Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 681–690
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 681–690
पृष्ठ 681
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमत्राह्मण णित हो रही थी | अपने तथाविध प्रतिष्ठात्मक सौर- यज्ञिय तेज मे सदा समन्वित रहने के कारण हीं माता-पृथिवी प्रतिष्ठा से --शून्य-- क्षत - विक्षत भग्न- त्रुटित उच्च ग्रवच विषम याद भावों से संस्पृष्ट प्रमाणित होती हुई सर्वोत्ना समरातात्मिका ' उर्वराश ' ( प्रजननशक्तिमती ) बनी रहती थी । अपने प्रतिष्ठात्मक इसी सम-धरामानुबन्ध से यह ' सुपड़ा ' बनी रहती थी । और यों इत्थंभूत दिव्य भावों से सञ्चालिता माता धरित्री सौर - दिव्य -मधु - रसात्मक, जीवनीयरसात्मक ' ओजः ' - स्वरूप सम्पादक - ' उ ' रस से ' ऊर्जस्वती ' तथा मोमा-त्मक योगुण से पयस्वती बनती हुई सर्वात्मना हमारे लिए उपजीव्या प्रमाणित होरही थी । इत्थंभूता सौर-यज्ञिय - दिव्यप्राणगर्भिता, अतएव सुक्ष्मा - शिवा - स्योना - सुबदा - ऊर्जस्वती - पयस्वती यज्ञिया -- भूमि ही हमारी ' बज्ञिया - वेद ' बनी हुई थी, जिस के आधार पर ही हम ' यावती वै वेदिस्तावती पृथिवी ' जैसे महान् उदात्त उद्द्घोष करने में सक्षम बने हुए थे, जो क्षमता आज के भूत - व्यामोहन में आसक्त होकर, तद-नवी दिव्याण - विरोधी, यज्ञियप्राण प्रतिबन्धक -- भत - भौतिक -- विजुग्भणों के द्वारा हमनें सर्वथा ही विलुप्त करली है । और यों अपने मौलिक शान्ति स्वस्ति मूलक - ऋद्धि - वृद्धि - तृषि - पुषि - प्रद प्रकारों की उपेक्षा कर सर्वथा से श्रयज्ञिय - प्रकारों का ही आज हमनें अन्धानुकरण उपक्रान्त कर लिया है अपनी मूलविज्ञान--निधि से अपरिचित रहने के कारण जिस उपक्रान्ति से कृष्णमृगानुबन्धी इम यज्ञिय - भारतराष्ट्र का तो कदापि श्रभ्युदय सम्भव नहीं है । माता धरित्री के अभ्युदय संसाधक इह्रीं ऋतिपय तथ्यों के माध्यम से इस के उपजीवन य -- रस भाग की ओर भगवान् याज्ञवल्क्य के द्वारा या भारतीय प्रजा का ध्यान आकर्षित हुआ है, जैसा कि प्रक्रान्ता कण्डिका के उपसंहारात्मक – “ इमामेवैन - पृथिवीं संविद्य रसवर्ती, उपजीवनीयामकुर्वत ' इस वाक्य से स्पष्टतम है ॥। ११ ॥ प्रकारान्तर से यों समझिये कि दक्षिणाग्नि परिपाक करने वाला है । परिपाक से मिट्टी का ' श्लथ ' भाव नष्ट हो जाता है, मिट्टी दृढ़ बन जाती है । इसी परिपाक से वह मसृणा ( चिकनी ) भी बन जाती है । यही इसका सुक्ष्माभाव ( शोभनभूमिभाव ), एवं ' शिवभाव ' है । गार्हपत्याग्नि प्रतिष्ठारूप है, यही प्रजनयिता है, वही स्वरूपसम्पत्ति है । उत्तरोत्तर ' उर्जरा ' बने रहना हीं इसका सुपदा, एवं स्योनाभाव है । मृत्तिका को रसयुक्त, एवं बलयुक्त बनाने के लिए तीसरा परिग्रह किया जाता है । ये तीनों परिग्रह ' भूमिपरिग्रह ' हैं । पहिले के " गायत्रेण वा छन्दसा परिगृह्णामि " इत्यादि तीनों परिषद् प्राणपरिग्रह हैं । प्रारूप विष्णु को छन्दों से परिग्रहीत किया जाता है, एवं भूतमय विष्णु का भूपिण्ड से परिग्रहण किया जाता है । इसप्रकार सम्भ्य ६ परिग्रह होजाते हैं । व्यापक विष्णुत्र पडऋतु की समष्टि ही संवत्सर है, एवं यही यज्ञसम्पन है । उक्त ६ परिग्रहों से यजमान का यह वैध यज्ञ प्राकृतिक पडऋतुरूप सम्वत्सरयज्ञसम्पत् मे युक्त होजाता है । दूसरे शब्दों में यों समझिए कि, पूर्व के तीन परिग्रह ' लोकी ' परिग्रह हैं, एवं उत्तर के तीन परिग्रह ' लोक ' परिग्रह हैं । लोक भूतप्रधान हैं, एवं लोकी प्राणप्रधान हैं । इस क्रम से दोनों का यज्ञ के साथ सम्बन्ध होनाता है । साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि, पूर्व के तीन परिग्रहों में ६ व्याहृतियाँ हैं, एवं उत्तर के परिग्रहों में ६ व्याहृतियाँ हैं । इस प्रकार १२ व्याहृतियाँ होजातीं हैं । यज्ञसम्पत् - रहस्पवेत्ताओं को विदित होना चाहिए कि, द्वादश व्याहृतियाँ में भी द्वादशमासात्मिका सम्वत्सरमूर्तिमयी यज्ञ विष्णुसम्पत् परिग्रहीत होजाती है । पूर्व, एवं उत्तर-परिग्रहों से सम्वन्ध रखने वालीं वे १२ व्याहृतियाँ आगे के परिलेख से स्पष्ट होजातीं हैं । ६४३
पृष्ठ 682
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीय अध्याय द्वादशव्याहृतिपरिलेख: I १ – १- गायत्रेण त्वा २ - २ -- छन्दसा परिगृह्णामि प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण | ' गायत्रेण त्वा छन्दसा परिगृह्णामी ' ति दक्षिणतः १ ( १ ) ३–३१ - त्रैन्टुभेन त्वा | ' त्रैष्टमेन वा छन्दमा परिगृहणामी ति ४ - ४ - छन्दसा परिहामि पश्वात् २ ( २ ) ५-५ -- जागतेन त्वा पट्टभिर्व्याहृतिभिः गृह्णाति परिग्रहं त्रिरुत्तरं पभिर्व्याहृतिभिः गृह्णाति परिग्रहं त्रिपूर्व " परिगृह्णाति तावतमेवैतत् -मात्रा यावत्यस्य यज्ञो यावानेव स " ७- १- सुक्ष्मा चासि ८-२- शिवा चासि ६- ३ - म्योना चासि ६ - ६ - छन्दसा परिगृह्णामि ' जागतेन त्वा च्छन्दसा परिगृह्णामी ' -त्युत्तरत: ३ ( ३ ) 1 ' सुक्ष्मा चासि शिवा चासी ' ति दक्षि-णतः १ ( ४ ) ' स्योना चासि सपदा चासी ' ति पश्चात् १०- १४ - सुषदा चासि 1 २ ( ५ ) ११- ५ ऊर्जस्ती चासि 1 ' ऊर्जस्वती चासि पबस्वती चे ' त्युरन्तरतः । १२--६-- पयस्वती च ३ [ ६ ] ॥ १२, १३ ॥ I II
पृष्ठ 683
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमत्रह्म प्रद्धति - प्रकरण में ( मूलानुवाद में ) वेदि - निर्माण- प्रकार बतलाते हुए कहा गया है कि, कितनें हीं ( तैत्तिरीय - सम्प्रदायानुयायी ) याज्ञिकों के मतानुसार वेदि का पश्चिम भाग ( श्रोणी भाग ) व्याममात्र ( दो हाथ ) चौड़ा होना चाहिए, एवं पूर्व भाग ( अंस भाग ) तीन अरत्नि ( १ || हाथ ) चौड़ा होना चाहिए । इस का प्रतिवाद करते हुए वाशवल्क्य कहते हैं कि, ' व्याममात्री - अरत्नि ' इस ठीक परिणाम की अर्गला की कोई ग्रावश्यकता नहीं है । यजमान अपने अनुमान से जितना मान ठीक समझे, उसी चौड़ाई से वेदि का निर्माण कर लेना चाहिए । तात्पर्य्य यही है कि, आधिदैविकयज्ञ से आध्यात्मिकयज्ञ ( पुरुष ) का स्वरूप निष्पन्न होता है । जैसा स्वरूप अण्डब्रह्माण्ड का है, ठीक वैसा ही स्वरूप पिण्डब्रह्माण्ड का है । हमारा शरीर प्राकृतिक यज्ञ की प्रतिकृति ही है । इसी श्राधार पर " यज्ञो वै पुरुषः " - " पुरुषो वै यज्ञः " इत्यादि यज्ञपुरुष के अभेद - सूचक निगम वचन प्रतिष्ठित हैं । दोनों यज्ञ ईश्वर की रचना है । दोनों हीं एक प्रकार से प्राकृतिक यज्ञ हैं । इधर प्राकृतिक यज्ञ के अनुसार ही आधिभौतिक यज्ञ का ( मनुष्ययज्ञ का ) चितान हुआ है । यही कारण है कि, इस काल्पनिक यज्ञ में आध्यात्मिक एवं आधिदैविक, दोनों यज्ञों के स्वरूप का विचार रखना पड़त है । यदि कोई वैधयज्ञ में सावधानी कर देता है, तो ऋषि अध्यात्म-अधिदैवत - यज्ञ का स्वरूप चतलाते हुए उस का संशोधन कर देते हैं । यहाँ ऐसा क्या होता है?, इस का समाधान वही प्राकृतिक अधिदैविक, एवं आध्यात्मिक यज्ञ है । पुरुष यज्ञपुरुष है । स्त्री यज्ञपुरुषरूप पुरुष ( मनुष्य ) की प्रतिष्ठा है । यहाँ भी यज्ञ पुरुषस्थानीय है, एवं वेदि स्त्रीस्थानीया है । स्त्री वही सुन्दर मानी जाती है, जिसका श्रोणिभाग विपुल हो, अंसंभाग संकुचित हो । अतः यहाँ भी वेदि का श्रोणी- स्थानीय पश्चिम भाग विपुल होना चाहिए, एवं अंसस्थानीय पूर्वभाग संकुचित होना चाहिए । " श्रागे से संकुचित, नीचे से विपुल " यज्ञसम्पत् यहीं समाप्त है । इस का यह तात्पर्य लगाना कि, " आगे से व्यरत्नि हो, नीचे से व्याममात्री ही हो " विज्ञानदृष्टि से बहिर्भूत है । यजमान अपनी इच्छा से यश्चैन्छ परिणाम रख सकता है । हाँ, उसे प्रत्येक दशा में यह ध्यान अवश्य रखना होगा कि, वेदि पश्चिम में विपुल, एवं पूर्व में संकुचित है अथवा नहीं । ' आभिरूप्य - सोन्दर्य ' ही वास्तविक सौन्दर्य माना गया है, जैसा कि - ' आभिरूप्याञ्च बिम्बानाम् ' इत्यादि औौपासनिक वाक्य से स्पष्ट है । जिसे लोकभाषा में साँचे में ढला हुआ ' कहा जाता है, उसी का नाम है -- ' अभिरूप सौन्दर्य्य ' । वेदि यज्ञपुरुष की पत्नी है, अर्थात् ' स्त्री ' है । अभिरूप - सौन्दर्य से समन्विता नारी ही पुरुष के प्रकृतिसिद्ध श्रद्धा वात्सल्य स्नेह - काम - नामक चतुर्विध रागभावों की समन्वितावस्थारूप सृष्टिप्रवर्तक-सुप्रसिद्ध - ' रतिप्रेम ' की अधिष्ठात्री मानी गई है । वस्तुस्थिति ऐसी है कि, सौन्दर्य्य रूप, अभिरूप, भेद से ढो भागोंमें विभक्त है । सौन्दर्य के अधिष्टाता इन्द्र, और त्वष्टा, नामक दो प्राणविशेष वैदिक विज्ञान में प्रसिद्ध हैं । इन्द्र ' रूपसौन्दर्य्य ' के अधिष्ठाता हैं, एवं त्वष्टा- ' अभिरूपसौन्दर्य ' के अधिष्ठाता हैं । शिल्पी वही विशिष्ट शिल्पी माना गया है, जिस की रङ्गरञ्जिता तूलिका में इन दोनों सौन्दयों के चित्रण की क्षमता रहती है | इन्द्र जहाँ वर्णरूप के अधिष्ठाता हैं, वहाँ त्वष्टा आकार रूप के अधिष्टाता हैं । हरित - नोल-पीत -- रक्त- धूम्र - श्वेत- कृष्ण - बभ्रु -- आदि आदि पृश्निभावात्मक जितने भी वर्ण ( रँग ) हैं, सभी ' वर्णरूप ' नाम से प्रसिद्ध हैं, एवं रूपं रूपं मघत्रा बोभवीति ' ( ऋक्संहिता ) के अनुसार सौररश्मिभुक्त ६४५
पृष्ठ 684
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण ' मघवा ' नामक इन्द्रप्राण ही इन बच्चयावत वरूपों के अधिष्टाता एवं प्रवर्तक हैं । इसी वरूण का नाम है -- ' रूपसौन्दर्य्य ', ÷ । दूसरा है - ' अभिरूपसौन्दर्य | आकाररूप का ही नाम ' अभिरूपता ' है, जिस इस अभिरूपात्मक आकाररूप का प्रवर्त्तके ‘ त्वष्टा ' आण माना गया है, जैसा कि - ' त्वष्टा रूपाणि विशतु त्वष्टा वै रेतः सिक्तं विकिरोति ' इत्यादि से स्पष्ट है । आकाररूप ही वर्णरूप की प्रतिष्ठा माना गया है । वयोनाधात्मक छन्द का नाम है- आकार, एवं वयोरूप छन्दित वस्तु का नाम है- ' आकारित पदार्थ ' | पदार्थ, और पदार्थ का आकार, दोनों क्रमशः इन्द्र, और त्वष्टा से अनुप्राणित हैं । दोनों में आकार ' आधार ' है, आका-रित वस्तु आवेय है | छन्दोरूप त्वा आधारात्मक सौन्दर्य की, छटित ऐन्द्र आधेय - मौन्दर्य की प्रतिष्टा बना करता है । अतएव दोनों में प्रमुख स्थान त्वाष्ट्राकार- सौन्दर्य्यरूप - अभिरूपसौन्दर्य ' का ही माना गया है । कदापि श्वेत - कृष्ण पीत- हरित - ( काला - गौरा - श्रादि ) व सौन्दर्य के मापदण्ड नहीं बना करते । श्रपितु प्रभु-स्वरूपेण आकारविशेष ही सौन्दर्य का प्रमुख मापदण्ड बना करता है । विशिष्टाकार से समन्वित प्रत्येक वर्ण [ रँग ] जहाँ सुन्दर बन जाता है, वहाँ निकृष्टाकारों से विशिष्ट भी वर्णं निकृष्ट बनता हुआ सौन्दर्य्य की सीमा से बहिर्भूत होता है | अतएव वर्णरूपात्मक ऐन्द्र - रूपसौन्दर्य, तथा आकाररूपात्मक त्याष्ट्र - अभिरूप-सौन्दर्य्य, दोनों में ‘ अभिरूप - सौन्दर्य ' ही प्रमुख मान लिया गया है, जैसा कि ' आभिरूप्याच्च बिम्बानाम् ' इत्यादि पासनिक - वचन से स्पष्ट है * । प्रतिमा का अथवा तो चित्र का वर्णात्मक रूपसौदर्य इनके ग्राकारात्मक अभिरूप सौन्दर्य पर ही प्रतिष्ठित माना गया है । वर्णतः कृष्ण - पाषाणमयी भी प्रतिमा ग्राकारसौन्दर्य से जहाँ स्वम्बरूप से अभिव्यक्त होपड़ती है, वहाँ वर्णत: विशिष्टा भी प्रतिमा आकारविकृति से अपने वैशिष्ट्य से वञ्चित होजाती है । यही स्थिति चित्रात्मक शिल्प की है । अतएव भगवान् याज्ञवल्क्य ने यहाँ वेदिरूपा नारी के सौन्दर्य के सम्बन्ध में वष्ट्राप्राणात्मक आकाररूपात्मक अभिरूपसौन्दर्य को ही प्रमुख माना है । बज़पुरुष की यो ( पत्नी स्थानीया ) यह वेदि पश्चाद्वरीयसी मध्ये संहारिता, तथा पुरस्ता दुर्बी-आकार - भावों से समन्वित रहती है । एतदाकारसौन्दर्ययुक्ता, अभिरूपसुन्दरी नारी की ही लोक में प्रशंस । होती है - ' एवमेव हि योषां प्रशंसन्ति ' । ' पश्चाद्वरीयसी ' का अर्थ है - पृथुश्रोणिः । ‘ मध्ये संह्वारिता ' का अर्थ है - ' मध्ये संग्राह्या ' एवं ' पुरस्तादुर्वी ' का अर्थ है - ' त्रिमृष्टान्तरांसा ' । श्रोणिद्वय विथुलाकारस— समन्वित, मध्य - कटि प्रदेश हस्तग्राह्यमर्थ्यादया सूक्ष्म ( कृशोदरी ), एवं अभाग श्रोणपेक्षया थोड़े नत, किन्तु विस्तृत | ही गोवा का अन्यतम अभिरूप - सौन्डर्स है, जिसे ' प्रजनन ' का मूलाधार माना गया है ॥ १४, १५, १६ ॥ --- विशिष्टतम रूपसौन्दर्य से सम्पन्ना नारी के लिए राजस्थान में ' रूप का डला ( रूपराशि -रूपस्तूप, रूप का ढेर ) यह शब्द प्रसिद्ध है |
* चर्चकस्य तपोयोगात्, अच्चनस्यातिशायिनात् ।
अभिरूप्याच्च विम्वानां देवः सान्निध्यमृच्छति ॥
६४६
पृष्ठ 685
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमत्राह्मण तथाभूता श्रभिरूपसदगुणान्विता यशिया वेदि प्राकृ, अथवा तो उड़, दोनों में से किसी एक दिशा की ओर ही प्रवणा होनी चाहिए | कारण स्पष्ट है । मानव मर्ग का उत्तरदिशा से प्रधान सम्बन्ध है, एवं देवसर्ग का पूर्वदिशा से सम्बन्ध है । मानवसृष्टि रेतोमयी भूत है एवं देवसृष्टि प्राणमृष्टि हैं । प्रागणपति प्राणात्मक इन्द्र पूर्वदिशा के दिकपाल हैं, एवं भूतपति चन्द्रमा ( सोम ) उत्तरदिशा के दिक्पाल -' चन्द्रमसा तो नव आभृतम् ' इत्यादि कीपीतकि सिद्धान्तानुसार चान्द्र सोम ही ऋतु - स्वरूप का जनक बनता हुआ शुक्रात्मक रेतो - रूप में परिणत होता है एवं रेतःशुकाहुति ही मानवसृष्टि का प्रमुख बीज माना गया है । तत्प्रधानता क्योंकि सौम्या उत्तरदिक् में ही है । अतएव उत्तरादिकू ( उत्तर दिशा ) साम्य - शुक्र - प्रधान मानव की प्रातिविक ऋतु मानली गई है, जबकि प्रागेन्द्र के प्राधान्य से पूर्वादिकू देवताओं की दिशा मानी गई है । प्रथम तो वेदि इस ओर ही प्रवणा ( झुकी हुई ) होनी चाहिए । यदि इस ओर सुविधा न हो, तो स्वादिरूपा उत्तर दिशा की ओर भी बेटि प्रथा रक्सी जासकती है । किन्तु भूल कर भी इसे दक्षिणप्रवण तो कदापि नहीं बनाना चाहिए जो सौम्यप्राण उत्तर में मानव के जीवन की मूलप्रतिष्ठा है, वही दक्षिणानुगत बनता हुआ । पितृप्राणात्मक बन कर मानव की मृत्यु का कारण बन जाया करता है । अतएव दक्षिण दिशा को याम्यादिक ( यमराज की दिशा ) माना गया है । ' ददायमोसा सानं पृथिव्या - यमो वे अवसानस्येष्टे ' इत्यादि मन्त्रब्राह्मण - अतियों के अनुसार दक्षिणस्थ याम्य-वितर तो अवसान के ही अधिपति माने गए हैं । अतएव मानव को स्वप्राण का आभिमुख्य कदापि दक्षिण-दिशा की ओर नहीं करना चा हए । इसी आधार पर नोदीची नशिराः शयीत ' ( उत्तर दिशा की ओर मस्तक करके कभी शयन नहीं करना चाहिए ) यह यादेश हुआ है । क्योंकि ऐसा करने से प्राणगि दक्षिणाभिमुख ही बन जाया करती है, जो कि आयुः प्राण पर व्याघात करने वाली मानी गई है । अतएव भारतीय - ' वास्तुशास्त्र ' ( भवन निर्माणादि शिल्पशास्त्र ) में दक्षिण की ओर गृहद्वार रखना आत्यन्तिक रूपेण निषिद्ध माना गया है । निगमनिष्ट स्थगीय श्रीजयसिंहजी नृपतियर के तत्वावधान में विनिर्मित जयपुर नगर का समस्त गृहाशल्प इसी नियम से अनुप्राणित था, जो आज के युगधर्म के द्वारा यत्र - तत्र परिवर्तित होगया है । प्राक् प्रवणा, अथवा तो उदक् प्रावैदि के तथोक्त याम्य - दक्षिणप्रान्त को मिट्टी डाल कर थोड़ा उन्नत कर देना चाहिए । इस से दो तथ्य सिद्ध हो जाते हैं । उन्नतभाग से बेदि का दक्षिणप्रवणता दोष सर्वात्मना हट जाता है । दूसरे वेदि ' पशुसम्पत्ति ' से भी समन्वित होजाती है । परिशिष्टात्मक नाग का ही नाम, श्लथ मिट्टी का ही नाम - ' पुरीप ' है, को अनात्म्य है । आत्मस्वरूपामिव्यक्तित्व से वञ्चिता पशुसृष्टि ' अनात्म्या ' है, प्रवर्ग्य है, पुरीषरूपा है, अर्थात् प्रवर्ग्यात्मिका है । पृथग्भूता मिट्टी प्रवर्ग्य - स्थानीया बनती हुई निटाने साज्ञात - ‘ पशु ' है । अतएव इस पुरीष - विधान से वेदि अवश्य ही पशुसम्पत्ति से भी समन्विता होजाती है । क्या दक्षिणस्थ याम्य - रुद्र इस पशुसम्पत्ति को नष्ट नहीं कर देगा, जिसे कि पुरीष - निदानेन वेद्रि के दक्षिण भाग में प्रतिष्ठित किया गया है? नहीं, इसलिए कि, याम्यरुद्र तो स्वयं ' पशुपति ' है । अतएव वे तो रक्षक हीं हैं इन दक्षिणस्थ - पशुओं के । उक्त कथन का तात्पर्य यही है कि, आधिदैविक यज्ञ तथा आध्यात्मिक यज्ञ का जैमा स्वरूप है, इस आधिभौतिकी केटि का स्वरूप भी उसी अनुपात से वितत होना चाहिए । वेदि की स्वरूप सम्पत्ति से सम्बन्ध
पृष्ठ 686
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण रखने वाले इसी तथ्य का अत्र समन्वय हुआ है, जिसके अनन्तर ' प्रतिमार्जन कर्म्म ' ही उपस्थित हो-रहा है || १७ || प्रतिमार्ज्जुनकम्मोपपत्ति--उत्तर - परिग्रहानन्तर स्पय से उत्पाटित मिट्टी को समन्त्रक बाहिर फेंकना हीं ' प्रतिमार्जन कर्म ' है । जिस मन्त्र से यह कर्म किया जाता है, वह निम्न लिखित है-" पुरा करस्य विसृपो विरप्शिन्नुद्रादाय पृथिवीं जीरदानुम् | यामैरेयंश्चन्द्रमसि स्वधाभिस्तामु धीरासो अनुदिश्य यजन्ते " ॥ -यजुः सं ० १२८ मं ० " हे विरपशिन! विसृपः ( करस्य ) पुरा ( देवा: ) जीवदानु यां पृथिवीमुदादाय स्वधा-भिचन्द्रमसि - ऐरयन्, तामु श्रनुदिश्य - धीरासः - यजन्ते " । हे विष्णो! विविध योद्धाओं की इधर उधर दौड़ भाग ( सर्पण - झपाटा ) के कारण ' त्रिसृप ' नाम से प्रसिद्ध क्रूरकर्म्मा, अतएव ' क्रूर ' नाम से प्रसिद्ध ग्राम से पहिले देवताओंने जीवनीय जिस पृथिवी को ( पृथिवी के जिस जीवनीय भाग को ) ( धरोहर के रूप में ) चन्द्रमा में प्रतिष्ठित किया था, उसी ( जीवदानु भाग ) को लक्ष्य में रख कर धीर याज्ञिक यजन करते हैं " -यह है मन्त्र का अक्षर।र्थ | इस मन्त्र की सङ्गति लगाती हुई ब्राह्मणश्रुति कहती है कि- " किसी समय युद्ध की आशङ्का से देवताओं ने युद्ध से पहिले ही परस्पर की मन्त्रग्ा । से यह निश्चय किया कि, " इस भूपिण्ड पर जो अपना याज्ञिक अमृतमय देवयजन भाग है, उसे कुछ दिनों के लिए चन्द्रमा में रख दें । यदि जीत गए, तो पुनः इसे ले लेंगे । नहीं, तो जीवनीय रस के आधार पर पुनः असुरो को परास्त कर देंगे । फलतः देवताओंने उस जीवनीय भाग को धरोहर के रूप में चन्द्रमा में प्रतिष्ठित कर दिया " । प्रकृत यज्ञ में चन्द्रमा में सुरक्षित उसी देवयजन भाग की ( भावना द्वारा ) प्राप्ति के लिए उक्त मन्त्र से प्रतिमार्जन किया जाता है । उस देवयजन की भावना रखते हुए प्रतिमार्ज्जन से विशुद्ध भूप्रदेश में उसी यज्ञिय भाव का ( देवयजन भाग का ) समावेश होजाता है । ( ' अहि वाऽस्यैतस्मिन् देवयजनऽ इषु भवति य एवमेतदूवेद ” ) । संहिताभाग के कितने हीं मन्त्र विशुद्ध आधिदैविक विज्ञान का ही निरूपण करते हैं । केवल विज्ञान का निरूपण करने वाले मन्त्र भाषादृष्टि से भी जटिल होते हैं, एवं अर्थदृष्टि से भी रहस्यमय होते हैं । प्रकृत मन्त्र ऐसा ही है । इस में एक अपूर्व आधिदैविक विज्ञान का निरूपण किया गया है । कल्पनारसिक कवियों की उत्ताल - तरङ्गों की आधारभूमि ' चन्द्रकलङ्क " का क्या स्वरूप है?, दूसरे शब्दों में चन्द्रत्रिम्ब में दिम्लाई देने वाला ' कृष्णचिह्न ' क्या है?, उक्त मन्त्र इमी प्रश्न का तात्यिक समाधान कर रहा है । वैदिक -- विज्ञान का तिरस्कार करते हुए लक्ष्मी के लाडले राजपुत्रों का अनुरञ्जन करने वाले, उनकी प्रशंसा में ह्रीं अपने जीवन को धन्य मानने वाले, वैदिक विज्ञान के परम शत्रु भारतीय उन कवियों से ही पहिले पूँछ देखिए | देखें, वे इस ' कलङ्क ' के सम्बन्ध में क्या उत्तर देते हैं? । बहुत दिनों की घटना है । इस सम्बन्ध
पृष्ठ 687
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीय अध्याय शतपथब्राह्मण पचमत्राह्मण में एक पद्म किसी कविश्रेष्ठ के मुख से हमारे श्रोत्रविवरों में बलात् प्रविष्ट होगया था । सम्भवतः सभी संस्कृतानुरागी निम्न लिखित उस पद्य से सुपरिचित होंगे कि श्रङ्क ं
केऽपि शशङ्किरे जलनिधेः, पङ्क परे मेनिरे ।
सारङ्ग कतिचिच्च सञ्जगदिरे भ्रच्छाय मैच्छन् परे ॥
इन्दौ यद्दलितेन्द्रनीलशकलः श्यामं दरीदृश्यते ।
तत् सान्द्र निशिपीतमन्धतमसं कुतिस्थमाचचमहे ॥
" कितने ही कल्पना - रसिकों का कहना है कि, चन्द्रमा में जो कृष्णभाव है, वह एक कलङ्क का सूत्रक है । चन्द्रमाने जारबुद्धि से बृहस्पति की स्त्री तारा ( गुरुपत्नी ) पर बलात्कार किया था । वही कलङ्क ( कालिमा, कालिख ) आजतक चन्द्रमा में दिखाई दे रहा है । कितने हीं मानते हैं कि, चन्द्रमा समुद्रमन्थन के अवसर पर समुद्र से निकला है । समुद्र से निकलते हुए समुद्र का पङ्क ( कचड़ ) भी चन्द्रमा में लगा रह गया | वही चन्द्रमा में दिखलाई दे रहा है । कितने हीं कहते हैं कि, चन्द्रमा के कोड़ में एक मृगशावक ( हरिणकाचा ) बैठा है । हरिण चन्द्रमा का वाहन है । उसका पुत्र भी उसी के साथ है । अल्पवयस्क होने से प्रीतिवश चन्द्रमा ने उसे अपने अङ्क ( गोट ) में प्रतिष्ठित कर रक्खा है । चन्द्रमा में दिखलाई देने वाला कृष्णभाव ( कालिमा ) वही क्रोडस्थ मृगशावक है । इसीलिए चन्द्रमा ' मृगलाञ्छन ' नाम से प्रसिद्ध है । कितने हीं विद्वान् कहते हैं कि, चन्द्रमा पर भूपिण्ड की छाया पड़ती है । चन्द्रमा में दृष्ट कृष्ण-भूमि की छायामात्र है । परन्तु हमारी दृष्टि से ( पद्यरचना करने वाले कवि के मत से ) चन्द्रमा में जो श्यामता दिखलाई दे रही है, वह रात्रि का ही अन्धकार है । रात्रि का जो घना अन्धकार था, उसे ही मानो चन्द्रमा ने पी लिया है । रात्रि का सम्पूर्ण अन्धकार चन्द्रमा के उदर में चला गया है । अतएव चान्द्री रात्रियों में ( शुक्लपक्ष में, विशेतः पूर्णिमा में ) अन्धकार नहीं रहता । वही पीतान्धकार चन्द्रकुक्षि में दिखलाई दे रहा है । " उपर्युक्त सभी पक्ष केवल कल्पना हीं कल्पना हैं । यद्यपि इस कल्पना में भी — ' भूच्छायमैच्छन परे ' यह वाक्य अवश्य ही आंशिकरूप से सत्य है । परन्तु इतर मिध्याशों के संदशपतित होने से उसकी भी मौलिकता तिरोहित ही होरही है । प्रकृत मन्त्र उसी सत्यांश का विश्लेषण कर रहा है, जैसाकि निम्नलिखित चन्द्रोत्पत्तिप्रकरण से स्पष्ट होजायगा । जिसप्रकार ‘ बहिर्ग्रह ' नाम से प्रसिद्ध शनि, बृहस्पति, मङ्गल, एवं ' अन्तर्ग्रह ' नाम से प्रसिद्ध शुक्र - बुध- पृथिवी सूर्य के उपग्रह माने जाते हैं, एवमेव चन्द्रमा पृथिवी का उपग्रह माना गया है । दूसरें शब्दों में- चन्द्रमा पृथिवी का पुत्र माना जासकता है । यद्यपि चन्द्रमा को ' अत्रिपुत्र ' माना गया है । परन्तु उस त्रिप्राण का भूपिएड से ही सम्बन्ध है । त्रिप्राण ही भूपिण्ड का स्वरूप- समर्पक बनता है । भूपिड भूतमय है । भूत की प्रतिष्ठा प्राण है । बिना प्राण के भूत एक क्षण भी प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । वही भूतप्रतिष्ठारूप वाङमय, किंवा वागूरूप प्राण ' अत्रि ' नाम से प्रसिद्ध है । चतुर्विध अन्नादाग्नियों का निरू-पण करते हुए, हमने पूर्व में पृथिवी में ' गार्हपत्य ' नाम के अन्नादाग्नि ' की सत्ता बतलाई है । इस अन्ना-६४६
पृष्ठ 688
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमत्राह्मण दाग्नि की नित्य - चिनेनिधय भेट से दो अवस्थाएँ होती हैं । चित्याग्नि भूतप्रधान है, इसी से भूषिएड बनता है । एवं त्रितेनिधेय ग्राग्न प्राणप्रधान है । यही लग मूर्ति अत्रिप्राय है । यही भृपिएड की प्रतिष्टा है । इसी प्राण का निरूपण करते हुए ऋषे कहते हैं --“ वागेवात्रिः । वाचा ( पार्थिवान्नादाग्निना ) झन्नमयते । अति नै नामैतद्यदत्रिरिति ’ ( श ० १४/५/२/२२ ) ॥ भूपिण्ड वागूरूप त्रिप्राणमय है । अतएव इसे भी वागूरूप ही कहा जाता है, जैसाकि निम्न लिखित श्रौत वचनों से स्पष्ट होजाता है-१ – “ तस्यवा एतम्याग्नेर्वागेवोपनिषत् " ( शत ० १० | ५ | १।१ । ) । २ - इयं ( पृथिवी ) वाक् " ( ऐ ० ५। ३३ । शत ० ४।६।६।१६ । ३ – " वागिति पृथिवी " ( जै ० उ ० ४।२२।११ ) । ४ - " वागेवावं लोकः " ( ० १४ | ४ | ३ | १ ) । ५ - - " साया सा वागग्निस्स: " ( जै ० उ ० १ | २८ | ३ ) ६ - " साया सा वागासीत् सोऽग्नि- ( अन्नादः ) रभवत् ' ( जै ० उ ० २।२।१ ) यह बागुरूप ( अन्नादाग्निरूप ) पार्थिव त्रिप्राण वस्तुतः श्राषोमय परमेष्टी का ही मनोता है । भृसु - अङ्गिरा अत्रि, इन तीनों का श्रभवस्थान आपोमय परमेष्टी ही है । इनमें भृगु, एवं श्रङ्गिरा, प्राण आगे जाकर घन - तरल- विरल अवस्था भेद से क्रमशः आपः- वायु - सोम, अग्नि- यम श्रादित, इन तीन तीन स्वरूपों में परिगात होजाते हैं । तीसरा त्रिप्राण भृगु - अङ्गिरा प्राणवत् तीन अवस्थाओं में परित न होकर मदा एकरूप ही रहता है । श्रतएव ' न त्रि ' इस निर्वचन के अनुसार भी इसे ' अत्रि ' कहा जाता है । ' अति ' ( अन्न ) -'न त्रित्रि शब्द के दो निर्वचन हैं । यही प्राण भूतसृष्टि का आलम्बन है । प्रत्येक भौतिक पदार्थ ( तेज, एवं आकाश को छोड़ कर ) धामच्छद ( जगह रोकने वाला ) है । साथ ही प्राय: प्रत्येक धामच्छद पदार्थ पारदर्शकता का प्रतिबन्धक है । इस पारदर्शकता का अवरोधक यही त्राण है । यह प्राण सूर्य का ( ज्योति का ) प्रतिबन्धक है । जिस धामच्छद पदार्थ में त्रिप्राण की प्रधानता रहती है, उसकी पारदर्शकता नष्ट हो जाती है । सौररश्मियाँ उम से पारावारीगण नहीं हो सकती । तमोमयी बामा भूतसृष्टि का अधिष्ठाता यही प्रारण है । ऋतुकाल में स्त्री के रज में तमोमयी सृष्टि का मूलभूत यही त्रिप्राण रहता है । तएव ऋतुमती को ' आत्रेयी ' कहा जाता है! दिव्य सौरज्योतिर्मय देवताओं की अपेक्षा यह प्राण मलीमस है | इसी ग्रभिप्राय से श्रुति कहती है- ' पामानोऽत्रिणः " ( प ० ब्रा ० ३ ११ ) – रक्षांसि - पारमत्रिणः ” ( ऐ ० २२ ) । इसी पाप्मभाव के कारण धम्मशास्त्र में ऋतुमती स्त्री के स्पर्श का निषेध हुआ है । पृथिवी का मूल उपादान पानी ही है । इसीके साथ अन्नावाग्निमय धामच्छद पारदर्शकता का प्रतिबन्धक आापोमय पारमेष्टय त्रिप्राण भी संयुक्त रहता है । अत्रप्राण के परिपाक में चिल्याग्निमय भूपिण्ड की स्वरूप-६५०
पृष्ठ 689
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण पञ्चमब्राह्मण निष्पत्ति होती है है । पिण्ड पानी और अग्नि ( अत्रि ) का समन्वितरूप है । इसी अग्नि के सम्बन्ध से इसके लिए “ यथाग्निगर्भा पृथिवी " यह कहा जाता है । भूपिण्ड क्या है, चित्याग्निमूर्त्ति अन्नादाग्नि-रूप अत्रिप्राणमूर्त्ति है । यह भूषिण्ड क्रान्तिवृत्त पर परिक्रमा लगा रहा है । बृह्ती केन्द्र - स्थित सूयं के चारों ओर ' दीर्घवृत्त ' ( अण्डाकारवृत्त ) रूप ' क्रान्तिवृत्त ' पर घूमता हुआ भूपिण्ड सम्वत्सरगति का अधिष्टाता बनता है, एवं स्वाक्षपरिभ्रमण से दैनंदिन गति का प्रवर्त्तक बनता हुआ अहोरात्र का स्वरूप-सम्पादक बनता है | स्वाक्ष, एवं साम्वत्सरिक परिभ्रमण करते हुए पार्थिव अग्नि में दसों दिशाओं में व्याप्त दिक्सोम की निरन्तर ग्राहुति होती रहती है । यही पार्थिव अग्नीषोमात्मक यज्ञ है । पार्थिव अग्नि विकासघर्म्मा है, एवं यह भूपिण्ड के खण्ड खण्ड करना चाहता है । परन्तु संकोच-धम्म सो अग्नि में बहुत होकर उसके इस विकास का दमन करता रहता है । श्रागत सोम घनादि तीन अवस्थाओं में परिणत रहता है । भूविडावच्छिन्न सोम घनावस्थापन है, इसी को ' ध्रुवसोम ' कहा जाता है । पृथिवी के पञ्चदशस्तोमरूप अन्तरिक्ष में व्याप्त पार्थिव सोम तरतलावस्थापन्न है, इसी को ' धर्त्रसोम ' कहा जाता है । एवं पृथिवी के २१ एकविंशस्तोमरूप द्यलोक में पार्थिव सोम विरलावस्थापन्न प्राणावस्थापन ) है, इसी को ' घरुण सोम ' कहा जाता है । तात्पर्य यही है कि, दिक्सोम पार्थिव वागग्नि में बहुत होता है । सोमाहुति से प्रीत त्रिप्राणमय पार्थिव वागग्नि ' अङ्गिरा ' नाम धारण करता हुआ ऊपर की ओर ( युलोक की ओर ) जाता है । इस वागग्नि की घनादि तीन अवस्थाएँ होजातीं हैं । भूपिण्डावन्छिन्न सोममय पार्थिव अग्नि ' घन ' है । पञ्चदशस्तोमावच्छिन्न, वायु नाम से प्रसिद्ध दिव्याग्नि ' तरल ' है । एवं एकविंशस्तोमावच्छिन्न, आदित्य नाम से प्रसिद्ध दिव्याग्नि ' विरल ' है । प्रग्नि की इन तीन अवस्थाओं के कारण तद्गर्भित सोम की भी उक्त तीन अवस्थाएँ होजातीं हैं । अन्तरिक्ष में पार्थिव वागग्निरूप त्रिप्राण व्याप्त रहता है । इसी के गर्भ में तरलसोम प्रतिष्ठित रहता है । भूपिण्ड घूम रहा है | अन्तरिक्षस्थ सोम यहीं ( अन्तरिक्षप्रदेश में ) उस त्रिरूप वागग्नि से प्रवृक्त होकर एक स्थान में घनी-भूत होता रहता है । यही पृथिवी की तीन साम्वत्सरिक परिक्रमाओं से एकीभूत पार्थिव तरल सोम चन्द्रत्रिम्ब रूप में परिणत होजाता है । यह पृथिवी के प्रवृक्त सोमरस से उत्पन्न हुआ है, इसीलिए तो इसे पृथिवी का उपग्रह माना जाता है, एवं त्रिनेत्र के प्रसवण से उत्पन्न होने के कारण यह ' अत्रिपुत्र ' भी माना जाता है । चन्द्रमा के इसी औपत्तिक- रहस्य को लक्ष्य में रखकर पुराण कहता है-पिता सोमस्य वैं विप्रा जज्ञेऽत्रिर्भगवानृषिः । काष्ठकुव्यशिलाभूत ऊध्नवाहुर्महाजुतिः ॥ १ ॥
सुदुरं नाम तपो येन तप्तं महत् पुरा ।
त्रीणि वर्षसहस्राणि दिव्यानी हि नः श्रुतम् ॥ २ ॥
तयोर्ध्वरेतसस्तत्र स्थितस्यानिमिषस्प हैं ।
सोमवं तनुरापेदे महाबुद्धिः स वै द्विजः ॥ ३ ॥
ऊर्ध्वमाचक्रमे तस्य सोमचं भावितात्मनः ।
नेत्राभ्यामत्रवत् सोमो दशधा द्योतयन् दिशः ॥४ ॥
— ब्रह्माण्डोपोद्घाते - हरिवंशे व ६५१
पृष्ठ 690
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीय अध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमत्राह्मण देवताओं के यजन ( सङ्गतिकरण ) दि ' अग्निः सर्वा देवता: ' के अनुसार अग्नि सांदैिवत्य को अवश्य है । ही इन ' देवयजन ' ( देवताओं के यज्ञरूप का एकमात्र सावन सोमाहुति ही है तब हम सोम बहुत होने वाला पार्थिव सोम ही नेव-यजन का साधन ) कह सकते हैं । भूषिटस्थ अग्नि सोम में पूर्वप्रदर्शित क्रमानुसार चन्द्ररूप में परिणत यजन है । यही देवगजनभूमि है । यही देवयजन । क्योंकि पितरप्राण का अधिष्ठाता एकमात्र सोम ही दुआ है । पार्थिव देवयजन सोम पितृश्राणमय है ( यजुः सं ० ) यह कहा जाता है जिसप्रकार देवताओ है अतएव पितरों के लिए ' पितरः सोम्प्रासः ' अन्तर्याम - सम्बन्ध की प्रधानता से " स्वस्मिन् धत्त ' का अन्न ' स्वाहा ' कहलाता है, एवमेव पितरों का अन्न के अनुसार ' स्वधा ' नाम से व्यवहृत होता है । स्वधा अथवा स्वं. ( आत्मानं ) धत्ते " इस निर्वचन पितृमाण की रासे पार्थिव सोमाय सीमस्य है एवं यह पितरमय है इसी स्वधारूप को लक्ष्य में रखकर - " स्वधाभिः - चन्द्रमसि -देवयजन भाग चन्द्ररूप में परिणत होता है, इसी 1 रहस्य अयुक्त देवयजन ( सोम ) से चन्द्रमा बन गया है । ऐरयन् " यह कहा गया है । आरम्भ में पृथिवी के चन्द्रमा प्रकाशित होगया | परन्तु चन्द्रमा के मध्य में चन्द्रमा के साथ सौर रश्मित्रों का सम्बन्ध हुआ, बान्द्रगर्भित सोम पार्थिव कृष्णभाग से युक्त था । इस पार्थिव सोम घनरूप से प्रतिष्ठित था । दूसरे शब्दों मे ' न बन सका । अतएव वहां सौररश्मियों की प्रतिष्ठान पार्थिच भाग की प्रधानता से यहाँ का सोम ' बी दे रहा है । होती । यही पार्थिवदेवयजनभाग हमें आज भी काला दिखाई आज पृथिवी से निकलने वाला वह देव--सृष्टि के आरम्भ में देववचन के द्वारा चन्द्रमा बना था । चान्द्रसोम श्रोषधि--( पोषण - पुष्टि ) कर रहा है यजनभाग उसी रूप से चन्द्रमा का स्वरूप - सम्पादन यह मयत वश्य ही आय में डालने वाला है । निर्माण में खर्च देता रहता है । नियन्ता एवं चन्द्रमा, इन दो स्थानों में इस की ' मोम देवयजन ' है, वह 1 सिद्ध होचुका विशुद्ध पार्थिवाग्नि देवयजन सोम प्रतिष्ठित है, एवं सर्वथा शुद्ध-उपलब्धि हो सकती है । विशुद्ध पार्थिवाग्नि में प्राप्त वह पावन नहीं होसकता । उसकी केवल भावना ही की जाती है । रूप चन्द्रमा में प्रतिष्ठित है यह वैचयज्ञ में उखाड़ी हुई मिट्टी इन में किसी में भी विशुद्ध दूसरा है पार्थिवदेवयजन । श्रोषधि- तृण - खनन व्यापार से वाला ग्रागन्तुक, किंवा अनिरूप नहीं है । प्रतिमान का तात्पर्य यही है कि, देवयजन भूस्तरपर भाग रहने प्राप्त होनाय इसी पार्थिम देवयजन-पयिभाव हट जाय एवं विशुद्ध पार्थिवाग्निरूप आता है । पार्थिव देवयजन के साथ ही चन्द्र-सम्पति को प्राप्त करने के लिए प्रतिमाफक किया इस के लिए " क्रूरस्य विमुषः " देवयजन सम्पत्ति भी हमें ( भावनामय मन्त्रवल से ) प्राप्त हो जिसप्रकार जाय उपासनकाद में केवल भावना इत्यादि मन्य बोलते हुए प्रतिमार्जनकम्मे किया जाता है बल से है, एवमेव यहाँ भी भावना के के बल पर विदूरस्थ उपास्य देव अन्तरात्मा में प्रतिष्टित होजाता होजाती है । यह तो हुआ इस प्रक--अवश्य ही उस बेदि में वह चान्द्रदेवयजन संम्पत्ति प्रतिष्टित ( ऐतिहासिक ) रहस्य भी अवगत कर रंग का याविदैविक अर्थ अब दी चार पहियों में आधिमीतिक लीजिए । ८५२