवा बटवृक्ष हजारे जितना ही लम्बा रहे, यह कभी न होगा । प्रत्येक भौतिकी सृष्टि के बीज में आकृति - प्रकृति अहङ्कङ्कृति का अधिष्ठाता महाविद्यमान रहता है । इस कथन से प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि भूवा छन्द-अग्नि आदि से म्लान विष्णु ओषधियों के मूल में ( मध्य में ) जहाँ से कि शिराएँ निकल कर भूगर्भ में जाती हैं ) प्रतिष्ठित रहता है । यनकर्ता यजमान जिस भूप्रदेश में यज़ करना चाहे, पहिले उस प्रदेश में रोहित ओषधि, तृणादि को समूल उखाड़ फेंके । इस से वह मूलस्थ विष्णुमारण बेदि में ममाविष्ट हो जायगा । इसी सम्पूर्ण गुहानिहित रहस्य को लक्ष्य में रखकर ' सोऽयं विष्णुम्लान:: ' इत्यादि कहा गया है, और प्रकृत आख्यान का यही संक्षिप्त आधिदैविक रहस्य है । इस अधिदैविक रहस्य- निदर्शन के साथ ही प्रस्तुत ब्राह्मण की १ ऋण्डिका से १० कण्डिकापर्यन्त का आख्यानात्मक सन्दर्भ उपरत हो रहा है । १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ६, १० ॥ इत्याधिदैविक रहस्यम् -- * --६३७
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द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमत्राह्मण पद्धत्यनुगत सन्दर्भ - समन्वय -भौम देवताओं ने परीक्षा के द्वारा ( तं खनन्त इवान्वपुः ) औषधिमूलों में म्लान विष्णु का प्राप्त कर लिया । प्राकृतिक प्राधिदैविक विष्णु व्यापक है | अतः जबतक इसे परिच्छिन्न न कर लिया जाय, तबतक वह विष्णु परिन्छिन्न वैधयज्ञ का उपकारक नहीं बन सकता । इसी सीमाभाव के लिए प्राप्त - विष्णु का ‘ सुक्ष्मा चासि ' ० इत्यादि मन्त्रों से ( मन्त्रब्रह्मरूप वाग्वल से ) परिग्रह किया जाता है । इसी परिग्रहक से वेदि का स्वरूप सम्पन्न होता है, अतएव इस कर्म्म को ' बेदिपरिग्रहकर्म्म ' भी कहा जाता है । भूप्रदेश के जिस भाग में वेदि बनाई जाने वाली है, उस प्रदेश के दक्षिण भाग में " सुक्ष्मा चासि शिवा चासि " बह मन्त्र बोलते हुए ' स्क्य ' से पूर्व पश्चिम अध्वर्यु एक रेखा कर देता है । बही दक्षिण परिग्रह है । दक्षिण में बाम्ब अग्नि की सत्ता रहती है । " यमो वै अवसानस्येष्टे " -- इदाद्यमाऽवमानं पृथिव्याः ' इत्यादि के अनुसार यमदेवता अवसान ( मृत्यु ) के अधिष्ठाता हैं । दक्षिणभाग से इसी मृत्युभाव का निराकरण करने के लिए- “ हे दक्षिण भूभाग आप शोभन प्रदेश हैं, मृत्युञ्जय शिव की शक्ति से युक्त, अतएव शिव हैं " यह भावना की जाती है । बज़ का नियत दक्षिण प्रदेश गमभीति से रक्षित बनें, दक्षिण परिग्रह का यही है अनन्तर- “ स्बोना चासि सुबदा चासि ' इस मन्त्र से पश्चिम परिग्रह किया जाता है । यह परिग्रह गाई त्याग्नि से सम्बन्ध रखता है । गार्हपत्य भूपिण्ड की प्रतिकृति है । गार्हपत्य ग्रह ( बर ) है | बर वही उत्तम होता है, जहाँ का धरातल सम हो, जहाँ रहने से पूर्ण सुख मिले । इसी गृहसम्पत्ति को प्राप्त करने के लिए " आप सुखरूपा हैं, आप आप अच्छी बैठक वाली हैं यह भावना की जाती है । अनन्तर— “ ऊर्जस्ती चासि पयाती च " यह मन्त्रभाग बोलते हुए उत्तर परिग्रह किया जाता है । उत्तर भाग सोममय, किवा अग्निगर्भित सोममय है । श्रवधियों में जो जीवनीय भाग ( ऊ ), एवं ' दुग्ध ' देखा जाता है, जह इसी पाशुकाग्नि की महिमा है । हमारा यज्ञ जीवनीय भाग, एवं रस भाग से युक्त रहै, दूसरे शब्दों में उत्तराग्नि- प्रदेश यजमान के लिये ऊ एवं पयोयुक्त बने, इसी भावना के लिये " हे उत्तर भूप्रदेश! किंवा पाशुकारने! आप ऊर्क युक हैं, आप पयोयुक्त हैं " यह भावना की जाती है । अन्न - वस्त्र की चिन्ता से आपादमस्तक श्राकुल- व्याकुल बना रहने वाला विशुद्ध भूतवादी - जड़वादी, अतएव - ' वर्त्त'मानवादी ' आज का भारतीय भावुक - राष्ट्रीय मानव कहता है - " हजारों वर्षो की पुरानी -सड़ी - गली -- वेद - स्मृति -- पुराणादि की जीर्ण - शीर्ण बातों का आज के नवीन युग में कोई उपयोग नहीं | अपने इसी काल्पनिक उपयोगिताबाद के व्यामोहन से व्यामुग्ध इस आज के भारतीय मानवने अपनी मूलनिधि से सर्वात्मना निरपेक्ष बन केवल भूलवादी प्रतीव्यजगत् की आधिदैविक प्राणशून्या उन जड़भूतपद्धतियों का ही प्रतिष्ठापन कर दिया है इस सांस्कृतिक - भारतराष्ट्र में जिस की मूलप्रतिष्ठा का एकमात्र आधार आधिदैविक प्राणजगत ही माना गया था । प्रसङ्ग ' बजभूमि ' का प्रक्रान्त है । एवं तत्सम्बन्ध में हीं ब्राह्मण का प्रस्तुत - सन्दर्भ प्रक्रान्त हैं । अतएव इसी दृष्टि से प्रकृत में दो शब्दों में हम उस ' यज्ञिय - भूप्रदेश ' की ओर ' अर्थ मानव ' का ध्यान आकर्षित करेंगे, जिस - ' यज्ञिय भूप्रदेश ' ६३८
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चब्राह्मण को ही ऋषि ने – सुक्ष्मा - शिवा स्योना- सुषड़ा ऊर्जस्वती - पयस्वती - इत्यादि माङ्गलिक, एवं रहम्यपूर्ण विशेषणों से समन्वित माना है । इत्थंभूता सर्वगुगान्विता भूमि को ही ऋषि ने ' इमामेवैतत - पृथिवीं-संवियरसवतीं, उपजीवनीयाम कुर्वन ' इत्यादि रूप से सस्यशामला - जीवनीयरसप्रदात्री - उपयुक्ता कहा है । ' अधिक अन्न अजाओ ' यही आज हमारे राष्ट्रीय - मानव का सर्वप्रमुख उदात्त उद्घोष है, जिस की सफलता के लिए विशुद्धा प्रतीच्या पद्धति के आधार पर ही नव - नव - आयोजन श्रविभूत - तिरोभूत जहां जारहे है धारावाहिक रूप से । तदपि राष्ट्र की ' अन्न चिन्ता ' समन्वित नहीं हो पा रही है । क्यों? । इल क्यों? का एकमात्र प्रमुख उत्तर है -- भूमि की जीवनीया उर्वराशक्ति से सम्बन्ध रखने वाले यज्ञिय.-आधिदैविक - वैष्णव- प्रारण की उपेक्षा, अनुपलब्धि, एवं तत्स्थाने च यज्ञविरोधी, जीवनीयतत्त्व के विनाशक अश्रुतपूर्ण रासायनिक खार्थी ( खादों ) का अन्धानुकरण, भीमकाय लौहयन्त्रों ( ट्रेक्टरों ) से निर्ममता रूपेण भूगर्भस्थ व प्राण का आत्यन्तिक- उत्पीड़न " । मानते हैं, और सर्वात्मना यह भी अनुभव कर रहे हैं कि, देवप्राणविरोधी, चेतनशक्तिप्रतिष्ठा-शून्य आज के प्रवृद्धतम भूतविज्ञान के अनुग्रह से कृनशरीरी तथाविध उत्तं जक रासायनिक - खाद्य, एवं भीमकाय लौहयन्त्र अवश्य ही तात्कालिक रूपेा भूमि के जीवनीय प्राण को तात्कालिक -रूपेण बहिर्भूत करते हुए कुछ समय के लिए तमुपदेशों में प्रभूतमात्रा में अन्नाशि अभिव्यक्त करने की क्षमता रखते हैं । और परिणाम स्वरूप सहज - भारतीय - पद्धति की अपेक्षा इस अभिनवा भौतिकी विज्ञानपद्धति से तात्कालिक रूपेण अन्न सम्पत्ति समृद्धा भी प्रतीत होने लगती है । एवं सम्भवतः सनातना - स्थितिभावापन्ना-- भूत - भविष्यत्परिणामानुबन्धिनी भी भारतीय नैष्ठिकी प्रज्ञा भी प्रत्यक्षप्रभावमूला तथाविधा मात्रुकता से आकर्षित होकर ही अपनी सहज - सोप्या पद्धतियों की उपेक्षा कर बहुव्यय - साध्या तथाविधा भूतविज्ञानपद्धतियों के ही अन्धानुकरण में प्रवृत्त होती जारही है । और अवश्य ही ' अर्मेधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति ' इस प्रकृतिसिद्ध सिद्धान्तानुसार इत्थंभूत निरतिशय भूतोत्पीड़न से श्रन्न सम्पत्युत्पादान में पूर्वापेक्षया इसे समृद्धि भी उपलब्ध होसकती है । यह सत्रकुछ मानते हुए भी अनुभव करते हुए भी, इस सम्बन्ध में कदापि ' श्रेयः पन्था ' की घोषणा नहीं की जासकती । क्यों कि— तथाविध उत्तेजक खाद्य से पार्थिव भूतभावात्मक - ' पूषा ' तत्व अवश्य ही तात्कालिक - रूपसे पुष्ट होसकता है । किन्तु सौर - सावित्राग्निमूलक- ' मधु ' रसमय वैष्णव- यज्ञिय प्राण ( जो प्रवर्ग्यरूप से भूगर्भ की अमुक सीमा में हीं गर्भित रहता है, वह तो असंदिग्धरूप से ही तथाविध- कृत्रिम - उत्तेजक खाद्य से दग्धरीर्य्य ही बन जाता है । एवं असीमभारान्त्रित लौहमन्त्रों ( ट्रेक्टरों ) से भी उस का सहज - प्रौम्ब-' उत्तरमूल ' का विकास सर्वात्मना अभिभूत ही होजाता है । परिणामस्वरूप, किंवा घोरघोरतम दुष्प रणाम - स्वरूप तथाविध उत्तेजक खाद्यों के समन्वय से एवं प्रचण्ड - भारान्वित लौहयन्त्रों से श्रात्यन्तिकरूपेण समुत्पीड़ित भूप्राण के समन्वय से उत्पन्न अन्न में न तो सहज ' माधुर्य्य ' ही अभिव्यक्त हो पाता, एवं न इस की यह तात्कालिकी प्ररोहण – उत्पादन - शक्ति ही चिरस्थाबिनी रह पाती । अपितु यह तो - ' शरीरान - शरीरम् ' न्यायानुगता वैसी अनात्म्या जीवनीयप्राणरसशून्या ही अन्नसृष्टि बनी रह जाती है, जिसे कदापि भारतीय दृष्टि EE
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द्वितीपध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण से- ' आत्मान्न ' तो नहीं हीं माना जासकता । माधुर्यरसविहीन, जीवनीयरस से प्रतिमूर्च्छित, केवल अवय-नमक ऐसा अन्न मात्रा में, एवं तात्कालिक रूपे आकार - प्रकार प्रदर्शनादि में ' बहू ' प्रमाणित होता हुआ भी तरयदृष्ट्या, किंवा वपाम ही बन जाता है । भूमिनिखनन उसी सीमान्त मान्य होना चाहिए, जिस सीमा पर मधुसमय - जीवनीयतस्त्रात्मक-सौर प्रवर्ग - यज्ञिय - वैष्णव- प्राण प्रतिष्ठित है । यदि प्रचण्डाघात से इस सीमा का अतिक्रमण होजाता है, तो भूगर्भस्थ भूतनाथाविध- ' पूत्रा ' भाग तो अवश्य ही तात्कालिक रूपेण अभिव्यक्त हो पड़ता है, फलस्वरूप कुछ समय के लिए ' भूतभार ' की दृष्टि से तत्प्रदेश में अन्न प्रभूतमात्रा में उत्पन्न भी होवाला है । किन्तु इस आघात परम्परा से बङ्गल ' भावोपलक्षित जीवनीय रसात्मक मधुसमय-सौर यशिप प्राण तो उत्कान्त ही हो जाता है और निश्रवन ऐसा केवल पार्थिव अन्न - ' अयज्ञिय ' ही बना रह आता है । भारतीय प्रथा केवल ' भूतान्न ' का भी समर्थन नहीं कर सकती । यदि करती है, तो वह भारतीय नहीं । ' यज्ञशिष्टाशिनः खन्तु ' के अनुसार भारतीय प्रजा का अन्न - यज्ञोच्छिषु ही माना गया है । जिस भीतिक अन्न में सौर दिव्य - देव - प्राण का भी सम्बन्ध रहता है, वही ' बोच्छिन ' कहलाया है, वही श्रार्षप्रजा के लिए ग्राह्य है । ऐसे भी कितने हीं अन्न हैं, जिनमें भूगर्भस्थ - यज्ञिय - वैष्णव- सौर- प्राण अन्तर्य्याम - सम्बन्ध से ( अमुक विजातीय प्रागविरोध से ) प्रविष्ट नहीं होने पाता । वैसे अन्न हीं ' अयज्ञियान ' कहलाए हैं । अतएव यज्ञिय - बजा के यज्ञकम्मों में वे अन निषिद्ध मान लिए गए हैं । ' अयज्ञिया वै मापा ' के अनुसार ' माप ' ( उर्दू ) इसी थे यि का अन्न है ' मसूर ' भी इसी अभि से अनुप्राणित है । अत पोष्टानुगामिनी आस्तिकता ' मसूर ' को भी अपने व्यवहार में स्याज्य ही मानती आ रही है तदित्थं इस यशिप - और प्राणानुरोच से ही भारतीय प्रजा की अव्यवस्था व्यस्थित हुई है । लशुन पक्षाडु गुञ्जनादि अपने सुरप्राण - प्राधान्य से यज्ञिय बनते हुए सर्वात्मना त्याज हीं मान लिए गए हैं द्विजाति के लिए, जबकि स्वयं श्रायुर्वेदशास्त्र ने इनके भौतिक गुणों का समर्थन किया है । अतएव केवल शरीरोपयोगी, किन्तु दिव्यासविरोधी तत्म अन्यान्य सभी शिव पदार्थ स्थास्य ही बन गए हैं धर्मशास्त्र में 1 जाणान्धी मधुमय, उरसमय सोमरसमय इसी जीवनीय - मौर पार्थिवस्या प्रकृत ब्रह्मसन्दर्भ से स्पष्टीकरण हुआ है, जिसका यजुम्मन्त्र के द्वारा ही स्वरूप विश्लेण हुआ है । कौनसा और कैसा भूप्रदेश तथाविध जीवनीय वशिय रस से समन्वित रहता है?, प्रस्तुत संदर्भ इसी प्रश्न का तात्त्विक समाधान कर रहा है, जिसके लिए यजुः संहिता के प्रथमाध्याय के सप्तम मन्त्र का निम्नलिखित अश ] दी -- शरणीकरणीय है-" सुक्ष्मा चासि शिक्षा चासि स्योना चासि " सुपदा चामि, ऊर्जस्ती चासि, पयस्वती च " । प्रत्येक शब्द अत्यन्त ही रम्य तथ्यों से अनुप्राणित है, जिसका अ स्पष्टीकरण सम्भव नहीं है । केवल दो शब्दो में ही इस दिशा का दिग्दर्शन प्रस्तुत है । ' ज्या ' नाम से प्रसिद्धा * माता पृथिवी का नाम घरा, ' ' से सम्बन्ध स्पने बाली सुप्रसिद्ध गणितप्रक्तिया ही ' ज्यामिति ' नाम से प्रसिद्ध है । अवश्य ही निरुक्रमानुष से ' ज्यामिति ' का ही रूपान्त उयामेट्री होगा एवं इसी ' ज्यामिति ' शब्द से ' जमीन ' शब्द व्यक्त हुआ होगा । I
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द्वितीय अध्याय शतपथब्राहाण पञ्चमब्राह्मण धरित्री, और धरिणी भी है, जिन इन सभी शब्दों का मौलिक अर्थ यद्यपि सर्वथा विभिन्न ही है । तथापि अमुक समानधर्मानुबन्ध से इन शब्दों को अमुक सीमा पर्यन्त पर्याय भी माना जासकता है । भूपिण्ड में प्रतिष्ठात्मक - स्थितिधर्म्मात्मक एक वैसा ' प्राण ' है, जिसके द्वारा भूपिण्ड ' अभूद्वा इयं प्रतिष्ठा - सर्वेषाम्, नम्माद् - भूमिरभवत् ' ( शत ० ६ | १ | १ | १० ) के अनुसार ' भूमि ' नाम से भी प्रसिद्ध होरहा है । प्रति-ष्ठा का इस धृति ( धारणशक्ति ) से ही यह घरा - घरित्रो - धरणी आदि नामों से व्यवहृत हुई है । सृष्टि-प्रक्रिया के अनुसार भूपेण्ड का मौलिक उपादानद्रव्य ' पानी ' ही माना गया है, जैसाकि - ' अद्द्भ्यः पृथिवी ' इत्यादि से स्पष्ट है । पतत्त्व अपने सहज ' ऋत ' धर्म के कारण प्रतिष्ठाशून्य है । अतएव पानी के स्तर पर गुरुत्ववर्म्मावच्छिन्न कोई भी भूतपदार्थ प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । श्रपितु तत्काल वह अब गर्भ में हीं निम-ज्जित होजाता ( डूब जाता ) है । ऐसे प्रतिष्ठाशून्य, धृतिगुणशून्य श्र से ही ग्राप: - फेनादि कम से भूषिण्ड का स्वरूप निर्माण हुआ है । प्रश्न उपस्थित है कि, प्रतिष्ठात्मक - धृतिगुण से शून्य अपद्रव्य ही जिस भूपिण्ड का मौलिक - उपादानद्रव्य है, वैसे भूपिण्ड में धृतिगुणक प्रतिष्ठाभाव कैसे, और कहाँ से आ गया? । इस प्रश्न का एक सुप्रसिद्धा यजिय - प्रक्रिया के माध्यम से ही परोक्ष समाधान करते हुए ऋषि ने कहा है कि आहुतिद्रव्यरूप अन्य ( घृत ) यद्यपि तरल है, अतएव प्रतिष्ठाशून्य है, अतएव घनतानुबन्धी धृतिगुण से विरहित है । तपि क्योंकि इस तरल प्रतिष्ठाशून्य भी आज्य में क्योंकि हिरण्यशकल ( सोने का टुकड़ा ) डाल कर ही इसकी आहुति दी जाती है, अतएव अनस्थिमत् भी इस आज्य से अस्थिमती प्रतिष्ठावती- प्रजा उत्पन्न होजाती है " । यज्ञिय आहुतिद्रव्य से ही यजमान का नवीन सशरीर - दैवात्मा उत्पन्न किया जाता है । वह ग्राहुति-द्रव्य अमुक यज्ञविशेष में है— ' आाज्य ' ( घृत - घी ) । इसीके सम्बन्ध में तत्र समवेत किसी वैज्ञानिक ने प्रश्न क्रिया कि, –'अनस्थिमद्ध्यते, कथमस्थिमत- प्रजायते ' । अर्थात् ' बिना हड्डी वाले ( घनताप्राण-शून्य - तरल ) इस आज्यद्रव्य की तो आहुति दी जाती है, और संकल्पित है अस्थिमती प्रजा । वह कैसे उत्पन्न हुई, जबकि उपादनभृत आज्यद्रव्य अस्थिभाव से शून्य है? | इसी प्रश्न का उत्तर है-' हिरण्यशकलं निवाय जुहोति तस्मान् इत्यादि । तात्पर्य स्पष्ट है । याज्य अवश्य तरल, थतएव अनस्थिमत, अर्थात् प्रतिष्ठात्मक वृतिगुणक अस्थिभाव से शून्य है । किन्तु इसमें हिरण्यशकल जो है । वह तो स्थितिमत् है | क्या तात्पर्य्य?, इस नवीन ' क्या '? का उत्तर है— ' प्रजोत्पत्तिविज्ञान ', जिसके स्पष्टीकरण का अत्र अवसर नहीं है । यज्ञानुबन्ध से प्रश्न वस्तुतः सृष्टिप्रक्रिया से ही अनुप्राणित है । पिता के शुक्र, तथा माता के शोणित, इन दोनों के चिन्मय पुराण - स्त्रीभ्रूणों के दाम्पत्यमूलक - मिथुनभाव से ही प्रजोत्पत्ति होती है । उपादानभूत शुक्र, और शोणित, दोनों ही क्रमशः भार्गव आङ्गिरम - ग्रापोद्रव्यात्मक - प्रतिष्ठा-शून्य - अनस्थिमत् तरल ही पदार्थ हैं । इन अनस्थिमद् भावों से अस्थिमती ( हड्डी वाली ) प्रजा कैसे उत्पन्न होगई?, यही पूर्व प्रश्न का समन्वय है । ' हिरण्यशकल ' का अर्थ है - ' सत्य यज्ञ - प्रतिष्ठात्मक - अश्मा-सोमगर्भित - सौर- हिरण्य- प्राण ' । वह साक्षाद्रूप से, अपने ब्रह्मौदनरूप सत्यरूप से शुक्रशोणित में प्रतिष्ठित नहीं होता । ग्रपितु धर्म्मयागात्मक - छिन्नशीर्षभाग से अनुप्राणिता सुप्रसिद्धा विस्रसनप्रक्रिया से सम्बन्ध रखने वाला, सौरसत्ययज्ञ - मण्डल से ' ऋतु ' रूपेण प्रयुक्त ( पृथक् ) होजाने वाला - ' प्रवर्ग्य ' नामक III
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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड पचमब्राह्मण ' सौर सावित्र वैष्णव यज्ञिय तेज ' ही शुक्र शोणित रूप श्राज्य ( तरलद्रव्य ) में प्रतिष्टित होता है, एवं इसी सौर प्रवर्ग ( शकल - खण्ड ) रूप - हिरएयतेज से प्रजा के ' अस्थि ' भाग का स्वरूप निर्माण होता है । शारीरिक माम - मेट - मज्जा - सक आदि ऋतधातु जहाँ शुक्रशोणितात्मक चनते हुए आषोमय हैं, श्रतएव अप्रतिष्टित हैं, वहाँ ' अस्थि ' भाग मौरप्रवर्ग्यहिरण्यतेजोमय है, वही तात्पर्य्य - निष्कर्ष है । ठीक यही स्थिति भूपिण्ड की समझिए । ऋतधम्मां प्रतिष्ठाशून्य पानी में ऋतधर्म्मा, श्रतएव प्रतिष्ठाशून्य हीं वायु का प्रवेश हुआ । वायु के प्रवेश से तदवच्छिन्न पानी बुद्बुद ( बुलबुला ) रूप में परिगत होगया । एवं प्रतिष्ठालक्षण धृतिगुण के अभाव से तत्क्षण ही बुदबुद फूट गया । यह प्रक्रिया निरन्तर जल-स्तर पर प्रक्रान्त रहती है वायुः संघात - परम्पराओं के अनुग्रह से । यही मूलप्रक्रिया भविएड की जन्मदात्री बनी है, जिसके विस्तार का यहाँ अवसर नहीं है । यदि इन दोनों ऋत भावों का ही चंक्रमण प्रमुख बना रहता, तो कदापि भूपिण्ड बिएड रूप में परिणत न होता । किन्तु पानी, और वायु दोनों के मध्य में साम्वत्सरिक-सौर - प्रवर्ग्य- हिरण्यश कलात्मक तेज प्रविष्ट होजाता है । इसी तेजःसंयोग से बुदबुदावच्छिन्न श्रब - वायु प्रतिमू च्छित होजाते हैं, जिस इष प्राथमिक अवस्था का नाम ही है- ' फेन ' [ झाग ] | तदित्थं वायु के संघर्ष से, तथा तेजःसंयोग से यही फेन उत्तरोत्तर- घनता का अनुगामी बनता हुआ मृनसिकता शर्वरा श्रश्मा अय: - हिरण्य - इन प्रतिष्टा भावों में परिणत होजाता है । और यों इन अचादि - हिरण्यान्त श्राट प्रतिष्टा-भात्रों के शत्मवगमायनिक सम्मिश्रण से प्रतिष्टात्मक ' भूषिण्ड ' का स्वरूप सम्पन्न होजाता है । यों पोमय भी भूपिण्ड सौर हिरण्यरूप गज़िय तेज को स्वगर्भ में प्रतिष्ठित कर धृतिलक्षण प्रतिष्टागुण से समन्वित होता हुआ ' भूमि ' रूप में परिणत होजाता है । इसी धृतिगुण में आज यह भूपिण्ड क्योंकि स्वपृष्ट पर अतुलित - भार बहने करने की ' क्षमता ' से सर्वात्मना समन्वित, समर्थ बना हुआ है, अतएव - [ सौर मज्ञिय वैष्णव- दिव्य-तेज को गर्भ में धारण करने से ही ] सब कुछ सहसकने में समर्थ बनता हुत्रा - भूपिण्ड - ‘ सुक्ष्मा ' [ सर्वं क्षमते ] नाम से श्रमिद्ध हो रहा है । क्षमताप धृतिगुगा ही इसे ' सुक्ष्मा ' बनाए हुए है । और वह गुण स्वयं इसका न होकर प्रयुक्त सौर- बैष्णव यज्ञिय तेज का ही है । दुर्भाग्यवश यदि मानवीय प्रज्ञापराध से भूषि-एड का यह यज्ञिय - वैष्णव- सौर - तेज- श्रभिभूत हो जाता है, अथवा जो उत्क्रान्त कर दिया जाता है सौर - दिव्य-भाव - विरोधी लीयन्त्रादि से, तो निश्चयेन भूपिण्ड का ' दमा ' भाव ग्रभिमत ही होजाता है । फलत: ऐसे ' क्ष्मा ' शून्य, अतएव च केवल मृत्पिण्डात्मक भूभाग से उत्पन्न भूतमात्रप्रधान यजियन का भोक्ता मानव भी धृतिगुण से, प्रतिष्ठात्रल मे शून्यं शून्यं हीं बना रह जाता है । अब यह आवश्यक है कि, सर्वतोभावेन हम भूषि rs को ' सुक्ष्मा ' ही बनाए रहें । कदापि प्रचण्डाधातों से इसके गर्भस्थ वैष्णव प्रतिष्ठाप्राण को उत्-क्रान्त न करें । इसी तथ्य के आधार पर ऋत्रिप्रज्ञात्मक भारतराष्ट्र के चार्प कृषक के द्वारा काष्ठमय वैसे ' हल ' का ही आविर्भाव हुआ, जिससे पधि - मूल- पर्यन्त ही भूनिखनन -- सम्भाबित था शान्ति - स्वस्ति-रूप और यों अपने विष्णुतेजोमय प्रतिष्ठानराणात्मक- ' दमा ' भाव से ' सुक्ष्मा ' बनी रहने वाली माता पृथिवी ही हमारे लिए शान्ति स्वस्ति - पूर्वक - यज्ञियान्न प्रसृत करती हुई ' शिवा ' बनी रहती थी । ' सुक्ष्मा ', ग्रतएव च शिवा ऐसी ही माता धरित्री शान्ति स्वस्ति - प्रद - यज्ञियान्न उत्पन्न करती हुई अपनी पार्थिवी - प्रजा का भरणपोषण करती हुई इस के लिए सर्वात्मना ' सुपदा ' प्रमाणित होती हुई - ' स्योना ' ( सुखप्रदात्री ) प्रमा-II